मंगलवार, 24 जनवरी 2023

मर्दानगी

स्टेशन पर गहमागहमी थी। सभी ट्रेनें लेट चल रही थीं। ठंड का हाई एलर्ट जारी हो चुका था। मौसम के साथ ट्रेनों को भी जुकाम हो जाता है। 

मैं भी जैकेट, दस्ताने और कनटोप से लैस हो कर अपनी ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था। वेटिंग रूम ठसाठस भरा होने के कारण मैने बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़े रहने का निर्णय लिया। 

रात के दो बजे का समय रहा होगा। एक बुज़ुर्ग दम्पति बन्द पड़ी बुक स्टाल के सामने कम्बल बिछा और ओढ़ के बैठे हुये थे। बुज़ुर्ग की उम्र पचहत्तर के आसपास लग रही थी। उनकी पत्नी की भी उम्र सत्तर के ऊपर रही होगी। इस ठंड को भगाने के लिये चाय ही सबसे मुफ़ीद लग रही थी, सो मैं चाय की दुकान की ओर बढ़ गया। 

पत्नी ने जरूर चाय की फ़रमाइश की होगी, जो महोदय को चाय की दुकान तक आना पड़ा। उम्र के कारण या ठंड के कारण, कहना मुश्किल है, उनके हाथों में चाय के कप कुछ काँप से रहे थे। मेरी चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन उनको हेल्प ऑफ़र करके उनके स्वाभिमान को ठेस लगाने का मेरा मन नहीं किया। दोनों बुज़ुर्गों को चाय पीते देखना एक सुकून भरा दृश्य था। 

ढाई-पौने तीन के करीब उनकी ट्रेन का एनाउंसमेंट हो गया। गाड़ी को चार नम्बर प्लेटफ़ॉर्म पर आना था। हम लोग एक नम्बर पर थे। बुज़ुर्ग ने उठ कर दोनों कम्बल को तहा कर एक पिट्ठू बैग में डाल दिया। दोनों हाथों में अन्य दो बैग को लेकर वो बढ़ने ही वाले थे कि पत्नी ने एक बैग पकड़ लिया। आप एक बैग तो मुझको दे दीजिये। पति ने जोर दिया - कोई बात नहीं हल्के ही तो हैं। लेकिन पत्नी ने एक हल्का सा दिखने वाला बैग जबरदस्ती छुड़ा लिया।

पति ने उसे रुकने का इशारा किया। फिर पत्नी के बैग को खोल कर उसमें से दो लीटर पानी की बोतल को निकाल कर अपने बैग में डाल लिया। इस मर्दानगी पर कौन न हो जाये फ़िदा। मुझे भी होना ही था।

-वाणभट्ट

शनिवार, 7 जनवरी 2023

मेट्रो सिटी

आपने सुना होगा कि बहुत से देश तरक्क़ी कर के डेवलप्ड नेशन बन चुके हैं. हमने जब से होश सम्हाला है तब से अब तक देश डेवलप ही हो रहा है. जीवन के साठ बसन्त के करीब पहुँच के मुझे ये लगने लगा है कि इस जीवन में तो ये सम्भव नहीं दिख रहा है. कुछ लोगों से मिल कर ये एहसास जागृत होने लगता है कि हम बहुतों से बहुत आगे निकल चुके हैं लेकिन बस आप जैसे लोग (यानी मैं) अपने इंफेरियॉरिटी काम्प्लेक्स के चलते इस विकास को स्वीकार नहीं कर पाते. जैसे सावन के अंधे को हर तरफ़ हरा-हरा दिखता है, वैसे ही जेठ के अंधे को हर तरफ़ सूखा ही सूखा दिखायी देता है. आप दिन-रात विकास को खोजते रहते हैं, जबकि यहाँ विकास की ऐसी बाढ़ आयी हुयी है कि सब कुछ बहा जा रहा है. यदि अब भी आपको विकास नहीं दिखता तो आपकी दृष्टि में दोष है.

एक जमाना था जब हमारे बाप-दादा को सायकिल दहेज में मिलती थी. आज क्या मजाल कि कोई एसयूवी से नीचे बात करे. जिससे पूछो भाई बेटी की शादी में कितना ख़र्च हुआ तो गर्व से बताता फिरता है कि लड़के वालों ने जो भी माँगा, वो सब दिया. लड़के वालों ने डेस्टिनेशन वेडिंग की डिमांड रखी थी, उसी में तीस लाख लग गये. लेकिन शादी इतनी धूमधाम से की कि सब लोग याद रखेंगे. पहले वॉल्व वाले रेडियो मिल जाये तो लोग धन्य हो जाते थे. अब 85 इंच का स्मार्ट टीवी भी हजम नहीं होता. लड़के-लड़की सब पैकेज की बात करते हैं. सैलरी तो सरकारी शब्द बन के रह गया है. गाँव-गाँव ब्यूटी पार्लर खुल गये हैं. शहर गाँवों में घुसा जा रहा है और आप जनाब पूछते फिर रहे हैं कि विकास कहाँ है.

आज से कुछ साल पहले कोई सोच सकता था कि यूपी के शहरों में भी मेट्रो चल जायेगी. जब परियोजना का खाका खींचा गया, तो लोग उसे चुनावी हथकण्डे से ज़्यादा मानने को तैयार न थे. ऐसी सरकार देखने की हमारी आदत लगभग छूट चली थी जो शिलान्यास भी करें और लोकार्पण भी. जहाँ सिंगल रोड नहीं दिखती थी, वहाँ चार लेन सड़क और मेट्रो के खम्भों का निकल आना किसी चमत्कार से कम नहीं है. तय समय के अन्दर प्रोजेक्ट का पूरा हो जाना भी एक अजूबा ही है.

