शनिवार, 5 नवंबर 2022

 बिजुरिया

अभी-अभी प्रकाशोत्सव का पर्व गुजरा है। पूरा का पूरा देश, प्रदेश, जिला, गली-मोहल्ला सब जगमगा रहा था। बड़ी-बड़ी लाइटें लगी थीं और छोटी-छोटी चीनी झालरों ने हर घर को रौशन कर दिया था। दिये भी जले थे, लेकिन शगुन के। जब झालर पर ख़र्च कर रहे हैं तो दिये की आवश्यकता सिर्फ़ पूजा के लिये ही बचती है। दिवाली है तो दिया तो जलेगा ही लेकिन मेरी दिवाली तुम्हारी दिवाली से ज्यादा रोशन तो तब ही होगी जब अमावस की रात भी कनफ्यूज हो जाये कि सूरज किस घर से उगने वाला है। 

सबने प्रकाश के गीत गाये। अँधेरे का मातम मनाया। लक्ष्मी जी की पूजा की और राम जी को भूल गये। दीपावली पर दीप गायब थे, लेकिन रोशनी थी और बम-पटाकों का शोर भी था। लक्ष्मी जी को पाने के लिये श्रम करना पड़ता है। बहुत से ऐसे तरीक़े हैं, जहाँ भाग्य ने साथ दे दिया तो वारे-न्यारे हो जाते हैं। इसीलिये भाग्यवादी लोग दीपावली पर लक्ष्मी जी को जगाने के लिये द्यूत-क्रीड़ा का प्रयोग भी करते हैं। कितने का बोर्ड और कौन सा पत्ता, इसके लिये भी रोशनी की दरकार होती है। पूरे प्रकाश पर्व में जो सबसे गौण विषय रह जाता है, वो है बिजली की उपलब्धता। यदि किन्हीं कारणों से कोई फॉल्ट हो गया और, बिजली चली गयी, तो दिये और मोमबत्ती इतने तो होते नहीं कि आकाश में झिलमिलाते तारों से कम्पटीशन कर सकें। तब सबको ख़्याल आता है बिजली का। और लानत-मलानत भेजने लगते हैं बिजली विभाग पर कि बहुसंख्यकों के त्योहार पर ही इन्हें बिजली काटनी होती है। इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, कम से कम हमारे इलाके में।

इन्सान की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वो वस्तु या व्यक्ति का मूल्य तब तक नहीं समझता जब तक उसे खो नहीं देता। बिजली के साथ भी यही बात लागू होती है। जब तक रहती है, किसी को पता ही नहीं होता। जब लोग बाग सराउंड साउंड सिस्टम पर 80 इंच का टीवी देखते हैं, तो अनायास सीना 56 इंच फूल जाता है। टीवी तो इन्वर्टर से चल भी जाये लेकिन एसी-फ़्रिज के लिये जेनरेटर की ज़रूरत पड़ जाती है। इन्वर्टर और जेनरेटर भी बिजली ही देते हैं। लोग बिजली से चलने वाले तमाम यन्त्रों के पीछे तो भागते हैं लेकिन जो उन सबको चलाता है, उसके प्रति संवेदनशील नहीं होते। बिजली बचाना, बिजली उत्पादन से कम श्रेयस्कर नहीं है। बिजली बना नहीं सकते तो कम से कम बिजली बचा ही लीजिये। 

जिस तरह किसी यूज़र का ध्यान बिजली की ओर तभी जाता है जब वो नहीं आती। या कोई अप्लायंस काम करना बन्द कर देता है। जिन लोगों ने प्रशासन, वित्त और लेखा में बड़े-बड़े काम और नाम कमा रखे हैं, उन्हें कतिपय ही ये आभास होगा कि वो लोग अपना काम कुशलता से कर सकें, इसके लिये कोई न कोई सर्विस यूनिट वाला लगा रहता है। जिनके ऊपर रौब गाँठने का कोई मौका छोड़ा नहीं जाता। ये जो कम्प्यूटर और इंटरनेट के उपयोग से जो ज्ञान का अंतर्जाल बुना जा रहा है, उसके पीछे भी बिजली की सुनिश्चित उपलब्धता का योगदान है। बिजली और बिल्डिंग का वही रिश्ता है जो आत्मा का शरीर से होता है। लोग भी आजकल शरीर के रंग-रोगन पर ज्यादा ध्यान देते हैं, आत्मा के विकास पर नहीं। आज के युग में बिजली का वही हाल है जैसा रहीम दास जी के समय में पानी का हुआ करता था - 

रहिमन बिजली पाइये, बिन बिजली सब सून।

गीज़र बिन ना कटे दिसम्बर, न एसी बिन जून।।

ये नेता, अभिनेता, कलाकार, पत्रकार, बैंकर, डॉक्टर, ड्राइवर, लेखक, कुक, वैज्ञानिक या कोई भी, जो कुछ कर पा रहे हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं किसी सर्विस देने वाले का कंट्रीब्यूशन जरूर होता है। ये काम अधिकतर इंजीनियर्स या टेक्निशियंस द्वारा संपादित किया जाता है। अपने चारों ओर नज़र घुमाइये जितनी भी चीजें आपको दिखायी दे रही हैं, उसे किसी न किसी तकनीकी व्यक्ति ने बनाया होगा। जब कोई पत्रकार पूरी बदतमीज़ी से बोलता है कि पुल के निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ, तब वो भूल जाता है कि लोग फाइलों पर ही भ्रष्टाचार कर जाते हैं बिना कुछ डिलीवर किये। अक्सर ये वो लोग होते हैं जो अपने हाथ से एक पेंच भी नहीं कस सकते। जीके और इतिहास पढ़ के जो लोग केबीसी लायक होते हैं, वही लोग  प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग की सारी सीमायें लाँघ जाते हैं। कहीं भी, कोई भी यंत्र या व्यवस्था अगर सुचारू रूप से चल रही हो, तो कोई तकनीकी व्यक्ति उसका रख-रखाव कर रहा होगा। नौ मन तेल होता है तभी राधायें नाचती हैं। ये बात राधाओं को समझ नहीं आती। ऐसा नहीं है कि उनकी प्रतिभायें काबिल-ए-तारीफ़ नहीं हैं। किन्तु स्टेज पर लाइट-साउंड उनकी प्रस्तुति पर चार चाँद लगा देता है। तालियाँ तो उसी को मिलती हैं या मिलनी चाहिये जिसने मंच पर प्रस्तुतिकरण किया है। लेकिन तकनीकी सहयोग को भी ड्यू सम्मान मिलना चाहिये। लोग बाग डॉक्टर और वकील के आगे तो बेबस-लाचार से दिखते हैं, लेकिन इंजीनियर को देख के चौड़े हो जाते हैं। सब लोग सर्विस सेक्टर के लोगों को सेवक ही मान लेते हैं। एक मिनट के लिये नेटवर्क चला जाता है, तो इंटरनेट जीवी त्राहिमाम-त्राहिमाम कर उठता है। यदि किसी दिन इंजीनियरों ने सेवा को रोका तो अनर्थ हो सकता है। निश्चय ही उनका काम सेवा देना है, किन्तु दो शब्द धन्यवाद या सम्वेदना के सुनना उनके हौसले को बढ़ाता है।

हमारे वरिष्ठ सहयोगी पाल साहब को दीपावली के तुरन्त बाद सेवा निवृत्त होना था, सो हो भी गये। वो चूँकि बिजली विभाग के प्रमुख थे और सीनियर मोस्ट थे, तो उनके रिटायरमेंट से एक निर्वात का होना अवश्यम्भावी है। कुर्सियाँ कभी खाली नहीं रहतीं। अगले व्यक्ति को चार्ज मिलना ही था लेकिन पाल साहब की कर्मठता और कार्य के प्रति समर्पण निश्चय ही अन्य लोगों को प्रेरित करेगा। पाल साहब ने संस्थान में बिजली व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये कभी घर-परिवार की परवाह नहीं की। दिन-रात एक किये रहते। रात दो बजे लाइट गयी नहीं कि उनका फ़ोन कोई न कोई घनघना ही देता था। इसके बाद उनका काम शुरू हो जाता था और तभी खत्म होता, जब तक बिजली न आ जाये। आवश्यक विभागों को जेनरेटर की सप्लाई देते रहना भी उनकी आवश्यक सेवा का हिस्सा था। जब कोरोना ने दस्तक दी तो पूरा देश हाइबरनेशन मोड में चला गया। लेकिन एसेंशियल सर्विसेज़ बदस्तूर जारी रहीं। इलेक्ट्रिकल इंचार्ज होने के नाते पाल साहब ने ड्यूटी में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती। अगर अफ़सर अपनी ड्यूटी कर रहे हैं तो उन्हें एसी, कम्प्यूटर, नेट सब चलता हुआ चाहिये। चूँकि उन दिनों कोई किसी से मिलता-जुलता तो था नहीं, सब अपने-अपने कमरे से कार्य निष्पादित करने अपनी सुविधानुसार आते और जाते। लेकिन बिजली तो सबको चाहिये, आने और जाने के बीच। इस प्रकार पाल साहब और उनके सहयोगियों की ड्यूटी लगभग पूरे दिन की हो जाती। कोरोना पीरियड में जिसने भी ड्यूटी की, उसे कोरोना वारियर की संज्ञा से नवाज़ा गया। लेकिन क्या मजाल कि किसी का ध्यान बिजली की तरफ़ गया हो।

