शुक्रवार, 20 मार्च 2026

सौ सियार और शेर का शिकार

सियारों को अपनी बुद्धि पर बहुत भरोसा था. 

चालक वो इतने थे कि कोई शिकार स्वयं न करते. शेर-चीता-बाघ शिकार करते. उनके खाने के बाद जो बच जाता, वो इनके लिये काफ़ी था. उनके साथ रह कर जंगल का कोई भी प्राणी ऐसा न था जिसका स्वाद इन्होंने न चखा हो. 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये संस्कार इनके जीवन में रच-बस गया था. जंगल के अपने कानून होते हैं. जंगल का कानून अलिखित होता है. लेकिन उसका पालन करने-कराने की जिम्मेदारी स्वयं प्रकृति ने ले रखी थी. शाकाहारी निरीह प्राणी, ताक़तवर माँसाहारी प्राणियों के लिये भोजन थे. पढ़ और अनपढ़ में ये ही अन्तर है. यदि शाकाहारी जानवर पढ़े-लिखे होते तो सामाजिक न्याय और समरसता के लिये आंदोलन करते. लेकिन अनपढ़ इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर चुके थे. 

शेर अपने आप राजा बन गया और बाक़ी जानवर प्रजा. लेकिन राजा की अपनी प्रजा के प्रति न कोई जिम्मेदारी थी, न कोई जवाबदेही. जब भूख लगी, और जो सामने पड़ गया, वही शिकार. वो उतना ही खाता था, जितना उसके लिये जरूरी हो. बल्कि सभी जंगलवासियों को ज्ञान था कि भोजन उतना ही जितना ज़रूरी हो, स्वाद नहीं स्वास्थ्य के लिये. उन्हे ये भी मालूम था कि जंगल में डॉक्टर नहीं होता. भोजन ही औषधि है. ये बात दिन में चार बार बिना भूख खाने वाले आदमी को नहीं पता. वो इलाज करा लेगा और स्वाद के लिये जान दे देगा. हर समय भोजन की कमी का रोना, रोना, बहुतों की आजीविका है. 

सियारों ने शेर की संगत में रह कर हर जानवर का स्वाद ले लिया था. बस एक शेर ही था जिसके स्वाद से वो अब तक वंचित थे. लेकिन जिसने कभी स्वयं शिकार करके चूहा न मारा हो वो शेर के शिकार की भला सोच भी कैसे सकता था. सब मिल जाये, कोई तमन्ना भी न बचे, ऐसा भी कभी होता है. तमन्ना तो होती ही उसी की है जो न मिले. जंगल के नियम में तमन्ना पालने की कोई व्यवस्था है भी नहीं. किन्तु सियार तो सियार ठहरे. 

धरती पर आदमी के बाद, सियार को ही सबसे दिमाग़दार जीव माना गया है. उनके मन में तमन्ना जगी कि भाईयों और बहनों, हमने सब कुछ तो खा कर देख लिया, एक बार शेर का माँस भी खाने को मिल जाये, तो जीवन धन्य. इस कार्य को हममें से कोई अकेले तो कर नहीं सकता. सौ सियारों की एक टीम बनायी गयी. ये भी तय था कि जो पहले मोर्चे पर जायेगा, उसे भक्षण के लिये शेर का माँस नहीं मिल पायेगा. जब सब समझदार हों तो देश और समाज के उद्धार के लिये दूसरों से ही आगे आने की उम्मीद करेगा. भगत सिंह पड़ोसी के घर. हर घर भगत होते तो आज़ादी में चार सौ साल लगते? सियार हमेशा अधिकता में रहे हैं, चाहे जंगल हो या समाज. 

दिमाग़दार सियारों ने बहुत मौके खोजे लेकिन हर बार पहले कौन, हर एक के दिमाग़ में आ जाता. शेर को बूढ़ा होना ही था. उसने खाना छोड़ दिया. सिर्फ़ पानी से काम चलाता. उसे मालूम था कि अन्त निकट है. धीरे-धीरे शरीर शिथिल होता जा रहा था. सियारों को इसमें अवसर दिखायी दिया. सबने एक साथ धावा बोल दिया. 

शेर को संतोष था कि सियारों ने हमला पीछे से किया था. 

-वाणभट्ट

रविवार, 15 मार्च 2026

सी थ्रू

गुरु जी ने आज सुबह के प्रवचन में कहा कि मंगल भाव का होना सबसे अच्छा है. यदि आप सबके मंगल की कामना करते हैं, तो आपका मंगल अपने आप हो जाता है. आती साँस में सामने वाले के मंगल की कामना कीजिये और जाती साँस में अपने मंगल की. मुझे ये गुरु जी इसीलिये पसन्द हैं जो बाकि गुरुओं की तरह सिर्फ़ त्याग की बात नहीं करते. त्याग तो तुम तब करोगे जब कोई वस्तु तुम्हारे पास होगी. साँस लोगे तभी तो छोड़ोगे. 

जब मै कॉरिडोर में एक तरफ़ से घुसा, तभी उसने भी कॉरिडोर में दूसरी तरफ़ से प्रवेश किया. हमको एक-दूसरे से टकराना निश्चित था. ये नियति सुनिश्चित करती है कि किस दिन हम किससे मिलेंगे. भले मिलना चाहें या ना चाहें. किस्मत में जिन्हें मिलना लिखा है, वो ना मिल पायें ऐसा किस्मत होने नहीं देगी. और नियति के आगे हम सबको नतमस्तक होना ही होता है. हम दोनों मंथर गति से आगे बढ़ रहे थे. बहरहाल हम दोनों का आमना-सामना होना ही था. बस सौ फिट लम्बा कॉरिडोर ही था, हम दोनों के बीच. न वो मेरी शक्ल देखना चाहता था, न मै उसकी. निकट भविष्य में हमारा एक-दूसरे से काम पड़ने की सम्भावना भी न के बराबर थी. हम हिन्दुस्तानियों, विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों में टीम स्पिरिट की कमी इसलिये पायी जाती है, क्योंकि हर किसी को लगता है कि 'हम किसी से कम नहीं'. न हमारा कोई कॉमन टारगेट होता है, न कोई अजेंडा. सबके अपने राग, सबकी अपनी ढपली. एक तो अपना-अपना अहम् लिये हम लोग टीम में काम करके राजी नहीं, दूसरा अंग्रेज़ों के ज़माने की ट्रेनिंग लिये मैनेजर्स भी ये सुनिश्चित करने में लगे रहते हैं कि गलती से मिस्टेक न हो जाये, और कोई टीम बन जाये. कोई बड़ा लक्ष्य हो तो टीम बन भी जाये. जब लक्ष्य छोटे और व्यक्तिगत हों तो - अकेले हम अकेले तुम, अपनी-अपनी देखो. इस प्रक्रिया में ऊपर वालों के दिन बिना किसी अधिक प्रयास के कुशलता से कट जाते हैं. कर्म योग की ट्रेनिंग करना इसीलिये ऊपर से नीचे तक सभी कर्मचारियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया. सेवा भाव तो जगे तो विकास को गति मिले.     

देश दिन पर दिन तरक्की करता जा रहा है लेकिन आज भी कभी-कभी लगता है कि हमारे पूर्वज कुछ अधिक समझदार थे. नवनिर्मित भवनों में जाइये तो दिन और रात का पता तक नहीं चलता है. बिजली के ऊपर हमारी निर्भरता सौ प्रतिशत नहीं तो निन्यानबे प्रतिशत तो हो ही गयी है. दिन में भी बिजली जलाये बिना कोई काम नहीं कर सकते. पहले बिजली की उपलब्धता या तो थी नहीं, या थी भी तो सीमित हुआ करती थी. भवन ऐसे बनते थे, जहाँ डे-लाईट का अधिकतम उपयोग हो सके. बीच में दालान, चारों ओर बरामदा फिर कमरे. हर कमरा अलग. सबका अपना-अपना कमरा, हर कमरे के अपने-अपने ताला-ताली. हर व्यक्ति आत्मनिर्भर. अपना कमरा खोलो और अपना काम करो. क्या घर क्या दफ़्तर सब जगह कमोबेश ऐसी ही व्यवस्था थी. हवा-धूप-पानी सब इफ़रात में उपलब्ध. आज भी कुछ गर्म देश दिवा प्रकाश के उपयोग और गर्मी से निपटने के लिये ऑफिस का टाइम सुबह रखते हैं. 

