शनिवार, 18 जुलाई 2026

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके  विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ  कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं. 

बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर  वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा. 

जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये 

बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये 

आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े. 

हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरी नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.

मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास भी धीरे-धीरे हो ही गया. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी.  बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपस्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी लगी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है. 

बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र  की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टि गोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व और मेरे बॉस को शर्म आती है, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. 

समस्याओं के समाधान प्रायः सरल और सस्ते ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये. अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.  

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जुलाई 2026

नैनो कहानियाँ: लक्ष्य

लक्ष्य 1:

कॉंग्रचुलेशन्स, तीसरे राउंड के इंटरव्यू के बाद आप सेलेक्ट हो गये हैं. हमारी कम्पनी में साठ लोग हैं, जो छ: प्रोजेक्ट्स पर काम रहे हैं. आपको एक विशिष्ट टीम के लिये चयनित किया गया है. आपके प्रोजेक्ट मैनेजर बतायेंगे कि उनकी टीम की आपसे क्या आपेक्षायें हैं. वही आपको ट्रेनिंग देंगे, सिखायेंगे और आपका मूल्यांकन भी करेंगे. 

लक्ष्य 2:

वेलकम टु आवर ऑर्गनाइजेशन. दो रिटन और एक साक्षात्कार के बाद हाइली क्वालिफ़ाइड लोगों का चयन होता है. यहाँ साठ लोग छिहत्तर प्रोजेक्ट्स पर का काम कर रहे हैं ताकि किसी को प्रमोशन में दिक्कत न हो. हमारे यहाँ काम करने की फ्रीडम है. आप भी एक प्रोजेक्ट बनाइये. अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कीजिये. हम साल भर नियंत्रण और एक बार मूल्यांकन करते हैं. 

लक्ष्य 3:

बॉस एम्प्लॉयी से - अपना लक्ष्य निर्धारित करो ताकि हम उसकी मॉनिटरिंग कर सकें. 

एम्प्लॉयी बॉस से - सर लक्ष्य और दिशा आप तय करें. वी विल नॉट लीव सिंगल स्टोन अनटर्नड. उसकी प्राप्ति के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे. 

बॉस एम्प्लॉयी से - नौकरी करो नौकरी. ये बातें इंटरव्यू में ही अच्छी लगती हैं. प्रोन्नति तुम्हें चाहिये, मुझे नहीं. 

लक्ष्य 4:

समस्यायें बहुत हैं, बहुआयामी हैं. एकांगी प्रयास भूत में नाकाफ़ी सिद्ध हुये हैं. आवश्यकता है एकीकृत समाधान पर मिल कर काम करने की. शीर्ष नेतृत्व का कार्य है, समस्याओं की प्राथमिकता तय करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मार्गदर्शन देना. यदि लक्ष्य का ज्ञान और भान है, तो काम करना और करवाना आसान हो जाता है. इसके लिये ज़रूरी है, बॉस के लिये लक्ष्य और उसकी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता. 

लक्ष्य 5:

लक्ष्य विहीनता की स्थिति में ऑर्गेनाइज़ेशन के कर्मचारियों को व्यस्त रखना भी कला है. पुरखन दादी भी स्वयं को व्यस्त रखने के लिये करती थीं, इस कोठरी का माल उस कोठरी. लक्ष्य तय हो तो काम खत्म हो सकता है. फिर मैनपावर क्या करेगी. अलादीन के जिन्न को बिज़ी भी तो रखना है.

-वाणभट्ट

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

लघु कथा - दिशा

सभा सुधारकों की थी. कोई जलवायु परिवर्तन से प्रभावित न होने वाली प्रजाति के विकास में लगा था. कोई बिना खाद-पानी के उत्पादन बढ़ाने पर उद्दत था. किसी ने कीट-बीमारी की चुनौती को स्वीकार किया था. कुछ जीन ही बदल देने की फिराक़ में थे. वहाँ उपस्थित एक प्रोसेसर बोला पड़ा - सर, अरहर में गोंद कम हो जाये, तो इसका छिलका भी मटर की तरह उतर जाये. मिलिंग लॉस कम हो जायेगा. राजमा रात भर भिगोये बिना दो सीटी में गल जाये तो क्या बात है. सबने समवेत स्वर में जवाब दिया - बड़ी चुनौतियाँ ही विज्ञान को आकर्षित करती हैं. समस्यायें बड़ी हों तभी फण्ड भी मिलता है. इन कामों के लिये भला कौन फण्ड देगा. कभी आवश्यकता थी जननी, आविष्कार की. अब फण्डिंग तय करती है, दिशा विज्ञान की. 


-वाणभट्ट

शनिवार, 23 मई 2026

चहास

अगर मै कहूँ की चाय की लत मुझे विरासत में मिली तो शायद गलत न होगा. कोई छोटा बच्चा दूध न पिये तो माँ का मन नहीं मानता. वो सारे जतन कर लेगी कि बढ़ते बच्चे के विकास में कोई कमी न रह जाये. जब उन्होंने देख लिया कि बच्चे को चाय का रंग ही पसन्द है, तो चाय का विकल्प निकाला गया, बॉर्नविटा. बचपन से बॉर्नविटा के साथ दूध पीने वाले शुद्ध शहरी बच्चे को शुद्ध दूध हजम होने से रहा. घी का हाल तो और बुरा था. दाल में माँ घी डाल देती तो मुझे तैरता बाल नज़र आता. ये जो हाइट पाँच फ़िट पाँच इंच पर अटक गयी, उसका दोष मै किसी और को नहीं दे सकता. हालात ये हैं कि आज भी अलबत्ता तो दूध पीता नहीं और पीता भी हूँ तो कुछ न कुछ एडिटिव डाल कर. 

सुबह उठते ही फ्रेश होने के बाद पिता जी चाय पी कर ही टहलने निकलते. सुबह पाँच बजे. हमारे घर में चाय पौने पाँच पर बन जाती थी. लौटने के बाद, दूसरा कप और नाश्ते के साथ तीसरा. दिन में कितने हुये, उसका हिसाब नहीं. लेकिन वापस घर आने पर चाय तो बननी ही थी. तब न टीवी था, न मोबाइल. ज्ञान बाँटने के विधाओं से सभी वंचित थे. चाय के गुण-अवगुण के बारे में बताने वालों का नितान्त अभाव था. बल्कि मेरे एक मित्र के पिता जी बताया करते थे कि टी-बोर्ड की नौकरी में वो लोगों को चाय फ़्री पिलाया करते थे, ताकि लोगों को चाय का चस्का लगे. और हिंदुस्तानियों की एक बात तो माननी पड़ेगी, अमिताभ अगर फ़ण्डू च्यवनप्राश का एड कर दे तो हम आराम से मान लें कि उनकी सेहत का राज़ यही है. अगले एड में वही फ़ायम चूर्ण के गुण गाते नज़र आ सकते हैं. जब आदत लग रही थी तब किसी ने कोई वैधानिक चेतावनी नहीं दी थी कि चाय सभी बीमारियों की जड़ है. सरदर्द-सर्दी-जुकाम का तो आज भी सबसे कारगर इलाज चाय ही है. 