तीस से अधिक सालों से सेवा करते-करते कहीं से उन्हें ये लगने लगा कि आवश्यक सेवा में उनके योगदान को यथोचित मान्यता मिलेगी। वो कुछ दादा साहब फाल्के टाइप के वन्स इन लाइफ़ टाइम पुरस्कार से पुरस्कृत होंगे। उनके साथ जॉइन किये अन्य नॉन-टेक्निकल टाइप के टेक्निकल्स को संस्थान के बेस्ट वर्कर का आवर्ड मिल चुका था। फार्म इंचार्ज, सिक्योरिटी इंचार्ज, गेस्ट हाउस इंचार्ज और न जाने कितने प्रकार के इंचार्ज इस सम्मान से सम्मानित हो चुके थे। इलेक्ट्रिकल इंचार्ज की सेवाओं को मौखिक मान्यता तो सब देते रहे लेकिन वो अवार्ड में परिवर्तित नहीं हो पायी। आवश्यक सेवाओं की ये विडम्बना है कि सबको ख़ुश नहीं कर सकते। पाल साहब को बुरा तो ज़रूर लगा होगा लेकिन उन्होंने उसका ज़िक्र अपने रिटायरमेन्ट भाषण में करना उचित नहीं समझा। 

पानी और हवा की तरह बिजली भी वर्तमान समय की एक आवश्यकता बन चुकी है। बिजली के बिना हमारे सारे संसाधन व्यर्थ प्रतीत होते हैं। नॉन-टेक्निकल लोग टेक्निकल लोगों द्वारा आवश्यक सेवायें मुहैया कराये जाने को अधिकार की तरह माँगते हैं लेकिन उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। लेखकों और शायरों ने भी कभी इंजीनियर्स के योगदान पर कुछ भी लिखने से परहेज किया है। विदाई समारोह के लिये इंटरनेट पर उपलब्ध सारा साहित्य पलट मारा (पहले की तरह अब लाइब्रेरी की अवधारणा बदल गयी है)। लेकिन क्या मजाल कि बिजली पर कोई शेर या बकरी मिल जाये। कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। लेकिन मूर्धन्य से मूर्धन्य साहित्यकार वहाँ तक नहीं पहुँच सके, जहाँ से आधुनिक चिराग़ (बल्ब) रौशन हैं। कुछ नये लोगों ने प्रयास किया लेकिन उनकी बिजुरिया में साहित्यिक एंगल तो हो सकता है लेकिन टेक्निकल नहीं। नतीजन 'वाणभट्ट' को लेखनी उठानी पड़ गयी। 

बिजली है तो जीने के सारे सबब हैं,

ये एसी, ये ट्यूबलाइट, ये पंखे, ये टीवी, ये फ़्रिज हैं।

इक रूह सी है जो चलाये रखती है

वरना हम क्या हैं ज़नाब, एक बलब फ़्यूज़ हैं।।

-वाणभट्ट

रविवार, 23 अक्तूबर 2022

शुभ दीपावली

सूरज जब डूबने चला
तो गर्वोक्ति से बोला,
कौन करेगा मेरा काम
मेरे डूबने के बाद।

पिछली पंक्ति में खड़े
टिमटिमाते-सहमे से दिये ने कहा धीरे से,
बहुत निर्बल और दीन हूँ किन्तु 
प्रयास करूँगा लड़ने का अँधेरे से।

माटी के उस दिये ने सहस्त्र दियों को जला दिया
सबने मिल कर काली रात को उजिया किया,
जलता दिया जग को एक सन्देश दे गया
स्वयं जलना पड़ता है जब हो अंधेरा घना।

सूर्य उगने की प्रतीक्षा में न समय गवायें
क्यों न सब मिल रात का उत्सव मनायें,
अपने अंतस में भी इक दीपक जलायें
अमावस में तारों और जुगनुओं सा जगमगायें।

शुभ दीपावली सभी को...🙏🙏🙏

-वाणभट्ट

(कविवर रविन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से प्रेरित)

बुधवार, 5 अक्तूबर 2022

सनातन

धर्म के नाम पर बहुत कन्फ्यूजन फैला हुआ है. मजहब-सम्प्रदाय को लोग धर्म से कन्फ्यूज कर गये हैं. जिस तरह धर्म शाश्वत है, उसी तरह अधर्म भी अपरिवर्तनीय है. धर्म की सीधी-सपाट परिभाषा जो मेरी समझ में आती है वो ये है - "धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है". धर्म देश-काल-स्थान में भी बदलता नहीं है. इसका अनुसरण करना भी बहुत आसान है. बस अन्तरात्मा की बात माननी है. ये वो देव-वाणी है जिसे अधर्म करते हुये चुप कराना पड़ता है. लेकिन इसकी अग्नि कहीं न कहीं आत्मग्लानी या पश्च्याताप के रूप में अंतर्मन में सुलगती रहती है. राम-रावण-हनुमान-दसहरा आदि प्रतीकों के माध्यम से धर्म का साक्षात् स्वरुप को मानव मात्र के सामने प्रस्तुत किया जाता है. श्रीमद भगवत गीता में भी व्यक्ति के अन्तर्द्वंद को महाभारत के रूप में दिखलाया गया है. पाँच अच्छाइयों पर सौ बुराइयाँ हावी हैं. हमारी स्थिति भीष्म की है. जो चाहता है बुराई और अच्छाई दोनों साथ रहें. जीवन का असली आनन्द तो बुराइयों में निहित है. संत ही बनना था, तो दुनिया में आने और रहने की जरूरत क्या है. कमंडल लो और निकल लो.  द्वैत हर युग में रहा है, और अधर्म के बिना धर्म की स्थापना की कल्पना भी संभव नहीं है. इसी धर्म ध्वजा का निरन्तर वहन ही सनातन है. जिसका न कभी आदि था न कभी अन्त होगा.  

दसहरा शायद इसीलिये मनाया जाता है कि कम से कम साल में एक बार अच्छाई और बुराई पर मंथन कर लिया जाये. ये उपदेश किसी और के लिये नहीं हैं. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिये हैं. कोई भी व्यक्ति अपने धर्म से भले वाकिफ़ न हो लेकिन अधर्म को सीने में छुपाये घूमता रहता है. एक भजन में इसका ज़िक्र भी आता है "जग से चाहे भाग ले प्राणी, मन से भाग ना पाये". इसीलिये वानप्रस्थ आते-आते ईश्वर के प्रति उसकी आस्था बलवती होने लगती है. दीन-दुनिया के सफलतम लोग भी भगवान को क्या जवाब देंगे का ध्यान करके स्पीरिचुअल होने के प्रयास में लग जाता है. छत्तीस चूहे खा कर पुण्य कमाने का प्रावधान सभी सम्प्रदायों में है. 

गर्ग साहब रिटायर्मेंट की कगार पर पहुँच चुके हैं. हिन्दुओं में जितनी जातियाँ हैं, उतने ही उपनाम भी हैं. जो पुछल्ले की तरह नाम से चिपक जाते हैं. जातक जब जन्म लेता है तो उसे इस बात का भान तक नहीं होता कि उसने कितने उच्च कुल में जन्म लिया है. इस टाइटिल के उच्चारण मात्र से समाज को पता चल जाता है कि बन्दा ज्ञानी है, बलशाली है, व्यापारी है या इनमें से कुछ भी नहीं है. ये जो कुछ भी नहीं हैं, वही बहुतायत में पाये जाते हैं. जब हम घर-परिवार-समाज पर एक सरसरी नजर डालते हैं, तो स्पष्ट दिखता है कि बनाने वाले ने सबको बराबर नहीं बनाया है. एक ही परिवार में एक सक्षम भाई दूसरे अक्षम भाई को उसी दृष्टि से देखता है जैसे समाज की विभिन्न जातियाँ एक दूसरे को. किसी संगठन में भी देखेंगे तो उच्च पदों की संख्या सीमित हैं जबकि रोजमर्रा के कामों के लिये जितने व्यक्ति मिल जायें उतने कम हैं. भारत वर्ष को पुरातन परिपेक्ष्य में देखें तो जातियाँ किसी के साथ चिपकी नहीं थीं. लेकिन समय के साथ अपनी सुविधा के लिये लोगों ने उसे चिपकाना उचित समझा, ताकि लोगों को परिवार का इतिहास बताना न पड़े. शिवा जी और राणा प्रताप का शौर्य उनकी तलवारें बोलती थीं. लेकिन वहाँ जोख़िम ज्यादा था. नाम में टाइटिल लगाने से ही जब भौकाल टाइट हो जाये तो तलवार उठाने की क्या जरूरत है. मुगलों के समय में भी जाति व्यवस्था चिपकाने का प्रचलन रहा हो, ऐसा कम ही दिखता है. बहुत संभव है कि अंग्रेजों को अपनी योग्यता जाहिर करने के उद्देश्य से ये आज की प्रचलित वर्ण व्यवस्था ने जन्म लिया हो. जैसे आज हम अपने अंग्रेजी स्कूल में पढ़े होने पर गर्व महसूस करते हैं, वैसे ही हर किसी का प्रयास होता है कि उसके पास गर्व करने के लिये कुछ ना कुछ तो होना चाहिये. 

