शनिवार, 2 मई 2026

कृषि शोध में साइंस का प्रादुर्भाव

सभा भवन में छिहत्तर रंगरूट शोधकर्ता बैठे हुये थे. उनकी ट्रेनिंग का पहला दिन था और इंट्रोडक्शन चल रहा था. तभी मुख्य ट्रेनिंग अधिकारी ने हवा में एक प्रश्न उछाल दिया - ये बताइये आपमें से कितने छात्रों का पैशन था, कृषि क्षेत्र में शोध करने का. हँसती-मुस्कुराती सभा में सन्नाटा छा गया. केवल तीन हाथ ही उठे. ये एक सटीक आंकलन भी था कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों का मात्र 4 प्रतिशत छात्र ही शिक्षण या शोध से जुड़ना चाहता है. 

ये लगभग 30 साल पुराना परिदृश्य है. साठ और सत्तर के दशक में जन्मे लोगों को भली-भाँती याद होगा कि तब कृषि की पढ़ाई वही लोग किया करते थे, जिन्हें स्वयं को ही नहीं, उनके पिता जी और पास-पड़ोस को भी ये विश्वास होता था कि बेटे से इन्टर में बायो या मैथ्स नहीं चलनी. तब पास-पड़ोस मोहल्ला वैसा नहीं था, जैसा अब होता है, इनडिफ़रेन्ट. सभी अतिशय कंसर्न्ड होते थे. किस-किस का बेटा हाईस्कूल या इंटर का बोर्ड दे रहा है, पूरे मोहल्ले को पता होता था. हाईस्कूल के अंकों के आधार पर निर्णय लिया जाता था कि लड़का साइंस पढ़ने लायक है भी या नहीं. लायक है तो मैथ्स के मार्क्स के आधार पर उसे पीसीएम पढ़ने या बायो के मार्क्स के हिसाब से उसे जेडबीसी पढ़ने की सलाह दी जाती थी. कला या वाणिज्य के क्षेत्र उसके बाद क्रमशः, दूसरी और तीसरी पसन्द हुआ करते थे. कृषि की तो कोई बात भी नहीं करता था. जिनके चाचे-मामे-ताये, कृषि क्षेत्र से किसी न किसी रूप में जुड़े थे, उन्हें ही मालूम था कि कृषि में रोजगार का क्या पोटेंशियल है. हर्डल रेस दो तरह की हो सकती है. एक - हर्डल के ऊपर से. उसके लिये आपको अधिक प्रयास करना होता है. दूसरी - हर्डल के नीचे से सर्राते हुये निकल जाओ. फिनिश पॉइंट पर देर-सबेर सब पहुँच ही जाते हैं. वहाँ सब बराबर हैं. 

सरकारें समानता और बहुजन हिताय के सिद्धान्त को ध्यान में रख कर काम करती हैं. इसीलिये तो सभी डिग्री वाले एक ही तराजू में तौल दिये गये. उनकी नज़र में, इन्जीनियरिंग हो या मेडिकल, हिन्दी हो या तबला, सब बराबर. नतीजा ये हुआ कि नौकरी लगने के बाद क्या साइंस-क्या मैथ्स और क्या कला-क्या संगीत. सब एक समान. यहाँ किसी विषय की श्रेष्ठ्ता सिद्ध करने का इरादा नहीं है. लेकिन हॉबीज़ और विषयों में कुछ फ़र्क किया जा सकता है. कुछ लोग स्नातक लेने में ही रगड़ जाते हैं, कुछ हँसते-खेलते ग्रेजुएट हो जाते. उन्हें मिडनाईट ऑयल बर्निंग का पता ही नहीं. प्रशासनिक सेवाओं के लिये योग्यता स्नातक की ही थी और आज भी है. डिग्री के विषयों से कोई अन्तर नहीं पड़ता. किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन्जीनियरिंग के छात्र भी आर्ट्स के विषय लेकर एग्जाम लिखते हैं, और सफल भी होते हैं. प्रशासनिक सेवा के माध्यम से देश सेवा का अरमान भी ग्रेजुएशन करते-करते जगता था. वहाँ सब धान बाईस पसेरी. बीए पास जब प्रशासन में आता है तो उसका साइंस के प्रति जो कॉम्प्लेक्स, हाईस्कूल-इन्टर से बना था, उसकी कसर वो इन्जीनियर और डॉक्टर से जरुर निकालता है. अब उसका काम, काम करना नहीं करवाना है. और जो काम करेगा, उसके काम और उसमें कमी निकालना, काम करने से कहीं आसान है. 

शोध और शिक्षण सेवाओं में भी जो लोग आते हैं, उन्हें प्राय: पता नहीं होता कि पीएचडी कर क्यों रहे हैं. एक भाई ने तो सेब की जगह केला लिख कर पूरी थीसिस जमा कर दी. एग्ज़ामिनर शरीफ़ था, उसने जहाँ-जहाँ सेब रह गया था वहाँ-वहाँ करेक्शन्स करवाके डिग्री दिलवा दी. बच्चे हैं, गल्तियाँ बच्चों से ही होती हैं. जब तक प्रशानिक सेवा के अटेम्प्ट बचे रहते हैं, तब तक युनिवर्सिटी के हॉस्टल एक आश्रय का काम करते हैं. और पिता जी से भी सिविल की तैयारी के नाम पर पैसे माँगने में संकोच कम होता है. तीन के अलावा जो तिहत्तर लोग थे, उन सब के अटेम्प्ट या तो ख़त्म हो चुके थे या ख़त्म होने वाले थे. उसके पहले ही शोध का एग्जाम क्रैक कर लिया था. एक अदद नौकरी की दरकार तो सबको होती है. जब तक नीली बत्ती न मिले तब तक कुछ तो करना ही है. पोस्टिंग होने के बाद उनमें से कई ने हार नहीं मानी. अपने-अपने शहर का आईएएस स्टडी सर्कल ज्वाइन कर लिया. कोचिंग के लिये अर्जित और चिकित्सा अवकाश ले कर, जीएस के लिये दिल्ली में भी डेरा डाल आते. जब तक अटेम्प्ट बचे रहते, वो आईएएस की तरह ही बिहेव करते. आदत पहले से बनानी होती है. प्रीलिम्स और मेन्स तक जाने के कारण, साथी शोधकर्ताओं में भी उनकी हनक बनी रहती. जब यूपीएससी में बात न बनती तो टारगेट बदल कर यूपीपीएससी कर लिया जाता. तुर्रा ये कि देश की सेवा करेंगे तो प्रशासक बन कर ही. शोध का निरीह रुतबा विहीन जीवन, उनके बस की बात न थी. नौकरी हो तो जलवे वाली. कुछ ने सफलता अर्जित की. प्रॉपर और अलाइड सर्विसेस में उनका सेलेक्शन विभाग के लिये भी गर्व का विषय बना. रुतबे के चक्कर में, कुछ ने तहसीलदार पद को तरजीह देते हुये शोध मार्ग का परित्याग कर दिया. जो शोध में बने रह गये, उनके लिये शोध एक मज़बूरी था. कुछ ने पार्ट टाइम कोचिंग खोल ली, कुछ ने एकेडेमी बना ली, कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये क्वेश्चन बैंक बना डाले. जिनकी लह गयी, वो कोचिंग में लिप्त हो गये. जिनकी नहीं चली उनके दिल में प्रशासक बनने की इच्छा दबी की दबी रह गयी. जिसके अन्कुर हमेशा सीने में दफ़न रहे और पद मिलते ही प्रस्फुटित हो गये.

एक कहावत है पूत के पाँव पालने से ही दिखने शुरू हो जाते हैं. दसवीं-बारहवीं तक आते-आते शिक्षकों को भी अंदाज़ लग जाता है कि बच्चे के लिये मैथ्स सही होगी या बायो. लेकिन शायद ही कोई कृषि के बारे में सोचता हो. मैथ्स और बायो स्ट्रीम का बच्चा ख़ुद जब तक दो-एक प्रयास न कर ले, इन्जीनियरिंग और मेडिकल का सपना पाले बैठा रहता है. उसके बाद विकल्प बचता है, ग्रेजुएशन में बीएससी बायो या मैथ्स का. उन दिनों बायो ग्रुप के बच्चे जोलॉजी-बौटनी-केमिस्ट्री में बीएससी करना पसंद करते थे. मैथ्स वाले स्नातक में फ़िजिस्क-केमिस्ट्री-मैथ्स लेते थे. एग्रीकल्चर वही पढ़ने जाते थे, जिन्हें आभास रहता था कि बीएससी-जेडबीसी की प्योर साइंस, थ्योरेटिकल और टफ़ है. एग्रीकल्चर अप्प्लाईड क्षेत्र है, यहाँ थोड़ी साइंस और थोडा प्रयोग कर के साइंस में डिग्री मिल जाती है. जिनकी साइंस इन्टर तक अच्छी हुआ करती थी, वो इंजिनियर या डॉक्टर बन गये. उसके बाद भी जिसकी साइंस में रूचि थी, उन्होंने स्नातक में पीसीएम या जेडबीसी विषय चुने. जिनका साइंस से वास्ता सबसे कम था, उन्होंने कृषि का वरण किया. कम्पटीशन कोई भी हो, हमारे ग्रेडिंग सिस्टम की विशेषता है कि सबका वर्गीकरण कर देता है. कोई टॉप करेगा तो कोई लास्ट भी आयेगा. अब तो कृषि एक बहुत ही रोजगार परक विषय बन गया है, इसलिये कम्पटीशन बढ़ने से अच्छे बच्चे विज्ञान से अधिक कृषि को प्रेफरेंस दे रहे हैं. लेकिन तीस-चालीस साल पहले ये बात न थी. छिहत्तर में मात्र तीन की शोध में रूचि, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था. 

जब आईएएस-पीसीएस के सभी अटेम्प्ट समाप्त हो गये तो साइंस करनी ही थी. नौकरी के इस चरण में सारा माया-मोह भंग हो चुका होता था. जब लगता, अब साइंस किये बिना गुजारा नहीं चलने वाला, तो साइंस भी कर लेते. पीएचडी तक तो यही किया. पीएचडी गुरु के प्रति अतीव श्रद्धा भाव रखने का बाइप्रोडक्ट है. नौकरी के इस दौर में ही साइंस का प्रादुर्भाव होना लाज़मी है. साइंस भी क्या थी, जो बीएससी-एमएससी-पीएचडी में किया था, करना वही था. इस शोध में कुछ ऐसी शाखायें हैं, जिनमें विशेष उपकरणों की आवश्यकता भी नहीं होती. हाथ झुलाते हुये आइये और साठ के बाद हाथ झुलाते हुये निकल लीजिये. बहुत तो अपने प्रमोशन के मद्दे नज़र जो कुछ लिखा पढ़ी की क़वायद की थी, वो यथावत अपने ऑफिस में छोड़ कर निकल गये. नये बच्चे समझ न पाते कि उस विरासत (कबाड़) का करें तो करें क्या. वो भी दस साल पहले किये गये कामों पर पुन: प्रोजेक्ट ऐसे बनाते जैसे अब तक किसी ने कुछ किया ही नहीं. पोस्ट साइंस की है तो तनख्वाह भी उसी बात की  मिलनी थी. जहाँ तनख्वाह है, वहाँ प्रमोशन है. प्रमोशन है तो बॉस हैं. बॉस हैं तो चमचे हैं. चमचे हैं तो साइंस वही है, जो वो करें. कृषि की साइंस में आप चाहते कुछ हैं और होता कुछ है. बायलॉजिकल मटेरियल है. तमाम फैक्टर्स हैं - देश-काल-वातावरण-भूमि-जल-वर्षा हैं. कोई भी फैक्टर गड़बड़ाया तो नतीजा बदल सकता है. इसलिये अन्य साइंस की तरह, यहाँ प्रयोगों को दोहराना थोडा कठिन है. इसलिये कृषि साइंस में एक इन्हेरेन्ट फेक्सिबिलिटी है. चूँकि ये प्रायोगिक विषय भी है इसलिये फसल प्रबन्धन को आर्ट/कला भी माना जा सकता है. 