पूरे घर की आदत बदस्तूर चलती रही, पिता जी के रिटायर होने के बाद भी. बस फ़र्क़ इतना हुआ कि सुबह चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से आ गयी. पौने पाँच बजे की चाय के लिये श्रीमती जी ने हाथ खड़े कर दिये थे. अब दूसरी चाय मेरे टहल के लौटने के बाद होती. पिता जी बालकनी में टहलते और मेरे लौटने का इंतज़ार करते. 

उस दिन जगमोहन को सुबह पाँच बजे बुला लिया था. इलाहाबाद जाना था. जब से सठियाया हूँ, श्रीमती जी अकेले कार ले कर जाने को मना करती हैं. विशेषकर शहर से बाहर. साठ के बाद बगावती तेवर भी ढीले पड़ जाते हैं, चाहे घर में हो या बाहर. वैसे भी जिनकी जीत में मज़ा आता हो, उनसे हारना अच्छा लगता है. अब तक ये समझ आ गया होता है कि दुनिया चलाना बस उसी का काम है. चपरासीनुमा अफ़सर और अफ़सरनुमा चपरासी (कॉपीराइट - श्रीलाल शुक्ल)  सब उसी का खेल है. कभी-कभी ये भी लगता है कि इललॉजिकल बॉस और लॉजिकल सबोर्डिनेट बना कर भगवान ने गलती तो नहीं कर दी. तब जा कर पूर्व जन्मों के कर्मों पर विश्वास होने लगता है. बहरहाल अब ये भी विश्वास होने लगा है कि सुकरात अगर समय से पहले पैदा हो जाये तो समाज उसे जहर न दे तो उसका करे क्या. मौका लगा है तो चिटकाता चलूँ कि बीस साल पहले ही मुझे अंदाज़ होने लगा था कि मनुष्य के डॉक्टर्स ह्युमन हेल्थ की बात करेंगे और कृषि के डॉक्टर्स सॉयल हेल्थ, फ़सल प्रबंधन और कृषक आय की बात करेंगे. जो आज होता दिख रहा है. बीस साल बाद के लिये ये लिखे दे रहा हूँ कि सुपर स्पेशलिस्ट धूल फ़ाँकते नज़र आयेंगे. ये हर समस्या का समाधान अपनी विषय विशेषज्ञता के दृष्टिकोण से खोजते हैं. स्पेशलिस्ट रिपोर्ट का इलाज करते हैं, आदमी का नहीं. अपने अभूतपूर्व विकास के बाद भी एलोपैथी, सिम्पटम बेस्ड इलाज में, आयुर्वेद और होम्योपैथी की तुलना में असफल सिद्ध हुयी है. इन्होंने मानव शरीर को मशीन समझ लिया. जबकि हमारे पुरखों को भी मालूम था कि मनुष्य मन, बुद्धि, अहं और चित्त से जुड़ा है. जब इसके उपर उठेगा तभी जीव से शिव की यात्रा पूरी होगी. आदमी और पेड़-पौधों का मैनेजमेंट होलिस्टिकली होगा. दो हज़ार साल की अंग्रेज़ी साइंस, अरबों साल की पृथ्वी की प्राकृतिक जीवन शैली पर हावी हो गयी है. विज्ञान का प्रयास जहाँ तक प्रकृति को समझने तक सीमित था, वहाँ तक विज्ञान ने प्रगति की. विज्ञान के साइंस बनने के बाद इंसान भगवान के डोमेन में हस्तक्षेप करने लगी है. यहीं से साइंस ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ आरम्भ कर दिया. आज वातावरण में व्याप्त विसंगतियों के मूल में मानव द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिये प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व अनियंत्रित दोहन ही जिम्मेदार है.  देर-सवेर साइंस को वापस विज्ञान पर लौटना होगा. प्रकृति का अध्ययन करो, उसके एक्सट्रीम्स के कारणों को समझो, उन पर नियंत्रण करने का प्रयास करो, किन्तु उसे बदलने या लड़ने का नहीं. विज्ञान ऐसी धरती का निर्माण करता है, जहाँ धरती पर सब प्राणियों का बराबर का हक़ और हिस्सा हो. ये बात अलग है कि तब शायद हम फिर झिंगालाल-हूम करते घूम रहे हों. शायद सिर्फ़ लैंडरेसेज़ (आदिवासी) ही बचें. साइंस फ़िक्शंस में दो हज़ार साल आगे जिस विकास की कल्पना प्रस्तुत की जाती है, उसका उलट भी हो सकता है. जिस तरह मानव, साइंस के नाम पर सेल्फ़ डिस्ट्रक्शन्स का इंतज़ाम करता घूम रहा है, जीवन बचा ले जाना ही सबसे बड़ी चुनौती है. 

पौने पाँच बजने से पहले ही जगमोहन ने घण्टी बजा दी. नहा-धो के चाय के कप को हाथ लगाया ही था. जितनी जल्दी निकलेंगे उतनी ही जल्दी वापस लौटने की प्रक्रिया होगी. सो हड़बड़ी में बिना चुस्की लिये, चाय गले में उतार ली. इरादा था 'मोहन पेड़ा' पर उनकी चाय का लुफ़्त लिया जायेगा. जगमोहन भाई का हाल ये है कि वो क्या खाते-पीते हैं और कब खाते-पीते हैं, उनके साथ कई बार रहने के बाद भी मुझे पता नहीं लग सका. जब मै और जो मै खाता, उसी से उनका काम चल जाता. शायद ही उन्होंने कभी अपनी तरफ़ से चाय-कॉफ़ी-स्नैक्स या खाने की डिमांड की हो. 

