शनिवार, 25 मई 2024

प्रदूषण

हर ओर है धुआँ और धुंध 

साँसों पर पहरा है

हवाओं का 


शोर इतना है कि 

कान का बहरा जाना भी

है सम्भव 


तारे भी छुप जाते हैं

रातों में अपना अस्तित्व बचाने को

कि धरती इस तरह जगमगाती है 

अँधेरा हटाने को 


कुहाँसा सा छा जाता है 

मन और मस्तिष्क पर 

जब सूचना तन्त्र परोस देता है

अप्रमाणिक सूचनायें 

अनियंत्रित स्रोतों से 


बाढ़ सी आ रखी है 

व्यक्तिगत अवधारणाओं की 

विज्ञान में हैं सबके पास 

अनेक समाधान 

यही है अनेकता में एकता 

एक समस्या के अनेक निदान 


विषयों कि पहचान बनाये रखने के लिये

आवश्यक भी है भिन्नता 

हर विशेषज्ञ के पास है अपनी 

समाधान की विधियाँ 

किन्तु 

एकीकृत समाधान से विद्वतजनों को 

डर है उनके विषय के गौण हो जाने का 


प्रकृति ने सदैव किया है

अपना संरक्षण

वो करती रहती है आज भी

अपना पोषण 

अपनी विधि से 

किन्तु यह तभी सम्भव है 

जब वो बच जाये 

मनुष्य के अवांछित हस्तक्षेप से


प्रकृति छेड़-छाड़ कुछ सीमा तक सहती है 

फिर देती है बदले के संकेत 

यदि कोई पढ़ पाये तो 

नहीं तो वो बदले भी लेती है 

अपनी प्राकृतिक विधि से 


विनाश करती है 

प्रचंड प्रलयंकारी रूप में 

इस तरह से कि 

किसी पर ना लगे उसका दोष 

ले लेती है प्रकृति सब दोष अपने ऊपर 

ताकि मनुष्य को न हो

किसी तरह का अपराध बोध 


अंग्रेजी में लिखे और पढ़े गये 

विज्ञान के 

अप्राकृतिक समाधानों का 

आधार है स्वार्थ 

जिसमें से झाँकता है 

ढंका-छिपा अर्थ


हानि और लाभ के गणित में

सर्वाधिकार पर एकाधिकार में सिमट 

अपने में ही उलझा 

माध्यम बन रह गया है विज्ञान 


हर ज्ञानी व्यस्त है ज्ञान को भुनाने में 

उस ज्ञान को जो सहज उपलब्ध था, है और रहेगा 

पूर्वजों द्वारा प्रदत्त निशुल्क ज्ञान 

शास्त्रों, वेदों, पुराणों और पुस्तकों के 

माध्यम से 


मँहगी शिक्षा और शोध व्यय का 

मूल्य तो भरना ही होगा किसी को

ज्ञानी को ज्ञान का लाभ चाहिये 

समाज कल्याण के आधार पर 

स्वयं के लिये 


विज्ञान के नाम पर 

अपना-अपना झण्डा और डंडा उठाये 

ज्ञानी-ध्यानी 

निरंतर लिप्त हैं कूटनीति और राजनीति में 

एक के बाद एक असफल होती 

प्रकृति के अप्राकृतिक सुधार विधियों के

इसीलिये उठा लाते हैं नये-नये झुनझुने 

बजाने को कि कुछ साल और निकल जायें 

समाधान के प्रयास में 

चला चली की बेला पर 

पकड़ा जायेंगे लकड़ी अगली पौध को 

जो गढ़ेगी अपना नया झुनझुना 


देश-विदेश के पंच सितारा होटलों में 

आयोजित संगोष्ठीयों में 

विश्वस्तरीय आवभगत और स्वादिष्ट व्यंजनों से 

तृप्त आत्माओं के साथ 

विज्ञान की पुनर्स्थापना हेतु 

गहन चिंतन और मंथन भी है 

एक प्रकार का 

वैज्ञानिक प्रदूषण


-वाणभट्ट 

सोमवार, 20 मई 2024

जाना तेरा

तुम्हारी तरह
जाना तो हमको भी है
किसी दिन अचानक
बिन बताये 

ये जो दुनिया में डूबे हैं
तो बस इस उम्मीद में
कि चार से कुछ ज्यादा कंधे हों
वैसे चार भी कम नहीं हैं

उम्मीद तो ये भी है
कि कुछ आँखें नम हों
कुछ आँसू सूख जाएं गालों पर 
चन्द दिन बसें यादों में कुछ लोगों की

श्रद्धांजलि के कुछ शब्द पहुंचे
बच्चों तक कि कुछ पल को
उन्हें लगे सफल होना
एक असफल जीवन का

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 मई 2024

एज इज़ जस्ट नम्बर

अभी सवेरा नहीं हुआ था. रोज की तरह एलार्म ने अपना काम कर दिया. नींद पूरी तरह खुल नहीं पायी थी. ख़ुमारी कायम थी. आजकल सोते-सोते साढ़े ग्यारह-बारह बज जाना आम है. रोज ये तमन्ना ले कर सोने जाना कि कल से सुबह पाँच बजे उठ जाउँगा, पर वो सुबह आती ही नहीं. लेकिन एलार्म बजते ही नये डॉक्टरों की चेतावनी याद आने लगती है कि आदमी को कम से कम सात से आठ घण्टे तो सोना ही चाहिये. आदमी के लिये इतना बहाना काफी है. सोते-सोते जोड़-घटाना शुरू कर देता है. इस हिसाब से तो उसे सात बजे से पहले तो उठना ही नहीं चाहिये. 

अंग्रेजी में मेडिकल साइंस पढ़े लोगों से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इनके सैलिबस में यम-नियम-संयम के बारे में न तो बताया गया है, न पढाया. शरीर को मशीन मानने वाले इन प्राणियों की स्थिति ये हो गयी है कि मोटरसायकिल मेकैनिक की तरह आपको याद दिलाते घूम रहे हैं कि बहुत दिनों से आप सर्विस कराने नहीं आये. एक आई स्पेशलिस्ट के यहाँ जाना हुआ तो वो भड़क उठे - जिनकी आँख ख़राब है (यानि चश्मिश हैं), उन्हें छ: महीने में एक बार तो आई टेस्ट जरुर कराना चाहिये. 

मुझे नहीं याद कि किसी मेकैनिक ने मेरी मोटर सायकिल को कभी भी एकदम परफेक्ट बताया हो. यही हाल हमारे चिकित्सकों का हो रखा है. ब्रह्म मुहूर्त और ब्रह्मचर्य का इनके लिये कोई महत्त्व नहीं है. ये तो जो भी अंग्रेजी में छप जाये उसी को ज्ञान समझ कर बाँचने लगते हैं. अपनी आयुर्वेद की चिकित्सा पद्यति पर इन्हें भरोसा नहीं है. चूँकि पूरी एनाटॉमी-फिजियोलॉजी इन्होंने विदेशी पुस्तकों से पढ़ी है तो इनको लगता है कि चिकित्सा विज्ञान के बारे में संस्कृत जानने वाले पुरखों को क्या पता होगा. शायद इसीलिये आज इन्सान के बच्चे का इलाज पैदा होने से पहले शुरू हो जाता है और वेंटीलेटर पर मरने तक चलता रहता है. तुर्रा ये है कि मेडिकल साइन्स ने आदमी की आयु बढ़ा दी है. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मनुष्य का जन्म ही इलाज कराने और डॉक्टरों को फ़ीस देने के लिये हुआ है. इस प्रक्रिया में यदि मेडिकल लाइन सेवा की जगह एक इन्डस्ट्री या प्रोफेशन बन जाये, तो इसमें गलत क्या है. शहर में होटल कम हॉस्पिटल ज्यादा दिखते हैं. परचून की दुकानें जिस रेट से बन्द हो रही हैं, दवाई की दुकानें उसकी दुगनी दर से खुल रही हैं. 

हालात ये हैं कि भूख से सरकार मरने नहीं देगी और डॉक्टर बिना इलाज किये. हर गली-मोहल्ले में नर्सिंग होम्स की बाढ़ आ रखी है, क्या मजाल कि कोई बिना इलाज कराये मर जाये. इलाज इतना मँहगा हो गया है कि आम आदमी के लिये इलाज करा पाना मुश्किल होता जा रहा है. जहाँ समस्या है, वहाँ समाधान है, और जहाँ समाधान है, वहीं तो रोजगार और व्यापार की संभावनायें हैं. इसीलिये बहुत सी स्वास्थ्य बीमा कम्पनियाँ मार्केट में आ गयी हैं. पहले बीमा लोग जीवन के सुरक्षा कवच के लिये लेते थे. मरने के पहले इन्वेस्टमेंट और मरने के बाद परिवार के लिये कुछ पूँजी की व्यवस्था. बीमे का तो धन्धा ही डर के आधार पर खड़ा किया गया है. गब्बर ने सन पचहत्तर में ही एलान कर दिया था कि जो डर गया समझो मर गया. तो मरे हुये लोग इस धन्धे के सबसे बड़े ग्राहक हैं. गब्बर की बात सही होती तो उसका अन्त इतना दु:खद न होता. लेकिन अगर ठाकुर और उसके पूरे परिवार का टर्म इन्श्योरेंस होता तो फिल्म बनाने की जरूरत ही न पड़ती. ठाकुर भी पूरे इण्डिया में इंश्योरेंस के पैसे से घूम-घूम के निहाल हो रहा होता. 