अब स्थिति ये है कि भवन नहीं बिल्डिंग्स बन रही हैं, अट्टालिकायें बन रही हैं. लेकिन उनकी डिज़ाइन में बेसिक कमी ये है कि रोशनी के लिये, प्राय: दिन में भी, कृतिम प्रकाश पर निर्भर रहना पड़ता है. बिजली का कनेक्शन बरक़रार रखने के लिये लम्बा-चौड़ा बिल भी देना पड़ता है. दिवा-प्रकाश का न्यूनतम उपयोग करने के बाद भी, हर कोई बिजली बचाने के लिये बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं चूकता. ये कृतिम प्रकाश का ही नतीजा है कि हर कोई ख़ुद तो डिप्रेशन में है ही, और दूसरे को डिप्रेशन में डालने के लिये तत्पर दिखता है. इस माहौल में जो भी अपनी व्यथा-कथा बताता है, उसे मै किसी न किसी बाबा को पकड़ लेने की मुफ़्त सलाह दे देता हूँ. लोग मजा लेंगे लेकिन कन्धा नहीं. बाबा मजा भी नहीं लेता और कन्धा भी देता है. और उसकी ट्रस्ट को दिया दान, डॉक्टर्स के साइड एफेक्ट वाली दवाइयों से सस्ता ही पड़ता है. 

शायद जगह की कमी ने कॉम्पैक्ट और मल्टीस्टोरी भवन बनाने को प्रेरित किया होगा. सबसे नायाब डिज़ाइन हुआ करती है, एक अंतहीन लम्बा कॉरिडोर. कॉरिडोर के अगल-बगल कमरे, और अन्त में, या सबकी सुविधा के लिये बीच में, प्रसाधन की व्यवस्था. सरकारी भवन जो बने तो लगता है, इस नक़्शे को पूरे देश ने बिना किसी संशय के अपना लिया. सरकारी भवन मुख्यतः सरकारी निर्माण विभागों द्वारा बनाये जाते हैं. उनके लिये अनुमानित लागत निकालना आसान हो जाता है. उन्हें अधिकतर प्रोजेक्ट के बजट से मतलब होता है. जहाँ उन्हें कोई नया डिज़ाइन दिखाया या बताया तो उन्हें लगता है कि नयी डिज़ाइन और नया एस्टीमेट बनाना पड़ेगा. इसलिये घुमा-फिरा कर ये आपको वही डिज़ाइन सजेस्ट करेंगे जो आज तक बनाते आये हैं. ये नहीं है कि ये डिज़ाइन कर नहीं सकते, लेकिन जब नौकरी करनी है, तो सीधे-सच्चे, समय की कसौटी पर जाँचे-परखे नक़्शे पर काम करना ही सही भी है और आसान भी. जब ट्रांसफ़र-पोस्टिंग हर तीन साल पर बदल ही जानी है, तो जल्दी से जल्दी बजट हासिल करो, काम शुरू करो-कराओ, और काम ख़त्म होने से पहले निकल लो. आपका फैलाया रायता कोई और समेटेगा. आप नयी जगह, नया रायता फैलाओ. इन परिस्थितियों में किसकी तमन्ना होगी इंजीनियरिंग मार्वेल्स बनाने की. और विभागों का भी परम ध्येय ये ही होता है कि बजट मिला है तो जल्दी से जल्दी हिल्ले लगा दो, वर्ना अगले बजट में कटौती की सम्भावना रहती है. जब दोनों को (बनवाने और बनाने वाले) को जल्दी हो तो प्लान और एलिवेशन पर काम करना समय की बर्बादी है. नतीजा बिल्डिंग में कॉरिडोर, कॉरिडोर के दोनों ओर कमरे और आख़िर या बीच में प्रसाधन, इससे अधिक भवन का उपयोग करने वाले कर्मचारी-अधिकारी न सोच पाते हैं, न आशा करते हैं. 

कमरे हैं तो खिड़कियाँ भी होंगी. जिनसे दिन में सूर्य-प्रकाश आने की सम्भावना रहती है. लेकिन हमारे कर्मचारी थोड़े सोफेस्टिकेटेड होते हैं. घर में तो परदे बीवी की मर्ज़ी के लगते हैं. ऑफिस में अपनी पसंद के परदे लगाने की छूट मिल जाती है. तो हर कमरे को लोग-बाग़ अपने मनपसंद रंग के परदों से सजाने का मौका नहीं चूकते. अब चूँकि परदे होते ही प्राइवेसी के लिये हैं, तो उन्हें इतना मोटा तो होना ही चाहिये कि अन्दर का नज़ारा बाहर से न दिखे. ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने जरुर इन्टरवीन किया होगा जो निर्णय लिया गया कि कॉरिडोर की ओर दरवाज़े शीशे के होंगे ताकि ऑफिस में ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और कॉरिडोर से गुजरने वाला हर शख्स ये देख सके कि अन्दर चल क्या रहा है. लेकिन जैसा कि पहले बताया जा चुका है, प्राइवेसी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिये शीशों के ऊपर गाढ़ी काली फ़िल्म का आवरण चस्पा कर दिया गया. अब कॉरिडोर में सूर्य के प्रकाश के पहुँचने की जो रही-सही कसर भी थी, वो समाप्त हो गयी. रवि के पहुँचने की सम्भावना थी नहीं, कवि भला उन गलियारों में क्यों घुसना चाहता. कहते भी है कि जहाँ रवि न पहुँचे, वहाँ कवि पहुँच जाता है. लेकिन कवि के लिये कोई मोटिवेशन, कोई प्रेरणा तो हो. अन्धकार इतना घुप्प था कि यदि कॉरिडोर में कुछ एल.ई.डी. बल्ब न टिमटिमा रहे होते तो मुझे पता भी नहीं चलता कि दूसरे छोर से कौन घुसा. हो सकता है हम टकरा भी जाते. 

इतनी लम्बी विवेचना में हम लोगों के बीच की दूरी घट कर मात्र बीस फिट रह गयी होगी. मुस्कराहट, हेल्लो-हाय की प्रीरिक्वीज़िट होती है. उसका चेहरा सख्त था. जिन्हें स्वयं पर अतिशय विश्वास होता है, वो बाबा लोगों के चक्कर से दूर रहते हैं. इसलिये भारतीय दर्शन के विराट ज्ञान से वंचित रह जाते हैं. उसका मुझ नाचीज़ पर मुस्कराहट वेस्ट करने का कोई इरादा न देख कर, मैंने भी अपना सारा ध्यान कूटस्थ पर लगा दिया. आती साँस मंगल तेरा, जाती साँस मंगल मेरा. अस्तित्वबोध ख़त्म हो रहा था. हमारे स्थूल शरीर अदृश्य होते जा रहे थे. दोनों आत्मायें एक दूसरे के आर-पार देखते हुये अगल-बगल से गुजर गयीं. 

-वाणभट्ट

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

दलहन आत्मनिर्भरता के सूत्र

क्रान्तियाँ अचानक घटित नहीं होतीं. इनके नेपथ्य में होती है, लक्ष्य को प्राप्त करने की एक समग्र दृष्टि और दिशा. इनमें निहित होता है, स्वार्थरहित सन्घर्ष और त्याग. सर्वोपरि होती है, देश और समाज कल्याण की भावना. एक समय ऐसा भी था, जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था. खाद्यान्न उत्पादन देश की बढ़ती जनसँख्या की खाद्य आपूर्ति करने में सक्षम नहीं था. इसके लिये आयातित अनाज पर निर्भर रहना पड़ता था. देश की बढ़ती जनसँख्या के समक्ष खाद्य सुरक्षा एक प्रश्नवाचक चिन्ह बन कर खड़ी थी. तब समाधान के भी समस्त प्रयास आरम्भ हुये. खाद्यान्न आत्मनिर्भरता में अधिक उत्पादकता वाले उन्नत बीजों ने मुख्य और केन्द्रीय भूमिका निभायी. ये उन्नत प्रजातियाँ कृषि में किये गये निवेश (Inputs), खाद-पानी, के प्रति संवेदनशील थीं. अतः हरित क्रान्ति सम्भव हो सकी, सिंचित क्षेत्र के बड़ी जोत वाले समर्थ किसानों के द्वारा जो खाद और पानी का निवेश वहन करने में सक्षम थे. इस क्रांति में नीति-नियंताओं की भूमिका को भी कम करके नहीं आँका जा सकता. कृषि शोध का शीर्ष नेतृत्त्व तत्कालीन प्रशासन में इस विश्वास को स्थापित करने में सफल रहा कि उचित प्रोत्साहन के द्वारा ही खाद्यान्न आत्मनिर्भरता सम्भव है. न्यूनतम समर्थन मूल्य, सुनिश्चित ख़रीद, भण्डारण क्षमता और सार्वजानिक वितरण प्रणाली का विकास आदि कारणों के कारण हरित क्रान्ति घटित हो सकी. यदि हरित क्रान्ति के घटकों को सूचीबद्ध किया जाये, तो वह निम्नवत होगी:

1. उच्च उत्पादकता वाले उन्नत बीज 

2. खाद की उपलब्धता 

3. पानी की सुविधा

4. अधिक जोत वाले समृद्ध किसान 

5. न्यूनतम समर्थन मूल्य

6. सुनिश्चित ख़रीद 

7. सुरक्षित भण्डारण 

8. सार्वजानिक वितरण प्रणाली 

इस क्रान्ति को हरित क्रान्ति तब घोषित किया गया जब खाद्यान्न उत्पादन में हुयी वृद्धि, जनसाधारण की थाली तक पहुँची. यदि समग्र दृष्टि डाली जाये तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि किसी भी खाद्य सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये हरित क्रांति के सभी घटकों का समावेश अवश्य होना चाहिये. निसन्देह इसमें उन्नत बीजों की मुख्य भूमिका है. वर्तमान परिवेश में कृषक की आय-वृद्धि को एक और घटक के रूप में जोड़ा जाना आवश्यक है. कृषि आधारित उद्योगों के लिये आवश्यक है कि वे कृषक कल्याण की दिशा में भी अपना योगदान दें. 