जब 'मोहन पेड़ा' के सामने से निकले, उसके खुलने का समय नहीं हुआ था. फ़तेहपुर के पास एक 'मोरिंगा' रेस्टोरेंट खुला था. जगमोहन को वहाँ रोकने के लिये बोल कर मै फ़ेसबुक पर बर्थडे की विशेज़ और व्हाट्सएप्प पर गुड मॉर्निंग के अपने दैनिक शगल में लग गया. जब इससे फ़ारिग हुआ तो पूछा - अभी तक 'मोरिंगा' नहीं आया. जगमोहन खाली सड़क पर कार दाबे हुआ था. बोला - सर मिस कर गया, वो तो निकल गया. मैंने फिर कहा - आगे रिलायंस पेट्रोल पम्प पर भी एक 'वाइल्डबीन कैफ़े' है, वहाँ चाय मिल सकती है. जगमोहन कूटनीतिक तरीके से मुस्कराते हुये बोला - सर वो भी निकल गया. मेरे दिल में एक वहम हमेशा रहा है, घर से चाय पी कर न निकलो तो कहीं चाय नहीं मिलती. सुबह चाय पी तो क्या थी, निपटा दी थी. चाय पीने वाली फ़ीलिंग नहीं हुयी. मुझे लगा आज अपना टोटका टेस्ट करने के लिये सही दिन है. 

निर्णय ये हुआ कि किसी के यहाँ जाने से पहले थोड़ी पेट पूजा कर ली जाये. गाड़ी हीरा हलवाई की तरफ़ मोड़ दी गयी. दही-जलेबी थी, समोसा था, चटनी थी, लेकिन चाय न थी. बगल में एक चाय की दुकान हुआ करती थी. सुबह की वजह शायद खुली न थी. टहलने के बाद लोग समोसा-जलेबी खा भी लें लेकिन चाय भला कौन पीता है. 

अगला पड़ाव मनु के यहाँ था. कुछ व्यक्तिगत काम था. अब सुबह-सवेरे पौने आठ बजे किसी के घर बिना बताये पहुँच जाओगे तो वो नहाता-धोता ही मिलेगा. आधे घण्टे बाद जब वो बाहर आया तो कहीं जाने के लिये तैयार दिख रहा था. भैया आपका काग़ज़ मेज पर ही रखा हुआ है. आज आपको समय नहीं दे पा रहा हूँ. बेटी का इम्तहान है, उसे लेकर सेंटर जाना है. साथ बेटी भी थी.

वहाँ से निकल कर अपने घर आ गया. जब तक मम्मी-पापा थे, हर महीने दो महीने पर ख़ुद आने की ज़िद कर लेते थे या मुझे धक्का लगा कर भेज देते थे. उनके बाद ये धक्का मुझे ख़ुद को लगाना पड़ता था. इस बार चार महीने से उपर हो चुके थे. मित्र धरम पा जी का विदेश से आगमन न हुआ होता तो शायद ये विज़िट भी टल जाता. उनसे फिर भी मुलाकात उनके भारत आगमन पर किसी न किसी रूप में हो जाया करती थी. उनकी माता जी से मिले अरसा हो गया था. उनसे मिलने की इच्छा इस बार बलवती थी. जो इलाहाबाद खींच लायी. उनके यहाँ बाबा सत्य नारायण की कथा का आयोजन भी था. सोचा घर साफ़-सफ़ाई कर के, दो अभिन्न मित्रों से मिलते हुये जमुनापार धरम पा जी के घर चला जायेगा. तब तक कथा भी समाप्त हो चुकी होगी. प्रसाद लेकर एलआईसी कॉलोनी में मौसी जी का भी आशीर्वाद प्राप्त करता हुआ वापस निकल लूँगा. 

घर महीनों से बन्द था. साफ़-सफ़ाई में दो घण्टे लग गये. तब चाय की याद आयी. घर पर बेसिक कुकिंग की सारी सुविधायें हैं. चाय का रेडी मिक्स भी पिछले विज़िट में रख गया था. इंडक्शन पर पानी चढ़ा दिया. बड़े कॉफ़ी मग में में पूरा सैशे पलट दिया. सोचा अब सुकून से सिप ले ले कर, आराम से बैठ कर, चाय पियूँगा. चाय पीना एक क्रिया है. इसे निपटाना नहीं होता. रेडी मिक्स में पानी डालते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो गया. डिब्बे पर देखा तो चाय अपनी एक्सपायरी पूरी कर चुकी थी. 

अब पवन या शिशिर के यहाँ चाय की टेस्टिंग होनी थी. फोन पर पवन को लेते हुये शिशिर के यहाँ जाने का प्रोग्राम बना. पवन के यहाँ ज़्यादा बैठने कोई इरादा नहीं था. फिर भी भाभी जी ने चाय के लिये आग्रह किया. समयाभाव के कारण हमने शिशिर के यहाँ चलने का निर्णय ले लिया. चलते-चलते भी भाभी जी ने सप्रेम फ़्रिज से निकाल कर चिल्ड लाहौरी जीरा की बोतल पकड़ा दी. शिशिर के यहाँ हम तीनों ने पूरे दो घण्टे नये-पुराने किस्से बुने. एनी बेसेंट स्कूल का नौसटैलजिया ऐसा है कि घण्टों गुज़र जायें और समय कम पड़ जाये. आवभगत के मामले में भाभी जी का जवाब नहीं. क्या-क्या नहीं खिलाया. पर पीने के मामले में बोलीं - गर्मी बहुत पड़ रही है इसलिये माज़ा ला रही हूँ. उनके स्नेह के आगे चाय की फ़र्माइश करने की इच्छा न हुयी. मेरा प्रयोग भी अभी ख़त्म नहीं हुआ था. 

धरम पा जी के यहाँ पहुँचते-पहुँचते तीन-साढ़े-तीन हो चुके थे. तीसरा अध्याय समाप्ति की ओर अग्रसर था. पा जी भाव विभोर से कथावाचक की वचनवक्रता के मुरीद हुये जा रहे थे. जजमान विदेश से आया था इसलिये पंडित जी भी उन्हें पूरी तरह छाप लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. शायद जजमान उनकी विद्वता देख अमरिका बुला ले. आरती-भजन ख़त्म होते-होते समय साढ़े चार के आस-पास पहुँच गया. चरणामृत-प्रसाद ग्रहण करते-करते घड़ी की सुई पाँच पार कर चुकी थी. अभी मौसी से मिलना था और वापस कानपुर भी निकलना था. संयोग से पा जी को भी कहीं एपॉइंटमेंट के लिये देर हो रही थी. चाची जी का चरण स्पर्श करके हम शीघ्र ही धरम पा के साथ उनको उनके गंतव्य पर छोड़ने के लिये निकल पड़े. 