नौकरी लगने के बाद एक चीज़ का एहसास जो सबसे पहले हुआ वो ये था कि पिता जी लोगों ने नाहक ही नामकरण की जहमत उठायी. एक संस्थान में एक ही उपनाम के ज़्यादा लोग तो होते नहीं. सो लोग बाग़ वर्मा-शर्मा-मिश्रा-ठाकुर आदि से ही काम चला लेते हैं. लेकिन यहाँ भी एक लोचा है. कुछ उपनामों के साथ ही साहब लग सकता है. जैसे गर्ग, सिंह, पाल आदि के साथ साहब फिट बैठता है. और बाक़ी वर्मा-शर्मा-मिश्रा आदि को जी से ही काम चलाना पड़ता है. कभी-कभी पोस्ट (पद) को देखते हुये, कुछ लोग वर्मा या शर्मा या मिश्रा के साथ साहब लगाने का अनुचित प्रयास करते हैं. लेकिन ये सहज समझ आ जाता है कि बन्दा पोस्ट को साहब लगा रहा है, व्यक्ति के उपनाम को नहीं. 

तो गर्ग साहब को जब मालूम हो गया कि अब रिटायर हुये बिना कोई चारा नहीं है, तो उन्होंने मनन किया कि अब क्या करना है. जीवन के तजुर्बों ने इतना तो बतला ही दिया था कि जैसे वो अपने माँ-बाप की सेवा उनकी वृद्धावस्था में कर सके, बहुत संभव है कि उनके बच्चों को अपनी महत्वाकांक्षाओं और आजीविका के चलते ये अवसर न मिल पाये. तो उन्हें इस लायक तो होना ही चाहिये कि अपनी देख-भाल ख़ुद कर सकें. इसके लिये पहली प्रीरिक्विज़िट थी - स्वस्थ शरीर. इस उद्देश्य से उन्होंने अपनी दिनचर्या को बहुत ही संतुलित और संयमित कर लिया. उचित आहार-विहार और खान-पान में संयम भले ही देखने में छोटी बातें लगतीं हों लेकिन उनका पालन करने के लिये बहुत प्रयास करने पड़ते हैं. बहरहाल धुन के पक्के गर्ग साहब ने चीनी-नमक-जंक फूड्स से तौबा कर ली. और प्रातःकालीन वाक को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया. ये बात अधिकांश लोगों को पता होती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वो इसके लिये रिटायर होने का इंतज़ार करते हैं. इस बात को जिसने जितनी जल्दी समझ लिया उसका पोस्ट रिटायर्मेंट जीवन उतना ही स्वस्थ होता है. 

उनके टहल-मार्ग में एक पीपल का पेड़ भी पड़ता था. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास होता है. हिन्दू लोगों की मान्यता ये भी है कि भगवान सब जगह है और सब कुछ देख रहा है. इसलिये धर्म चाहे-अनचाहे इनके जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है. अधर्म करने के बाद भी इन्हें ज्ञात रहता है कि कहाँ-कहाँ गलत किया है. उससे मानसिक मुक्ति के लिये ना-ना प्रकार के प्रावधान भी हैं. गंगा स्नान-तीर्थयात्रा-भजन-पूजन जो आपको सूट करे कीजिये. और सबसे आसान है इस बात का बोध कि कर्ता तो वो ही है, हम तो साधन हैं, निमित्त मात्र हैं. इसलिये मेरा क्या दोष. "तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा". 

पिछली दीपावली की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ कहीं कूड़े या सड़क पर तो फेकीं नहीं जा सकतीं. घर पर नयी लक्ष्मी जी को आना है, सो इनका निस्तारण कैसे हो. धर्म के नाम पर इतनी शर्म बची हुयी है कि रात के अँधेरे में ये मूर्तियाँ घर से निकाल कर किसी छोटे मन्दिर या पीपल के पेंड के नीचे बा-इज्ज़त रख दी जाती हैं. जाड़ा-गर्मी-बरसात के भरोसे. कि ऊपर वाला अपने विधान से उन मूर्तियों को डिस्पोज करेगा. एक साल की मूर्तियाँ डिस्पोज़ होने नहीं पातीं थीं कि दिवाली फिर आ जाती थी. उस पीपल के पेड़ के नीचे मूर्तियों का अम्बार लग गया था. कण-कण में भगवान् देखने वाले उस पीपल के पेड़ पर भी शीश झुका देते. गर्ग साहब की दिनचर्या में ये काम भी शामिल हो गया था. 

बरसात की उस सुबह कुछ बूँदा-बांदी हो रही थी. एक मन किया कि चलो आज नहीं जाते. लेकिन बारिश कुछ कम थी, इसलिये छाता लेकर टहला जा सकता है. ऐसा सोच कर गर्ग साहब घर से निकल लिये. यथावत पीपल के पेड़ पर पहुँच कर तमाम देवी-देवताओं को नमन करने के लिये शीश झुकाया तो देखा किसी ने प्लास्टिक की पारदर्शी पन्नी में हार्ड कवर में श्रीरामचरितमानस हिन्दी टीका के साथ (वृहदाकार) रख छोड़ी है. उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि क्या लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं बची है कि धर्मग्रंथों को भी रखा जा सके. उस लिफ़ाफ़े में १०८ मनकों की रुद्राक्ष की जप-माला भी रखी हुयी थी. गर्ग साहब को लगा ये शायद ऊपर वाले का इशारा है. स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिकता का समय भी आरम्भ होने वाला है. उन्होंने पुस्तक को उठा के माथे से लगा लिया.

- वाणभट्ट         

बुधवार, 14 सितंबर 2022

चलनी

पार्टिकल साइज़ एनालीसिस (कण आकार विष्लेषण) हेतु घटते हुये क्रम में चलनियाँ एक के नीचे एक लगी हुयीं थी. बेसन में उपस्थित कणों के आकार का परीक्षण होना था. इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सीव शेकर को अधिकतम आयाम और आवृति पर सेट करके, सजीव तसल्ली से कुर्सी पर बैठ गया. टाइमर 10 मिनट का था. उतनी देर खड़े रहने का कोई औचित्य नहीं था. टेलर बाबा की सीरीज़ के अनुसार चलनियों को व्यवस्थित किया जाता है. बड़े छेद वाली चलनी सबसे ऊपर और सबसे महीन सबसे नीचे. हैमर मिल से बना बेसन कितना महीन या मोटा है, ये जानना आवश्यक होता है कि बेसन का सेव बनेगा या लड्डू. कणों के आकार के अनुसार ही पिसे बेसन या आटे की ग्रेडिंग की जाती हैं. इसी तकनीक का उपयोग मृदा का विश्लेषण के लिये मृदा वैज्ञानिक भी करते हैं.

बचपन में जब भी खेल होता था तो कई बार गुल्ली-डंडे में आउट होने वाला बच्चा ये कहते पाया जाता था - 'तेली के तीन दाम'. यानि कम से कम तीन चांस दो, तब देखो मेरा कमाल. यदि शोध के क्षेत्र में न आया होता तो शायद इसका मतलब आसानी से समझ न आता. यहाँ हर डाटा कम से कम तीन रेप्लिकेशन्स में लिया जाता है. एक या दो बार में सही आँकलन नहीं हो पाता इसलिये सुनिश्चित करने के लिये प्रयोग को कई बार करना पड़ता है. औसत और मानक विचलन के साथ ही डाटा रिपोर्ट किया जाता है. एक ही काम को तीन बार करने के लिये बहुत ही धैर्य की आवश्यकता होती है. शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुये नीति-नियन्ताओं ने पीएचडी को शोध व अध्यापन सेवाओं के लिये अनिवार्य न्यूनतम योग्यता बना दिया है. अमूमन तीन से छः साल में समाप्त होने वाली यह डिग्री वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें ज्ञान प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा हो या धैर्य कूट-कूट के भरा हो. कभी शोध और अध्यापन में वही व्यक्ति आते थे, जिनकी इस क्षेत्र में रुचि (हॉबी) हुआ करती थी. जब से ये क्षेत्र नौकरी के अवसर बने हैं, तब से लोग-बाग प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करते-करते पीएचडी कर जाते हैं. उधर निकल गये तो ठीक नहीं तो प्रोफ़ेसरी पक्की है ही. बक़ौल शहरयार साहब - गर जीत गये तो क्या कहना, हारे भी तो बाजी मात नहीं.

