शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

इतिहास

कभी-कभी आपको लगता होगा कि इतिहास हमें पढाया ही क्यों जाता है, जब सारे प्रीमियम क्वालिटी जॉब्स पर विज्ञान के छात्र काबिज हैं. लोग तर्क दे सकते हैं कि सभी विषय बराबर हैं और सभी में जॉब्स की अभूतपूर्व संभावनायें हैं. लेकिन ये भी एक ज्ञात सत्य है कि हाईस्कूल और इन्टर आते-आते हर छात्र को ये अनुमान लग जाता है कि किस विषय से उसका आगे पाला न पड़े तो बेहतर है. समाजवाद, जिसे मसाजवाद कहना अधिक श्रेयस्कर होगा, सबको बराबर सिद्ध करने में लगा है. मसाजवाद, शब्द इसलिये अधिक एप्रोप्रियेट है, कि इसमें हर एक के अहम् की तुष्टि करनी होती है. तानाशाही होती तो किसी को तेल लगाने की ज़रूरत न होती. प्रजातन्त्र में जनता ही जनार्दन है. किसी भी देशकाल में विद्वानों की संख्या अल्पज्ञों से अधिक नहीं रही है, न हो सकती. विक्रमादित्य हों या अक़बर, उन्होंने कन्सल्टेंसी के लिये नौ रत्न ही क्यों चुने, वो सौ रत्न भी अपॉइन्ट कर सकते थे, उन्हें भला क्या कमी थी. लेकिन उन्हें सुराज डिलीवर करना था. योग्यता जब उस ज़माने में आपेक्षित थी, तो आज तो उसकी आवश्यकता और भी प्रासंगिक है. लेकिन जब से ये मसाजवाद आया, हर किसी को ये बताया जाने लगा कि ईश्वर ने इंसान बनाया है और हर इंसान बराबर है. चूँकि हर इंसान बराबर है, तो हर जगह बराबरी एक नैसर्गिक न्याय है. ये बात अलग है कि एक ही घर में एक ही माता-पिता से उत्पन्न चार भाई बराबर नहीं हैं. और माँ-बाप भी बच्चों के साथ समानता का व्यवहार नहीं कर पाते. लेकिन अगर समानता सरकार से लेनी हो तो हर कोई तैयार है, धरना-प्रदर्शन के लिये. 

यही व्यवस्था पाठ्यक्रम के सभी विषयों पर भी लागू कर दी गयी. हर विषय बराबर महत्वपूर्ण है. फिर क्या तबला, क्या सितार, क्या इतिहास, क्या भूगोल, क्या क्वांटम फिज़िक्स, क्या थर्मोडायनमिक्स, सब एक तराजू में तौल दिये गये. बचपन से रगड़-घिस के इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाने वालों की कुण्ठा जायज़ है. मौज-मस्ती के साथ बीए पास सहपाठी प्रशासक बन कर उसी पर रौब गाँठने का मौका नहीं छोड़ता. एक परिवार में सब बराबर नहीं हैं, तो एक देश में हर व्यक्ति बराबर करने का सपना देखने और दिखाने वाले, मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं. कितने ही महापुरुष सबको बराबर करते-करते, बिना कोई उद्यम लगाये, अम्बानी-अडानी से टक्कर ले रहे हैं. अगर सब आदमी बराबर हैं, तो फिर एग्ज़ाम्स की अवधारणा ही गलत है. जो जिस इलाके में पैदा हुआ, उसी इलाके में पढ़े-लिखे, काम करे. हर जगह, हर काम की ज़रूरत है. ये क्या कि पढ़ाई की कन्नौज में और नौकरी करने जा रहा है, फ़ौज में. उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग पूरी दुनिया में झंडे गाड़ रहे हैं, उनके लिये उनके अपने प्रदेश में ही रोजगार के अवसर नहीं हैं. 

जब से इतिहास और हिन्दी जैसे मानविकीय (ह्यूमैनिटीज़) विषयों को लेकर लोग शासक-प्रशासक बनने लगे, इंजीनियर्स ने प्रशासनिक सेवाओं को अपना लक्ष्य बनाना आरम्भ कर दिया. नतीज़ा पिछले दस सालों में प्रशासनिक सेवाओं में इंजीनियर्स का चयन 70% तक पहुँच गया. और विशेषता ये है कि इनमें से 90% इंजीनियर्स ने परीक्षा के लिये मानविकीय विषयों का ही चयन किया. यहाँ भी मसाज करने के उद्देश्य से कला-विज्ञान-वाणिज्य-मेडिकल-इंजीनियरिंग सबको बराबर मान लिया गया. किन्तु प्रशासन में जिस संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, उसको मापने के लिये कोई टेस्ट नहीं डिज़ाइन किया गया है. प्रशासनिक पदों पर रहते हुये, आपने यदि अपनी संवेदना का प्रदर्शन कर दिया, तो वही बॉस जो आपका वार्षिक मूल्याङ्कन करता है, उसके नाराज़ होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है. चूँकि नौकरी में ना-करी का रिवाज़ नहीं है, इसलिये यदि आप पद में निहित शक्तियों का उपयोग कर वाकई समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं, तो आपको अपने ही विभाग के धृतराष्ट्रों-दुर्योधनों-कर्णों से लड़ना पड़ेगा. शरद जोशी साहब ने अपने किसी ग्रन्थ में पहले से ही लिख रखा है - युद्धभूमि में अर्जुन ने कृष्ण से कहा - प्रभु, चाचा-भाई-भतीजों से तो मै निपट सकता हूँ, पर आप देख नहीं रहे हैं, सामने बॉस भी खड़े हैं, इस तरह के धर्म युद्ध से मै तो बाज आया. 

जिनका ज़मीर ज़रुरत से ज्यादा जाग्रत होता है, वे हर जगह यूँ और क्यूँ करने लगते हैं. ऐसे लोगों को सिस्टम मिसफिट डिक्लेयर करके किनारे बैठा देता है या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. जिन्हें अंदेशा हो जाता है कि यहाँ सर्वाइवल कठिन है, तो नौकरी में रहते हुये जो न कर पाये, उसे करने का सन्कल्प लेकर, स्वतः ही पद छोड़ के निकल लेते हैं. उन्हें समझ आ जाता है कि नेतागिरी ही एक माध्यम है जिसके द्वारा वो समाजसेवा कर सकते हैं. ये अलग बात है कि आत्म-उत्थान के लिये समर्पित जनसेवक, प्रायः इस बीमारी से ग्रसित नहीं होते और नौकरी में संवेदनशीलता की कतिपय गुंजाइश नहीं होती.

विज्ञान और अभियांत्रिकी का छात्र होने के नाते, मुझे सब्जेक्टिव विषय वैसे ही लगते हैं, जैसे वाणभट्ट के ब्लॉग. जब जैसा मन हुआ, वैसी व्याख्या कर डाली. सही को गलत और गलत को सही सिद्ध करने का कार्य, या तो कवि-लेखक कर सकते हैं या इतिहासकार. भूगोल भी कुछ हद तक वैज्ञानिक है. इसमें अपने मन से कुछ भी भाँजने की गुंजाइश कम होती है. लेकिन इतिहास और हिन्दी ऐसे विषय हैं, जिसमें यदि आप थोड़े भी कल्पनाशील हैं, तो कॉपी खाली नहीं रहने वाली. शायद इसीलिये सिविल सेवा के एग्ज़ाम्स में ये छात्रों के पसन्दीदा विषय होते हैं. इतिहास में थोडा क्रोनोलॉजी का मग्घा मारने की आवश्यकता होती है, हिन्दी में तो वो भी नहीं करना. कला विषयों की प्रत्येक पुस्तक में पहला अध्याय मात्र ये सिद्ध करने में लग जाता है कि इतिहास भी विज्ञान है. राजनीति शास्त्र को तो पॉलिटिकल साइंस ही घोषित कर दिया गया. हिन्दी और अन्ग्रेज़ी के भी अपने भाषा विज्ञान हैं. संस्कृत पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है, जिसमें गणित की तरह दो और दो के जोड़ का फ़ॉर्मूला लगता है. सही तो सही, फुल मार्क्स. गलत, तो ज़ीरो. लेकिन जिस तरह समर्थ लोग किसी को अपना औचित्य सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं समझते, संस्कृत ने भी अपनी गरिमा बनाये रखी, और विज्ञान या अविज्ञान की परिभाषा के चक्कर से बची रही. 

चूँकि आज का विषय इतिहास है, तो ये बताना आवश्यक हो जाता है कि इतिहास, इतिहासकार लोग लिखते हैं. और जब वो घटना या दुर्घटना हो रही होती है तब वो वहाँ उपस्थित नहीं होते. बाद में प्रत्यक्षदर्शी जो उन्हें रिपोर्ट देते हों, उसी के आधार पर वो उस घटना/दुर्घटना को अपने नज़रिये से कलमबन्द करते रहते हैं. ये आज का अटल सत्य बन गया है, जो लिख गया, वो पत्थर की लकीर. किला बनेगा तो समय के साथ खँडहर हो जायेगा, लेकिन जो लिखा जायेगा, वही पीढ़ियों तक पढ़ा-पढ़ाया जायेगा. समय के साथ वही लिखा अमर हो जायेगा. उसी के रेफरेन्स कोट किये जायेंगे, वाणभट्ट  एट आल सन् फलाँना-फलाँना. यदि आप इतिहास पढ़िये तो लगता है कि सारे महापुरुषों को इतिहास में ही जन्म लेना था. आज़ादी की लड़ाई तो बहुतों ने लड़ी, लेकिन हर किसी को स्वतंत्रता सन्ग्राम सेनानी नहीं माना गया. स्वतन्त्रता के पश्चात् जिस पार्टी की सरकार बनी, सारे महान पुरुष उसी के डिक्लेयर हो गये. हर गली-मोहल्ले-चौराहों पर उनकी प्रतिमायें लगीं, तो लोगों की स्मृतियों में वे आज भी जीवित हैं. जिन्होंने शहादत दी या यातनायें सहीं, उनके नाम इतिहास के पृष्ठों में खो से गये. जब से हमने होश सम्हाला एक भी पुरुष (या महिला), महापुरुष (या महामहिला) नहीं बन पाये. आज़ादी के बाद से तो महापुरुषों ने जन्म लेना ही बन्द कर दिया. जो पैदा हुये भी, तो पक्ष और विपक्ष ने उनकी पूरी कुण्डली खंगाल डाली. जब हर पार्टी अपने-अपने महापुरुष लिये घूम रही है, तो किसी एक पुरुष को महापुरुष घोषित करना मुश्किल हो जाता है. स्वीकार्यता इस बात पर बनती है कि एक आपका तो एक हमारा भी. नहीं तो न आपका, न हमारा. इतिहास के इतिहास पर यदि गहन दृष्टि डाली जाये तो ज्ञात होता है कि जो शासक होता है, वो इतिहास लिखवाता है. अब किसी कलमकार की क्या मजाल कि जिल्ल-ए-सुभानी की अमानत में खयानत कर जाये. जान है तो जहान है. मुग़लों ने तो अति कर दी, एक शहर बसाया नहीं, बस शहरों के नाम बदल दिये. मकानों पर कब्जा करने का ये प्रचलन आज भी चल रहा है, नेम प्लेट बदल दो, मकान आपका हो गया. शेर शाह सूरी भाई ने तो गज़ब कर दिया, ढाका से काबुल तक पक्की सड़क का निर्माण करा डाला, अपने दस वर्षों के कार्यकाल में. यहाँ भी नाम पट्ट बदलने की ही सम्भावना लगती है. इसलिये जिसने भी भारत जैसे धर्मपरायण और सहिष्णु देश पर लूट-खसोट के उद्देश्य से हमला किया, उसने ख़ुद को महान घोषित कर दिया. शमशीर के साये में कुछ भी इतिहास लिखवा लो. सत्ता या पद में निहित शक्तियों के दुरूपयोग के आज भी बहुत से उदाहरण मिल जाते हैं. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी जनता का, जनता के लिये, जनता के द्वारा स्थापित प्रजातन्त्र में ऐसी बानगी देखने को मिलती हो, तो ग़ुलामी काल की बात ही क्या करनी. सरकार क्या बदली नया-नया इतिहास और नये-नये महापुरुष निकल-निकल कर सामने आने लगे. 