लेकिन तब लोग बड़े पक्के हुआ करते थे. बिना इंश्योरेन्स के हर किसी से पन्गा लिये रहते थे. जल्द ही वो समय आने जा रहा है कि डॉक्टर बिना बीमा कराये लोगों को देखने से सिर्फ इसलिये  मना कर दे कि बंदा उनकी फ़ीस और इलाज का ख़र्च वहन नहीं कर पायेगा. और बीमा है तो डॉक्टर से लेकर हेल्थ केयर सिस्टम से जुड़े के हर व्यक्ति का लाभ ही लाभ है. अमरीका के भारतीय मूल के एक चिकित्सक का विचार था कि डॉक्टर का काम है स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना ताकि उनकी जरूरत न पड़े या कम से कम पड़े. धरती पर डॉक्टर्स को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है. ऐसा नहीं है कि भगवान तुल्य डॉक्टर्स आज नहीं हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है और ये उनकी प्रोफेशनल मजबूरी भी हो सकती है. जब मँहगी शिक्षा ले कर पढायी की है तो उसका कई गुना अर्जित करना आवश्यक हो जाता है.     

एक दौर वो था जब एलार्म बजने से पहले ही पैर धरती चूमने को बेताब रहते थे. इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि वो भी दौर था जब फ़न्ने मियां फ़ाख्ता उड़ाया करते थे. आखिर उम्र भी कोई चीज़ होती है. उम्र को बढ़ना ही था तो बढ़ी, उसे कौन रोक सकता था. ये तो भला हो मेडिकल साइंस का जो पच्चीस और पचास साल के आदमियों के मेडिकल पैरामीटर एक समान मान के चलती है. इसलिए हर उम्र के हर आदमी के लिये कुछ न कुछ इलाज है, कुछ न कुछ दवाई है. एक से एक एनर्जी टैबलेट्स और कैप्सूल हैं जो दावे से कहती हैं कि रुकना मना है. बढ़ती उम्र को रोकने के लिये टॉनिक भी हैं. लेकिन कोई ये मानने-बताने को तैयार नहीं है कि भाई उम्र हो गई है थोड़ा स्लो हो जाओ. बाल-वाल काले-पीले करके आदमी भी ये मानने को तैयार नहीं दिखता कि उम्र हो गई है. इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है. 

हिन्दुस्तान में तो वैसे ही हर आदमी ये मान के चलता है कि इस धरा पर अवतरित हो कर उसने देश पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया है. ऐसे में सरकार का दायित्व है कि वो उसका और उसके परिवार का भरण-पोषण करे. और सरकारें बनती भी हैं यही सब्ज बाग दिखा कर. जनता को पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में चाहिये. सरकार बहुत प्रयास कर रही है कि लोग सेहत के लिए कुछ जागरूक हो जाएं तो मेडिकल के खर्च में कुछ लगाम लगे. लेकिन अक्सर लोग स्वाद और शौक के आगे स्वास्थ्य के प्रति उदासीन रवैया अपनाते हैं. जब भरण-पोषण से लेकर स्वास्थ्य का ठेका सरकार का है तो सरकार को भी चाहिए कि हर व्यक्ति को एक डायट चार्ट और योग का एक मिनिमम पैकेज पकड़ा दे. अपने शरीर की कुछ तो जिम्मेदारी लो.

सर पर बचे-खुचे बालों को रंगने के बाद, कभी वर्मा को बढ़ती उम्र का एहसास हुआ हो, ऐसा नहीं था. एक जमाने में परमानेंट-गेवरमेंट-सर्वेंट्स की आय भले ही प्राइवेट में जॉब करने वाले उनके दोस्तों से कम रही हो, लेकिन पे कमीशनों के लगने के बाद से उनके लिविंग स्तर में भी काफ़ी सुधार देखने को मिला है. साठ के करीब पहुंच रहे लोगों ने जिन्दगी तो पैसा बचाने में गुजार दी, अब समझ नहीं आता कि खर्च करें तो कहां. शेयर मार्केट का जो उठान है, वो इन्हीं लोगों की देन है. घूमने की आदत रही नहीं, तला-भुना खाना डॉक्टर ने मना कर रखा है, तो बेचारे करें क्या. बस म्यूचुअल फण्ड और शेयर ही बचता है, इन्वेस्टमेंट के नाम पर. एसी कार से आना, एसी रूम में काम या मीटिंग करना और उसी एसी कार से वापस लौट जाना. इस दिनचर्या में कभी एंड्यूरेंस टेस्ट की स्थिति आती ही नहीं. जब से उम्र ने पचास पार किया, वर्मा को तड़कीले-भड़कीले कपड़े पसन्द आने लगे. जींस और टीशर्ट पहनते तो शाम तक बेल्ट में दबी-सहमी टमी विद्रोह कर देती. ऊपर की गैस ऊपर और नीचे की नीचे फंसी रह जाती. लेकिन जवान दिखने और दिखाने के लिए ये कोई बड़ा सैक्रीफ़ाइस नहीं था. वैसे भी बहुत से महापुरुष सुबह शाम मोटिवेशनल चैनल्स पर ये बताते घूम रहे हैं कि एज इज़ जस्ट नम्बर. बाकी लोगों को तो बस महसूस करना है. सुविधाओं के साथ ऐसा लगता भी है कि एज नम्बर गेम मात्र है.

लेकिन ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था. एक एंड्यूरेंस टेस्ट वर्मा को खोज रहा था. सभी स्मार्ट लोगों ने भयंकर गर्मी में होने वाले इलेक्शंस में ड्यूटी करने से ख़ुद को बचा लिया. वर्मा ख़ुद को जवान भले समझता रहा हो लेकिन स्मार्ट लोगों की कैटेगरी में वो ख़ुद को नहीं मानता था. स्मार्टनेस की शुरुआत घर से ही होती है और देश पर खत्म होती है. इनके हिस्से न मां-बाप की सेवा आती है, न समाज सेवा और न ही देश सेवा. क्योंकि जो स्मार्ट होता है, वो स्मार्ट ही होता है. हर चीज़ में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना लाभ देखता है. साठ के पास पहुंच रहा वर्मा इलेक्शन ड्यूटी करने वाला विभाग का सबसे उम्र दराज व्यक्ति रहा होगा. मित्रों ने दिल सांत्वनाएं दीं. सांत्वना दुश्मनों ने भी दी लेकिन उन्होंने चेहरे से टपकी पड़ रही खुशी को छिपाने का प्रयास नहीं किया. किसी ने अपनी पुरानी खुन्नस निकालने के उद्देश्य से वर्मा का नाम उस लिस्ट में डलवा दिया, जिनको इलेक्शन के लिए विभाग उपलब्ध करा सकता था. ऐसा नहीं है कि वर्मा ने इलेक्शन ड्यूटी पहले नहीं की थी. सरकारी नौकर के लिए ये एक आवश्यक व अनिवार्य ड्यूटी है. पहले इलेक्शन ड्यूटी महाकुम्भ की तरह लगती थी. पुलिस और पैरामिलिट्री साथ होने पर सरकारी नौकर को सरकार प्रदत्त जिम्मेदारियों और ताकत का एहसास होता था. निश्चित रूप से सुविधाओं के अभाव वाले बूथ्स में कभी-कभी ड्यूटी कष्टकारी भी हो जाती थी. लेकिन इस पंच वर्षीय प्रक्रिया का आनन्द भी अलग था. हफ्तों लोग उसी को याद करते. 

इस बार गर्मी का कहर अप्रैल से ही शुरू हो गया था. मई में तो हालात और भीषण हो गए. दो दिन की ही बात थी. वर्मा अपने पुराने दौर में पहुंच गया. किन्तु इस बार गर्मी प्रचंड थी और सुविधाओं का था नितांत टोटा. बहरहाल पूरे शौक से ड्यूटी की और जब फाइनल रिपोर्ट जमा करके निकले तो लगा - अभी तो मैं जवान हूं. जवान लोगों के साथ ड्यूटी करने का अलग अनुभव होता है. जब घर लौटे तो ऐसी फीलिंग थी मानो युद्ध भूमि से लौटे हों. दो दिन बाद ठीक से खाना खाने को मिला. एसी में रहने वालों के लिए, बिना एसी के रहना ही सजा है. पसीना धारों-धार बहा. स्कूल जहां ड्यूटी थी, वहां पानी की व्यवस्था बढ़िया थी. वर्ना भूख के साथ प्यास का दंश भी झेलना पड़ता. कुल मिला कर वर्मा संतुष्ट था कि रिटायरमेंट से पहले देश सेवा का सुनहरा अवसर मिला.

खाना खाने के बाद थकान का एहसास हुआ. एसी की ठंडी हवा में जल्द ही नींद आ गई.

सुबह एलार्म अपने समय पर बजा. आदतन झटके से उठने की कोशिश की. अस्थि पंजर कड़कड़ा गया. मांसपेशियों ने दिमाग का कहा मानने से इंकार कर दिया. वर्मा डिहाइड्रेशन सा फील कर रहा था. दो दिन के एक्सरशन ने उसके रंगे बालों की कलई खोल के रख दी. सबसे अनुरोध है कि दो-चार दिन कोई वर्मा को ये न बोले - एज इज़ जस्ट नम्बर. कसम से, बहुत गुस्से में है. 