शहर में मेट्रो क्या चली, कुछ-कुछ दिल्ली-कोलकता-मुम्बई वाली फीलिंग हावी होने लगी है. जगह की कमी के कारण बड़े-बड़े भूखण्डों पर उभरते हुये स्काई स्क्रैपर्स इस फीलिंग को और हवा देने लगते हैं. अम्बर पे खुलेगी खिड़की या खिड़की पे खुला अम्बर होगा - जैसी स्थिति के लिये लोग इंडिपेंडेन्ट मकानों से विमुख हो कर फ्लैट कल्चर की ओर मुड़ रहे हैं. एक सोसायटी में लगभग एक ही आय वर्ग के लोगों में कुछ साम्यता तो मिल जाती है. लिफ़्ट और पार्किंग एरिया कॉमन होने के कारण गाहे-बगाहे सब टकरा ही जाते हैं. छतों पर पानी की टंकियों के बीच कितने ही इश्क़ परवान चढ़ जाते हैं. मेट्रो सिटी में जो कुछ सम्भव है, वो यहाँ भी हो सकता है. किसी प्रकार की रोका-रोकी या टोका-टाकी नहीं होती है. यही तो मेट्रो कल्चर है.

लेकिन पेसिमिस्ट टाइप के लोगों को तो दोनों जहाँ एक साथ चाहिये. होना चाहते हैं अमरीका, वो भी गाँव के उपले पर बने चोखा-बाटी के साथ. देश चाहे जितनी तरक्क़ी कर ले, उन्हें तो पुराने जमाने में ऐसा होता था, वैसा होता था, करके ठंडी आहें भरने में ही आनन्द आता है. इनमें वो लोग भी शामिल हैं जिन्हें अब्रॉड में सेटल्ड अपने बच्चों के बच्चों के कारण दुनिया देखने का मौका मिल जाता है. क्या बतायें साहब, वहाँ इतनी तरक्क़ी हो रखी है कि बच्चा-बच्चा अंग्रेज़ी बोलता है. एक बार लौटने के बाद उनका बाकी जीवन इसी में बीत जाता है कि विकसित देशों का जीवन - अहा क्या जीवन है. पूरा देश चमचमाता रहता है. कूड़ा-करकट देखने को तो आँखें तरस गयीं. साफ़-सफ़ाई तो इतनी है कि जंगल में भी टॉयलेट बने हुये हैं. रेलवे ट्रैक पर कोई तीतर-बटेर लड़ाता नहीं दिखता. ये बात अलग है कि नाती-पोतों के बड़े हो जाने के बाद बच्चों से बस फेसटाइम और व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर ही बात हो पाती है. अब फ्लैट टाइप के घरों में इतनी जगह तो होती नहीं कि बाबा-पोता साथ रह सकें. आख़िर आज के बच्चों को प्राइवेसी भी तो चाहिये. फॉरेन विज़िट का और कुछ फ़ायदा हो या न हो, इतना तो मालूम हो ही जाता है कि हम क्यों इतने बैकवर्ड हैं (फ़िरंगी इसी को डेवलपिंग बोलते हैं). 

बाहर के लोगों में क्या अच्छाई है और हम लोगों में क्या-क्या बुरायी है, इसका जायजा लेना हो तो किसी फॉरेन रिटर्न के साथ बैठ जाइये. निश्चय ही आपको अपने बैकवर्ड होने पर विश्वास होने लगेगा. जो हम नहीं सीख पा रहे हैं वो है तमीज़. देश और समाज में हमें कैसा व्यवहार करना है. दबंगयी और बदतमीज़ी को हमने स्मार्टनेस का दर्ज़ा दे दिया है. जब सो कॉल्ड मेट्रो सिटी में ई-बस शुरू हुयी तो घुसते ही बन्दे ने पूछा इसमें गुटखा कहाँ थूकेंगे खिड़की तो सब बन्द है. चार लेन सड़क पर लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ लेकर उल्टे चलते मिल जायेंगे. डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन की सुविधा हो जाने के बाद भी कूड़ों के ढेर दिख जाना असामान्य नहीं लगता. सारा देश सरकार से कुछ ज्यादा ही उम्मीद करता है और अपने कर्तव्यों को आदर्श वाक्यों के अधिक नहीं मानता. अड़ोस पड़ोस को और पड़ोस अडोस को इसलिये नहीं पहचानता क्योंकि सब के सब आत्म निर्भर हो गये हैं. रूल्स आर फ़ॉर द फूल्स की शिक्षा बच्चों को देने वाला, अपनी गलती तब रियलाइज करता है, जब बच्चे परिवार के रूल्स को तोड़ कर उसी का सिद्धान्त उसी पर अप्पलाई कर देते हैं. स्काई स्क्रेपर्स और मेट्रो हमारी तरक्की की इबारत नहीं लिखते, हाँ जिस समाज में हम रहते हैं वो कितना कल्चर्ड है, हमारी तरक्की को परिभाषित करता है. लेकिन अफसोस तब होता है जब रैट रेस के जनक स्कूल सबको ये बताते घूम रहे हैं कि कैसे अपने ही साथियों से आगे निकलना है, तो तमीज़ सिखाने की जिम्मेदारी घर-परिवार पर आ जाती है. लेकिन हर परिवार एक स्मार्ट सिकन्दर का इंतज़ार कर रहा है.

ऐसे ही फॉरेन रिटर्न बुजुर्ग ने बुरा से मुँह बनाया जब मॉल में उनके लिफ़्ट से निकलने से पहले एक अल्ट्रा मॉडर्न सा दिखने वाला लड़का लिफ़्ट में घुस गया. मुझे मालूम था कि उनके साथ अब उनके घर तक का सफ़र कितना ज्ञानवर्धक होने वाला है.

-वाणभट्ट

सोमवार, 2 जनवरी 2023

नया साल

एक साल पहले से मुझे पता था कि ठीक एक साल बाद नया साल आने वाला है. नये साल को आना था, तो आया भी. लेकिन जैसा इस साल आया मेरे विचार से ऐसा कभी न आया होगा. दो साल तक कोरोना की दहशत में रहने के बाद, इस बार जनता ने खुल कर नये साल का जश्न मनाया. और शायद ऐसा मनाया जैसा मेरी याददाश्त में कभी न मनाया गया होगा. ऐसा लग रहा था कि अब न मनाया तो फिर ये मौका मिले न मिले. कोरोना मुहाने पर टहल रहा है. बस सरकार के मोहर लगाने की देर है, फिर चेहरा मास्क के पीछे.