मौसी के यहाँ बचपन से अब तक शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मातृतुल्य मौसी जी ने अपने हाथों से कुछ बना के न खिलाया हो. अब उम्र के इस पड़ाव पर वो वॉकर के सहारे चलने को विवश हैं. वहाँ चाय की इच्छा न थी, बस मौसी से मिलना और उनका आशीर्वाद लेना ही प्रयोजन था. देर पहले ही हो रखी थी. किन्तु तुरन्त उठना भी सही न लगा. इतने दिनों बाद तो आना हुआ था. बेटा-बहू, बच्चों के पास गये हुये थे, इसलिये छोटी बहन उनकी देख भाल को आयी हुयी थी. उसे मालूम था कि दादा चाय को ना नहीं कहते. बोली - दादा आप मम्मी के पास बैठिये, मै चाय बना कर लाती हूँ. मैंने कहा - देखो पहले ही बहुत देर हो चुकी है. कल ऑफ़िस भी है. वापस कानपुर घर पहुँचते-पहुँचते देर हो जायेगी. मन ही मन मुझे डर था कि कहीं ये मेरी बात मान न जाये. शायद उसने मेरे मन को भाँप लिया. वो मुस्कुराई - आप और चाय के लिये मना. बैठिये मै तुरन्त लाती हूँ.  चाय के साथ वो कुछ स्नैक्स भी ले आयी. जिसके लिये मैंने मना कर दिया. शुद्ध खालिस चाय का जो स्वाद था, उसे खराब करने का मेरा कोई इरादा न था. 

लौटते समय 'मोहन पेड़ा' खुला था. हमेशा की तरह कारों का हुजूम खड़ा था. जगमोहन को घर पहुँचने की जल्दी थी. हमारे ख़स्ते-चाय के चक्कर में उसे देर हो जाती. ग्यारह बजे घर पहुँचने के बाद नहा-धो कर कुछ खाने का विचार नहीं आया. श्रीमती जी से बोला - एक कप चाय मिलेगी क्या, कड़क एकदम कड़क.

सवेरे पौने पाँच बजे बाहर से अख़बार और चाय लेकर कार्डियोलॉजी में पिता जी की बेड पर पहुँचा. रात बारह बजे थोड़ी अनइज़ीनेस लगने के कारण पड़ोसी डॉक्टर की सलाह पर पापा को लेकर कार्डियोलॉजी आना पड़ा. बयासी साल की उम्र में पिता जी ने शायद पहली और आख़िरी बार चाय को ना कहा था.

-वाणभट्ट

शनिवार, 9 मई 2026

शुक्रवार, 8 मई 2026

सिक प्लॉट

खेत ख़राब हो गया था. बल्कि ये कहना अधिक उचित होगा कि खेत को जान बूझ के ख़राब किया गया था, विषाणुओं द्वारा. इन सिक प्लाट में फसलों की प्रजातियों की स्क्रीनिंग होती है. जो प्रजाति सिक प्लाट में जी गयी, अमूमन मान लिया जाता है कि उस प्रजाति पर बीमारी का असर नहीं होगा. यहाँ पर ये देखना मुख्य मक़सद है कि कौन-कौन सी वेरायटीज़ फेल हुयी, कौन सी पास. प्रजातियों के चयन का एक टाइम टेस्टेड फ़ॉर्मूला है. रेस में सबको दौड़ा दो, जो जीत गया, वो जीत गया, जो हार गया, वो कहाँ गया. कौन जाने. जो रेस में शामिल नहीं हुये, उन्हें खोजो और खोज के सिक प्लाट में लगाओ. उन्हीं में कहीं प्रतिरोधकता मिल सकती है. गोया मुद्दा है कि-

अब हवायें ही करेंगी रौशनी  का फैसला

जिस दिये में जान होगी वो दिया बच जायेगा - मशहर बदायुँनी  

अब जब दिये को झोंक ही दिया तूफ़ान में, तो बेचारा ऊपर वाले के रहम-ओ-करम से ही बचेगा. बहुत से काम बस इसलिये किये जाते हैं कि हमसे पहले जितने भी विद्वान हुये, उन्हीं के बनाये रास्तों का अनुसरण सफलता की गारेंटी है. लीक से हट कर भला सोचने का न किसी के पास समय है, न माद्दा. पेड़-पौधे अपनी जगह तो छोड़ नहीं सकते. लड़ते तो वो भी होंगे, आखिरी साँस तक सर्वाइवल के लिये कि दो-चार बीज ही बन जायें. उनका वंश तो आगे बढ़ सके. जो प्रजातियाँ फेल हो गयीं, वो भी कहीं न कहीं तो जी ही रही होंगी. लोगों ने नाम मिटा भी दिया तो क्या. जीवन तो चलता रहता है. रेस हारने वाला हर व्यक्ति धरती नहीं छोड़ देता. ये बात शायद पेड़-पौधों पर भी लागू होती हो. 

शर्मा जी का चेहरा फ़क्र से चमक उठता, जब भी किसी को बताते कि उनके दोनों बच्चे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में कैसे पहुँचे. इसके पीछे मिसेज और मिस्टर शर्मा का बड़ा त्याग था. घर में पढ़ाई-लिखाई के माहौल का निर्माण तो माँ-बाप को ही करना होता है. जब तक बच्चों का सेलेक्शन नहीं हो गया, घर में टीवी नहीं आया. तब नेट और मोबाईल का जमाना नहीं था. मनोरंजन के नाम पर रेडियो पर विविध भारती और सीलोन के अलावा कुछ न था. टीवी नया-नया आया था. दस किलोमीटर रेन्ज के टावर्स लगने शुरू हुये थे. जल्द ही टीवी का आकर्षण रेडियो के उपर हावी होने लगा. चित्रहार और फिल्मों का क्रेज़ बढ़ गया. पूरे मोहल्ले ने टीवी ले लिया. बस शर्मा के घर में टीवी नहीं आया. ऐसा नहीं था कि वो अफोर्ड न कर सकते हों. अपने बच्चों को सांत्वना देते रहे कि एक बार सेलेक्ट हो जाओ, फिर ले लेंगे. बच्चों ने उन्हें निराश नहीं किया. लेकिन उनके घर टीवी तब आया जब बड़े बेटे ने जॉब जॉइन कर लिया. माँ-बाप के पास एक्सक्यूज़ था कि अब बच्चे बाहर हैं, तो हम लोग टीवी का क्या करेंगे. जल्द ही दूसरा बेटा भी ग्रेजुएशन कर के जॉब में लग गया. मल्टी-नेशनल कम्पनियाँ थीं. अच्छे पैकेज और पर्क्स थे. 