- वाणभट्ट

बुधवार, 1 मई 2024

जीनोम एडिटिंग

पहाड़ों से मुझे एलर्जी थी. ऐसा नहीं कि पहाड़ मुझे अच्छे नहीं लगते बल्कि ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि पहाड़ किसे अच्छे नहीं लगते. मैदानी इलाकों में रहने वालों का पहाड़ों की दुश्वारियों से सामना कहां होता है. उन्हें तो सारे पहाड़ हिल स्टेशन से लगते. जिन्हें वहाँ रहना होता है, उन्हें भी दुश्वारियों का भान नहीं होता, क्योंकि वे उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी होती हैं. कोलाहल से दूर पहाड़, दुनिया के सताये लोगों को भी बहुत रास आते हैं. तभी तो हताश पति और निराश प्रेमी, इस नश्वर जगत के मानवीय प्रेम से ऊपर उठ कर, ईश प्रेम की खोज में पहाड़ों की ही शरण लेते हैं. भारत के पहाड़ों को देवभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता. कितने ही दीन-दुनिया के हिसाब से अनफिट लोग (कर्मयोगीयों के अनुसार निकम्मे और नाकारा लोग) जब कंदराओं में आत्म संयम और आत्म ज्ञान प्राप्त करके निकलते हैं, तो दुनिया उनके चरणों में होती है. दुनियादार कर्मयोगी बेसिकली जिस धन के पीछे-पीछे भाग-भाग के अपना जीवन व्यर्थ कर लेते हैं, वही धन इन बाबाओं के पीछे-पीछे भागता है. और तुर्रा ये कि बाबा उसे हाथ से छूना भी पसन्द नहीं करते. अगले प्रमोशन को लक्ष्य करके और स्कोर कार्ड सामने चिपका कर जो मात्र फल की कामना से काम करते हैं, उन्हें कर्मयोगी मानना, त्याग की प्रतिमूर्ति महान कर्मयोगियों के प्रति नाइंसाफी होगी.

ऐसा नहीं है कि मुझे पहाड़ों से प्रेम नहीं है लेकिन जिन पहाड़ों का ज़िक्र पहली पंक्ति में किया है, उसका सम्बन्ध गगनचुम्बी हिमालय से नहीं, बल्कि गणित वाले पहाड़ों से है. जिसे बच्चे-बच्चे को कंठस्थ कराने का ठेका हमारे गणित वाले मास्साब का था. उनकी व्यक्तिगत मान्यता थी कि जिसे भी दुनिया में तरक्की करनी है, उसकी गणित तो अच्छी ही होनी चाहिए. तब के मास्साब को सपने में भी गुमान न होगा कि भविष्य में दो और दो जोड़ने के लिए बच्चे कैलकुलेटर का उपयोग करेंगे. पहाड़ों पर घूमने जायेंगे, सैर-सपाटा करेंगे, भला उन्हें रटने की क्या जरूरत. वैसे गणित जैसा नामाकूल विषय हर किसी के बस की बात होता तो देश कला और खेल जगत के विभिन्न क्षेत्रों की अनेकानेक प्रतिभाओं से वंचित रह गया होता. अधिकांश लोगों ने गणित के फोबिया से ही डर कर बायो या आर्ट्स या कॉमर्स पढ़ी है. जबकि सबको पता है कि इंजीनियर बन कर आसानी से एक सुखद और समृद्ध जीवन जिया जा सकता है. पुल के एक-आध खम्भे भी इधर-उधर कर लिए, तो जीवन के खट-राग से मुक्ति. 

पता नहीं क्यों मेरे ऊपर घर में बुजुर्गों और स्कूल में टीचरों की (और ऑफिस में अफसरों की) विशेष अनुकम्पा सदैव बरसती रही है. सब के सब मुझे सुधारने को तत्पर रहे हैं. इसमें उनका कोई दोष नहीं है, उनको मुझमें कुछ प्रतिभा अवश्य दिखाई देती होगी, तभी वो उसे निखारने के प्रयास में लग जाते हैं. उस ज़माने में हमारे मास्साब को जीनोम एडिटिंग के बारे कुछ पता तो था नहीं लेकिन उनके पास जीन एडिट करने के बहुत से अचूक तरीके (टूल्स) थे. जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि अन्य गुरुओं की तरह हमारे मैथ्स से गुरु जी को भी अगाध स्नेह था, मुझसे. क्लास के बाकी लड़कों से भले ही वो ग्यारह का पहाड़ा पूछ लें, लेकिन वो मुझसे तेरह का पहाड़ा ही पूछा करते थे. बारह तक के पहाड़े उनकी कट्टर पढाई (कट्टर ईमानदार टाइप) विधि से फर्राटे से याद हो गए थे. लेकिन तेरह के अंक से मुझे एक अनजान फोबिया डेवलप हो गया. तेरह का पहाड़ा कोई पूछ ले तो हाथ-पैर फूल जाते थे. और उन्होंने भी कसम खा रखी थी कि तेरह का पहाड़ा रटा कर ही मानेंगे. जब मेरे हाथ-पैर तेरह के नाम से अच्छी तरह फूल चुके होते तो उनके चेहरे पर वैसी ही मुस्कान नाचने लगती थी जैसी फिल्मों में किसी विलेन की. वो इशारों में बस इतना कहते - 'जा बेटा जा, ले आ'. मैं जाता और ले भी आता. फिर एक आवाज़ दूर तक गूँजती थी, सटाक-सटाक, सटाक-सटाक, संटी की.

इसमें भी मुझे अपने पिता जी की  साजिश लगती है. जब मेरा मन साहित्य और संगीत में की ओर झुक रहा था, तो उनकी तमन्ना मुझ नाचीज़ को बड़े भाई की तरह इंजीनियर बनाने की हुआ करती रही होगी. बड़े भाई साहब पढ़ने में मुझसे अच्छे थे. टेंथ के बाद उनके बायलोजी और मैथ्स के टीचर दोनों ने घर पर धरना दे दिया, कि बच्चे में पोटेंशियल है. एक कहते थे इसे डॉक्टर बनाना चाहिए, और दूसरे इंजीनियर बनाने पर अड़े थे. तब सिंगल प्लांट सलेक्शन की अवधारणा मुझे नहीं थी. टीचर्स भी एक तरह के ब्रीडर ही होते हैं. ये पता लगा ही लेते हैं कि बन्दे में कौन-कौन से गुण और हुनर हैं. एक सा पेपर सभी बच्चों को देकर स्क्रीनिंग करने की प्रथा बहुत पुरानी है. ये नहीं कि इंटेलीजेंट बच्चों को कठिन पेपर दें और पढ़ाई से भागने वालों को सरल. शिक्षा विभाग को ये बहुत बाद में समझ आया कि हर बच्चे को तब तक पास करते जाओ जब तक बच्चा ख़ुद फेल होना न चाहे. अब कोई डांट-मार का डर भी नहीं रहा. टीचर्स को आब्जर्वर कहना ज़्यादा उचित होगा क्योंकि उसमें साइंस की बहुत सी विधाओं की तरह साइंस जैसा कुछ नहीं है. विज्ञान के कई विषय हैं, जिनमें न किसी प्रकार का विशेष उपकरण चाहिये, ना ही कोई केमिकल. खाली हाथ आइये, शोध कीजिये और रिटायर्मेंट पर ऐसे निस्पृह भाव से निकल लीजिये, जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँदें. ऑब्जरवेशन अपने आप में एक विज्ञान है. हमारे पुरखों ने बिना टेलिस्कोप के मात्र ऑब्जरवेशन से ग्रह-नक्षत्रों  की चाल माप डाली. पूरे विश्व में बिना उपकरण वाले इस विज्ञान को साइंस का दर्जा दिलाने के लिये बायोटेक्नोलोजी के शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया जा रहा है. जिससे पुराने शोधकर्ताओं में एक इन्फेरियोरिटी कॉम्प्लेक्स डेवेलप होना स्वाभाविक है. 

गुरु का काम ही है कि दस साल में वो भी पहचान ले कि किस बच्चे में क्या पोटेंशियल है. किसे मेडिकल में जाना चाहिए, किसे इंजीनियरिंग में. कौन खेल से नाम कमायेगा और कौन संगीत साधना करेगा. ये गुरु की पारखी नजरों से छिपा नहीं रह सकता था. गुरु तो वहीं का वहीं रह जाता है, चेले पता नहीं क्या-क्या अफलातून बने फिरते हैं. पिता जी ने गणित के मास्साब को मुझे इंजीनियर बनाने की सुपारी दे रखी थी. इसलिए वो मेरी जीन एडिटिंग का कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे. उनके पास कई तरीके कई थे - ऊँगली के बीच पेन्सिल दबाना, कान खींचना/उमेंठना, डस्टर सर पर खटखटा देना आदि-इत्यादि. जीन एडिटिंग का उनका प्रमुख शस्त्र था, नीम की संटी. जो वो मुझी से तुड़वाते. उनकी उसी एडिटिंग का अमूल्य योगदान है जो मैं गिरते-पड़ते इंजीनियर बन ही गया. 

प्रकृति का नियम है, परिवर्तन जो अन्तर से आता है, वो चिर स्थाई होता है. बाहर से थोपा हुआ चेंज तभी तक रहता है जब तक बाहर का इन्वायरमेंट फेवरेबल होता है. दारु और सिगरेट छोड़ने का प्रयास करने वाले इस बात को भली-भाँती समझ सकते हैं. वातावरण के हिसाब से प्रकृति के सभी प्राणी या तो विलुप्त हो गये या उन्नत होते गये. पहले (हमारे ज़माने में) आदमी का बच्चा बहुत भोंदू सा हुआ करता था. ये बात इस बात से परिलक्षित होती है कि अम्मा-दादी उन्हें मालिश करके, नहला-धुला के, काला टीका लगा के पालने में लिटा दें, तो बच्चा तभी हाहाकार मचाता था जब उसे भूख लगे. आज आदमी के बच्चे की प्रजाति बहुत ही उन्नत है. आज के बच्चे सिर्फ दूध-मालिश से नहीं मानने वाले. उन्हें पैदा होते ही कार्टून नेटवर्क चाहिए और कुछ दिन बाद मम्मी का स्मार्ट फोन. और एक बात नहीं मानी कि पूरा घर सर पर उठा लेते हैं. आज कल किसी बच्चे को आप उल्टी चप्पल पहने नहीं देख सकते. न ही कोई बच्चा उल्टा अखबार या मैगज़ीन पढ़ता मिलेगा. एक ढाई साल का बच्चा भी दस रूपये और पांच रूपये की चॉकलेट का फ़र्क जानता है. अब पहाड़ा वो इसलिए याद नहीं करता कि उसे कैलकुलेटर का उपयोग पता है. हिस्ट्री-ज्योग्रेफी को याद करके दिमाग की हार्ड डिस्क को वो बेवजह नहीं भरता क्योंकि सब कुछ तो गुगल बाबा की सहायता से एक फिंगरटिप पर उपलब्ध है. बच्चों का दिमाग समय के साथ अधिक विकसित होता चला गया. तभी तो बचपन की कल्पनायें आज साकार होती दिख रही हैं और भविष्योन्मुखी नयी पीढ़ी, नये-नये सपने देख रही है. 