सजीव ने पूरी सीव एनालीसिस की प्रक्रिया को तीन बार किया. हर बार किस चलनी पर कितना बेसन रुका, उसे तौला. उसे आश्चर्य नहीं हुआ कि हर बार हर चलनी पर लगभग बराबर मात्रा ही प्राप्त हुयी. यही प्रयोग की सफलता है कि विचलन कम से कम हो. मानव त्रुटियाँ कम करने के उद्देश्य से ही रिप्लीकेशन्स करने का प्रावधान विकसित किया गया है. 

शेकर अपनी गति से कम्पन कर रहा था. हर बार दस मिनट पूरी तरह सजीव के अपने थे. एक विचार से वो चिपक गया. क्या इंसानों पर भी ये चलनी का सिद्धान्त लागू होता है. एक आचार-विचार-विहार के लोग प्रायः एक चलनी में एकत्र हो जाते हैं. जो लोग एक चलनी में आ जाते हैं, वो न ऊपर जा सकते हैं, न नीचे. कुछ लोग चलनी की निचली सतह पर चिपके रहते हैं. जरा सा झटका लगा तो नीचे वाली चलनी में जा गिरते हैं.  जो मोटा होगा वो ऊपर अटक जायेगा और जो महीन होगा वो नीचे निकल जायेगा. उसे आप चाह कर भी अपनी चलनी में नहीं ला सकते. लेकिन जो आपकी चलनी में फँस गया तो वो चाहे कुछ भी कर ले पर अपनी चलनी नहीं बदल सकता. सजीव सोच रहा था, उसके जितने भी दोस्त थे, वो दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच गये हों, या कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन दोस्त बने रहे. जो चलनी में नहीं आये, वो ऊपर-नीचे तो हैं, लेकिन दोस्त नहीं कह सकते उनको.  

ध्यान के उन गहनतम क्षणों में दृश्य साफ़ होता जा रहा था. सारे दोस्त-रिश्तेदार उसने ऊपर वाली चलनी में डाल कर शेकर स्टार्ट कर दिया. उसे भली-भाँति समझ आ रहा था. जो तुम्हारी चलनी में हैं, वो हमेशा वहीं रहेगा, और जो नहीं है वो कभी उस चलनी का सदस्य था ही नहीं. दिक्कत तब होती है जब हम दूसरी चलनी के सदस्य अपनी चलनी में लाना चाहते हैं. ज्ञान कहीं भी, कभी भी मिल सकता है बस थोड़ा ध्यानावस्थित होने की आवश्यकता है. सजीव के लिये, ये ब्रह्मज्ञान बुद्धा अवेकनिंग टाइप का ज्ञान था. 

- वाणभट्ट

सितम्बर 14, 2022: हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं सहित


रविवार, 31 जुलाई 2022

जीएफ़आर

जैन साहब ने एक एचपीएलसी और कुछ केमिकल्स का इन्डेन्ट मेक और ब्रैंड के साथ क्रय विभाग को भेज दिया. अगली सुबह जब वो काम पर आये तो उनकी लैब में वो सारा सामान उपस्थित था, जो उन्होंने माँगा था. उनके साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. उन्हें थोडा नहीं, बहुत आश्चर्य हुआ. बल्कि ये कहना उचित होगा की वो आश्चर्य के सागर में गोते लगाने लग गये.

उसके चेहरे में एक गजब सा कॉन्फिडेंस आ गया था. और चाल में अकड़ भी. जब उसे पता चला कि उसके विरुद्ध विजिलेंस इन्क्वायरी सेट हुयी है. ये भी एक स्टेट्स सिम्बल है. इतने साल हो गये अफसर बने और अब तक कोई जाँच न हुयी, तो सर्किल में बदनामी की बात है. एक जमाना था जब लोग पड़ोसियों पर अपना प्रभाव दिखाने के लिये इनकम टैक्स की रेड का इंतज़ार करते थे. पडोसी भी जब तक रेड न पड़े, सिर्फ़ रहन-सहन से किसी को बड़ा आदमी मानने को तैयार न दिखते. समय के भी पंख होते हैं. जमाना बहुत आगे जा चुका है. अब साधन-संपन्न-समृद्ध लोग ईडी से कम में सन्तुष्ट नहीं होते. इसीलिये दस करोड़ वाला बीस करोड़ और बीस करोड़ वाला चालीस करोड़ कैश इकठ्ठा करने में लगा है. फिर वो कुछ न कुछ एंटी-नेशनल एक्टीविटी में सिर्फ़ इसलिये इन्वॉल्व हो जाता है ताकि ईडी का ध्यान आकृष्ट कर सके. वर्ना जहाँ करोड़पतियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी हो वहाँ पैसा अगर गद्दों-बोरों-दीवारों में दफ़न रह गया तो मरने के बाद किसे पता चलेगा की इसी धन के लिये जनाब (और जनाबिन भी) जीवन भर तन-मन से लगे रहे और वन-टू का फोर करते रहे. लेकिन इसके लिये किसी मन्त्री-सन्त्री के करीबी होना अनिवार्य है. ये जनाब बस एक सरकारी अधिकारी थे. इनके लिये विभागीय जाँच का बैठ जाना ही काफी था. अपने ही लोग हैं. मिल-बैठ के बातें होंगी. जहाँ चार यार मिल जायेंगे, महफिल रंगीन हो जायेगी. और क्या. ये इतने में ही खुश हैं कि अब उन्हें माइक्रोसॉफ्ट और सिस्को सर्टिफाइड इंजीनियर्स की तरह सर्टिफाइड भ्रष्ट होने का लाइसेन्स मिल गया है. अब वो और खुल के खेल सकेंगे.

प्रधान सेवक ने एक बार मुद्दा उठाया भी था कि सरकारी नौकरी होती है और प्राइवेट जॉब्स. और नौकर का काम होता है सेवा करना जनता की. लेकिन जब उसी सेवक के पदनाम में अधिकारी शब्द जुड़ जाता है, तो उसे लगने लगता है कि अब वो सेवा देने नहीं, लेने का पात्र बन गया है. इसी के लिये तो उसने जी-जान से हाड़-तोड़ पढाई की थी. अब भी अगर पद का मज़ा नहीं लूट पाया तो लानत है, ऐसी सरकारी नौकरी पर. 

एक शोध संस्थान में जब समस्त अधिकारीयों को न्यूज़ पेपर का बिल रीइम्बर्स होने का ऑर्डर आया, तो किसी को कानों कान खबर नहीं लगी. प्रशासनिक और वित्त अधिकारी ने अपने-अपने बिल वसूलने शुरू कर दिये. जब पूछा गया भाई ऐसा कैसे, तो बोले यहाँ तो बस दो ही अधिकारी हैं, बाकी तो वैज्ञानिक हैं. वैज्ञानिक तो वैसे भी निरीह प्राणी है. पहले तो कुछ बोलता नहीं और जब बोलता है तो सीनियर कहना शुरू कर देते हैं, फिर तुममें और उनमें अन्तर क्या रह गया. इतना पढ़-लिख कर भी तुम ख़ामख्वाह अपना स्तर गिरा रहे हो. नतीजा पूरा का पूरा ऑफिस सूरमा भोपाली बना घूम रिया है. मानो मेंहदी हसन की ग़ज़ल मॉडिफाई करके गुनगुना रहा हो -  

"हमसे अलग तुम रह नहीं सकते, इस बेदर्द ज़माने में" 

अपने इन्डेन्ट का ऑर्डर पास करने के लिये जैन साहब कॉन्ट्रेक्ट कर्मचारी के बगल में स्टूल पर भी बैठ चुके थे. जेम पोर्टल पर अपना ऑर्डर प्लेस करने हेतु. ये बात समझ से परे है कि अमेजन और फ्लिपकार्ट से दिन-रात शॉपिंग करने वाले लोग, जेम के यूज़रनेम और पासवर्ड से महरूम हैं. यदि जेम का पासवर्ड मिल जाता तो बाक़ी कर्मचारी भी अपने कन्विनियेंट टाइम पर पोर्टल का उपयोग कर पाते. भले ऑर्डर प्लेस करने का काम ऑफिस करे लेकिन प्रोडक्ट सर्च तो कोई भी कर ही सकता है. लेकिन जीएफ़आर इसकी इज़ाजत नहीं देता. अब की बजट से पहले वित्त मन्त्री से गुज़ारिश करूँगा कि अमेजन की तरह जेम पर भी आम आदमी को अपना एकाउन्ट बनाने की परमिशन दें, ताकि सब अपने घरों के सामान भी जेम से खरीद सकें. इससे जेम पर रजिस्टर्ड उद्यमियों को भी लाभ मिलेगा. 