आज हम भविष्य के जिस इतिहास को जी रहे हैं, उसे देख कर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि हर तस्वीर के दो रुख़ होते हैं. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरफ़ से, किस एंगल से देख रहे हैं. पक्ष को कोई कमी नहीं दिखती और विपक्ष को कमी ही कमी दिखती है. पक्ष-विपक्ष दोनों देश का विकास चाहते हैं, लेकिन सत्ता में रहने या आने के बाद. तब तक सब गलत. जब इतने विकास और निष्पक्ष पत्रकारिता के बाद भी लोग मीडिया को गोदी मीडिया कह सकते हैं, तो ये मानना पड़ता है कि वृहद् समाज प्रायः सत्ता के पक्ष में रहता है. विरोध भी वही दर्ज़ करते हैं जो मलाई से वंचित रह जाते हैं. पत्रकारिता को प्रजातन्त्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है. जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते विचार और मूल्य बदल जाते हों, तो आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि भूतकाल में भी शासकों का प्रभाव किस हद तक लेखक और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करता रहा होगा. इतिहास के पन्नों से आज़ादी के कितने ही दीवानों के नाम तक मिटा दिये गये. 

संयोग से हम भविष्य के बनते हुये इतिहास का हिस्सा हैं. 3000 के अल्ले-पल्ले पंजीकृत राजनैतिक पार्टियों के कारण हम हिन्दुस्तान के प्रजातन्त्र को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र मान कर गौरवान्वित होते हैं. जब तक प्रजातन्त्र एक परिवार-व्यवस्था के अधीन रहा, सारे महापुरुषों पर उन्हीं का वर्चस्व रहा. जैसे-जैसे प्रजातन्त्र का विकास हुआ, पार्टियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी. मल्टी पार्टी सिस्टम में हर पार्टी के अपने महापुरुष हैं. कुछ पार्टियों में तो लीडरान की संख्या की तुलना में समर्थकों की संख्या कम है. पार्टी में भी तो हर कोई किसी न किसी पद का आकान्क्षी है. हर वह व्यक्ति जो हज़ार-पाँच सौ वोटों को प्रभावित कर सकता है, नेता बना घूम रहा है. क्या मजाल कि कोई उनके नेता के विरुद्ध कुछ लिख-बोल दे, इतने अनुयायी तो पले ही हुये हैं कि कहीं भी, कोई भी, चक्का जाम कर दें. व्यापक बेरोजगारी में धरना-प्रदर्शन-चक्का जाम एक उद्योग की तरह फल-फूल रहा है. जिस इतिहास को हम जी रहे हैं, उसे देख-सुन कर पढ़े हुये इतिहास से विश्वास उठ सा गया है. बताइये आज कोई ऐसा नेता हो सकता है, जिसके पीछे पूरा देश खड़ा हो जाये. तब भी नहीं रहा होगा, लेकिन जिसका मीडिया मैनेजमेंट जितना बढ़िया रहा होगा, वो महान बन गया. जिस देश में सबको अपनी-अपनी पड़ी हो उससे समझदार देश खोजना मुश्किल है. यदि भगत-उधम जैसे दीवाने होते तो क्या समझते हैं आप, अन्ग्रेज़ हों या मुग़ल, कितने दिन टिक पाते. छोटे-छोटे व्यक्तिगत लाभ के लिये, जब आज भी लोग नैतिक मूल्यों और आदर्शों को तिरोहित कर सकते हैं, तो वफ़ादारी के ईनाम के तौर पर मुगलों के ज़माने में तो निजाम और अंग्रेजों के ज़माने में राय बहादुर की पदवियों से नवाज़ा जाता था. इस देश में क्रान्ति करने की प्रथा नहीं है, वर्ना देश को सैकड़ों वर्षों की गुलामी न झेलनी पड़ती. अमरीकी क्रान्ति पाँच-सात साल में ख़त्म हो गयी. सौ-दो सौ साल भला कौन सी क्रांति चलती है.   

अतीत के इतिहास ने कितने ही महापुरुषों को हाशिये में दफ़न हो गये. स्थापित महापुरुषों को इतना महिमामंडित किया गया कि युवा पीढ़ी आज़ादी के अन्य वीर सपूतों के विषय में जान ही नहीं पायी. सुभाष-आज़ाद-भगत-पटेल-सावरकर के योगदान को उतनी तरजीह नहीं मिल सकी. एक बार भारत के सम्पूर्ण इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है. ताकि हम जान सकें कि हमारा इतिहास और अस्तित्व, अन्ग्रेज़ों-मुग़लों के काल तक ही सीमित नहीं था, और दिल्ली ही भारत नहीं था. आज़ादी की लड़ाई में कितनों ने अपना सर्वस्व गँवाया. उनको भी इतिहास के पन्नों में जगह मिलनी चाहिये. अहिंसक आज़ादी की जिस परिकल्पना पढ़-सुन कर हम बड़े हुये, वही हमारा इतिहास है, वही हमारा सच है. वर्तमान परिस्थितियों को देख कर सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि इतिहासकारों ने उस समय के शासकों के मनमाफ़िक ही लिखा होगा. और जनता को भी वही दिखाया गया होगा. आज इन्फोर्मेशन एक्सप्लोज़न के युग में आम आदमी भी जागरूकता के चरम पर है, कोई किसी को यूँ ही महान नहीं मान लेगा. हर व्यक्ति, हर महापुरुष को अपने चश्मे से देख रहा है. यदि किसी ने गलती से किसी को महान बोल दिया, तो लोग बैठे हैं उसकी महानता का नक़ाब उतारने को. गनीमत है, इतिहास के महापुरुष आज नहीं पैदा हुये, नहीं तो चैटजीपीटी के युग में उनका पूरा इतिहास और भूगोल निकाल लिया जाता. समर्थक समर्थन करते और विरोधी विरोध.  

खोजी पत्रकारिता के नाम पर कोई घोषित कर देता है - कौवा कान ले गया. और रोजगार की तलाश में बैठे लोगों को मुद्दा मिल जाता है. कभी-कभी लगता है, शायद नयी पीढ़ी के मन में आज़ादी के आन्दोलन में भाग लेने की तमन्ना अभी भी बाकी है, इसलिये ये बस मुद्दे खोजते रहते हैं. कुकरमुत्ते की तरह उग जाने वाली पार्टियाँ, आज फ़ेसबुक-इन्स्टा-ट्विटर पर बैठ कर व्यवस्था बदलने का दंभ भर रही हैं. युवा जेन-ज़ी को लोगों ने ऐसे चढ़ा दिया है जैसे इनके पहले की पीढ़ियाँ कभी जवान नहीं थीं और इनके बाद आने वाली नस्लें ढक्कन पैदा होने वाली हैं. अरे भाई दुनिया को आगे ही जाना है, यदि पुतिन-नेतान्याहू-ट्रम्प से बच गयी तो. सिर्फ़ इस्तीफ़ा-इस्तीफ़ा खेलने से  समस्या का समाधान नहीं निकलना, ये बात उन्हें भी पता है. प्रजातन्त्र है, इसलिये सबको आज़ादी है, सोचने की, बोलने की. सोचने-बोलने से भला किस सत्ता को फ़र्क पड़ता है, इसलिये इन्हें धरना-प्रदर्शन-चक्का जाम में ही समाधान दिखायी देता है. टीवी चैनल्स, यू-ट्यूब, सोशल मीडिया किसी अनजान नाम को पूरे देश के घर-घर में पहचान दिला सकने में सक्षम है. और ये पीढ़ी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की इस ताक़त को भली-भाँति समझती है. मेरे विचार से जो कुकुरमुत्ते-कॉकरोच टाइप की पार्टियाँ पैदा हो गयी हैं, उन्हें नैशनल लेवल पर आने से पहले अपने आस-पास के ज्वलंत मुद्दों पर काम करना चाहिये.

जिन लोगों को भारत के स्वतंत्रता सन्ग्राम में भाग लेने का मौका नहीं मिला, उनकी तमन्ना पूरी करने के उद्देश्य से एक नया विभाग बनाना चाहिये, जिसमें अन्ग्रेज़ों और मुग़लों के अत्याचारों को सिम्युलेट किया जाये. जिसे भी आज़ादी का ज़्यादा शौक चर्राये, उसे हफ़्ते-दस दिन के लिये सिम्युलेटर में भेज दिया जाये. इनकी आज़ादी की क्रान्ति में भाग लेने की तमन्ना भी पूरी हो जायेगी और देश का अनावश्यक धरने-प्रदर्शन में होने वाले धन और समय का अपव्यय भी बच जायेगा. बाकि प्रजातन्त्र में बात रखने के अपने तरीक़े हैं, उस तरह से भी समस्याओं को निपटाया जा सकता है.    

