रात भी नींद भी कहानी भी
हाय क्या चीज़ है जवानी भी
रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेपाल में एक आंदोलन होता है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी ने किया. आंदोलन सफ़ल भी रहा. सरकार गिरी, सरकार बनी. मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि इस आंदोलन में जेन-ज़ी की महती भूमिका रही है. जेन-ज़ी शब्द ने बहुत इम्प्रेस किया. तो हमने ये पता करने के लिये गूगल किया कि ये जेन-ज़ी हैं, तो हम क्या हैं. तब पता चला कि 1965 से 1980 के मध्य पैदा हुये लोग जेन-एक्स से वास्ता रखते हैं. ज़्यादा अन्तर नहीं है. बस बीच में जेन-वाई ही तो है. अब तो जेन-अल्फ़ा (2013 के बाद) भी धरा पर अवतरित हो चुकी है. हम पैदा हुये, जवान हुये और आज साठ की दहलीज़ भी पार कर ली, किसी ने इतनी इज़्ज़त नहीं दी कि हमारी जेनरेशन को कोई नाम देते. आगे भी पीढ़ियाँ आती रहेंगी, अब चूँकि चलन पड़ गया है, उनके लिये ग्रीक अल्फाबेट के अक्षर शुरू ही हुये हैं. नाम चाहे कुछ भी दे लो, पिछली पीढ़ी अगली को और अगली पीढ़ी पिछड़ी को कमतर ही मानती रहेगी.
हमेशा पिछली पीढ़ी, अगली पीढ़ी को संशय से देखती. प्रायः उसका मुख्य आधार सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार तक सीमित रहता है. शायद ही सास ने बहू और बेटी में समता मूलक सिद्धांत का पालन किया हो. तब भी किसी बाप ने तब तक अपने बेटे की बातों का अनुसरण नहीं किया, जब तक उसने जग में उनका नाम रोशन करने वाला काम न कर दिया हो. जब भी किसी ने लीक से हट कर काम करने का प्रयास किया है, सबसे अधिक विरोध उस अपने घर, अपने ही समाज से हुआ है. माँ-बाप का तो काम ही था, बच्चों में संस्कार इतना कूट-कूट कर भर देना कि कम से कम उनका बच्चा अपने से बड़ों के सामने अधिक चूँ-चपड़ न कर सके. जब तक परिवार में चार-छ: बच्चों का चलन था, एक-दो बच्चे संस्कारी बच जाते थे. अमूमन ये वो बच्चे होते थे, जिन्होंने अपने माँ-बाप को गर्व करने का मौका नहीं दिया होता था. उनकी भी विवशता थी कि आर्थिक स्थिति के लिये वे अपने पेरेंट्स पर निर्भर रहते. जब से न्युक्लीयर और छोटे परिवार का चलन बढ़ा है, माँ-बाप की मजबूरी बन गयी है कि बच्चों का फ़्री डेवलपमेंट करें. डबल इनकम परिवार में किसके पास समय है कि बच्चों के पीछे भागे. उनकी सारी ख्वाहिशें बिना किसी विशेष जिद के पूरी होने लगीं. नतीजा ये पीढ़ी इतनी पैम्पर्ड है कि पैरेंट्स स्वयं ज्यादा टोका-टाकी करने से परहेज करते हैं कि साहब जादे/जादी नाराज़ न हो जायें.
