तुम थीं
तब कभी नहीं लगा
तुम हो
अब जब
तुम नहीं हो
तो
लगता है
तुम हो
-वाणभट्ट
एक नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं...पहचान का प्रतीक...सादे पन्नों पर लिख कर नाम...स्वीकारता हूँ अपने अस्तित्व को...सच के साथ हूँ...ईमानदार आवाज़ हूँ...बुराई के खिलाफ हूँ...अदना इंसान हूँ...जो सिर्फ इंसानों से मिलता है...और...सिर्फ और सिर्फ इंसानियत पर मिटता है...
खेत ख़राब हो गया था. बल्कि ये कहना अधिक उचित होगा कि खेत को जान बूझ के ख़राब किया गया था, विषाणुओं द्वारा. इन सिक प्लाट में फसलों की प्रजातियों की स्क्रीनिंग होती है. जो प्रजाति सिक प्लाट में जी गयी, अमूमन मान लिया जाता है कि उस प्रजाति पर बीमारी का असर नहीं होगा. यहाँ पर ये देखना मुख्य मक़सद है कि कौन-कौन सी वेरायटीज़ फेल हुयी, कौन सी पास. प्रजातियों के चयन का एक टाइम टेस्टेड फ़ॉर्मूला है. रेस में सबको दौड़ा दो, जो जीत गया, वो जीत गया, जो हार गया, वो कहाँ गया. कौन जाने. जो रेस में शामिल नहीं हुये, उन्हें खोजो और खोज के सिक प्लाट में लगाओ. उन्हीं में कहीं प्रतिरोधकता मिल सकती है. गोया मुद्दा है कि-
अब हवायें ही करेंगी रौशनी का फैसला
जिस दिये में जान होगी वो दिया बच जायेगा - मशहर बदायुँनी
अब जब दिये को झोंक ही दिया तूफ़ान में, तो बेचारा ऊपर वाले के रहम-ओ-करम से ही बचेगा. बहुत से काम बस इसलिये किये जाते हैं कि हमसे पहले जितने भी विद्वान हुये, उन्हीं के बनाये रास्तों का अनुसरण सफलता की गारेंटी है. लीक से हट कर भला सोचने का न किसी के पास समय है, न माद्दा. पेड़-पौधे अपनी जगह तो छोड़ नहीं सकते. लड़ते तो वो भी होंगे, आखिरी साँस तक सर्वाइवल के लिये कि दो-चार बीज ही बन जायें. उनका वंश तो आगे बढ़ सके. जो प्रजातियाँ फेल हो गयीं, वो भी कहीं न कहीं तो जी ही रही होंगी. लोगों ने नाम मिटा भी दिया तो क्या. जीवन तो चलता रहता है. रेस हारने वाला हर व्यक्ति धरती नहीं छोड़ देता. ये बात शायद पेड़-पौधों पर भी लागू होती हो.
शर्मा जी का चेहरा फ़क्र से चमक उठता, जब भी किसी को बताते कि उनके दोनों बच्चे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में कैसे पहुँचे. इसके पीछे मिसेज और मिस्टर शर्मा का बड़ा त्याग था. घर में पढ़ाई-लिखाई के माहौल का निर्माण तो माँ-बाप को ही करना होता है. जब तक बच्चों का सेलेक्शन नहीं हो गया, घर में टीवी नहीं आया. तब नेट और मोबाईल का जमाना नहीं था. मनोरंजन के नाम पर रेडियो पर विविध भारती और सीलोन के अलावा कुछ न था. टीवी नया-नया आया था. दस किलोमीटर रेन्ज के टावर्स लगने शुरू हुये थे. जल्द ही टीवी का आकर्षण रेडियो के उपर हावी होने लगा. चित्रहार और फिल्मों का क्रेज़ बढ़ गया. पूरे मोहल्ले ने टीवी ले लिया. बस शर्मा के घर में टीवी नहीं आया. ऐसा नहीं था कि वो अफोर्ड न कर सकते हों. अपने बच्चों को सांत्वना देते रहे कि एक बार सेलेक्ट हो जाओ, फिर ले लेंगे. बच्चों ने उन्हें निराश नहीं किया. लेकिन उनके घर टीवी तब आया जब बड़े बेटे ने जॉब जॉइन कर लिया. माँ-बाप के पास एक्सक्यूज़ था कि अब बच्चे बाहर हैं, तो हम लोग टीवी का क्या करेंगे. जल्द ही दूसरा बेटा भी ग्रेजुएशन कर के जॉब में लग गया. मल्टी-नेशनल कम्पनियाँ थीं. अच्छे पैकेज और पर्क्स थे.
बच्चे तेज तो थे ही. शीघ्र ही उन्हें अंदाज़ लग गया कि ये कम्पनियाँ दरअसल सस्ते मानव श्रम के लिये भारत में अपने ऑफ़िस खोल लेती हैं. यहाँ की सैलरी और टीए-डीए के दाम में उन्हें विदेशों के प्रोजेक्टस् में काम कराती हैं. पेरेंट्स इसी में खुश की मेरा बेटा हवाई जहाज से यूरोप-अमरीका जा रहा है. वो भी कम्पनी के ख़र्चे पर. वहाँ जा कर उन्हें पता चला कि उसी काम के लिये वहाँ के लोगों की तनख्वाह उनकी सैलरी से दो गुनी और तीन गुनी है. यहाँ पर कम्पनी में मैनेजमेंट हावी था. प्राय: एमबीए किये लोग उच्च पदों पर काबिज़ थे. उनका काम, बड़ी-बड़ी प्लानिंग करना और वो काम दूसरों से करवाना होता है. यहाँ सबॉर्डिनेशन का तरीक़ा ही है हाँकने वाला. वो काम भी बताते, तो मानो आदेश दे रहे हों. इतना पढने-लिखने के बाद कभी-कभी बॉसों बद्तमीज़ी अखर जाती. वो ह्युमिलियेट करने का कोई भी मौका न छोड़ते. टीम में, टीम भावना की कमी बनाये रखना, मैनेजमेंट का गुर था. प्रोफ़ेशनल्स होने के बाद भी प्रमोशंस-इंक्रीमेंट में भाई-भतीजा वाद झलक ही जाता. अब तक वो कई बार कई विकसित देश भ्रमण कर चुके थे. विकसित देशों में वर्किंग एनवायरमेन्ट अलग था. मैनेजमेंट में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं था, कम से कम दिखता तो नहीं था. बाहरी होने के बाद भी सब मिल कर टीम में काम करते. यहाँ पर कई बार उनका सामना देश-समाज में व्याप्त मल्टी लेवल भ्रष्टाचार से भी हो चुका था. बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अन्तर को उन्होंने महसूस किया. इस वातावरण में, विशेषकर विदेश में देखने के बाद, कभी-कभी उन्हें घुटन होने लगती. लगता यही काम हम विकसित देशों में रह कर भी तो कर सकते हैं. उनके ज्ञान चक्षु खुलने लगे. ज्ञान-विज्ञान की कोई सीमा तो है नहीं. दोनों ने निर्णय लिया कि बाहर ही निकल लिया जाये.
अपने देश में बच्चों को सेटेल करने की जिम्मेदारी भी पेरेंट्स की तब पूरी मानी जाती है, जब तक बच्चों का विवाह न हो जाये. अच्छी नौकरी हो तो शादी में अधिक दिक्कत नहीं होती. शादी करवा के शर्मा जी अभी बहू-बच्चों के सुख की कल्पना में डूबे ही थे, जब बच्चों ने अपना निर्णय सुना दिया. कारण पर्याप्त थे. बच्चों को उन्होंने पढ़ाया ही इसी लिये था कि खुले आसमान में अपनी उड़ान उड़ सकें. अपने लिये उन्हें रोकना, उन्हें उचित नहीं लगा. बुरा भी लगा कि बच्चों के पर निकल आये हैं, निर्णय से पहले पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा. बच्चों का तर्क था, कोई हमेशा के लिये थोड़ी न जा रहे हैं. जैसे बंगलोर, वैसे जर्मनी. जब आप चाहेंगे, हम आ जायेंगे. परिंदे घोसले से इस तरह अचानक उड़ जायेंगे, ऐसा शर्मा जी ने न सोचा था. बच्चे अपना भला-बुरा समझते हैं, ये सोच कर उन्हें संतोष करना पड़ा.