बच्चे तेज तो थे ही. शीघ्र ही उन्हें अंदाज़ लग गया कि ये कम्पनियाँ दरअसल सस्ते मानव श्रम के लिये भारत में अपने ऑफ़िस खोल लेती हैं. यहाँ की सैलरी और टीए-डीए के दाम में उन्हें विदेशों के प्रोजेक्टस् में काम कराती हैं. पेरेंट्स इसी में खुश की मेरा बेटा हवाई जहाज से यूरोप-अमरीका जा रहा है. वो भी कम्पनी के ख़र्चे पर. वहाँ जा कर उन्हें पता चला कि उसी काम के लिये वहाँ के लोगों की तनख्वाह उनकी सैलरी से दो गुनी और तीन गुनी है. यहाँ पर कम्पनी में मैनेजमेंट हावी था. प्राय: एमबीए किये लोग उच्च पदों पर काबिज़ थे. उनका काम, बड़ी-बड़ी प्लानिंग करना और वो काम दूसरों से करवाना होता है. यहाँ सबॉर्डिनेशन का तरीक़ा ही है हाँकने वाला. वो काम भी बताते, तो मानो आदेश दे रहे हों. इतना पढने-लिखने के बाद कभी-कभी बॉसों बद्तमीज़ी अखर जाती. वो ह्युमिलियेट करने का कोई भी मौका न छोड़ते. टीम में, टीम भावना की कमी बनाये रखना, मैनेजमेंट का गुर था. प्रोफ़ेशनल्स होने के बाद भी प्रमोशंस-इंक्रीमेंट में भाई-भतीजा वाद झलक ही जाता. अब तक वो कई बार कई विकसित देश भ्रमण कर चुके थे. विकसित देशों में वर्किंग एनवायरमेन्ट अलग था. मैनेजमेंट में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं था, कम से कम दिखता तो नहीं था. बाहरी होने के बाद भी सब मिल कर टीम में काम करते. यहाँ पर कई बार उनका सामना देश-समाज में व्याप्त मल्टी लेवल भ्रष्टाचार से भी हो चुका था. बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अन्तर को उन्होंने महसूस किया. इस वातावरण में, विशेषकर विदेश में देखने के बाद, कभी-कभी उन्हें घुटन होने लगती. लगता यही काम हम विकसित देशों में रह कर भी तो कर सकते हैं. उनके ज्ञान चक्षु खुलने लगे. ज्ञान-विज्ञान की कोई सीमा तो है नहीं. दोनों ने निर्णय लिया कि बाहर ही निकल लिया जाये. 

अपने देश में बच्चों को सेटेल करने की जिम्मेदारी भी पेरेंट्स की तब पूरी मानी जाती है, जब तक बच्चों का विवाह न हो जाये. अच्छी नौकरी हो तो शादी में अधिक दिक्कत नहीं होती. शादी करवा के शर्मा जी अभी बहू-बच्चों के सुख की कल्पना में डूबे ही थे, जब बच्चों ने अपना निर्णय सुना दिया. कारण पर्याप्त थे. बच्चों को उन्होंने पढ़ाया ही इसी लिये था कि खुले आसमान में अपनी उड़ान उड़ सकें. अपने लिये उन्हें रोकना, उन्हें उचित नहीं लगा. बुरा भी लगा कि बच्चों के पर निकल आये हैं, निर्णय से पहले पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा. बच्चों का तर्क था, कोई हमेशा के लिये थोड़ी न जा रहे हैं. जैसे बंगलोर, वैसे जर्मनी. जब आप चाहेंगे, हम आ जायेंगे. परिंदे घोसले से इस तरह अचानक उड़ जायेंगे, ऐसा शर्मा जी ने न सोचा था. बच्चे अपना भला-बुरा समझते हैं, ये सोच कर उन्हें संतोष करना पड़ा. 

जिन बच्चों के कारण जो माँ-बाप कभी मोहल्ले वालों की ईर्ष्या के पात्र थे, वही माँ-बाप देश में अकेले रह गये. जितने लोग उतनी बातें. देखो बुढ़ापे में पेरेंट्स को भला कौन छोड़ के जाता है. देश-प्रेम भी कुछ होता है. भाई सेवा ही करनी है तो अपने देश की करो. फ़िरंगी तो अभी भी हमें ग़ुलाम ही समझते हैं. दोयम दर्ज़े का व्यवहार होता है. कभी बच्चों को इतना न पढ़ाओ कि आपके ही काम न आ सकें. इससे अच्छा तो मेरा बेटा है, नौकरी नहीं लगी तो क्या, कम से कम साथ तो रहता है. शर्मा जी को बच्चों के जाने का उतना ग़म नहीं था, जितना पास-पड़ोस-रिश्तेदारों के तानों का था. वो सबसे कटने लगे. अन्दर ही अन्दर कुछ टूट सा गया था. अँग्रेजी में चिकित्सा शास्त्र पढ़े डॉक्टर्स ने उनकी समस्या को मानसिक बीमारी, डिप्रेशन मान लिया. मॉडर्न मेडिकल साइंस में हर मर्ज़ का शर्तिया इलाज है. उस ज्ञान का अर्जन डॉक्टर्स नें वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किया है. आयुर्वेद-योग-ध्यान को टोटका-टोना मानने वालों के तरकश में दवाईयों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है. शर्मा जी को डिप्रेशन से बचाने वाली दवाइयों की डोज़ जैसे-जैसे बढ़ती गयी, उनका मर्ज़ बढ़ता गया. 

मरीज-ए-इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की

मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की - शाद लखनवी 

जिस देश की खासियत है कि लोग दूसरे के दुःख से कम, सुख से अधिक दुःखी होते हों, वहाँ मिसेज और मिस्टर शर्मा अपने बच्चों की सफलता को ठीक से सेलिब्रेट भी नहीं कर पाये. कभी-कभी शर्मा जी लगता कि वो जीत के भी बाज़ी हार गये. हार नहीं मानी थी, तो मिसेज शर्मा ने. वो शर्मा की छोटे बच्चे की तरह देख-सम्हाल करतीं. 