हरित क्रांति के बाद ही दुग्ध उत्पादन की श्वेत क्रान्ति भी देखने को मिली. श्वेत क्रान्ति ये यह सिद्ध करने में सफल रही कि सहकारिता और सहभागिता से भी क्रान्ति संभव है. उपलब्ध संसाधनों का यदि समुचित उपयोग किया जाये तो वर्तमान चुनौतियों और परिस्थितियों को क्रान्ति में परिवर्तित किया जा सकता है. दुग्ध क्रान्ति का मूल, दुग्ध उत्पादकों के संजाल (नेटवर्क) निर्माण और उनके व्यवसायिक हित-लाभ के संरक्षण में निहित है. इसे कोआपरेटिव क्रान्ति की संज्ञा भी दी जा सकती है, जिसमें उत्पादक से लेकर उपभोक्ता तक सभी हितधारकों का लाभ सुनिश्चित करते हुये, एक जीत-जीत स्थिति (Win-Win Situation) का निर्माण किया गया. समय के साथ दुग्ध क्रान्ति का ये कॉपरेटिव मॉडल और सशक्त और सुदृढ़ हुआ है. सम्भवतः यह एक प्रशंसनीय और अनुकरणीय आदर्श उदाहरण है, जिसे कृषि उत्पादन के किसी भी क्षेत्र में स्थापित किया जा सकता है. 

वर्तमान युद्ध, वर्तमान में उपलब्ध उपकरणों और संसाधनों से ही लड़ना होगा. भविष्य की तकनीक हमें नवोन्मेषी कार्यों के लिये प्रेरित अवश्य करती हैं, किन्तु वर्तमान समस्याओं का समाधान वर्तमान तकनीकों से ही सम्भव है. यही बात दलहन आत्मनिर्भरता के विषय में भी लागू होती है. नीति-नियन्ताओं ने इस दिशा में अपनी कार्यान्वयन योजना को मूर्तरूप देना आरम्भ भी कर दिया है. दिशा-निर्देश के अनुसार दहलन उत्पादन के लिये उपयुक्त क्षेत्रों के चिन्हीकरण का कार्य आरम्भ भी कर दिया है. शासन और नीति निर्धारक अब शोध और विज्ञान की ओर आशावान दृष्टि से देख रहे हैं. भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुये दलहन आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में प्राप्त करने का निश्चय किया गया है. अतः दलहन शोध को भी स्पष्ट रूप से अपनी संस्तुतियों के साथ आगे आना होगा. जलवायु परिवर्तन सहिष्णु, कीट और रोग अवरोधी, उच्च उत्पादन और पौष्टिकता वाली प्रजातियों का विकास की दिशा में पारम्परिक और अनुवांशिक प्रजनन पद्यातियाँ निश्चय ही एक आशान्वित भविष्य की ओर इंगित करती हैं, किन्तु आज की परिस्थितियों से निपटने के लिये कोई स्पष्ट संकेत देने में सक्षम नहीं हैं. बहुत से विषय वस्तु विशेषज्ञ अपनी-अपनी दिशाओं में प्रयास कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है समन्वित (Integrated) और समेकित (Consolidated) प्रयास की. आवश्यकता है कि आज दलहन उत्पादक क्षेत्रों में प्रचलित और संस्तुत प्रजातियों का कठोर स्क्रीनिंग की. स्क्रीनिंग का उद्देश्य अधिक से अधिक प्रजातियों का चयन करने की अपेक्षा अस्वीकरण होना चाहिये. प्रत्येक प्रजाति को उत्पादकता कीट-रोग प्रतिरोधकता के साथ ही यदि विशिष्ट गुणवत्ताओं का भी समावेश हो तो निश्चय ही कम प्रजातियों का चयन होगा, किन्तु वो श्रेष्ठ होंगी. रंग, आकार, छिलके और दाल का अनुपात, पकने में समय, प्रोटीन व अन्य तत्वों की मात्रा आदि विशिष्टताओं को भी सम्मिलित कर लिया जाये तो निसंदेह चयनित प्रजातियों की संख्या में कमी आयेगी. प्रजातियों को उनके अन्तिम उपयोग जैसे शीघ्र अंकुरण, अधिक पफिंग, कम तेल सोखने, अधिक फ्लेकिंग, फेर्मेंटेशन के लिये उपयुक्तता आदि विशिष्टताओं, के अनुसार वर्गीकृत भी किया जा सकता है. एक देश ने भारतीय प्रजाति की देसी गायों को संवर्धित करके उनके दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया वो भी दूध की पौष्टिकता और गुणवत्ता को बिना प्रभावित किये. इसी प्रकार स्थानीय प्रजातियों के विकास की प्रक्रिया अपनाना चाहिये, ताकि उत्पादन में वृद्धि प्रजाति की गुणवत्ता को प्रभावित न करे और वो शीघ्रता से उस क्षेत्र में स्वीकार्य हो जाये. प्रायः ये देखने को मिलता है कि नयी प्रजातियों की संस्तुति के बाद भी, कृषक पुरानी प्रजातियों को ही उगा रहा है. कारण बीज की उपलब्धता तो है ही साथ में उसका समय-सिद्ध भरोसा भी है. स्थानीय प्रजातियों को उन्नत करना उन्हें सहज स्वीकार्य बनायेगा. 

कम प्रजातियों का सीधा सम्बन्ध उच्च गुणवत्ता के बीजों की उपलब्धता से है. प्रकृति ने पहले से ही अनुवांशिक विविधता की व्यवस्था बना रखी है. अधिक क्षेत्र में एक ही प्रजाति की खेती से न केवल फसल प्रबंधन में सहायता मिलेगी अपितु फसल उत्पाद की एकरूपता, प्रसन्स्करण के लिये अधिक उपयुक्त होगी. कुछ अन्य कृषि प्रधान देश विस्तृत भूमि पर एक ही प्रजाति की फसल लेते हैं. जिसके कारण उनके लिये मशीनीकरण सहज हो जाता है. इससे समय और श्रम प्रबन्धन भी आसन हो जाता है. भारत दलहन का सर्वाधिक उत्पादक और उपयोगकर्ता देश है. आन्तरिक दलहन आवश्यकता की आपूर्ति के लिये दलहन आयात आज की आवश्यकता है. कुछ देश भारत के लिये ही दालों का उत्पादन कर रहे हैं. हजारों हेक्टेयर में उत्पादित एक ही प्रजाति की उपज भारतीय प्रसंस्करणकर्ताओं को भी आयातित उपज के उपयोग के लिये प्रेरित करती है. भारत आमों के उत्पादन में एक अग्रणी देश है, किन्तु अधिकांश प्रसंस्करणकर्ता आम का पल्प या कंसंट्रेट इसलिये आयात करते हैं क्योंकि बाहर से आने वाला उत्पाद एकसमान है, और उससे तैयार अन्तिम उत्पाद मार्केट में पसंद किया जाता है. यही बात दलहन की आत्मनिर्भरता पर भी लागू की जा सकती है. 