जिन बच्चों के कारण जो माँ-बाप कभी मोहल्ले वालों की ईर्ष्या के पात्र थे, वही माँ-बाप देश में अकेले रह गये. जितने लोग उतनी बातें. देखो बुढ़ापे में पेरेंट्स को भला कौन छोड़ के जाता है. देश-प्रेम भी कुछ होता है. भाई सेवा ही करनी है तो अपने देश की करो. फ़िरंगी तो अभी भी हमें ग़ुलाम ही समझते हैं. दोयम दर्ज़े का व्यवहार होता है. कभी बच्चों को इतना न पढ़ाओ कि आपके ही काम न आ सकें. इससे अच्छा तो मेरा बेटा है, नौकरी नहीं लगी तो क्या, कम से कम साथ तो रहता है. शर्मा जी को बच्चों के जाने का उतना ग़म नहीं था, जितना पास-पड़ोस-रिश्तेदारों के तानों का था. वो सबसे कटने लगे. अन्दर ही अन्दर कुछ टूट सा गया था. अँग्रेजी में चिकित्सा शास्त्र पढ़े डॉक्टर्स ने उनकी समस्या को मानसिक बीमारी, डिप्रेशन मान लिया. मॉडर्न मेडिकल साइंस में हर मर्ज़ का शर्तिया इलाज है. उस ज्ञान का अर्जन डॉक्टर्स नें वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किया है. आयुर्वेद-योग-ध्यान को टोटका-टोना मानने वालों के तरकश में दवाईयों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है. शर्मा जी को डिप्रेशन से बचाने वाली दवाइयों की डोज़ जैसे-जैसे बढ़ती गयी, उनका मर्ज़ बढ़ता गया.
मरीज-ए-इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की - शाद लखनवी
जिस देश की खासियत है कि लोग दूसरे के दुःख से कम, सुख से अधिक दुःखी होते हों, वहाँ मिसेज और मिस्टर शर्मा अपने बच्चों की सफलता को ठीक से सेलिब्रेट भी नहीं कर पाये. कभी-कभी शर्मा जी लगता कि वो जीत के भी बाज़ी हार गये. हार नहीं मानी थी, तो मिसेज शर्मा ने. वो शर्मा की छोटे बच्चे की तरह देख-सम्हाल करतीं.
दो-तीन साल बीत गये जब बच्चों को माँ ने पिता के डीप डिप्रेशन के बारे में बताया. वहाँ के व्यवस्थित जीवन में बच्चों के परिवार को रास आ गया था. इसलिये वापस लौटने का प्रश्न न था. बच्चे लायक थे ही. विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में सफल भी थे. अब तक ठीक से इस्टैब्लिश हो चुके थे. उन्होंने पापा-मम्मी को अपने पास बुलाने का निश्चय किया. जिनके बच्चे वहाँ हों, वो अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप को भी ला सकते थे. वहाँ नियमों में ऐसा भी प्रावधान है. उनके देश के लिये काम करने वाले एक्सपीरियेन्सड व्यक्ति को रोकने के संभावनायें तलाश ली जाती हैं. बच्चों और बच्चों के बच्चों के साथ शर्मा का डिप्रेशन छूमंतर हो गया. स्वस्थ लाइफ़ स्टाइल और दिनचर्या के कारण शर्मा की सभी दवायें जल्द बन्द हो गयीं. शर्मा परिवार अब सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एक सफल परिवार था. वहाँ की आबो-हवा उन्हें भा गयी. कभी कभार वो पास-पड़ोस-रिश्तेदारों को वीडियो फोन कर लिया करते. उनके खुशी से दमकते चेहरों को देख इष्ट-मित्रों के चेहरे मुरझा जाते. अब वो एक खुशहाल जीवन जी रहे थे.
हवा में प्रदूषण कम. एक्यूआई 2-4 के बीच. हरियाली हर तरफ़. टैक्स ज़्यादा पर भ्रष्टाचार कम. इसलिये जनता को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सरकारी सुविधाओं पर भी भरोसा था. शिक्षा लगभग फ़्री. सीनियर सिटिज़न्स को थीं, एडिशनल सुविधायें, वो भी मुफ़्त. शर्मा ने बच्चों के पास वहीं सेटेल होने का निश्चय कर लिया. मिसेज शर्मा भी वो दिन भूल न पायी थीं, कैसे तमाम करीबी पास-पड़ोस-नाते-रिश्तेदारों के रहते हुये भी वो अपने देश, अपने शहर में अकेले रह गये थे. यहाँ सोशल सेक्योरिटी अधिक थी. विकसित, और पचास से अधिक सालों से सतत विकासशील, देश में बड़ा अन्तर है. वहाँ आदमी की वैल्यू थी. कोई जानता हो या न जानता हो, मिलेगा तो आत्मीयता से. मैनर्स, सॉरी-थैंक यू-एक्यूज़ मी, उनको बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है. हमारे यहाँ तो एरोगेंस को स्मार्टनेस का पर्याय मान लिया गया है. जो जितना सक्षम है, उतना ही बदतमीज़. ऊँची- ऊँची बिल्डिंग्स, मॉल्स और मेट्रो से देश नहीं बनता. देश बनता है लोगों से. उनकी शिक्षा व्यवस्था से. वाह्य भौतिक प्रगति जिसे दुनिया देखती है, उस वातावरण का उप-उत्पाद है. शीघ्र ही मिसेज और मिस्टर शर्मा वहाँ रम गये. आखिरी बार वो आये तो अपनी सारी चल-अचल सम्पत्ति डिस्पोज़ करने के लिये आये.
दस-पन्द्रह दिन के प्रवास में उनका प्रयास था, रिश्तेदारों-पास-पड़ोस से मिल लिया जाये. पता नहीं फिर आना हो, न हो. मेरा उनसे परिचय बस आते-जाते सामने पड़ जाने पर दुआ-सलाम तक ही सीमित था. पता चला कि वो हमेशा के लिये इंडिया छोड़ के जा रहे हैं, तो मेरी जिज्ञासा बलवती हो गयी, ये जानने के लिये कि इस उम्र में कैसे कोई अपना देश छोड़, विदेश में बसने की सोच सकता है. मेरे शाम की चाय के इन्वीटेशन को उन्होंने स्वीकार कर लिया.
वो शाम को आये. उनके साथ थीं, बच्चों के लिये चॉकलेट्स, हम लोगों के लिये कुछ गिफ्ट्स, और हमें दिखाने के लिये उनकी फ़ोटो एल्बम. चाय पीने के बाद उन्होंने अपनी एल्बम दिखानी शुरू कर दी. साफ़-सुथरे शहर, वेल मेंटेण्ड पार्क्स, नियंत्रित ट्रैफ़िक, मॉल और अस्पताल, सब अद्भुत, सब वर्ल्ड क्लास. हम भारतीयों को सम्वेदना देने की ग़ज़ब बीमारी है. मैंने उनकी दुखती रग कुरेदने की कोशिश की. 'अपने जन्म स्थल से इतनी दूर जा के रहना, वो भी उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ अजीब नहीं है'. दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराये. बोले 'जाना कौन चाहता है, अपना घर, अपना देश छोड़ कर. लेकिन बुज़ुर्गों का जीवन यहाँ कठिन है, विशेषकर जब बच्चे साथ न हों. बच्चों को भी लगता है उन्हें उचित वातावरण नहीं मिला, जिसमें उनकी प्रतिभा को चुनौती मिले. उन्हें लगता कि बाहर उनके काम की अधिक कद्र है, वो ग्रो कर सकते हैं. प्रतिष्ठित कॉलेजों में पढ़ने के बाद भी मेरे बच्चे आय के मामले में भ्रष्ट विभागों के अपने दोस्तों से कहीं पीछे थे. वहाँ वो अच्छा कर रहे हैं. संतुष्ट हैं. सब सुविधायें सबके लिये, और सुविधाओं के लिये किसी प्रकार का संघर्ष नहीं है. यहाँ तो अनार कम और बीमार अधिक हैं. जीवन क्या होता है, वहाँ जा के हमने जाना. कोई आपा धापी नहीं, कोई होड़ नहीं. जीवन में जितना जीवन है, बस उसी को जीना है. अब बच्चे तो आने से रहे. हमारा भी मन लग गया है. तरक्की की होड़ में हमने इंसानियत को तिलांजलि दे दी. शिक्षित लोगों में भी देश-समाज के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना का अभाव है. वहाँ जा के पता लगता है कि वो क्यों विकसित हैं और हम क्यों विकासशील. आप ऐसा वातावरण बनाइये जिसमें लोग फलें-फूलें, आगे बढ़ें. अच्छे लोग जब आगे जाते हैं तो वो देश-समाज को कुछ दे कर ही जाते हैं. इस तरह समाज का विकास होता है. 'सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट' और 'माइट इज़ राइट' का नियम जंगल का कानून हो सकता है, किसी सभ्य समाज का नहीं. सब रेस में लगे हैं, अपने ही पास-पड़ोस-साथी-रिश्तेदारों से आगे निकलने के लिये. देश को अगर विकसित बनना है तो वातावरण बनाना होगा. देश का आधार सुदृढ़ करने के लिये, बच्चों पर, शिक्षा पर निवेश करना होगा. उन्हें सिर्फ़ मैनर्स सिखाना होगा, उन्हें शिक्षा का उद्देश्य सिखाना होगा. शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. 25 साल बाद जो भारत बनेगा, वो सही मायनों में विकसित होगा. जब तक ये बात समझ नहीं आती, लोग इमारतों-मेट्रो और सड़कों विकास मान कर उसी में ही उलझे रहेंगे. ब्रेन ड्रेन न हो इसके लिये, स्कूल से रोजगार तक, एक समन्वित योजना बनानी होगी. ताकि बच्चों को इन्वेंशन और इनोवेशन के लिये प्रोत्साहन मिले'. चन्द घण्टों में उनका पूरा जीवन चरित हमारे सामने था. उनके मन में कहीं ये मलाल ज़रूर था, कि यहाँ सब ठीक होता तो हमें और हमारे बच्चों को बाहर जाने की क्या ज़रूरत थी.
