रविवार, 30 अगस्त 2026

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है. पुरानी कहावत है - इफ़ हेल्थ इज़ लॉस्ट देन एवरीथिंग इज लॉस्ट. बुजुर्गों की बातें लोग बिना अनुभव किये मान लेते तो बहुत सम्भव है कि नयी आती पीढ़ियों के साथ गलतियाँ कम होती जातीं. कम से कम रिपीट तो न होतीं. लेकिन वो युवा ही क्या जो बाप की बात बिना अनुभव किये मान ले. सौ साल का जीवन है और सब आप अपने पूर्ववर्तियों के हिसाब से करते चले गये तो आपके पास इतना समय बच जायेगा कि काटे नहीं कटेगा. इसलिये अपने बाप-दादाओं को गलत सिद्ध करने के लिये, सबसे पहले तो उनकी बात मानना बन्द कर दीजिये. फिर ऐसे-ऐसे काम (प्रयोग) कीजिये कि बाप कहे बेटवा आउट ऑफ़ कन्ट्रोल हो गया है. पहले जब दो-चार बच्चे होते थे, तो एकौ उधरा जाये तो बाप लट्ठ ले के सुधार, अब जब एक-दो ही पैदा हो रहे हैं, तो बाप किसे समझाये, किसे दौड़ाये. मन-मसोस के बोलता है - बेटा कर लो जो तुम्हें करना है. पचपन-साठ पार करते-करते जब शरीर और हौसले दोनों पस्त होने लगते हैं, तब वही बेटा बोलता है - माई डैड वाज़ राईट. लेकिन यदि वो बाप की बात मान लेता तो, सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो जीवन भर करता क्या. ये भी सच है कि ये दुनिया जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ही गयी है, वो आगे न जा पाती यदि नयी पीढ़ी उन्हीं की लकीर पीटती चलती. दुनिया की वर्तमान तरक्की नयी पीढ़ी की क्रान्तिकारी और विद्रोही, सब कुछ बदल डालने की प्रकृति के कारण ही संभव हुयी है. जो समाज से हट कर नया सोचने-समझने-करने की हिम्मत रखते थे, उन्होंने ही दुनिया बदली. बाकी तो ढर्रे पर चलते चलने को ही जीवन समझ बैठे. 

भौतिकतावादी समाज की मज़बूरी है कि वो सफलता-असफलता को भौतिक प्रगति के आधार पार आँकता है. बंगले-गाड़ी-मोटर. स्टेटस के जितने सिम्बल हैं, उनके पीछे आदमी भागते-भागते उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच जाता है जब कहता है - ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा तो वो-वो चीज़ें जो बचपन से अब तक फ़्री मिला करती थीं और मिला करती हैं. माया की चाल ही यही है, पहले खूब नचाती है, फ़िर बताती है कि हम ही हैं महाठगनी. मेरे चक्कर में न पड़ते तो बेहतर रहता. जिन्हें जितनी जल्दी इस सत्य भान हो गया, वो माया-मोह के बंधन से मुक्त हो गये. पता नहीं आदमी को ये बीमारी क्यों है कि उसे लगता है कि जिस चीज़ में उसे आनन्द आ रहा है, उसे दूसरों को भी बताया-सिखाया जाये. उन्हें लगता है कि जो अनुभव उन्हें हो गया है उसका लाभ ले कर और लोग माया के चक्कर में न पड़ें. लेकिन लोग तो धरा पर भाँति-भाँति के अनुभव करने ही तो आये हैं. यदि दूसरों के कहने पर चलते रहे और आत्मानुभूति न की तो लौट कर भगवान को क्या जवाब देंगे. धरती पर आने के बाद तो भगवान भी माया के चन्गुल से नहीं बच सके, तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या है. कितने ही साधू-सन्त आये जिन्हें असार जीवन का सार मिल गया था. वो झोला-झन्डा लेकर निकल लिये दुनिया में अलख जगाने. लेकिन हर किसी को वो अपनी बात समझाने में सफल न हो सके. करोड़ों के देश में अगर हज़ार-पाँच सौ ने भी आपको पकड़ लिया तो स्वरोजगार का ये समय सिद्ध मॉडल सर्वोत्कृष्ट है. लाख दो लाख ने फौलो कर लिया तो धन्धा चल निकला समझो.    

कुछ नया करने और करते रहने की जुगत हर जगह हर तरफ़ जारी है. लेकिन क्रांति वहीं होती है, जब आपके विचार इतने अधिक लोगों तक पहुँच जाये कि वो लोगों को उनका अपना विचार लगने लगे. फिर आपका काम ख़त्म. बाकी लोग आपके विचार को सर-माथे पर ढोने लगेंगे. आप भीड़ को एक दिशा दिखा कर छोड़ दीजिये. बाकी काम भीड़ अपने आप करने लग पड़ेगी. आप पतली गली देखिये, और धीरे से निकल लीजिये. फ़सलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन बढ़ाने का विचार एक क्रांति की तरह उछाला गया, और भाई लोग तो तैयार बैठे ही थे कैच करने के लिये. नतीजा, हर कोई लग गया इस दिशा में. फ़सल में ये तत्व पहुँचेंगे कैसे इसका विज्ञान बहुत पेचीदा हो सकता है लेकिन इसकी तकनीक शायद आसानी से समझ आ जाये. हर फ़सल में पोषक तत्वों की नियत मात्रा और क्षमता है. शायद इसीलिये दुनिया के हर देश में संतुलित भोजन की महत्ता पर बल दिया गया है. थाली विशेष रूप से भारतीय थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-सलाद-रायता-पापड़-अंचार का समावेश किया गया होगा. हमारे यहाँ तो पथ्य और अपथ्य दोनों को परिभाषित किया गया है कि कब क्या-क्या खाना है और कब क्या नहीं खाना है. शरीर की प्रकृति और प्रकार के अनुसार ही वैद्य भोजन का निर्धारण करते थे. जो पदार्थ एक व्यक्ति के लिये अमृत हो सकता है, दूसरे के लिये विष भी बन सकता है. 

