सभा भवन में छिहत्तर रंगरूट शोधकर्ता बैठे हुये थे. उनकी ट्रेनिंग का पहला दिन था और इंट्रोडक्शन चल रहा था. तभी मुख्य ट्रेनिंग अधिकारी ने हवा में एक प्रश्न उछाल दिया - ये बताइये आपमें से कितने छात्रों का पैशन था, कृषि क्षेत्र में शोध करने का. हँसती-मुस्कुराती सभा में सन्नाटा छा गया. केवल तीन हाथ ही उठे. ये एक सटीक आंकलन भी था कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों का मात्र 4 प्रतिशत छात्र ही शिक्षण या शोध से जुड़ना चाहता है.
ये लगभग 30 साल पुराना परिदृश्य है. साठ और सत्तर के दशक में जन्मे लोगों को भली-भाँती याद होगा कि तब कृषि की पढ़ाई वही लोग किया करते थे, जिन्हें स्वयं को ही नहीं, उनके पिता जी और पास-पड़ोस को भी ये विश्वास होता था कि बेटे से इन्टर में बायो या मैथ्स नहीं चलनी. तब पास-पड़ोस मोहल्ला वैसा नहीं था, जैसा अब होता है, इनडिफ़रेन्ट. सभी अतिशय कंसर्न्ड होते थे. किस-किस का बेटा हाईस्कूल या इंटर का बोर्ड दे रहा है, पूरे मोहल्ले को पता होता था. हाईस्कूल के अंकों के आधार पर निर्णय लिया जाता था कि लड़का साइंस पढ़ने लायक है भी या नहीं. लायक है तो मैथ्स के मार्क्स के आधार पर उसे पीसीएम पढ़ने या बायो के मार्क्स के हिसाब से उसे जेडबीसी पढ़ने की सलाह दी जाती थी. कला या वाणिज्य के क्षेत्र उसके बाद क्रमशः, दूसरी और तीसरी पसन्द हुआ करते थे. कृषि की तो कोई बात भी नहीं करता था. जिनके चाचे-मामे-ताये, कृषि क्षेत्र से किसी न किसी रूप में जुड़े थे, उन्हें ही मालूम था कि कृषि में रोजगार का क्या पोटेंशियल है. हर्डल रेस दो तरह की हो सकती है. एक - हर्डल के ऊपर से. उसके लिये आपको अधिक प्रयास करना होता है. दूसरी - हर्डल के नीचे से सर्राते हुये निकल जाओ. फिनिश पॉइंट पर देर-सबेर सब पहुँच ही जाते हैं. वहाँ सब बराबर हैं.
सरकारें समानता और बहुजन हिताय के सिद्धान्त को ध्यान में रख कर काम करती हैं. इसीलिये तो सभी डिग्री वाले एक ही तराजू में तौल दिये गये. उनकी नज़र में, इन्जीनियरिंग हो या मेडिकल, हिन्दी हो या तबला, सब बराबर. नतीजा ये हुआ कि नौकरी लगने के बाद क्या साइंस-क्या मैथ्स और क्या कला-क्या संगीत. सब एक समान. यहाँ किसी विषय की श्रेष्ठ्ता सिद्ध करने का इरादा नहीं है. लेकिन हॉबीज़ और विषयों में कुछ फ़र्क किया जा सकता है. कुछ लोग स्नातक लेने में ही रगड़ जाते हैं, कुछ हँसते-खेलते ग्रेजुएट हो जाते. उन्हें मिडनाईट ऑयल बर्निंग का पता ही नहीं. प्रशासनिक सेवाओं के लिये योग्यता स्नातक की ही थी और आज भी है. डिग्री के विषयों से कोई अन्तर नहीं पड़ता. किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन्जीनियरिंग के छात्र भी आर्ट्स के विषय लेकर एग्जाम लिखते हैं, और सफल भी होते हैं. प्रशासनिक सेवा के माध्यम से देश सेवा का अरमान भी ग्रेजुएशन करते-करते जगता था. वहाँ सब धान बाईस पसेरी. बीए पास जब प्रशासन में आता है तो उसका साइंस के प्रति जो कॉम्प्लेक्स, हाईस्कूल-इन्टर से बना था, उसकी कसर वो इन्जीनियर और डॉक्टर से जरुर निकालता है. अब उसका काम, काम करना नहीं करवाना है. और जो काम करेगा, उसके काम और उसमें कमी निकालना, काम करने से कहीं आसान है.