अब जब आज़ादी के सत्तर साल बाद प्राकृतिक और आर्गेनिक खेती की बात होती है तो इन्हें लगता है कि अंग्रेज़ी में पढ़ा इनका सारा ज्ञान धराशायी न हो जाये, इसलिये कुछ गूढ़ विषय, बायो-टेक्नॉलजी, नैनो-टेक्नॉलजी, बायो-इंफोर्मेटिक्स आदि नये विषयों में प्रमुखता से निवेश किया जा रहा है. वैश्विक परिदृश्य में नवीन विषयों में निवेश और शोध आज की आवश्यकता भी है. समस्या ये है कि इनके अधिकान्श लक्ष्य काल्पनिक हैं. एक ऐसी सुपर रेस विकसित करने की परिकल्पना है, जिसमें रोग-कीट-जलवायु परिवर्तन-सूखा-जल भराव-पोषण आदि समस्त समस्याओं का स्थायी निदान हो जाये. सुपर ह्यूमन रेस की अवधारणा पर कई विज्ञान कथायें लिखी जा चुकी हैं और उन पर फिल्में भी बनी हैं. यदि प्रबन्धन मात्र से उत्पादन बढ़ भी गया तो उसमें साइंस क्या. भोजन का हव्वा दिखाये बिना फण्ड नहीं मिलता. ये बात अलग है कि रसायन आधारित खेती से उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन डॉक्टर्स के यहाँ भीड़ भी बढ़ी है. भूख से कम और खा-खा कर मरने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुयी है. कृषि शोध में प्रजातियों का विकास और विकास करने वालों का दर्जा सबसे ऊपर है. ये कृषि की सभी समस्याओं का निदान प्रजाति विकास में देखते हैं. जिस तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद और होम्योपैथी को हिकारत से देखता है, इनके लिये भी पारम्परिक बीजों द्वारा प्राकृतिक और जैविक खेती के लाभ को स्वीकार करना कठिन है. आज जब फिर मोटे आनाज और प्राकृतिक खेती की बात हो रही है, इन्हें लगता है इनके अंग्रेज़ी में पढ़े ज्ञान को चुनौती दी जा रही है. आज कृषि को एक समेकित-समावेशी विज्ञान की आवश्यकता है. जो मानव-मृदा-जल सभी के लिये सतत रूप से स्वस्थ और लाभकारी हो. ये तो तय है कि 10-12 हज़ार पहले खेती के आरम्भ से पहले भी पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिये पर्याप्त भोजन था. वो व्यवस्था टिकाऊ थी और पर्यावरण अनुकूल भी. हज़ार-दो हज़ार साल का अंग्रेज़ी में पढ़ा-पढ़ाया ज्ञान सस्टेनेबल होगा या नहीं, अब लोगों को शक़ होने लगा है. रासायनिक खादों, कीटनाशकों और खर-पतवारनाशी के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण, अविश्वास और विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं. विज्ञान सतत प्रवाहमान है. विभिन्न विषयों की संकीर्ण विचारधारा से विज्ञान का विकास सम्भव नहीं है.

और कुछ हो न हो, नौकरी में प्रमोशन का एक सटीक विज्ञान होता है. ठीक वैसे ही जैसे दो दुनी चार होता है. सीआर आउटस्टैंडिंग प्राप्त करने का सेट पैटर्न है. काम उतना जितना सीआर में लिखना हो. कोई कॉलम खाली नहीं रहना चाहिये. सो शोधकर्ता से कुछ भी करा लीजिये. कम से कम प्रमोशन के लिये, जितना करना हो उतना तो कर ही लेता है. प्रमोशन भी समय निर्धारित है. यदि आप का दृष्टिकोण सुधारवादी नहीं है, तो कोई माई का लाल नहीं है, जो प्रमोशन रोक ले. नतीजा पिरामिड उलट गया है, प्रोफ़ेसर अधिक और असिस्टेंट कम हो गये हैं. शोधकर्ता पूरा मैनेजर बन गया है. और मैनेजर कुछ भी मैनेज कर सकता है. वो शोध भी करता है, उसे छपवाता है, नेटवर्किंग करता है, मेला भी लगाता-लगवाता है, गाहे-बगाहे सेमिनार-सिम्पोजिया में शिरकत करके अपनी और अपने विषय की प्रासंगिकता बनाये रखता है, कभी-कभी बुद्धि मन्थन (ब्रेन स्टोर्मिंग) भी करवा देता है. वो हर वो काम करने को आतुर रहता है, जिसके लिये क्रेडिट मिल रहा हो. कभी-कभी तो दूसरों का क्रेडिट भी हड़पने से नहीं चूकता. ये पेटेन्ट की प्रथा इसीलिये बनायी गयी है, ताकि शोधकर्ता को उसका लाभ मिल सके. लेकिन चूँकि हर फ़ाइल नीचे से ऊपर तक जाती है, तो कुछ लोगों को इसलिये कृतार्थ करना पड़ता है कि फ़ाइल रुक ना जाये. यहाँ उनकी भूतकाल में की गयी प्रशासन की पढ़ाई काम आती है. येन-केन-प्रकारेण काम करवाना-निकलवाना नितान्त आवश्यक है. आज का शोध स्मार्ट शोध है. यदि आपका लक्ष्य प्रमोशन मात्र हो तो बिना स्मार्टनेस के भूल जाइये. शिक्षा और शोध कभी हॉबी हुआ करते थे, अब चूँकि शिक्षा और शोध नौकरी बन गये हैं तो नौकरी में प्रमोशन के जितने हथकंडे हैं, सब अपनाने पड़ते हैं. जिसमें सबसे पहली कड़ी है, बॉस. बाबा रहीम दास जी पहले ही बता गये थे - 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।

रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥

आप ने गलती से ये वहम पाल लिया कि साइंस करके आप कोई तोप मार लेंगे तो आप को ग़लतफ़हमी का इलाज कराना चाहिये, यदि उसका कोई इलाज हो, तो. बड़े-बड़े आये और बह गये. विनम्रता ज्ञानियों का लक्षण है. इसलिये शोधकर्ता को अतिशय विनम्र होना चाहिये. एरियर, टीए और मेडिकल बिल रुक जाये, तो भले लड़ लीजिये, लेकिन साइंस के लिये दुश्मनी मोल लेने की ज़रूरत नहीं है. जिनका बचपन से साइंस से ज़्यादा वास्ता न रहा हो, उनके हिस्से साइंस आयेगी तो वो साइंस को रॉकेट साइंस बना के मानेंगे. वैसा ही काम करेंगे, जिसे या तो आत्मा समझ सके या परमात्मा. अपने विषय की विशिष्टता में इतना डूबे रहते हैं कि दूसरे क्षेत्रों में क्या हो रहा है, इससे इनको कोई सरोकार नहीं रहता है. बीस साल फसल की ऊँचाई बढ़ाने में बर्बाद कर दिये. यदि इन्जीनियर को समस्या बतायी होती तो वो बताता कि कम्बाइन की कटर बार को नीचा करना पौधे को ऊँचा करने से अपेक्षाकृत आसान और सरल विकल्प था. नया करने के नाम पर कुछ लोग शैटरिंग रेजिस्टेंट प्रजाति बनाने की सोच रहे हैं, ताकि कटाई के समय शैटरिंग न हो. कोई ऐसी प्रजाति की खोज में लगा है जो कीटों के दांत खट्टे कर दे. इनोवेशन के नाम पर पुराने कामों को नये कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. रोग और कीट प्रतिरोधी बीजों के विकास से आसान, फसलों का प्रबंधन है. मृदा स्वास्थ्य के बिना खेती, सतत खेती नहीं बन सकती. जल और मृदा संरक्षण कृषि शोध का एक उपेक्षित पक्ष रहा है. 

एकल दिशा में फंडिंग से कृषि शोध के अन्य आयाम संकुचित हो कर रह गये हैं. विशेष रूप से कृषि अभियांत्रिकी. सभी विद्यालयों- संस्थानों में कृषि के सभी विभाग मिल जायेंगे, बस अभियांत्रिकी नहीं मिलेगा. जबकि कृषि की लागत कम करने और उत्पादन का समुचित उपयोग करने में इस विधा का महती योगदान है. बस दिक़्क़त ये है कि अप्लाइड साइंस में कुछ भी ढँका-छिपा नहीं रहता, इसलिये ये साइंस जैसा नहीं लगता. चन्द्रयान की सफलता मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान की सफलता की चरम परिणति है. दोनों मिल के काम करें तो इसमें कोई शक़-शुबहा नहीं है कि कृषि को एक लाभकारी उद्यम बनाया जा सकता है. जैसा पहले कहा जा चुका है, साइंस को आत्मा-परमात्मा के बीच की चीज़ न बनाइये. कई बार बक्से के बाहर समस्या का समाधान होता है, किन्तु ये कर्मयोगी अपने विषय पर ही काम करते रहेंगे, चाहे किसी और ने समाधान निकाल लिया हो. 

आज कृषि की 90 प्रतिशत समस्याओं को उचित फसल प्रबंधन और कृषि अभियांत्रिकी के द्वारा मैनेज किया जा सकता है. शोध बैकयार्ड में किया जाने वाला काम है, सामने तो तकनीक ही दिखती है. लेकिन शोध को हाईलाईट करने के चक्कर में शोधपत्रों को ज़रूरत से ज़्यादा तरजीह दे दी गयी. सब प्रबंधन के बजाय, समाधान पर लट्ठ लिये पिले पड़े हैं. समाधान के प्रयास पहले से होते चले आ रहे हैं. ये कभी ख़त्म नहीं होते, जीवन भले कम पड़ जाये. सिस्टम का सीधा सरल सपाट सिद्धांत है, काम ऐसे ही करते रहिये, जैसे सब करते रहे हों. सब तर गये आप भी तर जाइये. सिस्टम, सिस्टम से चलता है. इस के हिसाब से ख़ुद को ढालिये, इसके अनुसार सुधरने की तो गुन्जाइश है लेकिन सिस्टम सुधारने की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमोशन विज्ञान के रूल्स एकदम क्लियर रखिये. सबके दिन फिरते हैं, बस सब्र रखिये. तब तक पद न मिले, चुप मार के साइंस कीजिये. प्रशासन के गुण तो पहले से ही विद्यमान थे, पद पा कर वो पुष्पित और पल्लवित होंगे. जब आप ऊपर पहुँच जायेंगे, तब साइंस भी करवा लीजियेगा. अभी तो वही साइंस है, जो ऊपर वाला कहे. प्रमोशन विज्ञान में इस बात का बहुत महत्त्व है - बॉस इज़ आलवेज़ राईट. 