जब से विज्ञान नौकरी बना है, लोगों को कुछ न कुछ करते रहना और उसे छापते रहना, मज़बूरी बन गया है. ताकि समय आधारित प्रमोशन निर्धारित समय सीमा पर बिना किसी दिक़्क़त के होता रहे. इसके लिये उपर वालों की मेहरबानी भी बहुत जरूरी है. क्योंकि महान लोग जिस पथ से गये हैं, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करते रहना शायद आसान और सुरक्षित मार्ग है. लकीर पीटने का लाभ ये है कि विज्ञान के पीर और फ़कीर आपके काम को अपने काम का विस्तार मान कर आनन्दित होते रहें. नया सोचने-समझने की तथा दूसरों को समझाने की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद प्राय: समाप्ति की कगार पर होती है. उस पर कोई नया विचार भी आ जाये तो अपने पुरातन विचारों और कर्मों को सही सिद्ध करने के लिये ये नये विचारों के औचित्य पर सवाल खड़े करने से नहीं चूकते. ऐसा ही हुआ जब किसी ने गेहूँ, धान और दालों में पोषक तत्वों को फ़सल सुधार से बढ़ाने के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये. इन तत्वों को मृदा में डाला जाता है ताकि पौधे की जड़ें मृदा से इन तत्वों का अवशोषण व स्थानान्तरण कर इन्हें फसलों के बीजों में भण्डारित कर सकें. विभिन्न प्रजातियों में पोषक तत्वों के अवशोषण की क्षमता भिन्न हो सकती है. 

जब कुछ प्रभावशाली लोग एक दिशा में कार्य आरम्भ कर देते हैं, तो वे आगे की दिशा भी निर्धारित कर देते हैं. स्थापित विषयों पर काम करना, अधिकांश विज्ञानियों के लिये आसान होता है. नये काम और विचारों के लिये आपको उनका ही समर्थन चाहिये होता है, जो इस क्षेत्र अपने बरसों खपा चुके हैं. भीड़ भी भेंड़ चाल में उसी मार्ग का अनुसरण करने लगती है, प्राय: बिना सोचे-समझे. सस्य क्रियाओं और फ़सल सुधार के द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाने के प्रयास वैश्विक स्तर पर वृहद् रूप से चल रहे हैं. कोई भी फ़सल इन प्रयासों से अछूती नहीं रह सकी है. इस पद्यति को बायो-फोर्टीफिकेशन (जैव सम्वर्धन) की संज्ञा दी गयी. इस प्रक्रिया की विशेषता ये थी कि लौह, जस्ता, प्रोटीन व अन्य पोषक तत्वों की  मात्रा की माप बीज स्तर पर की जाती है. जबकि अन्न को उत्पादन से लेकर थाली में भोजन के रूप में पहुँचने की यात्रा में अनेकानेक प्रसंस्करण व पाक क्रियाओं से हो कर गुजरना होता है. इसलिये ये अत्यावश्यक है कि अनाज के स्तर पर ही नहीं, प्रसंस्करण और व्यंजन बनने के बाद इन पोषक तत्वों का आँकलन किया जाये. बहुत सम्भव है कि छिलका उतारने, उबालने और खाना बनाने की प्रक्रिया में पोषक तत्वों में क्षति होती हो. अनाज में कुछ पोषण विरोधी पदार्थ भी प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं, जो इन पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं. पाक विधियों के मध्य इन तत्वों के लीच कर जाने की भी सम्भावना रहती है. 

पोषण बढ़ाने के लिये खाना पकाने के दौरान या खाना बन जाने के बाद पोषक तत्वों को बिना किसी हानि के सहजता से भोजन में मिलाया जा सकता है. पकाने के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में कुछ ह्रास अवश्य सम्भव है.  भोजन का पोषण सम्वर्धन अन्न के पोषण सम्वर्धन से आसान और कम लागत की प्रक्रिया है. आयरन, जिन्क, प्रोटीन आदि तत्व आज प्रीमिक्स के रूप में उपलब्ध हैं. जिन्हें आटा, चावल, दाल, नमक में मिलाया जा सकता है. पोषक तत्व, खाद्य मैट्रिक्स में आसानी से घुल कर पूरे भोजन में फैल जाते हैं. अधिक तापमान पर तत्वों में आंशिक हानि सम्भव है. लेकिन तापरोधी यौगिकों के उपयोग से इस समस्या से भी बचा जा सकता है. पोस्ट-प्रोसेसिंग फोर्टीफिकेशन का उपयोग औद्योगिक व संस्थागत स्तर पर पहले से ही किया जा रहा है. अब तो पोषक तत्व टैबलेट के रूप में भी सहजता से सस्ते दामों में उपलब्ध हैं, जिनका वितरण स्कूलों और संस्थाओं में किया जा रहा है. 

हर प्रकार के अन्न में कार्बोहाईड्रेट्स और प्रोटीन प्राकृतिक मात्रा में उपलब्ध रहता है. विभिन्न प्रजातियों में इनकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है. फ़सलों और उनकी प्रजातियों में बायो-फोर्टीफिकेशन से प्रोटीन बढ़ाने की सम्भावनाओं की तलाश विश्व स्तर पर जारी है. भारत जैसे  शाकाहारी बाहुल्य देश में भी अन्डे, चिकन और माँस का उपयोग बढ़ा है. ऐसे में बायो-फोर्टीफिकेशन माध्यम अन्न में प्रोटीन बढ़ाने के उद्देश्य कहाँ तक सार्थक हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है. सोयाबीन में प्राकृतिक रूप से 36-40% तक प्रोटीन उपलब्ध होता है. शाकाहारियों में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने में सोयाबीन एक मुख्य भूमिका निभा रहा है. इस स्तर तक किसी भी अन्न में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के समस्त प्रयास समय और धन के अपव्यय से अधिक कुछ नहीं है. बायो-फोर्टीफिकेशन के द्वारा सोयाबीन की चुनौती के बराबर या ऊपर निकलने प्रयास चलते रहेंगे. कुछ समूहों के लिये समस्या बनाये रखना, समाधान से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. पूर्वी यूपी में एक कहावत है - मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं, हाथी तो बनने से रहा. समय बिताने के लिये, यदि कुछ काम करते रहने की ही ज़िद है, तो करते रहिये. 