तकनीकी विकास ने मानव विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया है. आज का बच्चा लेटेस्ट गैजेट्स से लैस है, और युवा मानव जीवन को और अधिक आरामदेह बनाने के लिए नयी-नयी तकनीक ईजाद कर रहा है. आदमी के इस विकास क्रम में मुख्य बात है कि किसी प्रकार का कोई जेनेटिक मैनेजमेंट (मैनिपुलेशन) नहीं किया गया है, और जो इन्वायरमेंटल चेंज होने थे, उनसे बचना नामुमकिन था. इन्वायरमेंट के साथ यदि आदमी का बच्चा उन्नत हो गया तो बाकि प्राणियों के बच्चे भी बदलते वातावरण के अनुसार विकसित होते गए  या हो जायेंगे. रेंड के पेड़, मोथा, पार्थेनियम, आदि-इत्यादि खर-पतवार बिना किसी जेनेटिक्स के इंप्रूव हो गये. आदमी जिनका समूल नाश करना चाहता है, वो हर तरह मुँह चिढ़ाते लहलहा रहे हैं. और उनके लिए बड़ी-बड़ी कम्पनियां एक से एक भयंकर केमिकल बनाने-बेचने में लगी हैं.  प्रकृति में ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं. जो मच्छर पहले कछुआ जलाते ही भाग जाते थे, अब उनके लिये पूरी एक इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है, वे रोज-रोज एक से एक एडवान्स केमिकल निकाल रही है ताकि आप और हम मच्छर से होने वाली ना-ना प्रकार की बीमारियों से बचे रहें. इसका भी अध्ययन होना चाहिए, कि इनकी कौन सी जीन एडिट हो गयी जो इन पर ग्लोबल वार्मिंग का कोई असर नहीं पड़ा रहा. इन अनवांटेड वनस्पतियों का न तो जीवन चक्र छोटा हुआ, न ही इनके प्रसार में कोई कमी आयी. ये बारहमासी अवांछित वनस्पतियां पूरी धरा पर कब्ज़ा करने का माद्दा रखती हैं. कभी-कभी लगता है कि क्या गेहूँ के पौधे को कांग्रेस ग्रास जितना ताकतवर बनाया जा सकता है. गलियों-सड़कों के किनारे गेहूं लहलहाता रहे. यदि बन गया तो समझ लीजिये, एवरग्रीन रिवोल्यूशन हो गया. नई-नई विकसित प्रजातियों की प्रतिरोधकता समय के साथ कम होती जाती है. जैसे एक रेस लगी है, सुर और असुर के बीच. सुर नाज़ुक और सुकुंआर होते हैं, क्योंकि ये अच्छे और अनुकूल वातावरण में पलते-बढ़ते हैं. सभी खर-पतवार और कीट-पतंगों और विषाणु-रोगाणु बदलते परिवेश में समय के साथ इवोल्व करते गये. और इवोल्यूशन, रिवोल्यूशन की तुलना में अधिक स्थाई होता है.

संटी द्वारा की गई एडिटिंग का असर को एक दिन तो खत्म होना ही था. एक ट्रेनिंग की रिपोर्ट समिट करनी थी. ट्रेनिंग में कुछ ईमानदारी-कर्तव्यनिष्ठा-देश प्रेम का अंश था. रिपोर्ट तो ठीक-ठाक ही लिख दी थी लेकिन अंत में दिनकर जी की कविता पेल दी - 

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, 

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध. 

किसी ने मेरे अन्तर में उठती देश प्रेम की हिलोरें नहीं देखीं. उसे अन्यथा ले लिया गया. नतीजा एक मेमो. मेमो की रिप्लाई में एक और साहित्यिक रचना लिखी गयी. इस बार ये पूरी तरह स्वरचित थी. अब तो मेमो रिप्लाई पर भी मेमो मिलने लगे और वाणभट्ट की साहित्यिक प्रतिभा दिनोंदिन निखरती चली गयी. यही व्यवस्था प्राणी जगत में हर तरफ व्याप्त है, चाहे वो प्राणी विज्ञान हो या वनस्पति विज्ञान. कुत्ते की दुम को बीस वर्षों तक पाइप में रखने के बाद भी उसे सीधा नहीं किया जा सका. जिस दिन कुत्ता ख़ुद ठान लेगा वो अपनी दुम सीधी भी कर लेगा. इसी प्रकार खर-पतवार हो या कीट-पतंगे, या वायरस-बैक्टीरिया, सब के सब वही रहे और वातावरण को एडॉप्ट करते चले गए. उनके आगे एक से एक उन्नत प्रजातियों ने दम तोड़ दिया. जिस रेट से प्रजातियाँ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर से लेकर हर गली-मोहल्ले के विद्यालयों-विश्विद्यालयों में  विकसित की जा रही हैं, उसका कोई अंत होता नहीं दिख रहा है. 

जब कोई ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज को काउंटर करने की बात करता है, तो लगता है, वो टाइम पास कर रहा है. प्राकृतिक  आपदा का प्रबन्धन किया जा सकता है. उसके प्रभाव को कम (मिटीगेट) किया जा सकता है, लेकिन समाप्त करने की परिकल्पना स्वान्तः सुखाय जैसे शोध कार्यों से अधिक नहीं लगती. जिनका उदेश्य पीएचड़ी करने-कराने से अधिक नहीं है. वैसे शोध ऐसे ही विषयों पर होने चाहिये जैसे ब्रह्माण्ड की खोज, ताकि लोगों की पीएचडी होती रहे, बड़े-बड़े जर्नल्स पैसा ले-ले कर शोध पत्र छापते रहें. उनकी और सबकी दुकानें चलती रहे. कार-एसी-फ्रिज बनाने वाले, जिनके दम पर पांच सितारा होटलों में विज्ञान ग्लोबल वार्मिंग पर ज्ञान दिया जाता है, इंसान की जिन्दगी आरामदायक बनाते-बनाते सिधार गये, लेकिन नोबल उन्हें तो मिलने से रहा. हरित क्रांति के पुरोधा को रत्न देने में भी चार दशक लगा दिए. 

ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए जमीन पर काम करना पड़ेगा. जो कोई नहीं करना चाहता क्योंकि एसी के बाहर दिमाग काम नहीं करता. हार्डडिस्क को ठंडा न  रखो तो उसके क्रैश होने का खतरा रहता है. दुनिया भर के वनस्पति शास्त्री कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिर्फ़ जीन मेनपुलेशन और एडिटिंग में समाधान खोज रहे हैं. इसमें बजट भले मिल जाये लेकिन स्थायी समाधान मिलने की सम्भावना कम है. वैसे भी बायो साइंस बहुत डायनेमिक है, इसमें चिरस्थाई जैसा कुछ नहीं होता. यही इसका प्लस प्वाइंट है. आज वृक्षारोपण, मृदा क्षरण रोकना और जल संरक्षण की दिशा में न सिर्फ बातें हो रही हैं बल्कि काम भी किया जा रहा है. जो काम आसान होते है, वहां शोध की गुंजाइश कम होती है, लेकिन वहीं सक्सेस स्टोरीज़ बनती हैं. ये काम तो हमारे गांव के अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग भी कर सकते हैं. हम पढ़े लिखे हैं, तो कुछ हट कर ही करेंगे. आम खा कर उसकी गुठली जमीन में गाड़ देना तो कोई भी कर सकता है. बजट तो बड़े-बड़े काम के लिए मिलता है. जहां बजट होगा वहीं बेस्ट ब्रेन काम करेंगे. इसीलिए एलोपैथी को विज्ञान मान लिया गया और, होम्योपैथी और आयुर्वेद को झाड-फूँक. यदि मृदा समृद्ध है और जल उपलब्ध है, तो बहुत सी आपदाओं और बीमारियों से बचा जा सकता है. जैसे स्वस्थ शरीर के लिए इम्यूनिटी की आवश्यकता होती है, उसी तरह ये बात पेड़-पौधों पर भी लागू होती है. ऐसा नहीं है कि किसी को इस बात का ज्ञान नहीं है, लेकिन जब साइंस पढ़ी है तो साइंस ही करेंगे. एलोपैथी का डॉक्टर खुद भले प्राणायाम कर ले, लेकिन अपने मरीज को इन्हेलर ही बताएगा. क्योंकि उसने वो ही पढ़ा है. बक्से के बाहर की सोच वाले डॉक्टर्स, लोपैथी  छोड़ आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार करने लगे हैं. एलोपैथी तो है ही, जब मुलेठी से काम नहीं चलेगा तो एंटीबायेटिक का विकल्प भी ट्राई कर लेना.

तो अब आवश्यकता है, शत्रुओं के स्ट्रॉन्ग प्वाइंट को समझने की. हमें इवोल्यूशन पर काम करना चाहिए. यदि चने के चार बीज भी 55 डिग्री पर बन गये तो वो अंदर से कितना सॉलिड होगा. वो वातावरण के अनुसार स्वयं अपने जीन की एडिटिंग करने में सक्षम होगा. क्राइसिस में ही विकास के गुणसूत्र छिपे होते हैं. 

आजकल बच्चों को पहाड़ा याद करने पर जोर नहीं दिया जाता. घर और स्कूल की डांट-मार से दूर रही ये नयी पीढ़ी के फ्री डेवलपमेंट वाले सेल्फ इवोल्वड बच्चे हैं, और शायद इसीलिए ज्यादा इंडीपेंडेंट हैं, और ज्यादा क्रियेटिव भी.