पहली तारीख़ को हर साल की तरह इस बार भी ठंड अपने चरम पर थी. ऊँचे पहाड़ों पर हुयी बर्फ़बारी ने मैदानी इलाकों की गलन को बढ़ा दिया था. 31 दिसम्बर की रात तो ठंड भगाने के जितने इन्तजाम सम्भव थे, सब उपलब्ध थे. मेरा मतलब अलाव, मूँगफली, गज़क, डीजे, डांस और म्यूज़िक से था. आपने कुछ और समझा तो सही ही समझा होगा. वही तो मेन फैक्टर है हर एंजॉयमेंट के पीछे. जब भी जहाँ भी चार यार मिल जायें तो फिर नये साल का इन्तज़ार कैसा. सारे क्लब-होटल-रेस्टोरेंट रौशन हो रखे थे. नया साल एक ऐसा त्योहार है जिसमें किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है. जिसका मन जैसे करे वैसे मनाये. बल्कि इसे त्योहार कहना भी ठीक नहीं है. ये तो मौका है आज़ादी का, लिबर्टी का. कुछ भी करो घर वालों को जस्टिफाई करने की ज़रूरत नहीं है. सब सही-गलत नये साल के जश्न के नाम.

हमारे देश की एक अच्छाई है कि हमारी अन्तरात्मा सदैव जागृत रहती है. हम लोग नैतिक रूप से कभी भी गलत नहीं करते, न ही करना चाहते हैं. गलती हो भी जाये तो गलती मानने का तो कतई कोई रिवाज़ नहीं है. तभी तो एक ही मुद्दे पर पक्ष जितनी ज़ोरदार दलील देता है, विपक्ष उतने ही दमदार तरीके से उसका विरोध करता है. कई बार तो ये शक़ होता है कि ये पक्ष-विपक्ष की नूरा-कुश्ती सिर्फ़ जनता को दिखाने के लिये है. रात को जितना जश्न मनाया जाता है, उसका हैंगओवर उतारने के लिये उसकी दोगुनी भक्ति हावी हो जाती है, अगले दिन यानि एक जनवरी को. 

उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रहे हैं उस में नैतिकता का ठेका अपने आप आपके सर पर थोप दिया जाता है. और बच्चों के सामने आदर्श रखने के इरादे से इस मुलम्मे को हम सहर्ष ओढ़ भी लेते हैं. रात जब पड़ोस में कुछ छड़े म्यूज़िक के फुल वॉल्यूम पर नये साल की मौज कर रहे थे, तो हमको मिर्ची लगना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. धीरे से कुछ बड़बड़ाया ही था कि कंधे से ऊपर निकल चुके बच्चे ने रिमोट बढ़ा दिया - पापा आप दूरदर्शन लगा लो. मैं जरा दोस्तों से मिल के आता हूँ. दिल्ली के पंजाबियों ने और कुछ किया हो या न किया हो लेकिन हम यूपी वालों की हिन्दी भ्रष्ट कर दी है. बच्चों को 'लीजिये' की तुलना में 'लो' बोलना ज़्यादा सुविधाजनक लगता है. मैने जाना है, आपने खाना है, टाइप की हिन्दी सुनते ही रोम-रोम सुलग जाता है. मै कुछ कह पाता उससे पहले जनाब मुझे रिमोट थमा कर निकल लिये. 

रोज की तरह मेरा सवेरा सुबह पाँच बजे हो चुका था. चूँकि मैं रोज की तरह समय से सो गया था, तो मेरा सवेरा तो जल्दी होना ही था. कड़कड़ाती ठंड में टहलने सिर्फ़ इस लिये निकल गया कि साल के पहले दिन की शुरुआत हेल्दी होनी चाहिये. सात बजे तक जब लौट के आया तो घर में जागृत अवस्था के कोई लक्षण नहीं थे. पता नहीं माँ-बेटी-बेटा रात में कब सोये. बहरहाल घर में घुसते ही सबको खड़खड़ा दिया. आज पहली तारीख़ है सब जल्दी से नहा-धो कर तैयार हो जाओ मंदिर चलेंगे. जैसी उम्मीद थी रिस्पॉन्स बहुत ठंडा सा मिला लेकिन कभी कभी मैं याद दिलाने की कोशिश करता रहता हूँ कि बाप मै ही हूँ. 

फिर भी ब्रंच करते-करते ढाई-तीन तो बज ही गये थे. इस बार सन्डे होने के कारण घर वालों ने मेरी लम्बी पूजा-ध्यान का भरपूर ख्याल रखा. सब तैयार हो गये थे. निर्णय ये हुआ कि घर से दूर शहर के बाहर हाइवे से कुछ हट के एक मन्दिर है, वही चलते हैं. वहाँ अब तक जाना नहीं हो पाया था. 25-30 किलोमीटर की दूरी तय करके शहर की भीड़-भाड़ से जूझते हुये घण्टे-सवा घण्टे में जब हम हाइवे के उस मोड़ तक पहुँचे जहाँ से मन्दिर के लिये मोड़ था. दृश्य हमारी कल्पना से परे था. कारों की जितनी लम्बी कतार उस सड़क पर घुसने को आमादा थीं, उससे लम्बी लाइन निकलने वाली कारों की दिख रही थी. कोई सहज ही अंदाज लगा सकता था कि मन्दिर प्रांगण में पार्किंग का क्या हाल होगा. कुछ देर कार की लाइन में लगने के बाद हमने निर्णय किया कि आगे हाइवे पर एक और मन्दिर पड़ता है, वहाँ पार्किंग की दिक्कत नहीं होनी चाहिये. सो गाड़ी मेन हाइवे पर आगे बढ़ा दी. वहाँ भी हाइवे के किनारे कारों की लाइन लगी थी. और मन्दिर में भी श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी लाइन थी. फाइनली हमने रोड से ही अनन्य श्रद्धा के साथ भगवान को प्रणाम किया और वापस घर के लिये गाड़ी मोड़ दी. 