देश में करने के लिये बहुत काम हैं, आपको देखना है कि कहाँ से शुरू होना है. गली-मोहल्ले में काम करने से नैशनल आइडेंटिटी नहीं बनने वाली इसलिये राष्ट्रीय मुद्दे उठाना बहुत ज़रूरी है. जिन्होंने अपने इर्द-गिर्द स्कूल-कॉलेज-समाज-ऑफ़िस में घटती विसंगतियों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठायी,  वो पूरी व्यवस्था बदलना चाहते हैं, वो भी बिना इलेक्शन लड़े. जेन-ज़ी को देश बदलना है तो बदलाव का हिस्सा बने. शुरुआत अपने अगल-बगल होने वाली अव्यवस्था से लड़ने से शुरू करें. देश सुधारने से अच्छा है, आप जहाँ जिस जगह हैं, वहीं से सुधार आरम्भ कीजिये. आज़ादी की लड़ाई जन्तर-मन्तर पर नहीं लड़ी गयी थी. हर किसी ने अपने-अपने स्तर पर प्रतिरोध किया था. कुछ ने नौकरियाँ छोड़ीं, कुछ ने अखबार निकला, कुछ ने किस्से-कहानी-कवितायें लिखीं. उसके लिये प्रताड़ित भी हुये. आज़ादी नारे लगाने से नहीं मिली होगी. तब मीडिया के इतने माध्यम नहीं थे. आज हर मोबाइल धारक एक पत्रकार है. सच दिखाना जितना आसान हो गया है, उतना ही कठिन हो गया है, सच को छिपाना. भारत में हर किसी के लिये महान बनने के अभी भी बहुत अवसर हैं. बस फ़र्क ये है कि वास्तविकता जमीन पर दिखनी चाहिये. 

जिन लोगों में महान बनने का कीड़ा विद्यमान है, वाणभट्ट उनका आह्वाहन करता है कि आइये, तन-मन-धन से अपना योगदान दीजिये. मीडिया के विकास के युग में कम से कम ये गारेन्टी तो दी जा सकती है कि भविष्य के इतिहास के जिस हिस्से में हम जी रहे हैं, उसमें मैनिपुलेशन की सम्भावना नगण्य है. आप को महान बनने के लिये कठोरतम प्रयास करना होगा. आपके विरोधी हर वो सम्भव हथकण्डे अपनायेंगे जो आपको महान बनने से रोक सके. बाकि अगर ये सरकार भी पिछली सरकार की तरह सत्तर बरस रह गयी, तो कुछ नये महान लोग अवतरित हो जायेंगे. नये इतिहास में पुराने महान किरदारों के गुम हो जाने का भी अंदेशा है. आज अगर गाँधी, कृष्ण या राम भी आ जायें, तो कृतिम बुद्धिमत्ता के इस युग में उनको भी स्वयं को महान सिद्ध करना मुश्किल हो जाये. यकीन मानिये, आज के समय में, जब झींगुर और तिलचट्टे बिना कुछ किये-धरे प्रश्न पूछने लग जायें, तो लगता है, अब बहुत कठिन है, डगर महानता की. 

-वाणभट्ट

शनिवार, 19 सितंबर 2026

जागृत निन्द्रा

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डायलॉग नहीं था. फिर भी इसमें कहीं कुछ तो वजन था, जो ज़ेहन में रह गया. उस समय इसका मतलब समझ नहीं आया था. लगा कुछ बोलना रहा होगा, सो राईटर ने लिख दिया होगा, कलाकार ने बोल दिया होगा. हम भी तब जुम्मा-जुम्मा दस साल के बच्चे हुआ करते थे. अब लगता है कि लेखक ने बड़ी बारीकी से देखा-समझा होगा, स्मगलरों के काम करने के तरीक़े को. ये इतनी सफ़ाई से अपना काम करते हैं कि किसी को कोई शक़-शुबहा न हो. उस फ़िल्म में किसी अंध विद्यालय के बच्चों का उपयोग तस्करी के लिये किया जाता था. शातिर लोग शतरंज की तरह चालें चलते हैं. ग्रूप बना कर जब गलत काम किये जाते हैं तो उसे साजिश की संज्ञा दी जा सकती है. प्रायः जो साजिशें समूह विशेष के लाभ के लिये होती हैं, वे देश और समाज विरोधी भी होती हैं.   

जब अपने चारों ओर आत्मकेंद्रियता से ग्रसित समाज को देखता हूँ, तो समझ आता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ इस कदर हावी है कि लोग बस मै-मेरा-अपना और बहुत हुआ तो मेरे-अपने तक सीमित हो कर रह गये हैं. जब सबको अपनी-अपनी पड़ी है, तो देश-दुनिया की चिन्ता वे करें जिन्हें घर फूँक तमाशा देखने का शौक़ है. बाकी अपन को क्या, जहाँ अपना लाभ वही मेरा रास्ता. एक तरफ़ कुछ अल्पसंख्यक राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ लोग देश के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर करने को उद्दत हैं तो दूसरी तरफ़ बहुसंख्यक कृतघ्न लोगों की कमी नहीं है. ज़िन्दगी का आनंद तो ना-समझ लोगों के पल्ले ही आता है. 'बने रहो लुल्ल, मजा लो फुल्ल'. आज का ब्रह्म वाक्य बन चुका है. ये हमारे डीएनए के भीतर तक पैठ गया है. इसके लिये क्या जेन-एक्स और क्या जेन-ज़ी, कोई अछूता नहीं रहा है. 'समझदार की मौत है' - एक मुहावरा ही बना दिया गया. सामान्यतः हर मुहावरा, हर देश, हर भाषा में अलग-अलग तरीक़े से प्रयोग में आता रहा है. लेकिन समझदार की मौत है के समानान्तर शायद ही कोई मुहावरा अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा में गढ़ा गया होगा. शून्य की खोज की तरह इस मुहावरे की खोज का श्रेय भी हमें ही मिलना चाहिये. इसके पीछे राजनैतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण हो सकते हैं. वर्षों की ग़ुलामी अकारण तो न थी. देशद्रोह के उदाहरणों से भारत का इतिहास भरा पड़ा है. दूसरे देश पर आक्रमण कर लूटने या राज करने का विचार किसी के मन में आना राजनीति है. एक बार लुटने-पिटने के बाद, पुन: लुटने के लिये तत्पर रहना, इतिहास है. और पूरी दुनिया में एक ही देश को इस पुनीत कार्य के लिये चिन्हित कर लेना, भूगोल है. जिसे देखो कहाँ जा रहा है, खोजने या लूटने, तो भारत. अमेरिका दुनिया के नक्शे में कभी न आता, यदि कोलम्बस भारत खोजने न निकलता. भ्रष्टाचार और स्वार्थ में लिप्त वर्तमान ही अतीत का इतिहास है. इतिहास पढ़ने का समय न हो तो वर्तमान को ही इतिहास की दृष्टि से देखिये. सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये चरित्रवान नेतृत्व की ही नहीं कर्तव्यपरायण नागरिकों की भी आवश्कयकता होती है. हर युग को अपना चाणक्य खोजना पड़ता है जो देश में जन-जागरण लाने में सक्षम हो. परन्तु घनानन्द जब बहुतायत में हों तो कितने ही चाणक्य खप जायेंगे देश को सही मार्ग पर लाने में. आज भी अगर आप चारों ओर दृष्टि डालें तो आपको लगेगा कि आप भविष्य के जिस इतिहास में जी रहे हैं, वो किसी भी प्रकार से अपने पूर्ववर्ती इतिहास से भिन्न नहीं है. अन्ग्रेज़ों के शासन काल में देशप्रेम का प्रदर्शन करना कतिपय आसन था. आप शासन का विरोध करते तो क्रांतिकारी घोषित हो जाते. आज जब अपनों पर अपनों का ही राज है तो ये सिद्ध करना कठिन हो जाता है कि कौन देश के लिये समर्पित है कौन नहीं. सक्षम पदों पर बैठे लोग वाह्य रूप से देश के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करने पर विश्वास करते हैं, वो भी साल में दो बार. पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी न आते तो शायद उसकी भी आवश्यकता न पड़ती. कथनी और करनी में अन्तर का भान बाबा कबीर ने चौदहवीं शताब्दी में ही हो गया था. 

कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोई। 

कथनी तज करनी करे, तो विष सों अमृत होई।।

पक्ष और विपक्ष दोनों देश प्रेम से ओत-प्रोत हैं. दोनों ही देश के विकास को ले कर कृत संकल्प हैं. लेकिन चूँकि दोनों धुर विरोधी हैं, इसलिये जब तक वे स्वयं सत्ता में न आ जायें, एक दूसरे का विरोध करते रहेंगे. ग्रेटेस्ट और लार्जेस्ट डेमोक्रेसी का उदाहरण अमेरिका और भारत के संदर्भ में प्रायः दिया जाता है. वहाँ एक तरह से दो पार्टी सिस्टम है. हमारे यहाँ छह हज़ार से अधिक पंजीकृत पार्टियाँ हैं. ये बात अलग है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में एक पक्ष को रोकने के लिये सारा विपक्ष एक हो गया है. इस प्रकार हम भी कह सकते हैं कि हम लार्जेस्ट के साथ-साथ ग्रेटेस्ट डेमोक्रेसी बनने की दिशा में अग्रसर हो चुके हैं. जनता की स्थिति भी कोई कम बुरी नहीं है. पक्ष हो या विपक्ष, जनता आँख मूँद कर अपने-अपने नेता के पीछे चल रही है. जितने सम्प्रदाय, जितनी जातियाँ, उतने नेता, उतनी पार्टियाँ. सत्ता को दिये सुझाव को कई बार राष्ट्र विरोध मान लिया जाता है और सरकार के अच्छे काम में बुराई खोजना विपक्ष का एक मात्र काम बन गया है. सिर्फ़ विरोध के लिये विरोध कहाँ तक उचित है, ये जनता को हर पाँच साल बाद देखना होता है.