-वाणभट्ट

सोमवार, 20 जुलाई 2026

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी

हाय क्या चीज़ है जवानी भी

रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेपाल में एक आंदोलन होता है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी ने किया. आंदोलन सफ़ल रहा. सरकार गिरी, सरकार बनी. मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि इस आंदोलन में जेन-ज़ी की महती भूमिका रही है. जेन-ज़ी शब्द ने बहुत आकृष्ट किया. तो हमने ये पता करने के लिये गूगल किया कि ये जेन-ज़ी हैं, तो हम क्या हैं. तब पता चला कि 1965 से 1980 के मध्य पैदा हुये लोग जेन-एक्स से वास्ता रखते हैं. ज़्यादा अन्तर नहीं है. बस बीच में जेन-वाई ही तो है. अब तो जेन-अल्फ़ा (2013 के बाद) भी धरा पर अवतरित हो चुकी है. हम पैदा हुये, जवान हुये और आज साठ की दहलीज़ भी पार कर ली, किसी ने इतनी इज़्ज़त नहीं दी कि हमारी जेनरेशन को कोई नाम देता. आगे भी पीढ़ियाँ आती रहेंगी, अब चूँकि चलन पड़ गया है, उनका नामकरण इसी ढर्रे पर होगा. उनके लिये ग्रीक अल्फाबेट्स के अक्षरों की बस शुरूआत ही हुयी है. नाम चाहे कुछ भी दे लो, पिछली पीढ़ी अगली को और अगली पीढ़ी पिछड़ी को अपने से कमतर ही मानती रहेगी. 

हमेशा पिछली पीढ़ी ने, अगली पीढ़ी को संशय से देखा है. प्रायः उसका मुख्य आधार सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार तक ही सीमित रहा है. शायद ही सास ने बहू और बेटी में समता मूलक सिद्धांत का पालन किया हो. किसी बाप ने तब तक अपने बेटे की बातों का अनुसरण नहीं किया, जब तक उसने जग में उनका नाम रोशन करने वाला काम न कर दिया हो. जब भी किसी ने लीक से हट कर काम करने का प्रयास किया है, सबसे अधिक विरोध उसे अपने घर, अपने ही समाज से हुआ है. माँ-बाप का तो काम ही था, बच्चों में संस्कार इतना कूट-कूट कर भर देना कि कम से कम उनका बच्चा अपने से बड़ों के सामने अधिक चूँ-चपड़ न कर सके. जब तक परिवार में चार-छ: बच्चों का चलन था, एक-दो बच्चे संस्कारी बच जाते थे. अमूमन ये वो बच्चे होते थे, जिन्होंने अपने माँ-बाप को गर्व करने का मौका नहीं दिया होता था. उनकी भी विवशता थी कि आर्थिक स्थिति के लिये वे अपने पेरेंट्स पर निर्भर रहते. जब से न्युक्लीयर और छोटे परिवार का चलन बढ़ा है, माँ-बाप की मजबूरी बन गयी है कि बच्चों का फ़्री डेवलपमेंट करें. डबल इनकम परिवार में किसके पास समय है कि बच्चों के पीछे भागे. उनकी सारी ख्वाहिशें बिना किसी विशेष जिद के पूरी होने लगीं. नतीजा ये पीढ़ी इतनी पैम्पर्ड है कि पैरेंट्स स्वयं ज्यादा टोका-टाकी करने से परहेज करते हैं कि साहब जादे/जादी नाराज़ न हो जायें. 

जब से दुनिया है, तब से पुरानी पीढ़ी को लगता रहा है कि अगली पीढ़ी नकारा है. लेकिन दुनिया हमेशा आगे ही गयी है. बिना किसी वैज्ञानिक हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आदमी की प्रजाति विकसित होती चली गयी. इसमें टेक्नोलॉजी की विशेष भूमिका रही है. ये कहने में मुझे कतई गुरेज नहीं है कि अगली पीढ़ी हमेशा पिछ्ली से उन्नत रही है. समृद्धि भी बढ़ी है. पुराने लोग तो ये बताने से भी नहीं चूकते कि पहले इतने स्कूल नहीं थे, और थे भी तो किसी प्रकार की सुविधायें नहीं होती थीं. साधन सीमित थे. मीलों पैदल जाना पड़ता था. ये बात सच भी है. हमारे अपने बचपन में रेडियो ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था. पिता जी के पास एक अदद साइकिल हुआ करती थी, जिसे वो चमका कर रखते थे. शाम को कोई बच्चा घर में नहीं रुकता था. एक रबर की छोटी सी बॉल से पूरा मोहल्ला गेंद तड़ी  और सेवन स्टोंस खेल लेता था. चालीस पैसे की वो बॉल भी चंदे से आती थी. समय के साथ समृद्धि बेतहाशा बढ़ी है. अब हर बच्चा फ़ुटबॉल लिये घूम रहा है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई का प्रेशर इतना बढ़ गया है कि बच्चों ने खेलना छोड़ दिया है. और जिन्हें खेलने का शौक हो तो उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जॉइन करनी पड़ती है. जब तक ये कॉलेज पहुँचे, सीनियर-जूनियर का लिहाज भी खत्म हो चला था. पेरेंट्स जिन्हें सूरमा भोपाली बनाने में लगे रहते थे, कॉलेज के स्वछंद वातावरण में ये और भी उच्छृंखल हो गये. स्वछंद और स्वतंत्र पालन पोषण का ये प्रभाव है कि नयी पीढ़ी पहले से अधिक बुद्धिमान, रचनात्मक और सृजनशील है. हमने ही इन्हें पंख दिये हैं, तो हमारा कर्तव्य भी है कि इन्हें उड़ने दें. जब कोई कहता है कि वो बच्चे किस काम के जो बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का ख्याल न रख सकें. तो मुझे लगता है कि बच्चों से ऐसी अपेक्षा रखना उचित नहीं है. अपना सर्कल, अपना ओल्ड होम बनाइये और बच्चों को देश समाज के लिये अपना काम करने दीजिये. अपनी उम्मीदों को उनके विकास का रोड़ा न बनाइये. 