दलहन आत्मनिर्भरता के सूत्र:

1. दलहन उत्पादक क्षेत्रों का चिन्हीकरण 

2. क्षेत्र की प्रचलित और संस्तुत प्रजातियों की स्क्रीनिंग 

3. उत्पादकता और गुणवत्ता के आधार पर एक या दो प्रजातियों का चयन 

4. चयनित प्रजातियों का बीज उत्पादन 

5. विस्तृत क्षेत्र में फसल उत्पादन 

6. मशीनीकरण व फसल प्रबन्धन

7. विकेन्द्रित भण्डारण 

8. ग्राम्य अंचल में प्रसंस्करण 

प्रजातियों का विकास पृष्ठभूमि में निरन्तर चलते रहने की प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य कठोरतम स्क्रीनिंग के बाद कम से कम प्रजातियों का चयन होना चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रम में उत्पादन और उत्पादकता के अतिरिक्त फसल प्रबन्धन और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यदि ड्रिप इरिगेशन, पंक्तिबद्ध बुआई, रिज प्लांटिंग, निपिंग, मृदा स्वास्थ्य आदि फसल प्रबन्धन तकनीकों से उत्पादकता में वृद्धि होती है, तो इनके लिये उत्पादन तकनीक का मानकीकरण करना आवश्यक है, ताकि सभी प्रजातियों को सामान प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियाँ मिलें. इनका परिक्षण मूल विकासकर्ता से भिन्न विषयवस्तु विशेषज्ञों द्वारा किया जाना अनिवार्य होना चाहिये.

वैज्ञानिकता की यवनिका के पीछे प्रायः विज्ञान और तार्किकता व्यर्थ हो जाती है. आज जब जैविक और प्राकृतिक खेती की बात होती है, तब अंग्रेज़ी भाषा में कृषि विषयों का अध्ययन करते के कारण अधिकांश वैज्ञानिक इनका विरोध करने पर बाध्य हैं, क्योंकि ये अवधारणायें इनकी शिक्षा के विपरीत है. ऐसी ही स्थिति एलोपैथी और आयुर्वेद के सन्दर्भ में पायी जाती है, जो एक सीमा तक सही भी है. वर्षों की शिक्षा सदैव नये ज्ञान के प्रति सशंकित रहती है. विज्ञान का काम है शंका का समाधान. पुरातन पद्यतियों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसने की आवश्यकता है. विज्ञान को सदैव नये विचारों के प्रति सहिष्णु और समावेशी होना चाहिये. 

कृषि शोध का सम्पूर्ण परिदृश्य उन्नत बीजों के विकास पर सीमित हो कर रह गया. व्यवहारिक क्षेत्र में किये गये, मौलिक शोध की अन्तिम परिणति एक उत्पाद के रूप में होनी अत्यावश्यक है. चन्द्रयान प्रोजेक्ट को, अनेकानेक मौलिक विषयों जैसे गणित, भौतिकी, और रसायन शास्त्र के मौलिक शोध की वाह्य या प्रकट उपलब्धि कह सकते हैं, जिसमें अभियांत्रिकी विषयों ने भी अहम् भूमिका निभायी है. बीजों के विकास व चयन प्रक्रिया में अभियांत्रिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. श्रेष्ठ होता यदि फसल सुधारक इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते. ये स्थिति दुखद है, किन्तु आशा है जब उत्पादकता को कृषक आय और समृद्धि से जोड़ कर देखा जायेगा, अभियान्त्रिकी की आवश्यकता को बल मिलेगा. 

दलहन आत्मनिर्भरता की चुनौती, वो भी निर्धारित समय सीमा में, से निपटने के लिये कृषि शोध को अधिक प्रभावी, अनुकूल और ग्रहणीय बनाने की आवश्यकता है.

-वाणभट्ट 

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

प्रदूषण

पूरे शहर की पत्तियों का रंग बदल सा गया है. छोटे-बड़े सभी पेड़ों का यही हाल है. हरी-हरी पत्तियों पर धूल की परत देखते-देखते, अब ये रंग हमारी आदत में शुमार हो गया है. वनस्पतियों की वास्तविक हरीतिमा को देखने के लिये आपको बरसात का इंतज़ार करना पड़ सकता है. आपके अट्ठारहवीं मंजिल के आलिशान फ़्लैट की बालकनी के गमलों में शोभायमान पौधों की पत्तियों को तो आप स्प्रे गन की सहायता से थोड़ा-बहुत पानी डाल कर साफ़ कर सकते हैं, लेकिन यदि आपका घर जमीन पर है, तो यकीन मानिये घर के बाहर रखे पौधों का वही हाल होता है, जो शहर भर के पेड़-पौधों का. सारी पत्तियाँ धूल-धूसरित. घर को अगर ढंग से पैक करके नहीं रखा तो घर के अन्दर और बाहर में अंतर कर पाना बहुत कठिन है. खिड़की पर मच्छर जाली, शीशे के पल्ले और मोटे-मोटे पर्दों के आच्छादन के बाद भी सुबह से शाम तक घर के हर सामान पर धूल की एक मोटी परत बिछ जाती है. यदि आपको सफ़ाई की सनक है, तो भगवान ही आपका मालिक है. आप दिन भर डस्टिंग करते ही नज़र आयेंगे. और जितनी बार कोई वाहन, स्कूटर या कार, बाहर से निकलेगी, एक-दो किलो धूल का रुख़ आपके होम-स्वीट-होम की ओर ही होगा. सबसे कठिन काम है, घर में जगह-जगह से लाये सजावटी सामानों को साफ़ करना. कभी-कभी तो लगता है घर में सामान न होते, या जो होते भी तो अलमारियों के अन्दर बंद, तो कितना अच्छा होता. बस मेज-कुर्सी-सोफ़ा और जमीन ही साफ़ करनी पड़ती. 

सरकारी व्यवस्थाओं से अमूमन हर कोई त्रस्त है. ऐसा ही हाल है जल निगम द्वारा 'हर घर पानी' की व्यवस्था का. गाहे-बगाहे पानी झटका दे ही जाता है. तमाम इंतजाम के बाद भी गन्दा-बदबूदार पानी आ जाना, अजूबा नहीं लगता. वस्तुतः ये सरकार की आम जनता की इम्युनिटी बूस्ट करने-कराने की योजना है. विदेशों में सेटल्ड हमारे ही लोग जब भारत की पावन धरा पर उतरते हैं, तो उन्हें सबसे ज्यादा डर पीने के पानी से लगता है. जिन-जिन को सरकारी पानी की सप्प्लाई पर भरोसा नहीं था, उन सभी ने अपने-अपने घर में बोरिंग करा ली. पम्प का प्रेशर इतना तेज़ है कि वो ख़ुद को रोक नहीं पाता रोज-रोज घर में लगाये पेड़-पौधों की पत्तियाँ साफ़ करने से. बीच में कार आ जाती है, इसलिये वो भी धुल जाती है. वर्ना पर्यावरण प्रेमियों का इरादा तो बस पत्तियों को हरा-भरा देखने का ही था. कुछ दूरदर्शी लोग होते हैं. वो समस्या को 'निप द बड' के सिद्धांत से समाप्त कर देना चाहते हैं. वो रोज अपने घर के सामने की सड़क सिर्फ़ इसलिये धोते हैं कि धूल बैठ जायेगी तो उड़ेगी नहीं. हमारे यहाँ संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन हमारा प्रयास सदैव ये रहता है कि हम संसाधनों का दोहन अपने पड़ोसियों से ज्यादा करें. अब मै अपनी महानता का क्या बखान करूँ, इस चलते-पुर्जे ज़माने में भी कुछ मेरे जैसे आदर्शवादी लोग हैं, जो अभी भी सरकारी पानी की सप्प्लाई का उपयोग कर रहे हैं और आधी बाल्टी पानी में पोछा निचोड़-निचोड़ के अपनी कार-स्कूटर साफ़ रखने का प्रयास करते हैं, वो भी हफ़्ते-दस दिन में एक बार.