दो-तीन साल बीत गये जब बच्चों को माँ ने पिता के डीप डिप्रेशन के बारे में बताया. वहाँ के व्यवस्थित जीवन में बच्चों के परिवार को रास आ गया था. इसलिये वापस लौटने का प्रश्न न था. बच्चे लायक थे ही. विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में सफल भी थे. अब तक ठीक से इस्टैब्लिश हो चुके थे. उन्होंने पापा-मम्मी को अपने पास बुलाने का निश्चय किया. जिनके बच्चे वहाँ हों, वो अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप को भी ला सकते थे. वहाँ नियमों में ऐसा भी प्रावधान है. उनके देश के लिये काम करने वाले एक्सपीरियेन्सड व्यक्ति को रोकने के संभावनायें तलाश ली जाती हैं. बच्चों और बच्चों के बच्चों के साथ शर्मा का डिप्रेशन छूमंतर हो गया. स्वस्थ लाइफ़ स्टाइल और दिनचर्या के कारण शर्मा की सभी दवायें जल्द बन्द हो गयीं. शर्मा परिवार अब सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एक सफल परिवार था. वहाँ की आबो-हवा उन्हें भा गयी. कभी कभार वो पास-पड़ोस-रिश्तेदारों को वीडियो फोन कर लिया करते. उनके खुशी से दमकते चेहरों को देख इष्ट-मित्रों के चेहरे मुरझा जाते. अब वो एक खुशहाल जीवन जी रहे थे. 

हवा में प्रदूषण कम. एक्यूआई 2-4 के बीच. हरियाली हर तरफ़. टैक्स ज़्यादा पर भ्रष्टाचार कम. इसलिये जनता को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सरकारी सुविधाओं पर भी भरोसा था. शिक्षा लगभग फ़्री. सीनियर सिटिज़न्स को थीं, एडिशनल सुविधायें, वो भी मुफ़्त. शर्मा ने बच्चों के पास वहीं सेटेल होने का निश्चय कर लिया. मिसेज शर्मा भी वो दिन भूल न पायी थीं, कैसे तमाम करीबी पास-पड़ोस-नाते-रिश्तेदारों के रहते हुये भी वो अपने देश, अपने शहर में अकेले रह गये थे. यहाँ सोशल सेक्योरिटी अधिक थी. विकसित, और पचास से अधिक सालों से सतत विकासशील, देश में बड़ा अन्तर है. वहाँ आदमी की वैल्यू थी. कोई जानता हो या न जानता हो, मिलेगा तो आत्मीयता से. मैनर्स, सॉरी-थैंक यू-एक्यूज़ मी, उनको बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है. हमारे यहाँ तो एरोगेंस को स्मार्टनेस का पर्याय मान लिया गया है. जो जितना सक्षम है, उतना ही बदतमीज़. ऊँची- ऊँची बिल्डिंग्स, मॉल्स और मेट्रो से देश नहीं बनता. देश बनता है लोगों से. उनकी शिक्षा व्यवस्था से. वाह्य भौतिक प्रगति जिसे दुनिया देखती है, उस वातावरण का उप-उत्पाद है. शीघ्र ही मिसेज और मिस्टर शर्मा वहाँ रम गये. आखिरी बार वो आये तो अपनी सारी चल-अचल सम्पत्ति डिस्पोज़ करने के लिये आये.  

दस-पन्द्रह दिन के प्रवास में उनका प्रयास था, रिश्तेदारों-पास-पड़ोस से मिल लिया जाये. पता नहीं फिर आना हो, न हो. मेरा उनसे परिचय बस आते-जाते सामने पड़ जाने पर दुआ-सलाम तक ही सीमित था. पता चला कि वो हमेशा के लिये इंडिया छोड़ के जा रहे हैं, तो मेरी जिज्ञासा बलवती हो गयी, ये जानने के लिये कि इस उम्र में कैसे कोई अपना देश छोड़, विदेश में बसने की सोच सकता है. मेरे शाम की चाय के इन्वीटेशन को उन्होंने स्वीकार कर लिया. 

वो शाम को आये. उनके साथ थीं, बच्चों के लिये चॉकलेट्स, हम लोगों के लिये कुछ गिफ्ट्स, और हमें दिखाने के लिये उनकी फ़ोटो एल्बम. चाय पीने के बाद उन्होंने अपनी एल्बम दिखानी शुरू कर दी. साफ़-सुथरे शहर, वेल मेंटेण्ड पार्क्स, नियंत्रित ट्रैफ़िक, मॉल और अस्पताल, सब अद्भुत, सब वर्ल्ड क्लास. हम भारतीयों को सम्वेदना देने की ग़ज़ब बीमारी है. मैंने उनकी दुखती रग कुरेदने की कोशिश की. 'अपने जन्म स्थल से इतनी दूर जा के रहना, वो भी उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ अजीब नहीं है'. दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराये. बोले 'जाना कौन चाहता है, अपना घर, अपना देश छोड़ कर. लेकिन बुज़ुर्गों का जीवन यहाँ कठिन है, विशेषकर जब बच्चे साथ न हों. बच्चों को भी लगता है उन्हें उचित वातावरण नहीं मिला, जिसमें उनकी प्रतिभा को चुनौती मिले. उन्हें लगता कि बाहर उनके काम की अधिक कद्र है, वो ग्रो कर सकते हैं. प्रतिष्ठित कॉलेजों में पढ़ने के बाद भी मेरे बच्चे आय के मामले में भ्रष्ट विभागों के अपने दोस्तों से कहीं पीछे थे. वहाँ वो अच्छा कर रहे हैं. संतुष्ट हैं. सब सुविधायें सबके लिये, और सुविधाओं के लिये किसी प्रकार का संघर्ष नहीं है. यहाँ तो अनार कम और बीमार अधिक हैं. जीवन क्या होता है, वहाँ जा के हमने जाना. कोई आपा धापी नहीं, कोई होड़ नहीं. जीवन में जितना जीवन है, बस उसी को जीना है. अब बच्चे तो आने से रहे. हमारा भी मन लग गया है. तरक्की की होड़ में हमने इंसानियत को तिलांजलि दे दी. शिक्षित लोगों में भी देश-समाज के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना का अभाव है. वहाँ जा के पता लगता है कि वो क्यों विकसित हैं और हम क्यों विकासशील. आप ऐसा वातावरण बनाइये जिसमें लोग फलें-फूलें, आगे बढ़ें. अच्छे लोग जब आगे जाते हैं तो वो देश-समाज को कुछ दे कर ही जाते हैं. इस तरह समाज का विकास होता है. 'सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट' और 'माइट इज़ राइट' का नियम जंगल का कानून हो सकता है, किसी सभ्य समाज का नहीं. सब रेस में लगे हैं, अपने ही पास-पड़ोस-साथी-रिश्तेदारों से आगे निकलने के लिये. देश को अगर विकसित बनना है तो वातावरण बनाना होगा. देश का आधार सुदृढ़ करने के लिये, बच्चों पर, शिक्षा पर निवेश करना होगा. उन्हें सिर्फ़ मैनर्स सिखाना होगा, उन्हें शिक्षा का उद्देश्य सिखाना होगा. शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. 25 साल बाद जो भारत बनेगा, वो सही मायनों में विकसित होगा. जब तक ये बात समझ नहीं आती, लोग इमारतों-मेट्रो और सड़कों विकास मान कर उसी में ही उलझे रहेंगे. ब्रेन ड्रेन न हो इसके लिये, स्कूल से रोजगार तक, एक समन्वित योजना बनानी होगी. ताकि बच्चों को इन्वेंशन और इनोवेशन के लिये प्रोत्साहन मिले'. चन्द घण्टों में उनका पूरा जीवन चरित हमारे सामने था. उनके मन में कहीं ये मलाल ज़रूर था, कि यहाँ सब ठीक होता तो हमें और हमारे बच्चों को बाहर जाने की क्या ज़रूरत थी.