कमरे में तीन लोगों ने प्रवेश किया.  दो पुरुष और एक महिला. तीनों एक प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्यालय से पधारे थे. प्रथम पुरुष - सन्युक्त निदेशक, द्वितीय पुरुष - उपनिदेशक और तृतीय महिला - सहायक निदेशक थीं. वे लोग अपने प्रदेश में प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित करवाने के उद्देश्य से हमारे यहाँ आये थे. कृषि से सम्बंधित लोगों के पास कृषि की हर समस्या का वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध है. उन्हें अभियांत्रिकी और अभियन्ताओं की आवश्यकता कम ही पड़ती है. लेकिन यहाँ मामला पूरी तरह से अभियांत्रिकी और प्रसंस्करण से सम्बन्धित था. गनीमत है किसी ने ये नहीं कहा कि हमारे यहाँ कोई अभियन्ता नहीं है. मज़बूरी थी, वे स्टेट गेस्ट थे, तो किसी ने मेरे कमरे का रास्ता बता दिया. उन्हें दरकार थी, प्रसंस्करण सम्बन्धी डीपीआर की. मैंने यथा-ज्ञान, यथा-क्षमता उनकी सहायता करने का प्रयास किया. प्रसंस्करण की विधि और तकनीकों की विस्तार से चर्चा की और डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाने में यथा-सम्भव सहायता की. संयुक्त और उप-निदेशक कृषि स्नातक थे जबकि युवा-महिला देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान से कृषि अभियांत्रिकी में परास्नातक थी. चूँकि ये मुद्दा ही अभियांत्रिकी का था इसलिये सारे के सारे प्रश्न महिला अभियन्ता द्वारा ही पूछे जा रहे थे. दो दिन के पश्चात उसने जो डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की वो निश्चय ही काबिल-ए-तारीफ़ थी.  

दो दिन उनके प्रवास के दौरान उनसे इनफॉर्मल परिचय भी हो चला था. मैंने पूछ ही लिया कि माननीय मंत्री जी ने हर प्रदेश में कृषि अभियान्त्रिकी निदेशालय बनाने के उद्देश्य से एक पत्र सभी प्रदेशों को भेजा है. उस दिशा में आपके प्रदेश ने क्या कोई प्रयास किया है. सीनियर मोस्ट संयुक्त महोदय ने मुस्कुराते हुये कहा कि हमें अभी उसकी आवश्यकता नहीं है. अलग निदेशालय बनाने से क्या लाभ होगा. अभी हम साथ-साथ काम करते हैं. जिन प्रदेशों में अलग कृषि अभियन्त्रण निदेशालय बन गया है, वहाँ यंत्रीकरण का स्तर बढ़ गया है. कृषि उत्पादन मूल्यों में कमी आयी है और सामयिक कृषि प्रबन्धन से उत्पादकता में भी वृद्धि प्राप्त हुयी है. सम्भवतः कृषि अभियन्त्रण की सफलता की पुनरावृत्ति के उद्देश्य से ही मन्त्री महोदय ने प्रत्येक प्रदेश में कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना पर बल दिया हो. 

आज कृषि आधारित हर संगठन-संस्थान में कृषि अभियांत्रिकी की आवश्यकता और महत्ता का तीव्रता से अनुभव किया जा रहा है. किन्तु विभागों में बहुतायत कृषि स्नातकों की संख्या में दो-एक अभियन्ता ही रखे गये हैं. जबकि यह सभी जानते हैं कि कृषि क्षेत्र की अधिकान्श समस्याओं के व्यापक समाधान अभियांत्रिकी के द्वारा ही सम्भव है. खेत तैयार करने से लेकर, फसल तैयार होने तक और उसके बाद उपभोक्ता की थाली तक पहुँचने में फसल को अनेक चरणों से गुजरना होता है. मूल्य श्रृंखला में उत्पादक से अधिक लाभ मूल्य श्रृंखला के अन्य हितधारक ले जाते हैं. मुख्य उत्पादक यानि किसान के लिये खेती कभी-कभी घाटे का सौदा बन जाती है. कृषक की आय मात्र उत्पादन दोगुना करने से दुगनी नहीं होने वाली. बल्कि दोगुने उत्पादन पर उपज का मूल्य आधा होने की सम्भावना अधिक है. ये बात किसान सहित सबकी समझ में आ गयी है. बिना समुचित आय के किसानों को कृषि कार्यों से जोड़े रखना आसान नहीं होगा. सतत कृषक और सतत कृषक परिवार की संकल्पना के बिना, सतत कृषि की परिकल्पना नहीं की जा सकती. 

विभिन्न कमेटियों की संस्तुति में कृषि अभियान्त्रिकी को बढ़ावा देने की बात हो रही है. लेकिन कहीं न कहीं, डर ये भी है कि छद्म आत्मा-परमात्मा टाइप के कार्यों को जो तथाकथित विज्ञान का स्वरुप दिया गया है, वो खंडित न हो जाये. इसी लिये कृषि अभियन्त्रण निदेशालय की स्थापना के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कृषि स्नातक बाहुल्य वाले विभागों ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखायी है. शोध कार्य भी प्रायः समस्याओं का स्थायी निदान करने की दिशा में लगे हुये हैं, वो भी बिना अभियन्त्रण को सम्मिलित किये. ये तो भला हो विश्व के लघु और सीमांत किसानों का, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों का, जिनका उत्पादन और आय बढ़ाने की फ़िक्र में विश्व के सभी ज्ञानी-विज्ञानी लगे हुये हैं. ऐसे भी अनपढ़ लोग हैं, जिन्होंने वर्षा जल को संचित करके भूमि जल का स्तर बढ़ा दिया, वन क्षेत्र में विस्तार कर दिया. मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान में यही अन्तर है. व्यवहारिक ज्ञान के लिये डिग्री-डिप्लोमा नहीं चाहिये. जमीनी हक़ीक़त के लिये विज्ञान को भी यथार्थ के धरातल पर आना ही होगा. समस्या का निर्धारण किसी शोध का पहला चरण है. लेकिन समस्या ये है कि विज्ञान के पास इसके लिये समय नहीं है. जिस लीक पर सब काम कर रहे हैं, सब उसी दिशा में जुट जाते हैं. एक समस्या पर अनेकों लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं. जिस अंधाधुंध गति से अनुसंधान चल रहे हैं, कभी-कभी लगता है, ऐसे विषयों पर श्रम, समय और धन व्यय हो रहा है, जिसकी आवश्यकता ही नहीं है. जिन काल्पनिक समस्याओं के काल्पनिक स्थायी समाधान पर वैश्विक स्तर पर शोध कार्य चल रहे हैं, उनका एकीकृत प्रबन्धन सम्भवतः किफ़ायती विकल्प हो. विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित प्रयोग अधिक प्रभावशाली और विश्वसनीय सिद्ध हुआ है और भविष्य में भी होगा. जहाँ कृषि विज्ञान, कृषि क्षेत्र की समस्त समस्याओं का निराकरण विज्ञान के द्वारा करने के लिये कृतसंकल्प है, वहीं उनका प्रबन्धन, स्थायी समाधान से कहीं अधिक मितव्ययी, आसान और प्रभावी है.    

जिनके ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं, उन्हें व्यक्तिगत हानि-लाभ का बखूबी पता है. वे देश-काल से ऊपर उठ चुके हैं. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद कृषि अभियांत्रिकी के महत्त्व पर बात आरम्भ तो हुयी है लेकिन अभियन्त्रण को बढ़ावा देने के ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं. संस्तुतियों पर ध्यान दिया जाये तो सभी अभियान्त्रिकी की उपयोगिता को रेखांकित तो करते हैं, लेकिन अभियंत्रण विभाग-प्रभाग स्थापित करने की नहीं. हर संस्थान में कृषि के सभी महत्वपूर्ण व गौण विषयों के विभाग मिल जायेंगे, लेकिन संस्तुतियों के बाद भी कृषि अभियन्त्रण विभाग या प्रभाग नहीं मिलेगा. न ही कोई प्रयास कर रहा है कि हर संस्थान में कृषि अभियंत्रण प्रभाग होना चाहिये. कृषि विज्ञान के अन्य सभी विषय अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के बाहर नहीं झाँकते तक नहीं. एक कृषि अभियन्त्रण ही है, जो बीज से लेकर अन्तिम उत्पाद (भोज्य पदार्थ) तक हर चरण के सभी पक्षों से किसी न किसी रूप में सम्बद्ध है. इस बात का संज्ञान कृषि से सम्बद्ध सभी लोगों को है किन्तु विषय विशेषज्ञ अपने विषय की महत्ता से इतने अभिभूत हैं कि वो अन्य विकल्पों और सम्भावनाओं पर विचार नहीं करना चाहते. हर जगह दुनिया तो आँख वाले ही चला रहे हैं और वो चाहते हैं कि बाकी सब उन्हीं के चश्मे से देखें. कृषि क्षेत्र भी इससे इतर नहीं है. कृषि विज्ञान सब कुछ जानते और समझते हुये भी कृषि अभियंत्रण का उपयोग तो करना चाहता है लेकिन उसे विज्ञान की संज्ञा देने को तैयार नहीं है. व्यवहारिक विज्ञान के लिये प्रायः यह कहते सुना जा सकता है, इसमें विज्ञान क्या है. तभी एक निपट अनपढ़ आदिवासी सूखा ग्रस्त क्षेत्र में मात्र गड्ढे खोद कर हरियाली ला कर क्रांति ले लाता है, तो विज्ञान को भी प्रमोशन और शोधपत्रों से आगे निकल कर, समस्या समाधान और आय संवर्धन की दिशा में कार्य करना होगा. आज सबको भली-भाँति मालूम है कि समस्याओं का व्यापक समाधान कृषि अभियंत्रण के बिना नहीं निकलने वाला. लेकिन ज्ञानी-विज्ञानी इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं. धीरे-धीरे सन पचहत्तर में आयी फ़िल्म के डॉयलॉग - 'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी' का मतलब समझ आने लगा है. देर-सबेर कृषि अभियन्त्रिकी निदेशालय हर प्रदेश में स्थापित होगा. पहले ही बहुत विलम्ब हो चुका है. ये पहल जितनी जल्दी हो उतना अच्छा. शुभस्य शीघ्रम.

सोते को जगाने के यत्न किये जा सकते हैं, किन्तु जगे हुये को कौन, कैसे जगाये. योग में जागृत निन्द्रा का प्रावधान है. लेकिन योग व्यक्तिगत अनुभूति है. कृषि समस्याओं का समाधान व प्रबन्धन, विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित उपयोग में निहित है. वैसे भी किसी ने ठीक ही कहा है - साइंस इज़ अबाउट नोइंग, इंजीनियरिंग इज़ अबाउट डूइंग.   