जब बिना ज़्यादा प्रयास के जैन साहब को एचपीएलसी और केमिकल्स मिल गये तो उनके दिमाग में पहला विचार यही आया कि जापान में जीएफ़आर नहीं होता है क्या. वो दो साल के डेपुटेशन रिसर्च के लिये जापान के किसी शोध संस्थान में चयनित हुये थे. इतने मँहगे आइटम्स के लिये तो यहाँ उन्हें पिलर-टू-पोस्ट करना पड़ जाता. माँगते थे कुछ और मिलता था कुछ. उनके आश्चर्य के ठिकाने में और वृद्धि होने वाली थी, जब वो चावल के गोदाम देखने गये. वहाँ भी यहाँ की तरह धान की फ़ाईन और सुपर फ़ाईन टाइप की वैरायटीज़ होती होंगी. जैन साहब ने अपना तजुर्बा उन महिला के साथ शेयर करने की कोशिश की जो उन्हें गो-डाउन दिखा रहीं थीं. जैन साहब ने बड़ी सहजता से पूछा कि क्या ये संभव है कि फ़ाईन वैरायटी को सुपर फ़ाईन दिखा कर खरीद लिया जाये. वो महिला हतप्रभ सी रह गयीं. बोलीं जैन साहब आपने मुझसे तो कह दिया लेकिन किसी और से मत कहियेगा ये बात. हम ऐसा सोच भी नहीं सकते. तब ये समझना जरूरी हो जाता है कि हिन्दुस्तान में जीएफ़आर की जरूरत क्यों कर पड़ी होगी. और ऑडिट का ऑडिट करने की आवश्यकता क्यों पडती है.  

जीएफ़आर दरअसल अन्तरात्मा की आवाज़ है, जिसे हम मारने में संकोच नहीं करते. सही और गलत का फ़र्क सबको पता है. सही करने के लिये, दिल की और गलत करने के लिये दिमाग की जरूरत होती है. यदि देशप्रेम का जज़्बा व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर होता तो, सहज ही हम वही करते जो दिल कहता. तब शायद इतने नियम और कानूनों की आवश्यकता भी न होती. लेकिन एक देश की सौ प्रतिशत जनता एक सा तो सोच नहीं सकती. वैसे भी हम फ्री पंजीरी लूटने के कायल लोग हैं. जो फ्री बिजली और पानी के लिये देश को ताक़ में रखने में देर नहीं करते. जीएफ़आर की ये व्यवस्था तो वैसे भी सिर्फ़ और सिर्फ़ देश के 4 प्रतिशत से कम सरकारी कर्मचारियों पर ही लागू होती है. दोस्तेवोसकी के एक उपन्यास क्राइम और पनिशमेन्ट में एक इंटेलिजेंट और स्मार्ट युवक को लगता था कि बुद्धिमान लोगों को क्राइम कर ही लेना चाहिये. वो अपराध कर भी देता है. लेकिन उस 800 से अधिक पेज के साइको-थ्रिलर में ये ही समझाने की कोशिश की गयी है कि अपराध करना आसान है लेकिन उसके परिणाम का दंश झेलना ही पड़ता है. 

हमारे बचपन में एक दूर के रिश्तेदार हुआ करते थे. वो चार-छ: साल में एक-आध बार आते थे, और जाने का नाम नहीं लेते थे. बाद में पता चला कि जब वो भ्रष्टाचार में पकड़े जाते थे, तो बिना नोटिस रिसीव किये अज्ञातवास पर निकल जाते थे. सस्पेंशन पीरियड का उपयोग वो अर्जित धन को साधने में किया करते. बड़े विश्वास से कहते थे - पैसा लेकर सस्पेंड हुये तो पैसा दे कर बहाल भी हो जायेंगे. फ़िक्र किस बात की. जब तक वो रहते पिता जी यही डरते रहते कि कहीं यहीं छापा न पड़वा दें.

जीएफ़आर लिखी भी उनके लिये है, जिनकी बुद्धि ने अन्तरात्मा पर विजय प्राप्त कर ली हो. ताकि वो उसके नियम-कानूनों का उपयोग अपनी सहूलियत से अपने फ़ायदे के लिये कर सकें. जैसे संविधान की किताब को आगे करके देश विरोधी असंवैधानिक काम किये जाते हैं. वैसे ही ज्ञानीजन जीएफ़आर का उपयोग उसमें निहित लूप होल्स को खोजने में करते हैं. लेकिन आत्मा तो आत्मा है. चाहे दोस्तेवोसकी के नायक/खलनायक रस्कोलनिकोव की हो या किसी और की. किसी भजन में पहले भी कहा गया है - 

"तोरा मन दर्पण कहलाये, भले-बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाये"

अपने ही ईमानदार सहकर्मी उसे दुश्मन नज़र आते. उनकी नज़रें उसे घूरती सी लगती. उनके सामने थ्री-पीस सूट में भी वो ख़ुद को नंगा महसूस करता. ईमानदारी सिखायी नहीं जाती, घुट्टी में पिलायी जाती है. बाबा शेक्सपियर पहले ही कह गये हैं - 

"नो लीगेसी इस सो रिच एज़ ऑनेस्टी"  

- वाणभट्ट 

* मुन्शी प्रेमचन्द के जन्मदिन पर सभी सुधी पाठकों को हार्दिक बधाइयाँ 


रविवार, 24 जुलाई 2022

बाढ़

यहाँ कम से कम तीन हाथी की गहरायी होगी. बच्चों की भीड़ में से कोई चिल्लाया. हर साल बाढ़ के आने का उसी बेसब्री से इंतज़ार होता था जैसे होली और दिवाली का. उम्र के उस पड़ाव पर बाढ़ की त्रासदी से सब बच्चे अनजान थे. दूसरी क्लास के बच्चे से उम्मीद भी क्या की जा सकती है. स्कूल काफी ऊँचाई पर था. वहाँ तक बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता था. स्कूल के पूरब की ओर गंगा जी के कछार का विस्तार इतना फैला हुआ था कि बाढ़ आने पर समुन्दर का एहसास होता था. तब समुन्द्र देखा भी नहीं था लेकिन बाद में जब सुअवसर मिला भी तो नज़ारा कुछ अलग सा नहीं लगा. 

प्रयाग स्टेशन के पास गंगा जी के कछार में हुआ करता था, हमारा एनी बेसेंट स्कूल. चूँकि मोहल्ले से सभी बच्चे उसी स्कूल में पढ़े थे या पढ़ रहे थे, तो पेरेन्ट्स को किसी प्रकार का संशय नहीं था कि अपने होनहारों को किस स्कूल में भेजना है. रेलवे ट्रैक के बगल-बगल चलते हुये मोहल्ले के बच्चों का पूरा दल चलता था. छठवी से लेकर आठवीं के बच्चों को बड़ा माना जाता था. और उनके पास छोटे बच्चों को हाँकने का सर्वाधिकार सुरक्षित था. इसमें कान उमेंठने से लेकर कंटाप जड़ने तक का अधिकार मिला हुआ था. फिर भी यदि कोई गियर में न आये तो घर में शिकायत करवा कर कुटवाने का विशेषाधिकार भी शामिल था. यदि ओलम्पिक में रेलवे ट्रैक पर बैलेन्स करके चलने की प्रतियोगिता होगी तो कोई शक नहीं कि चैम्पियन हमारे एनी बेसेन्ट से निकले. बच्चे ध्यान की उच्चतम अवस्था पर होते थे जब अपर इण्डिया ट्रेन के इन्जन का ड्राइवर उसे भंग करने के लिये बार-बार सीटी बजाता. बाद में उस ट्रेन के ड्राइवर्स पहचान गये थे और बच्चों के लिये डिमांड पर सीटी बजाते. वो रेलगाड़ी का जमाना था, कोयले वाले स्टीम इंजन थे, हॉर्न पों करके नहीं कू करके बजते थे. ट्रेन चलती थी - कू छुक-छुक.  