शोध और शिक्षण सेवाओं में भी जो लोग आते हैं, उन्हें प्राय: पता नहीं होता कि पीएचडी कर क्यों रहे हैं. एक भाई ने तो सेब की जगह केला लिख कर पूरी थीसिस जमा कर दी. एग्ज़ामिनर शरीफ़ था, उसने जहाँ-जहाँ सेब रह गया था वहाँ-वहाँ करेक्शन्स करवाके डिग्री दिलवा दी. बच्चे हैं, गल्तियाँ बच्चों से ही होती हैं. जब तक प्रशानिक सेवा के अटेम्प्ट बचे रहते हैं, तब तक युनिवर्सिटी के हॉस्टल एक आश्रय का काम करते हैं. और पिता जी से भी सिविल की तैयारी के नाम पर पैसे माँगने में संकोच कम होता है. तीन के अलावा जो तिहत्तर लोग थे, उन सब के अटेम्प्ट या तो ख़त्म हो चुके थे या ख़त्म होने वाले थे. उसके पहले ही शोध का एग्जाम क्रैक कर लिया था. एक अदद नौकरी की दरकार तो सबको होती है. जब तक नीली बत्ती न मिले तब तक कुछ तो करना ही है. पोस्टिंग होने के बाद उनमें से कई ने हार नहीं मानी. अपने-अपने शहर का आईएएस स्टडी सर्कल ज्वाइन कर लिया. कोचिंग के लिये अर्जित और चिकित्सा अवकाश ले कर, जीएस के लिये दिल्ली में भी डेरा डाल आते. जब तक अटेम्प्ट बचे रहते, वो आईएएस की तरह ही बिहेव करते. आदत पहले से बनानी होती है. प्रीलिम्स और मेन्स तक जाने के कारण, साथी शोधकर्ताओं में भी उनकी हनक बनी रहती. जब यूपीएससी में बात न बनती तो टारगेट बदल कर यूपीपीएससी कर लिया जाता. तुर्रा ये कि देश की सेवा करेंगे तो प्रशासक बन कर ही. शोध का निरीह रुतबा विहीन जीवन, उनके बस की बात न थी. नौकरी हो तो जलवे वाली. कुछ ने सफलता अर्जित की. प्रॉपर और अलाइड सर्विसेस में उनका सेलेक्शन विभाग के लिये भी गर्व का विषय बना. रुतबे के चक्कर में, कुछ ने तहसीलदार पद को तरजीह देते हुये शोध मार्ग का परित्याग कर दिया. जो शोध में बने रह गये, उनके लिये शोध एक मज़बूरी था. कुछ ने पार्ट टाइम कोचिंग खोल ली, कुछ ने एकेडेमी बना ली, कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये क्वेश्चन बैंक बना डाले. जिनकी लह गयी, वो कोचिंग में लिप्त हो गये. जिनकी नहीं चली उनके दिल में प्रशासक बनने की इच्छा दबी की दबी रह गयी. जिसके अन्कुर हमेशा सीने में दफ़न रहे और पद मिलते ही प्रस्फुटित हो गये.