अब तक शहर का जाम अपने पूरे शबाब पर था. सभी लोग अपनी-अपनी तरह से नये साल के पहले दिन को सेलिब्रेट करने निकले थे. जाम से बचने के लिए किन-किन गलियों और रास्तों से हमें गुजरना पड़ा, राम जाने.  चार घण्टे और अस्सी किलोमीटर की ड्राइव करके हम अपने घर के पास वाले मन्दिर में बाबा के सामने खड़े थे. भीड़ यहाँ भी रोज की अपेक्षा कुछ ज़्यादा थी. लेकिन दर्शन के लिये धक्का-मुक्की नहीं थी. 

-वाणभट्ट 


शनिवार, 5 नवंबर 2022

 बिजुरिया

अभी-अभी प्रकाशोत्सव का पर्व गुजरा है। पूरा का पूरा देश, प्रदेश, जिला, गली-मोहल्ला सब जगमगा रहा था। बड़ी-बड़ी लाइटें लगी थीं और छोटी-छोटी चीनी झालरों ने हर घर को रौशन कर दिया था। दिये भी जले थे, लेकिन शगुन के। जब झालर पर ख़र्च कर रहे हैं तो दिये की आवश्यकता सिर्फ़ पूजा के लिये ही बचती है। दिवाली है तो दिया तो जलेगा ही लेकिन मेरी दिवाली तुम्हारी दिवाली से ज्यादा रोशन तो तब ही होगी जब अमावस की रात भी कनफ्यूज हो जाये कि सूरज किस घर से उगने वाला है। 

सबने प्रकाश के गीत गाये। अँधेरे का मातम मनाया। लक्ष्मी जी की पूजा की और राम जी को भूल गये। दीपावली पर दीप गायब थे, लेकिन रोशनी थी और बम-पटाकों का शोर भी था। लक्ष्मी जी को पाने के लिये श्रम करना पड़ता है। बहुत से ऐसे तरीक़े हैं, जहाँ भाग्य ने साथ दे दिया तो वारे-न्यारे हो जाते हैं। इसीलिये भाग्यवादी लोग दीपावली पर लक्ष्मी जी को जगाने के लिये द्यूत-क्रीड़ा का प्रयोग भी करते हैं। कितने का बोर्ड और कौन सा पत्ता, इसके लिये भी रोशनी की दरकार होती है। पूरे प्रकाश पर्व में जो सबसे गौण विषय रह जाता है, वो है बिजली की उपलब्धता। यदि किन्हीं कारणों से कोई फॉल्ट हो गया और, बिजली चली गयी, तो दिये और मोमबत्ती इतने तो होते नहीं कि आकाश में झिलमिलाते तारों से कम्पटीशन कर सकें। तब सबको ख़्याल आता है बिजली का। और लानत-मलानत भेजने लगते हैं बिजली विभाग पर कि बहुसंख्यकों के त्योहार पर ही इन्हें बिजली काटनी होती है। इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, कम से कम हमारे इलाके में।

इन्सान की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वो वस्तु या व्यक्ति का मूल्य तब तक नहीं समझता जब तक उसे खो नहीं देता। बिजली के साथ भी यही बात लागू होती है। जब तक रहती है, किसी को पता ही नहीं होता। जब लोग बाग सराउंड साउंड सिस्टम पर 80 इंच का टीवी देखते हैं, तो अनायास सीना 56 इंच फूल जाता है। टीवी तो इन्वर्टर से चल भी जाये लेकिन एसी-फ़्रिज के लिये जेनरेटर की ज़रूरत पड़ जाती है। इन्वर्टर और जेनरेटर भी बिजली ही देते हैं। लोग बिजली से चलने वाले तमाम यन्त्रों के पीछे तो भागते हैं लेकिन जो उन सबको चलाता है, उसके प्रति संवेदनशील नहीं होते। बिजली बचाना, बिजली उत्पादन से कम श्रेयस्कर नहीं है। बिजली बना नहीं सकते तो कम से कम बिजली बचा ही लीजिये। 

जिस तरह किसी यूज़र का ध्यान बिजली की ओर तभी जाता है जब वो नहीं आती। या कोई अप्लायंस काम करना बन्द कर देता है। जिन लोगों ने प्रशासन, वित्त और लेखा में बड़े-बड़े काम और नाम कमा रखे हैं, उन्हें कतिपय ही ये आभास होगा कि वो लोग अपना काम कुशलता से कर सकें, इसके लिये कोई न कोई सर्विस यूनिट वाला लगा रहता है। जिनके ऊपर रौब गाँठने का कोई मौका छोड़ा नहीं जाता। ये जो कम्प्यूटर और इंटरनेट के उपयोग से जो ज्ञान का अंतर्जाल बुना जा रहा है, उसके पीछे भी बिजली की सुनिश्चित उपलब्धता का योगदान है। बिजली और बिल्डिंग का वही रिश्ता है जो आत्मा का शरीर से होता है। लोग भी आजकल शरीर के रंग-रोगन पर ज्यादा ध्यान देते हैं, आत्मा के विकास पर नहीं। आज के युग में बिजली का वही हाल है जैसा रहीम दास जी के समय में पानी का हुआ करता था - 