जब मै जेन-ज़ी को प्रोत्साहित करने की बात करता हूँ तो ये भी उम्मीद करता हूँ कि स्कूल-कॉलेज का अर्थ है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. आपके ज्ञानार्जन का लाभ यदि देश और समाज को मिलता है, तब तो उसका कोई लाभ है, अन्यथा जीविकोपार्जन तो सब कर रहे हैं. शिक्षा का ध्येय यदि व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित हो जाये, तो शायद शिक्षा अपना अर्थ खो देती है. आज की आज़ाद ख़्याल, जेन-ज़ी आत्मविश्वास और साहस से लबरेज है. प्रमाणिक सूचनायें जिन तक हमारी पहुँच पुस्तकों और पुस्तकालयों पर निर्भर थीं, आज मोबाइल के माध्यम से फिंगरटिप्स पर उपलब्ध हैं. आप इन्हें गुमराह नहीं कर सकते. आपका जन्म इनसे पहले हो गया था, सिर्फ़ इसलिये आपको ये ज्ञानी मान लें, ये इनके संस्कार में नहीं है. 

मैंने मेरे बच्चों के जेन-ज़ी और मेरे जेन-एक्स होने के बारे में जानने का प्रयास न किया होता, यदि नेपाल में बवाल न हुआ होता. इतना जबरदस्त आंदोलन कि चन्द दिनों में जेन-ज़ी ने सत्ता ही पलट दी. जेन-ज़ी का ये प्रयोग किस हद तक और कब तक सफ़ल होता है, ये देखना होगा. आजकल अपने यहाँ भी एक आंदोलन चल रहा है. बहुत से लोग इस तरह के हर आंदोलनों में इसलिये भाग लेने पहुँच जाते हैं कि उन्हें सरकार से हर बात पर शिकायत है. हर मोर्चे पर वो पूरी तत्परता से खड़े मिलेंगे. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. पक्ष-विपक्ष किसी को भी दोष देने से पहले मुझे लगता है, हमें उस समाज का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें हम पढ़े-बढ़े हैं या पल-बढ़ रहे हैं. नेता-अभिनेता उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें हम रहते हैं. आज जेन-ज़ी आंदोलन की राह पर है. जब तक 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' नहीं आयी थी, किसी और की जगह कोई और इम्तेहान देता हो, ये मै सोच नहीं सकता था. आज हर प्रतियोगी परीक्षा में सॉल्वर्स पकड़े जा रहे हैं. सन् अस्सी में भी बोर्ड के पेपर्स लीक हो जाया करते थे. आज भी डिग्री आसानी से पाने के लिये तमाम कॉलेज हैं, जहाँ गारेंटी से डिग्री दिलायी जाती है. पेपर्स लीक कराने वाले भी उसी जेनरेशन से आते हैं, जिससे उसका विरोध करने वाले. जब पैसा कमाना ही लोगों का ध्येय बन गया हो, पैसा आना चाहिये, क्या सही क्या ग़लत. बिना माँ-बाप के आर्थिक सहयोग के यह कार्य सम्भव नहीं हुआ होगा. आंदोलन का कारण सही है या ग़लत इस पर सभी के विचार भिन्न हो सकते हैं. साठ साल धरती पर गुजारने के बाद और कुछ हो न हो, तजुर्बा तो होता ही है, एक नज़रिया बनता है. ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली गलती है, ऐसा भी नहीं है कि ये आख़िरी गलती होगी. समस्या है तो समाधान की बात कीजिये. आज जो हो रहा है, वो पहले भी होता था. आगे भी होता रहेगा. जब भी गलत काम करने वाले लोग पकड़े जाते हैं, तो हल्ला-गुल्ला होना कोई नयी बात नहीं है. मीडिया ऐसे ख़बर बनाता है, जैसे इसके पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था. भ्रष्टाचार जिस समाज में मान्यता प्राप्त आचार-व्यवहार बन गया हो, वहाँ किस-किस का नाम लीजिये, किस-किस को रोइये. लेकिन हर जगह जहाँ हमारा व्यक्तिगत लाभ हो रहा होता है, हमने विरोध करने के बजाय समझौता करना सीख लिया है. हर किसी को बड़े मुद्दे चाहिये, आंदोलन करने के लिये. छोटी-छोटी बातों के लिये क्या लड़ना. विकसित और विकासशील देश में शायद यही अन्तर है. वहाँ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं. सॉरी-थैंक्स-एस्क्यूज़ मी जैसे शब्द भले छोटे लगते हों, लेकिन ये हमारी परवरिश को दिखाते हैं. सर्विस बिफ़ोर सेल्फ़. एक मित्र यूरोप में रहते हैं, उनका कहना है, बिल्डिंग, रोड्स, मेट्रो, नो डाउट तरक्की है, लेकिन मैनर्स मैटर्स. हमारे यहाँ पीएचडी याफ़्ता भी यदि दबंगई न दिखाये तो लोग उसे हल्के में ले लेंगे. स्मार्टनेस की परिभाषा इसी पर निर्भर है कि आप कितने उजड्ड हैं. यही जेन-ज़ी जब अपने आस-पास घटने वाली रोज मर्रा की छोटी समस्याओं से मुँह मोड़ लेती है, तो बड़े मुद्दे की बातें बस ऐसी लगती हैं कि अंग्रेज़ों से लड़ने का मौका हमें नहीं मिल सका, इसलिये हम वर्तमान व्यवस्था से लड़ेंगे. जिन विकसित देशों की तरह जेन-ज़ी अपने देश को देखना चाहती है, उसके लिये लड़ना होगा, हर समय, हर जगह. जहाँ भी गलत हो रहा है, लड़ो नहीं तो कम से कम विरोध तो दर्ज़ करो. शिक्षा, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, घूस, भ्रष्टाचार, पक्षपात, तमाम मुद्दे हैं, चिर-विकासशील देश में. विकसित होने के लिये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ मानव विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. सर्वमंगल और लोक कल्याण की विरासत वाला देश कब आत्म केन्द्रित हो गया, इस पर भी विचार करे, जेन-ज़ी. 