मेरी आँखों के सामने सिक प्लॉट घूम रहा था. प्रजातियों की स्क्रीनिंग के लिये मृदा में विषाणुओं को विकसित किया है ताकि ये चेक किया जा सके कि कौन सी प्रजाति जीवित बचती है. जैसे हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, पेड़-पौधों में भी होगी. एक अवगुण के कारण बाकी सारे गुण समाप्त तो नहीं हो जाते. उसी तरह पेड़ पौधों को भी उनके गुण के आधार पर सेलेक्ट किया जाना चाहिये. स्वस्थ मृदा के खेत में सम्भव है, उसके अन्य गुण निखर के सामने आते. सिर्फ़ उत्पादन और उत्पादकता की रेस में शायद हम खोते जा रहे हैं, उन प्रजातियों को, जिनका चयन स्वाद, गंध, आकार, रंग, व्यन्जन विधि आदि कितने ही गुणों के लिये किया जा सकता था. स्वस्थ मृदा और वातावरण में गुण आधारित स्क्रीनिंग करने की आवश्यकता है. ये कुछ वैसा ही है कि भ्रष्ट और बेईमान समाज में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का फ़ेल हो जाना. दुराग्रही लोगों के बाहुल्य ने पूरे देश को ही सिक प्लॉट बना दिया है. सीधे और शरीफ़ लोग सर्वाईवल मोड में चले जाते हैं. अपने को समाज के हिसाब से फ़िट रखने के प्रयास में लगे रहना, उनके लिये बड़ी चुनौती है. सड़क, बिजली, मेट्रो, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स आदि भौतिक तरक्की की बानगी तो दिखाते हैं, किन्तु गिरते नैतिक मूल्यों और सभ्यता विहीन समाज, निकट भविष्य में हमारे विकसित राष्ट्र के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं. व्यक्तिगत समृद्धि तो हो रही है, किन्तु एक देश, एक समाज के रूप में कभी-कभी लगता है, हम पिछड़ते जा रहे हैं. जिनमें क्षमता-योग्यता होगी, वो सही वातावरण की तलाश में लगा रहेगा. इसलिये जिसको मौका मिल रहा है वो पलायन कर जाता है. चाहे गाँव से शहर की ओर, चाहे शहर से मेट्रो सिटी की ओर, और चाहे मेट्रो सिटी से विदेश की ओर. जिस व्यक्ति के लिये यहाँ सर्वाइव करने के लाले पड़े थे, वही विदेश में झंडे गाड़ रहा है.
आदमी और पेड़, दोनों में जीवन है. अन्तर बस इतना है, पेड़ स्थिर है, जड़ है, जमीन के बिना उसका अस्तित्व नहीं है. वो अपनी जगह, अपना वातावरण नहीं बदल सकता, आदमी बदल सकता है. आदमी भी जब एक जगह रुक जाता है, तो कुछ-कुछ पेड़ बन जाता है. उसी जमीन, उसी वातावरण में रहना उसकी बाध्यता बन जाती है.
- वाणभट्ट
हमारे देश की एक खासियत है. हर व्यक्ति अपने अपने दृष्टिकोण से सही है. और एक खासियत है कि अगर हम गलत हों भी तो मान क्यों लें. अगर आवाज़ में दम है और पीछे से किसी महापुरुष का बैकअप है, तो आप कुछ भी कीजिये, कोई आप का बाल भी बाँका नहीं कर सकता. निरीह वो व्यक्ति है, जिसको संशय है. उसकी बात में वो कॉन्फिडेंस नहीं आता, जितना संशयरहित व्यक्ति की बातों में रहता है. 'मोर स्टडी, मोर कंफ्यूज़न, नो स्टडी नो कंफ्यूज़न' का सिद्धांत जिसने भी प्रतिपादित किया होगा, गहन अनुभव के बाद ही किया होगा. बातों के बताशे फोड़ने वाले, हथेली पर सरसों उगा दें.
कॉन्फिडेंस की कमी भारत की एक मूल बीमारी है. यहाँ पैदा होने से मरने तक सब अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिये दूसरे का कॉन्फिडेंस तोड़ने में लगे रहते हैं. घर में बाप को और स्कूल में टीचर को सब बच्चे नाकारा लगते हैं, यदि आप टॉप थ्री में रैंक नहीं करते. टॉप टेन तक भी बच्चों को फ़्रंट रो मिल जाती थी. बाकी के कॉन्फिडेंस को तोड़ने में टीचर-माँ-बाप कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ते. पिछली सीट पर बैठने वाले भी कॉन्फ़िडेंट बच्चे होते थे. उन्हें मालूम था कि कब और कितना पढ़ना है. ये न टीचर के हत्थे चढ़े, ना पेरेंट्स के. इनके कॉन्फ़िडेस को ठेस लगाने में कोई कामयाब न हो सका. ये ही वो लोग थे, जो दूसरे के कॉन्फ़िडेस की ऐसी-तैसी करने में लगे रहते.
जिनमें कॉन्फ़िडेस का बाहुल्य था, उन्हें किसी गुरु, किसी भगवान की ज़रूरत न थी. जिनके पास कमी थी, उन्हीं के लिये आकाश के ऊपर किसी सुपर पावर की परिकल्पना की गयी होगी. स्वर्ग-नर्क और पुनर्जन्म का कांसेप्ट भी उन्हीं के लिये खोजा गया होगा. जिनका ये फण्डा क्लियर हो गया कि इस जीवन के पहले और बाद कोई जीवन नहीं है, तो समझ लीजिये उसे किसी देवी-देवता की ज़रूरत नहीं है. वो कर्म के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. लेकिन प्रायः तभी तक जब तक उसका सामना असफलता से नहीं होता. सफलता और असफलता में बस इतना ही अन्तर है कि जब तक आदमी सफल हो रहा होता है, सारा श्रेय स्वयं के कर्म और मेहनत को देता है, और असफल होते ही उसका ठीकरा प्रभु की मर्ज़ी पर फोड़ देता है. प्रभु को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप उसे मानते हैं या नहीं. उसकी प्रेम की कृपा-वृष्टि सबके उपर समान रूप से बरसती रहती है. उसे महसूस करने के लिये आपको दिव्य-दृष्टि चाहिये.
कभी कभी व्यक्ति अपने घमंड में अपनी औकात से ज़्यादा पंगे ले लेता है. तो उपर वाला अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने के लिये बिना आवाज़ की लाठी का प्रयोग कर लेता है. जिन देशों में नियम-कानून का राज है, वहाँ भगवान को जल्दी कोई याद नहीं करता. लेकिन जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उन्हें भी भगवान की ज़रूरत पड़ ही जाती है. विकसित सुविधा संपन्न देशों में कोई कारण नहीं है कि कोई भगवान को याद करे और याद करे भी तो क्यों. लेकिन द्वैत जीवन का हिस्सा है. सफलता है तो कहीं बगल में असफलता इंतज़ार कर रही होगी. सुख है तो दुःख भी आ सकता है. इसका उल्टा भी होता है. सुख-दुःख, सफलता-असफलता का कॉम्बो पैक है. जीवन, उतार-चढ़ाव का नाम है. निश्चय ही सरल रेखा तो नहीं होता. ईसीजी की सीधी लाइन कौन देखना चाहता है.
सुमेरु पर्वत पर विश्व विजेताओं के नाम लिखने के लिये जगह ही नहीं है. हर सौ साल में हज़ार-पाँच सौ के नाम लिख जाते हैं. सिकन्दर जब विश्व विजय करके सुमेरु पर्वत पर नाम लिखवाने की गरज से पहुँचा, तो दरबान ने बिना इंप्रेस हुये उसे एक चॉक थमा दी और कहा जाओ जा के अपना नाम लिख आओ. थोड़ी देर बाद सिकन्दर परप्लेक्स मूड में बाहर आया और दरबान से बोला कहाँ लिखूँ, वहाँ कोई कोना भी खाली नहीं है. दरबान आराम से बोला - जाओ कोई भी नाम मिटा के अपना लिख लो. बताने वाले बताते हैं कि सिकन्दर को उसी पल ब्रह्म ज्ञान मिल गया और वो बिना नाम लिखे लौट आया.