रहिमन बिजली पाइये, बिन बिजली सब सून।

गीज़र बिन ना कटे दिसम्बर, न एसी बिन जून।।

ये नेता, अभिनेता, कलाकार, पत्रकार, बैंकर, डॉक्टर, ड्राइवर, लेखक, कुक, वैज्ञानिक या कोई भी, जो कुछ कर पा रहे हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं किसी सर्विस देने वाले का कंट्रीब्यूशन जरूर होता है। ये काम अधिकतर इंजीनियर्स या टेक्निशियंस द्वारा संपादित किया जाता है। अपने चारों ओर नज़र घुमाइये जितनी भी चीजें आपको दिखायी दे रही हैं, उसे किसी न किसी तकनीकी व्यक्ति ने बनाया होगा। जब कोई पत्रकार पूरी बदतमीज़ी से बोलता है कि पुल के निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ, तब वो भूल जाता है कि लोग फाइलों पर ही भ्रष्टाचार कर जाते हैं बिना कुछ डिलीवर किये। अक्सर ये वो लोग होते हैं जो अपने हाथ से एक पेंच भी नहीं कस सकते। जीके और इतिहास पढ़ के जो लोग केबीसी लायक होते हैं, वही लोग  प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग की सारी सीमायें लाँघ जाते हैं। कहीं भी, कोई भी यंत्र या व्यवस्था अगर सुचारू रूप से चल रही हो, तो कोई तकनीकी व्यक्ति उसका रख-रखाव कर रहा होगा। नौ मन तेल होता है तभी राधायें नाचती हैं। ये बात राधाओं को समझ नहीं आती। ऐसा नहीं है कि उनकी प्रतिभायें काबिल-ए-तारीफ़ नहीं हैं। किन्तु स्टेज पर लाइट-साउंड उनकी प्रस्तुति पर चार चाँद लगा देता है। तालियाँ तो उसी को मिलती हैं या मिलनी चाहिये जिसने मंच पर प्रस्तुतिकरण किया है। लेकिन तकनीकी सहयोग को भी ड्यू सम्मान मिलना चाहिये। लोग बाग डॉक्टर और वकील के आगे तो बेबस-लाचार से दिखते हैं, लेकिन इंजीनियर को देख के चौड़े हो जाते हैं। सब लोग सर्विस सेक्टर के लोगों को सेवक ही मान लेते हैं। एक मिनट के लिये नेटवर्क चला जाता है, तो इंटरनेट जीवी त्राहिमाम-त्राहिमाम कर उठता है। यदि किसी दिन इंजीनियरों ने सेवा को रोका तो अनर्थ हो सकता है। निश्चय ही उनका काम सेवा देना है, किन्तु दो शब्द धन्यवाद या सम्वेदना के सुनना उनके हौसले को बढ़ाता है।

हमारे वरिष्ठ सहयोगी पाल साहब को दीपावली के तुरन्त बाद सेवा निवृत्त होना था, सो हो भी गये। वो चूँकि बिजली विभाग के प्रमुख थे और सीनियर मोस्ट थे, तो उनके रिटायरमेंट से एक निर्वात का होना अवश्यम्भावी है। कुर्सियाँ कभी खाली नहीं रहतीं। अगले व्यक्ति को चार्ज मिलना ही था लेकिन पाल साहब की कर्मठता और कार्य के प्रति समर्पण निश्चय ही अन्य लोगों को प्रेरित करेगा। पाल साहब ने संस्थान में बिजली व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये कभी घर-परिवार की परवाह नहीं की। दिन-रात एक किये रहते। रात दो बजे लाइट गयी नहीं कि उनका फ़ोन कोई न कोई घनघना ही देता था। इसके बाद उनका काम शुरू हो जाता था और तभी खत्म होता, जब तक बिजली न आ जाये। आवश्यक विभागों को जेनरेटर की सप्लाई देते रहना भी उनकी आवश्यक सेवा का हिस्सा था। जब कोरोना ने दस्तक दी तो पूरा देश हाइबरनेशन मोड में चला गया। लेकिन एसेंशियल सर्विसेज़ बदस्तूर जारी रहीं। इलेक्ट्रिकल इंचार्ज होने के नाते पाल साहब ने ड्यूटी में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती। अगर अफ़सर अपनी ड्यूटी कर रहे हैं तो उन्हें एसी, कम्प्यूटर, नेट सब चलता हुआ चाहिये। चूँकि उन दिनों कोई किसी से मिलता-जुलता तो था नहीं, सब अपने-अपने कमरे से कार्य निष्पादित करने अपनी सुविधानुसार आते और जाते। लेकिन बिजली तो सबको चाहिये, आने और जाने के बीच। इस प्रकार पाल साहब और उनके सहयोगियों की ड्यूटी लगभग पूरे दिन की हो जाती। कोरोना पीरियड में जिसने भी ड्यूटी की, उसे कोरोना वारियर की संज्ञा से नवाज़ा गया। लेकिन क्या मजाल कि किसी का ध्यान बिजली की तरफ़ गया हो।

तीस से अधिक सालों से सेवा करते-करते कहीं से उन्हें ये लगने लगा कि आवश्यक सेवा में उनके योगदान को यथोचित मान्यता मिलेगी। वो कुछ दादा साहब फाल्के टाइप के वन्स इन लाइफ़ टाइम पुरस्कार से पुरस्कृत होंगे। उनके साथ जॉइन किये अन्य नॉन-टेक्निकल टाइप के टेक्निकल्स को संस्थान के बेस्ट वर्कर का आवर्ड मिल चुका था। फार्म इंचार्ज, सिक्योरिटी इंचार्ज, गेस्ट हाउस इंचार्ज और न जाने कितने प्रकार के इंचार्ज इस सम्मान से सम्मानित हो चुके थे। इलेक्ट्रिकल इंचार्ज की सेवाओं को मौखिक मान्यता तो सब देते रहे लेकिन वो अवार्ड में परिवर्तित नहीं हो पायी। आवश्यक सेवाओं की ये विडम्बना है कि सबको ख़ुश नहीं कर सकते। पाल साहब को बुरा तो ज़रूर लगा होगा लेकिन उन्होंने उसका ज़िक्र अपने रिटायरमेन्ट भाषण में करना उचित नहीं समझा। 

पानी और हवा की तरह बिजली भी वर्तमान समय की एक आवश्यकता बन चुकी है। बिजली के बिना हमारे सारे संसाधन व्यर्थ प्रतीत होते हैं। नॉन-टेक्निकल लोग टेक्निकल लोगों द्वारा आवश्यक सेवायें मुहैया कराये जाने को अधिकार की तरह माँगते हैं लेकिन उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। लेखकों और शायरों ने भी कभी इंजीनियर्स के योगदान पर कुछ भी लिखने से परहेज किया है। विदाई समारोह के लिये इंटरनेट पर उपलब्ध सारा साहित्य पलट मारा (पहले की तरह अब लाइब्रेरी की अवधारणा बदल गयी है)। लेकिन क्या मजाल कि बिजली पर कोई शेर या बकरी मिल जाये। कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। लेकिन मूर्धन्य से मूर्धन्य साहित्यकार वहाँ तक नहीं पहुँच सके, जहाँ से आधुनिक चिराग़ (बल्ब) रौशन हैं। कुछ नये लोगों ने प्रयास किया लेकिन उनकी बिजुरिया में साहित्यिक एंगल तो हो सकता है लेकिन टेक्निकल नहीं। नतीजन 'वाणभट्ट' को लेखनी उठानी पड़ गयी। 

