गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

धरती

धरती 

मै बताता हूँ.

धरती ने इक आग का गोला
निगल लिया था 
और 
वो जलती रही
भीतर ही भीतर. 
ताकि 
तुम पर आंच ना आये. 
पर उसकी छाती को 
इतना न कोंचो 
कि
वो उगलने पर 
मजबूर हो जाये.

- वाणभट्ट 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

सिस्टम के अन्दर : अन्ना हजारे

मिश्र जी ने बड़े बुझे मन से स्टाफ रूम के अन्दर कदम रखा ही था, कि एक फुसफुसाती आवाज ने उनका स्वागत किया "आ गए अन्ना हजारे". आवाज इतनी तेज थी कि उन्हें सुनाई दे जाये. और इतनी धीरे भी थी कि उन्हें लगे उनसे किसी ने कुछ नहीं कहा. कुछ लोगों के फीं-फीं कर के हँसने की आवाज भी उनके कानों तक पहुँच ही गई. ये अन्ना हजारे अनशन पर क्या बैठे. ईमानदारों को चिढाने के लिए एक नया पर्यायवाची मिल गया. मिश्र जी का दम ऐसे माहौल से घबराने लगा था. मन हुआ इस रोज रोज की चिक-चिक से तो अच्छा था कि नौकरी को लात मार के वाकई अन्ना के साथ हो लिया जाये. ये सिस्टम तो सुधरने से रहा, कहीं खुद को ही ब्रेन हम्रेज न हो जाये और पूरी जिंदगी बिस्तर पर घुट-घुट के काटनी पड़ जाए.

मिश्र जी ने जब नौकरी शुरू की, तो माता-पिता के अनुमान से इससे अच्छी नौकरी हो ही नहीं सकती थी. शिक्षा और शोध का पुनीत काम था. बेटे के टेम्परामेंट के अनुसार. इस नौकरी में किसी की न तो चाकरी बजानी थी न ही कोई ऊपरी कमाई थी. बस अपने काम से काम और तनख्वाह इतनी बुरी भी नहीं थी की कहीं हाथ फैलाना पड़े. बेटा ईमानदारी पर प्रवचन देता था, सो उसके लिए इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता था. मिश्र जी ने भी यही सोच कर इस नौकरी के लिए नेट क्वालीफाई किया. जब उसके बाकी साथी नीली बत्ती के चक्कर में दिन-रात एक कर रहे थे, मिश्र जी ने अध्ययन-अध्यापन-शोध को अपनी रोजी का जरिया बनाने का निश्चय किया.

सोचा एक-आध बच्चे भी अपनी तरह ईमानदार और देश भक्त बना लिये तो जीवन सफल हो जायेगा. बच्चों को आजकल जो शिक्षा स्कूलों में नहीं मिलती, वो मिश्र जी की क्लास में बिना माँगे मिल जाती. केमिस्ट्री के साथ-साथ आदर्श, उसूल और देश भक्ति की घुट्टी फ्री मिला करती थी. बच्चे भी अभी तक पूरी तरह बड़े नहीं हुए थे, सो मिश्र जी के विचारों से उद्वेलित हो जाते. मिश्र जी कहते बताओ भारत से अंग्रेजों को भगाने में इतने साल क्यों लग गए. पता नहीं इतने वर्षों से विदेशी लुटेरे भारत को ही लूटने में क्यों लगे रहे. आज भी चारों तरफ भूरे अंग्रेजों का बोलबाला है. अब ये देश को लूट रहे हैं और पूरा देश इस तमाशे को देख रहा है. कारण सिर्फ एक है, देश में देशभक्ति की कमी. भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फ़ैल गया है. हर कोई इससे परेशान है पर जब अपना मौका आता है इसे रोकने और इससे लड़ने का, तो लोग शॉर्टकट ही अपनाते हैं. बहरहाल कुछ भी हो मिश्र जी ने अपने देशप्रेम और ईमानदार छवि के कारण एक अलग इमेज बना रखी थी. अधिकतर लोग उनको सनकी या झक्की समझते और उनके खैरख्वाह, उन्हें बेवक़ूफ़. पर बच्चों में वो काफी लोकप्रिय थे.  

बच्चे भी देखते थे कि मिश्र जी वाकई गाँधीवादी कि तरह रहते थे. सादा जीवन. कर्त्तव्य के प्रति समर्पण. जब बाकि टीचर पान-मसाला खा-खा कर कॉलेज कि दीवारों को लाल करने में लगे रहते. मौका मिलते ही बच्चों को कुंजी या गाइड रेकमेंड कर देते. पढ़ाना न पड़े इसलिए बच्चों को बताते कि बड़े-बड़े एक्जाम के लिए सिर्फ एक अदद डिग्री की आवश्यकता है. इसलिए विद्यार्थी को डिग्री से ज्यादा कम्पटीशन की तैयारी पर ध्यान देना चाहिए. अगर वो सारा दिन कॉलेज में क्लास करने में समय व्यर्थ करेगा, तो कम्पटीशन की तैयारी कब करेगा. जब गुरुजन पास कराने की तो गारेंटी ले ही रहे हैं, तो बच्चों को भी क्या कुत्ते ने काटा है कि उनसे क्लास लेने कि बात करें. जब पढ़ाने कि ज़रुरत नहीं तो उनके पास समय ही समय था. जिसे कुछ पॉलिटिक्स करने में बिताते, कुछ कोचिंग के माध्यम से पैसा कमाने में. कुछ प्रिंसिपल के चारों ओर गणेश परिक्रमा में समय जाया करना पसंद करते. उदण्ड-उत्श्रृंखल टाइप के बच्चे मिश्र जी से दुखी भी रहते थे. एक तो अटेंडेंस कम होने पर एक्जाम में बैठने न देते और ऊपर से पास होने के लिए पढाई भी करनी पड़ती.