-वाणभट्ट 

रविवार, 6 सितंबर 2026

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत और रामायण जैसे महाग्रंथ तो लगभग प्रत्येक भारतीय के जीवन का हिस्सा हैं. सबने बचपन से इनको सुना और गुना है. भारत में ग्रन्थ और काव्य रचना एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण के साथ की जाती थी. पन्चतंत्र हो या जातक कथायें, सबका उदेश्य था, एक संस्कारित समाज का निर्माण करना. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों के आने के पूर्व का इतिहास, न तो स्वतन्त्रता के पूर्व ढंग से पढाया गया, न ही स्वतन्त्रता के बाद किसी ने उसके पुनरावलोकन की आवश्यकता समझी. इसका परिणाम ये हुआ कि हमें हमारे अराध्य भगवानों के भी धरा पर अवतरण के साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ रही है. आज जब भी कहीं कोई कहानी या कथा लिखी जाती है, तो उस तरह की घटना घटने के बाद ही लिखी जाती है. लेखक अपनी सम्वेदना के अनुरूप कहानी को घटा या बढ़ा के प्रस्तुत करता है. अलग-अलग लेखक, उसी घटना को अपने-अपने नज़रिये से देखते हैं, और अपनी-अपनी कहानी कहते हैं. एक की कहानी में जो व्यक्ति विलेन है, दूसरे की कहानी में वही व्यक्ति हीरो हो सकता है. सब नजरिये का खेल है. ये लेखक के ऊपर निर्भर है कि किसी घटना को वो किस परिपेक्ष्य से देखता है. महाग्रन्थों को जब कोई कोरी कल्पना सिद्ध करने का प्रयास करता है तो उसे ये समझना चाहिये कि कल्पना की भी कोई सीमा है. महाभारत में हज़ारों चरित्र हैं, हर चरित्र की अपनी भूमिका है और हर चरित्र की कोई न कोई अन्तर्कथा है. 

हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐतिहासिक अस्तित्व को लोग सहजता से नकार देते हैं. सम्भवतः यह हिन्दू धर्म की विशेषता है कि ये समय के साथ नवीनता ग्रहण करता गया. इसीलिये इस नित्य नूतन होते धर्म को सनातन भी कहा गया है. बुद्ध-महावीर यदि इतिहास का हिस्सा न होते तो उनके जैसे चरित्र को भी लोग कल्पना ही मानते. जिस देश में कण-कण में भगवान के वास की अवधारणा है, वहाँ उन्हें महापुरुष मान कर नहीं छोड़ दिया गया. हमने उन्हें भगवान माना. जब भी कोई राम और कृष्ण के धरा पर उनके आविर्भाव पर संशय प्रगट करता है, तो हिन्दू ही है, जो उनके विवेक पर प्रश्न नहीं उठाता. धर्म का लक्ष्य एक है, उसे प्राप्त करने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं. धर्म की सीधी-सरल परिभाषा है - धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है. प्रेम-करुणा-दया-सत्य-अहिंसा शाश्वत धर्म हैं, अपरिवर्तनीय. देश-काल-समाज के अनुसार उचित और अनुचित कर्मों की स्वीकार्यता बदल सकती है . एक समाज जिसे धर्म की संज्ञा देता है, दूसरा उसे अधर्म ठहरा सकता है. किन्तु धर्म का मूल नहीं बदलता.

चलिये कुछ देर के लिये मान भी लेते हैं कि भारत किम्वादंतियों का देश रहा है और इतिहास अधिक प्रमाणिक इसलिये नहीं है कि जो भी वाह्य शासक आता है, वो अपने को आपके ऊपर स्थापित करने के लिये आपके मूल्यों, आपकी धरोहर और आपके इतिहास को पहले समाप्त करने का प्रयास करता है. सदियों की दासता के बाद भी हमारे पुरखों ने अपने इतिहास को किम्वदंतियों के रूप में जीवित रखा. इकबाल साहब को कहना ही पड़ गया - कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. आज़ादी के बाद सत्ता भारतीयों के हाथ में आने के बाद भी, यदि उसमें भारतीयता का अभाव रहा, तो उसके पीछे मैकॉले की शिक्षा पद्यति को दोष दे कर हम अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते. अभी हम मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतन्त्र भी न हुये थे कि ग्लोबल इकोनोमी के नाम पर हम स्वयं को विदेशी संस्कृति अपनाने के लिये बाध्य पाते हैं. व्यक्ति हो या देश दुविधा से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता. हम आज भी ये समझने में असमर्थ हैं कि हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा सही है या विदेशी भाषा में पढाया गया ज्ञान. हम पश्चिम का अनुसरण करें या अपनी संस्कृति पर गर्व. हमारे यहाँ खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर ग्रन्थ उपलब्ध रहे हैं. ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों का हमें तब भी ज्ञान था, जब दुनिया को पृथ्वी के गोल और चपटा होने पर संदेह था. गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के सेब गिरने से पहले यहाँ विद्यमान था, इसीलिये सौर्य मंडल के सबसे बड़े ग्रह को गुरु या बृहस्पति कहा गया. ये संयोग मात्र नहीं है कि यूरोप की अधिकान्श खोजें फ़िरंगियों के भारत में पदार्पण के बाद हुयी हैं. अंग्रेजी में ज्ञान-विज्ञान पढ़ने के कारण हमारी सोच सीमित होती गयी. आज हम अपने ही ज्ञान धरोहर को संरक्षित कर पाने में विफल हो रहे हैं. निश्चय ही भौतिकतावादी पश्चिम ने मनुष्य जीवन को सरल और सहज बनाने के लिये विज्ञान के प्रायौगिक उपयोग में सफलता अर्जित की है. किन्तु एकांगी विकास के चरम पर पहुँच कर प्रत्येक मनुष्य को लगता है कि कहीं कुछ कमी है. समग्रता के साथ जीवन जीने के लिये मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता होती है. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. विश्व के महानतम अमीरों में से एक रॉकफ़ेलर (सीनियर) के बारे में कहा जाता है, जब वो अपनी सफलता के शिखर पर थे, उन्हें एक शून्यता बोध ने जकड़ लिया. दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी. तब उनके किसी शुभचिन्तक ने उन्हें दान करने के लिये प्रेरित किया. जिसने उनकी जीवन की दिशा को बदल दिया. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग परोपकार के लिये समर्पित कर दिया. आज भी उनके नाम से अनेक लोक कल्याण की योजनायें चल रही हैं और ज़रूरतमंद योग्य लोगों को लाभान्वित कर रही हैं. 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का वार्षिक आगमन भारतीयों में चेतना का नव-सृजन करने को पर्याप्त है. जहाँ भी, जब भी, कृष्ण का उल्लेख होता है, वहाँ उनके जन्म से लेकर, उनके अन्त तक के समस्त प्रकरण, हम भारतीयों के मानस पटल पर इस प्रकार अन्कित हैं, जैसे हम सभी उन घटनाओं के साक्षी हैं. कैसे कारावास में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया, कैसे कंस वध किया, कैसे महाभारत में भाग लिया और कैसे सब छोड़ कर द्वारिका प्रस्थान कर गये. कृष्ण की बात हो तो गीता और महाभारत का उल्लेख भी आना ही है. एक जीवन किसी मानव कल्पना में इतना विराट हो सकता है, असम्भव लगता है. यदि हमने उन्हें अवतार माना है, तो उसके पीछे उनके चरित्र की विशालता परिलक्षित होती है. निर्लिप्त होकर कर्म करने की अवधारणा प्रतिपादित करना, पश्चिम की भौतिकतावादी संस्कृति में सम्भव नहीं है. यही बात मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सन्दर्भ में भी लागू होती है. भारत के अतिरिक्त और किसी भी देश में इस प्रकार के आदर्शों की कल्पना क्यों नहीं की जा सकी. क्योंकि उनकी धरा पर इतने गौरवशाली, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का आविर्भाव नहीं हुआ. यदि हमारा इतिहास कल्पना मात्र है तो उन्हें किसी ने कल्पना की उड़ान भरने से किसने रोक रखा था. रामायण-महाभारत मात्र कथायें नहीं हैं. धरती पर जिया गया जीवन है. जितने वृहद ये ग्रन्थ हैं, उससे कहीं अधिक विस्तृत इनके पात्र और इनकी अन्तर्कथायें हैं. 

श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित ईश्वर-अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या पढने के बाद यह अनुभूति हुयी कि देश, समाज, परिवार और व्यक्ति के अन्तर में जो द्वन्द घटित हो रहा है, वही महाभारत है, वही महाभारत का लघु संस्करण है. 

धृतराष्ट्र - इन्द्रिय आसक्त, प्रवृत्तियों का दास व्यक्ति दृष्टिहीन से श्रेष्ठ नहीं है. भीष्म - अस्मिता और आत्म गौरव का प्रतीक हैं, जो हस्तिनापुर को पुनर्स्थापित कर पांडवों (अच्छी प्रवृत्ति) और कौरवों (बुरी प्रवृत्ति) को साथ देखना चाहते हैं. द्रोण - हमारी आदतों के वशीभूत हो कर कार्य करने की प्रवृत्ति है. संस्कारवश, सही या गलत करने से पूर्व हम गुरु से पूछते अवश्य हैं किन्तु करते अपनी आदत के अनुरूप ही.  दुर्योधन - मनुष्य की सांसारिक सुख-सुविधाओं को साधिकार प्राप्त कर लेने की भौतिक इच्छा का प्रतीक है. कर्ण - आसक्ति का पर्याय हैं, जो हर उस काम को सही ठहरा सकते हैं, जो उन्हें करना हो. युधिष्ठिर - विवेकवान और शांति का स्वरुप हैं. भीम - शक्ति का प्रतीक हैं. अर्जुन - आत्म नियन्त्रण की शक्ति हैं.  सहदेव - वाह्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण करते हैं. नकुल - नियमित जीवन शैली के महत्त्व दर्शाते हैं. पाँच पांडव, ब्रह्माण्ड के पाँच तत्वों के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अश्वथामा- हमारी सुप्त इच्छाओं के द्योतक हैं. जब तक अन्तिम इच्छा पूर्ण नहीं हो जाती, कोई आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते.     