- वाणभट्ट

शनिवार, 27 अप्रैल 2024

बिग बॉस का घर

मैं कमीज़ पहनता हूं तो जैसे कवच पहनता हूं

घर से निकलता हूं तो किसी युद्ध के लिए - देवी प्रसाद मिश्र

एक जमाना जब पढ़े-लिखे लोग कम थे, लेकिन वे सिर्फ़ लगते नहीं थे, वे वाकई पढ़े-लिखे होते थे. घर में ही अपने बच्चों को पढ़ा लेते थे, होम वर्क करा लेते थे. आजकल के पढ़े-लिखे पेरेंट्स की तरह नर्सरी के स्टूडेंट को पढ़वाने के लिए ट्यूशन नहीं लगवाते थे. जब से सर्वशिक्षा की अलख जगाने का प्रयास शुरू हुआ, हर किसी को लगा पढ़ना जरूरी हो गया है. फिर क्या, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले, गांव-गांव स्कूल खुलने लगे. पहल सरकार की ओर से की गई. लेकिन शनै-शनै बाकी क्षेत्रों की तरह, शिक्षा के क्षेत्र में भी प्राइवेट घुस गया. बल्कि ये कहना ज़्यादा सही होगा कि प्राइवेट ने शिक्षा को टेकओवर कर लिया. देश की जनता को अपने ऊपर जितना कॉन्फिडेंस है, उतना अपनी सरकारों पर दस साल पहले तक नहीं था. अब लोग कह सकते हैं कि हवा का रुख़ देख कर वाणभट्ट ये कहना चाह रहा है कि देश को आजादी दस साल पहले ही मिली है, तो बता देता हूं, आप सही समझ रहे हैं. जब बिस्कुट में काजू दिखना चाहिए तो लेखक भला अपना समर्थन क्यों छिपाए. लेकिन मेरा समर्थन उसी सरकार के साथ रहता है, जो सत्ता में हो. चुनाव के दौरान लिखे इस लेख से, यदि मेरे दो-चार फॉलोवर्स के वोट भी पोलराइज हो गए तो इसे राष्ट्र निर्माण में मेरा सहयोग माना जाए. अगर दूसरे पार्टी सत्ता में आ गई तो राष्ट्रहित में मेरा समर्थन उसी के साथ रहेगा. 

पढ़ाई की बाढ़ आई तो, स्कूल दर स्कूल खुलते गए. टीचर दर टीचर बनते गए. बच्चे दर बच्चे पढ़ते गए. बच्चे क्या बच्चों के मां-बाप भी ग्रेजुएट नहीं तो साक्षर तो हो ही गए. जिसका हाईस्कूल शहर से न हो पाए वो रिमोट गांव के उस स्कूल से बोर्ड का फॉर्म भर देते, जो 100 प्रतिशत पास कराने की गारेंटी लेते थे. जब हाईस्कूल और इंटर बच्चा बिना पढ़े कर लेता है तो उसके पास ज्ञान का भले अकाल हो लेकिन कॉन्फिडेंस कूट-कूट कर भरा होता है. मोर स्टडी, मोर कन्फ्यूजन, नो स्टडी, नो कन्फ्यूजन. ये मुहावरा ऐसे ही लोगों के लिए गढ़ा गया होगा. हालत तो ऐसे हो गए हैं कि समझदार की मौत है जैसे मुहावरे भी प्रचलित हो गए. हद तो तब हो गई जब लोग कहने लग गए कि लगते तो समझदार हो. मतलब बन्दा ये एहसास दिला देता है कि लग तो रहे हो पर हो नहीं. कॉन्फिडेंस की वैसे ही देश में कोई कमी नहीं थी, उस पर मोटिवेशनल स्पीकर्स की भी बाढ़ आ गई. अपना डिप्रेशन दूर करने के चक्कर में इन्होंने ओशो से लेकर शिव खेड़ा तक सब साहित्य पढ़ डाला. जब आईएएस की कोचिंगों में पढ़-पढ़ कर के लोगों ने कोचिंग संस्थान स्थापित कर डाले, तो ये भी क्या अपने साहित्य का अंचार डालते. इन्होंने भी पीडी क्लासेस खोल डालीं. पीडी यानी पर्सनालिटी डेवेलपमेंट. हमारे इंजीनियरिंग कॉलेज के जो लड़के होम साइंस कॉलेज के इर्द-गिर्द नजर आया करते थे, उनकी पर्सनालिटी पढ़ाकू मग्घों से अलग होती थी. आज भी उन्होंने दुनिया हिला रखी है और वो रोज-रोज सफलता की नई-नई गाथाएं लिख रहे हैं (पे पैकेज के रूप में). बाकी मग्घू टाइप के लड़के कहीं कोने-अतरे में अध्यापन और शोध टाइप के कामों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं. 

एक जमाने में बच्चों को डॉक्टर और स्कूल जाने से डर लगा करता था. डॉक्टर सूई लगाता था और टीचर पिटाई. डॉक्टर और टीचर दोनों ही बच्चों की भलाई ही चाहते थे. पढ़ाने के लिए मास्टर जी को पिता जी की तरफ से पूरी छूट थी, जैसे चाहे वैसे पढ़ाए. लेकिन पढ़ाने में किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए. सो मास्टर जी भी कक्षा के बच्चों को अपना ही बच्चा मानते और उसी तरह ठोंकते जैसे घर पर पढ़ने के लिए पिता जी. टीचर लोग पूरे अभिवावक की तरह ख्याल रखते थे. बच्चा स्कूल में लफंगई  भी करता तो जम के ख़बर ली जाती. बच्चा पिता जो को बता भी नहीं पाता कि मास्टर साहब ने क्यों पीटा. पढ़ने-पढ़ाने का ऐसा माहौल था कि शुरुआत में बच्चों को स्कूल जाना बहुत अखरता था. चीख-चीख के पास-पड़ोस सर पर उठा लेते थे. लेकिन घर वाले पढ़ाने पर आमादा रहते. पढ़ाने-पढ़ाने का इतना शौक लोगों में जगा कि देखते ही देखते देश में पढ़े-लिखों की बाढ़ आ गई. हाल तो ऐसा हो गया कि अनपढ़ और मजदूर टाइप के लोग भी अपने को इनसे ज्ञानी मानते. मौका देख के बोल ही देते कि शक्ल से तो पढ़े-लिखे लग रहे हो. लगने और होने में हमेशा अन्तर रहा है. गदहा, घोड़ा लगता है जबकि घोड़ा, घोड़ा होता है. पहले स्कूल सरकारी ही हुआ करते थे, लेकिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को अन्दर की बात मालूम होती है. इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को कॉन्वेंट और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना शुरू कर दिया. और प्राइवेट वाले तो पहले से ही पैकेज के रौब में थे. नतीजा आपके सामने है. प्राइवेट स्कूल, स्कूल न हो कर कॉरपोरेट इंडस्ट्री बन गए हैं. उनकी आलीशान बिल्डिंगों को देख कर लगता है कि कोई पांच सितारा होटल है. लगता है, लेकिन हैं ये स्कूल ही. 

समय के साथ पीढियां बदल जाती हैं. इंडस्ट्रियल स्कूलों-कॉलेजों से थोक के भाव निकले पढ़े-लिखे, कॉन्फिडेंस से लबरेज लोग, आज आत्मकेंद्रित हो गए हैं. हड़बड़ी इतनी है कि उसे जीवन की हर रेस में सबसे आगे रहना है और सबसे तेज चलना है. नियम-कानून तो उनके लिए है, जिनमें कॉन्फिडेंस की कमी हो या जो स्मार्ट कम हों. एक जीवन में बहुत कुछ कर गुजरना है. समय बहुत कम है. बस एक जीवन. मार्केट घर में घुसा पड़ा है. एक लेटेस्ट मोबाइल खरीदते हैं तो अगले दिन कम्पनी उससे अच्छा मॉडल लॉन्च कर देती है. मामला स्टेट्स का होता है, भला मेरी कार तुम्हारी कार से छोटी क्यों. इतने गैजेट्स और अप्लायंसेज आ गए हैं कि दोनों काम करें तभी सब खरीद सकते हैं. खरीदते-खरीदते हाल ये हो जाता है कि घर छोटा पड़ जाता है. फिर और बड़ा मकान. सारी की सारी कहानी अर्थशास्त्र के चारों ओर घूमती रहती है. वन टू का फ़ोर करने में जब लोग लग जाते हैं तो क्या अपने, क्या पराए, हर जगह आपको अपने आस-पास के लोगों से आगे रहना है. जब तक साथ रहने-चलने की बातें थीं तो यारी-दोस्ती-रिश्तेदारी में गणित नहीं चलती थी. क्या घर- परिवार और क्या बाहर, अब तो हर समय एलर्ट मोड में रहना पड़ता है. हर समय लगता है कि कहीं न  कहीं कोई न कोई अपने सेल्फ प्रमोशन के लिए साजिश कर रहा है. पढ़े लिखे लोग किसी से पीछे नहीं रह सकते, इसलिए येन-केन-प्रकारणेंन वो चाल भी चलेगा और दांव भी लगायेगा. घर हो या बाहर, हर किसी को लगता है कि वो बिग बॉस के घर में है, साथ में सब हैं भरोसे का कोई नहीं.

- वाणभट्ट

पुनाश्च: यूनिकोड टाइपिंग में आप चंद्र बिंदु नहीं लिख पाते. ये की जगह ए ने ले ली है. हिन्दी अख़बारों को पढ़ कर हिन्दी सुधारने से रही. ये यूनिकोड की हिन्दी सबकी हिन्दी खराब कर देगी.