मेरी आँखों के सामने सिक प्लॉट घूम रहा था. प्रजातियों की स्क्रीनिंग के लिये मृदा में विषाणुओं को विकसित किया है ताकि ये चेक किया जा सके कि कौन सी प्रजाति जीवित बचती है. जैसे हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, पेड़-पौधों में भी होगी. एक अवगुण के कारण बाकी सारे गुण समाप्त तो नहीं हो जाते. उसी तरह पेड़ पौधों को भी उनके गुण के आधार पर सेलेक्ट किया जाना चाहिये. स्वस्थ मृदा के खेत में सम्भव है, उसके अन्य गुण निखर के सामने आते. सिर्फ़ उत्पादन और उत्पादकता की रेस में शायद हम खोते जा रहे हैं, उन प्रजातियों को, जिनका चयन स्वाद, गंध, आकार, रंग, व्यन्जन विधि आदि कितने ही गुणों के लिये किया जा सकता था. स्वस्थ मृदा और वातावरण में गुण आधारित स्क्रीनिंग करने की आवश्यकता है. ये कुछ वैसा ही है कि भ्रष्ट और बेईमान समाज में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का फ़ेल हो जाना. दुराग्रही लोगों के बाहुल्य ने पूरे देश को ही सिक प्लॉट बना दिया है. सीधे और शरीफ़ लोग सर्वाईवल मोड में चले जाते हैं. अपने को समाज के हिसाब से फ़िट रखने के प्रयास में लगे रहना, उनके लिये बड़ी चुनौती है. सड़क, बिजली, मेट्रो, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स आदि भौतिक तरक्की की बानगी तो दिखाते हैं, किन्तु गिरते नैतिक मूल्यों और सभ्यता विहीन समाज, निकट भविष्य में हमारे विकसित राष्ट्र के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं. व्यक्तिगत समृद्धि तो हो रही है, किन्तु एक देश, एक समाज के रूप में कभी-कभी लगता है, हम पिछड़ते जा रहे हैं. जिनमें क्षमता-योग्यता होगी, वो सही वातावरण की तलाश में लगा रहेगा. इसलिये जिसको मौका मिल रहा है वो पलायन कर जाता है. चाहे गाँव से शहर की ओर, चाहे शहर से मेट्रो सिटी की ओर, और चाहे मेट्रो सिटी से विदेश की ओर. जिस व्यक्ति के लिये यहाँ सर्वाइव करने के लाले पड़े थे, वही विदेश में झंडे गाड़ रहा है. 

आदमी और पेड़, दोनों में जीवन है. अन्तर बस इतना है, पेड़ स्थिर है, जड़ है, जमीन के बिना उसका अस्तित्व नहीं है. वो अपनी जगह, अपना वातावरण नहीं बदल सकता, आदमी बदल सकता है. आदमी भी जब एक जगह रुक जाता है, तो कुछ-कुछ पेड़ बन जाता है. उसी जमीन, उसी वातावरण में रहना उसकी बाध्यता बन जाती है. 

- वाणभट्ट

मंगलवार, 5 मई 2026

तीसरी आँख

हमारे देश की एक खासियत है. हर व्यक्ति अपने अपने दृष्टिकोण से सही है. और एक खासियत है कि अगर हम गलत हों भी तो मान क्यों लें. अगर आवाज़ में दम है और पीछे से किसी महापुरुष का बैकअप है, तो आप कुछ भी कीजिये, कोई आप का बाल भी बाँका नहीं कर सकता. निरीह वो व्यक्ति है, जिसको संशय है. उसकी बात में वो कॉन्फिडेंस नहीं आता, जितना संशयरहित व्यक्ति की बातों में रहता है. 'मोर स्टडी, मोर कंफ्यूज़न, नो स्टडी नो कंफ्यूज़न' का सिद्धांत जिसने भी प्रतिपादित किया होगा, गहन अनुभव के बाद ही किया होगा. बातों के बताशे फोड़ने वाले, हथेली पर सरसों उगा दें. 

कॉन्फिडेंस की कमी भारत की एक मूल बीमारी है. यहाँ पैदा होने से मरने तक सब अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिये दूसरे का कॉन्फिडेंस तोड़ने में लगे रहते हैं. घर में बाप को और स्कूल में टीचर को सब बच्चे नाकारा लगते हैं, यदि आप टॉप थ्री में रैंक नहीं करते. टॉप टेन तक भी बच्चों को फ़्रंट रो मिल जाती थी. बाकी के कॉन्फिडेंस को तोड़ने में टीचर-माँ-बाप कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ते. पिछली सीट पर बैठने वाले भी कॉन्फ़िडेंट बच्चे होते थे. उन्हें मालूम था कि कब और कितना पढ़ना है. ये न टीचर के हत्थे चढ़े, ना पेरेंट्स के. इनके कॉन्फ़िडेस को ठेस लगाने में कोई कामयाब न हो सका. ये ही वो लोग थे, जो दूसरे के कॉन्फ़िडेस की ऐसी-तैसी करने में लगे रहते. 

जिनमें कॉन्फ़िडेस का बाहुल्य था, उन्हें किसी गुरु, किसी भगवान की ज़रूरत न थी. जिनके पास कमी थी, उन्हीं के लिये आकाश के ऊपर किसी सुपर पावर की परिकल्पना की गयी होगी. स्वर्ग-नर्क और पुनर्जन्म का कांसेप्ट भी उन्हीं के लिये खोजा गया होगा. जिनका ये फण्डा क्लियर हो गया कि इस जीवन के पहले और बाद कोई जीवन नहीं है, तो समझ लीजिये उसे किसी देवी-देवता की ज़रूरत नहीं है. वो कर्म के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. लेकिन प्रायः तभी तक जब तक उसका सामना असफलता से नहीं होता. सफलता और असफलता में बस इतना ही अन्तर है कि जब तक आदमी सफल हो रहा होता है, सारा श्रेय स्वयं के कर्म और मेहनत को देता है, और असफल होते ही उसका ठीकरा प्रभु की मर्ज़ी पर फोड़ देता है. प्रभु को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप उसे मानते हैं या नहीं. उसकी प्रेम की कृपा-वृष्टि सबके उपर समान रूप से बरसती रहती है. उसे महसूस करने के लिये आपको दिव्य-दृष्टि चाहिये. 