इन्हें जान कर क्या आपको नहीं लगा कि ये सभी पात्र तो जाने-पहचाने हैं. हमारे ही जीवन के अंश हैं. यानि जो गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था, वो कुरुक्षेत्र कहीं और नहीं है, हमारे भीतर ही है. महाभारत के समस्त पात्र हमारी ही मनोवृत्तियों और प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं. विश्व, देश, समाज और मनुष्य में जो द्वन्द चल रहा है, उसे महाभारत का नाम दिया गया है. हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही है.  गलत-सही का निर्णय करने वाले हम कौन होते हैं. ये समय तय करेगा कौन पांडवों के पक्ष में है, कौन कौरवों के. अभी तो भूमिका निभानी है. भगवान आज भी धरा पर आ जायें तो लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझने की गलती फिर करेंगे. महाभारत का एक भी पात्र, यदि अपनी भूमिका का निर्वहन यथोचित रूप से नहीं करता, तो क्या महाभारत जैसा महाग्रन्थ बन पाता. एक छोटी सी बात की कल्पना कीजिये कि यदि दुर्योधन पाँच गाँव दे देता, अपने पांडु भाइयों को, तो क्या होता. हर पात्र की अपनी भूमिका है, उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिये. धृतराष्ट्र हों या युधिष्ठिर, दुर्योधन हो या अर्जुन, सबको एक विशिष्ट भूमिका मिली है. उसका निर्वहन उनका कर्तव्य है. महाभारत चलता रहता है, हर युग में, हर काल में. कृष्ण आते रहे हैं और आते रहेंगे सदैव, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये. कहीं बाहर नही, हमारे कुरुक्षेत्र में, हमारे अन्तर में.

-वाणभट्ट

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर - श्री कृष्ण प्रेरणा से...🙏🙏🙏

सादर-साभार: ईश्वर-अर्जुन सम्वाद श्रीमद्भग्वद्गीता, योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इण्डिया (अवश्य पढ़ें) 

रविवार, 30 अगस्त 2026

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है. पुरानी कहावत है - इफ़ हेल्थ इज़ लॉस्ट देन एवरीथिंग इज लॉस्ट. बुजुर्गों की बातें लोग बिना अनुभव किये मान लेते तो बहुत सम्भव है कि नयी आती पीढ़ियों के साथ गलतियाँ कम होती जातीं. कम से कम रिपीट तो न होतीं. लेकिन वो युवा ही क्या जो बाप की बात बिना अनुभव किये मान ले. सौ साल का जीवन है और सब आप अपने पूर्ववर्तियों के हिसाब से करते चले गये तो आपके पास इतना समय बच जायेगा कि काटे नहीं कटेगा. इसलिये अपने बाप-दादाओं को गलत सिद्ध करने के लिये, सबसे पहले तो उनकी बात मानना बन्द कर दीजिये. फिर ऐसे-ऐसे काम (प्रयोग) कीजिये कि बाप कहे बेटवा आउट ऑफ़ कन्ट्रोल हो गया है. पहले जब दो-चार बच्चे होते थे, तो एकौ उधरा जाये तो बाप लट्ठ ले के सुधार, अब जब एक-दो ही पैदा हो रहे हैं, तो बाप किसे समझाये, किसे दौड़ाये. मन-मसोस के बोलता है - बेटा कर लो जो तुम्हें करना है. पचपन-साठ पार करते-करते जब शरीर और हौसले दोनों पस्त होने लगते हैं, तब वही बेटा बोलता है - माई डैड वाज़ राईट. लेकिन यदि वो बाप की बात मान लेता तो, सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो जीवन भर करता क्या. ये भी सच है कि ये दुनिया जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ही गयी है, वो आगे न जा पाती यदि नयी पीढ़ी उन्हीं की लकीर पीटती चलती. दुनिया की वर्तमान तरक्की नयी पीढ़ी की क्रान्तिकारी और विद्रोही, सब कुछ बदल डालने की प्रकृति के कारण ही संभव हुयी है. जो समाज से हट कर नया सोचने-समझने-करने की हिम्मत रखते थे, उन्होंने ही दुनिया बदली. बाकी तो ढर्रे पर चलते चलने को ही जीवन समझ बैठे. 

भौतिकतावादी समाज की मज़बूरी है कि वो सफलता-असफलता को भौतिक प्रगति के आधार पार आँकता है. बंगले-गाड़ी-मोटर. स्टेटस के जितने सिम्बल हैं, उनके पीछे आदमी भागते-भागते उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच जाता है जब कहता है - ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा तो वो-वो चीज़ें जो बचपन से अब तक फ़्री मिला करती थीं और मिला करती हैं. माया की चाल ही यही है, पहले खूब नचाती है, फ़िर बताती है कि हम ही हैं महाठगनी. मेरे चक्कर में न पड़ते तो बेहतर रहता. जिन्हें जितनी जल्दी इस सत्य भान हो गया, वो माया-मोह के बंधन से मुक्त हो गये. पता नहीं आदमी को ये बीमारी क्यों है कि उसे लगता है कि जिस चीज़ में उसे आनन्द आ रहा है, उसे दूसरों को भी बताया-सिखाया जाये. उन्हें लगता है कि जो अनुभव उन्हें हो गया है उसका लाभ ले कर और लोग माया के चक्कर में न पड़ें. लेकिन लोग तो धरा पर भाँति-भाँति के अनुभव करने ही तो आये हैं. यदि दूसरों के कहने पर चलते रहे और आत्मानुभूति न की तो लौट कर भगवान को क्या जवाब देंगे. धरती पर आने के बाद तो भगवान भी माया के चन्गुल से नहीं बच सके, तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या है. कितने ही साधू-सन्त आये जिन्हें असार जीवन का सार मिल गया था. वो झोला-झन्डा लेकर निकल लिये दुनिया में अलख जगाने. लेकिन हर किसी को वो अपनी बात समझाने में सफल न हो सके. करोड़ों के देश में अगर हज़ार-पाँच सौ ने भी आपको पकड़ लिया तो स्वरोजगार का ये समय सिद्ध मॉडल सर्वोत्कृष्ट है. लाख दो लाख ने फौलो कर लिया तो धन्धा चल निकला समझो.    

कुछ नया करने और करते रहने की जुगत हर जगह हर तरफ़ जारी है. लेकिन क्रांति वहीं होती है, जब आपके विचार इतने अधिक लोगों तक पहुँच जाये कि वो लोगों को उनका अपना विचार लगने लगे. फिर आपका काम ख़त्म. बाकी लोग आपके विचार को सर-माथे पर ढोने लगेंगे. आप भीड़ को एक दिशा दिखा कर छोड़ दीजिये. बाकी काम भीड़ अपने आप करने लग पड़ेगी. आप पतली गली देखिये, और धीरे से निकल लीजिये. फ़सलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन बढ़ाने का विचार एक क्रांति की तरह उछाला गया, और भाई लोग तो तैयार बैठे ही थे कैच करने के लिये. नतीजा, हर कोई लग गया इस दिशा में. फ़सल में ये तत्व पहुँचेंगे कैसे इसका विज्ञान बहुत पेचीदा हो सकता है लेकिन इसकी तकनीक शायद आसानी से समझ आ जाये. हर फ़सल में पोषक तत्वों की नियत मात्रा और क्षमता है. शायद इसीलिये दुनिया के हर देश में संतुलित भोजन की महत्ता पर बल दिया गया है. थाली विशेष रूप से भारतीय थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-सलाद-रायता-पापड़-अंचार का समावेश किया गया होगा. हमारे यहाँ तो पथ्य और अपथ्य दोनों को परिभाषित किया गया है कि कब क्या-क्या खाना है और कब क्या नहीं खाना है. शरीर की प्रकृति और प्रकार के अनुसार ही वैद्य भोजन का निर्धारण करते थे. जो पदार्थ एक व्यक्ति के लिये अमृत हो सकता है, दूसरे के लिये विष भी बन सकता है. 

जब से विज्ञान नौकरी बना है, लोगों को कुछ न कुछ करते रहना और उसे छापते रहना, मज़बूरी बन गया है. ताकि समय आधारित प्रमोशन निर्धारित समय सीमा पर बिना किसी दिक़्क़त के होता रहे. इसके लिये उपर वालों की मेहरबानी भी बहुत जरूरी है. क्योंकि महान लोग जिस पथ से गये हैं, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करते रहना शायद आसान और सुरक्षित मार्ग है. लकीर पीटने का लाभ ये है कि विज्ञान के पीर और फ़कीर आपके काम को अपने काम का विस्तार मान कर आनन्दित होते रहें. नया सोचने-समझने की तथा दूसरों को समझाने की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद प्राय: समाप्ति की कगार पर होती है. उस पर कोई नया विचार भी आ जाये तो अपने पुरातन विचारों और कर्मों को सही सिद्ध करने के लिये ये नये विचारों के औचित्य पर सवाल खड़े करने से नहीं चूकते. ऐसा ही हुआ जब किसी ने गेहूँ, धान और दालों में पोषक तत्वों को फ़सल सुधार से बढ़ाने के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये. इन तत्वों को मृदा में डाला जाता है ताकि पौधे की जड़ें मृदा से इन तत्वों का अवशोषण व स्थानान्तरण कर इन्हें फसलों के बीजों में भण्डारित कर सकें. विभिन्न प्रजातियों में पोषक तत्वों के अवशोषण की क्षमता भिन्न हो सकती है. 

जब कुछ प्रभावशाली लोग एक दिशा में कार्य आरम्भ कर देते हैं, तो वे आगे की दिशा भी निर्धारित कर देते हैं. स्थापित विषयों पर काम करना, अधिकांश विज्ञानियों के लिये आसान होता है. नये काम और विचारों के लिये आपको उनका ही समर्थन चाहिये होता है, जो इस क्षेत्र अपने बरसों खपा चुके हैं. भीड़ भी भेंड़ चाल में उसी मार्ग का अनुसरण करने लगती है, प्राय: बिना सोचे-समझे. सस्य क्रियाओं और फ़सल सुधार के द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाने के प्रयास वैश्विक स्तर पर वृहद् रूप से चल रहे हैं. कोई भी फ़सल इन प्रयासों से अछूती नहीं रह सकी है. इस पद्यति को बायो-फोर्टीफिकेशन (जैव सम्वर्धन) की संज्ञा दी गयी. इस प्रक्रिया की विशेषता ये थी कि लौह, जस्ता, प्रोटीन व अन्य पोषक तत्वों की  मात्रा की माप बीज स्तर पर की जाती है. जबकि अन्न को उत्पादन से लेकर थाली में भोजन के रूप में पहुँचने की यात्रा में अनेकानेक प्रसंस्करण व पाक क्रियाओं से हो कर गुजरना होता है. इसलिये ये अत्यावश्यक है कि अनाज के स्तर पर ही नहीं, प्रसंस्करण और व्यंजन बनने के बाद इन पोषक तत्वों का आँकलन किया जाये. बहुत सम्भव है कि छिलका उतारने, उबालने और खाना बनाने की प्रक्रिया में पोषक तत्वों में क्षति होती हो. अनाज में कुछ पोषण विरोधी पदार्थ भी प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं, जो इन पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं. पाक विधियों के मध्य इन तत्वों के लीच कर जाने की भी सम्भावना रहती है. 