जिन तीन लोगों ने हाथ उठाया था, वो कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, ये कोई नहीं जानता. लेकिन ये तो तय है कि बाकी तिहत्तर इतिहास लिख रहे होंगे और शोध में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे होंगे.  

-वाणभट्ट

वैधानिक चेतावनी: इस लेख में उल्लिखित वृतान्तो का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है. चरित्र में किसी प्रकार का मेल संयोग मात्र है. ये लेख उनके लिये नहीं है जो साइंस में विज्ञान खोजने में सक्षम हैं. इस लेख का उद्देश्य मौलिकता और व्यवहारिकता के समेकित समाधान परक शोध की ओर ध्यान आकर्षित करना है. जिन्हें शोध के नाम पर लकीर पीटने की आदत है, उन्हें ये आलेख बुरा लग सकता है. कृपया अपने रिस्क पर पढ़ें. 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

कृषि शोध का चतुर्थ आयाम

कृषि शोध केन्द्र में फसल उत्पादन में वृद्धि के सुझावों के लिये एक हाई पावर कमेटी बैठी थी. कमेटी की अध्यक्षता कृषि शोध क्षेत्र की एक नामचीन हस्ती, डॉ. सत्य आधार जी कर रहे थे. कमेटी क्या थी, कृषि क्षेत्र की समस्त विधाओं के विद्वतजनों का समागम था. अपने ओपनिंग रिमार्क में ही चेयरमैन साहब ने उवाचा - कृषि उत्पादन में वृद्धि लाना आज की आवश्यकता है. वर्तमान परिस्थितियों में जब कृषि बहुत आगे निकल आयी है, ये काम कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. मात्र लाइन सोइंग से हम उत्पादन 15% बढ़ा सकते हैं. मात्र प्लान्टर का प्रयोग हमें उत्पादन में 15% की वृद्धि देने में सक्षम है. ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग करके हम जल उपयोग दक्षता बढाने के साथ साथ उत्पादन में 15% वृद्धि पा सकते हैं. मैकेनाइज्ड क्रॉप प्रोडक्शन से हम कृषि लागत को कम और कृषक आय में वृद्धि कर सकते हैं. इन्जीनियर्स के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. आप लोगों को इस दिशा में काम करना चाहिये. 

संयोग से कृषि अभियंत्रण अनुभाग का एकाकी अभियन्ता और अनुभागाध्यक्ष भी सभा में उपस्थित था. जिसे कुछ दिन पहले ही नया-नया चार्ज मिला था. उससे रहा नहीं गया. बोल पड़ा - सर आप ने बहुत ही अच्छे सुझाव दिये हैं. दो हेक्टेयर लैंड हमें भी मिल जाती तो ये देखा जा सकता है कि इंजीनियरिंग इन्टरवेन्शन्स से कितनी उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है. हम लोग उत्पादन वृद्धि के अधिकान्श प्रयास प्रजातियों के विकास में कर रहे हैं. यदि मात्र मैकेनाइज़ेशन से लागत कम और उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है, तो ऐसे अप्प्लाईड प्रयोग भी होने चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रमों में ये भी देखना चाहिये कि क्रॉप मैनेजमेन्ट से कितनी वृद्धि सम्भव है. प्रजातियों के विकास में उसके ऊपर उत्पादन वृद्धि को लक्ष्य करने का प्रयास करना चाहिये. फसल उन्नयन प्रोग्राम्स की टीम में कृषि के अन्य विषयों की तरह अभियान्त्रिकी को भी शामिल करना चाहिये. बहुत सी समस्याओं का निदान प्रबंधन द्वारा किया जा सकता है, उन पर शोध में समय और धन व्यय करने से बचा जा सकता है. 

उसे लगा कि चेयरमैन साहब उसके इस उद्बोधन से प्रसन्न हो कर शाबाशी देंगे. लेकिन वहाँ सभा में सन्नाटा छा गया. उसे जरा भी भान नहीं हुआ कि सभी को साँप क्यों सूँघ गया. उसे ये भी नहीं लगा कि उसने कोई गलत बात कह दी है. लेकिन सत्य आधार जी का आधार हिलने लगा. बड़े लोगों को सुनाने की आदत होती है, सुनने की नहीं. उसके बाद उन्होंने इन्जीनियर को जो-जो सुनाया है और जिन-जिन शब्दों में सुनाया है, उन शब्दों का प्रयोग किसी भी सभ्य समाज में वर्जित माना जाता है. फिर भी यदि पढने की इच्छा हो तो पाठकों को पिछले ब्लॉग जीनोटाइप (https://vaanbhatt.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) पर जाना पड़ेगा. 

उसका परिणाम ये हुआ कि शीघ्र ही कृषि अभियन्त्रण अनुभाग का विलय अन्य विभाग में कर दिया गया. ताकि कोई इन्जीनियर पियर रिव्यू मीटिंग में अपना ज्ञान बघारने की हिमाक़त न कर सके. अपने लोगों की बात अपनों में ही रहे तो अच्छा. आउट ऑफ़ बॉक्स विचार, और ऐसे विचार वाले लोग, बॉक्स के बाहर ही रहे तो ही अच्छा.  

भारत में कृषि शिक्षा और शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. इस सन्दर्भ में वाणभट्ट का पुराने ब्लॉग - कृषि शोध की दशा और दिशा (https://vaanbhatt.blogspot.com/2025/03/blog-post_31.html?m=1) पर जाने की कृपा करें. बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कृषि शिक्षा के महत्त्व को समझा गया. इसी दशक में शाही कृषि अनुसन्धान संस्थान और इलाहाबाद कृषि संस्थान भी अपने अस्तित्व में आये. जहाँ कृषि शिक्षा की विभिन्न विधाओं पर अध्ययन, अध्यापन व शोध का कार्य आरम्भ हुआ. शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में मानव श्रम को कम करने के उद्देश्य से अभियान्त्रिकी आवश्यकता का अनुभव किया गया. इस दिशा में प्रथम प्रयास भी इलाहाबाद कृषि संस्थान से हुआ. कृषि में अभियान्त्रिकी के महत्त्व को देखते हुये, वर्ष 1943 में संस्थान ने कृषि अभियान्त्रिकी में पहला स्नातक पाठ्यक्रम आरम्भ किया. आईएआरआई, आईआईटी, खड़गपुर और पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय  में क्रमशः  1945, 1952 और 1960 में कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना हुयी. आज कृषि अभियान्त्रिकी शिक्षा लगभग सभी कृषि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उपलब्ध है. साठ के दशक में कृषि क्षेत्र में हुयी हरित क्रांति में कृषि अभियान्त्रिकी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. ये बात अलग है कि उन्नत प्रजातियों को पूरा श्रेय दिया गया.

आज़ादी के 80 साल होने जा रहे हैं और देश में कृषि मशीनीकरण अभी भी मात्र 45-55 प्रतिशत ही हुआ है, जबकी अनेक विकसित और विकासशील देशों में मशीनीकरण 90-95 प्रतिशत हो चुका है. इसके पीछे देश में लघु और सीमान्त किसानों की अधिक संख्या और छोटी जोत को मुख्य कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जहाँ समस्या है, वहीं तो समाधान खोजने की आवश्यकता है. हमारा कृषि शोध आज भी उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि में उलझा हुआ है. सारे प्रयास उत्पादन बढ़ाने के लिये किये जा रहे हैं. जबकि किसान इससे कहीं आगे निकल गया है. वो कम ख़र्च पर टिकाऊ और लाभदायक खेती की बात कर रहा है. यदि शोध आवश्यकताओं के अनुसार नहीं होंगे तो किस लिये होंगे. कृषि क्षेत्र में मजदूरों की घटती संख्या आज चिंता का प्रमुख विषय है. इस कारण खेती के रकबे घटते और बढ़ते रहते हैं. जिन फ़सलों में मशीनीकरण अधिक हुआ है, वे कृषकों की प्रमुख पसंद बनाते जा रहे हैं. जिन राज्यों ने कृषि अभियान्त्रिकी के विकास पर ध्यान दिया, उन राज्यों में कृषि उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है. मध्य प्रदेश पहला राज्य बना, जिसने कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना की. यंत्र दूत योजना के माध्यम से प्रदेश के कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ लागत में कमी भी आयी है. प्रदेश में निदेशालय की सफलता के परिदृश्य में सभी राज्यों में कृषि अभियंत्रण निदेशालय के स्थापना की पहल आरम्भ हो चुकी है. 

कृषि शिक्षा और शोध में उन्नत प्रजातियों के विकास, नवीन उत्पादन पद्यतियों और फसल संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुये हैं और हो रहे हैं. किन्तु आज आवश्यकता किसान को कृषि से जोड़े रखने की है. यह तभी सम्भव है है जब कृषि को व्यवसाय के रूप में किया जाये और ये एक लाभकारी उद्यम बन सके. छोटी जोत और अधिक उत्पादन लागत के कारण कृषक परिवार खेती से विमुख होते जा रहे हैं और ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो नियमित आय का जरिया बन सकें. विकसित देशों में लैंड होल्डिंग्स बड़ी हैं इसलिये वहाँ मशीनीकरण एक आवश्यकता बन गया है. हमारे देश में छोटी जोत के कारण मशीनों में निवेश कम है. इस कारण फसल उत्पादन के प्रमुख चरणों में मानव श्रम की उपलब्धता एक संकट बन जाता है. समय से कृषि कार्य न हो पाने से फसल की हानि के साथ-साथ कृषि लागत में भी वृद्धि होती है. कृषि शोध संस्थानों में कृषि के तीन आयामों - 1. प्रजाति उन्नयन, 2. उत्पादन तकनीक और 3. पादप संरक्षण पर तो बहुत कार्य हो रहा है. किन्तु कृषि अभियन्त्रण की दिशा में पूर्ण समर्पण के साथ विशेष प्रयास नहीं किया जा रहा है. 