एनी बेसेंट में पढ़ने के कुछ खास फ़ायदे थे. इस स्कूल की कोई बाउन्ड्री नहीं थी. जहाँ तक भाग सकते हो भाग लो. कछार और स्कूल को एक लम्बी सीधी सड़क सेपरेट करती थी. नर्सरी सेक्शन के पीछे की तरफ़ एक जंगल था. जिसमें छुपम-छुपाई जैसे खेल होते थे. बाघों का डर दिखा कर शिक्षिकायें बच्चों को उधर जाने से रोकने का असफल प्रयास भी करती थीं. खेल के चार बड़े-बड़े मैदान थे. सबका लेवल गंगा जी ने अपने कटान से बनाया हुआ था. एक बड़ी प्रार्थना सभा का ग्राउन्ड अलग था जिसमें पूरा स्कूल एक साथ प्रेयर करता था. छोटे बच्चों के लिये एक छोटा प्ले ग्राउन्ड। 15 अगस्त और 26 जनवरी पर झण्डे को सलामी दी जाती और महीनों ड्रिल का रिहर्सल होता. दूर से आने वाले बच्चों के लिये बसों की सुविधा भी थी. बिल्डिंग इतनी बड़ी थी कि नर्सरी-केजी से लेकर आठवीं तक सभी क्लास के दो सेक्शन आराम से लग सकें। बिल्डिंगें भी दूर-दूर फैल कर बनी थीं। यदि कोई बच्चा पानी पीने के लिये निकले तो आसानी से क्लास खत्म होने तक इधर-उधर घूम सकता था. बशर्ते किसी टीचर की नज़र न पड़े. टीचर्स इतनी पर्सनल थीं कि स्कूल के अन्दर हों या बाहर, यदि स्कूल के बच्चे कुछ गलत करते मिल जायें तो यथोचित पुरस्कार या प्रवचन मिलना तय था. एक बच्चे को मुर्गा सिर्फ़ इसलिये बनाना पड़ा कि उसने पानी की टंकी पर लिखे ब्रह्म वाक्य को थोड़ा परिवर्तन कर के बोल दिया था - पानी बहाओ, पियो मत. दुर्योग से प्रिन्सिपल वहीं से गुजर रही थीं. बीच में एक लाइब्रेरी और बड़ा सा हॉल था. हॉल में महापुरुषों की फ़ोटोज़ और कोट्स लगे हुये थे. वहीं पर विवेकानन्द जी का कोट - सभी नदियाँ जिस तरह अंत में समुद्र में विलीन हो जाती हैं उसी प्रकार धर्म के अनेकानेक मार्ग ईश्वर तक पहुँचते हैं - से पहली बार सामना हुआ था. कभी-कभी उस हॉल में केन्द्रीय फ़िल्म प्रभाग द्वारा निर्मित साक्षी गोपाल और सत्यवादी हरिश्चंद जैसी शिक्षाप्रद फ़िल्में दिखायी जाती थीं. आज के युग में संस्कार छोड़ते-छोड़ते भी जो थोड़ी बहुत संस्कार नाम की चीज़ बची रह गयी है, उसमें स्कूल का बहुत बड़ा दोष है. वरना हम भी देशभक्ति और ईमानदारी जैसी बिमारियों से बच जाते. और लम्पट कॉन्फिडेंस लिये देश के अथाह स्रोतों के दोहन में लिप्त होने पर गर्व अनुभव करते. उस समय इलाहाबाद के कम स्कूलों में ही को-एड सिस्टम था. इसका और कोई फ़ायदा हो या न हो, लेकिन बच्चों में  बेसिक तमीज़ और ड्रेसिंग सेंस ज़रूर आ जाता था. एनी बेसेन्ट में पढने का एक लाभ ये भी था कि हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़ने पर भी इन्ग्लिश मीडियम स्कूल वाली फ़ीलिंग आती थी. 

बात बाढ़ से शुरू हुयी थी. तब कछार, कछार हुआ करता था. सिर्फ़ मैदान और मैदान के अलावा कुछ नहीं. धीरे-धीरे शहर फैलता गया. जमीनें सिकुड़ती गयीं. जमीन की कमी के कारण लोगों ने कछार में भी प्लाटिंग कर डाली. अब कछार दो-तीन मन्जिल के मकानों से भर गया है. दूसरी मन्जिल इसलिये जरुरी है कि बाढ़ तो आनी ही है हर साल. तो ख़ास दिक्क़त न हो. साल के कुछ हफ़्तों की ही तो बात होती है. भला हो ग्लोबल वार्मिंग का अब पानी कम बरसता है तो बाढ़ भी कम ही दिन रहती है. वो दिन दूर नहीं जब कछार में बड़े-बड़े बिल्डर्स बहुमन्जिला इमारतें बनायेंगे. 

स्कूल छूटा फिर शहर भी छूट गया लेकिन गंगा जी से नाता बना रहा. जब तक लुधियाना रहा तब तक यही डर सताता रहा कि कहीं गलती से निपट गया तो गंगा किनारे वाले को बुड्ढे नाले के किनारे निपटाया जायेगा. उपर वाले की दया से नीचे वालों ने सुनी और वापस गंगा जी के पास आ आया. अब कानपुर में रह रहा हूँ. जहाँ के लिये कहावत भी है कि कानपुर में कान भी बचा के रखना पड़ता है. बहुत स्मार्ट लोग हैं, कान काट लेते हैं. मेरी मज़बूरी है कि मै चश्मा लगाता हूँ जिसके लिये कान का होना बहुत आवश्यक है. 

इस बार बरसात ने यूपी में धोखा दे रखा है. जुलाई खत्म होने को आयी और इन्द्र देव का दिल पसीज ही नहीं रहा है. लोग पानी के इन्तजार में त्राहिमाम-त्राहिमाम बस इसलिये कर रह हैं कि पूरे शहर की बिजली की खपत बढ़ गयी है और विद्युत् विभाग उतनी आपूर्ति नहीं कर पा रहा है. इन्वर्टर पंखे तो चला सकता है, लेकिन डेढ़ टन का एसी नहीं. शहर वालों को कौन सी खेती करनी है. अगर बिजली आती रहे और एसी चलता रहे तो उन्हें कोई परेशानी नहीं है. बारिश हो या न हो. बस खेत-किसान की फ़िक्र और ज़िक्र कर लेते हैं. उनके लिये तो बारिश मतलब गरमागरम चाय के साथ पकौड़ों का आनन्द. माहौल में थोड़ी रूमानियत आ जाये. इससे ज़्यादा कुछ नहीं. पानी ढंग से बरस जाये तो घर के आँगन को भी बारिश से बचा के रखने वाली इस शहरी जनता को दिक्कत होने लगती है. लेकिन बारिश तो दूर बादल भी नज़र नहीं आ रहे. पूरे सीजन में बस दो-चार दिन ही बादलों ने अपना असली रूप दिखाया है. शहर की प्लान्ड कॉलोनीज़ का ये हाल है कि लोग त्राहि-त्राहि करने लगे. जिस बाढ़ को देखने हमें कछार तक जाना पड़ता था, वो घर तक आ गयी है. 

कारण वही है, जहाँ ज़्यादा समझदार लोग होते हैं, वहाँ त्याग बेवकूफ़ ही करेंगे. कॉलोनी पढ़े-लिखे नौकरी-पेशा लोगों की न होती तो कोई आसानी से कह सकता था कि अनपढ़ लोग हैं. प्लाट के एक-एक इन्च पर निर्माण करने के बाद पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति प्रेम के जज्बे के चलते सबने फुटपाथ पर कब्ज़ा कर रखा है. सड़क का पानी नाली-नाले तक पहुँचे भी तो कैसे. नालियाँ जो बरसाती पानी को नालों तक ले जाने के लिये बनायीं गयीं थीं, बन्द पड़ीं हैं. बड़े नालों को घरों के सामने या तो पाट दिया गया है या उनका सदुपयोग घरों के कचरे को फेंकने में किया जाता है. कूड़े वाला आया घर से कचरा निकाल - का सुगम संगीत फुल वॉल्यूम पर सुबह-सुबह चालू हो जाता है. वॉल्यूम इतना तेज कि कोई ये नहीं कह सकता कि वो कान में रुई डाल के सो रहा था. लेकिन क्या मजाल कि हर घर इस स्मार्ट सिटी मिशन की मुहिम में शामिल होने को तैयार हो. नगर निगम के अथक प्रयासों के बाद भी हर दो सौ मीटर पर एक कूड़े का अम्बार लगा दिख जायेगा. डेमोक्रेसी का मखौल उड़ाने वाले सब कुछ सरकार पर थोप कर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ने में लग जाते हैं. गुटका चबा कर दिन में तीन लीटर पीक उगलने वाले इसी में खुश हैं कि सफ़ाई अभियान फेल हो गया.