एक कहावत है पूत के पाँव पालने से ही दिखने शुरू हो जाते हैं. दसवीं-बारहवीं तक आते-आते शिक्षकों को भी अंदाज़ लग जाता है कि बच्चे के लिये मैथ्स सही होगी या बायो. लेकिन शायद ही कोई कृषि के बारे में सोचता हो. मैथ्स और बायो स्ट्रीम का बच्चा ख़ुद जब तक दो-एक प्रयास न कर ले, इन्जीनियरिंग और मेडिकल का सपना पाले बैठा रहता है. उसके बाद विकल्प बचता है, ग्रेजुएशन में बीएससी बायो या मैथ्स का. उन दिनों बायो ग्रुप के बच्चे जोलॉजी-बौटनी-केमिस्ट्री में बीएससी करना पसंद करते थे. मैथ्स वाले स्नातक में फ़िजिस्क-केमिस्ट्री-मैथ्स लेते थे. एग्रीकल्चर वही पढ़ने जाते थे, जिन्हें आभास रहता था कि बीएससी-जेडबीसी की प्योर साइंस, थ्योरेटिकल और टफ़ है. एग्रीकल्चर अप्प्लाईड क्षेत्र है, यहाँ थोड़ी साइंस और थोडा प्रयोग कर के साइंस में डिग्री मिल जाती है. जिनकी साइंस इन्टर तक अच्छी हुआ करती थी, वो इंजिनियर या डॉक्टर बन गये. उसके बाद भी जिसकी साइंस में रूचि थी, उन्होंने स्नातक में पीसीएम या जेडबीसी विषय चुने. जिनका साइंस से वास्ता सबसे कम था, उन्होंने कृषि का वरण किया. कम्पटीशन कोई भी हो, हमारे ग्रेडिंग सिस्टम की विशेषता है कि सबका वर्गीकरण कर देता है. कोई टॉप करेगा तो कोई लास्ट भी आयेगा. अब तो कृषि एक बहुत ही रोजगार परक विषय बन गया है, इसलिये कम्पटीशन बढ़ने से अच्छे बच्चे विज्ञान से अधिक कृषि को प्रेफरेंस दे रहे हैं. लेकिन तीस-चालीस साल पहले ये बात न थी. छिहत्तर में मात्र तीन की शोध में रूचि, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था.
जब आईएएस-पीसीएस के सभी अटेम्प्ट समाप्त हो गये तो साइंस करनी ही थी. नौकरी के इस चरण में सारा माया-मोह भंग हो चुका होता था. जब लगता, अब साइंस किये बिना गुजारा नहीं चलने वाला, तो साइंस भी कर लेते. पीएचडी तक तो यही किया. पीएचडी गुरु के प्रति अतीव श्रद्धा भाव रखने का बाइप्रोडक्ट है. नौकरी के इस दौर में ही साइंस का प्रादुर्भाव होना लाज़मी है. साइंस भी क्या थी, जो बीएससी-एमएससी-पीएचडी में किया था, करना वही था. इस शोध में कुछ ऐसी शाखायें हैं, जिनमें विशेष उपकरणों की आवश्यकता भी नहीं होती. हाथ झुलाते हुये आइये और साठ के बाद हाथ झुलाते हुये निकल लीजिये. बहुत तो अपने प्रमोशन के मद्दे नज़र जो कुछ लिखा पढ़ी की क़वायद की थी, वो यथावत अपने ऑफिस में छोड़ कर निकल गये. नये बच्चे समझ न पाते कि उस विरासत (कबाड़) का करें तो करें क्या. वो भी दस साल पहले किये गये कामों पर पुन: प्रोजेक्ट ऐसे बनाते जैसे अब तक किसी ने कुछ किया ही नहीं. पोस्ट साइंस की है तो तनख्वाह भी उसी बात की मिलनी थी. जहाँ तनख्वाह है, वहाँ प्रमोशन है. प्रमोशन है तो बॉस हैं. बॉस हैं तो चमचे हैं. चमचे हैं तो साइंस वही है, जो वो करें. कृषि की साइंस में आप चाहते कुछ हैं और होता कुछ है. बायलॉजिकल मटेरियल है. तमाम फैक्टर्स हैं - देश-काल-वातावरण-भूमि-जल-वर्षा हैं. कोई भी फैक्टर गड़बड़ाया तो नतीजा बदल सकता है. इसलिये अन्य साइंस की तरह, यहाँ प्रयोगों को दोहराना थोडा कठिन है. इसलिये कृषि साइंस में एक इन्हेरेन्ट फेक्सिबिलिटी है. चूँकि ये प्रायोगिक विषय भी है इसलिये फसल प्रबन्धन को आर्ट/कला भी माना जा सकता है.