हमारे यहाँ, जहाँ प्राय: माइट को ही राइट समझ लिया जाता है, तो मानसिक सुकून के लिये दो-चार भगवान (बाप) तो नीचे ही बनाने पड़ जाते हैं. अगर नहीं बना पाये, तो ये समझ लीजिये, देर-सवेर आपको असली बाप (भगवान) की ज़रूरत पड़ने वाली है.
जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों,
मै नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों.
तब शर्मा नया रंगरूट था. उसे लगता था दुनिया पलट देगा. सो जहाँ जाता एक न एक बखेड़ा कर आता. आज़ादी के सत्तर सालों में एक सिस्टम बना है, लोग उसमें फ़िट होने में लगे हैं, और भाई सुधार करने लग जाते. तब तक तो फिर भी ठीक था जब तक बाहरी विभागों से भिड़ते रहे. अपने विभाग में पंगा नहीं लेना था. सिनियर्स ने समझाया. खामख्वाह रगड़ दिये जाओगे. क्रांतिकारी विचारधारा वाले अगर समझाने से समझ जाते तो हम अभी भी क्वीन विक्टोरिया के सामने सजदा कर रहे होते. किसी भी सिस्टम के उत्थान में तमाम अनाम लोगों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है, जिन्होंने नक्कारखाने में तूती की आवाज़ को मरने नहीं दिया. अपने त्याग का लाभ उन्हें भले न मिला हो, लेकिन अगली पीढ़ियों ने उनका लाभ उठाया. नयी पीढ़ी को उन अंजान लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, जिनके नाम सिस्टम की मेमो फ़ाइलों में आज भी कहीं दफ़्न पड़े होंगे.
लड़ने-भिड़ने की भी एक उम्र होती है. शर्मा को भी उम्र से मात मिलनी ही थी. समाज सुधार के लिये लड़ने वाले ने हथियार डाल दिये और आत्म सुधार के मार्ग पर चल दिया. वैसे भी हमारे यहाँ कहा गया है - हारे को हरि नाम. और हरि भी बिना गुरु के तो मिलते नहीं. सो शर्मा जी ने एक गुरु खोज निकाला. गुरु ने गारेंटी ली कि इसी जन्म में ईश्वर से साक्षात्कार करवा देगा बशर्ते वो उनकी बताई विधि का पालन करे. इसके लिये कोई कठिन विधि भी नहीं बतायी. आरम्भ एक जगह स्थिर बैठ के साँसों पर ध्यान लगाने से था, बस. थोड़ा अभ्यास करना पड़ता है. चलते-फिरते आदमी का एक जगह बैठना ही कठिन है लेकिन शर्मा को गुरु पर पूरा विश्वास था. वो जैसा कहते शर्मा उसको शब्दशः फॉलो करता.
आँख बन्द करते ही उसका ध्यान लग जाता. साँसों की माला में लगातार हरि का नाम सुमिरता रहता. उसका अंतरज्ञान निरन्तर विकसित हो रहा था. सामने घट रहे घटनाक्रम के पीछे की पृष्ठभूमि भी उसके सामने होती. बिना प्रभावित हुये साक्षी भाव से दुनिया की माया को निर्लिप्त भाव से देखने की अपनी क्षमता पर उसे स्वयं आश्चर्य होता. शब्दों और पंक्तियों को ही नहीं पंक्तियों के बीच की भाषा भी वो समझ जाता. वो ये भी सोच लेता कि सामने वाला क्या सोच रहा है. वो ध्यानावस्था में बिना हिले-डुले घण्टों बैठा रहता. कभी-कभी उसे यकीन होने लगता, उसका तीसरा नेत्र जागृत हो रहा है.
एक दिन किसी सामाजिक कार्यकलाप के लिये शहर के नामचीन होटल में जाना हुआ. बहुत दिनों बाद होटल के रिसेप्शन पर आदमक़द आईने से सामना हुआ था. उसका तीसरा नेत्र खुल चुका था. शर्ट के 5वें और 6वें बटन के मध्य.
-वाणभट्ट
सभा भवन में छिहत्तर रंगरूट शोधकर्ता बैठे हुये थे. उनकी ट्रेनिंग का पहला दिन था और इंट्रोडक्शन चल रहा था. तभी मुख्य ट्रेनिंग अधिकारी ने हवा में एक प्रश्न उछाल दिया - ये बताइये आपमें से कितने छात्रों का पैशन था, कृषि क्षेत्र में शोध करने का. हँसती-मुस्कुराती सभा में सन्नाटा छा गया. केवल तीन हाथ ही उठे. ये एक सटीक आंकलन भी था कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों का मात्र 4 प्रतिशत छात्र ही शिक्षण या शोध से जुड़ना चाहता है.
ये लगभग 30 साल पुराना परिदृश्य है. साठ और सत्तर के दशक में जन्मे लोगों को भली-भाँती याद होगा कि तब कृषि की पढ़ाई वही लोग किया करते थे, जिन्हें स्वयं को ही नहीं, उनके पिता जी और पास-पड़ोस को भी ये विश्वास होता था कि बेटे से इन्टर में बायो या मैथ्स नहीं चलनी. तब पास-पड़ोस मोहल्ला वैसा नहीं था, जैसा अब होता है, इनडिफ़रेन्ट. सभी अतिशय कंसर्न्ड होते थे. किस-किस का बेटा हाईस्कूल या इंटर का बोर्ड दे रहा है, पूरे मोहल्ले को पता होता था. हाईस्कूल के अंकों के आधार पर निर्णय लिया जाता था कि लड़का साइंस पढ़ने लायक है भी या नहीं. लायक है तो मैथ्स के मार्क्स के आधार पर उसे पीसीएम पढ़ने या बायो के मार्क्स के हिसाब से उसे जेडबीसी पढ़ने की सलाह दी जाती थी. कला या वाणिज्य के क्षेत्र उसके बाद क्रमशः, दूसरी और तीसरी पसन्द हुआ करते थे. कृषि की तो कोई बात भी नहीं करता था. जिनके चाचे-मामे-ताये, कृषि क्षेत्र से किसी न किसी रूप में जुड़े थे, उन्हें ही मालूम था कि कृषि में रोजगार का क्या पोटेंशियल है. हर्डल रेस दो तरह की हो सकती है. एक - हर्डल के ऊपर से. उसके लिये आपको अधिक प्रयास करना होता है. दूसरी - हर्डल के नीचे से सर्राते हुये निकल जाओ. फिनिश पॉइंट पर देर-सबेर सब पहुँच ही जाते हैं. वहाँ सब बराबर हैं.
सरकारें समानता और बहुजन हिताय के सिद्धान्त को ध्यान में रख कर काम करती हैं. इसीलिये तो सभी डिग्री वाले एक ही तराजू में तौल दिये गये. उनकी नज़र में, इन्जीनियरिंग हो या मेडिकल, सितार हो या तबला, सब बराबर. नतीजा ये हुआ कि नौकरी लगने के बाद क्या साइंस-क्या मैथ्स और क्या कला-क्या संगीत. सब एक समान. यहाँ किसी विषय की श्रेष्ठ्ता सिद्ध करने का इरादा नहीं है. लेकिन हॉबीज़ और विषयों में कुछ फ़र्क किया जा सकता है. कुछ लोग स्नातक लेने में ही रगड़ दिये जाते हैं, कुछ हँसते-खेलते ग्रेजुएट हो जाते. उन्हें मिडनाईट ऑयल बर्निंग का पता ही नहीं. प्रशासनिक सेवाओं के लिये योग्यता स्नातक की ही थी और आज भी है. डिग्री के विषयों से कोई अन्तर नहीं पड़ता. किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन्जीनियरिंग के छात्र भी आर्ट्स के विषय लेकर एग्जाम लिखते हैं, और सफल भी होते हैं. प्रशासनिक सेवा के माध्यम से देश सेवा का अरमान भी ग्रेजुएशन करते-करते जगता था. वहाँ सब धान बाईस पसेरी. बीए पास जब प्रशासन में आता है तो उसका साइंस के प्रति जो कॉम्प्लेक्स, हाईस्कूल-इन्टर से बना था, उसकी कसर वो इन्जीनियर और डॉक्टर से जरुर निकालता है. अब उसका काम, काम करना नहीं करवाना है. और जो काम करेगा, उसके काम और उसमें कमी निकालना, काम करने से कहीं आसान है.