प्रिंसिपल भी उनकी खरी-खरी बातों से आजिज़ आ चुका था. सो उनको दूर रखना ही पसंद करता था. कुछ लग्गू-भग्गू भी, थे जो प्रिंसिपल और मिश्र जी कि इस दूरी का फायदा उठा कर प्रिंसिपल का कान भरा करते थे. प्रिंसिपल भी कोई दूध के धुले न थे, इसलिये जो भी पैसा कालेज के उत्थान के लिये, शोध के लिये, लिब्रेरी के लिये, कंप्यूटर के लिये, फ़र्निचर के लिये, केमिकल के लिये, उपकरणों के लिये, बच्चों के लिये, आता उस पर अपनी कृपा-दृष्टि बनाये रखते. लग्गू-भग्गू भी शेर के साथ सियार वाले भाव से उनके साथ जुटे रहते. शेर की जूठन से ही कितनों के पेट भर जाते. शेर भी दलेर मेंहदी कि तर्ज पर एलान करता फिरता कि साडे नाल रहोगे तो ऐश करोगे...

मिश्र जी अपनी दुनिया में मगन थे और दुनिया अपने में. हर केमिकल के लिए प्रिंसिपल कि चिरौरी, ऑफिस में बाबुओं के चक्कर काटना मिश्र जी के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाता था. बच्चों को प्रेक्टिकल तो करने ही थे. कुछ एम्एससी और पीएचडी के भी छात्र थे. सो मिश्र जी ने धीरे-धीरे अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा शोध कार्यों को समर्पित करना शुरू कर दिया. वैसे भी संतोषी आदमी के लिए पैसा की आवश्यकता उतनी ही है, जितनी उसकी वास्तविक आवश्यकतायें. मिश्र जी सादा जीवन जीने में भरोसा रखते थे. और लोगों को ये घर फूँक तमाशा देखने जैसा लगता. शोध के लिये अपना पैसा बर्बाद करना कहाँ की समझदारी है. शोध पत्र छापने के लिए पेपर का प्रोपर चैनल से जाना अनिवार्य है. प्रिंसिपल जो खुद भी केमिस्ट्री के क्षेत्र से थे, अपना नाम घुसेडने के लिये मिश्र जी पर कई बार जोर आजमाने की कोशिश की, पर मिश्र जी ने एक न सुनी. और कभी उनका नाम अपने शोधपत्रों में शामिल नहीं किया. जंगल के शेर को ये नागवार लगता पर हाथी की सवारी करने की हिम्मत भी न पड़ती. बस वो घात का इंतज़ार करता रहता. 

उसी समय एक नेटवर्क प्रोजेक्ट सेंकशन हो गया, पूरे एक करोड़ का. मिश्र जी उसके मुख्य इन्वेस्टिगेटर बने. प्रिंसिपल ने लखनऊ तक पूरा जोर लगा लिया कि एक करोड़ रुपया किसी सनकी के हाथ में देना उचित नहीं है. क्या कमाएगा और क्या लौटाएगा. पर ये पैसा दिल्ली से आया था, और दिल्ली भी किसी अंतर्राष्ट्रीय फंड से आया था, जिसने खुद मिश्र जी को मनोनीत किया था, इसलिये ये पैसा तो मिश्र जी की ही कलम से खर्च होना था. मिश्र जी के कार्य करने की अपनी ही शैली थी. फर्म वाले आते तो पूछते सर कितना कमीशन चलेगा. मिश्र जी कहते कितना कमीशन दोगे. सर १० परसेंट का दस्तूर है. तो मिश्र जी कहते, १० परसेंट में मेरे छात्रों के लिये कम्प्यूटर गिफ्ट कर दो, या एक्स्ट्रा केमिकल्स ही दे दो. क्लास के लिये कुछ फर्नीचर बनवा दो. प्रिंसिपल और ऑफिस असहाय सा इस पैसे को लुटते हुये देखता. उनके हिस्से इसकी एक पाई भी नहीं आ पा रही थी. 