अब जब आज़ादी के सत्तर साल बाद प्राकृतिक और आर्गेनिक खेती की बात होती है तो इन्हें लगता है कि अंग्रेज़ी में पढ़ा इनका सारा ज्ञान धराशायी न हो जाये, इसलिये कुछ गूढ़ विषय, बायो-टेक्नॉलजी, नैनो-टेक्नॉलजी, बायो-इंफोर्मेटिक्स आदि नये विषयों में प्रमुखता से निवेश किया जा रहा है. वैश्विक परिदृश्य में नवीन विषयों में निवेश और शोध आज की आवश्यकता भी है. समस्या ये है कि इनके अधिकान्श लक्ष्य काल्पनिक हैं. एक ऐसी सुपर रेस विकसित करने की परिकल्पना है, जिसमें रोग-कीट-जलवायु परिवर्तन-सूखा-जल भराव-पोषण आदि समस्त समस्याओं का स्थायी निदान हो जाये. सुपर ह्यूमन रेस की अवधारणा पर कई विज्ञान कथायें लिखी जा चुकी हैं और उन पर फिल्में भी बनी हैं. यदि प्रबन्धन मात्र से उत्पादन बढ़ भी गया तो उसमें साइंस क्या. भोजन का हव्वा दिखाये बिना फण्ड नहीं मिलता. ये बात अलग है कि रसायन आधारित खेती से उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन डॉक्टर्स के यहाँ भीड़ भी बढ़ी है. भूख से कम और खा-खा कर मरने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुयी है. कृषि शोध में प्रजातियों का विकास और विकास करने वालों का दर्जा सबसे ऊपर है. ये कृषि की सभी समस्याओं का निदान प्रजाति विकास में देखते हैं. जिस तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद और होम्योपैथी को हिकारत से देखता है, इनके लिये भी पारम्परिक बीजों द्वारा प्राकृतिक और जैविक खेती के लाभ को स्वीकार करना कठिन है. आज जब फिर मोटे आनाज और प्राकृतिक खेती की बात हो रही है, इन्हें लगता है इनके अंग्रेज़ी में पढ़े ज्ञान को चुनौती दी जा रही है. आज कृषि को एक समेकित-समावेशी विज्ञान की आवश्यकता है. जो मानव-मृदा-जल सभी के लिये सतत रूप से स्वस्थ और लाभकारी हो. ये तो तय है कि 10-12 हज़ार पहले खेती के आरम्भ से पहले भी पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिये पर्याप्त भोजन था. वो व्यवस्था टिकाऊ थी और पर्यावरण अनुकूल भी. हज़ार-दो हज़ार साल का अंग्रेज़ी में पढ़ा-पढ़ाया ज्ञान सस्टेनेबल होगा या नहीं, अब लोगों को शक़ होने लगा है. रासायनिक खादों, कीटनाशकों और खर-पतवारनाशी के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण, अविश्वास और विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं. विज्ञान सतत प्रवाहमान है. विभिन्न विषयों की संकीर्ण विचारधारा से विज्ञान का विकास सम्भव नहीं है.