उम्र के इस पड़ाव, मुझे लगता  है, मुद्दे छोटे हों या बड़े, विरोध करना जरूरी. देश ने, समाज ने जो भी प्रगति की है, उसके पीछे कुछ वो लोग थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ का आँकलन नहीं किया. यदि आपके पड़ोसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं, तो अगला नम्बर आपका हो सकता है. छोटे कुछ मुद्दे मै बताता हूँ, जेन-ज़ी आंदोलन की शुरूआत यहाँ से कर सकती हैं. 1. घर के बाहर कूड़ा फेंकना, 2. पार्क में फूल तोड़ना, 3. दूसरों के घर के आगे कुत्ता टहलाना, 4. सड़क पर अतिक्रमण हटाना, 5. बिना हेलमेट-बेल्ट के ड्राइविंग करना, 6. गलत साइड चलना, 7. बेवजह हॉन्क करना, 8. गालियों का प्रयोग, 9. क्यू में लगना, 10. अनुचित लाभ को ना, 11. नियम कानून का पालन, 12. ईधर-उधर थूकना, 13. रोड रेज आदि ये कुछ छोटे मुद्दे हैं. मंत्री का इस्तीफ़ा यदि आपके लिये बड़ा मुद्दा है, तो एक उससे और बड़ा मुद्दा देता हूँ आपको - एक देश-एक शिक्षा, वन नेशन-वन एजुकेशन. ये मुद्दा खान सर ने अपने एक पॉडकास्ट में उठाया था. मुद्दे बड़े हों और जिनमें सर्व मंगल का भाव हो, तो आंदोलन को कौन समर्थन नहीं देगा. 

किन राहों से दूर है मन्ज़िल कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे - निदा फ़ाज़ली

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 जुलाई 2026

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके  विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं. 

बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर  वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा. 

जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये 

बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये 

आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े. 

हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरि नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.

मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास बताया था बाबा जी ने. ये बात अलग है कि जरा ध्यान लगा नहीं कि नींद आ जाती थी. बाबा की गारेंटी भला कैसे पूरी होती. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी.  बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपश्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. गरिष्ठ भोजन और गहरी नींद से जो स्वास्थ्य लाभ हुआ, उससे अपने ही जूते के तस्मे बाँधने में अड़चन होने लगी. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी महसूस हुयी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है. 

बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र  की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टिगोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व है और मेरे बॉस को अफ़सोस, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. 

समस्याओं के समाधान प्रायः सरल और सस्ते ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये. अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.  

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जुलाई 2026

नैनो कहानियाँ: लक्ष्य

लक्ष्य 1:

कॉंग्रचुलेशन्स, तीसरे राउंड के इंटरव्यू के बाद आप सेलेक्ट हो गये हैं. हमारी कम्पनी में साठ लोग हैं, जो छ: प्रोजेक्ट्स पर काम रहे हैं. आपको एक विशिष्ट टीम के लिये चयनित किया गया है. आपके प्रोजेक्ट मैनेजर बतायेंगे कि उनकी टीम की आपसे क्या आपेक्षायें हैं. वही आपको ट्रेनिंग देंगे, सिखायेंगे और आपका मूल्यांकन भी करेंगे. 

लक्ष्य 2:

वेलकम टु आवर ऑर्गनाइजेशन. दो रिटन और एक साक्षात्कार के बाद हाइली क्वालिफ़ाइड लोगों का चयन होता है. यहाँ साठ लोग छिहत्तर प्रोजेक्ट्स पर का काम कर रहे हैं ताकि किसी को प्रमोशन में दिक्कत न हो. हमारे यहाँ काम करने की फ्रीडम है. आप भी एक प्रोजेक्ट बनाइये. अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कीजिये. हम साल भर नियंत्रण और एक बार मूल्यांकन करते हैं. 

लक्ष्य 3:

बॉस एम्प्लॉयी से - अपना लक्ष्य निर्धारित करो ताकि हम उसकी मॉनिटरिंग कर सकें. 

एम्प्लॉयी बॉस से - सर लक्ष्य और दिशा आप तय करें. वी विल नॉट लीव सिंगल स्टोन अनटर्नड. उसकी प्राप्ति के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे. 

बॉस एम्प्लॉयी से - नौकरी करो नौकरी. ये बातें इंटरव्यू में ही अच्छी लगती हैं. प्रोन्नति तुम्हें चाहिये, मुझे नहीं. 

लक्ष्य 4:

समस्यायें बहुत हैं, बहुआयामी हैं. एकांगी प्रयास भूत में नाकाफ़ी सिद्ध हुये हैं. आवश्यकता है एकीकृत समाधान पर मिल कर काम करने की. शीर्ष नेतृत्व का कार्य है, समस्याओं की प्राथमिकता तय करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मार्गदर्शन देना. यदि लक्ष्य का ज्ञान और भान है, तो काम करना और करवाना आसान हो जाता है. इसके लिये ज़रूरी है, बॉस के लिये लक्ष्य और उसकी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता. 

लक्ष्य 5:

लक्ष्य विहीनता की स्थिति में ऑर्गेनाइज़ेशन के कर्मचारियों को व्यस्त रखना भी कला है. पुरखन दादी भी स्वयं को व्यस्त रखने के लिये करती थीं, इस कोठरी का माल उस कोठरी. लक्ष्य तय हो तो काम खत्म हो सकता है. फिर मैनपावर क्या करेगी. अलादीन के जिन्न को बिज़ी भी तो रखना है.