शोध और शिक्षण सेवाओं में भी जो लोग आते हैं, उन्हें प्राय: पता नहीं होता कि पीएचडी कर क्यों रहे हैं. एक भाई ने तो सेब की जगह केला लिख कर पूरी थीसिस जमा कर दी. एग्ज़ामिनर शरीफ़ था, उसने जहाँ-जहाँ सेब रह गया था वहाँ-वहाँ करेक्शन्स करवाके डिग्री दिलवा दी. बच्चे हैं, गल्तियाँ बच्चों से ही होती हैं. जब तक प्रशानिक सेवा के अटेम्प्ट बचे रहते हैं, तब तक युनिवर्सिटी के हॉस्टल एक आश्रय का काम करते हैं. और पिता जी से भी सिविल की तैयारी के नाम पर पैसे माँगने में संकोच कम होता है. तीन के अलावा जो तिहत्तर लोग थे, उन सब के अटेम्प्ट या तो ख़त्म हो चुके थे या ख़त्म होने वाले थे. उसके पहले ही शोध का एग्जाम क्रैक कर लिया था. एक अदद नौकरी की दरकार तो सबको होती है. जब तक नीली बत्ती न मिले तब तक कुछ तो करना ही है. पोस्टिंग होने के बाद उनमें से कई ने हार नहीं मानी. अपने-अपने शहर का आईएएस स्टडी सर्कल ज्वाइन कर लिया. कोचिंग के लिये अर्जित और चिकित्सा अवकाश ले कर, जीएस के लिये दिल्ली में भी डेरा डाल आते. जब तक अटेम्प्ट बचे रहते, वो आईएएस की तरह ही बिहेव करते. आदत पहले से बनानी होती है. प्रीलिम्स और मेन्स तक जाने के कारण, साथी शोधकर्ताओं में भी उनकी हनक बनी रहती. जब यूपीएससी में बात न बनती तो टारगेट बदल कर यूपीपीएससी कर लिया जाता. तुर्रा ये कि देश की सेवा करेंगे तो प्रशासक बन कर ही. शोध का निरीह रुतबा विहीन जीवन, उनके बस की बात न थी. नौकरी हो तो जलवे वाली. कुछ ने सफलता अर्जित की. प्रॉपर और अलाइड सर्विसेस में उनका सेलेक्शन विभाग के लिये भी गर्व का विषय बना. रुतबे के चक्कर में, कुछ ने तहसीलदार पद को तरजीह देते हुये शोध मार्ग का परित्याग कर दिया. जो शोध में बने रह गये, उनके लिये शोध एक मज़बूरी था. कुछ ने पार्ट टाइम कोचिंग खोल ली, कुछ ने एकेडेमी बना ली, कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये क्वेश्चन बैंक बना डाले. जिनकी लह गयी, वो कोचिंग में लिप्त हो गये. जिनकी नहीं चली उनके दिल में प्रशासक बनने की इच्छा दबी की दबी रह गयी. जिसके अन्कुर हमेशा सीने में दफ़न रहे और पद मिलते ही प्रस्फुटित हो गये.
एक कहावत है पूत के पाँव पालने से ही दिखने शुरू हो जाते हैं. दसवीं-बारहवीं तक आते-आते शिक्षकों को भी अंदाज़ लग जाता है कि बच्चे के लिये मैथ्स सही होगी या बायो. लेकिन शायद ही कोई कृषि के बारे में सोचता हो. मैथ्स और बायो स्ट्रीम का बच्चा ख़ुद जब तक दो-एक प्रयास न कर ले, इन्जीनियरिंग और मेडिकल का सपना पाले बैठा रहता है. उसके बाद विकल्प बचता है, ग्रेजुएशन में बीएससी बायो या मैथ्स का. उन दिनों बायो ग्रुप के बच्चे जोलॉजी-बौटनी-केमिस्ट्री में बीएससी करना पसंद करते थे. मैथ्स वाले स्नातक में फ़िजिस्क-केमिस्ट्री-मैथ्स लेते थे. एग्रीकल्चर वही पढ़ने जाते थे, जिन्हें आभास रहता था कि बीएससी-जेडबीसी की प्योर साइंस, थ्योरेटिकल और टफ़ है. एग्रीकल्चर अप्प्लाईड क्षेत्र है, यहाँ थोड़ी साइंस और थोडा प्रयोग कर के साइंस में डिग्री मिल जाती है. जिनकी साइंस इन्टर तक अच्छी हुआ करती थी, वो इंजिनियर या डॉक्टर बन गये. उसके बाद भी जिसकी साइंस में रूचि थी, उन्होंने स्नातक में पीसीएम या जेडबीसी विषय चुने. जिनका साइंस से वास्ता सबसे कम था, उन्होंने कृषि का वरण किया. कम्पटीशन कोई भी हो, हमारे ग्रेडिंग सिस्टम की विशेषता है कि सबका वर्गीकरण कर देता है. कोई टॉप करेगा तो कोई लास्ट भी आयेगा. अब तो कृषि एक बहुत ही रोजगार परक विषय बन गया है, इसलिये कम्पटीशन बढ़ने से अच्छे बच्चे विज्ञान से अधिक कृषि को प्रेफरेंस दे रहे हैं. लेकिन तीस-चालीस साल पहले ये बात न थी. छिहत्तर में मात्र तीन की शोध में रूचि, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था.
जब आईएएस-पीसीएस के सभी अटेम्प्ट समाप्त हो गये तो साइंस करनी ही थी. नौकरी के इस चरण में सारा माया-मोह भंग हो चुका होता था. जब लगता, अब साइंस किये बिना गुजारा नहीं चलने वाला, तो साइंस भी कर लेते. पीएचडी तक तो यही किया. पीएचडी गुरु के प्रति अतीव श्रद्धा भाव रखने का बाइप्रोडक्ट है. नौकरी के इस दौर में ही साइंस का प्रादुर्भाव होना लाज़मी है. साइंस भी क्या थी, जो बीएससी-एमएससी-पीएचडी में किया था, करना वही था. इस शोध में कुछ ऐसी शाखायें हैं, जिनमें विशेष उपकरणों की आवश्यकता भी नहीं होती. हाथ झुलाते हुये आइये और साठ के होते ही हाथ झुलाते हुये निकल लीजिये. बहुत तो अपने प्रमोशन के मद्देनज़र जो कुछ लिखा-पढ़ी की क़वायद की थी, वो यथावत अपने ऑफ़िस में छोड़ कर निकल गये. नये बच्चे समझ न पाते कि उस विरासत (कबाड़) का करें तो करें क्या. वो भी दस साल पहले किये गये कामों पर पुन: प्रोजेक्ट ऐसे बनाते जैसे अब तक किसी ने कुछ किया ही नहीं. पोस्ट साइंस की है, तो तनख्वाह भी उसी बात की मिलनी थी. जहाँ तनख्वाह है, वहाँ प्रमोशन है. प्रमोशन है तो बॉस हैं. बॉस हैं तो चमचे हैं. चमचे हैं तो साइंस वही है, जो वो करें-कहें. कृषि की साइंस में आप चाहते कुछ हैं और होता कुछ है. बायलॉजिकल मटेरियल है. तमाम फैक्टर्स हैं - देश-काल-वातावरण-भूमि-जल-वर्षा हैं. कोई भी फैक्टर गड़बड़ाया तो नतीजा बदल सकता है. अन्य साइंस की तरह, यहाँ प्रयोगों को दोहराना थोडा कठिन है. इसलिये कृषि साइंस में एक इन्हेरेन्ट फेक्सिबिलिटी है. चूँकि ये प्रायोगिक विषय भी है इसलिये फसल प्रबन्धन को आर्ट/कला भी माना जा सकता है.