उच्च स्तर पर गठित वरिष्ठ अधिकारियों की समीतियाँ, कृषि अभियान्त्रिकी की आवश्यकता पर तो बल देती हैं, लेकिन इसके लिये एक पूर्ण विकसित (फुल फ्लेजेड) विभाग की संस्तुति नहीं करतीं. कारण कुछ और नहीं है, लोग अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के दायरे में ही सोचने को विवश हैं. जो उन्होंने पढ़ा है या जो उन्हें पढ़ाया गया है, उससे इतर वो न सोचना चाहते हैं, न समझना.  वर्तमान में कृषि क्षेत्र की अधिकांश समस्याओं का निराकरण अभियन्त्रण के माध्यम से किया जा सकता है. किन्तु प्रयुक्त (एप्लाइड) शोध की तुलना में मौलिक (बेसिक) शोध अधिक चुनौतीपूर्ण लगता है. साठ शोधकर्ता और छिहत्तर परियोजनाओं के मॉडल से शोध पत्र तो निकल सकते हैं किन्तु ऐसी समेकित तकनीक का विकास सम्भव नहीं है, जिसे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके. आज की आवश्यकता है, साठ शोधकर्ताओं को छ: लक्ष्य उन्मुख (टारगेट ओरिएंटेड) परियोजनाओं पर केन्द्रित करना. जिसमें मृदा सम्वर्धन, जल संचयन-संरक्षण, मशीनीकरण, कृषि उत्पादन से लेकर भण्डारण-प्रसंस्करण और कृषि के उप और सह उत्पादों का उपयोग भी सम्मिलित हो. टीम के माध्यम से हर विषय एक दूसरे से पृथक नहीं, पूरक बन के काम करेंगे और एक सम्पूर्ण (कम्प्लीट) तकनीक के विकास में सहायक होंगे. 

विकसित देशों के कृषि मॉडल में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 1-2 प्रतिशत है तो लगभग उतनी ही जनसँख्या कृषि उत्पादन में संलग्न है, जबकि भारत में कृषि, सकल घरेलू उत्पाद में 16-18 प्रतिशत का योगदान करता है किन्तु कृषि पर निर्भर जनसँख्या 45-50 प्रतिशत है. इसलिये विकसित देशों के मॉडल को हम पूर्णरूप से नहीं अपना सकते. भारत के लिये आवश्यक है कि वो कृषि एवं कृषि से सम्बद्ध क्षेत्रों को एक उद्योग के रूप में विकसित करें. इसके लिये कृषि शोध की दिशा में भी एक आमूल-चूल परिवर्तन की दरकार है. हाशिये में डाल दिये गये कृषि अभियंत्रण शोध को कृषि शोध के अन्य आयामों के साथ समन्वित करना न सिर्फ़ आज की आवश्यक है, बल्कि भारतीय कृषि का भविष्य भी है. लाभदायक कृषि के द्वारा ही भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, कृषि, को सुदृढ़ किया जा सकता है और उसके द्वारा प्राप्त आय में निरन्तरता प्राप्त की जा सकती है. लाभ, आज समाज का मूलमन्त्र है और इसकी स्थापना के लिये कृषि शोध को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है. लाभप्रदता के लिये कृषि शोध को आज समग्र सम्पूर्णता से देखना आवश्यक है. 

मृदा एवं जल संरक्षण अभियान्त्रिकी, सिंचाई और जल निकासी अभियान्त्रिकी, कृषि शक्ति एवं यंत्र अभियांत्रिकी, प्रसंस्करण एवं खाद्य अभियन्त्रिकी, आदि विषय कृषि अभियान्त्रिकी के प्रमुख घटक हैं. एक या दो अभियांत्रिकी संस्थान समस्त कृषि उत्पादों की समस्त समस्याओं का वृहद स्तर पर समाधान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिये हर संस्थान में एक कृषि अभियंत्रण विभाग की स्थापना की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिये. यदि संस्थान लाभोन्मुखी  परियोजनाओं पर कार्य करेंगे, तभी उनके द्वारा विकसित तकनीकें अपना कर किसान लाभान्वित हो सकेंगे. भविष्य में वो ही शोध संस्थान सफल होंगे जो अपने संसाधनों का सृजन स्वयं कर सकेंगे. इसके लिये उन्हें कृषि से जुड़े उद्योगों से जुड़ कर उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर शोध करना होगा. इस कार्य में कृषि अभियन्त्रण विभाग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. देश का कृषक और कृषि आधारित उद्योग, आज सम्पूर्ण तकनीक, उत्पादन से अंतिम उत्पाद तक, माँग रहा है. इसलिये प्रयोग भी समेकित होने चाहिये. खण्ड-खण्ड में किये गये श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य एक सम्पूर्ण तकनीक में परिवर्तित नहीं हो सकते. इसके लिये आवश्यकता है, कृषि के अन्य आयामों के साथ कृषि शोध के चतुर्थ आयाम - कृषि अभियांत्रिकी को सुदृढ़ करने की.

जड़त्व का सिद्धांत है कि जो वस्तु जैसे चल रही है वैसे ही चलती रहती है (और रुकी है तो रुकी रहती है) जब तक कोई वाह्य बल नहीं लगता. भारतीय कृषकों और कृषि आधारित उद्योगों की आकांक्षायें व अपेक्षायें वही बल हैं, जो कृषि शोध को एक नयी दिशा प्रदान करेंगी.

-वाणभट्ट

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

कुर्सी और चमचों का खेल

प्रथम एआई जेनरेटेड कविता...


कुर्सी का मोह निराला है, जिसने सबको पाला है,

इस चार पाँव की लकड़ी ने, जाने कितनों को डस डाला है।

सिंहासन पर जो बैठ गया, वो ख़ुद को ख़ुदा समझता है,

पर असली खेल तो पीछे बैठा, 'चमचा' ही रचता है।


चमचागिरी वो विद्या है, जिसमें बिना पढ़े ही डिग्री है,

साहब की हाँ में हाँ मिलाना, बस यही इसी की फ़िक्री है।

साहब जो कहें "दिन है अभी", तो चमचा "सूरज" लाता है,

साहब कहें "अँधेरा है", तो वो "तारे" गिनवाता है।


बिना धार के चाकू सा, ये मक्खन ख़ूब लगाता है,

मेहनत करने वाला पीछे, और ये आगे बढ़ जाता है।

एक हाथ में निष्ठा है, और दूसरे में स्वार्थ का प्याला,

चमचागिरी के दम पर ही, आज कल होता है उजाला।


पर याद रहे ओ कुर्सी वालों, ये चमचे बड़े सयाने हैं,

जब पाँव डगमगाते कुर्सी के, ये सबसे पहले बेगाने हैं।

आज तुम पर निछावर हैं, कल किसी और पर होंगे,

ये 'चमचे' कभी भी वफ़ादार, किसी दौर के नहीं होंगे।


वाणभट्ट 

(Credit to Google AI...😊) 

सोमवार, 30 मार्च 2026

वफ़ादारी

वफ़ादारी शब्द आते ही धरतीवासी मनुष्यों के जेहन में सिर्फ़ एक ही प्राणी की शक्ल सामने आती है. जो नाराज़ हो तो भौंकता है, और प्यार करने पर आ जाये तो चाट-चाट कर मुहाल कर देता है. आपको देख के खुश हो जाये तो दुम हिला-हिला के जी हलकान कर दे. भगवान ने कभी प्राणियों को बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया, लेकिन इनकी कुछ हरकतों की वजह से इनका नाम गाली की तरह प्रयोग में लाया जाता है. लोग भी गुणों से अधिक अवगुणों पर ध्यान देते हैं. हिन्दुस्तान में तो जातक के जन्म लेते ही उसकी कुण्डली बनवाने का विधान है. उसमें उसकी योनि भी लिखी होती है. योनि किसी न किसी पशु पर आधारित होती है. यदि आपको किसी की योनि पता चल जाये तो ये एहसास भी होता है कि वो मनुष्य प्रायः उसी के अनुसार व्यवहार भी करता है. कन्फेर्मेटरी टेस्ट के तौर पर आप दूसरों की नहीं, अपनी ही चेक करके देख लीजिये. आपको लगने लगेगा कि आप में उस प्राणी (जानवर) के गुण विद्यमान हैं. 

आदमी को भी यदि किसी दूसरे व्यक्ति के चरित्र को एक शब्द में बताना हो तो अक्सर किसी न किसी जानवर का ही नाम लेता है. अलाना तो एकदम गऊ है, फलाना बैल, उल्लू या गधा है. बस एक शब्द मात्र से लोग दूसरे के बारे में सब कुछ समझ जायेंगे. आगे कुछ कहने की ज़रूरत न होगी. लोग अपने आप उसके पूरे चरित्र का चित्रण कर लेंगे. वैसे भी आदमी की समस्या ही ये है कि वो अपने चरित्र से अधिक दूसरों के चरित्र पर नज़र रखता है. परन्तु आज जिस प्राणी का ज़िक्र करना चाह रहा हूँ, उस प्राणी के चाहने वाले उस पर जान न्यौछावर करते हैं, और न चाहने वाले उससे कहीं ज़्यादा नफ़रत करते हैं. प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले भी जब किसी व्यक्ति पर अत्यंत क्रोधित होते हैं, मनुष्य को उस प्राणी के नाम के साथ कुछ और सम्पुट जोड़ कर सम्बोधित करते हैं. आजकल कश्मीर से कन्याकुमारी तक गली-गली उनका आतंक फैला हुआ है. उनके लवर्स भी उसी तादात में बढ़ रहे हैं. इधर आपने किसी को 'के-के' शब्द कहा नहीं कि उधर आपके घर के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया. आपने आदमी को नवाज़ी जाने वाली संज्ञा (कमीने) को उसके नाम के साथ जोड़ने की गुस्ताखी कैसे कर दी. ये उस प्राणी का सरासर अपमान है. और हम उस प्राणी के प्रेमी इस अन्याय की पुरजोर विरोध और भर्त्सना करते हैं. अब तक आप समझ तो गये होंगे कि लेखक किस प्राणी की बात कर रहा है, लेकिन नाम लेने से घबरा भी रहा है.

मेरी क्या मजाल कि प्राणी-शिरोमणि का नाम अपनी ज़ुबान पर लाऊँ और पहले से खड़ी अपने दुश्मनों की फ़ौज में इज़ाफ़ा करूँ. फ़िल्मों में अमिताभ की आवाज़ का लाभ उठाने के लिये स्पेशली भारी-भरकम डायलॉग लिखे जाते थे. किसी फ़िल्म में विलेन अमिताभ से कहता है कि - वफ़ादारी से काम करोगे तो बहुत आगे जाओगे. इस पर भाई अपनी गम्भीर आवाज़ में कहते हैं - सेठ, वफ़ादारी चाहिये तो कुत्ता पाल लीजिये, मै तो आदमी हूँ सोच समझ कर काम करूँगा. डायलॉग का दम देखिये, फ़िल्म का नाम भूल गया लेकिन डायलॉग याद रहा. इस उम्मीद में कि कभी मौका मिला तो चिटकाऊँगा. लेकिन नौकरी में मौका ही नहीं लगा. हर एप्लिकेशन के नीचे लिखना पड़ रहा है - योर्स फ़ेथफ़ुली. ये बात अलग है कि जब उपर वाले ही अपने देश-समाज के लिये फ़ेथफ़ुल न हों तो नीचे लिखा फ़ेथफ़ुल भी बस अंग्रेज़ी भाषा में लिखे प्रार्थना-पत्र की रस्म अदायगी मात्र रह जाता है. इस मामले में धरम पा जी थोड़े स्ट्रेट थे. जिसे तौलना हो बिना लाग लपेट के तौल देते. कुत्ते-कमीने मै तेरा खून पी जाऊँगा. जट्ट जो ठहरे. 