-वाणभट्ट

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

लघु कथा - दिशा

सभा सुधारकों की थी. कोई जलवायु परिवर्तन से प्रभावित न होने वाली प्रजाति के विकास में लगा था. कोई बिना खाद-पानी के उत्पादन बढ़ाने पर उद्दत था. किसी ने कीट-बीमारी की चुनौती को स्वीकार किया था. कुछ जीन ही बदल देने की फिराक़ में थे. वहाँ उपस्थित एक प्रोसेसर बोला पड़ा - सर, अरहर में गोंद कम हो जाये, तो इसका छिलका भी मटर की तरह उतर जाये. मिलिंग लॉस कम हो जायेगा. राजमा रात भर भिगोये बिना दो सीटी में गल जाये तो क्या बात है. सबने समवेत स्वर में जवाब दिया - बड़ी चुनौतियाँ ही विज्ञान को आकर्षित करती हैं. समस्यायें बड़ी हों तभी फण्ड भी मिलता है. इन कामों के लिये भला कौन फण्ड देगा. कभी आवश्यकता थी जननी, आविष्कार की. अब फण्डिंग तय करती है, दिशा विज्ञान की. 


-वाणभट्ट

शनिवार, 23 मई 2026

चहास

अगर मै कहूँ की चाय की लत मुझे विरासत में मिली तो शायद गलत न होगा. कोई छोटा बच्चा दूध न पिये तो माँ का मन नहीं मानता. वो सारे जतन कर लेगी कि बढ़ते बच्चे के विकास में कोई कमी न रह जाये. जब उन्होंने देख लिया कि बच्चे को चाय का रंग ही पसन्द है, तो चाय का विकल्प निकाला गया, बॉर्नविटा. बचपन से बॉर्नविटा के साथ दूध पीने वाले शुद्ध शहरी बच्चे को शुद्ध दूध हजम होने से रहा. घी का हाल तो और बुरा था. दाल में माँ घी डाल देती तो मुझे तैरता बाल नज़र आता. ये जो हाइट पाँच फ़िट पाँच इंच पर अटक गयी, उसका दोष मै किसी और को नहीं दे सकता. हालात ये हैं कि आज भी अलबत्ता तो दूध पीता नहीं और पीता भी हूँ तो कुछ न कुछ एडिटिव डाल कर. 

सुबह उठते ही फ्रेश होने के बाद पिता जी चाय पी कर ही टहलने निकलते. सुबह पाँच बजे. हमारे घर में चाय पौने पाँच पर बन जाती थी. लौटने के बाद, दूसरा कप और नाश्ते के साथ तीसरा. दिन में कितने हुये, उसका हिसाब नहीं. लेकिन वापस घर आने पर चाय तो बननी ही थी. तब न टीवी था, न मोबाइल. ज्ञान बाँटने के विधाओं से सभी वंचित थे. चाय के गुण-अवगुण के बारे में बताने वालों का नितान्त अभाव था. बल्कि मेरे एक मित्र के पिता जी बताया करते थे कि टी-बोर्ड की नौकरी में वो लोगों को चाय फ़्री पिलाया करते थे, ताकि लोगों को चाय का चस्का लगे. और हिंदुस्तानियों की एक बात तो माननी पड़ेगी, अमिताभ अगर फ़ण्डू च्यवनप्राश का एड कर दे तो हम आराम से मान लें कि उनकी सेहत का राज़ यही है. अगले एड में वही फ़ायम चूर्ण के गुण गाते नज़र आ सकते हैं. जब आदत लग रही थी तब किसी ने कोई वैधानिक चेतावनी नहीं दी थी कि चाय सभी बीमारियों की जड़ है. सरदर्द-सर्दी-जुकाम का तो आज भी सबसे कारगर इलाज चाय ही है. 

पूरे घर की आदत बदस्तूर चलती रही, पिता जी के रिटायर होने के बाद भी. बस फ़र्क़ इतना हुआ कि सुबह चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से आ गयी. पौने पाँच बजे की चाय के लिये श्रीमती जी ने हाथ खड़े कर दिये थे. अब दूसरी चाय मेरे टहल के लौटने के बाद होती. पिता जी बालकनी में टहलते और मेरे लौटने का इंतज़ार करते. 

उस दिन जगमोहन को सुबह पाँच बजे बुला लिया था. इलाहाबाद जाना था. जब से सठियाया हूँ, श्रीमती जी अकेले कार ले कर जाने को मना करती हैं. विशेषकर शहर से बाहर. साठ के बाद बगावती तेवर भी ढीले पड़ जाते हैं, चाहे घर में हो या बाहर. वैसे भी जिनकी जीत में मज़ा आता हो, उनसे हारना अच्छा लगता है. अब तक ये समझ आ गया होता है कि दुनिया चलाना बस उसी का काम है. चपरासीनुमा अफ़सर और अफ़सरनुमा चपरासी (कॉपीराइट - श्रीलाल शुक्ल)  सब उसी का खेल है. कभी-कभी ये भी लगता है कि इललॉजिकल बॉस और लॉजिकल सबोर्डिनेट बना कर भगवान ने गलती तो नहीं कर दी. तब जा कर पूर्व जन्मों के कर्मों पर विश्वास होने लगता है. बहरहाल अब ये भी विश्वास होने लगा है कि सुकरात अगर समय से पहले पैदा हो जाये तो समाज उसे जहर न दे तो उसका करे क्या. मौका लगा है तो चिटकाता चलूँ कि बीस साल पहले ही मुझे अंदाज़ होने लगा था कि मनुष्य के डॉक्टर्स ह्युमन हेल्थ की बात करेंगे और कृषि के डॉक्टर्स सॉयल हेल्थ, फ़सल प्रबंधन और कृषक आय की बात करेंगे. जो आज होता दिख रहा है. बीस साल बाद के लिये ये लिखे दे रहा हूँ कि सुपर स्पेशलिस्ट धूल फ़ाँकते नज़र आयेंगे. ये हर समस्या का समाधान अपनी विषय विशेषज्ञता के दृष्टिकोण से खोजते हैं. स्पेशलिस्ट रिपोर्ट का इलाज करते हैं, आदमी का नहीं. अपने अभूतपूर्व विकास के बाद भी एलोपैथी, सिम्पटम बेस्ड इलाज में, आयुर्वेद और होम्योपैथी की तुलना में असफल सिद्ध हुयी है. इन्होंने मानव शरीर को मशीन समझ लिया. जबकि हमारे पुरखों को भी मालूम था कि मनुष्य मन, बुद्धि, अहं और चित्त से जुड़ा है. जब इसके उपर उठेगा तभी जीव से शिव की यात्रा पूरी होगी. आदमी और पेड़-पौधों का मैनेजमेंट होलिस्टिकली होगा. दो हज़ार साल की अंग्रेज़ी साइंस, अरबों साल की पृथ्वी की प्राकृतिक जीवन शैली पर हावी हो गयी है. विज्ञान का प्रयास जहाँ तक प्रकृति को समझने तक सीमित था, वहाँ तक विज्ञान ने प्रगति की. विज्ञान के साइंस बनने के बाद इंसान भगवान के डोमेन में हस्तक्षेप करने लगी है. यहीं से साइंस ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ आरम्भ कर दिया. आज वातावरण में व्याप्त विसंगतियों के मूल में मानव द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिये प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व अनियंत्रित दोहन ही जिम्मेदार है.  देर-सवेर साइंस को वापस विज्ञान पर लौटना होगा. प्रकृति का अध्ययन करो, उसके एक्सट्रीम्स के कारणों को समझो, उन पर नियंत्रण करने का प्रयास करो, किन्तु उसे बदलने या लड़ने का नहीं. विज्ञान ऐसी धरती का निर्माण करता है, जहाँ धरती पर सब प्राणियों का बराबर का हक़ और हिस्सा हो. ये बात अलग है कि तब शायद हम फिर झिंगालाल-हूम करते घूम रहे हों. शायद सिर्फ़ लैंडरेसेज़ (आदिवासी) ही बचें. साइंस फ़िक्शंस में दो हज़ार साल आगे जिस विकास की कल्पना प्रस्तुत की जाती है, उसका उलट भी हो सकता है. जिस तरह मानव, साइंस के नाम पर सेल्फ़ डिस्ट्रक्शन्स का इंतज़ाम करता घूम रहा है, जीवन बचा ले जाना ही सबसे बड़ी चुनौती है. 