और कुछ हो न हो, नौकरी में प्रमोशन का एक सटीक विज्ञान होता है. ठीक वैसे ही जैसे दो दुनी चार होता है. सीआर आउटस्टैंडिंग प्राप्त करने का सेट पैटर्न है. काम उतना जितना सीआर में लिखना हो. कोई कॉलम खाली नहीं रहना चाहिये. सो शोधकर्ता से कुछ भी करा लीजिये. कम से कम प्रमोशन के लिये, जितना करना हो उतना तो कर ही लेता है. प्रमोशन भी समय निर्धारित है. यदि आप का दृष्टिकोण सुधारवादी नहीं है, तो कोई माई का लाल नहीं है, जो प्रमोशन रोक ले. नतीजा पिरामिड उलट गया है, प्रोफ़ेसर अधिक और असिस्टेंट कम हो गये हैं. शोधकर्ता पूरा मैनेजर बन गया है. और मैनेजर कुछ भी मैनेज कर सकता है. वो शोध भी करता है, उसे छपवाता है, नेटवर्किंग करता है, मेला भी लगाता-लगवाता है, गाहे-बगाहे सेमिनार-सिम्पोजिया में शिरकत करके अपनी और अपने विषय की प्रासंगिकता बनाये रखता है, कभी-कभी बुद्धि मन्थन (ब्रेन स्टोर्मिंग) भी करवा देता है. वो हर वो काम करने को आतुर रहता है, जिसके लिये क्रेडिट मिल रहा हो. कभी-कभी तो दूसरों का क्रेडिट भी हड़पने से नहीं चूकता. ये पेटेन्ट की प्रथा इसीलिये बनायी गयी है, ताकि शोधकर्ता को उसका लाभ मिल सके. लेकिन चूँकि हर फ़ाइल नीचे से ऊपर तक जाती है, तो कुछ लोगों को इसलिये कृतार्थ करना पड़ता है कि फ़ाइल रुक ना जाये. यहाँ उनकी भूतकाल में की गयी प्रशासन की पढ़ाई काम आती है. येन-केन-प्रकारेण काम करवाना-निकलवाना नितान्त आवश्यक है. आज का शोध स्मार्ट शोध है. यदि आपका लक्ष्य प्रमोशन मात्र हो तो बिना स्मार्टनेस के भूल जाइये. शिक्षा और शोध कभी हॉबी हुआ करते थे, अब चूँकि शिक्षा और शोध नौकरी बन गये हैं तो नौकरी में प्रमोशन के जितने हथकंडे हैं, सब अपनाने पड़ते हैं. जिसमें सबसे पहली कड़ी है, बॉस. बाबा रहीम दास जी पहले ही बता गये थे -
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥
आप ने गलती से ये वहम पाल लिया कि साइंस करके आप कोई तोप मार लेंगे तो आप को ग़लतफ़हमी का इलाज कराना चाहिये, यदि उसका कोई इलाज हो, तो. बड़े-बड़े आये और बह गये. विनम्रता ज्ञानियों का लक्षण है. इसलिये शोधकर्ता को अतिशय विनम्र होना चाहिये. एरियर, टीए और मेडिकल बिल रुक जाये, तो भले लड़ लीजिये, लेकिन साइंस के लिये दुश्मनी मोल लेने की ज़रूरत नहीं है. जिनका बचपन से साइंस से ज़्यादा वास्ता न रहा हो, उनके हिस्से साइंस आयेगी तो वो साइंस को रॉकेट साइंस बना के मानेंगे. वैसा ही काम करेंगे, जिसे या तो आत्मा समझ सके या परमात्मा. अपने विषय की विशिष्टता में इतना डूबे रहते हैं कि दूसरे क्षेत्रों में क्या हो रहा है, इससे इनको कोई सरोकार नहीं रहता है. बीस साल फसल की ऊँचाई बढ़ाने में बर्बाद कर दिये. यदि इन्जीनियर को समस्या बतायी होती तो वो बताता कि कम्बाइन की कटर बार को नीचा करना पौधे को ऊँचा करने से अपेक्षाकृत आसान और सरल विकल्प था. नया करने के नाम पर कुछ लोग शैटरिंग रेजिस्टेंट प्रजाति बनाने की सोच रहे हैं, ताकि कटाई के समय शैटरिंग न हो. कोई ऐसी प्रजाति की खोज में लगा है जो कीटों के दांत खट्टे कर दे. इनोवेशन के नाम पर पुराने कामों को नये कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. रोग और कीट प्रतिरोधी बीजों के विकास से आसान, फसलों का प्रबंधन है. मृदा स्वास्थ्य के बिना खेती, सतत खेती नहीं बन सकती. जल और मृदा संरक्षण कृषि शोध का एक उपेक्षित पक्ष रहा है.