वो मौके की तलाश में थे और ऑडिट ने उनको ये मौका भी दे दिया. परचेज प्रोसीजर में निगोशिएशन की गुंजाईश नहीं होती. मिश्र जी ने हर चीज में ये गलत काम किया है. मिश्र जी जानते थे की अगर उन्होंने निगोशिएट न किया होता तो यही पैसा प्रिंसिपल और ऑफिस की जेब में जाता. ऑडिट भी ये मान कर चलता है कि पैसा ख़र्च हुआ है, तो कमीशन कहीं न कहीं तो गया ही होगा. कम से कम हिन्दुस्तान में तो ये एक प्रथा सी बन गयी है. लिहाजा हर परचेज पर मिश्र जी को एक मेमो मिला और उसकी रिप्लाई से ऑडिट को न संतुष्ट होना था, न वो संतुष्ट हुआ. लखनऊ से जवाब तलब हो गया, सो अलग से. हसीन मौका देख प्रिंसिपल ने सस्पेंशन का लेटर थमा दिया. मिश्र जी पर पूरा जाँच आयोग बैठा दिया गया. जिसमें सारे लग्गुओं और भग्गुओं को शामिल कर लिया गया. मिश्र जी निष्पक्ष जाँच सही लोगों द्वारा किये जाने के लिये लखनऊ-दिल्ली लिख रहे हैं. ऊपर सब अपने-अपने कामों में मसरूफ़ हैं. किसी के ये गुमान भी नहीं है कि कोई ऐसा आदमी भी इस देश में हो सकता है जो अपने से पहले देश कि सोचता हो. और आज के युग में भी गाँधी की नक़ल करने की गलत कोशिश करता हो. 

मिश्र जी की लिखा-पढ़ी जारी है. नक्कारखाने में तूती की आवाज़ भी कभी सुनायी देती है. मिश्र जी ने फंडिंग एजेन्सी विश्व बैंक को भी अपनी सफाई भेजी है जो प्रॉपर चैनल से जानी है. मिश्र जी का विश्वास रोज डोल जाता है. पर गाँधी की फोटो जिसकी वो रोज पूजा करते हैं, उन्हीं एक संबल देती है, कि जब वो अकेले फिरंगियों से लड़ सकता है तो ये तो अपने रंग की चमड़ी वाले हैं. अंग्रेजों के अपने नियम और क़ानून थे इसलिए शायद उनसे लड़ना आसान था. वो ताकत का दुरूपयोग करके गाँधी को मरवा भी सकते थे. पर सत्याग्रह कोई गुनाह तो नहीं, इसलिए बेचारे मजबूर हो जाते. भूरे अंग्रेजों का न कोई नियम है, न क़ानून, न ईमान है, न धरम. इनसे लड़ना बहुत कठिन है. ये तो किसी से कह कर किसी को भी ठिकाने लगा दें. जिन्दा रहेगा तो सबको परेशान करेगा. इस पर मिश्र जी ने लगता है गौर नहीं किया. वर्ना उन्हें लगता वो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. 

मेरे हिसाब से अब उनके पास दो ही विकल्प हैं - १. सिस्टम में रह कर हारी लड़ाई को जारी रखें (जिसमें उनका टर्मिनेशन पक्का दिख रहा है) या २. सिस्टम को टाटा-बाय-बाय कर अन्ना के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में जुड़ जायें. पर ये तय तो मिश्र जी को ही करना है. 

- वाणभट्ट                

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

ईमानदार का भूत

ऐसा तो होना ही था उसका हश्र. भरे चौराहे पर ठिचआँ...ठिचआँ... की आवाज़ हुयी. एक चलते-फिरते आदमी को लाश में तब्दील होते भला देर लगती है क्या? हमेशा की तरह किसी ने कुछ भी न देखा, न सुना. कुछ देर बाद कौतूहल जागा. सोये शहर को मसाला मिला था, कुछ देर के लिये ही सही. "बेचारा यंग ही तो था", "बदमाशों का दुस्साहस तो देखो", "देखने में तो शरीफ़ लगता था", "शहर तो शरीफ़ों के रहने लायक ही नहीं रहा", "आजकल लोगों के लफ़ड़ों का भी तो पता नहीं रहता", "भाई ऐसा काम ही क्यों करो की ये नौबत आये", आदि-आदि. कोई किसी का मुँह तो बंद कर नहीं सकता, लिहाज़ा, जितने मुँह उतनी बातें. कल यही घटना अख़बार में भी छप सकती है. जाहिर है जब तक अगला मसाला ना तैयार कर ले ये शहर, इस खबर का फैलना ज़रूरी है. नहीं तो लोगों को बातों का टोटा पड़ सकता है. बड़े-बड़े शहरों में ऐसा  होता ही रहता है.