गलियों में आजकल कुत्तों की संख्या बहुत बढ़ गयी है. सिर्फ़ हमारे मोहल्ले में नहीं. भारत के सभी राज्यों के सभी जिलों के सभी मोहल्लों की बात हो रही है. हम समस्याओं का पोषण करने में माहिर हैं. समस्या जब तक सर से नीचे रहती है, उसकी ओर ध्यान नहीं देते, और जब सर से उपर निकल जाती है तो कहते हैं कि अब क्या ही कर सकते हैं (इसी को नयी वाली हिन्दी कहा जाता है. पुरानी हिन्दी में अकारण 'ही' जोड़ दें तो नयी हिन्दी बन जाती है. काम तो - अब क्या करें - से भी चल जाता). 

शहर में उठाईगिरी और चोरी की वारदातें बढ़ रही थीं. पड़ोसी से मुलाक़ात और बोल-चाल तो शहर के ज़ेड स्क्वायर मॉल में ही होतीं. घरों के बीच इतनी ऊँची-ऊँची दीवारें जो बना लीं हैं. पता नहीं कानपुर में कितनी प्राइवेसी चाहिये लोगों को. हमारे इलाहाबाद में तो आज भी अड़ोसी-पड़ोसी के बीच चार फ़ुट की दीवार होती है. ग्लोबल सिटीजन होने के नाते, यहाँ भी मेरी दीवार तो चार फ़ुट ही रही. लेकिन पड़ोसियों को तो चोरों से सुरक्षा चाहिये. धूप और हवा के लिये भले ही सड़क पर खटिया डाल के बैठना पड़े. कुछ लोग तो इंतेहा प्राईवेसी पसन्द हैं कि छत पर भी पडोसी उनको देख न सके, इतनी ऊँची दीवारें बना रखी हैं. ऐसे लोगों के लिये ही बुर्क़ा इज़ाद किया गया होगा. दुनिया ढँकने के बजाय ख़ुद को ही ढँक लो.

देश ने तरक्की की तो लोगों की तरक्की भी होनी ही थी. पे कमीशंस का दौर चला तो हर नौकरी-पेशा आदमी को उसकी उम्मीद से अधिक धन मिलने लगा. तनख्वाह अधिक हो तो लोन आसानी से मिल जाते हैं. हमारे पिता जी ने भी लोन ले कर मकान बनवाया था. आज भी याद है कि लोन की किश्त चुकाने में हम लोग पूरा सीजन एक ही सब्जी पर काट देते थे. जो सीजन की सबसे सस्ती होती. लौकी का सीजन हो तो सुबह नाश्ते से लेकर रात के खाने तक दे लौकी, दे लौकी. नेनुआ, टिंडा और कद्दू तो इतना खाया कि अब तक वितृष्णा बनी हुयी है. आज ऐसी बात नहीं है. लोग मकान, कार और कम्प्यूटर का लोन एक साथ उठाते हैं. जो भी मकान बनवाना शुरू करता है तो दो मंजिल से नीचे रुकता नहीं है. पैसा है तो सिक्योरिटी भी तो चाहिये. एक मंज़िल पर ख़ुद रहेगा, दूसरी पर किरायेदार रखेगा. ताकि भविष्य में कभी बाहर जाना हो तो घर की रखवाली के लिये गार्ड पर खर्च नहीं करना पड़े. इन्डिपेंडेंट मकानों की यही दिक़्क़त है. इस मामले में फ्लैट अच्छे होते हैं. पर घर की रखवाली के लिये किरायेदार ऐसा होना चाहिये जिसकी पत्नी घरवाली हो, दिन भर घर में रहती हो. घर सुरक्षित रहेगा तभी तो हम, पति-पत्नी, निश्चिंत हो कर नौकरी कर पायेंगे. धरती पर एक हम ही तो समझदार हैं नहीं. पूरा का पूरा मोहल्ला समझदार है. नतीजा, हर घर डबल स्टोरी. मकान ज़्यादा, किरायेदार कम. कभी-कभी तो लगता है कि बेकार में पैसा दूसरी मंज़िल में लगा दिया, उतना बैंक में डाल देते तो किराये से अधिक तो ब्याज मिल जाता और उस ब्याज से सेक्युरिटी वाले का ख़र्च निकल जाता.

किरायेदारों की भयंकर किल्लत होने के कारण घरों की सुरक्षा व्यवस्था चरमराने लगी. तब लोगों को लगा कि सुरक्षा के लिये किरायेदार न सही तो कुत्ता ही पाल लिया जाये. शुरुआत पामेरियन से हुयी थी. छोटा सा कुत्ता है. कोई घुसेगा तो कम से कम भौंकेगा तो. जहाँ लोगों की शान ही बड़ी कार से बनती-बढ़ती हो, वहाँ कुत्तों का कंप्टीशन भी होना ही था. किसी ने एलसेशियन पाला तो किसी ने लेब्राडोर, किसी ने जर्मन शेफ़र्ड, तो किसी ने गोल्डन रिट्रीवर. गाड़ी की ही तरह मेरा कुत्ता तुम्हारे कुत्ते से मँहगा और बड़ा. इंपोर्टेड कुत्ते के नाज-नख़रे भी अलहदा. उनका फ़ूड, उनका शैम्पू, उनका पार्लर, उनका एसी, उनका कमरा. मिडिल क्लास नौकरी पेशा लोगों को जल्दी ही समझ आ गया कि रईसी दिखाने के लिये बड़ी कार लेनी है तो शोफ़र भी रखो. कम से कम रोज कार पर कपड़ा तो मार देगा. नहीं तो शहर भर धूल-धूसरित कार ले कर घूमो. पार्किंग की जगह मिलती नहीं. बीवी तो शॉपिंग करे और आप कार में बैठे रहो. मँहगी कारों की तरह विलायती कुत्तों के ख़र्चे भी अफ़लातून. लोगों का जल्दी ही कुत्ते पालने से मन भर गया. 

जब सब तरफ़ अंधकार हो जाता है तो कहीं न कहीं से आशा की किरण फूटती है. इन परिस्थितियों में गली के आवारा कुत्ते मसीहा बन के उभरे. घर में कुत्ता पालने से अच्छा है सड़क के कुत्तों को अपना लिया जाये. इन देसी कुत्तों की तो लॉटरी खुल गयी. हर घर कुछ न कुछ खाने को डाल देता. इस उम्मीद में कि कुत्ते वफ़ादार होते हैं, तो कुछ ख़्याल रखेंगे घर का, विशेषकर जब हम घर पर नहीं होते. आजकल जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी है, अशिक्षा भी परवान चढ़ रही है. कोई गाय और कुत्ते को रोटी खिला रहा हो, एकाएक सूरज को जल चढ़ाने लग जाये, चींटी को आटा डालने लगे, तो समझ लीजिये, किसी ग्रह-नक्षत्र की काट कर रहा है. औरों की क्या कहूँ, मुझे ही किसी ने मशविरा दिया कि वीआईपी फ़्रेंची के ऊपर लाल लँगोट पहना करो तो शत्रु और बॉस काबू में रहते हैं. भगवान किसी मित्र को कभी किसी का बॉस न बनाये, बेवजह दुश्मनी हो जाती है. ये टोटका बहुत कारगर रहा है. 

मोहल्ले का स्ट्रीट कुत्ता प्रेम इस कदर बढ़ गया कि हर किसी की ये समझ नहीं आ रहा कि वो कुत्तों के लिये क्या कर दें कि पूरे मोहल्ले के कुत्ते उनके वफ़ादार हो जायें. कोई सुबह-शाम दूध पिला रहा है, कोई पेडिग्री खिला रहा है. एक भाई तो रोज दर्जन भर अंडे लेकर कुत्तों के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करने में लगे रहते थे. कुत्तों की संख्या इतनी बढ़ गयी कि सड़क पर बच्चे कम कुत्ते अधिक दिखायी देते. जिसका गेट खुलता वो वहीं दौड़ पड़ते. सामने दुम हिलाते लोग किसे अच्छे नहीं लगते. इंसानों ने ये कला कुत्तों से ही तो सीखी है. सब का पौष्टिक भोजन खा-खा कर ये कुत्ते इसे अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझने लग गये. साल दो साल ऐसा भी दौर चला. धीरे-धीरे लोगों को लगने लगा ये कुत्ते तो दिन-रात बाहर घूम ही रहे हैं. खाना इन्हें भरपूर मिल ही रहा है, तो हम अपने ख़र्चे ही कम कर लें. कुछ लोगों के बच्चों और रिश्तेदारों को आवारा कुत्तों ने दौड़ा-दौड़ा के काट भी लिया था, इसलिये मारे गुस्से के उन्होंने कुत्तों को खाना देना बन्द कर दिया.

जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि सिर्फ़ हम ही समझदार थोड़ी हैं, पूरा मोहल्ला, क्या पूरा देश ही समझदारों का है. सैकड़ों साल की ग़ुलामी समझदार ही कर सकते हैं. बेवकूफ़ तो आज भी वतन पर मर-मिटने को तैयार हैं. सबने, कम से कम, ख़रीद कर तो सड़किया कुत्तों को खिलाना बन्द कर दिया. घर में जो बच जाता वही खिलाने की कोशिश करते. लेकिन माल खाने के आदी हो चुके कुत्ते सूखी रोटी भला क्यों खाते. नतीजा वे मालन्यूट्रीशन का शिकार होने लगे. अब उन कुत्तों में वो जोश-ख़रोश गायब था. रात भर भूख के मारे वे चिल्लाते-किचकिचाते. लोगों को लगता सुरक्षा कवच काम कर रहा है. दिन भर वे इधर-उधर पड़े सोते रहते. नींद इतनी गहरी कि सर पर स्कूटर पहुँच जाये तो भी इन्हें पता न चले. जरा सी आहट पर टूटने वाली श्वान निंद्रा जैसी बात नहीं बची थी. अब वो दुम तब ही हिलाते जब कोई उनका मन-पसन्द आहार ऑफ़र करता. 