पौने पाँच बजने से पहले ही जगमोहन ने घण्टी बजा दी. नहा-धो के चाय के कप को हाथ लगाया ही था. जितनी जल्दी निकलेंगे उतनी ही जल्दी वापस लौटने की प्रक्रिया होगी. सो हड़बड़ी में बिना चुस्की लिये, चाय गले में उतार ली. इरादा था 'मोहन पेड़ा' पर उनकी चाय का लुफ़्त लिया जायेगा. जगमोहन भाई का हाल ये है कि वो क्या खाते-पीते हैं और कब खाते-पीते हैं, उनके साथ कई बार रहने के बाद भी मुझे पता नहीं लग सका. जब मै और जो मै खाता, उसी से उनका काम चल जाता. शायद ही उन्होंने कभी अपनी तरफ़ से चाय-कॉफ़ी-स्नैक्स या खाने की डिमांड की हो. 

जब 'मोहन पेड़ा' के सामने से निकले, उसके खुलने का समय नहीं हुआ था. फ़तेहपुर के पास एक 'मोरिंगा' रेस्टोरेंट खुला था. जगमोहन को वहाँ रोकने के लिये बोल कर मै फ़ेसबुक पर बर्थडे की विशेज़ और व्हाट्सएप्प पर गुड मॉर्निंग के अपने दैनिक शगल में लग गया. जब इससे फ़ारिग हुआ तो पूछा - अभी तक 'मोरिंगा' नहीं आया. जगमोहन खाली सड़क पर कार दाबे हुआ था. बोला - सर मिस कर गया, वो तो निकल गया. मैंने फिर कहा - आगे रिलायंस पेट्रोल पम्प पर भी एक 'वाइल्डबीन कैफ़े' है, वहाँ चाय मिल सकती है. जगमोहन कूटनीतिक तरीके से मुस्कराते हुये बोला - सर वो भी निकल गया. मेरे दिल में एक वहम हमेशा रहा है, घर से चाय पी कर न निकलो तो कहीं चाय नहीं मिलती. सुबह चाय पी तो क्या थी, निपटा दी थी. चाय पीने वाली फ़ीलिंग नहीं हुयी. मुझे लगा आज अपना टोटका टेस्ट करने के लिये सही दिन है. 

निर्णय ये हुआ कि किसी के यहाँ जाने से पहले थोड़ी पेट पूजा कर ली जाये. गाड़ी हीरा हलवाई की तरफ़ मोड़ दी गयी. दही-जलेबी थी, समोसा था, चटनी थी, लेकिन चाय न थी. बगल में एक चाय की दुकान हुआ करती थी. सुबह की वजह शायद खुली न थी. टहलने के बाद लोग समोसा-जलेबी खा भी लें लेकिन चाय भला कौन पीता है. 

अगला पड़ाव मनु के यहाँ था. कुछ व्यक्तिगत काम था. अब सुबह-सवेरे पौने आठ बजे किसी के घर बिना बताये पहुँच जाओगे तो वो नहाता-धोता ही मिलेगा. आधे घण्टे बाद जब वो बाहर आया तो कहीं जाने के लिये तैयार दिख रहा था. भैया आपका काग़ज़ मेज पर ही रखा हुआ है. आज आपको समय नहीं दे पा रहा हूँ. बेटी का इम्तहान है, उसे लेकर सेंटर जाना है. साथ बेटी भी थी.

वहाँ से निकल कर अपने घर आ गया. जब तक मम्मी-पापा थे, हर महीने दो महीने पर ख़ुद आने की ज़िद कर लेते थे या मुझे धक्का लगा कर भेज देते थे. उनके बाद ये धक्का मुझे ख़ुद को लगाना पड़ता था. इस बार चार महीने से उपर हो चुके थे. मित्र धरम पा जी का विदेश से आगमन न हुआ होता तो शायद ये विज़िट भी टल जाता. उनसे फिर भी मुलाकात उनके भारत आगमन पर किसी न किसी रूप में हो जाया करती थी. उनकी माता जी से मिले अरसा हो गया था. उनसे मिलने की इच्छा इस बार बलवती थी. जो इलाहाबाद खींच लायी. उनके यहाँ बाबा सत्य नारायण की कथा का आयोजन भी था. सोचा घर साफ़-सफ़ाई कर के, दो अभिन्न मित्रों से मिलते हुये जमुनापार धरम पा जी के घर चला जायेगा. तब तक कथा भी समाप्त हो चुकी होगी. प्रसाद लेकर एलआईसी कॉलोनी में मौसी जी का भी आशीर्वाद प्राप्त करता हुआ वापस निकल लूँगा. 