अब जब आज़ादी के सत्तर साल बाद प्राकृतिक और आर्गेनिक खेती की बात होती है तो इन्हें लगता है कि अंग्रेज़ी में पढ़ा इनका सारा ज्ञान धराशायी न हो जाये, इसलिये कुछ गूढ़ विषय, बायो-टेक्नॉलजी, नैनो-टेक्नॉलजी, बायो-इंफोर्मेटिक्स आदि नये विषयों में प्रमुखता से निवेश किया जा रहा है. वैश्विक परिदृश्य में नवीन विषयों में निवेश और शोध आज की आवश्यकता भी है. समस्या ये है कि इनके अधिकान्श लक्ष्य काल्पनिक हैं. एक ऐसी सुपर रेस विकसित करने की परिकल्पना है, जिसमें रोग-कीट-जलवायु परिवर्तन-सूखा-जल भराव-पोषण आदि समस्त समस्याओं का स्थायी निदान हो जाये. सुपर ह्यूमन रेस की अवधारणा पर कई विज्ञान कथायें लिखी जा चुकी हैं और उन पर फिल्में भी बनी हैं. वैसे कभी-कभी लगता है, सभी समस्याओं की जड़ आदमी के दिमाग़ को ही जीन स्तर पर सुधार दिया जाये, तो बहुत सी समस्यायें स्वतः ही समाप्त हो जायेंगी. यदि प्रबन्धन मात्र से उत्पादन बढ़ भी गया तो उसमें साइंस क्या. भोजन का हव्वा दिखाये बिना फण्ड नहीं मिलता. ये बात अलग है कि रसायन आधारित खेती से उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन डॉक्टर्स के यहाँ भीड़ भी बढ़ी है. भूख से कम और खा-खा कर मरने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुयी है. कृषि शोध में प्रजातियों का विकास और विकास करने वालों का दर्जा सबसे ऊपर है. ये कृषि की सभी समस्याओं का निदान प्रजाति विकास में देखते हैं. भगवान रचित डायवर्सीटी में नित्य प्रति मानव निर्मित डायवर्सीटी ऐड होती जा रही है. जिस तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद और होम्योपैथी को हिकारत से देखता है, इनके लिये भी पारम्परिक बीजों द्वारा प्राकृतिक और जैविक खेती के लाभ को स्वीकार करना कठिन है. अब जब फिर मोटे अनाज और प्राकृतिक खेती की बात हो रही है, इन्हें लगता है इनके अंग्रेज़ी में पढ़े ज्ञान को चुनौती दी जा रही है. आज कृषि को एक समेकित-समावेशी विज्ञान की आवश्यकता है. जो मानव-मृदा-जल सभी के लिये सतत रूप से स्वस्थ और लाभकारी हो. ये तो तय है कि 10-12 हज़ार पहले खेती के आरम्भ से पहले भी पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिये पर्याप्त भोजन था. वो व्यवस्था टिकाऊ थी और पर्यावरण अनुकूल भी. हज़ार-दो हज़ार साल का अंग्रेज़ी में पढ़ा-पढ़ाया ज्ञान सस्टेनेबल होगा या नहीं, अब लोगों को शक़ होने लगा है. रासायनिक खादों, कीटनाशकों और खर-पतवारनाशी के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण, अविश्वास और विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं. विज्ञान सतत प्रवाहमान है. विभिन्न विषयों की संकीर्ण विचारधारा से विज्ञान का विकास सम्भव नहीं है.
और कुछ हो न हो, नौकरी में प्रमोशन का एक सटीक विज्ञान होता है. ठीक वैसे ही जैसे दो दुनी चार होता है. सीआर आउटस्टैंडिंग प्राप्त करने का सेट पैटर्न है. काम उतना जितना सीआर में लिखना हो. कोई कॉलम खाली नहीं रहना चाहिये. सो शोधकर्ता से कुछ भी करा लीजिये. कम से कम प्रमोशन के लिये, जितना करना हो उतना तो कर ही लेता है. प्रमोशन भी समय निर्धारित है. यदि आप का दृष्टिकोण सुधारवादी नहीं है, तो कोई माई का लाल नहीं है, जो प्रमोशन रोक ले. नतीजा पिरामिड उलट गया है, प्रोफ़ेसर अधिक और असिस्टेंट कम हो गये हैं. शोधकर्ता पूरा मैनेजर बन गया है. और मैनेजर कुछ भी मैनेज कर सकता है. वो शोध भी करता है, उसे छपवाता है, नेटवर्किंग करता है, मेला भी लगाता-लगवाता है, गाहे-बगाहे सेमिनार-सिम्पोजिया में शिरकत करके अपनी और अपने विषय की प्रासंगिकता बनाये रखता है, कभी-कभी बुद्धि मन्थन (ब्रेन स्टोर्मिंग) भी करवा देता है. वो हर वो काम करने को आतुर रहता है, जिसके लिये क्रेडिट मिल रहा हो. कभी-कभी तो दूसरों का क्रेडिट भी हड़पने से नहीं चूकता. ये पेटेन्ट की प्रथा इसीलिये बनायी गयी है, ताकि शोधकर्ता को उसका लाभ मिल सके. लेकिन चूँकि हर फ़ाइल नीचे से ऊपर तक जाती है, तो कुछ लोगों को इसलिये कृतार्थ करना पड़ता है कि फ़ाइल रुक ना जाये. यहाँ उनकी भूतकाल में की गयी प्रशासन की पढ़ाई काम आती है. येन-केन-प्रकारेण काम करवाना-निकलवाना नितान्त आवश्यक है. आज का शोध स्मार्ट शोध है. यदि आपका लक्ष्य प्रमोशन मात्र हो तो बिना स्मार्टनेस के भूल जाइये. शिक्षा और शोध कभी हॉबी हुआ करते थे, अब चूँकि शिक्षा और शोध नौकरी बन गये हैं तो नौकरी में प्रमोशन के जितने हथकंडे हैं, सब अपनाने पड़ते हैं. जिसमें सबसे पहली कड़ी है, बॉस. बाबा रहीम दास जी पहले ही बता गये थे -
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥
आप ने गलती से ये वहम पाल लिया कि साइंस करके आप कोई तोप मार लेंगे तो आप को ग़लतफ़हमी का इलाज कराना चाहिये, यदि उसका कोई इलाज हो, तो. बड़े-बड़े आये और बह गये. विनम्रता ज्ञानियों का लक्षण है. इसलिये शोधकर्ता को अतिशय विनम्र होना चाहिये. एरियर, टीए और मेडिकल बिल रुक जाये, तो भले लड़ लीजिये, लेकिन साइंस के लिये दुश्मनी मोल लेने की ज़रूरत नहीं है. जिनका बचपन से साइंस और नवोन्मेषी विचारों से ज़्यादा सरोकार न रहा हो, उनके हिस्से साइंस आयेगी तो वो साइंस को रॉकेट साइंस बना के मानेंगे. वैसा ही काम करेंगे, जिसे या तो आत्मा समझ सके या परमात्मा. अपने विषय की विशिष्टता में इतना डूबे रहते हैं कि दूसरे क्षेत्रों में क्या हो रहा है, इससे इनको कोई सरोकार नहीं रहता है. बीस साल फसल की ऊँचाई बढ़ाने में बर्बाद कर दिये. यदि इन्जीनियर को समस्या बतायी होती तो वो बताता कि कम्बाइन की कटर बार को नीचा करना पौधे को ऊँचा करने से अपेक्षाकृत आसान और सरल विकल्प था. नया करने के नाम पर कुछ लोग शैटरिंग रेजिस्टेंट प्रजाति बनाने की सोच रहे हैं, ताकि कटाई के समय शैटरिंग न हो. कोई ऐसी प्रजाति की खोज में लगा है जो कीटों के दांत खट्टे कर दे. इनोवेशन के नाम पर पुराने कामों को नये कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. रोग और कीट प्रतिरोधी बीजों के विकास से आसान, फसलों का प्रबंधन है. मृदा स्वास्थ्य के बिना खेती, सतत खेती नहीं बन सकती. जल और मृदा संरक्षण कृषि शोध का एक उपेक्षित पक्ष रहा है. लेकिन इन कामों में शोध से अधिक सुनियोजित योजनाओं की आवश्यकता होती है. फण्ड की उपलब्धता वो सागर है जहाँ शोध करने की तमन्नायें हिलोरें मारने लगती हैं. फण्ड न हो तो न कोई समस्या हो, न उनके समाधान की तलाश.
एकल दिशा में फंडिंग से कृषि शोध के अन्य आयाम संकुचित हो कर रह गये हैं. विशेष रूप से कृषि अभियांत्रिकी. सभी विद्यालयों-संस्थानों में कृषि के सभी विषयों के विभाग मिल जायेंगे, बस अभियांत्रिकी नहीं मिलेगा. जबकि कृषि की लागत कम करने और उत्पादन का समुचित उपयोग करने में इस विधा का महती योगदान है. बस दिक़्क़त ये है कि अप्लाइड साइंस में कुछ भी ढँका-छिपा नहीं रहता, इसलिये ये साइंस जैसा नहीं लगता. चन्द्रयान की सफलता मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान की सफलता की चरम परिणति है. दोनों मिल के काम करें तो इसमें कोई शक़-शुबहा नहीं है कि कृषि को एक लाभकारी उद्यम बनाया जा सकता है. जैसा पहले कहा जा चुका है, साइंस को आत्मा-परमात्मा के बीच की चीज़ न बनाइये. कई बार बक्से के बाहर समस्या का समाधान होता है, किन्तु ये कर्मयोगी अपने विषय पर ही काम करते रहेंगे, चाहे किसी और ने समाधान निकाल लिया हो.