पुलिस को आना था, सो पुलिस आयी भी. लाश कहीं ख़ुद-बख़ुद चल ना दे, इस आशय से कुछ लोग उसे घेरे खड़े थे. जिन्हें जल्दी थी, वो अपनी साइकिल, स्कूटर, या कार पर चढ़े-चढ़े  पूरा विवरण पाने को लालायित थे. पर अब तक खाकी वर्दी में क़ानून आ चुका था. "सालों कभी मर्डर नहीं देखा क्या, खामख्वाह मजमा लगा रखा है. जाओ अपना-अपना काम करो". जिन लोगों में जिज्ञासु प्रवृत्ति की जरा भी कमी थी, उन्हें यकायक ज़रूरी काम याद आ गये. कुछ लोग पुलिस की मदद करने को तत्पर थे, सो उन्हें तुरंत नहीं हाँका जा सकता था. आखिर प्रजातंत्र भी कोई चीज़ है. पुलिसियों से अधिक अच्छी तरह ये बात भला कौन समझ सकता है. रोज़ ऐरे-गैरे नेताओं को झेलते रहते हैं. घंटे भर में सब सरक लेंगे, फिर इत्मीनान से काम किया जायेगा. दरोगा सजीवन पांडे ने सोचा. ये तो अच्छा हुआ की दो ठुल्लों को लेते आये, वर्ना भीड़ को भागने में ही लगा रहना पड़ता. दरोगा जी को अपनी विलक्षण चतुर बुद्धि पर बड़ा अभिमान था. और हो भी क्यों नहीं. उसके कई मेधावी साथी दुनियादारी में उससे कहीं पीछे थे. वो जिस काम में हाथ लगाता, लक्ष्मी जी से रहा ना जाता. पीछे-पीछे चलीं आतीं. तभी तो पैंतीस साल की कम उम्र में उसके पास वो सब कुछ था, जिसे पाने में बहुतों की उम्र बीत जाती है.

दरोगा जी मोटर-साइकिल को कुर्सी बना कर उस पर विराजमान हो गये. लाश की शिनाख्त का काम जोरों पर था. एक ठुल्ला घडी और कपड़ों से उस मरे आदमी की हैसियत तौल रहा था. तो दूसरे को उसका पर्स वज़नदार लग रहा था. पर्स में पैसे कम थे और फ़ालतू के कागज़ ज़्यादा. उनमें बन्दे का आई-कार्ड भी पड़ा था. कार्ड देखते ही ठुल्ला 'युरेका' अंदाज़ में चिल्लाया "जी जनाब! मिल गया" एक पल तो तो दरोगा को लगा कि क़ातिल का कोई पुख़्ता सबूत हाथ लग गया. कार्ड देखते ही उसके होंठों पर मुस्कान फैल गयी. लक्ष्मी के आने कि आहट उसे स्पष्ट सुनाई दे रही थी.

आई-कार्ड क्या था, पूरा बायोडाटा था. मरने वाले का नाम मानस हंस था. दरोगा मन ही मन हँस रहा था, कि जात छिपाने को आजकल लोग क्या-क्या सरनेम लगा लेते हैं. पर जात भी कहीं छिपती है? लोग सब पता कर लेते हैं और अपनी बिरादरी को तो सूँघ कर पहचान लेते हैं. नहीं तो भला हिंदुस्तान में शादियाँ कैसे होतीं? साला विकास प्राधिकरण में इंजिनीयर था. जरूर कमीशन के चक्कर में ठेकेदार को रगड़ रहा होगा. तभी ये गति हुयी है. पता नहीं लोग कितना लालच करते हैं. संतोषम परम सुखम्. अपने राम तो न आते को रोकें न जाते को टोकें. इंजिनीयर की लाश है, तो कुछ दे कर ही जायेगी. वर्ना लावारिस में निपटा देते. अब तहक़ीक़ात तो करनी पड़ेगी.

सरकार मोबाइल ड्यूटी तो देती है, पर मोबाइल नहीं. अपने मोबाइल से ही प्राधिकरण फ़ोन करना पड़ेगा. अपनी ज़मीन के चक्कर में प्राधिकरण के एसई साहब का नंबर फीड है. चलो उन्हीं को फ़ोन लगता हूं. 

"एसई साहब...!"
"हाँ, बोल रहा हूँ."
"मै सजीवन पांडे, दरोगा. आप से मिला था. साहब हमारे प्लोट्वा का क्या हुआ? कोने वाले प्लाट के लिये आपसे विनती की थी."

एसई साहब के पास ऐसे फ़ोन आये दिन आते रहते थे. कोने का तो क्या, कोई भी प्लाट वो बिना फ़ायदे के अपने बाप को न दिलायें. ऐसा नहीं कि उन्हें अपने बाप से प्यार नहीं था, पर सिस्टम में और लोगों का हक़ मारा जाता. और ये उनके उसूल के खिलाफ़ था. इसलिये सिस्टम को पारदर्शी बनाते हुये अपने कार्यकाल में नीति बनाई - ना बाप बड़ा ना भैया. और इस नीति पर अब तक अक्षरश: पालन भी किया. कोने की ज़मीन पर बीस प्रतिशत एक्स्ट्रा. दरोगा अपने आप को ज्यादा होशियार समझ रहा है. 

प्रत्यक्ष रूप में बोले "सजीवन जी मै अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करुँगा. पर आजकल आप तो जानते ही हैं पूरी प्रक्रिया कंप्यूटर द्वारा की जाती है इसलिये दिक़्क़त है. आप तो अपने ही आदमी हैं, कोई न कोई प्लाट अवश्य दिलवाऊँगा". एसई साहब ने मजे हुए नेता सा जवाब दिया. ऐसे ही थोड़ी न इस पद पर पहुँचे थे. बड़ों-बड़ों को चरा कर ये मुकाम हासिल किया है. फिर ये मामूली दरोगा क्या चीज़ है?