एकल दिशा में फंडिंग से कृषि शोध के अन्य आयाम संकुचित हो कर रह गये हैं. विशेष रूप से कृषि अभियांत्रिकी. सभी विद्यालयों- संस्थानों में कृषि के सभी विभाग मिल जायेंगे, बस अभियांत्रिकी नहीं मिलेगा. जबकि कृषि की लागत कम करने और उत्पादन का समुचित उपयोग करने में इस विधा का महती योगदान है. बस दिक़्क़त ये है कि अप्लाइड साइंस में कुछ भी ढँका-छिपा नहीं रहता, इसलिये ये साइंस जैसा नहीं लगता. चन्द्रयान की सफलता मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान की सफलता की चरम परिणति है. दोनों मिल के काम करें तो इसमें कोई शक़-शुबहा नहीं है कि कृषि को एक लाभकारी उद्यम बनाया जा सकता है. जैसा पहले कहा जा चुका है, साइंस को आत्मा-परमात्मा के बीच की चीज़ न बनाइये. कई बार बक्से के बाहर समस्या का समाधान होता है, किन्तु ये कर्मयोगी अपने विषय पर ही काम करते रहेंगे, चाहे किसी और ने समाधान निकाल लिया हो.
आज कृषि की 90 प्रतिशत समस्याओं को उचित फसल प्रबंधन और कृषि अभियांत्रिकी के द्वारा मैनेज किया जा सकता है. शोध बैकयार्ड में किया जाने वाला काम है, सामने तो तकनीक ही दिखती है. लेकिन शोध को हाईलाईट करने के चक्कर में शोधपत्रों को ज़रूरत से ज़्यादा तरजीह दे दी गयी. सब प्रबंधन के बजाय, समाधान पर लट्ठ लिये पिले पड़े हैं. समाधान के प्रयास पहले से होते चले आ रहे हैं. ये कभी ख़त्म नहीं होते, जीवन भले कम पड़ जाये. सिस्टम का सीधा सरल सपाट सिद्धांत है, काम ऐसे ही करते रहिये, जैसे सब करते रहे हों. सब तर गये आप भी तर जाइये. सिस्टम, सिस्टम से चलता है. इस के हिसाब से ख़ुद को ढालिये, इसके अनुसार सुधरने की तो गुन्जाइश है लेकिन सिस्टम सुधारने की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमोशन विज्ञान के रूल्स एकदम क्लियर रखिये. सबके दिन फिरते हैं, बस सब्र रखिये. तब तक पद न मिले, चुप मार के साइंस कीजिये. प्रशासन के गुण तो पहले से ही विद्यमान थे, पद पा कर वो पुष्पित और पल्लवित होंगे. जब आप ऊपर पहुँच जायेंगे, तब साइंस भी करवा लीजियेगा. अभी तो वही साइंस है, जो ऊपर वाला कहे. प्रमोशन विज्ञान में इस बात का बहुत महत्त्व है - बॉस इज़ आलवेज़ राईट.
जिन तीन लोगों ने हाथ उठाया था, वो कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, ये कोई नहीं जानता. लेकिन ये तो तय है कि बाकी तिहत्तर इतिहास लिख रहे होंगे और शोध में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे होंगे.
-वाणभट्ट
वैधानिक चेतावनी: इस लेख में उल्लिखित वृतान्तो का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है. चरित्र में किसी प्रकार का मेल संयोग मात्र है. ये लेख उनके लिये नहीं है जो साइंस में विज्ञान खोजने में सक्षम हैं. इस लेख का उद्देश्य मौलिकता और व्यवहारिकता के समेकित समाधान परक शोध की ओर ध्यान आकर्षित करना है. जिन्हें शोध के नाम पर लकीर पीटने की आदत है, उन्हें ये आलेख बुरा लग सकता है. कृपया अपने रिस्क पर पढ़ें.