अभी चार दिन की बारिश में ही सारी कॉलोनी न सिर्फ़ धुल गयी बल्कि भर भी गयी. घरों के सामने ढाल भी लोगों ने सड़क की ओर झेल दिये हैं ताकि उनकी दीवार सुरक्षित रहे. ये बात अलग है कि डामर वाली सडकें पानी का भराव नहीं झेल पातीं और जल्द ही रोड़ी-गिट्टी सब बाहर आ जाती है. फिर यही लोग सरकार और इंजीनियर्स को कोसते हैं, बहुत भ्रष्टाचार है. इनकी  उम्मीद होती है कि एक बार सी-सी रोड बन जाये तो हमेशा के लिये दिक्कत खत्म हो जाये. बरसाती पानी भर भी जाये तो गंगा जी सा आनन्द मिले, अभी उबड़-खाबड़ सड़क पर जल भराव का आनन्द लेने में पैर में मोच आने की सम्भावना ज़्यादा है. छई-छप्पा-छई वाले हालातों में लोग प्रसन्न हैं गंगा जी घर तक आ गयीं. बच्चों को घर बैठे कागज़ की कश्ती चलाने का सुअवसर मिल गया. लेकिन मोबाइल और कम्प्यूटर में घुसे बच्चों को कागज़ की नाव उत्साहित नहीं करती. कभी बाढ़ देखने जाना पड़ता था, अब घर के सामने ही पानी भर जाता है. इसमें भला कौन सी परेशानी है. लोग निश्चिन्त भाव से कहते हैं कि पानी अब पहले सा कहाँ बरसता. बस दो-चार दिन की दिक्क़त है, फिर तो सड़क सूखी ही मिलती है. शहर में हर नयी सड़क के साथ नालों का एक जाल तैयार होता जा रहा है, जो बहते नहीं, रुके-रुके से रहते हैं. बरसात से पहले उनकी सफ़ाई के बिल हर साल बदस्तूर पास हो जाते हैं. 

अपने घर को हरा-भरा रखने के लिये अपनी बाउन्ड्री के अन्दर कुछ पौधे-गमले लगा रखे हैं. फुटपाथ घेरने का कोई इरादा भी नहीं है. सड़क का ढाल नाली की ओर ही रहने दिया है. पडोसी अक्सर कहते रहते हैं कि आप भी पर्यावरण संरक्षण में योगदान दीजिये. अपना फुटपाथ घेरिये. पूरी गली में बस एक ही घर के आगे फुटपाथ बचा हुआ है. सामने पानी कम भरता है. सड़क भी कुछ कम टूटी है. पड़ोसियों के यहाँ कोई गेस्ट आता है तो उसे गाड़ी पार्क करने की जगह भी वहीं दिखती है. मोहल्ले में किसी ने नालियों को अहमियत नहीं दी, इसलिये आदर्शवादी वर्मा जी को घर बैठे गंगा मैया की बाढ़ का आनन्द मिल जाता है. वैसे भी बड़े-बुजुर्ग फरमा गये हैं - समझदार की मौत है. टूटी सड़क, जल भराव और गंदगी को झेलने को वर्मा जी इसलिये विवश हैं कि शहर समझदार हो गया है और वो अपने बचे-खुचे एनी बेसेंटिया संस्कारों को छोड़ भी नहीं पा रहे हैं. 

गुलज़ार साहब से माफ़ी सहित ये पंक्तियाँ अर्ज़ कर रहा हूँ-

इन उम्र से लम्बे नालों को,  बहते तो कभी देखा नहीं 
बस बजबजाते रहते हैं, पानी को सरकते देखा नहीं 
स्मार्ट लोगों के शहर में, स्मार्ट सिटी को ढूँढता है, ढूँढता है, ढूँढता है. 
   


- वाणभट्ट     

  

रविवार, 17 जुलाई 2022

फुग्गा

गुब्बारे लो गुब्बारे...रंग बिरंगे प्यारे प्यारे...बचपन में ये या इससे मिलती जुलती कविता हम सबने पढ़ी-सुनी होगी. इनके ना-ना प्रकार के रंग बाल मन को आकृष्ट करते हैं. शायद ही कोई बच्चा इसकी चपेट में न आया हो. शायद ही कोई बचपन हो जो इसके लिये न मचला हो. गैस वाले गुब्बारों की तो बात ही अलग थी. इनके गुच्छे बना स्कूलों के विशिष्ट आयोजनों पर उड़ाये जाते थे. हर बच्चे ने इनके माध्यम से आकाश में कल्पना की उड़ान अवश्य भरी होगी. बर्थडेज़ में घरों को गुब्बारे से सजाया जाता रहा है. और फुलाने से ज़्यादा मज़ा बच्चों को उन्हें फोड़ने में आता है. पार्टी में केक कटने का सब्र से इन्तज़ार बच्चे इसीलिये कर पाते कि उसके बाद गुब्बारे फोड़ने को मिलेंगे. गुब्बारे फोड़ने में उन्हें बम फोड़ने जैसी फ़ीलिंग ज़रूर आती होगी. हम लोग तो उस जमाने के हैं, जब गुब्बारे के फटने के बाद भी उसकी मकोइया बना कर दूसरों के सर पर फोड़ी जाती थी.  

पता नहीं क्यों फूला हुआ गुब्बारा बचपन से ही फोड़े जाने के लिये लालायित करता रहा है. आजकल वाट्सएप्प पर एक स्टोरी बहुत प्रचारित हो रही है. बॉस ने अपने सभी मातहतों को बुलाया और सबको एक-एक गुब्बारा दिया. सबको उसने उसे फुलाने के लिये कहा. उसने कहा जिसका गुब्बारा देर तक फूला रहेगा उसे एक इन्क्रीमेंट मिलेगा. शर्त ये थी कि कोई कमरे से बाहर नहीं जायेगा. लेकिन कहानी में ट्विस्ट डालने के लिये उसने सबके हाथ एक - एक ऑलपिन भी पकड़ा दी. फिर क्या था. सभी सहकर्मी अपना गुब्बारा बचाने और दूसरे के गुब्बारे फोड़ने जुगत में जुट गये. जिसका गुब्बारा पहले फूट गया वो दूसरों के गुब्बारे फुड़वाने में लग गया. आपका अनुमान सही है. दो मिनट के अन्दर ही सारे गुब्बारे फूट चुके थे. बॉस मुस्कुरा रहा था. उसने डिक्लेयर किया कि यदि सब अपना-अपना गुब्बारा पकड़े खड़े रहते तो सभी को इन्क्रीमेंट मिलता. लेकिन जहाँ प्रतिस्पर्धा की भावना इतनी गहरी हो कि हमें अपने ही साथियों से आगे निकलना हो, तो जो हुआ वो अवश्यम्भावी था. और ये कहानी हर वाट्सएप्प उपयोगकर्ता तक जरूर पहुँची होगी. लेकिन क्या मजाल कि वाट्सएप्प पर दिन-रात बहने वाली ज्ञान गंगा का असर किसी पर पड़ता. इस कहानी का हश्र भी वही होना था जो बाकियों का होता है. एक कहानी बन के ही रह जाना. जो सुनने और सुनाने में अच्छी लगे, बस इतना ही. 

उम्र बढ़ने के बाद आदमी का गुब्बारों की तरफ़ का मोह खत्म सा हो जाता है. लेकिन गुब्बारा उसे कहाँ छोड़ने वाला. वो किसी न किसी रूप में उसने ऊपर आवरण की तरह चिपक जाता है. किसी पर कुर्सी के रूप में, किसी पर पैसे के रूप में, किसी पर ताकत के रूप में. अब इन गुब्बारों के बचपन के गुब्बारों की तरह नीले-पीले रंग तो नहीं होते. एक आवरण की तरह रंगहीन-गन्धहीन-पारदर्शी मुलम्मा चढ़ जाता है. और व्यक्ति अपने द्वारा सृजित इस गुब्बारे में रोज थोड़ी-थोड़ी हवा भरता रहता है. सहअस्तित्व में विश्वास न करने वाले असामाजिक टाइप के तत्वों को लगता है, मेरा गुब्बारा दूसरों से बड़ा होना चाहिये. इसलिये उसका भरसक प्रयास होता है कि या तो वो अपने गुब्बारे में और हवा भर ले या दूसरे के गुब्बारे में पिन चुभाता घुमे. सब के सब अपना-अपना अदृश्य गुब्बारा लिये घूम रहे हैं. बड़े गुब्बारे वाले अपने गुब्बारे से सन्तुष्ट नहीं हैं. या तो उनकी नज़र अपने से बड़े गुब्बारे पर है या वो अपने से छोटे गुब्बारे वाले पर हावी होने में लगे हैं. और छोटे गुब्बारे वाले भी मौके की तलाश में रहते हैं. जरा मौका मिला नहीं कि पिन छुआ देते हैं. यदि कुछ न कर पायें तो भी बड़े गुब्बारे के स्वतः फूटने की कामना करना कोई गुनाह तो नहीं. कुछ का जीवन इसी इंतज़ार में व्यतीत हो जाता है. समय के साथ सब गुब्बारों की हवा निकलती है. मनुष्य बली नहीं होत है, समय होत बलवान. लेकिन ये बात समय रहते समझ आ जाये तो सारे गुब्बारे एक साथ उड़ने लगते. देश और समाज नित नयी ऊँचाइयों को छूता नज़र आता. जब बात मेरा गुब्बारा तुम्हारे गुब्बारे से छोटा कैसे, तो सारा ज्ञान गया तेल लेने. पहले तुम्हारा गुब्बारा निपटा लें फिर अगले गुब्बारे को देखेंगे. 