मगर सजीवन पांडे ने भी इतने साल कच्ची गोलियां तो खेली नहीं थी. ऐसे थोड़ी नहीं चरा सकते एसई  साहब. ट्रम्प कार्ड पांडे के पास था ही. पांडे ने संयत आवाज़ में कहना शुरू किया "साहब आपके यहाँ कोई मानस हंस नाम का  इंजीनियर है क्या?"

अब चौंकने की बारी एसई साहब की थी. कहीं मानस ने विभागीय भ्रष्टाचार की एफ आई आर तो नहीं लिखा दी. हर ठेकेदार से काम की गुणवत्ता को लेकर चक-चक. जब से आया है, ठेकेदार कतराने लगे हैं. कहते हैं या तो क्वालिटी ले लो या कमीशन. साला बड़ा ईमानदार बनता है. हेडक्वाटर को भी यही नमूना मिला था.

"हाँ-हाँ है तो. बड़ा ही अनसोशल और इंप्रैक्टिकल आदमी है. कोई ख़ास बात?"

"साहब उसे किसी ने चौराहे पर निपटा दिया. ज्यादा खाऊ था क्या? लगता है ठेकेदारों ने काम लगा दिया."

ये वाकई बड़ी खबर थी. एसई साहब सिहर से गये. मर्डर तक बात पहुँच जायेगी ऐसा उन्हें आभास न था. कोई हार्डकोर क्रिमिनल तो वो थे नहीं. सिर्फ वाईट कॉलर क्राइम उनकी स्पेशिऐलिटि थी. पर अब जो हो गया, सो हो गया. मामले को निपटाना होगा. माया में बड़ी ताक़त है, ऐसा उनका अगाध विश्वास था. वो रिहर्सल करने लगे, मानस की शोक सभा का. बड़े ही कर्मठ और ईमानदार अधिकारी थे मानस जी. कर्तव्यपरायणता तो कोई उनसे सीखे. प्राधिकरण के लाभ के लिए उन्होंने बड़े-बड़े बिल्डरों से लेकर राजनेताओं तक को नहीं छोड़ा. वो एक महान कर्मयोगी थे. पर अफ़सोस इस भ्रष्ट सिस्टम में वो फ़िट न हो सके और बाध्य होकर उन्हें आत्महत्या जैसा गलत निर्णय लेना पड़ गया. भ्रष्टाचार से लड़ना आत्महत्या करना ही तो है, इस देश में. अगर इस हत्या को आत्महत्या सिद्ध कर दिया जाये तो कोई बवाल नहीं होगा. ये सोच कर वो मुस्कराये. ये दरोगा साला किस दिन काम आयेगा. वो और सोचते पर दरोगा को जल्दी थी. आखिर मोबाइल तो उसी ने किया था, खामख्वाह बिल बढ रहा है.

दरोगा ने पूछा "क्या साहब कोई ख़ास बात है?"

"नहीं ऐसा कुछ नहीं, पर क्या तुम इसे आत्महत्या दिखा सकते हो. तुम्हारे काम का मै ख़ुद ख़्याल रखूँगा. साले के न आगे कोई है, न पीछे. हमीं लोगों को फूंकना-तापना पड़ेगा. हत्या दिखाओगे तो ख़ामख्वाह हमहीं लोगों को परेशान करोगे. फिर कोई सीआईडी की डिमांड करेगा कोई सीबीआई की."

" साहब वो कोने वाला प्लाट".

"क्या सजीवन, की ना छोटी बात. तुम हमारा ख़्याल रहो, मै तुम्हारा. रिपोर्ट में  सुसाइड ही आना चाहिये".

दरोगा के नथुनों में लक्ष्मी की गंध बढ़ती जा रही थी. "साहब मेरा तो ठीक है पर आजकल बलेस्टिक और पोस्टमार्टम वाले बहुत हावी हो गये हैं. जरा सी कलम हिलाने का अनाप-शनाप माँग लेते है."

"देखो पण्डे, दाम जो तुम चाहो, पर काम जो हम चाहें.". एसई साहब चाँदी के जूते की अहमियत से भली-भांति वाकिफ़ थे. ऐसे ही जूते खा-खा के वो इस ऊँचे ओहदे पर पहुँचे थे. इंजिनियर हो कर जब वो बिक सकते हैं तो इस दरोगा की क्या बिसात.

"पंद्रह लाख"

"ठीक है. दफ़न करो इस लफड़े को". सौदा पक्का हो गया था. बेफ़जूल बातों की अब गुंजाईश नहीं थी. एसई साहब ने खुद ही फ़ोन काट दिया.