पोषण बढ़ाने के लिये खाना पकाने के दौरान या खाना बन जाने के बाद पोषक तत्वों को बिना किसी हानि के सहजता से भोजन में मिलाया जा सकता है. पकाने के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में कुछ ह्रास अवश्य सम्भव है.  भोजन का पोषण सम्वर्धन अन्न के पोषण सम्वर्धन से आसान और कम लागत की प्रक्रिया है. आयरन, जिन्क, प्रोटीन आदि तत्व आज प्रीमिक्स के रूप में उपलब्ध हैं. जिन्हें आटा, चावल, दाल, नमक में मिलाया जा सकता है. पोषक तत्व, खाद्य मैट्रिक्स में आसानी से घुल कर पूरे भोजन में फैल जाते हैं. अधिक तापमान पर तत्वों में आंशिक हानि सम्भव है. लेकिन तापरोधी यौगिकों के उपयोग से इस समस्या से भी बचा जा सकता है. पोस्ट-प्रोसेसिंग फोर्टीफिकेशन का उपयोग औद्योगिक व संस्थागत स्तर पर पहले से ही किया जा रहा है. अब तो पोषक तत्व टैबलेट के रूप में भी सहजता से सस्ते दामों में उपलब्ध हैं, जिनका वितरण स्कूलों और संस्थाओं में किया जा रहा है. 

हर प्रकार के अन्न में कार्बोहाईड्रेट्स और प्रोटीन प्राकृतिक मात्रा में उपलब्ध रहता है. विभिन्न प्रजातियों में इनकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है. फ़सलों और उनकी प्रजातियों में बायो-फोर्टीफिकेशन से प्रोटीन बढ़ाने की सम्भावनाओं की तलाश विश्व स्तर पर जारी है. भारत जैसे  शाकाहारी बाहुल्य देश में भी अन्डे, चिकन और माँस का उपयोग बढ़ा है. ऐसे में बायो-फोर्टीफिकेशन माध्यम अन्न में प्रोटीन बढ़ाने के उद्देश्य कहाँ तक सार्थक हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है. सोयाबीन में प्राकृतिक रूप से 36-40% तक प्रोटीन उपलब्ध होता है. शाकाहारियों में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने में सोयाबीन एक मुख्य भूमिका निभा रहा है. इस स्तर तक किसी भी अन्न में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के समस्त प्रयास समय और धन के अपव्यय से अधिक कुछ नहीं है. बायो-फोर्टीफिकेशन के द्वारा सोयाबीन की चुनौती के बराबर या ऊपर निकलने प्रयास चलते रहेंगे. कुछ समूहों के लिये समस्या बनाये रखना, समाधान से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. पूर्वी यूपी में एक कहावत है - मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं, हाथी तो बनने से रहा. समय बिताने के लिये, यदि कुछ काम करते रहने की ही ज़िद है, तो करते रहिये. 

-वाणभट्ट

सोमवार, 20 जुलाई 2026

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी

हाय क्या चीज़ है जवानी भी

रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेपाल में एक आंदोलन होता है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी ने किया. आंदोलन सफ़ल रहा. सरकार गिरी, सरकार बनी. मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि इस आंदोलन में जेन-ज़ी की महती भूमिका रही है. जेन-ज़ी शब्द ने बहुत आकृष्ट किया. तो हमने ये पता करने के लिये गूगल किया कि ये जेन-ज़ी हैं, तो हम क्या हैं. तब पता चला कि 1965 से 1980 के मध्य पैदा हुये लोग जेन-एक्स से वास्ता रखते हैं. ज़्यादा अन्तर नहीं है. बस बीच में जेन-वाई ही तो है. अब तो जेन-अल्फ़ा (2013 के बाद) भी धरा पर अवतरित हो चुकी है. हम पैदा हुये, जवान हुये और आज साठ की दहलीज़ भी पार कर ली, किसी ने इतनी इज़्ज़त नहीं दी कि हमारी जेनरेशन को कोई नाम देता. आगे भी पीढ़ियाँ आती रहेंगी, अब चूँकि चलन पड़ गया है, उनका नामकरण इसी ढर्रे पर होगा. उनके लिये ग्रीक अल्फाबेट्स के अक्षरों की बस शुरूआत ही हुयी है. नाम चाहे कुछ भी दे लो, पिछली पीढ़ी अगली को और अगली पीढ़ी पिछड़ी को अपने से कमतर ही मानती रहेगी. 

हमेशा पिछली पीढ़ी ने, अगली पीढ़ी को संशय से देखा है. प्रायः उसका मुख्य आधार सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार तक ही सीमित रहा है. शायद ही सास ने बहू और बेटी में समता मूलक सिद्धांत का पालन किया हो. किसी बाप ने तब तक अपने बेटे की बातों का अनुसरण नहीं किया, जब तक उसने जग में उनका नाम रोशन करने वाला काम न कर दिया हो. जब भी किसी ने लीक से हट कर काम करने का प्रयास किया है, सबसे अधिक विरोध उसे अपने घर, अपने ही समाज से हुआ है. माँ-बाप का तो काम ही था, बच्चों में संस्कार इतना कूट-कूट कर भर देना कि कम से कम उनका बच्चा अपने से बड़ों के सामने अधिक चूँ-चपड़ न कर सके. जब तक परिवार में चार-छ: बच्चों का चलन था, एक-दो बच्चे संस्कारी बच जाते थे. अमूमन ये वो बच्चे होते थे, जिन्होंने अपने माँ-बाप को गर्व करने का मौका नहीं दिया होता था. उनकी भी विवशता थी कि आर्थिक स्थिति के लिये वे अपने पेरेंट्स पर निर्भर रहते. जब से न्युक्लीयर और छोटे परिवार का चलन बढ़ा है, माँ-बाप की मजबूरी बन गयी है कि बच्चों का फ़्री डेवलपमेंट करें. डबल इनकम परिवार में किसके पास समय है कि बच्चों के पीछे भागे. उनकी सारी ख्वाहिशें बिना किसी विशेष जिद के पूरी होने लगीं. नतीजा ये पीढ़ी इतनी पैम्पर्ड है कि पैरेंट्स स्वयं ज्यादा टोका-टाकी करने से परहेज करते हैं कि साहब जादे/जादी नाराज़ न हो जायें. 

जब से दुनिया है, तब से पुरानी पीढ़ी को लगता रहा है कि अगली पीढ़ी नकारा है. लेकिन दुनिया हमेशा आगे ही गयी है. बिना किसी वैज्ञानिक हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आदमी की प्रजाति विकसित होती चली गयी. इसमें टेक्नोलॉजी की विशेष भूमिका रही है. ये कहने में मुझे कतई गुरेज नहीं है कि अगली पीढ़ी हमेशा पिछ्ली से उन्नत रही है. समृद्धि भी बढ़ी है. पुराने लोग तो ये बताने से भी नहीं चूकते कि पहले इतने स्कूल नहीं थे, और थे भी तो किसी प्रकार की सुविधायें नहीं होती थीं. साधन सीमित थे. मीलों पैदल जाना पड़ता था. ये बात सच भी है. हमारे अपने बचपन में रेडियो ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था. पिता जी के पास एक अदद साइकिल हुआ करती थी, जिसे वो चमका कर रखते थे. शाम को कोई बच्चा घर में नहीं रुकता था. एक रबर की छोटी सी बॉल से पूरा मोहल्ला गेंद तड़ी  और सेवन स्टोंस खेल लेता था. चालीस पैसे की वो बॉल भी चंदे से आती थी. समय के साथ समृद्धि बेतहाशा बढ़ी है. अब हर बच्चा फ़ुटबॉल लिये घूम रहा है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई का प्रेशर इतना बढ़ गया है कि बच्चों ने खेलना छोड़ दिया है. और जिन्हें खेलने का शौक हो तो उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जॉइन करनी पड़ती है. जब तक ये कॉलेज पहुँचे, सीनियर-जूनियर का लिहाज भी खत्म हो चला था. पेरेंट्स जिन्हें सूरमा भोपाली बनाने में लगे रहते थे, कॉलेज के स्वछंद वातावरण में ये और भी उच्छृंखल हो गये. स्वछंद और स्वतंत्र पालन पोषण का ये प्रभाव है कि नयी पीढ़ी पहले से अधिक बुद्धिमान, रचनात्मक और सृजनशील है. हमने ही इन्हें पंख दिये हैं, तो हमारा कर्तव्य भी है कि इन्हें उड़ने दें. जब कोई कहता है कि वो बच्चे किस काम के जो बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का ख्याल न रख सकें. तो मुझे लगता है कि बच्चों से ऐसी अपेक्षा रखना उचित नहीं है. अपना सर्कल, अपना ओल्ड होम बनाइये और बच्चों को देश समाज के लिये अपना काम करने दीजिये. अपनी उम्मीदों को उनके विकास का रोड़ा न बनाइये. 

जब मै जेन-ज़ी को प्रोत्साहित करने की बात करता हूँ तो ये भी उम्मीद करता हूँ कि स्कूल-कॉलेज का अर्थ है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. आपके ज्ञानार्जन का लाभ यदि देश और समाज को मिलता है, तब तो उसका कोई लाभ है, अन्यथा जीविकोपार्जन तो सब कर रहे हैं. शिक्षा का ध्येय यदि व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित हो जाये, तो शायद शिक्षा अपना अर्थ खो देती है. आज की आज़ाद ख़्याल, जेन-ज़ी आत्मविश्वास और साहस से लबरेज है. प्रमाणिक सूचनायें जिन तक हमारी पहुँच पुस्तकों और पुस्तकालयों पर निर्भर थीं, आज मोबाइल के माध्यम से फिंगरटिप्स पर उपलब्ध हैं. आप इन्हें गुमराह नहीं कर सकते. आपका जन्म इनसे पहले हो गया था, सिर्फ़ इसलिये आपको ये ज्ञानी मान लें, ये इनके संस्कार में नहीं है. 