मोहल्ले वालों का सड़कीय कुत्ता प्रेम लगभग समाप्त था. एक बड़थ्वाल जी ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें कुत्तों से बहुत प्रेम तो नहीं था, लेकिन उन्हें उन बेचारों पर दया आती थी. पेडिग्री और अंडे तो नहीं, वो सुबह और शाम कुत्तों के लिये बिस्किट का इंतज़ाम रखते. वो कहते कि यदि ये कुत्ते रोटी खा लेते तो इन्हें मै भर पेट भोजन करा देता. लेकिन इन्हें भी मॉडर्न बच्चों की तरह उटपटांग चीज़ें खाने की लत लग गयी है. रोटी नहीं खाते, पर बिस्किट चाव से खाते हैं. इनके चक्कर में रोज सौ रुपये सुबह और सौ रुपये शाम ख़र्च हो जाते हैं. सुबह और शाम जब बिस्किट का टाइम होता दसियों कुत्ते बड़थ्वाल जी के साथ पड़ोस में सोनकर की दुकान तक उन्हें गार्ड ऑफ़ ऑनर देते हुये ले कर जाते और बिस्किट खरीदवा कर वापस ले कर आते. बिस्किट वितरण उनके गेट पर ही होता. हर कुत्ते को एक पैकेट. कुत्ते ऐसी ऐसी मुद्रायें बनाते मानो इस जनम में उनके लिये बड़थ्वाल जी के ऋण से उऋण होना सम्भव नहीं है. बड़थ्वाल जी को भी एक संतुष्टि मिलती. 

आज शाम जब टहल के लौटा तो उनके दरवाज़े पर कोई चहल पहल नहीं थी. एक भी कुत्ता नज़र नहीं आ रहा था. वो बालकनी में खड़े थे. बिना किसी विशेष प्रयोजन के मैंने पूछ लिया आज आपकी सेना दिखायी नहीं पड़ रही है. उन्होंने ने जो बताया उसे सुन कर कुत्तों पर से भी विश्वास उठ गया. भाई नवराते चल रहे थे, अभी कुछ दिन पहले ही ख़तम हुये हैं. उसके बाद से पार्क के उस पार रहने वाले श्रीवास्तव जी कसर पूरी करने में लगे हैं. दबा कर नॉनवेज का सेवन हो रहा है. अभी तक वो बची-खुची हड्डियाँ कूड़ेदान में डाल देते थे. इस बार निस्तारण के लिये उन्होंने घर के बाहर एक तसला ला कर रख दिया है. चार दिन हो गये. कुत्ते बिस्किट खाने नहीं आये. जमाना बदल गया है. वफ़ादारी नाम की चीज़ ही नहीं रही. 

जिन प्राणियों की मिसाल दी जाती थी, वफ़ादारी के लिये, जब उन्होंने ही वफ़ादारी को तिलांजलि दे दी हो, तो इंसान से इसकी उम्मीद करना बेमानी है. आदमी की परेशानी का सबब अब ये है कि वफ़ादारी की उपमा के लिये किस प्राणी का ज़िक्र करे. 

-वाणभट्ट

शनिवार, 28 मार्च 2026

नाम में क्या रक्खा है

मियाँ शेक्सपियर ने कभी फ़रमाया था कि गुलाब, गुलाब ही रहेगा चाहे, आप उसे किसी भी नाम से पुकारें. उनकी इस बात पर किसी फिरंगी के दिल और दिमाग़ में कोई कन्फ्यूज़न रहा हो, ऐसा नहीं लगता तो नहीं. दरअसल, विकसित देशों की ये ख़ासियत रही है कि उन्होंने किसी को महान मान लिया तो मान लिया. उसकी बधिया नहीं उधेड़ेंगे. हम भारतीयों की आदत है कि हम अपने अलावा किसी को महान मानने के लिये आसानी से राजी नहीं हैं. महान बनने और मानने के पीछे भी लॉबीयिंग होती है. एक पक्ष किसी को महान बनाने पर आमादा हो जाये तो दूसरा पक्ष उसके विरुद्ध सैकड़ों कारण ले कर खड़ा हो जायेगा. उसे महान मानने के औचित्य पर ही सवाल उठा देगा. 

कंफ्यूज़न क्रियेट करने की हमारी बीमारी पुरानी है. हमारी अदालतें और अदालतों में वकील इसीलिये फल-फूल रहे हैं कि मुक़दमों को इस कदर उलझा दिया जाता है कि माननीय न्यायालय भी कन्फ्यूज़ हो जाता है कि सही क्या है और गलत क्या. इसीलिये साफ़-सुथरे केस भी बीसियों साल घिसटते रहते हैं. इसीलिये न्यायालयों का काम बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि हर तरफ़ काम ही काम है. और इसीलिये न्यायालयों में, इतना काम है, इतना काम है, इतना काम है कि कोई काम नहीं हो पा रहा है. डिमाण्ड होती रहती है कि न्यायधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाये. ताकि लम्बित मामलों त्वरित रूप से निपटाया जा सके. तारीख़ बढ़ते जाने से आम जन मानस में अवधारणा बनती जा रही है कि पैसा और ताकत न्याय को प्रभावित कर सकती है. यदि अधिक फ़ीस वाला वकील या उच्चतर न्यायालय जाने पर न्याय बदल जाये तो फिर न्याय कहाँ रह जाता है. स्पेड तो स्पेड ही रहेगा चाहे वकील बदले या न्यायालय. तब कभी-कभी कबीलों की अलिखित कबीलायी न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी लगने लगती है. किसी लेखक ने इस दर्द को ऐसे बयाँ किया है कि जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसे न्यायालय जा कर लगता है कि न्याय तो मिला नहीं, बचा-खुचा अन्याय जो अब तक नहीं मिला था, वो भी मिल गया. जेल जाते समय, दुष्टतम से दुष्टतम, भ्रष्टतम से भ्रष्टतम, व्यक्ति भी अपनी न्याय प्रणाली पर विश्वास व्यक्त करने से नहीं चूकता. यदि उसे न्याय व्यवस्था पर विश्वास था तो गलत काम किया ही क्यों. पता नहीं चलता कि व्यवस्था की प्रशन्सा कर रहा है या उस पर कटाक्ष. पद, पावर और पैसे के दम पर दोषी व्यक्ति मूँछों पर ताव देता घूमता है कि हमार कोई का करिबे.   

तो मामला ये है कि हमारी छिद्रान्वेषण की आदत है, तो क्या सही, क्या गलत, हम अपने पक्ष या विपक्ष में होने के आधार पर तय करते हैं. यदि हम सरकार के साथ हैं, तो उनकी सौ प्रतिशत बातें सही हैं. और सरकार में नहीं हैं तो उनकी सारी की सारी गतिविधियों की आलोचना करना हमारा परम कर्तव्य है. सिर्फ़ इसलिये क्यों कि हम विपक्ष में हैं. आज कल एक नया प्रचलन बढ़ा है कि उन बातों को तोड़-मरोड़ कर ऐसे प्रस्तुत करो कि यदि इतिहास के घोषित महापुरुष भारत की धरा पर पुनर्जीवित हो जायें, तो उनका अपने महान होने का भरम टूट जाये. इसके लिये किसी और का दोष नहीं है. इसके पीछे तर्क-कुतर्क करने की हमारी अनुवांशिक प्रवृत्ति है, जिसे फ्री डेवेलपमेंट की आधुनिक शिक्षा पद्यति ने और भी पोषित और पल्लवित किया है. 

'अ रोज़ इज़ अ रोज़' का जब से अंग्रेज़ीदाँ लोगों ने हिन्दी में तर्जुमा किया, हम हिन्दुस्तानियों ने इसे ब्रम्हवाक्य की तरह मान लिया। चूँकि ये बात विदेशी शेक्सपियर जैसे महान अँग्रेज़ी लेखक और नाट्यकार ने कही थी, तो उसे गलत मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. जो लोग अपने देसी महापुरुषों और उनके कथनों को हमेशा सशंकित दृष्टि से देखते हों, उनके लिये फ़िरंगी बयान अनुकरणीय बन जाते हैं. अपने नेताओं के वक्तव्यों की बाल की खाल उधेड़ने में कोई गुरेज़ नहीं है। विदेशियों का कहा कोटेशन हमारी समझ में जल्दी आ जाता है। उपनिषद-पुराण क्या कहते हैं, ये जानने-समझने के लिये हमारे पास समय नहीं है। पर ओबामा अगर 'यस यू कैन' कहता है, तो लगता है इससे पहले ये शब्द दुनिया की किसी भाषा में कभी भी नहीं कहे गये। 

इस मामले में चीन और जापान का तो ज़्यादा पता नहीं पर निश्चय ही उनका विदेशी भाषा अज्ञान ही उनकी मूल संस्कृति के संरक्षण का कारण रहा होगा। उनकी जनता विदेशी कोटेशन्स के अनुवाद ही अपनी भाषा में सुनती या पढ़ती होगी। इसलिये कोट की मूल भावना की तह तक संभवतः नहीं पहुँच पाती हो। पर हमारा क्या, हम मुग़लों से ज्यादा मुग़ल और अंग्रेज़ों से ज़्यादा अंग्रेज़ हैं. ये हमारी सैकड़ों वर्षों की धुर गुलामी का परिचायक है कि फिरंगी ज़ुबान में कही बात हमारे दिल में गहरे बैठती है। बाकि हमारे प्राचीन ग्रन्थ सिर्फ़ हमारा मनोबल बढ़ाने के लिये उपयोग में लाये जाते हैं। हमारे पुरखों ने वेदों-उपनिषदों के ज़माने में ही हवाई जहाज की खोज कर ली थी। सूर्य तक की दूरी का अनुमान लगा लिया था। इह और उह लोक दोनों की बारीकियों से हम वाकिफ़ थे। ये तो हमने अपने ज्ञान का उपयोग करना उचित नहीं समझा वरना क्या अमेरिका, क्या चीन सब हमारे आगे पानी भरते नज़र आते।

कभी-कभी जब राष्ट्रीय अस्मिता जागती है तो हम भी अपने पुरखों को महान बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते. हद तो तब हो जाती है जब हम उम्मीद करने लगते हैं कि हमारे पुरखे महान थे, इसलिये महान होना हमारा बर्थ राइट है। इस बात का किसी और के मानने न मानने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ये बात हमारे जेहन में घुसी हुयी है। जो इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते उनकी देश भक्ति पर प्रश्नवाचक चिन्ह अवश्य लगाया जा सकता है. वे या तो इस देश की महान परम्परा के बारे में अनभिज्ञ हैं या भारत को विश्व गुरु मानने से उन्हें कोई बहुत बड़ा नुकसान होने की आशंका है। यदि सरकार की माने तो इसके पीछे विदेशी ताकतों, आईएसआई या पाकिस्तान के हाथ हो सकता है, जो देश की जनता को अँधेरे में रखना चाहती है।

बाहर वालों के सामने हम भारतीय सम्मान-स्वाभिमान की कितनी भी डींगें हाँक लें, पर अन्दर ही अन्दर हम पश्चिमोन्मुखी हैं। हर चीज़ पर पश्चिम के विकसित देशों की ओर टकटकी लगाये बैठे रहते हैं कि कब वो हमारे विचारों को एंडोर्स करें और कब हम देसी से वैश्विक एंटिटी बन जाये। वैश्विक होने के अपने फ़ायदे हैं। अपने देश का नमक तो बहुत खा लिया, विदेशों का नमक तभी चखने को मिलेगा, जब हमारे विचार अमरिकी विचारों से मेल खायें। चाहे ये विचार वैज्ञानिक हों या आध्यात्मिक। मुझे शक़ है कि हम अपने कई ऋषियों-मनीषियों को शायद न पहचान पाते अगर उन्होंने पश्चिमी देशों का रुख़ न किया होता। स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानन्द, आचार्य रजनीश इत्यादि कोई अपवाद नहीं हैं। आज भी हम अपने वैज्ञानिकों और विचारकों को अंग्रेज़ी चश्मे से देखना पसंद करते हैं। अगर किसी ने अमरीका के उच्च श्रेणी की शोध पत्रिका में अपना शोध छपवा लिया तो हम उसको अवार्ड देने के लिए पलक-पाँवड़े बिछा के तैयार हो जाते हैं। अपनी भाषा के लेखों को हेय दृष्टि से देखना हमारी परम्परा बन गयी है।