घर महीनों से बन्द था. साफ़-सफ़ाई में दो घण्टे लग गये. तब चाय की याद आयी. घर पर बेसिक कुकिंग की सारी सुविधायें हैं. चाय का रेडी मिक्स भी पिछले विज़िट में रख गया था. इंडक्शन पर पानी चढ़ा दिया. बड़े कॉफ़ी मग में में पूरा सैशे पलट दिया. सोचा अब सुकून से सिप ले ले कर, आराम से बैठ कर, चाय पियूँगा. चाय पीना एक क्रिया है. इसे निपटाना नहीं होता. रेडी मिक्स में पानी डालते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो गया. डिब्बे पर देखा तो चाय अपनी एक्सपायरी पूरी कर चुकी थी. 

अब पवन या शिशिर के यहाँ चाय की टेस्टिंग होनी थी. फोन पर पवन को लेते हुये शिशिर के यहाँ जाने का प्रोग्राम बना. पवन के यहाँ ज़्यादा बैठने कोई इरादा नहीं था. फिर भी भाभी जी ने चाय के लिये आग्रह किया. समयाभाव के कारण हमने शिशिर के यहाँ चलने का निर्णय ले लिया. चलते-चलते भी भाभी जी ने सप्रेम फ़्रिज से निकाल कर चिल्ड लाहौरी जीरा की बोतल पकड़ा दी. शिशिर के यहाँ हम तीनों ने पूरे दो घण्टे नये-पुराने किस्से बुने. एनी बेसेंट स्कूल का नौसटैलजिया ऐसा है कि घण्टों गुज़र जायें और समय कम पड़ जाये. आवभगत के मामले में भाभी जी का जवाब नहीं. क्या-क्या नहीं खिलाया. पर पीने के मामले में बोलीं - गर्मी बहुत पड़ रही है इसलिये माज़ा ला रही हूँ. उनके स्नेह के आगे चाय की फ़र्माइश करने की इच्छा न हुयी. मेरा प्रयोग भी अभी ख़त्म नहीं हुआ था. 

धरम पा जी के यहाँ पहुँचते-पहुँचते तीन-साढ़े-तीन हो चुके थे. तीसरा अध्याय समाप्ति की ओर अग्रसर था. पा जी भाव विभोर से कथावाचक की वचनवक्रता के मुरीद हुये जा रहे थे. जजमान विदेश से आया था इसलिये पंडित जी भी उन्हें पूरी तरह छाप लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. शायद जजमान उनकी विद्वता देख अमरिका बुला ले. आरती-भजन ख़त्म होते-होते समय साढ़े चार के आस-पास पहुँच गया. चरणामृत-प्रसाद ग्रहण करते-करते घड़ी की सुई पाँच पार कर चुकी थी. अभी मौसी से मिलना था और वापस कानपुर भी निकलना था. संयोग से पा जी को भी कहीं एपॉइंटमेंट के लिये देर हो रही थी. चाची जी का चरण स्पर्श करके हम शीघ्र ही धरम पा के साथ उनको उनके गंतव्य पर छोड़ने के लिये निकल पड़े. 

मौसी के यहाँ बचपन से अब तक शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मातृतुल्य मौसी जी ने अपने हाथों से कुछ बना के न खिलाया हो. अब उम्र के इस पड़ाव पर वो वॉकर के सहारे चलने को विवश हैं. वहाँ चाय की इच्छा न थी, बस मौसी से मिलना और उनका आशीर्वाद लेना ही प्रयोजन था. देर पहले ही हो रखी थी. किन्तु तुरन्त उठना भी सही न लगा. इतने दिनों बाद तो आना हुआ था. बेटा-बहू, बच्चों के पास गये हुये थे, इसलिये छोटी बहन उनकी देख भाल को आयी हुयी थी. उसे मालूम था कि दादा चाय को ना नहीं कहते. बोली - दादा आप मम्मी के पास बैठिये, मै चाय बना कर लाती हूँ. मैंने कहा - देखो पहले ही बहुत देर हो चुकी है. कल ऑफ़िस भी है. वापस कानपुर घर पहुँचते-पहुँचते देर हो जायेगी. मन ही मन मुझे डर था कि कहीं ये मेरी बात मान न जाये. शायद उसने मेरे मन को भाँप लिया. वो मुस्कुराई - आप और चाय के लिये मना. बैठिये मै तुरन्त लाती हूँ.  चाय के साथ वो कुछ स्नैक्स भी ले आयी. जिसके लिये मैंने मना कर दिया. शुद्ध खालिस चाय का जो स्वाद था, उसे खराब करने का मेरा कोई इरादा न था. 

लौटते समय 'मोहन पेड़ा' खुला था. हमेशा की तरह कारों का हुजूम खड़ा था. जगमोहन को घर पहुँचने की जल्दी थी. हमारे ख़स्ते-चाय के चक्कर में उसे देर हो जाती. ग्यारह बजे घर पहुँचने के बाद नहा-धो कर कुछ खाने का विचार नहीं आया. श्रीमती जी से बोला - एक कप चाय मिलेगी क्या, कड़क एकदम कड़क.

सवेरे पौने पाँच बजे बाहर से अख़बार और चाय लेकर कार्डियोलॉजी में पिता जी की बेड पर पहुँचा. रात बारह बजे थोड़ी अनइज़ीनेस लगने के कारण पड़ोसी डॉक्टर की सलाह पर पापा को लेकर कार्डियोलॉजी आना पड़ा. बयासी साल की उम्र में पिता जी ने शायद पहली और आख़िरी बार चाय को ना कहा था.

-वाणभट्ट

शनिवार, 9 मई 2026

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की स...