आपको लग रहा होगा कि मुद्दा प्रदूषण का था और वाणभट्ट बस धूल की बात कर रहा है. तो भाइयों और बहनों, मुझे ये बताना है कि मेरे फेफ़ड़ों के हालात बहुत नासाज़ हैं. लेकिन वाहनों के धुयें से मेरी एलर्जी उतनी एग्रिवेट नहीं होती, जितनी धूल के बारीक कणों से. पुतिन और नेतान्याहू ने इस धरती पर जितने बम फोड़ डाले हैं, उसके बाद मै ये दावे से कह सकता हूँ कि बारूद और फॉसिल फ्यूएल से ग्लोबल वार्मिंग तो बढ़ सकती है लेकिन प्रदूषण नहीं. प्रदूषण के नाम पर हर कोई वाहनों में प्रयुक्त होने वाले ईधन को ही सबसे बड़ा गुनाहगार मान रहा है लेकिन असली गुनहगार धूल है. जाड़ों में फॉग और धूल-धुयें के कण मिल कर स्मॉग बना देते हैं, जो कमज़ोर रेस्पिरेटरी सिस्टम वालों के लिये परेशानी का सबब बन जाते हैं. दिल्ली वालों ने दिल्ली के प्रदूषण के लिये हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने को मुख्य कारण माना. निसंदेह इसने स्मॉग को बढाया है, लेकिन केवल कोहरा और धुआँ, धूल के महीन कणों के बिना बहुत घातक नहीं हो सकता. धूल के वो कण मुझे ज़्यादा खतरनाक लगते हैं, जो अत्यंत महीन होते हैं. ड्राई डस्टिंग के बाद भी मेरी कार पर चिपके धूल के महीन कणों के कारण मेरी कार का असली रंग, वेट वाश के बाद ही दिखायी देता है. हवा में तैरते धूल के ये अदृश्य कण मेरी चिन्ता का मुख्य कारण हैं. अब चूँकि मेरी अवधारणा में विज्ञान या रसायन शास्त्र के शब्द, जैसे कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाईट्रोजन ऑक्साइड, सल्फ़र डाईऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन आदि-इत्यादि, नहीं हैं, इसलिये किसी भी अंग्रेजी में साइंस पढ़े विशषज्ञ को मेरी बात अनर्गल प्रलाप लग सकती है. इसमें मै अपना नहीं, उनकी शिक्षा का दोष मानता हूँ, जिसने उनकी सोचने-समझने की क्षमता को इस हद तक प्रभावित कर रखा है कि वो उसी बात को सच मानते हैं जो अंग्रेजी में लिखी हो. धूल के प्रति ये विचार मेरे तब बने थे, जब सन 1990 में मैंने दिल्ली में नौकरी शुरू की थी. तब भी मुझे सड़कों पर फैली हुयी रेतीली धूल दिखती थी, जो घास रहित फुटपाथ पर पसरी रहती थी, और वाहनों के आने-जाने से विस्थापित होती रहती थी. उसके विस्थापन का एक और कारण था, सुबह-सुबह मोहल्लों में झाड़ू से सफ़ाई. झाड़ू पोलीथिन और अन्य कचरे को भले साफ़ करती हो, लेकिन इसी के माध्यम से इधर की धूल उधर और उधर की धूल इधर आ जाती थी. और यही धूल खिड़कियों और दरवाज़ों से घर के अन्दर आ जाती थी. 

समस्यायें हैं, तो उनके समाधान के लिये सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थायें हैं. सरकारी संस्थायें तो नौकरी बन जाती हैं. इसलिये लोग उतना ही काम करते हैं, जितने में काम चलता रहे. अपना भी और समस्या का भी. समस्या है तो हम हैं. समस्या नहीं तो हम नहीं. यदि सरकारी अपना काम निष्ठा और लगन से करते तो गैर- सरकारी की जरूरत ही कहाँ थी. ज्ञानी विद्वानों को भी मालूम है कि सरकारी संस्थानों के पास संसाधनों का नितान्त अभाव रहता है और वे अपने लिये संसाधन सृजन का प्रयास भी नहीं करते. मूलतः इनका प्रयास जो भी वित्तीय प्रावधान किया गया है, उसके निस्तारण की ओर अधिक रहता है. इनके लिये बजट कन्ज़म्प्शन की समस्या सर्वोपरि है. इसीलिये हर विषय के एक्सपर्ट लोगों ने समस्याओं के समाधान के लिये एक ऐसी नॉन-प्रॉफिटेबल, चैरिटेबल, नॉन-गवर्नमेंटल व्यवस्था बनायी है, जिन्हें ट्रस्ट या सोसायटी के माध्यम से संचालित किया जाता है. इनका काम है विभिन्न मुद्दों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाना और उठाये रखना, क्योंकि समस्या का समाधान किसी और को करना है. इस पुनीत कार्य के लिये ये मैगज़ीन निकालेंगे, जर्नल छापेंगे और गोष्ठियाँ करेंगे. पिछले तीस सालों का मेरा तजुर्बा बताता है कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी हो, उस पर यदि एक सेमिनार या सिम्पोजियम हो गया, तो समस्या एक-दो दशक के लिये ख़त्म हो जाती है. अगली बार उसी थीम पर दुबारा सेमीनार, प्रायः नहीं होता, और होता भी है तो दस-बीस साल बाद. ये बात अलग है कि सेमिनार की थीम चाहे कुछ भी हो, वक्ताओं और प्रतिभागियों की थीम नहीं बदलती. वो पुराने कन्टेन्ट, नये पावर पॉइंट प्रेजेंटेशंस में ले कर आ जाते हैं. दो-तीन दिन चलने वाले समागम में ऐसी गहमा-गहमी होती है, मानों कुम्भ मेले में बिछड़े बन्धु-बांधवों का पुनर्मिलन हो रहा हो. 

देश-दुनिया में बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिये ऐसी ही एक संस्था 'सोल्यूशन फॉर पॉल्यूशन' का आविर्भाव कराया गया. जाने-माने गण्यमान नीति नियन्ताओं, चिन्तकों और सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स को घेर-घार कर मेंबर बनाया गया. सोसायटी के मेम्बर बनना भी एक फ़क्र की बात है. बहुत से लोग इसे अपने विज़िटिंग कार्ड और लेटर हेड पर भी छपवा लेते हैं. स्पेशलिस्ट्स को स्पेशलिस्ट तभी माना जा सकता है जब उसने समस्या के समाधान की दिशा में कुछ काम किया हो. काम करके नाम कमाने में मुद्दत लग जाती है, कभी-कभी तो जीवन कम पड़ जाता है. और काम करने का एक खामियाजा ये भी है कि जब तक दूसरे आपके काम की सराहना न करें, आपके सारे प्रयास व्यर्थ हैं. देश और समाज जो आगे गया है, उसमें अनेकानेक लोगों का योगदान है. लेकिन नाम उन्हीं का दर्ज हुआ, जिन्होंने ख़ुद अपने नाम से लिखा या दूसरों से अपने बारे में लिखवाया. अब हमारे गुरु, बाणभट्ट जी, को ही ले लीजिये. यदि उन्होंने अपने नाम से न लिखा होता तो सातवीं शताब्दी में भारत की धरा पर जन्म लेने वाले इस महान लेखक के बारे में किसे पता होता. तो अमर होने का सबसे आसन-अमिट फॉर्मूला है, आप जीते जी इतना लिख (छाप) जाइये कि धरतीवासी आपको चाह कर भी भूल न पायें. इसी महान उद्देश्य को लक्षित करके प्रदूषण को समर्पित सोसायटी एस-एफ़-पी एक मैगजीन और एक जर्नल भी निकालती है. उसी में छाप-छाप के अनेकानेक लोग रातों रात स्पेशलिस्ट बन गये. अब दुनिया में कहीं भी सेमिनार-सिम्पोजिया-कॉन्फ्रेंस हो तो इनके बिना सब सूना-सूना सा लगता है. इनके प्रेजेंटेशंस में विज्ञान के गूढ़ और अबूझ शब्दों का समावेश इस कदर होता है कि सुनने वाले को इन्फेरियोरिटी काम्प्लेक्स हो जाये. उसे लगने लगता है कि उसे साइंस का स भी नहीं आता. ये सिर्फ़ एयर पाल्यूशन के इतने कारण और प्रकार बता दें कि आदमी गिनते-गिनते थक जाये. लेकिन उसमें धूल जैसी नामाकूल चीज़ शामिल हो, तो लानत है विज्ञान और वैज्ञानिक की वैज्ञानिकता, दोनों पर. विज्ञान ने ब्रह्माण्ड की जटिलताओं को सहज रूप से जिज्ञासुओं को समझाने का प्रयास किया, किन्तु वैज्ञानिकों ने स्वयं को सिद्ध करने के उदेश्य से सहज और सामान्य ज्ञान को भी जटिल अवधारणा बना डाला. और स्थिति ये है कि बात यदि अंग्रेजी में कही गयी हो, तो हिन्दी मीडियम में पढ़ा ज्ञानी बिना बात ताली बजा दे. 

फाइव स्टार होटल या इन्टरनैशनल टूरिस्ट डेस्टिनेशंस पर कॉन्फ्रेंस रखने का उद्देश्य ये होता है कि ये दिखाया जा सके कि सोसायटी भूखे-नंगों की नहीं है. सब पैसे का खेला है. 'विकास और शहरों में बढ़ता प्रदूषण' थीम पर कॉन्फ्रेंस भारत के साफ़-सुथरे शहर विजाग के पाँच सितारा होटल में रखने का निर्णय लिया गया. तीन दिन की गहमा-गहमी और वक्ताओं ने अपने ओजस्वी व्याख्यानों से इतना धुरन्धर वैज्ञानिक प्रदूषण फैलाया कि देश, दिल और दिमाग़ का सारा प्रदूषण धुआँ-धुआँ हो गया. प्लेनरी सेशन आते-आते प्रतिभागियों की संख्या बस अवार्ड लेने वालों और कुछ ताली बजाने वालों तक सीमित रह गयी. कॉन्फ्रेंस की भयंकर सफलता पर सभी ने आयोजकों की और भाग लेने आये प्रतिभागियों ने, एक-दूसरे की सराहना की. अगली काँफ्रेंस में फिर मिलने की कस्मों के साथ सब विदा हो गये. खाने-पीने की व्यवस्था अद्भुत थी. अधिकांश आयोजक बैग की क्वालिटी में चिरकुटई कर जाते हैं. इस बार ऐसा नहीं हुआ था. अमेरिकन टूरिस्टर का झोला बच्चों के काम आयेगा, ये सोच कर सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की.