विकसित देशों की सोच भी विकसित है। उनके द्वार अन्य देशों की प्रतिभाओं के लिये सदैव खुले रहते हैं। चाहे वो विद्या का क्षेत्र हो, चाहे खेल-कूद का। दूसरे देशों के प्रतिभा संपन्न लोगों के लिये उन्होंने बहुत सी छात्रवृत्तियाँ भी चला रखी हैं। हमारे यहाँ आज़ादी के सत्तर साल बाद भी आपकी योग्यता फिरंगी स्वीकार्यता पर निर्भर है। जब तक आप विदेशी जर्नल्स में अपने शोध पत्र नहीं छाप लेते आपके काम की कोई सराहना नहीं करेगा. जब आप जापान या जर्मनी में जा के वहीं काम करके, वहाँ के जर्नल में शोध पत्र छापते हैं, तो आपका काम लोकल नहीं ग्लोबल हो जाता है. आप जो भी काम करते हैं, उसे विदेशी शोध पत्र का तमगा मिल जाता है। हमारे जोगी-जोगना, जो दैवयोग और अपने सतत प्रयासों से वहाँ पहुँच गये, विदेशी ठप्पा लगवा के सिद्ध पुरुषों में शुमार हो गये। हमारे यहाँ सिद्ध भी उसी को माना जाता है, वैश्विक नज़र में सिद्ध है। हमारे अपनों की नज़र में चढ़ने के लिये ज़रूरी है कि हम पहले विदेशी नज़रों में भी चढ़ें. इसके बिना हमारा काम नहीं चलता. चाहे टैगोर हों, चाहे रे, चाहे विद्यार्थी. कुल मिला के बात इतनी है कि यदि आप अपने को सिद्ध मानते हैं और चाहते हैं कि आपको और लोग भी सिद्ध मानें तो इसके लिये फिरंगियों के द्वारा चिन्हित किये जाना पहली शर्त है. फिरंगी भी आपको तभी सम्मानित करेंगे जब आप तन-मन से उनके विचारों को अपने देश में प्रचारित और प्रसारित करेंगे। इसके लिये उन्होंने धन का समुचित प्रावधान कर रखा है। धन वो आपको मुहैया कराने को तत्पर हैं ताकि वो हथियार बनायें, बम बनायें, तकनीकें विकसित करें, और उन्हें दूसरे देशों को बेचें. विकासशील देश खाद्य और चिकित्सा के क्षेत्र में उनके शोध के व्यापक टेस्टिंग ग्राउंड बन के रह जाते हैं. शोध के लिये विदेशी फ़ण्डिंग वहाँ के शोध और विचारों का विस्तारीकरण मात्र है. शोध में प्रयुक्त होने वाले विश्वस्तरीय उपकरण, यन्त्र और रसायन (जिनके बिना आपके शोध की प्रमाणिकता पर ही प्रश्न उठ जाता है) की सप्प्लाई भी तो उनके ही हाथ में है। इस तरह एक पंथ दो काज हो जाता है, उनके विचारों का दूसरे देशों के बुद्धिजीवियों द्वारा वृहद स्वीकरण और, उनकी तकनीकों और उद्योगों का वैश्विकरण. जाने-अनजाने उनके लिये हम बाज़ार बन जाते हैं। तुर्रा ये की तश्तरी में अपनी तशरीफ़ फिरंगियों के हाथों सौंप कर हम गौरवान्वित महसूस करते हैं।

हम प्रेरणा के लिये भी पश्चिम की ओर देखते हैं. चीन-जापान-कोरिया अपनी भाषा अपने ज्ञान को प्रोत्साहित किया. उनकी तरक्की आत्मप्रेरित है. चीन भारत से दो साल बाद जापानियों से आज़ाद हुआ. लेकिन उसने ग़ुलामी के इतिहास को मिटा दिया. न इतिहास में ग़ुलामी का ज़िक्र, न सड़क-मोहल्लों के नाम. हमन  ग़ुलामी को बेचारगी की तरह ओढ़ लिया. ग़ुलाम थे इसलिये पिछड़ गये. ग़ुलामी ने हमारा अपनी ही योग्यता और ज्ञान पर भरोसा समाप्त कर दिया. भारत अपने पारम्परिक ज्ञान पर यदि आधुनिक दृष्टिकोण से शोध कार्य आरम्भ कर दे, तो निसन्देह कुछ समय-सिद्ध व्यवहारिक ज्ञान निकल कर आये. इसके लिये आवश्यक है कि हम अपनी भाषा में विज्ञान को बढ़ावा दें. जब भी कोई पारम्परिक खेती, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति या वैदिक विज्ञान की बात करता है, हमारे देश के ही अंग्रेज़ी में पढ़े-लिखे ज्ञानी विरोध के स्वर बुलंद करने लगते हैं. शासन द्वारा जैविक और प्राकृतिक खेती पर शोध को प्रोत्साहित करने के प्रयासों का सबसे मुखर विरोध वही कर रहे हैं, जिनके लिये अंग्रेज़ी में लिखा ज्ञान ही ब्रह्मवाक्य है. 

भारत में ज्ञान की परम्परा के मूल में सर्वजन हिताय और सुखाय की भावना रही है. ज्ञान-विज्ञान का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिये करना, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है. अंग्रेज़ी में लिखा विज्ञान ही विज्ञान नहीं है. हिन्दी और संस्कृत में लिखा विज्ञान भी विज्ञान ही रहेगा. विदेशी भाषा में विदेशी ग्रंथों को पढने के साथ आवश्यकता है, अपने ग्रंथों का अपनी भाषा में अध्ययन और संकलन. अपनी सभ्यता और पुरखों की महानता पर गर्व करने के लिये ये आवश्यक भी है. वर्मा-शर्मा-मिश्रा से ही काम चला लेने वाले देश को पहले से मालूम है कि नाम में क्या रखा है. 

-वाणभट्ट 

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

सौ सियार और शेर का शिकार

सियारों को अपनी बुद्धि पर बहुत भरोसा था. 

चालक वो इतने थे कि कोई शिकार स्वयं न करते. शेर-चीता-बाघ शिकार करते. उनके खाने के बाद जो बच जाता, वो इनके लिये काफ़ी था. उनके साथ रह कर जंगल का कोई भी प्राणी ऐसा न था जिसका स्वाद इन्होंने न चखा हो. 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये संस्कार इनके जीवन में रच-बस गया था. जंगल के अपने कानून होते हैं. जंगल का कानून अलिखित होता है. लेकिन उसका पालन करने-कराने की जिम्मेदारी स्वयं प्रकृति ने ले रखी थी. शाकाहारी निरीह प्राणी, ताक़तवर माँसाहारी प्राणियों के लिये भोजन थे. पढ़ और अनपढ़ में ये ही अन्तर है. यदि शाकाहारी जानवर पढ़े-लिखे होते तो सामाजिक न्याय और समरसता के लिये आंदोलन करते. लेकिन अनपढ़ इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर चुके थे. 

शेर अपने आप राजा बन गया और बाक़ी जानवर प्रजा. लेकिन राजा की अपनी प्रजा के प्रति न कोई जिम्मेदारी थी, न कोई जवाबदेही. जब भूख लगी, और जो सामने पड़ गया, वही शिकार. वो उतना ही खाता था, जितना उसके लिये जरूरी हो. बल्कि सभी जंगलवासियों को ज्ञान था कि भोजन उतना ही जितना ज़रूरी हो, स्वाद नहीं स्वास्थ्य के लिये. उन्हे ये भी मालूम था कि जंगल में डॉक्टर नहीं होता. भोजन ही औषधि है. ये बात दिन में चार बार बिना भूख खाने वाले आदमी को नहीं पता. वो इलाज करा लेगा और स्वाद के लिये जान दे देगा. हर समय भोजन की कमी का रोना, रोना, बहुतों की आजीविका है. 

सियारों ने शेर की संगत में रह कर हर जानवर का स्वाद ले लिया था. बस एक शेर ही था जिसके स्वाद से वो अब तक वंचित थे. लेकिन जिसने कभी स्वयं शिकार करके चूहा न मारा हो वो शेर के शिकार की भला सोच भी कैसे सकता था. सब मिल जाये, कोई तमन्ना भी न बचे, ऐसा भी कभी होता है. तमन्ना तो होती ही उसी की है जो न मिले. जंगल के नियम में तमन्ना पालने की कोई व्यवस्था है भी नहीं. किन्तु सियार तो सियार ठहरे. 

धरती पर आदमी के बाद, सियार को ही सबसे दिमाग़दार जीव माना गया है. उनके मन में तमन्ना जगी कि भाईयों और बहनों, हमने सब कुछ तो खा कर देख लिया, एक बार शेर का माँस भी खाने को मिल जाये, तो जीवन धन्य. इस कार्य को हममें से कोई अकेले तो कर नहीं सकता. सौ सियारों की एक टीम बनायी गयी. ये भी तय था कि जो पहले मोर्चे पर जायेगा, उसे भक्षण के लिये शेर का माँस नहीं मिल पायेगा. जब सब समझदार हों तो देश और समाज के उद्धार के लिये दूसरों से ही आगे आने की उम्मीद करेगा. भगत सिंह पड़ोसी के घर. हर घर भगत होते तो आज़ादी में चार सौ साल लगते? सियार हमेशा अधिकता में रहे हैं, चाहे जंगल हो या समाज. 

दिमाग़दार सियारों ने बहुत मौके खोजे लेकिन हर बार पहले कौन, हर एक के दिमाग़ में आ जाता. शेर को बूढ़ा होना ही था. उसने खाना छोड़ दिया. सिर्फ़ पानी से काम चलाता. उसे मालूम था कि अन्त निकट है. धीरे-धीरे शरीर शिथिल होता जा रहा था. सियारों को इसमें अवसर दिखायी दिया. सबने एक साथ धावा बोल दिया. 

सियारों ने घात लगा कर पीछे से हमला किया. शेर को इसी बात का संतोष था. 