मैंने मेरे बच्चों के जेन-ज़ी और मेरे जेन-एक्स होने के बारे में जानने का प्रयास न किया होता, यदि नेपाल में बवाल न हुआ होता. इतना जबरदस्त आंदोलन कि चन्द दिनों में जेन-ज़ी ने सत्ता ही पलट दी. जेन-ज़ी का ये प्रयोग किस हद तक और कब तक सफ़ल होता है, ये देखना होगा. आजकल अपने यहाँ भी एक आंदोलन चल रहा है. बहुत से लोग इस तरह के हर आंदोलनों में इसलिये भाग लेने पहुँच जाते हैं कि उन्हें सरकार से हर बात पर शिकायत है. हर मोर्चे पर वो पूरी तत्परता से खड़े मिलेंगे. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. पक्ष-विपक्ष किसी को भी दोष देने से पहले मुझे लगता है, हमें उस समाज का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें हम पढ़े-बढ़े हैं या पल-बढ़ रहे हैं. नेता-अभिनेता उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें हम रहते हैं. आज जेन-ज़ी आंदोलन की राह पर है. जब तक 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' नहीं आयी थी, किसी और की जगह कोई और इम्तेहान देता हो, ये मै सोच नहीं सकता था. आज हर प्रतियोगी परीक्षा में सॉल्वर्स पकड़े जा रहे हैं. सन् अस्सी में भी बोर्ड के पेपर्स लीक हो जाया करते थे. आज भी डिग्री आसानी से पाने के लिये तमाम कॉलेज हैं, जहाँ गारेंटी से डिग्री दिलायी जाती है. पेपर्स लीक कराने वाले भी उसी जेनरेशन से आते हैं, जिससे उसका विरोध करने वाले. जब पैसा कमाना ही लोगों का ध्येय बन गया हो, पैसा आना चाहिये, क्या सही क्या ग़लत. बिना माँ-बाप के आर्थिक सहयोग के यह कार्य सम्भव नहीं हुआ होगा. आंदोलन का कारण सही है या ग़लत इस पर सभी के विचार भिन्न हो सकते हैं. साठ साल धरती पर गुजारने के बाद और कुछ हो न हो, तजुर्बा तो होता ही है, एक नज़रिया बनता है. ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली गलती है, ऐसा भी नहीं है कि ये आख़िरी गलती होगी. समस्या है तो समाधान की बात कीजिये. आज जो हो रहा है, वो पहले भी होता था. आगे भी होता रहेगा. जब भी गलत काम करने वाले लोग पकड़े जाते हैं, तो हल्ला-गुल्ला होना कोई नयी बात नहीं है. मीडिया ऐसे ख़बर बनाता है, जैसे इसके पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था. भ्रष्टाचार जिस समाज में मान्यता प्राप्त आचार-व्यवहार बन गया हो, वहाँ किस-किस का नाम लीजिये, किस-किस को रोइये. लेकिन हर जगह जहाँ हमारा व्यक्तिगत लाभ हो रहा होता है, हमने विरोध करने के बजाय समझौता करना सीख लिया है. हर किसी को बड़े मुद्दे चाहिये, आंदोलन करने के लिये. छोटी-छोटी बातों के लिये क्या लड़ना. विकसित और विकासशील देश में शायद यही अन्तर है. वहाँ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं. सॉरी-थैंक्स-एस्क्यूज़ मी जैसे शब्द भले छोटे लगते हों, लेकिन ये हमारी परवरिश को दिखाते हैं. सर्विस बिफ़ोर सेल्फ़. एक मित्र यूरोप में रहते हैं, उनका कहना है, बिल्डिंग, रोड्स, मेट्रो, नो डाउट तरक्की है, लेकिन मैनर्स मैटर्स. हमारे यहाँ पीएचडी याफ़्ता भी यदि दबंगई न दिखाये तो लोग उसे हल्के में ले लेंगे. स्मार्टनेस की परिभाषा इसी पर निर्भर है कि आप कितने उजड्ड हैं. यही जेन-ज़ी जब अपने आस-पास घटने वाली रोज मर्रा की छोटी समस्याओं से मुँह मोड़ लेती है, तो बड़े मुद्दे की बातें बस ऐसी लगती हैं कि अंग्रेज़ों से लड़ने का मौका हमें नहीं मिल सका, इसलिये हम वर्तमान व्यवस्था से लड़ेंगे. जिन विकसित देशों की तरह जेन-ज़ी अपने देश को देखना चाहती है, उसके लिये लड़ना होगा, हर समय, हर जगह. जहाँ भी गलत हो रहा है, लड़ो नहीं तो कम से कम विरोध तो दर्ज़ करो. शिक्षा, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, घूस, भ्रष्टाचार, पक्षपात, तमाम मुद्दे हैं, चिर-विकासशील देश में. विकसित होने के लिये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ मानव विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. सर्वमंगल और लोक कल्याण की विरासत वाला देश कब आत्म केन्द्रित हो गया, इस पर भी विचार करे, जेन-ज़ी. 

उम्र के इस पड़ाव, मुझे लगता  है, मुद्दे छोटे हों या बड़े, विरोध करना जरूरी. देश ने, समाज ने जो भी प्रगति की है, उसके पीछे कुछ वो लोग थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ का आँकलन नहीं किया. यदि आपके पड़ोसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं, तो अगला नम्बर आपका हो सकता है. छोटे कुछ मुद्दे मै बताता हूँ, जेन-ज़ी आंदोलन की शुरूआत यहाँ से कर सकती हैं. 1. घर के बाहर कूड़ा फेंकना, 2. पार्क में फूल तोड़ना, 3. दूसरों के घर के आगे कुत्ता टहलाना, 4. सड़क पर अतिक्रमण हटाना, 5. बिना हेलमेट-बेल्ट के ड्राइविंग करना, 6. गलत साइड चलना, 7. बेवजह हॉन्क करना, 8. गालियों का प्रयोग, 9. क्यू में लगना, 10. अनुचित लाभ को ना, 11. नियम कानून का पालन, 12. ईधर-उधर थूकना, 13. रोड रेज आदि ये कुछ छोटे मुद्दे हैं. मंत्री का इस्तीफ़ा यदि आपके लिये बड़ा मुद्दा है, तो एक उससे और बड़ा मुद्दा देता हूँ आपको - एक देश-एक शिक्षा, वन नेशन-वन एजुकेशन. ये मुद्दा खान सर ने अपने एक पॉडकास्ट में उठाया था. मुद्दे बड़े हों और जिनमें सर्व मंगल का भाव हो, तो आंदोलन को कौन समर्थन नहीं देगा. 

किन राहों से दूर है मन्ज़िल कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे - निदा फ़ाज़ली

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 जुलाई 2026

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके  विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं. 

बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर  वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा. 

जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये 

बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये 

आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े. 

हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरि नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.

मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास बताया था बाबा जी ने. ये बात अलग है कि जरा ध्यान लगा नहीं कि नींद आ जाती थी. बाबा की गारेंटी भला कैसे पूरी होती. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी.  बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपश्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. गरिष्ठ भोजन और गहरी नींद से जो स्वास्थ्य लाभ हुआ, उससे अपने ही जूते के तस्मे बाँधने में अड़चन होने लगी. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी महसूस हुयी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है. 

बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र  की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टिगोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व है और मेरे बॉस को अफ़सोस, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. 

समस्याओं के समाधान प्रायः सरल और सस्ते ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये. अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.  

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जुलाई 2026

नैनो कहानियाँ: लक्ष्य

लक्ष्य 1:

कॉंग्रचुलेशन्स, तीसरे राउंड के इंटरव्यू के बाद आप सेलेक्ट हो गये हैं. हमारी कम्पनी में साठ लोग हैं, जो छ: प्रोजेक्ट्स पर काम रहे हैं. आपको एक विशिष्ट टीम के लिये चयनित किया गया है. आपके प्रोजेक्ट मैनेजर बतायेंगे कि उनकी टीम की आपसे क्या आपेक्षायें हैं. वही आपको ट्रेनिंग देंगे, सिखायेंगे और आपका मूल्यांकन भी करेंगे. 

लक्ष्य 2:

वेलकम टु आवर ऑर्गनाइजेशन. दो रिटन और एक साक्षात्कार के बाद हाइली क्वालिफ़ाइड लोगों का चयन होता है. यहाँ साठ लोग छिहत्तर प्रोजेक्ट्स पर का काम कर रहे हैं ताकि किसी को प्रमोशन में दिक्कत न हो. हमारे यहाँ काम करने की फ्रीडम है. आप भी एक प्रोजेक्ट बनाइये. अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कीजिये. हम साल भर नियंत्रण और एक बार मूल्यांकन करते हैं. 

लक्ष्य 3:

बॉस एम्प्लॉयी से - अपना लक्ष्य निर्धारित करो ताकि हम उसकी मॉनिटरिंग कर सकें. 

एम्प्लॉयी बॉस से - सर लक्ष्य और दिशा आप तय करें. वी विल नॉट लीव सिंगल स्टोन अनटर्नड. उसकी प्राप्ति के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे. 

बॉस एम्प्लॉयी से - नौकरी करो नौकरी. ये बातें इंटरव्यू में ही अच्छी लगती हैं. प्रोन्नति तुम्हें चाहिये, मुझे नहीं. 

लक्ष्य 4:

समस्यायें बहुत हैं, बहुआयामी हैं. एकांगी प्रयास भूत में नाकाफ़ी सिद्ध हुये हैं. आवश्यकता है एकीकृत समाधान पर मिल कर काम करने की. शीर्ष नेतृत्व का कार्य है, समस्याओं की प्राथमिकता तय करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मार्गदर्शन देना. यदि लक्ष्य का ज्ञान और भान है, तो काम करना और करवाना आसान हो जाता है. इसके लिये ज़रूरी है, बॉस के लिये लक्ष्य और उसकी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता. 

लक्ष्य 5:

लक्ष्य विहीनता की स्थिति में ऑर्गेनाइज़ेशन के कर्मचारियों को व्यस्त रखना भी कला है. पुरखन दादी भी स्वयं को व्यस्त रखने के लिये करती थीं, इस कोठरी का माल उस कोठरी. लक्ष्य तय हो तो काम खत्म हो सकता है. फिर मैनपावर क्या करेगी. अलादीन के जिन्न को बिज़ी भी तो रखना है.

लक्ष्य 6:

विकसित देश को विकसित युवा चाहिये होंगे. हमारा प्रयास है, अगले दो साल में ऐसे हज़ारों-लाखों युवाओं को भविष्य के लिये तैयार करना. 

वर्तमान में कुछ करेंगे, तभी तो विकास आयेगा.

अब विकास को आने से कोई रोक नहीं सकता. वो आ कर ही रहेगा. अगले दो साल युवाओं को 2047 के लिये तैयार करने में समर्पित कर दूँगा. फ़िलहाल तो लक्ष्य अगले दो साल का है. 

-वाणभट्ट

इतिहास

कभी-कभी आपको लगता होगा कि इतिहास हमें पढाया ही क्यों जाता है, जब सारे प्रीमियम क्वालिटी जॉब्स पर विज्ञान के छात्र काबिज हैं. लोग तर्क दे सकत...