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

घोषणापत्र

हर तरफ़ चुनाव का माहौल है. छोटी-छोटी मोहल्ला स्तर की पार्टियां आज अपना-अपना घोषणापत्र ऐसे बांच रहे हैं मानो केन्द्र में सरकार इनकी ही बनने वाली है. अभिनेता और राजनेता में एक समानता रही है, इन दोनों का कॉन्फिडेंस लेवल बहुत हाई होता है. अगर मेरी शक्ल-सूरत नवाजुद्दीन भाई से मिलती होती, तो बहुत सम्भव है मैं डिप्रेशन में चला जाता. ये तो बन्दे का कॉन्फिडेंस ही है जो बन्दा आज बॉक्स ऑफिस पर एक से एक हिट फिल्में दे रहा है. महान अभिनेता बच्चन साहब को कितने रिजेक्शन झेलने को मिले लेकिन बन्दे में आज भी जो चीज कूट-कूट कर भरी है, वो है कॉन्फिडेंस. कुछ-कुछ यही हाल छुटभैया राजनेताओं का है. जब मंच पर माइक पकड़ कर खड़े होते हैं तो लगता है जैसे लाल किले की प्राचीर से पूरे देश को संबोधित कर रहे हैं. ये बात अलग है कि इनकी मोहल्ला गोष्ठी में गिने-चुने वो लोग ही शिरकत करते हैं, जिनकी एक दिन की दिहाड़ी पक्की होती है. उन्हें नेता जी के उद्बोधन से कुछ लेना-देना नहीं होता. 

लेकिन इसमें कोई गलत बात नहीं है. अभिनेता और नेता रगड़-घिस के ही बनते हैं. किरदार हो या मंच, चाहे छोटा हो या बड़ा, अपने रोल को जो बखूबी निभाता है, वो ही भविष्य में बाकी सबसे आगे निकल जाता है. महापुरुष लोग पहले ही फरमा चुके हैं - मोर स्टडी मोर कन्फ्यूजन, नो स्टडी नो कंफ्यूजन. तो देश का ये हाल है कि ज्ञानी जन संशय में हैं और अज्ञानी कॉन्फिडेंस के सागर में गोते मार रहे हैं. ये बात हर क्षेत्र में लागू होती है. जो अपनी फील्ड के पीरों (Peers) की दिखाई लीक पर चलते रहे, वो मंजिल से भी आगे निकल गए. समय से आगे चलने वाले लोगों को समाज ने निपटा दिया. दरबारी समझदार टाइप के लोगों को मालूम था कि अपने आकाओं की इच्छानुसार धरती चपटी बता कर दरबार में सिक्का जमाया जा सकता है. भू को गोल बताने वालों के नसीब में सूली नहीं आएगी तो क्या सोने के सिक्के आएंगे. जब कोई कहता है कि दुनिया बहुत तरक्की कर गई है तो, वाणभट्ट का व्यक्तिगत मानना है कि भले ही आदमी चांद पर पहुंच गया लेकिन उसकी बेसिक फितरत नहीं बदली. आज तक जितनी शेर-ओ-शायरी दुनिया जहान में हुई है, उसमें इश्क से ज्यादा इंसान के छल-फरेब का ज़िक्र है. इश्क की शायरी भी वही मकबूल हुईं जहां इश्क में धोखा मिला हो या वो परवान न चढ़ पाया हो. अब तो लोगों का मानना है कि मकबूल इश्क सब्जी के थैले पर ख़त्म होता है. सो व्यवसाय कुछ भी हो, इंक्लूडिंग प्रेम (कुछ लोगों के लिए ये भी एक धंधा है), यदि कोई सीधी-सरल राह पर चलेगा तो घाटे में ही रहेगा. तो नेता लोग इससे कैसे बच सकते थे. उनका तो फुल टाइम काम ही है जनसेवा, जिसमें कोई नियमित तनख्वाह नहीं होती. इसलिए उसकी मजबूरी बन जाती है कि बगुला भगत बन के रहें. जनता की गरीबी हटाते-हटाते, ये कब अमीर हो जाते हैं, स्वयं इनको और इनके चमचों को पता ही नहीं चलता. चमचों की योग्यता ही इतनी होती है कि ये पतीला नहीं बन सकते. शेर के साथ रहने पर सियार को शिकार की चिन्ता नहीं करनी पड़ती. उसी उद्देश्य से ये पूरी वफादारी के साथ नेता जी के साथ लगे रहते हैं. नेता अगर पार्टी बदल ले तो ये भी पाला बदलने में देर नहीं लगाते. सबसे खास बात है कि सब के सब सिद्धांत वाली राजनीति की दुहाई देते नहीं अघाते. 

आम चुनाव की घोषणा के साथ ही सभी नेताओं को जनता की याद आने लगी है. सबकी जनसेवा करने की अदम्य इच्छा इसी मौसम में जागृत होती है. हर नेता अगले चुनाव के बाद अपने क्षेत्र को स्वर्ग बना देने के लिए लालायित दिख रहा है. उसके लिए वो एक से एक लोक-लुभावन वायदे कर रहा है. उसे मालूम है कि लहर एकतरफा है लेकिन जब मंच और माइक मिल जाए तो उसे बस फ्री-फंड की जबान ही तो हिलानी है. टेंट-वेंट भी कौन सा इनकी जेब से आता है. कुछ सट्टे बाज टाइप के लोगों को रेस के घोड़े पर दांव लगाने के बजाय नेता पर दांव लगाने में मजा आता है. जिस तरह कुछ फ्लॉप फिल्में लोग इसीलिए बनाते हैं कि उनकी काली कमाई खप जाए, उसी तरह कुछ धन्ना सेठ (अपनी बिरादरी के) नेता पर इसीलिए पैसा फूंक देते हैं, ताकि ब्लैक मनी हिल्ले लगाई का सके. वर्ना कुछ नेताओं के चाल-चलन-वचन को देख-सुन के शक होता है कि भला कौन इनको प्रमोट कर रहा है. आपको भले शक हो जाए लेकिन नेता का अंदाज वही रहता है, कि अगर जीत गए तो दुनिया बदल देंगे. आप की नहीं, अपनी. और यहीं पर नेता का कॉन्फिडेंस काम आता है. यदि वही कॉन्फिडेंस लूज कर जायेगा तो कौन उस पर पैसा लगाएगा.

अलग-अलग पार्टियां अलग-अलग घोषणापत्र घोषित कर रही हैं. और उनके नेता पूरे दम-खम से अपने-अपने दावे कर रहे हैं. जब काम में दम न हो तो बात में वजन नहीं रहता. इस कमी को पूरा करने के लिए लोग आवाज़ में पूरा दम लगा देते हैं. साउंड सिस्टम पर इको लगा कर जब नेता जी को अपनी आवाज़ अपने ही कानों तक पहुंचती है, तो उनका जोश उफान मारने लगता है. इस चक्कर में दो-चार वादे एक्स्ट्रा अपनी तरफ से कर जाते हैं जिनका घोषणापत्र में जिक्र तक नहीं होता. कॉन्फिडेंस का आलम तो ये होता है कि नेता जी को मालूम है कि जब हर बार वो ख़ुद अपने वादे भूल जाते हैं तो जनता क्या ख़ाक उन्हें याद रखेगी. अलबत्ता किराये की जनता को जनता मानना भी सही नहीं है. आजकल तो अख़बार और न्यूज़ चैनल्स का ज़माना है. यदि नेता की पार्टी लोकल है, तो लोकल मीडिया पर तो उसकी धौंस होनी ही चाहिए. उनको बता दिया जाता है कि वो कैमरा नेता जी पर ही फोकस रखें, ताकि टीवी की ऑडियंस को पता न चले कि सुनने वालों में सिर्फ़ टेंट-कुर्सी वाले ही थे. 

यदि आप एकदम फुरसत में हैं, तो दो-चार पार्टी के घोषणापत्र उठा लीजिए और उन्हें पढ़ने-समझने का प्रयास कीजिए. यदि वो समझ आ गए तो आपको सबमें एक साम्य देखने को मिलेगा. सबके निशाने पर गरीब-मजदूर-किसान ही मिलेगा. जिसके उत्थान के लिए सभी दल-बल सन सैंतालीस से लगे हुए हैं. सभी पार्टियां देश को सुखी और समृद्ध करने पर आमादा लगती हैं. महिलाओं और वंचितों को न्याय दिलाना सबका उद्देश्य है. हर एक के घोषणापत्र में हर किसी के लिए कुछ न कुछ ज़रूर है. दावा तो ये भी है कि जुल्म-ओ-सितम की रात का अन्त हो जाएगा. सबके लिए छत होगी पक्की और भूख जैसी चीज विलुप्त हो जायेगी. सरकारी नौकरी के इंतजार में निरन्तर बढ़ती हुई बेरोजगारी और बेरोजगार सबके टारगेट पर हैं. सब के सब घोषणापत्र बेरोजगारी के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं. कुल मिला कर सबका घोषणापत्र देख के लगता है कि इन सबकी विचारधारा तो एक है. सभी देश का विकास चाहते हैं. सभी जनता की समृद्धि चाहते हैं. सभी के इरादे बहुत अच्छे हैं. लेकिन जब वे एक-दूसरे के विरुद्ध बोलते हैं तो कहते हैं कि ये दो विचारधाराओं की लड़ाई है. उन्हें कॉन्फिडेंस है कि काम दिखा कर वोट नहीं मांगा जा सकता तो जनता को बरगला कर कंफ्यूज कर दो. दो दिन की छुट्टी में सबके घोषणापत्र खंगालने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि देश के नेता देश का विकास करने को तत्पर हैं लेकिन देश की जनता ही अपना विकास नहीं चाहती इसलिए देश विरोधी सरकार को चुन लेती है. सभी इस बार गलती की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जनता को जगाने में लगे हैं. सभी पार्टियों को लगता है कि जनता को जितने सब्जबाग (लॉलीपॉप) दिखाओगे, जीत की सम्भावना उतनी बढ़ती जायेगी. 