-वाणभट्ट

रविवार, 15 मार्च 2026

सी थ्रू

गुरु जी ने आज सुबह के प्रवचन में कहा कि मंगल भाव का होना सबसे अच्छा है. यदि आप सबके मंगल की कामना करते हैं, तो आपका मंगल अपने आप हो जाता है. आती साँस में सामने वाले के मंगल की कामना कीजिये और जाती साँस में अपने मंगल की. मुझे ये गुरु जी इसीलिये पसन्द हैं जो बाकि गुरुओं की तरह सिर्फ़ त्याग की बात नहीं करते. त्याग तो तुम तब करोगे जब कोई वस्तु तुम्हारे पास होगी. साँस लोगे तभी तो छोड़ोगे. 

जब मै कॉरिडोर में एक तरफ़ से घुसा, तभी उसने भी कॉरिडोर में दूसरी तरफ़ से प्रवेश किया. हमको एक-दूसरे से टकराना निश्चित था. ये नियति सुनिश्चित करती है कि किस दिन हम किससे मिलेंगे. भले मिलना चाहें या ना चाहें. किस्मत में जिन्हें मिलना लिखा है, वो ना मिल पायें ऐसा किस्मत होने नहीं देगी. और नियति के आगे हम सबको नतमस्तक होना ही होता है. हम दोनों मंथर गति से आगे बढ़ रहे थे. बहरहाल हम दोनों का आमना-सामना होना ही था. बस सौ फिट लम्बा कॉरिडोर ही था, हम दोनों के बीच. न वो मेरी शक्ल देखना चाहता था, न मै उसकी. निकट भविष्य में हमारा एक-दूसरे से काम पड़ने की सम्भावना भी न के बराबर थी. हम हिन्दुस्तानियों, विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों में टीम स्पिरिट की कमी इसलिये पायी जाती है, क्योंकि हर किसी को लगता है कि 'हम किसी से कम नहीं'. न हमारा कोई कॉमन टारगेट होता है, न कोई अजेंडा. सबके अपने राग, सबकी अपनी ढपली. एक तो अपना-अपना अहम् लिये हम लोग टीम में काम करके राजी नहीं, दूसरा अंग्रेज़ों के ज़माने की ट्रेनिंग लिये मैनेजर्स भी ये सुनिश्चित करने में लगे रहते हैं कि गलती से मिस्टेक न हो जाये, और कोई टीम बन जाये. कोई बड़ा लक्ष्य हो तो टीम बन भी जाये. जब लक्ष्य छोटे और व्यक्तिगत हों तो - अकेले हम अकेले तुम, अपनी-अपनी देखो. इस प्रक्रिया में ऊपर वालों के दिन बिना किसी अधिक प्रयास के कुशलता से कट जाते हैं. कर्म योग की ट्रेनिंग करना इसीलिये ऊपर से नीचे तक सभी कर्मचारियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया. सेवा भाव तो जगे तो विकास को गति मिले.     

देश दिन पर दिन तरक्की करता जा रहा है लेकिन आज भी कभी-कभी लगता है कि हमारे पूर्वज कुछ अधिक समझदार थे. नवनिर्मित भवनों में जाइये तो दिन और रात का पता तक नहीं चलता है. बिजली के ऊपर हमारी निर्भरता सौ प्रतिशत नहीं तो निन्यानबे प्रतिशत तो हो ही गयी है. दिन में भी बिजली जलाये बिना कोई काम नहीं कर सकते. पहले बिजली की उपलब्धता या तो थी नहीं, या थी भी तो सीमित हुआ करती थी. भवन ऐसे बनते थे, जहाँ डे-लाईट का अधिकतम उपयोग हो सके. बीच में दालान, चारों ओर बरामदा फिर कमरे. हर कमरा अलग. सबका अपना-अपना कमरा, हर कमरे के अपने-अपने ताला-ताली. हर व्यक्ति आत्मनिर्भर. अपना कमरा खोलो और अपना काम करो. क्या घर क्या दफ़्तर सब जगह कमोबेश ऐसी ही व्यवस्था थी. हवा-धूप-पानी सब इफ़रात में उपलब्ध. आज भी कुछ गर्म देश दिवा प्रकाश के उपयोग और गर्मी से निपटने के लिये ऑफिस का टाइम सुबह रखते हैं. 

अब स्थिति ये है कि भवन नहीं बिल्डिंग्स बन रही हैं, अट्टालिकायें बन रही हैं. लेकिन उनकी डिज़ाइन में बेसिक कमी ये है कि रोशनी के लिये, प्राय: दिन में भी, कृतिम प्रकाश पर निर्भर रहना पड़ता है. बिजली का कनेक्शन बरक़रार रखने के लिये लम्बा-चौड़ा बिल भी देना पड़ता है. दिवा-प्रकाश का न्यूनतम उपयोग करने के बाद भी, हर कोई बिजली बचाने के लिये बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं चूकता. ये कृतिम प्रकाश का ही नतीजा है कि हर कोई ख़ुद तो डिप्रेशन में है ही, और दूसरे को डिप्रेशन में डालने के लिये तत्पर दिखता है. इस माहौल में जो भी अपनी व्यथा-कथा बताता है, उसे मै किसी न किसी बाबा को पकड़ लेने की मुफ़्त सलाह दे देता हूँ. लोग मजा लेंगे लेकिन कन्धा नहीं. बाबा मजा भी नहीं लेता और कन्धा भी देता है. और उसकी ट्रस्ट को दिया दान, डॉक्टर्स के साइड एफेक्ट वाली दवाइयों से सस्ता ही पड़ता है. 

शायद जगह की कमी ने कॉम्पैक्ट और मल्टीस्टोरी भवन बनाने को प्रेरित किया होगा. सबसे नायाब डिज़ाइन हुआ करती है, एक अंतहीन लम्बा कॉरिडोर. कॉरिडोर के अगल-बगल कमरे, और अन्त में, या सबकी सुविधा के लिये बीच में, प्रसाधन की व्यवस्था. सरकारी भवन जो बने तो लगता है, इस नक़्शे को पूरे देश ने बिना किसी संशय के अपना लिया. सरकारी भवन मुख्यतः सरकारी निर्माण विभागों द्वारा बनाये जाते हैं. उनके लिये अनुमानित लागत निकालना आसान हो जाता है. उन्हें अधिकतर प्रोजेक्ट के बजट से मतलब होता है. जहाँ उन्हें कोई नया डिज़ाइन दिखाया या बताया तो उन्हें लगता है कि नयी डिज़ाइन और नया एस्टीमेट बनाना पड़ेगा. इसलिये घुमा-फिरा कर ये आपको वही डिज़ाइन सजेस्ट करेंगे जो आज तक बनाते आये हैं. ये नहीं है कि ये डिज़ाइन कर नहीं सकते, लेकिन जब नौकरी करनी है, तो सीधे-सच्चे, समय की कसौटी पर जाँचे-परखे नक़्शे पर काम करना ही सही भी है और आसान भी. जब ट्रांसफ़र-पोस्टिंग हर तीन साल पर बदल ही जानी है, तो जल्दी से जल्दी बजट हासिल करो, काम शुरू करो-कराओ, और काम ख़त्म होने से पहले निकल लो. आपका फैलाया रायता कोई और समेटेगा. आप नयी जगह, नया रायता फैलाओ. इन परिस्थितियों में किसकी तमन्ना होगी इंजीनियरिंग मार्वेल्स बनाने की. और विभागों का भी परम ध्येय ये ही होता है कि बजट मिला है तो जल्दी से जल्दी हिल्ले लगा दो, वर्ना अगले बजट में कटौती की सम्भावना रहती है. जब दोनों को (बनवाने और बनाने वाले) को जल्दी हो तो प्लान और एलिवेशन पर काम करना समय की बर्बादी है. नतीजा बिल्डिंग में कॉरिडोर, कॉरिडोर के दोनों ओर कमरे और आख़िर या बीच में प्रसाधन, इससे अधिक भवन का उपयोग करने वाले कर्मचारी-अधिकारी न सोच पाते हैं, न आशा करते हैं. 

कमरे हैं तो खिड़कियाँ भी होंगी. जिनसे दिन में सूर्य-प्रकाश आने की सम्भावना रहती है. लेकिन हमारे कर्मचारी थोड़े सोफेस्टिकेटेड होते हैं. घर में तो परदे बीवी की मर्ज़ी के लगते हैं. ऑफिस में अपनी पसंद के परदे लगाने की छूट मिल जाती है. तो हर कमरे को लोग-बाग़ अपने मनपसंद रंग के परदों से सजाने का मौका नहीं चूकते. अब चूँकि परदे होते ही प्राइवेसी के लिये हैं, तो उन्हें इतना मोटा तो होना ही चाहिये कि अन्दर का नज़ारा बाहर से न दिखे. ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने जरुर इन्टरवीन किया होगा जो निर्णय लिया गया कि कॉरिडोर की ओर दरवाज़े शीशे के होंगे ताकि ऑफिस में ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और कॉरिडोर से गुजरने वाला हर शख्स ये देख सके कि अन्दर चल क्या रहा है. लेकिन जैसा कि पहले बताया जा चुका है, प्राइवेसी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिये शीशों के ऊपर गाढ़ी काली फ़िल्म का आवरण चस्पा कर दिया गया. अब कॉरिडोर में सूर्य के प्रकाश के पहुँचने की जो रही-सही कसर भी थी, वो समाप्त हो गयी. रवि के पहुँचने की सम्भावना थी नहीं, कवि भला उन गलियारों में क्यों घुसना चाहता. कहते भी है कि जहाँ रवि न पहुँचे, वहाँ कवि पहुँच जाता है. लेकिन कवि के लिये कोई मोटिवेशन, कोई प्रेरणा तो हो. अन्धकार इतना घुप्प था कि यदि कॉरिडोर में कुछ एल.ई.डी. बल्ब न टिमटिमा रहे होते तो मुझे पता भी नहीं चलता कि दूसरे छोर से कौन घुसा. हो सकता है हम टकरा भी जाते. 

इतनी लम्बी विवेचना में हम लोगों के बीच की दूरी घट कर मात्र बीस फिट रह गयी होगी. मुस्कराहट, हेल्लो-हाय की प्रीरिक्वीज़िट होती है. उसका चेहरा सख्त था. जिन्हें स्वयं पर अतिशय विश्वास होता है, वो बाबा लोगों के चक्कर से दूर रहते हैं. इसलिये भारतीय दर्शन के विराट ज्ञान से वंचित रह जाते हैं. उसका मुझ नाचीज़ पर मुस्कराहट वेस्ट करने का कोई इरादा न देख कर, मैंने भी अपना सारा ध्यान कूटस्थ पर लगा दिया. आती साँस मंगल तेरा, जाती साँस मंगल मेरा. अस्तित्वबोध ख़त्म हो रहा था. हमारे स्थूल शरीर अदृश्य होते जा रहे थे. दोनों आत्मायें एक दूसरे के आर-पार देखते हुये अगल-बगल से गुजर गयीं. 

-वाणभट्ट

कृषि शोध में साइंस का प्रादुर्भाव

सभा भवन में छिहत्तर रंगरूट शोधकर्ता बैठे हुये थे. उनकी ट्रेनिंग का पहला दिन था और इंट्रोडक्शन चल रहा था. तभी मुख्य ट्रेनिंग अधिकारी ने हवा म...