कभी कभी व्यक्ति अपने घमंड में अपनी औकात से ज़्यादा पंगे ले लेता है. तो उपर वाला अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने के लिये बिना आवाज़ की लाठी का प्रयोग कर लेता है. जिन देशों में नियम-कानून का राज है, वहाँ भगवान को जल्दी कोई याद नहीं करता. लेकिन जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उन्हें भी भगवान की ज़रूरत पड़ ही जाती है. विकसित सुविधा संपन्न देशों में कोई कारण नहीं है कि कोई भगवान को याद करे और याद करे भी तो क्यों. लेकिन द्वैत जीवन का हिस्सा है. सफलता है तो कहीं बगल में असफलता इंतज़ार कर रही होगी. सुख है तो दुःख भी आ सकता है. इसका उल्टा भी होता है. सुख-दुःख, सफलता-असफलता का कॉम्बो पैक है. जीवन, उतार-चढ़ाव का नाम है. निश्चय ही सरल रेखा तो नहीं होता. ईसीजी की सीधी लाइन कौन देखना चाहता है. 

सुमेरु पर्वत पर विश्व विजेताओं के नाम लिखने के लिये जगह ही नहीं है. हर सौ साल में हज़ार-पाँच सौ के नाम लिख जाते हैं. सिकन्दर जब विश्व विजय करके सुमेरु पर्वत पर नाम लिखवाने की गरज से पहुँचा, तो दरबान ने बिना इंप्रेस हुये उसे एक चॉक थमा दी और कहा जाओ जा के अपना नाम लिख आओ. थोड़ी देर बाद सिकन्दर परप्लेक्स मूड में बाहर आया और दरबान से बोला कहाँ लिखूँ, वहाँ कोई कोना भी खाली नहीं है. दरबान आराम से बोला - जाओ कोई भी नाम मिटा के अपना लिख लो. बताने वाले बताते हैं कि सिकन्दर को उसी पल ब्रह्म ज्ञान मिल गया और वो बिना नाम लिखे लौट आया. 

हमारे यहाँ, जहाँ प्राय: माइट को ही राइट समझ लिया जाता है, तो मानसिक सुकून के लिये दो-चार भगवान (बाप) तो नीचे ही बनाने पड़ जाते हैं. अगर नहीं बना पाये, तो ये समझ लीजिये, देर-सवेर आपको असली बाप (भगवान) की ज़रूरत पड़ने वाली है. 

जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों, 

मै नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों. 

तब शर्मा नया रंगरूट था. उसे लगता था दुनिया पलट देगा. सो जहाँ जाता एक न एक बखेड़ा कर आता. आज़ादी के सत्तर सालों में एक सिस्टम बना है, लोग उसमें फ़िट होने में लगे हैं, और भाई सुधार करने लग जाते. तब तक तो फिर भी ठीक था जब तक बाहरी विभागों से भिड़ते रहे. अपने विभाग में पंगा नहीं लेना था. सिनियर्स ने समझाया. खामख्वाह रगड़ दिये जाओगे. क्रांतिकारी विचारधारा वाले अगर समझाने से समझ जाते तो हम अभी भी क्वीन विक्टोरिया के सामने सजदा कर रहे होते. किसी भी सिस्टम के उत्थान में तमाम अनाम लोगों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है, जिन्होंने नक्कारखाने में तूती की आवाज़ को मरने नहीं दिया. अपने त्याग का लाभ उन्हें भले न मिला हो, लेकिन अगली पीढ़ियों ने उनका लाभ उठाया. नयी पीढ़ी को उन अंजान लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, जिनके नाम सिस्टम की मेमो फ़ाइलों में आज भी कहीं दफ़्न पड़े होंगे. 

लड़ने-भिड़ने की भी एक उम्र होती है. शर्मा को भी उम्र से मात मिलनी ही थी. समाज सुधार के लिये लड़ने वाले ने हथियार डाल दिये और आत्म सुधार के मार्ग पर चल दिया. वैसे भी हमारे यहाँ कहा गया है - हारे को हरि नाम. और हरि भी बिना गुरु के तो मिलते नहीं. सो शर्मा जी ने एक गुरु खोज निकाला. गुरु ने गारेंटी ली कि इसी जन्म में ईश्वर से साक्षात्कार करवा देगा बशर्ते वो उनकी बताई विधि का पालन करे. इसके  लिये कोई कठिन विधि भी नहीं बतायी. आरम्भ एक जगह स्थिर बैठ के साँसों पर ध्यान लगाने से था, बस. थोड़ा अभ्यास करना पड़ता है. चलते-फिरते आदमी का एक जगह बैठना ही कठिन है लेकिन शर्मा को गुरु पर पूरा विश्वास था. वो जैसा कहते शर्मा उसको शब्दशः फॉलो करता. 

आँख बन्द करते ही उसका ध्यान लग जाता. साँसों की माला में लगातार हरि का नाम सुमिरता रहता. उसका अंतरज्ञान निरन्तर विकसित हो रहा था. सामने घट रहे घटनाक्रम के पीछे की पृष्ठभूमि भी उसके सामने होती. बिना प्रभावित हुये साक्षी भाव से दुनिया की माया को निर्लिप्त भाव से देखने की अपनी क्षमता पर उसे स्वयं आश्चर्य होता. शब्दों और पंक्तियों को ही नहीं पंक्तियों के बीच की भाषा भी वो समझ जाता. वो ये भी सोच लेता कि सामने वाला क्या सोच रहा है. वो ध्यानावस्था में बिना हिले-डुले घण्टों बैठा रहता. कभी-कभी उसे यकीन होने लगता, उसका तीसरा नेत्र जागृत हो रहा है. 

एक दिन किसी सामाजिक कार्यकलाप के लिये शहर के नामचीन होटल में जाना हुआ. बहुत दिनों बाद होटल के रिसेप्शन पर आदमक़द आईने से सामना हुआ था. उसका तीसरा नेत्र खुल चुका था. शर्ट के 5वें और 6वें बटन के मध्य.

-वाणभट्ट

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज न...