शिद्दत से कॉन्फ्रेंस की प्रोसीडिंग्स बनीं. हर तरह के पाल्यूशन को मात देने के सभी विचार, जिसमें धूल को मुद्दा नहीं बनाया गया था, सूचीबद्ध किये गये. ये बात अलग है कि वो प्रोसीडिंग्स डेढ़ साल बाद आज भी सोसायटी के ऑफ़िस में पड़े-पड़े धूल खा रही है. 

मेरा इम्यून सिस्टम इस कदर ध्वस्त है कि धूल का नाम लेते ही गले में खिच-खिच शुरू हो जाती है.

-वाणभट्ट 

रविवार, 9 नवंबर 2025

वैदिक संस्कृति में मानवधर्म - एक समीक्षा

मुझे हमेशा से लगता था कि जीवन जीने की भी कोई कुन्जी (मेड ईज़ी या गाइड) पुस्तक होनी चाहिये थी. हर आदमी पैदा होता है, और अन्त तक बस दुविधा और संशय में जीता रहता है कि जो मै कर रहा हूँ वो सही है या गलत. जिन्हें इस बात का संशय होता है, वो निसन्देह, गलत तो नहीं ही कर पाते. लेकिन जिन्हें संशय नहीं होता, वो सदैव अपने को सही ही मानते हैं. इसलिये भले ही वे अपने हिसाब से गलत न हों, किन्तु कई बार देश और समाज के लिये ऐसे लोग बहुत घातक सिद्ध होते हैं. 

ऐसी ही उहापोह में जीवन के साठ वसन्त बीत गये, जब 'वैदिक संस्कृति में मानवधर्म' पुस्तक मेरे हाथ आयी. ये तो मुझे भी पता था कि जीवन सार की बहुत सी बातें हमारे वेद-उपनिषदों में लिखीं हैं, लेकिन मन में कहीं संस्कृत भाषा के अत्यन्त जटिल होने के डर से, कभी उन्हें पढ़ने का साहस नहीं जुटा सका. आधुनिक शिक्षा का एक ये भी दुष्प्रभाव है कि हम किसी भी उस कार्य से बचते हैं, जिससे किसी प्रकार की आर्थिक या वैयक्तिक लाभ मिलने की सम्भावना न हो. मनोरंजन के साधनों पर तो हम बिना झिझक व्यय कर देते हैं, लेकिन ज्ञान के सागर में गोते लगाने में सदैव संकोच करते हैं. वो भी अपने ही धर्म ग्रन्थों के पठन-पाठन से. बचपन से हमें शिक्षित हो कर एक श्रेष्ठ जीवन जीने का पाठ तो पढाया गया किन्तु वास्तविक जीवन में मानव का क्या धर्म होना चाहिये, ऐसा कोई विषय हमारे पाठ्यक्रम में नहीं रखा गया. जो कुछ, सही या गलत, हम सीख पाते हैं, वो अपने अभिभावकों, वरिष्ठों और गुरुजनों के आचरण से.    

ऐसी स्थिति में ऊपर वाले ने मुझे एक अवसर दिया, जब कुछ दिन पूर्व मित्र डॉ. अनिल कुमार सिन्हा जी, जो डीएवी कॉलेज में संस्कृत के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष रहे हैं, ने मुझे अपनी लिखी एक पुस्तक "वैदिक संस्कृति में मानवधर्म" की समीक्षा लिखने के लिये दी. किताबें, विशेषकर कार्यक्षेत्र से इतर, यदि मेरे सामने आ जायें तो उन्हें पलट डालना मेरा पुराना शगल है. फिर विषय चाहे कुछ भी हो. आरम्भ में मुझे लगा सिन्हा साहब ने मुझे कहाँ फँसा दिया, इससे क्या मिलना. किस्सा-कहानी-कथायें पढना एक रुचिकर बात है, लेकिन वेदों का सार जैसी ज्ञानवान बातों को पढ़ने और समझने के ख्याल ने ही कुछ बोरियत का भाव उत्पन्न कर दिया. संस्कृत में लिखे श्लोकों की विशुद्ध हिन्दी में व्याख्या का अध्ययन एक बोरिंग काम हो सकता है, ये सोच कर काफ़ी दिनों तक ये पुस्तक मेरे सिरहाने ही रखी रही. उसे खोल के पढ़ने की हिम्मत मै नहीं कर पा रहा था. ब्लॉग-व्लॉग लिखना कोई बड़ी बात नहीं है. अपने विचार हैं, अपने तर्क, जैसे चाहो वैसे तोड़ो-मरोड़ो. लेकिन वैदिक संस्कृति पर लिखी पुस्तक की समीक्षा मेरे लिये आसन नहीं होने वाली थी. कारण ये है कि हमने ज्ञान को धर्म और कर्मकाण्ड से जोड़ कर रख दिया और उसे पण्डितों के भरोसे छोड़ दिया. हम बिना किसी कारण के ये अवधारणा बना बैठे कि संस्कृत तो पण्डितों-ज्ञानियों की भाषा है, इससे हम लोगों का, आम लोगों का भला क्या सरोकार. 

किन्तु जब पुस्तक को पढना आरम्भ किया तो 80 पृष्ठों में वेदों के सार वाली ये पुस्तक बिना किसी व्यवधान के एक बार में समाप्त कर के ही दम लिया. मुझे लगा अब तक सेल्फ हेल्प या इम्प्रूवमेंट के लिये पढ़ीं सारी बेस्ट सेलर किताबें बेकार हो जातीं, यदि हमारे वेदों में वर्णित जीवन जीने की कला को हमें प्री-प्राइमरी कक्षा से बच्चों को सिखाया गया होता. या बाद में भी वेदों में सन्चित ज्ञान को आज की जन सामान्य की भाषा - प्रचलित हिन्दी या स्कूली अंग्रेज़ी - में उपलब्ध कराया गया होता. आधुनिक शिक्षा पद्यति का कोई लाभ मिला हो या न मिला हो, इतना तो अवश्य हुआ है कि हम अपने धर्म और धर्म ग्रन्थों को चुनौती देने और देते रहने का कोई मौका नहीं चूकते. जबकि क्या विकसित और क्या अविकसित, सभी देश अपने-अपने देश के धर्म को जैसा है वैसा ही मानने का प्रयास करते हैं. उसके विरुद्ध न कुछ सुन सकते हैं, न उसमें किसी प्रकार के सुधार की गुंजाईश मानते हैं. तमाम जड़ताओं के बाद भी सुधार की बात वे भूल से भी नहीं करते. सहिष्णुता का पाठ केवल हिन्दू धर्म में ही मान्य है. इसीलिये उसे सुधारने के बयान कोई भी, कभी भी दे सकता है. बाकि सम्प्रदायों के लोगों की मज़बूरी भी है, जब बात जान-माल की हो तो उनका जीवन फ़िरकापरस्तों की रहनुमायी में ही कटना तय है. भलाई इसी में है कि जो जहाँ जैसा लिखा है वैसा ही मान लो.

वेदों और संस्कृत के नाम से अपने देश में ही एक ऐसा तबका तैयार कर दिया गया है, जो बिना पढ़े-समझे ही उन्हें ख़ारिज कर देता है. हिन्दी या अंग्रेज़ी माध्यम में पढाई करने के कारण वेदों को लेकर मेरे मन में भी वर्जनायें थीं. हजारों साल पुराने ग्रन्थ आज के सन्दर्भ में किस प्रकार उपयोगी हो सकते हैं. सिन्हा जी को भला इस किताब को लिखने की क्या आवश्यकता थी. अंग्रेज़ी के युग में हिन्दी की किताब कोई क्यूँ पढ़ेगा. मुझे नहीं मालूम था कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद वेदों को लेकर मेरे कई विश्वास और मिथक टूटने वाले हैं. पढ़ कर मुझे लगा कि जीवन के सार के लिये हम लोग खामख्वाह इधर-उधर भटकते रहते हैं. आज जब शिक्षा का उद्देश्य महज एक रोजगार और जीविकोपार्जन तक सीमित हो कर रह गया है, वेद हमें जीवन जीने का दर्शन और दिशा दिखाते हैं. इसका किसी धर्म-सम्प्रदाय से लेना-देना नहीं है किन्तु इसका सीधा और गहरा सम्बन्ध मानव धर्म से है. जिसे मानव धर्म का ज्ञान हो गया, वो चाहे किसी भी सम्प्रदाय का अनुयायी बन जाये, निश्चित रूप से धर्म का साथ कभी नहीं छोड़ पायेगा. 