आज कृषि की 90 प्रतिशत समस्याओं को उचित फसल प्रबंधन और कृषि अभियांत्रिकी के द्वारा मैनेज किया जा सकता है. शोध बैकयार्ड में किया जाने वाला काम है, सामने तो तकनीक या उत्पाद ही दिखता है. लेकिन शोध को हाईलाईट करने के चक्कर में शोधपत्रों की महिमा को ज़रूरत से ज़्यादा तरजीह दे दी गयी. सब प्रबंधन के बजाय, समाधान पर लट्ठ लिये पिले पड़े हैं. समाधान के प्रयास पहले से होते चले आ रहे हैं. ये कभी ख़त्म नहीं होते, जीवन भले कम पड़ जाये. सिस्टम का सीधा सरल सपाट सिद्धांत है, काम ऐसे ही करते रहिये, जैसे सब करते रहे हों. सब तर गये आप भी तर जाइये. सिस्टम, सिस्टम से चलता है. इस के हिसाब से ख़ुद को ढालिये. इसके अनुसार स्वयं को सुधारने की तो गुन्जाइश है, लेकिन सिस्टम के सुधरने की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमोशन विज्ञान के रूल्स एकदम क्लियर रखिये. सबके दिन फिरते हैं, बस सब्र रखिये. तब तक पद न मिले, चुप मार के वही कीजिये जिसे आपके पियर्स साइंस मानते हैं. प्रशासन के गुण तो पहले से ही विद्यमान हैं, पद पा कर वो पुष्पित और पल्लवित होंगे. जब आप ऊपर पहुँच जायेंगे, तब साइंस भी करवा लीजियेगा. अभी तो वही साइंस है, जो ऊपर वाला कहे. प्रमोशन विज्ञान में इस बात का बहुत महत्त्व है - बॉस इज़ आलवेज़ राईट.
जिन तीन लोगों ने हाथ उठाया था, वो कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, ये कोई नहीं जानता. लेकिन ये तो तय है कि बाकी तिहत्तर इतिहास लिख रहे होंगे और शोध में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे होंगे.
-वाणभट्ट
वैधानिक चेतावनी: इस लेख में उल्लिखित वृतान्तों का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है. चरित्र में किसी प्रकार का मेल संयोग मात्र है. ये लेख उनके लिये नहीं है जो साइंस में विज्ञान खोजने में सक्षम हैं. इस लेख का उद्देश्य मौलिकता और व्यवहारिकता के समेकित समाधान परक शोध की ओर ध्यान आकर्षित करना है. जिन्हें शोध के नाम पर लकीर पीटने की आदत है, उन्हें ये आलेख बुरा लग सकता है. कृपया अपने रिस्क पर पढ़ें.
कृषि शोध केन्द्र में फसल उत्पादन में वृद्धि के सुझावों के लिये एक हाई पावर कमेटी बैठी थी. कमेटी की अध्यक्षता कृषि शोध क्षेत्र की एक नामचीन हस्ती, डॉ. सत्य आधार जी कर रहे थे. कमेटी क्या थी, कृषि क्षेत्र की समस्त विधाओं के विद्वतजनों का समागम था. अपने ओपनिंग रिमार्क में ही चेयरमैन साहब ने उवाचा - कृषि उत्पादन में वृद्धि लाना आज की आवश्यकता है. वर्तमान परिस्थितियों में जब कृषि बहुत आगे निकल आयी है, ये काम कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. मात्र लाइन सोइंग से हम उत्पादन 15% बढ़ा सकते हैं. मात्र प्लान्टर का प्रयोग हमें उत्पादन में 15% की वृद्धि देने में सक्षम है. ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग करके हम जल उपयोग दक्षता बढाने के साथ साथ उत्पादन में 15% वृद्धि पा सकते हैं. मैकेनाइज्ड क्रॉप प्रोडक्शन से हम कृषि लागत को कम और कृषक आय में वृद्धि कर सकते हैं. इन्जीनियर्स के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. आप लोगों को इस दिशा में काम करना चाहिये.
संयोग से कृषि अभियंत्रण अनुभाग का एकाकी अभियन्ता और अनुभागाध्यक्ष भी सभा में उपस्थित था. जिसे कुछ दिन पहले ही नया-नया चार्ज मिला था. उससे रहा नहीं गया. बोल पड़ा - सर आप ने बहुत ही अच्छे सुझाव दिये हैं. दो हेक्टेयर लैंड हमें भी मिल जाती तो ये देखा जा सकता है कि इंजीनियरिंग इन्टरवेन्शन्स से कितनी उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है. हम लोग उत्पादन वृद्धि के अधिकान्श प्रयास प्रजातियों के विकास में कर रहे हैं. यदि मात्र मैकेनाइज़ेशन से लागत कम और उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है, तो ऐसे अप्प्लाईड प्रयोग भी होने चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रमों में ये भी देखना चाहिये कि क्रॉप मैनेजमेन्ट से कितनी वृद्धि सम्भव है. प्रजातियों के विकास में उसके ऊपर उत्पादन वृद्धि को लक्ष्य करने का प्रयास करना चाहिये. फसल उन्नयन प्रोग्राम्स की टीम में कृषि के अन्य विषयों की तरह अभियान्त्रिकी को भी शामिल करना चाहिये. बहुत सी समस्याओं का निदान प्रबंधन द्वारा किया जा सकता है, उन पर शोध में समय और धन व्यय करने से बचा जा सकता है.
उसे लगा कि चेयरमैन साहब उसके इस उद्बोधन से प्रसन्न हो कर शाबाशी देंगे. लेकिन वहाँ सभा में सन्नाटा छा गया. उसे जरा भी भान नहीं हुआ कि सभी को साँप क्यों सूँघ गया. उसे ये भी नहीं लगा कि उसने कोई गलत बात कह दी है. लेकिन सत्य आधार जी का आधार हिलने लगा. बड़े लोगों को सुनाने की आदत होती है, सुनने की नहीं. उसके बाद उन्होंने इन्जीनियर को जो-जो सुनाया है और जिन-जिन शब्दों में सुनाया है, उन शब्दों का प्रयोग किसी भी सभ्य समाज में वर्जित माना जाता है. फिर भी यदि पढने की इच्छा हो तो पाठकों को पिछले ब्लॉग जीनोटाइप (https://vaanbhatt.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) पर जाना पड़ेगा.
उसका परिणाम ये हुआ कि शीघ्र ही कृषि अभियन्त्रण अनुभाग का विलय अन्य विभाग में कर दिया गया. ताकि कोई इन्जीनियर पियर रिव्यू मीटिंग में अपना ज्ञान बघारने की हिमाक़त न कर सके. अपने लोगों की बात अपनों में ही रहे तो अच्छा. आउट ऑफ़ बॉक्स विचार, और ऐसे विचार वाले लोग, बॉक्स के बाहर ही रहे तो ही अच्छा.
भारत में कृषि शिक्षा और शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. इस सन्दर्भ में वाणभट्ट का पुराने ब्लॉग - कृषि शोध की दशा और दिशा (https://vaanbhatt.blogspot.com/2025/03/blog-post_31.html?m=1) पर जाने की कृपा करें. बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कृषि शिक्षा के महत्त्व को समझा गया. इसी दशक में शाही कृषि अनुसन्धान संस्थान और इलाहाबाद कृषि संस्थान भी अपने अस्तित्व में आये. जहाँ कृषि शिक्षा की विभिन्न विधाओं पर अध्ययन, अध्यापन व शोध का कार्य आरम्भ हुआ. शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में मानव श्रम को कम करने के उद्देश्य से अभियान्त्रिकी आवश्यकता का अनुभव किया गया. इस दिशा में प्रथम प्रयास भी इलाहाबाद कृषि संस्थान से हुआ. कृषि में अभियान्त्रिकी के महत्त्व को देखते हुये, वर्ष 1943 में संस्थान ने कृषि अभियान्त्रिकी में पहला स्नातक पाठ्यक्रम आरम्भ किया. आईएआरआई, आईआईटी, खड़गपुर और पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय में क्रमशः 1945, 1952 और 1960 में कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना हुयी. आज कृषि अभियान्त्रिकी शिक्षा लगभग सभी कृषि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उपलब्ध है. साठ के दशक में कृषि क्षेत्र में हुयी हरित क्रांति में कृषि अभियान्त्रिकी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. ये बात अलग है कि उन्नत प्रजातियों को पूरा श्रेय दिया गया.
आज़ादी के 80 साल होने जा रहे हैं और देश में कृषि मशीनीकरण अभी भी मात्र 45-55 प्रतिशत ही हुआ है, जबकी अनेक विकसित और विकासशील देशों में मशीनीकरण 90-95 प्रतिशत हो चुका है. इसके पीछे देश में लघु और सीमान्त किसानों की अधिक संख्या और छोटी जोत को मुख्य कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जहाँ समस्या है, वहीं तो समाधान खोजने की आवश्यकता है. हमारा कृषि शोध आज भी उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि में उलझा हुआ है. सारे प्रयास उत्पादन बढ़ाने के लिये किये जा रहे हैं. जबकि किसान इससे कहीं आगे निकल गया है. वो कम ख़र्च पर टिकाऊ और लाभदायक खेती की बात कर रहा है. यदि शोध आवश्यकताओं के अनुसार नहीं होंगे तो किस लिये होंगे. कृषि क्षेत्र में मजदूरों की घटती संख्या आज चिंता का प्रमुख विषय है. इस कारण खेती के रकबे घटते और बढ़ते रहते हैं. जिन फ़सलों में मशीनीकरण अधिक हुआ है, वे कृषकों की प्रमुख पसंद बनाते जा रहे हैं. जिन राज्यों ने कृषि अभियान्त्रिकी के विकास पर ध्यान दिया, उन राज्यों में कृषि उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है. मध्य प्रदेश पहला राज्य बना, जिसने कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना की. यंत्र दूत योजना के माध्यम से प्रदेश के कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ लागत में कमी भी आयी है. प्रदेश में निदेशालय की सफलता के परिदृश्य में सभी राज्यों में कृषि अभियंत्रण निदेशालय के स्थापना की पहल आरम्भ हो चुकी है.