यदि आप गौर कर सकें तो देखेंगे हर आदमी एक गुब्बारे की तरह है. किसी का गुब्बारा औकात से ज़्यादा फूला हुआ है तो किसी का चुचका हुआ. जिन्होंने अपने गुब्बारे में कम हवा भर रखी है उन्हें छोटी-मोटी पिन की चुभन से फ़र्क नहीं पड़ता. जिनके गुब्बारे में हवा ज़्यादा है, वो थोड़ा ऊपर उड़ना पसन्द करते हैं. लेकिन जरा भी पिन छू गयी तो उन्हें फटने में देर नहीं लगती. पद और पैकेज आसानी से हासिल हो जाता तो हर किसी को गुरुर करने का हक़ मिल जाता. रगड़-घिस के जब इतने ऊपर आये हैं तो एक रुतबा और रुआब तो होना ही चाहिये, जिसे सब सलाम करें. इस रुतबे और रुआब को जेहन और चेहरे पर चढ़ाने के लिये भी कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते. सुबह जगने से लेकर रात में सोने तक हर पल इसे जपना पड़ता है तब जाके वो बॉडी लैंग्वेज बनती है कि आदमी आम नहीं अमरूद है. 

ख़ुदा उन्हें नीली बत्ती का शौक़ अता फ़रमाये जिन्हें इनकी ख़्वाहिश हो. जिनकी ये ख़्वाहिश पूरी नहीं होती उनकी आत्मायें शरीर में रहते हुये भी मरी-मरी सी रहती हैं. साहब को नीली बत्ती तो नहीं मिली लेकिन जिस गुलिस्तां की हर शाख पर किसी न किसी ने डेरा डाल रखा हो, वहाँ एक ऊँची शाख उनके कब्ज़े में आ ही गयी. अब वो अपने मातहतों के लिये तो साहब बन ही चुके थे. लेकिन इस लम्हे को हर पल जीना पड़ता है. सो बीवी भी नौकरों के आगे उन्हें साहब कह कर ही सम्बोधित करती थी. सभी को हिदायत थी कि घर में भी साहब से तमीज़ से पेश आयें. घर और ऑफिस फ़तह करने के बाद साहब को लगता था कि बाहर वाले भी उनको हल्के में न लें. सरकार में उच्च पदों पर आसीन लोगों को इसीलिये लाल - नीली बत्तियों से नवाज़ा जाता है कि जनता को कन्फ्यूजन न रहे कि किन से उलझना नहीं है. कई विभागों को तो युनिफॉर्म भी दे दी गयी है ताकि किसी को रास्ता बदलना हो तो बदल ले, बाद में ये न कहे कि वसूली हो गयी. 

अमरुद महात्माओं के पास अपने महात्म्य का गुब्बारा बाहर के लोगों को दिखाने का एक मात्र माध्यम है, उनकी कार. किसका गुब्बारा कितना बड़ा है ये जानने के लिये कोई विशेष मेहनत नहीं करनी है. आपने गौर किया होगा कि इधर बड़ी गाड़ियों की बिक्री की होड़ मची हुयी है. सोसायटी की पार्किंग में जाइये जिसका गुब्बारा जितना बड़ा होगा, उतनी बड़ी गाड़ी का वो मालिक होगा. जैसा की पहले भी बताया जा चुका है पद और पैसा कुछ भी आपके गुब्बारे के साइज़ को बदल सकता है. पद तो फिर भी समझ आता है कि बन्दे ने मेहनत से हासिल किया है. लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त समाज में इमानदारी से पैसा बना लेना असम्भव भले न हो लेकिन कठिन तो अवश्य है. जिनके पास पद या पैसा न भी हो तो उनके गुब्बारे के अरमान तो कम नहीं हो जाते. वर्मा जी कबाड़ी मार्केट से बीएमडब्लू का लोगो इसीलिये उठा लाये कि मारुती 800 चलाने में उन्हें अपना गुब्बारा छोटा दिखायी देता था. ये बात सिर्फ़ व्यक्ति जनता है कि उसका गुब्बारा कितना बड़ा या छोटा है. लेकिन वो उसे बड़ा बना कर प्रोजेक्ट करता है ताकि लोगों में भौकाल बना रहे. इसी का नाम सेल्फकॉनफिड़ेंस है. ये जो अपनी पर्सनल गाड़ियों पर लोग भारत सरकार, प्रदेश सरकार, मंत्रालय, पुलिस लिखाये घूम रहे हैं दरअसल उनके गुब्बारे का द्योतक है. हर ऐसी गाड़ी वाले को टोल प्लाजा पर उलझते देखा जा सकता है. यही लोग हर प्लाजा पर झक-झक करते नज़र आ जायेंगे. भौकाल चल गया तो ठीक. नहीं चला तो कौन सा ऑफिस वाले या पडोसी साथ हैं.

ऐसे ही एक माननीय अपनी पर्सनल कार पर प्रदेश सरकार जिला प्रमुख लिखाये घूम रहे थे. हाइवे की टोलप्लाजा में अपनी हेकड़ी पर आ गये. अपना आई कार्ड उन्होंने उसके सामने रख दिया. प्लाजा कर्मचारी ने विनम्रता से कहा - सर ये आपकी ऑफिशियल गाड़ी होती तो मान भी लेता, प्राइवेट गाड़ी पर तो टोल लगेगा. प्लाजा का नुमाइन्दा उनकी पर्सनालिटी से इम्प्रेस होने को राजी नहीं था. उनका गुब्बारा इस बात पर सिकुड़ गया होता, यदि साथ में मोहल्ले का ड्राइवर न होता. उन्होंने बन्दे की बात को दिल पर ले लिया. बोले - चार टोल पर बिना पेमेन्ट किये आ रहा हूँ, तेरा टोल क्या स्पेशल है. भौकाल दिखाने के लिये वो हत्थे से उखड़ चुके थे. कर्मचारी ने देखा कि अब बात उसके उपर आ रही है तो उसने अपने आर्मी से रिटायर्ड सुपरवाईज़र को बुलाना उचित समझा. सुपरवाईजर ने पूरी इज्ज़त और विनम्रता के साथ उनके नाम-पते-पद की पूरी जानकारी माँगी. लेकिन जैसे ही उसने प्राइवेट गाड़ी पर टोल देने की बात कही तो साहब अपने पुराने रौब में आ गये. फिर जो हुआ, उसका सपना भी साहब ने न देखा होगा. मातहतों पर रौब गांठते-गांठते वो भूल गये थे कि सेर को सवा सेर भी मिलता है. सुपरवाईज़र ने उनके गुब्बारे को मकोई बनाने लायक भी नहीं छोड़ा. साहब को टोल देना पड़ा और प्लाजा के सहकर्मी ने पूरे एपिसोड की रिकोर्डिंग भी कर डाली. दूसरे के गुब्बारे को फटते देखने में लोगों का कितना इंटरेस्ट होता है, ये इस बात से पता लगता है कि पूरा प्रकरण वाट्सएप्प के माध्यम से पूरी दुनिया घूमते-घामते साहब के पास-पड़ोस-मातहतों के मोबाइल तक भी पहुँच गया. लेकिन किसी ने साहब को भनक भी न लगने दी. घर-दफ़्तर में उनका भौकाल उसी तरह कायम रहा. जब वो सोने जाते थे, तो काफी देर तक सुपरवाईज़र का चेहरा उन्हें सोने नहीं देता था. कभी-कभी तो वो नींद में चौंक के जाग जाते थे. हफ्ते भर के लिये चेहरे का रुआब और रौनक दोनों विलुप्त हो गये थे. चुचका हुआ गुब्बारा मातहतों को आन्तरिक आनन्द देता. उन्हें लगता कि टोल सुपरवाईज़र ने उनका बदला ले लिया.

लेकिन थेंथरयी भी कोई चीज़ होती है. साहब रोज अपने कॉनफिड़ेंस को समझाते - ख़ुदी को कर बुलंद इतना. बच्चन की 'नीड़ का निर्माण फिर से' से प्रेरणा ले कर नये गुब्बारे के निर्माण में लग गये. नये गुब्बारे में हवा भरने में ज़्यादा समय नहीं लगता.  

उनकी अनुपस्थिति में उनके मातहत अब उन्हें फुग्गा कह कर आनन्दित हो लेते. 

-वाणभट्ट           

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