वेद-पुराण-उपनिषद हिन्दू धर्म के मूल ग्रन्थ हैं. इनमें वर्णित प्रत्येक वाक्य मानव और मानवता को समर्पित है. इसमें द्वेष और दुर्भावना का कोई स्थान नहीं है. ये तो देश की राजनीति है, जिसने सदैव सत्ता के सोपान चढ़ने के लिये देश की भोली-भाली मासूम जनता को धर्म के आधार पर बर्गलाने का कुत्सित प्रयास किया है, जो आज भी जारी है. किसी ने अपने धर्म ग्रन्थों को पढने-पढ़ाने का काम तो नहीं किया, लेकिन धर्म ग्रन्थों को एक जाति विशेष की बपौती बता कर अधिसंख्य जनता को इस सहज उपलब्ध ज्ञान से वंचित रखा. आज आवश्यकता है कि प्रत्येक व्यक्ति जात-पात-धर्म के चश्मे को हटा कर इन पुस्तकों को पठन-पाठन करे. सामाजिक समरसता वाले समाज में मानव का क्या धर्म होना चाहिये, वेदों में वर्णित ये ज्ञान हमारे पुरखों की विरासत है, और हम हैं कि अपने ही इस ज्ञान का तिरस्कार करने में लिप्त हैं. ये पुस्तक ऐसे जिज्ञासु लोगों के लिये लाभकारी सिद्ध होगी. 

वाणभट्ट के इस लेख में जो भी विचार हैं, वो वेदों के श्लोकों पर सिन्हा जी की पुस्तक से प्रेरित हैं. सिन्हा जी ने भी वेदों के संचित ज्ञान को सारांश में और सहज शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. 

वेद की शिक्षायें 'मनुर्भव' अर्थात् 'मनुष्य बनने' पर बल देती हैं. इनमें वर्णित ज्ञान का प्रयास है समाज को नैतिक और चारित्रिक पतन की दिशा में जाने से रोकना और समाज में एकता और अखंडता के भाव की स्थापना करना. चूँकि पृथ्वी पर मानव से अधिक श्रेष्ठ कोई अन्य प्राणी नहीं है, इसलिये मानव जो समाज का केन्द्र बिंदु है, उसे ही स्वयं को श्रेष्ठतर बनाने का प्रयास करना होगा. वेदों का सार है कि मानव ऐसे समाज का निर्माण करे कि सम्पूर्ण विश्व एक कुटुम्ब बन जाये, साथ-साथ चले और सभी का मंगल हो. दुनिया में सैकड़ों धर्म और हजारों सम्प्रदाय हो सकते हैं लेकिन सब एक-दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने में ही लड़ते-मिटते रहे. एक हिन्दू धर्म ही ऐसा है, जिसने प्राणी मात्र के कल्याण की कामना की है, जिसमें चर-अचर-गोचर-अगोचर सब सम्मिलित हैं.    

चूँकि वेद किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं है, किसी एक काल-खण्ड में इसकी रचना हुयी हो ऐसा भी कोई दृष्टान्त नहीं है. इसलिये ये माना जा सकता है कि समय के साथ-साथ ऋषियों- महर्षियों ने इस ग्रन्थ के अध्ययन और लेखन में अपना-अपना योगदान दिया होगा, वो भी बिना कोई श्रेय लिये. इसके रचना काल के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन सब ने एक बात मानी है कि ये ग्रन्थ ईसा के जन्म से 1000 से 5000 साल पहले लिखे गये होंगे. आलोचनात्मक दृष्टि से पाश्चात्य विद्वान इन्हें प्राचीनकाल का नहीं मानते. यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम क्या मानते हैं ये अधिक आवश्यक है, न कि दूसरे, विशेषकर वो लोग जो विश्व विजय के उद्देश्य से दूसरों देशों पर अतिक्रमण और आक्रमण कर रहे थे. इतिहास शासकों द्वारा लिखा जाता है. तलवार की दम पर धर्म परिवर्तन करवाने वाले आततायी भी स्वयं को मानवतावादी बताने में कसर नहीं छोड़ते. धर्म अपरिवर्तनीय है. सम्प्रदाय आप कितने भी बदल लो सत्य, अहिंसा, करुणा और प्रेम धर्म थे, तो धर्म ही रहेंगे. और हिन्दू के अतिरिक्त हर सम्प्रदाय ने धर्म के नाम पर ही सबसे अधिक हिंसा की है. त्याग की आधारशिला पर स्थापित हिन्दू ही पूर्णरूप से धर्म की कसौटी पर खरा उतरता है. जो भी सम्प्रदाय, दूसरे सम्प्रदाय से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिये छल-बल का सहारा ले, वो और कुछ भी हो सकता है परन्तु धर्म तो कतई नहीं. परमार्थ और परहित आधारित वेदों ने हिन्दू धर्म को एक स्थिर और स्थायी नींव प्रदान की. इसी कारण हमारा देश हजारों वर्षों के मुग़ल और अंग्रेज़ शासन के बाद भी हम अपनी मान्यताओं से पृथक नहीं हो पाये. 'यूनान-मिस्र-रोमा सब मिट गये जहाँ से, बाकी मगर है अब तक नामो निशाँ हमारा'. सबने आतताइयों की ताकत के विरुद्ध समर्पण कर दिया होगा. कोई बात तो होगी कि भारत में धर्म की जडें इतनी गहरी हैं कि अन्याय और अत्याचार की पराकाष्ठा भी उसे समाप्त नहीं कर पायी. और जब अन्य सम्प्रदाय हिन्दू और हिन्दुत्व की ओर उँगली उठाता है, तो लगता है उनका कट्टरपंथ, उन्हें हिन्दू धर्म की अच्छाइयाँ और उनकी गलतियाँ भी स्वीकार करने नहीं दे रहा है. 

मानवता का सन्देश देते वेदों को शायद पढना और समझना मेरे बस की बात नहीं थी लेकिन सिन्हा जी के इस अनुग्रह ने मुझे अपने धर्म और पुरखों पर गर्व करने का एक मौका दे दिया. इसको केवल धर्म ग्रन्थ न समझ कर मानव-धर्म ग्रन्थ समझना अधिक उचित है. जात-पात में बंटे देश को एक बनाये रखने के लिये आवश्यक है कि धर्म के मर्म को समझा जाये. व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये हिन्दू धर्म की कोई कितनी भी आलोचना करे, लेकिन जिसे इसमें निहित दर्शन समझ आ जायेगा, उसे ये मानना पड़ेगा कि धर्म केवल धर्म होता है, वो भी मानव का मानव के प्रति. इस पुस्तक की कुछ छोटी-छोटी बातें मै साझा करने का प्रयास करता हूँ. 

वेदों का आविर्भाव इतना पहले हो गया था कि बहुधा लोग इसे सृष्टि के पूर्व परमेश्वर द्वारा लिखा मान लेते हैं. यहीं से आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोग इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं. और इन्हें ब्राह्मणों द्वारा रचा मायाजाल बता कर इनकी अपकीर्ति फ़ैलाने का प्रयास करते हैं. इनमें से अधिकांश ने वेदों की विषयवस्तु को जानने-समझने का प्रयास ही नहीं किया था. मैंने भी कभी नहीं किया था. कभी वेदों को पढ़ने की न कभी इच्छा हुयी, न साहस. वेद का शाब्दिक अर्थ होता है ज्ञान का सन्ग्रह. वेदों का एक-एक वाक्य विश्वबन्धुत्व और लोकमंगल की कामना से ओत-प्रोत है.