कृषि शिक्षा और शोध में उन्नत प्रजातियों के विकास, नवीन उत्पादन पद्यतियों और फसल संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुये हैं और हो रहे हैं. किन्तु आज आवश्यकता किसान को कृषि से जोड़े रखने की है. यह तभी सम्भव है है जब कृषि को व्यवसाय के रूप में किया जाये और ये एक लाभकारी उद्यम बन सके. छोटी जोत और अधिक उत्पादन लागत के कारण कृषक परिवार खेती से विमुख होते जा रहे हैं और ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो नियमित आय का जरिया बन सकें. विकसित देशों में लैंड होल्डिंग्स बड़ी हैं इसलिये वहाँ मशीनीकरण एक आवश्यकता बन गया है. हमारे देश में छोटी जोत के कारण मशीनों में निवेश कम है. इस कारण फसल उत्पादन के प्रमुख चरणों में मानव श्रम की उपलब्धता एक संकट बन जाता है. समय से कृषि कार्य न हो पाने से फसल की हानि के साथ-साथ कृषि लागत में भी वृद्धि होती है. कृषि शोध संस्थानों में कृषि के तीन आयामों - 1. प्रजाति उन्नयन, 2. उत्पादन तकनीक और 3. पादप संरक्षण पर तो बहुत कार्य हो रहा है. किन्तु कृषि अभियन्त्रण की दिशा में पूर्ण समर्पण के साथ विशेष प्रयास नहीं किया जा रहा है.
उच्च स्तर पर गठित वरिष्ठ अधिकारियों की समीतियाँ, कृषि अभियान्त्रिकी की आवश्यकता पर तो बल देती हैं, लेकिन इसके लिये एक पूर्ण विकसित (फुल फ्लेजेड) विभाग की संस्तुति नहीं करतीं. कारण कुछ और नहीं है, लोग अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के दायरे में ही सोचने को विवश हैं. जो उन्होंने पढ़ा है या जो उन्हें पढ़ाया गया है, उससे इतर वो न सोचना चाहते हैं, न समझना. वर्तमान में कृषि क्षेत्र की अधिकांश समस्याओं का निराकरण अभियन्त्रण के माध्यम से किया जा सकता है. किन्तु प्रयुक्त (एप्लाइड) शोध की तुलना में मौलिक (बेसिक) शोध अधिक चुनौतीपूर्ण लगता है. साठ शोधकर्ता और छिहत्तर परियोजनाओं के मॉडल से शोध पत्र तो निकल सकते हैं किन्तु ऐसी समेकित तकनीक का विकास सम्भव नहीं है, जिसे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके. आज की आवश्यकता है, साठ शोधकर्ताओं को छ: लक्ष्य उन्मुख (टारगेट ओरिएंटेड) परियोजनाओं पर केन्द्रित करना. जिसमें मृदा सम्वर्धन, जल संचयन-संरक्षण, मशीनीकरण, कृषि उत्पादन से लेकर भण्डारण-प्रसंस्करण और कृषि के उप और सह उत्पादों का उपयोग भी सम्मिलित हो. टीम के माध्यम से हर विषय एक दूसरे से पृथक नहीं, पूरक बन के काम करेंगे और एक सम्पूर्ण (कम्प्लीट) तकनीक के विकास में सहायक होंगे.
विकसित देशों के कृषि मॉडल में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 1-2 प्रतिशत है तो लगभग उतनी ही जनसँख्या कृषि उत्पादन में संलग्न है, जबकि भारत में कृषि, सकल घरेलू उत्पाद में 16-18 प्रतिशत का योगदान करता है किन्तु कृषि पर निर्भर जनसँख्या 45-50 प्रतिशत है. इसलिये विकसित देशों के मॉडल को हम पूर्णरूप से नहीं अपना सकते. भारत के लिये आवश्यक है कि वो कृषि एवं कृषि से सम्बद्ध क्षेत्रों को एक उद्योग के रूप में विकसित करें. इसके लिये कृषि शोध की दिशा में भी एक आमूल-चूल परिवर्तन की दरकार है. हाशिये में डाल दिये गये कृषि अभियंत्रण शोध को कृषि शोध के अन्य आयामों के साथ समन्वित करना न सिर्फ़ आज की आवश्यक है, बल्कि भारतीय कृषि का भविष्य भी है. लाभदायक कृषि के द्वारा ही भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, कृषि, को सुदृढ़ किया जा सकता है और उसके द्वारा प्राप्त आय में निरन्तरता प्राप्त की जा सकती है. लाभ, आज समाज का मूलमन्त्र है और इसकी स्थापना के लिये कृषि शोध को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है. लाभप्रदता के लिये कृषि शोध को आज समग्र सम्पूर्णता से देखना आवश्यक है.
मृदा एवं जल संरक्षण अभियान्त्रिकी, सिंचाई और जल निकासी अभियान्त्रिकी, कृषि शक्ति एवं यंत्र अभियांत्रिकी, प्रसंस्करण एवं खाद्य अभियन्त्रिकी, आदि विषय कृषि अभियान्त्रिकी के प्रमुख घटक हैं. एक या दो अभियांत्रिकी संस्थान समस्त कृषि उत्पादों की समस्त समस्याओं का वृहद स्तर पर समाधान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिये हर संस्थान में एक कृषि अभियंत्रण विभाग की स्थापना की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिये. यदि संस्थान लाभोन्मुखी परियोजनाओं पर कार्य करेंगे, तभी उनके द्वारा विकसित तकनीकें अपना कर किसान लाभान्वित हो सकेंगे. भविष्य में वो ही शोध संस्थान सफल होंगे जो अपने संसाधनों का सृजन स्वयं कर सकेंगे. इसके लिये उन्हें कृषि से जुड़े उद्योगों से जुड़ कर उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर शोध करना होगा. इस कार्य में कृषि अभियन्त्रण विभाग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. देश का कृषक और कृषि आधारित उद्योग, आज सम्पूर्ण तकनीक, उत्पादन से अंतिम उत्पाद तक, माँग रहा है. इसलिये प्रयोग भी समेकित होने चाहिये. खण्ड-खण्ड में किये गये श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य एक सम्पूर्ण तकनीक में परिवर्तित नहीं हो सकते. इसके लिये आवश्यकता है, कृषि के अन्य आयामों के साथ कृषि शोध के चतुर्थ आयाम - कृषि अभियांत्रिकी को सुदृढ़ करने की.
जड़त्व का सिद्धांत है कि जो वस्तु जैसे चल रही है वैसे ही चलती रहती है (और रुकी है तो रुकी रहती है) जब तक कोई वाह्य बल नहीं लगता. भारतीय कृषकों और कृषि आधारित उद्योगों की आकांक्षायें व अपेक्षायें वही बल हैं, जो कृषि शोध को एक नयी दिशा प्रदान करेंगी.
-वाणभट्ट
प्रथम एआई जेनरेटेड कविता...
कुर्सी का मोह निराला है, जिसने सबको पाला है,
इस चार पाँव की लकड़ी ने, जाने कितनों को डस डाला है।
सिंहासन पर जो बैठ गया, वो ख़ुद को ख़ुदा समझता है,
पर असली खेल तो पीछे बैठा, 'चमचा' ही रचता है।
चमचागिरी वो विद्या है, जिसमें बिना पढ़े ही डिग्री है,
साहब की हाँ में हाँ मिलाना, बस यही इसी की फ़िक्री है।
साहब जो कहें "दिन है अभी", तो चमचा "सूरज" लाता है,
साहब कहें "अँधेरा है", तो वो "तारे" गिनवाता है।
बिना धार के चाकू सा, ये मक्खन ख़ूब लगाता है,
मेहनत करने वाला पीछे, और ये आगे बढ़ जाता है।
एक हाथ में निष्ठा है, और दूसरे में स्वार्थ का प्याला,
चमचागिरी के दम पर ही, आज कल होता है उजाला।
पर याद रहे ओ कुर्सी वालों, ये चमचे बड़े सयाने हैं,
जब पाँव डगमगाते कुर्सी के, ये सबसे पहले बेगाने हैं।
आज तुम पर निछावर हैं, कल किसी और पर होंगे,
ये 'चमचे' कभी भी वफ़ादार, किसी दौर के नहीं होंगे।
- वाणभट्ट
(Credit to Google AI...😊)
तुम थीं तब कभी नहीं लगा तुम हो अब जब तुम नहीं हो तो लगता है तुम हो -वाणभट्ट