सभी मेनिफेस्टो का अध्ययन और मनन करने के बाद वाणभट्ट ने सोचा कि क्यों न एक सार्वभौमिक टाइप का मेनिफेस्टो बनाया जाए जिस पर देश और काल का प्रभाव न पड़े. चुनाव दर चुनाव आएं, लेकिन घोषणापत्र बदलना न पड़े. जब सभी, नेता और जनता, मुफ़्त का चन्दन घिसना चाह ही रहे हैं तो क्यों न उन्हीं के हिसाब से मेनिफेस्टो तैयार किया जाए. उसके सेलियंट बिन्दु नीचे लिखे हुए हैं. 

1. देश में पैदा होते ही हर व्यक्ति को पेंशन मिलेगी

2. पढ़ाई-लिखाई-भोजन-भवन सब फ्री

3. स्वास्थ्य सेवा सभी के लिए एकदम मुफ़्त 

4. हर हाथ को निश्चित काम

5. काम करने की आजादी, जो कर सकते हो वो करो

6. नहीं कर सकते तो मत करो, पेंशन तो है ही

7. जो करेगा उसे तनख्वाह मिलेगी पेंशन के अलावा

8. उद्यमियों को पूर्ण वित्तीय सहयोग और प्रोत्साहन

9. समस्त व्यय का वहन करदाताओं द्वारा

10. जाति-धर्म-भ्रष्टाचार समाप्त करके देश का विकास एक मात्र लक्ष्य

मेरे विचार से ये एक नवोन्मेषी, विकासशील और सर्वस्वीकार्य मेनिफेस्टो होना चाहिए. किसी को और कुछ फ्री में चाहिए तो सजेस्ट कर सकता है. इस मेनिफेस्टो के सभी कॉपीराइट, लेफ्ट है. जो चाहे, जहां चाहे इसे अपना सकता है. बल्कि मेरा मानना है कि सभी देशों को एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत इस एजेंडे को लागू करवाने का प्रयास करना चाहिए ताकि पृथ्वी पर किसी को गरीबी का सामना न करना पड़े. धर्म-जाति के नाम पर वैमनस्य का अन्त हो और भ्रष्ट आचरण की आवश्यकता ही न हो, आम आदमी को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए.

म्यूचुअल फंड की तरह, छोटे-छोटे शब्दों में एक वैधानिक चेतावनी भी देनी जरूरी है. इतनी सब पंजीरी लेने के बाद, किसी ने भी कोई भी ऐसा काम किया जो देश की अखंडता, अस्मिता और राष्ट्रीयता के विरुद्ध पाया गया, तो बेटा ऐसा तोड़ा जाएगा कि समझ नहीं आएगा कि खाएं कहां से और निकाले कहां से.

- वाणभट्ट

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

साइन्स

किसी भी विषय का व्यवस्थित ज्ञान ही विज्ञान है. चूंकि विज्ञान तार्किक होता है, तो हर कोई अपने विषय को वैज्ञानिक तरीके से व्यक्त करने में लगा है. हिस्ट्री तो हिस्ट्री, पॉलिटिक्स को भी विज्ञान सिद्ध करने के प्रयास किये जाते रहे हैं. संस्कृत जैसी भाषा गणित की तरह समृद्ध हैं, इसलिए भाषा को भी विज्ञान का दर्जा दिया गया है. हमारे देश में अंग्रेजों के आने के पहले तक विज्ञान हुआ करता था. लेकिन उनके आने के बाद चूंकि सारी शिक्षा व्यवस्था ही अंग्रेजी ओरियेंटेड हो गई तो विज्ञान को भी साइंस बनना ही था. इसके साइंस बनते ही देश का प्राचीन ज्ञान-विज्ञान विलुप्त प्राय हो गया. चार सौ साल की दासता में हमने ही जब अंग्रेजी को विद्वतजनों की भाषा मान लिया तो सारी की सारी पढायी अंग्रेजी पर शिफ्ट हो गई. सारा का सारा विज्ञान, साइंस बन के रह गया. जो कुछ भी अंग्रेजी में कहा या लिखा गया, उसे विश्वसनीय मान लिया गया. संभवतः किसी देश को गुलाम बनाने और बनाए रखने के लिए उसकी आत्मा को मारना जरूरी है, ये मुगलों और अंग्रेजों दोनो को पता था. तो एक ने फ़ारसी थोपी तो दूसरे ने अंग्रेजी. और भाषा किसी भी देश की आत्मा होती है. आज स्थिति ये है कि हमारे देश में हर विषय के ज्ञानी, अंग्रेज़ी में ही विमर्श करते हैं ताकि उनकी अंतरराष्ट्रीय साख बन सके. ऐसे में विज्ञान का साइंस हो जाना लाजमी भी था.

जब से बाबा जी ने कोर्ट में माफ़ी माँगी है कुछ लोगों की बाँछे खिली हुयी हैं. ये बात अलग है कि पूरी मेडिकल साइन्स एनाटॉमी के सम्पूर्ण ज्ञान के बाद भी आज तक ये नहीं खोज पायी कि बाँछें शरीर के किस भाग में पायी जाती है. लेकिन आश्चर्य की बात है की सबसे ज्यादा उसी प्रोफेशन के लोगों की खिली हैं. उन्हें बाबा पूरा का पूरा लाला लगता है. जब इतनी मेहनत, समय और पैसा खर्च करके किसी ने एलोपैथी में मेडिकल की डिग्री पायी हो तो उसका आयुर्वेद से वैमनस्य जायज़ भी है. बचपन से उसका और उसके परिवार का सपना था कि समाज सेवा के लिये मेडिकल जैसे नोबल प्रोफेशन को चुने. एण्ड यू नो, मेवा आलवेज़ फ़ॉल्लोज़ सेवा. तो सेवा के पीछे की मेवा आज के मेडिकल प्रोफेशन की सच्चाई बन चुकी है. मेवे के लिये आज सेवा करने को लोग उद्धत दिख रहे हैं. प्रेगनेंसी से लेकर मरने से पहले वेंटिलेटर तक की यात्रा कोई भी व्यक्ति बिना डॉक्टर के नहीं कर सकता. जब सिजेरियन बच्चा देश-काल के अनुसार कभी भी धरा पर अवतरित किया जा सकता है तो आपको बस पंडित जी से शुभ लग्न-मुहूर्त बिचरवाना है. वैसे भी नॉर्मल डिलीवरी पचास हज़ार तो सिजेरियन डेढ़ लाख दे कर जाती है. तो भला किसका मन सेवा करने को प्रेरित नहीं होगा. लिहाजा पूरे शहर में होटल कम और हॉस्पिटल ज्यादा हो गये हैं. और हॉस्पिटल्स में होटल्स वाली सभी सुविधायें उपलब्ध हैं. इसीलिए देश के स्वनाम धन्य महापुरुषों की ओर जब ईडी और सीबीआई नज़र फेरती है तो उनको मालूम होता है कि कौन सी बीमारी उन्हें अस्पताल ले जायेगी और कौन सी जेल. जिस भ्रष्टाचारी के हाथ रिश्वत लेते कभी नहीं काँपे उसको दिल का दौरा पड़ने लगता है. यहाँ साइंस एक विशेष रूप ले लेती है जो आदमी-आदमी में फ़र्क करना जानती है. ये नेता के प्रोफाइल पर निर्भर करता है (सत्ता पक्ष या विपक्ष) कि उसे बीमार माना जाये या बहानेबाज. सिद्ध करने के लिये हाइली क्वालिफाइड डॉक्टर्स का पूरा हुजूम होता है. जो अगर लिख दें कि आदमी मर गया है तो यमराज को धरती पर आना पड़ जाये. इसी साइन्स के आधार पर तो उन्होंने होम्योपैथी और आयुर्वेद को ब्लैक मैजिक या क्वैक या शुद्ध हिन्दी में झोलाछाप की श्रेणी में डाल रखा है. यहीं से मेरा साइंस को लेकर अन्तर्द्वंद आरम्भ होता है. 

विज्ञान आदमी के धरती पर आने से पहले भी था और बाद में भी रहेगा. आपके आसपास जो कुछ भी है या जो कुछ भी घटित हो रहा है उसको समझना-समझाना ही विज्ञान की सहज परिभाषा है. हर देश काल में लोगों ने प्रकृति के रहस्यों को अपने अपने ढंग से देखा-समझा. जैसे-जैसे आदमी का ज्ञान बढ़ता गया, उसकी जिज्ञासा भी बढती गयी. और विज्ञान भी विभिन्न आयामों में विस्तार लेता गया. कुछ पुरानी अभिव्यन्जनायें टूटी, कुछ नयी अवधारणायें बनी. इस तरह कड़ियों से कड़ियाँ जुड़ती गयीं और विज्ञान का चतुर्मुखी विकास होता गया. आज ब्रम्हाण्ड का कोई भी विषय मानव के आधुनिक विज्ञान से अछूता नहीं रह गया है. एक युग की खोज अगले युग का आधार बनती गयी. अपने पूर्वजों, विशेषकर भारतीय पूर्वजों का, वैज्ञानिक ज्ञान कभी-कभी हतप्रभ कर देता है कि बिना आधुनिक यन्त्रों, साधनों और मानकों के कैसे उन्होंने खगोलीय और भूमंडलीय गणनाओं का सटीक अध्ययन कर डाला. भोजन में क्या पथ्य है, क्या अपथ्य, बिना खाद्य प्रमाणीकरण संस्था के कैसे संभव हुआ होगा. भोजन के लिये उपयोगी खाद्य पदार्थों और वनस्पतियों/प्राणियों की एक लम्बी अन्तहीन सूची है. किस पथ्य से शरीर के किस भाग को क्या पोषण मिलेगा, इसका भी भान हमारे पूर्वजों को था. बिना इन्क्युबेटर शेकर, माइक्रोस्कोप, सेंट्रीफ्यूज, एचपीएलसी, स्पेक्ट्रो फोटोमीटर आदि यन्त्रों के विभिन्न वनस्पतियों के पौष्टिक, औषधीय और चिकित्सकीय गुणों का आँकलन, सिद्ध करता है कि विज्ञान ही नहीं, अपने मनीषियों का अन्तर्ज्ञान भी अपने चरम पर रहा होगा. लेकिन उनका ज्ञान सहज सभी को उपलब्ध था क्योंकि उसका उद्देश्य ही जन कल्याण था. यह ज्ञान अनुश्रुतियों और पांडुलिपियों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहा. हर पीढ़ी इसे समृद्ध करते हुये अगली पीढ़ी को सौंपती गयी. यहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ का सर्वथा अभाव था. वसुधैव कुटुम्बकम का पालन करने वाले देश का इतिहास कभी भी विस्तारवादी नहीं रहा. समृद्धि और ख्याति दिग-दिगान्तर में ऐसी थी कि देश सोने की चिड़िया के नाम से प्रसिद्ध था. कबीलाई प्रकृति की विस्तारवादी साम्राज्यों ने लूटने के उद्देश्य से ही देश को दासता की बेड़ियों में जकड़ कर रख दिया. सहस्त्र वर्षों की दासता ने यदि सबसे अधिक हानि पहुँचायी है तो वो है मानवता को. 