एसई राम विलास वर्मा ने अपने पचीस साल की प्राधिकरण की नौकरी में मानस हंस सा ईमानदार और काबिल आदमी दूसरा नहीं देखा था. लगता था, मानो अभी भी कॉलेज में पढ़ रहा हो. हर समय ऊँची-ऊँची आदर्शवादी बातें. मच्योरिटी नाम की तो चीज़ ही नहीं थी. जरा भी मच्योर होता तो क्या अपना अच्छा-बुरा न समझता. गाँधी का चेला बनता था, साला. न किसी को अपनी जात बताता था, न किसी की पूछता था. कहता था  मेरा धर्म भारतीय है. इस देश को अच्छे लोगों की ज़रूरत तो है. पर इतना अच्छा नहीं चलता. पूरा का पूरा सिस्टम ही चौपट कर के रख दिया था. क्या हम विकास नहीं चाहते, सरकार ने इतना ऊँचा पद ऐसे ही तो नहीं दे दिया. जब से नौकरी शुरू की तभी से ऊपर वालों को खुश रखने के लिये क्या-क्या पापड़ नहीं बेले. कभी बॉस के सामने सर नहीं उठाया. वफादारी से काम करने का ही ये परिणाम है, जो आज एसई के पद पर बैठा हूँ. खुद सिस्टम फ़ॉलो करो और नए लड़कों को सिस्टम सिखाओ. यही तो अपनी सफलता का मंत्र रहा है. ज्यादातर लड़के समझदार होते हैं. दो-चार साल में फ़िट हो जाते हैं. पर मानस तो जैसे न सुधरने की कसम खा के आया था. साम-दाम-दंड, किसी से भी काबू में नहीं आ पाया. शायद उसकी मिट्टी को यही बदा था. हर कोई अपनी किस्मत लिखा के आता है, वर्ना प्राधिकरण की नौकरी में तो बाबू से लेकर अफ़सर तक सबकी मौज है. एसई साहब की मोटी चमड़ी अभी भी ख़ुद को जस्टिफ़ाई करने में लगी थी.

हम सब तो सिस्टम के मोहरे हैं. उपर वाला प्यादा चलता है. प्यादे की क्या औकात की अपनी मर्ज़ी से चले. ऊपर वाले ने मेरे लिये ये ही रोल रखा है, तो मै भला क्या कर सकता हूँ. ठेकेदार से लेकर मंत्री तक पूरी श्रृंखला है. सबका ख़्याल रखना पड़ता है. दो-चार मानस हो जायें तो विकास का जो थोडा बहुत काम हो रहा है, सब ठप्प हो जाये. अब तो सभी ने इस भ्रष्ट तंत्र को स्वीकार कर लिया है. पर ठाकुर ठेकेदार भी साला पूरी उल्टी खोपड़ी है. रात पार्टी के नशे में जो मज़ाक कर रहा था, उसे कर भी डाला. अब झेलो भैया राम विलास. ये तो अच्छा हुआ की दरोगा की गुट्टी मेरे पास फँसी है नहीं तो मामला सुलटाने में पता नहीं कितना लग जाता है. ये पंद्रह लाख भी ठाकुर भरेगा. मेरी तो सिर्फ डील है.      


भीड़ छंट चुकी थी. सवेरे वाले चेहरे बदल चुके थे. पुलिस हरकत में आ चुकी थी. एक ठुल्ले ने बचे-खुचे तमाशबीनों को हाँक दिया. दूसरे ने आनन-फानन मैं देसी कट्टे का जुगाड़ कर दिया. सजीवन पांडे की ट्रेनिंग जारी थी. लाश के हाथ मैं कट्टा पकड़ा कर हर एंगल से फोटो उतारी जाने लगी. बलेस्टिक रिपोर्ट फ़ोन पर दी गयी पैसों की गारेंटी के हिसाब से लिखी जा चुकी थी. पोस्टमार्टम हॉउस का डॉक्टर सेट किया जा चुका था. ये मोबाईल भी कमाल की चीज़ आई है, अपने देश में. साहब से लेकर चपरासी सब को सेट कर लो, वो भी डायरेक्ट. हर किसी का नंबर फीड कर लो क्या पता कब कौन काम आ जाये. पंचनामा करके लाश जितनी जल्दी से सील हो जाये उतना अच्छा. लक्ष्मी को रूठने में भला कितनी देर लगती है. अब दरोगा को सब जल्द ही निपटाना होगा. डॉक्टर की तैयारी पूरी है. चूक की कोई गुंजाईश नहीं है.

रिपोर्ट तो डॉक्टर को ही लिखनी थी. सहायकों को चीर-फाड़ के लिये बोलने से पहले डॉक्टर के मन में लाश देखने की इच्छा जोर पकड़ने लगी. उससे रहा नहीं गया. मृतक के चेहरे पर एकदम शांति थी. किसी डर या दर्द का निशान तक न था. शायद उसे समझाने का मौका ही नहीं मिला कि उसके साथ क्या होने जा रहा है. मारने वाला भी अपने फन का माहिर जान पड़ता था. मृतक कि अध्-खुली आँखें डॉक्टर को घूरती सी लगीं. डॉक्टर ने अपने हाथों से उसकी पलकें गिरा दीं. और सहायकों को पोस्ट मार्टम का आदेश देकर वो अपने कक्ष में आ गया. 

रिपोर्ट तैयार हो चुकी थी. दरोगा उसकी अँग्रेज़ी समझने की कोशिश कर रहा था. पढ़ते-पढ़ते उसका रंग बदलने लगा. चेहरा तमतमा उठा. "अबे डॉक्टर तेरे को दो लाख कम पड़ रहे हैं. पैसे आत्महत्या दिखने के दे रहा हूँ, हत्या के नहीं.