बिजली है तो जीने के सारे सबब हैं,

ये एसी, ये ट्यूबलाइट, ये पंखे, ये टीवी, ये फ़्रिज हैं।

इक रूह सी है जो चलाये रखती है

वरना हम क्या हैं ज़नाब, एक बलब फ़्यूज़ हैं।।

-वाणभट्ट

रविवार, 23 अक्तूबर 2022

शुभ दीपावली

सूरज जब डूबने चला
तो गर्वोक्ति से बोला,
कौन करेगा मेरा काम
मेरे डूबने के बाद।

पिछली पंक्ति में खड़े
टिमटिमाते-सहमे से दिये ने कहा धीरे से,
बहुत निर्बल और दीन हूँ किन्तु 
प्रयास करूँगा लड़ने का अँधेरे से।

माटी के उस दिये ने सहस्त्र दियों को जला दिया
सबने मिल कर काली रात को उजिया किया,
जलता दिया जग को एक सन्देश दे गया
स्वयं जलना पड़ता है जब हो अंधेरा घना।

सूर्य उगने की प्रतीक्षा में न समय गवायें
क्यों न सब मिल रात का उत्सव मनायें,
अपने अंतस में भी इक दीपक जलायें
अमावस में तारों और जुगनुओं सा जगमगायें।

शुभ दीपावली सभी को...🙏🙏🙏

-वाणभट्ट

(कविवर रविन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से प्रेरित)

बुधवार, 5 अक्तूबर 2022

सनातन

धर्म के नाम पर बहुत कन्फ्यूजन फैला हुआ है. मजहब-सम्प्रदाय को लोग धर्म से कन्फ्यूज कर गये हैं. जिस तरह धर्म शाश्वत है, उसी तरह अधर्म भी अपरिवर्तनीय है. धर्म की सीधी-सपाट परिभाषा जो मेरी समझ में आती है वो ये है - "धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है". धर्म देश-काल-स्थान में भी बदलता नहीं है. इसका अनुसरण करना भी बहुत आसान है. बस अन्तरात्मा की बात माननी है. ये वो देव-वाणी है जिसे अधर्म करते हुये चुप कराना पड़ता है. लेकिन इसकी अग्नि कहीं न कहीं आत्मग्लानी या पश्च्याताप के रूप में अंतर्मन में सुलगती रहती है. राम-रावण-हनुमान-दसहरा आदि प्रतीकों के माध्यम से धर्म का साक्षात् स्वरुप को मानव मात्र के सामने प्रस्तुत किया जाता है. श्रीमद भगवत गीता में भी व्यक्ति के अन्तर्द्वंद को महाभारत के रूप में दिखलाया गया है. पाँच अच्छाइयों पर सौ बुराइयाँ हावी हैं. हमारी स्थिति भीष्म की है. जो चाहता है बुराई और अच्छाई दोनों साथ रहें. जीवन का असली आनन्द तो बुराइयों में निहित है. संत ही बनना था, तो दुनिया में आने और रहने की जरूरत क्या है. कमंडल लो और निकल लो.  द्वैत हर युग में रहा है, और अधर्म के बिना धर्म की स्थापना की कल्पना भी संभव नहीं है. इसी धर्म ध्वजा का निरन्तर वहन ही सनातन है. जिसका न कभी आदि था न कभी अन्त होगा.  

दसहरा शायद इसीलिये मनाया जाता है कि कम से कम साल में एक बार अच्छाई और बुराई पर मंथन कर लिया जाये. ये उपदेश किसी और के लिये नहीं हैं. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिये हैं. कोई भी व्यक्ति अपने धर्म से भले वाकिफ़ न हो लेकिन अधर्म को सीने में छुपाये घूमता रहता है. एक भजन में इसका ज़िक्र भी आता है "जग से चाहे भाग ले प्राणी, मन से भाग ना पाये". इसीलिये वानप्रस्थ आते-आते ईश्वर के प्रति उसकी आस्था बलवती होने लगती है. दीन-दुनिया के सफलतम लोग भी भगवान को क्या जवाब देंगे का ध्यान करके स्पीरिचुअल होने के प्रयास में लग जाता है. छत्तीस चूहे खा कर पुण्य कमाने का प्रावधान सभी सम्प्रदायों में है. 

गर्ग साहब रिटायर्मेंट की कगार पर पहुँच चुके हैं. हिन्दुओं में जितनी जातियाँ हैं, उतने ही उपनाम भी हैं. जो पुछल्ले की तरह नाम से चिपक जाते हैं. जातक जब जन्म लेता है तो उसे इस बात का भान तक नहीं होता कि उसने कितने उच्च कुल में जन्म लिया है. इस टाइटिल के उच्चारण मात्र से समाज को पता चल जाता है कि बन्दा ज्ञानी है, बलशाली है, व्यापारी है या इनमें से कुछ भी नहीं है. ये जो कुछ भी नहीं हैं, वही बहुतायत में पाये जाते हैं. जब हम घर-परिवार-समाज पर एक सरसरी नजर डालते हैं, तो स्पष्ट दिखता है कि बनाने वाले ने सबको बराबर नहीं बनाया है. एक ही परिवार में एक सक्षम भाई दूसरे अक्षम भाई को उसी दृष्टि से देखता है जैसे समाज की विभिन्न जातियाँ एक दूसरे को. किसी संगठन में भी देखेंगे तो उच्च पदों की संख्या सीमित हैं जबकि रोजमर्रा के कामों के लिये जितने व्यक्ति मिल जायें उतने कम हैं. भारत वर्ष को पुरातन परिपेक्ष्य में देखें तो जातियाँ किसी के साथ चिपकी नहीं थीं. लेकिन समय के साथ अपनी सुविधा के लिये लोगों ने उसे चिपकाना उचित समझा, ताकि लोगों को परिवार का इतिहास बताना न पड़े. शिवा जी और राणा प्रताप का शौर्य उनकी तलवारें बोलती थीं. लेकिन वहाँ जोख़िम ज्यादा था. नाम में टाइटिल लगाने से ही जब भौकाल टाइट हो जाये तो तलवार उठाने की क्या जरूरत है. मुगलों के समय में भी जाति व्यवस्था चिपकाने का प्रचलन रहा हो, ऐसा कम ही दिखता है. बहुत संभव है कि अंग्रेजों को अपनी योग्यता जाहिर करने के उद्देश्य से ये आज की प्रचलित वर्ण व्यवस्था ने जन्म लिया हो. जैसे आज हम अपने अंग्रेजी स्कूल में पढ़े होने पर गर्व महसूस करते हैं, वैसे ही हर किसी का प्रयास होता है कि उसके पास गर्व करने के लिये कुछ ना कुछ तो होना चाहिये. 