गुलामों का न कोई इतिहास होता है, न भाषा, न विज्ञान. उस समय के वैज्ञानिकों (ऋषियों-मुनियों-गुनियों) के अन्वेषण और अनुसन्धान का उद्देश्य लोक कल्याण था इसलिये ज्ञान को लाभ के लिये छापने का विचार कदाचित किसी के हृदय में भी आया हो. विदेशों में तो परिकल्पनाओं के साथ वैज्ञानिकों के नाम जोड़ने की प्रथा बन गयी. जिसने उन्हें अमरत्व प्रदान कर दिया. आवोगाद्रो हों, ओम हों, न्यूटन हों या आर्केमीडीज़, अपनी खोज के साथ अपना नाम जोड़े बिना नहीं रह पाये. विज्ञान में स्वार्थ का आरम्भ भी सम्भवतः यहीं से हुआ हो. चूँकि लिपिबद्ध करने का कार्य हमारे पुरखों ने अगली पीढ़ी के लिये ज्ञान संरक्षण के लिये किया था, उसके किसी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा में छापने का तो प्रश्न ही नहीं होता. पश्चिमी देशों की इस बात की तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि शोध हो, इतिहास हो या विचार उसके प्रचार-प्रसार के लिये वो उसे न सिर्फ लिखते हैं बल्कि छापते भी हैं. अगर हमारे कुछ महापुरुष यदि विदेश न जाते तो, व्यक्तिवाद को न मानने वाले भारत वर्ष में शायद ही कोई उनको पहचान पाता. ये बात अलग है कि वो दुनिया के सामने वही तथ्य रखते हैं जिसे वो दिखाना चाहते हैं. इसमें इतिहास या विज्ञान को तोड़-मरोड़ के प्रस्तुत करना हो तो उन्हें कैसा गुरेज. वैसे भी शासक का विशेषाधिकार है कि वो सब कुछ अपने हिसाब से लिखता या लिखवाता रहे.   

देश को सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ है अंग्रेजी शिक्षा पद्यति के थोपे जाने से. अँग्रेज यहाँ शासन करने के उद्देश्य से आये थे, उनका यहाँ या किसी अन्य देश से भी वापस जाने का इरादा नहीं था. इसीलिए उन्होंने जहाँ भी राज किया वहाँ के इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश किया. शिक्षा भी वो ऐसी देना चाहते थे जो उनके अनुसार और उनके लिये उपयोगी हो. इसके लिये उन्होंने हमारी शिक्षा प्रणाली पर ही आघात किया. अधिक दिन पहले की बात नहीं है, लगभग चार दशक पहले तक, इंजीनियरिंग के सेलेक्शन में अंग्रेजी में क्वालीफाई करने के बाद ही गणित-भौतिकी-रसायन की कॉपी चेक होती थी. जाहिर है हिन्दी मीडियम के वो ही छात्र इंजीनियरिंग में प्रवेश पाते थे जो समृद्ध घरों से सम्बन्ध रखते थे. यही हाल मेडिकल में भी रहा होगा. उच्च शिक्षा की किताबें तो आज भी अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध हैं. जिस देश को अपनी भाषा पर गर्व न हो उस देश की अस्मिता को दूसरे देश भला क्यों मान्यता दे. आज़ादी के बाद देश की बागडोर समृद्ध घरों की अंग्रेजी में पढ़ी-बढ़ी पौध के हाथों में स्वतः आ गयी. ये पीढ़ी अंग्रेजों के मूलभूत सिद्धांतों और मान्यताओं पर ही चल निकली. विज्ञान भी वही मान लिया गया जो अंग्रेजी में उपलब्ध था बल्कि ये कहना उचित होगा कि अंग्रेजी को ही विज्ञान मान लिया गया. जो भी अंग्रेजी में छप गया वो ब्रह्मवाक्य हो गया. देश की पुरातन ज्ञान परम्परा को हमारे ही नव शिक्षित-दीक्षित लोगों ने ओब्सोलीट (अप्रचलित) मान लिया. 

बाबा जी को मैं लगभग 1996 से फ़ॉलो कर रहा हूँ. जब ये आस्था चैनेल पर दो घन्टे हायर करते थे. तब भी इनका प्रोग्राम सुबह पाँच से आरम्भ हो कर सात बजे तक चलता था. तब इनका मुख्य विमर्श योगासन-प्राणायाम और इनसे होने वाले स्वास्थ्य लाभ पर हुआ करता था. अलग-अलग शहरों में इनके शिविर लगा करते थे जिनका सीधा या रिकोर्ड किया हुआ प्रसारण बिना नागा 365 दिन आया करता था. बाद में अपने सहपाठी के साथ मिल कर इन्होने आयुर्वेद को प्रतिष्ठित करने का भी काम किया. धीरे-धीरे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी. इन्होने न सिर्फ चैनेल ख़रीदा बल्कि आयुर्वेदिक दवाओं का काम भी आरम्भ कर दिया. इनका उद्देश्य आज भी अपनी दवाएं बेचने का नहीं होता. ये आज भी आयुर्वेदिक दवाइयाँ बनाने की पूरी विधि बताते हैं. हाँ यदि आपको बनाने में झन्झट लगे तो इनकी फार्मेसी दवाइयाँ भी बनाती हैं. हर शहर में इनके स्टोर्स हैं जिनके माध्यम से ये दैनिक उपयोग की सभी वस्तुओं को उपलब्ध कराते हैं. बताने वाले तो ये भी बताते हैं कि इन्होने ऋषिकेश में गंगा के किनारे से 10-20 चेलों के साथ शुरुआत की थी. आज लोग इन्हें लाला बोलने से नहीं चूकते लेकिन इन्होने योग-प्राणायाम-आयुर्वेद को विश्व में अहम् स्थान दिलाने के लिये अथक संघर्ष किया है. पूरी दुनिया बाबा का लोहा मान रही है. अफ़सोस की बात तो ये है कि जो नहीं मान रहे हैं वे अपने ही लोग हैं, जिन्होंने अंग्रेजी में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान पढ़ा है और अपनी पुरातन चिकित्सा पद्यति के बारे में जानने का प्रयास भी नहीं किया है. बाबा का संघर्ष कम हो सकता था यदि आधुनिक मेडिकल साइंस के जानने वाले आयुर्वेद से होने वाले चिकित्सकीय लाभ की पुष्टि करें और उसका समर्थन करें. ऐसे शोध पत्रों को विदेशी जर्नल्स में अंग्रेजी भाषा में छपवायें. निश्चय ही जनकल्याण के इस मिशन के लिये उन्हें व्यावसायिक लाभ के चक्रव्यूह से बचना पड़ेगा. 

मानव जीवन इलाज करने-करवाने के लिये नहीं मिला है. अन्य प्राणियों की तरह हमारा भी जीवन चक्र है. दवाइयों के सहारे सिर्फ जीवित रहना जीवन का उद्देश्य नहीं है. भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन, मन, शरीर और आत्मा से मिल कर बना है. अपने मन और शरीर को स्वस्थ रखना हर व्यक्ति की प्राथमिकता होनी चाहिये. नींद-भोजन-व्यायाम के बाद दवाइयों का नम्बर आता है. दवाई चाहे किसी भी पैथी की हों, उनका उपयोग आखिरी विकल्प होना चाहिए. यदि एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद तीनों चिकित्सा पद्यातियाँ मिल कर काम करें तो निसंदेह ही बहुत सी बीमारियों और उनके इलाज से बचा जा सकता है. कोरोना काल में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसने काढ़ा न पिया हो चाहे वो कितना भी अंग्रेजी में पढ़ा-लिखा डॉक्टर हो, इंजीनियर हो, वकील हो या न्यायाधीश. प्राणायाम-योग-ध्यान की महत्ता विश्व समझ रहा है. इतिहास बदला तो नहीं जा सकता लेकिन ठीक अवश्य किया जा सकता है. इसके लिये ये समझना आवश्यक है कि अंग्रेजी में लिखी सब बातें विज्ञान नहीं हैं और विज्ञान को इतना उदार बनना ही पड़ेगा कि नये और पुराने ज्ञान को आत्मसात कर सके.

-वाणभट्ट   

प्रदूषण

हर ओर है धुआँ और धुंध  साँसों पर पहरा है हवाओं का  शोर इतना है कि  कान का बहरा जाना भी है सम्भव  तारे भी छुप जाते हैं रातों में अपना अस्तित्...