डॉक्टर कि आँखें दरोगा को अन्दर तक बेध रहीं थी. डॉक्टर ने दृढ शब्दों में कहा "सॉरी, आई कांट हेल्प". मानस का भूत उस पर पूरी तरह हावी था और अभी भी वो शरीर के अंजाम से पूरी तरह बेख़ौफ़ था.

- वाणभट्ट       

अस्वीकरण: ये कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

रविवार, 20 मार्च 2011

आरक्षण, हमहू का!

तुम कहबो की होली वाले दिन इ आरक्षण का मुद्दा कौन उठाय दिहिस. तो भैया का बताई की बातै कुछ ऐसी है. हमार बेटौना को दिल्ली से आवै को रहा, सो पता चला लोग ट्रेनवा छेकाए बैठे हैं. भैया इहाँ कम्पटीशन छिड़ल बा की कौन कित्ता जाहिल हौवे. तो हम बताए दे रहे हैं की हमार कौम से जियादा तो अंडमान के आदिवासीयो भी जाहिल नहीं हैं. अगर आरक्षण का यही क्रैटेरिया है, तो हमका तो बिना आन्दोलन के आरक्षण दे देवे के चाही. अपनी जहालत का नमूना देवे बरे ट्रेन और बस रोकै की कौनो ज़रुरत नाहीं बा. हम लोग ठहरे खानदानी जाहिल और निपट गंवार अगर आरक्षण देवे को है, तो हमार इच्छा है की सबसे पहले आरक्षण हमार कौम को ही मिले के चाही. 

पढ़े-लिखे हमरी बिरादरी में अज्ञानी की निशानी है. जब हमरे पिताश्री हमका सांड सम्हाले की ट्रेनिंग दे रहे थे तो समझात रहे कि इ गैया-वैया के चक्कर में नाहीं पड़बे के चाही. जौन सांड सम्हाल लिहिस, समझो दुनिया सम्हाल लेई. सो भैया स्कूल किताब से उन्हें परहेज रहल और हमहू सुसुर कब पढ़े के चाहत रहे. लिहाज़ा पढाई-लिखाई से हमरा वास्ता अकल और भैस का ही रहल. एक गो मेहरारू मिल गइल उससे चार गो लौंडा पैदा भइल. बादे में इक लोंडिया भी भइल पर ओकर महतारी हमका बताइस कि लौंडा है, इसलिए ससुरी बच गइल. बाद में पता चलल कि लौंडिया है तो ओकी महतारी के मार-मार के भुरकस भर देहली. पर तब तक वो चार साल कि हो गयी रहल. ई हमार अम्मा और मेहरारू की चाल रहल जौन बिटियव़ा जी गइल वर्ना हमरे सात पुश्तन में सिर्फ बेट्वन के राज रहल. अईसन हमार बाबा कहत रहेन. 

आपन पिता जी कि इच्छा अनुसार लौंडन को स्कूल भेजबे नाहीं किये. छोटकौना और बिटिया पता नाहीं कब सरकारी स्कूल में भर्ती लई लिहेन हमका पतो नहीं चलिस. ओही नालायकव़ा आज आवै को रहा. दिल्ली में नौकरी करत है. शहरी लौंडिया से शादी किहिस है. पूरी मेम है. बाकी तीन तो मुस्टंड सांड अस गौवां भर में टहरत फिरत हैं. गाँव कि गैयन भी डेरात हैं. बड़ी मुश्किल से एक का बियाह निपटाया तो ससुरी बस लौंडिया ही जने जानत रही. दुई साल पहरे जब ससुरी को मइके पहुंचाय आये तो अकल ठिकाने लग गइल. अब ससुरी ने लौंडा दिया है. बुढ़ापे में पोते कि खबर मिल गई अब मरबे में कौनो कष्ट नाहीं होई. 

हमार तो बस खेती-बाड़ी में गुजर गई पर अब तो सरकार नौकरी देत है, अपने देश में पैदा हर इंसान को. और सरकार तो हमही तो बनात हैं तो हमरा बेटौना के बेटौना के सरकारी नौकरी तो मिले के चाही. हमका अपने बेटौना के बेटौना कि फिकिर होई गइल. नौकरी के लिए तो पढ़े के पड़ी, पर ई काम तो हमार सात पुश्तन ने नहीं किया (छोटके बेटवा को छोड़ के), तो क्या. हम बेटौना के बेटौना को पढ़ईबे. पढावे के का है स्कूल में नमवा लिखा देबे. जैसन हमार छोटकू पढ़ लिहिस, सरवा भी पढ़ लेई. ओकरे बाद अगर आरक्षण मिल जाई तो हमार बेटौना के बेटौना भी कलेक्टर बन जाई और नीली बत्ती की गाड़ी में घूमी. हमका इंजिनियर और डाक्टर नहीं बनाना, कलेक्टर ही ठीक रही. जब सरकार से मिले के है तो सबसे ऊँची कुर्सी ही चाही.