नौकरी लगने के बाद एक चीज़ का एहसास जो सबसे पहले हुआ वो ये था कि पिता जी लोगों ने नाहक ही नामकरण की जहमत उठायी. एक संस्थान में एक ही उपनाम के ज़्यादा लोग तो होते नहीं. सो लोग बाग़ वर्मा-शर्मा-मिश्रा-ठाकुर आदि से ही काम चला लेते हैं. लेकिन यहाँ भी एक लोचा है. कुछ उपनामों के साथ ही साहब लग सकता है. जैसे गर्ग, सिंह, पाल आदि के साथ साहब फिट बैठता है. और बाक़ी वर्मा-शर्मा-मिश्रा आदि को जी से ही काम चलाना पड़ता है. कभी-कभी पोस्ट (पद) को देखते हुये, कुछ लोग वर्मा या शर्मा या मिश्रा के साथ साहब लगाने का अनुचित प्रयास करते हैं. लेकिन ये सहज समझ आ जाता है कि बन्दा पोस्ट को साहब लगा रहा है, व्यक्ति के उपनाम को नहीं. 

तो गर्ग साहब को जब मालूम हो गया कि अब रिटायर हुये बिना कोई चारा नहीं है, तो उन्होंने मनन किया कि अब क्या करना है. जीवन के तजुर्बों ने इतना तो बतला ही दिया था कि जैसे वो अपने माँ-बाप की सेवा उनकी वृद्धावस्था में कर सके, बहुत संभव है कि उनके बच्चों को अपनी महत्वाकांक्षाओं और आजीविका के चलते ये अवसर न मिल पाये. तो उन्हें इस लायक तो होना ही चाहिये कि अपनी देख-भाल ख़ुद कर सकें. इसके लिये पहली प्रीरिक्विज़िट थी - स्वस्थ शरीर. इस उद्देश्य से उन्होंने अपनी दिनचर्या को बहुत ही संतुलित और संयमित कर लिया. उचित आहार-विहार और खान-पान में संयम भले ही देखने में छोटी बातें लगतीं हों लेकिन उनका पालन करने के लिये बहुत प्रयास करने पड़ते हैं. बहरहाल धुन के पक्के गर्ग साहब ने चीनी-नमक-जंक फूड्स से तौबा कर ली. और प्रातःकालीन वाक को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया. ये बात अधिकांश लोगों को पता होती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वो इसके लिये रिटायर होने का इंतज़ार करते हैं. इस बात को जिसने जितनी जल्दी समझ लिया उसका पोस्ट रिटायर्मेंट जीवन उतना ही स्वस्थ होता है. 

उनके टहल-मार्ग में एक पीपल का पेड़ भी पड़ता था. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास होता है. हिन्दू लोगों की मान्यता ये भी है कि भगवान सब जगह है और सब कुछ देख रहा है. इसलिये धर्म चाहे-अनचाहे इनके जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है. अधर्म करने के बाद भी इन्हें ज्ञात रहता है कि कहाँ-कहाँ गलत किया है. उससे मानसिक मुक्ति के लिये ना-ना प्रकार के प्रावधान भी हैं. गंगा स्नान-तीर्थयात्रा-भजन-पूजन जो आपको सूट करे कीजिये. और सबसे आसान है इस बात का बोध कि कर्ता तो वो ही है, हम तो साधन हैं, निमित्त मात्र हैं. इसलिये मेरा क्या दोष. "तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा". 

पिछली दीपावली की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ कहीं कूड़े या सड़क पर तो फेकीं नहीं जा सकतीं. घर पर नयी लक्ष्मी जी को आना है, सो इनका निस्तारण कैसे हो. धर्म के नाम पर इतनी शर्म बची हुयी है कि रात के अँधेरे में ये मूर्तियाँ घर से निकाल कर किसी छोटे मन्दिर या पीपल के पेंड के नीचे बा-इज्ज़त रख दी जाती हैं. जाड़ा-गर्मी-बरसात के भरोसे. कि ऊपर वाला अपने विधान से उन मूर्तियों को डिस्पोज करेगा. एक साल की मूर्तियाँ डिस्पोज़ होने नहीं पातीं थीं कि दिवाली फिर आ जाती थी. उस पीपल के पेड़ के नीचे मूर्तियों का अम्बार लग गया था. कण-कण में भगवान् देखने वाले उस पीपल के पेड़ पर भी शीश झुका देते. गर्ग साहब की दिनचर्या में ये काम भी शामिल हो गया था. 

बरसात की उस सुबह कुछ बूँदा-बांदी हो रही थी. एक मन किया कि चलो आज नहीं जाते. लेकिन बारिश कुछ कम थी, इसलिये छाता लेकर टहला जा सकता है. ऐसा सोच कर गर्ग साहब घर से निकल लिये. यथावत पीपल के पेड़ पर पहुँच कर तमाम देवी-देवताओं को नमन करने के लिये शीश झुकाया तो देखा किसी ने प्लास्टिक की पारदर्शी पन्नी में हार्ड कवर में श्रीरामचरितमानस हिन्दी टीका के साथ (वृहदाकार) रख छोड़ी है. उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि क्या लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं बची है कि धर्मग्रंथों को भी रखा जा सके. उस लिफ़ाफ़े में १०८ मनकों की रुद्राक्ष की जप-माला भी रखी हुयी थी. गर्ग साहब को लगा ये शायद ऊपर वाले का इशारा है. स्वास्थ्य के साथ-साथ आध्यात्मिकता का समय भी आरम्भ होने वाला है. उन्होंने पुस्तक को उठा के माथे से लगा लिया.