जब से दुनिया है, तब से पुरानी पीढ़ी को लगता रहा है कि अगली पीढ़ी नकारा है. लेकिन दुनिया हमेशा आगे ही गयी है. बिना किसी वैज्ञानिक हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आदमी की प्रजाति विकसित होती चली गयी. अगली पीढ़ी हमेशा पछ्ली से उन्नत हुयी है. समृद्धि भी बढ़ी है. पुराने लोग तो ये बताने से भी नहीं चूकते कि पहले इतने स्कूल नहीं थे, और थे भी तो किसी प्रकार की सुविधायें नहीं होती थीं. मीलों पैदल जाना पड़ता था. ये बात सच भी है. हमारे अपने बचपन में रेडियो ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था. पिता जी के पास एक अदद साइकिल थी, जिसे वो चमका कर रखते थे. शाम को कोई बच्चा घर में नहीं रुकता था. एक रबर की छोटी सी बॉल से पूरा मोहल्ला गेंद तड़ी और सेवन स्टोंस खेल लेता था. चालीस पैसे की वो बॉल भी चंदे से आती थी. समय के साथ समृद्धि बेतहाशा बढ़ी है. अब हर बच्चा फुलबॉल लिये घूम रहा है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई का प्रेशर इतना बढ़ गया है कि बच्चों ने खेलना छोड़ दिया है. और जिन्हें खेलने का शौक हो तो उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जॉइन करनी पड़ती है. जब तक ये कॉलेज पहुँचे, सीनियर-जूनियर का लिहाज खत्म हो गया था. पेरेंट्स जिन्हें सूरमा भोपाली बनाने में लगे रहते थे, कॉलेज के स्वछंद वातावरण में ये और भी उच्छृंखल हो गये. स्वछंद और स्वतंत्र पालन पोषण का ये प्रभाव है कि नयी पीढ़ी पहले से अधिक बुद्धिमान, रचनात्मक और सृजनशील है. हमने ही इन्हें पंख दिये हैं तो हमारा कर्तव्य भी है कि इन्हें उड़ने दें. जब कोई कहता है कि वो बच्चे किस काम के जो बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का ख्याल न रख सकें. तो मुझे लगता है कि बच्चों से ऐसी अपेक्षा रखना उचित नहीं है. अपना सर्कल, अपना ओल्ड होम बनाइये और बच्चों को देश समाज के लिये अपना काम करने दीजिये. अपनी उम्मीदों को उनके विकास का रोड़ा न बनाइये.
जब मै जेन-ज़ी को प्रोत्साहित करने की बात करता हूँ तो ये भी उम्मीद करता हूँ कि स्कूल-कॉलेज का अर्थ है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. आपके ज्ञानार्जन का लाभ यदि देश और समाज को मिलता है, तब तो उसका कोई लाभ है, अन्यथा जीविकोपार्जन तो सब कर रहे हैं. शिक्षा का ध्येय यदि व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित हो जाये तो शायद शिक्षा अपना अर्थ खो देती है. आज की आज़ाद ख़्याल, जेन-जी आत्मविश्वास और साहस से लबरेज है. प्रमाणिक सूचनायें जिन तक हमारी पहुँच पुस्तकों और पुस्तकालयों पर निर्भर थीं, आज मोबाइल के माध्यम से फिंगरटिप्स पर उपलब्ध हैं. आप इन्हें गुमराह नहीं कर सकते. आपका जन्म इनसे पहले हो गया था, सिर्फ़ इसलिये आपको ये ज्ञानी मान लें, ये इनके संस्कार में नहीं है.
मैंने मेरे बच्चों के जेन-ज़ी और मेरे जेन-एक्स होने के बारे में जानने का प्रयास न किया होता, यदि नेपाल में बवाल न हुआ होता. इतना जबरदस्त आंदोलन कि चन्द दिनों में जेन-ज़ी ने सत्ता ही पलट दी. जेन-ज़ी का ये प्रयोग किस हद तक और कब तक सफ़ल होता है, ये देखना होगा. आजकल अपने यहाँ भी एक आंदोलन चल रहा है. बहुत से लोग इस तरह के हर आंदोलनों में इसलिये भाग लेने पहुँच जाते हैं कि उन्हें सरकार से शिकायत है. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. पक्ष-विपक्ष किसी को भी दोष देने से पहले मुझे लगता है, हमें उस समाज का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें हम पढ़े-बढ़े हैं या पल-बढ़ रहे हैं. नेता-अभिनेता उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें हम रहते हैं. आज जेन-ज़ी आंदोलन की राह पर है. कारण सही है या ग़लत इस पर सभी के विचार भिन्न हो सकते हैं. साठ साल धरती पर गुजारने के बाद एक नज़रिया बनता है. ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली गलती है, ऐसा भी नहीं है कि ये आख़िरी गलती होगी. समस्या है तो समाधान की बात कीजिये. आज जो हो रहा है, वो पहले भी होता था. आगे भी होता रहेगा. जब तक गलत काम करने वाले लोग पकड़े जाते हैं तो हल्ला-गुल्ला होना कोई नयी बात नहीं है. मीडिया ऐसे ख़बर बनाता है, जैसे इसके पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था. भ्रष्टाचार जिस समाज में मान्यता प्राप्त आचार-व्यवहार बन गया हो, वहाँ किस-किस का नाम लीजिये, किस-किस को रोइये. लेकिन हर जगह जहाँ हमारा व्यक्तिगत लाभ हो रहा होता है, हमने विरोध करने के बजाय समझौता करना सीख लिया है. हर किसी को बड़े मुद्दे चाहिये आंदोलन करने के लिये. छोटी-छोटी बातों के लिये क्या लड़ना. विकसित और विकासशील देश में शायद यही अन्तर है. वहाँ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं. सॉरी-थैंक्स-एस्क्यूज़ मी जैसे शब्द भले छोटे लगते हों, लेकिन ये आपकी परवरिश को दिखाते हैं. सर्विस बिफ़ोर सेल्फ़. एक मित्र यूरोप में रहते हैं, उनका कहना है, बिल्डिंग, रोड्स, मेट्रो, नो डाउट तरक्की है, लेकिन मैनर्स मैटर्स. हमारे यहाँ पीएचडी याफ़्ता भी यदि दबंगई न दिखाये तो लोग उसे हल्के में ले लेंगे. स्मार्टनेस की परिभाषा इसी पर निर्भर है कि आप कितने उजड्ड हैं. यही जेन-ज़ी जब अपने आस-पास घटने वाली रोज मर्रा की छोटी समस्याओं से मुँह मोड़ लेती है, तो बड़े मुद्दे की बातें बस ऐसी लगती हैं कि अंग्रेज़ों से लड़ने का मौका हमें नहीं मिल सका, इसलिये हम वर्तमान व्यवस्था से लड़ेंगे. जिन विकसित देशों की तरह जेन-ज़ी अपने देश को देखना चाहती है, उसके लिये लड़ना होगा, हर समय, हर जगह. जहाँ भी गलत हो रहा है, लड़ो नहीं तो कम से कम विरोध तो दर्ज करो. शिक्षा, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, घूस, भ्रष्टाचार, पक्षपात, तमाम मुद्दे हैं, चिर-विकासशील देश में. विकसित होने के लिये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ मानव विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. सर्वमंगल और लोक कल्याण की विरासत वाला देश कब आत्म केन्द्रित हो गया, इस पर भी विचार करे जेन-ज़ी.
उम्र के इस पड़ाव, मुझे लगता है, मुद्दे छोटे हों या बड़े, विरोध दर्ज कराना जरूरी. देश ने, समाज ने जो भी प्रगति की है, उसके पीछे कुछ वो लोग थे जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ का आँकलन नहीं किया. यदि आपके पड़ोसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं, तो अगला नम्बर आपका हो सकता है. छोटे कुछ मुद्दे मै बताता हूँ, जेन-ज़ी आंदोलन की शुरूआत यहाँ से कर सकती हैं. 1. घर के बाहर कूड़ा फेंकने, 2. पार्क में फूल तोड़ने, 3. दूसरों के घर के आगे कुत्ता टहलाने, 4. सड़क पर अतिक्रमण, 5. बिना हेलमेट-बेल्ट के ड्राइविंग, 6. गलत साइड चलना, 7. बेवजह हॉन्क करना, 8. गालियों का प्रयोग, 9. क्यू में लगना, 10. अनुचित लाभ को ना. ये कुछ छोटे मुद्दे हैं. मंत्री का इस्तीफ़ा यदि आपके लिये बड़ा मुद्दा है, तो एक उससे और बड़ा मुद्दा देता हूँ आपको - एक देश-एक शिक्षा. ये मुद्दा खान सर ने अपने एक पॉडकास्ट में उठाया था. मुद्दे बड़े हों और सर्व मंगल के भाव से हों तो आंदोलन को कौन समर्थन नहीं देगा.
किन राहों से दूर है मन्ज़िल कौन सा रस्ता आसां है
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे - निदा फ़ाज़ली
- वाणभट्ट