जाहिल पन में हम्हन बस्तर के अदिवासियन से आगे ही होइबे. हमार लौंडे जितना देसी बनावे में माहिर हैं, उससे ज्यादा ओके चढ़ावे में उस्ताद हैं. शहर के लौंडे तो दिन रात एक करके पढ़े पड़े हैं और हमार लौंडे खा-खा के सांड हो रहे हैं. ऐसा नहीं है हमरे पास पैसा नहीं है. जबसे बाई-पास रोड बनी है और हमारे खेतन पर ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें बनीं हैं, हमहू धन्ना सेठ की औलाद हो गए हैं. सबसे पहले तो एक राइफल खरीदी, फिर एक बोलेरो. इससे बड़ी धाक रहती है हमार जाहिलों पर. लौंडे जौन देसी पिया करत रहेन, अब विदेसी पियत हैं. हमहू अब हुक्का छोड़ कर सिगरेट पियत हैं. पर पढ़े-लिखे कि बात हमार समझ से बाहेर है. जब से आरक्षण का पता लागल है, तब से तमन्ना जगल बा की हमरो बेटौना के बेटौना को एक नौकरी मिले के चाही.

जिनका अबहीं आरक्षण मिलत है सब, मेरा दावा है कि हमार बिरादरी से ज्यादा आगे हैं, अडवांस हैं. उ ससुरे अपनी बहन बेटियन के ख्याल रखें ले. हमरे खानदान में लौन्डियन को बहुतै टाईट रखे के पड़त है. अलबत्ता तो हम लौन्डियन को पैदई नहीं होवे देत हैं और गलती से हुई जाये तो ओका निपटाई दिन्ह जात है. हमार बिटइयवा तो पढ़ गइल पर हमार बाबू के सपना टूट गइल. सो हम अपनी बिटइयवा के शादी के बाद से सूरतो नहीं देखली. बिदाई के समे समझा देहली कि बेटवा ही जनना वर्ना ससुराल वाले फूंके चाहे तापें हम कुछ नहीं करबे.  बिटइयवा हमार समझदार रहल दुई ठो बेटवा जनिस. ओकरे बेट्वन कि भी हमें अब चिंता होत है. रिजरवेशन जब मिलै रहा है तो नातियन के बारे में सोचे भी तो हमरे काम है. पढ़े-लिखे हमार दुश्मन, हमका तो अईसन आरक्षण चाही जेमे सांड चारत-चरात ही लौंडे अफसर बन जायें.

हम्हन इस ब्रम्हांड के सबसे पिछड़े लोग हैं. अगर हमका आरक्षण नहीं मिला तो हमहू आन्दोलन करिबे. इ ट्रेन-बस तो का, हम हवाई जहाज तक रोक सकत हैं. ओकर डैना तोड़ कर जहाज में वापस घुसेड सकत हैं. अब कम्पटीशनव़ा तो जहालत के बा. कौन कितना जाहिल है, दिखाए पड़त है. सो हम गारेंटी के साथ कह सकत हैं कि हमसे जाहिल कौनो होय तो सबूत देवे, ओ भी कोर्ट मां. इ आन्दोलन-वान्दोलन की का जरूरत है. कौनो आदिवासी आपन बिटियव़ा के मार के दिखाए तो हम जानी कि ओ हमसे ज्यादा जाहिल है. हम भले दुसर जात कि लौंडिया से मज़ा ले लेवें पर का मजाल कि हमार बहु-बेटी पराई जात के चक्कर में पड़ जाये. या तो उसे देश छोड़े के पड़ी या दुनिया. है कौनो हमसे जाहिल? तो सरकार अगर बिना आन्दोलन के हमरी बात मान ले तो इससे अच्छी का बात होइबे.  वर्ना मजबूरन हम्हने के ट्रेन का चक्का जाम करे के पड़ी. सड़कन का खोदे के पड़ी और एअरपोर्ट में साड़न का घुसेरे के पड़ी. जाहिलों में जाहिल हमार कौम. सांड हमरी पहचान है और हमरी शान है. हमरे अन्दर के सांड को जगावे कि कोशिश ना करो. अबहीं शराफत से कह रहेन हैं कि आरक्षण चाही, हमहू का.

- वाणभट्ट

बुधवार, 16 मार्च 2011

समय

समय 

एक-एक लम्हा
बीत गया
बिना दस्तक दिए
बिना आवाज़ किये

सोते रहे 
चादर ढांपे

जब आँख खुली है
तो चारों ओर अँधेरा है घुप्प 
और
समय अपने गुज़र जाने 
का
चीख-चीख कर 
एलान कर रहा है 

- वाणभट्ट

रात

रात

रात अँधेरी होती है
रात में चीन्हना ज़रा मुश्किल होता है
रात खामोश होती है
रात को सब सोते हैं

दिन की अपेक्षा
रात में
बेधड़क नंगे हो जाना
आसान है

- वाणभट्ट

दरवाज़े

दरवाज़े 

नंगे पैर तले
ज़मीन पर धुल खिसखिसाती है

दरवाज़ों की दरारों से धूल घुस आई है
बुहारता हूँ पूरा का पूरा कमरा
पर तेज़ हवा से
वापस घुस आती है धूल
दरवाज़ा खोलते ही

तब मन खिसियाता है
कमबख्त 
ये दरवाजे भी क्यों होते हैं.

- वाणभट्ट 

आदर्शवादी

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