- वाणभट्ट         

बुधवार, 14 सितंबर 2022

चलनी

पार्टिकल साइज़ एनालीसिस (कण आकार विष्लेषण) हेतु घटते हुये क्रम में चलनियाँ एक के नीचे एक लगी हुयीं थी. बेसन में उपस्थित कणों के आकार का परीक्षण होना था. इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सीव शेकर को अधिकतम आयाम और आवृति पर सेट करके, सजीव तसल्ली से कुर्सी पर बैठ गया. टाइमर 10 मिनट का था. उतनी देर खड़े रहने का कोई औचित्य नहीं था. टेलर बाबा की सीरीज़ के अनुसार चलनियों को व्यवस्थित किया जाता है. बड़े छेद वाली चलनी सबसे ऊपर और सबसे महीन सबसे नीचे. हैमर मिल से बना बेसन कितना महीन या मोटा है, ये जानना आवश्यक होता है कि बेसन का सेव बनेगा या लड्डू. कणों के आकार के अनुसार ही पिसे बेसन या आटे की ग्रेडिंग की जाती हैं. इसी तकनीक का उपयोग मृदा का विश्लेषण के लिये मृदा वैज्ञानिक भी करते हैं.

बचपन में जब भी खेल होता था तो कई बार गुल्ली-डंडे में आउट होने वाला बच्चा ये कहते पाया जाता था - 'तेली के तीन दाम'. यानि कम से कम तीन चांस दो, तब देखो मेरा कमाल. यदि शोध के क्षेत्र में न आया होता तो शायद इसका मतलब आसानी से समझ न आता. यहाँ हर डाटा कम से कम तीन रेप्लिकेशन्स में लिया जाता है. एक या दो बार में सही आँकलन नहीं हो पाता इसलिये सुनिश्चित करने के लिये प्रयोग को कई बार करना पड़ता है. औसत और मानक विचलन के साथ ही डाटा रिपोर्ट किया जाता है. एक ही काम को तीन बार करने के लिये बहुत ही धैर्य की आवश्यकता होती है. शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुये नीति-नियन्ताओं ने पीएचडी को शोध व अध्यापन सेवाओं के लिये अनिवार्य न्यूनतम योग्यता बना दिया है. अमूमन तीन से छः साल में समाप्त होने वाली यह डिग्री वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें ज्ञान प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा हो या धैर्य कूट-कूट के भरा हो. कभी शोध और अध्यापन में वही व्यक्ति आते थे, जिनकी इस क्षेत्र में रुचि (हॉबी) हुआ करती थी. जब से ये क्षेत्र नौकरी के अवसर बने हैं, तब से लोग-बाग प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करते-करते पीएचडी कर जाते हैं. उधर निकल गये तो ठीक नहीं तो प्रोफ़ेसरी पक्की है ही. बक़ौल शहरयार साहब - गर जीत गये तो क्या कहना, हारे भी तो बाजी मात नहीं.

सजीव ने पूरी सीव एनालीसिस की प्रक्रिया को तीन बार किया. हर बार किस चलनी पर कितना बेसन रुका, उसे तौला. उसे आश्चर्य नहीं हुआ कि हर बार हर चलनी पर लगभग बराबर मात्रा ही प्राप्त हुयी. यही प्रयोग की सफलता है कि विचलन कम से कम हो. मानव त्रुटियाँ कम करने के उद्देश्य से ही रिप्लीकेशन्स करने का प्रावधान विकसित किया गया है. 

शेकर अपनी गति से कम्पन कर रहा था. हर बार दस मिनट पूरी तरह सजीव के अपने थे. एक विचार से वो चिपक गया. क्या इंसानों पर भी ये चलनी का सिद्धान्त लागू होता है. एक आचार-विचार-विहार के लोग प्रायः एक चलनी में एकत्र हो जाते हैं. जो लोग एक चलनी में आ जाते हैं, वो न ऊपर जा सकते हैं, न नीचे. कुछ लोग चलनी की निचली सतह पर चिपके रहते हैं. जरा सा झटका लगा तो नीचे वाली चलनी में जा गिरते हैं.  जो मोटा होगा वो ऊपर अटक जायेगा और जो महीन होगा वो नीचे निकल जायेगा. उसे आप चाह कर भी अपनी चलनी में नहीं ला सकते. लेकिन जो आपकी चलनी में फँस गया तो वो चाहे कुछ भी कर ले पर अपनी चलनी नहीं बदल सकता. सजीव सोच रहा था, उसके जितने भी दोस्त थे, वो दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच गये हों, या कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन दोस्त बने रहे. जो चलनी में नहीं आये, वो ऊपर-नीचे तो हैं, लेकिन दोस्त नहीं कह सकते उनको.  

ध्यान के उन गहनतम क्षणों में दृश्य साफ़ होता जा रहा था. सारे दोस्त-रिश्तेदार उसने ऊपर वाली चलनी में डाल कर शेकर स्टार्ट कर दिया. उसे भली-भाँति समझ आ रहा था. जो तुम्हारी चलनी में हैं, वो हमेशा वहीं रहेगा, और जो नहीं है वो कभी उस चलनी का सदस्य था ही नहीं. दिक्कत तब होती है जब हम दूसरी चलनी के सदस्य अपनी चलनी में लाना चाहते हैं. ज्ञान कहीं भी, कभी भी मिल सकता है बस थोड़ा ध्यानावस्थित होने की आवश्यकता है. सजीव के लिये, ये ब्रह्मज्ञान बुद्धा अवेकनिंग टाइप का ज्ञान था. 

- वाणभट्ट

सितम्बर 14, 2022: हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं सहित


मर्दानगी

स्टेशन पर गहमागहमी थी। सभी ट्रेनें लेट चल रही थीं। ठंड का हाई एलर्ट जारी हो चुका था। मौसम के साथ ट्रेनों को भी जुकाम हो जाता है।  मैं भी जैक...