वेदों की कुछ सार्वभौमिक और कालातीत शिक्षायें निम्नवत हैं:

1. मनुर्भव : मनुष्य बनो

2. संगच्छध्वं संवदध्वं : साथ चलें, मिलकर बोलें

3. स्वस्ति पन्था मनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव : सूर्य-चन्द्र के सदृश कल्याण मार्ग के पथिक बनें 

4. मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे : सबको परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें 

5. अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयं, परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम् : अट्ठारहों पुराणों में बस दो ही बातें लिखी हैं, परोपकार ही पुण्य है और परपीड़ा ही पाप 

6. मा गृध: कस्य स्विद्धनम : पराये धन का लालच न करो 

7. मा हिंसी: पुरुषान्यशुन्च्श्र : मनुष्य और पशुओं को मन, कर्म और वाणी से किसी प्रकार का कष्ट न दो 

8. ऋतस्य पथा प्रेत : सत्य के मार्ग पर चलो 

9. सर्वे भवन्तु सुखिन: : सभी लोग सुखी हों 

10. तेन त्यक्तेन भुंजीथा : त्याग की भावना का उपयोग करो 

11. पश्येम शरद:, जीवेम शरद: शतं : (यम, नियम, प्राणायाम, आसन का) पालन कर सौ वर्ष तक जीवित रहने का संकल्प 

12. यतोऽन्यदस्तिभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म: : जो सबको सामान रूप से अभ्युदय की ओर ले जाये, सबको कल्याण मार्ग पर ले जाये, वही धर्म है  

13. अहमनृतात्सत्यमुपैमि : मै असत्य (अनाचार) से पृथक रह कर सत्य (सदाचार) की ओर प्रवृत होऊँ

14. तत्कृणमो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्य: : ऐसी प्रार्थना करें जिससे मनुष्यों में परस्पर सुमति और सद्भाव का विस्तार हो  

15.  वसुधैव कुटुम्बकम् : समस्त पृथ्वी ही परिवार है 

वेदों में कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था और आयु के आधार पर आश्रम व्यवस्था का निर्धारण किया गया है. हर देश काल में और आज भी हर काम हर कोई कर सकता है, उसके लिये उतना ही पुरुषार्थ करना होगा. वर्ण व्यवस्था को उत्पति से जोड़ने के कारण देश अनायास निरन्तर बनी रहने वाली जातिगत व्यवस्था से जुड़ गया. समाज में व्याप्त विरोधाभास इसी बात को लेकर है. जन्म नहीं अपितु कर्म द्वारा वर्ण का निर्धारण ही देश और समाज के विकास की दिशा तय करेगा. धर्म ग्रंथों का बिना पढ़े उनका मूल्याङ्कन करना, हमें भारत के उद्दात ज्ञान से वंचित रखे हुये है. डॉ. सिन्हा का हिन्दी भाषा में संस्कृत के क्लिष्ट श्लोकों का भावार्थ निश्चय ही पाठकों को भारतीय वैदिक ज्ञान और संस्कृति के विषय में और अधिक जानने को प्रेरित करेगा.    

-वाणभट्ट 

शनिवार, 1 नवंबर 2025

समृद्धि

बंगले पर गहरा सन्नाटा व्याप्त था. पुरानी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों के बंगले इतने बड़े होते थे, जितने में आज लोग यूनिवर्सिटी खोल के बैठ जाते हैं. बंगले के सामने लॉन और पीछे किचन गार्डेन. एक छोटा-मोटा साम्राज्य समझ लीजिये. जब असिस्टेंट प्रोफेसर पर जॉइनिंग होती है, तब परिवार बड़ा होता है. माता-पिता-बीवी-बच्चे. घर मिलता है टाइप-थ्री. प्रोफ़ेसरी आते-आते घर में दो प्राणी बचते हैं और कमरे पाँच. चूँकि सरकार बंगले को आवश्यकता से अधिक ओहदे से जोड़ के देखती है, इसलिये बड़ा बंगला तब मिलता है जब आवश्यक्तायें सीमित हो जाती हैं. अब जब एक कमरे में दो लोग रहते हों, तो बाकी कमरों में झाड़ू लगवाना भी काम हो जाता है. किचन गार्डेन का भी कोई मतलब नहीं रह जाता. उसे मेन्टेन करने के लिये माली लगाओ, और जब सारी गोभी और मूली एक साथ तैयार होती हैं, तो समस्या ये हो जाती है कि कितनी खाओ, कितनी बाँटो. चूँकि पड़ोसी भी उसी तरह के बंगलों के मालिक होते हैं, तो सबके यहाँ स्थिति एक सी होती है. कौन किसको बाँटे. सारे काम वाले, माली, चौका-बर्तन करने वाली, कुक और ड्राइवर, भी सब्जी खा-खा कर अघा चुके होते हैं. अब प्रोफेसर हो कर यूनिवर्सिटी गेट पर सब्जी का ठेला लगाना शोभा तो देता नहीं, इसलिये जतन से उगायी गयी सब्जियों को तो ख़राब होना ही है. हॉर्टिकल्चर उत्पादन में जो 30 से 40 प्रतिशत नुकसान दर्ज़ किया जाता है, वो 45 से 50 प्रतिशत पहुँच जाये, यदि देश भर के बंगलों में हो रहे हॉर्टिकल्चरल लॉस को भी जोड़ लिया जाये. 

शांति इतनी अधिक थी कि घण्टी बजाने का दिल नहीं कर रहा था. लेकिन गेट खोलने बन्द करने की आवाज़ के बाद भी घर के भीतर कोई हलचल नहीं दिखी. लुधियाना से चंडीगढ़ सिर्फ़ प्रोफेसर साहब से मिलने ही तो आये थे हम. हम यानि डॉक्टर पड्डा और मै. ये प्रोफेसर डॉक्टर पड्डा के मित्र थे. उनसे मिलने के बाद पता चला कि वो उन्हीं की तरह सरदार भी थे. मजबूरी थी. कॉल बेल बजानी ही पड़ गयी. दरवाज़े पर लगी घण्टी (कॉल बेल) दबायी, तो सरकारी आवास पर अमूमन लगने वाली बजर की कर्कश आवाज ने मानो वातावरण में ध्वनि प्रदूषण फैला दिया हो. फ्रैक्शन ऑफ़ सेकेंड में हाथ घण्टी से हट गया. घण्टी बजाने के पाँच मिनट तक भी कोई हलचल नहीं हुयी. ताला दिख नहीं रहा था. हमें शक़ हुआ कि पीछे किचन गार्डेन वाले दरवाज़े पर ताला लगा के तो वो लोग कहीं निकल न गये हों. सन् चौरानबे में मोबाइल गिने-चुने लोगों के पास ही होता था. वैसे उनके कहीं निकलने की गुंजाइश इसलिये नहीं थी कि कुछ दिन पहले ही वो अस्पताल से लौटे थे, हार्ट अटैक से रिकवर हो कर. जिसकी सूचना मिलने के बाद ही पड्डा साहब ने प्रोग्राम बनाया, उनको देखने चलने का. कार जा रही थी, पड्डा साहब को साथ चाहिये था, मेरा परिवार इलाहाबाद गया हुआ था, इसलिये हम भी साथ में चिपक लिये. हमारे पूर्वांचल में हम का मतलब मै ही होता है. 

ट्रेनिंग के बाद मेरी पहली पोस्टिंग लुधियाना में हुयी थी. वहाँ जा कर मुझे एहसास हुआ कि समृद्धि क्या होती है. दुनिया भर में उस समय जितनी कारें होती थीं, सबके शो रूम वहाँ उपलब्ध थे. उनके सारे मॉडल घुमारमंडी की सड़कों पर घूमते देखे जा सकते थे. क्या ली, क्या लिवाइस, क्या लीकूपर, क्या लकोस्ट, सबके एक्सक्लूसिव शो रूम्स मैने पहली बार देखे थे. इलाहाबाद में तो सिविल लाइन्स की बड़ी से बड़ी दुकान पर मेरे साइज़ की तीन जींस निकल आयें तो बड़ी बात थी. वहाँ मिठाइयों की दुकानें भी कार के शो रूम जैसी बड़ी होती थीं. हमने अपने शहर में शराब की दुकानें और पान के खोखे देखे थे. लुधियाना में इसके उलट, दारू के खोखे थे, और ग्रेनाइट टॉप पर चाँदी के वर्क से सजी गिलौरियों और शटर वाली परमानेंट पान की दुकानें थीं. शाम के सात बजे फ़िरोजपुर रोड क्रॉस करने में डर इसलिये लगता था कि लम्बी-लम्बी कारों का काफ़िला थमने का नाम नहीं लेता था और उसे चला रहा चालक किस आसमान पर है, इसका अंदाज़ लगाना कठिन था. वहाँ के गाँवों में भी मकान पक्के हुआ करते थे. खपरैल शब्द उनकी शब्दावली में नहीं था. कुल्हड़ में चाय यूपी के भैये ही पसन्द करते थे, तब भी वहाँ काँच के गिलास प्रचलन में थे. आदमी को उपर से नीचे तक देखिये, तो चश्मे से लेकर जूते तक हर चीज़ ब्रैंडेड. पैसा सिर्फ़ होना ही काफ़ी नहीं था, वो दिखना भी चाहिये. पंजाबी आम तब तक खाता था, जब तक आम सौ रुपये किलो हो, जब बीस रुपया दाम हो जाता था, तो इसलिये आम खाना छोड़ देता कि अब तो भैया भी आम खा रहा होगा. वहाँ आपको इसलिये भी ख़र्च करना पड़ता था कि आपके अगल-बग़ल सब ख़र्च कर रहे हैं. खरबूजे को देख के खरबूजा रंग बदलता है, और मै तो खरबूजों के बीच रह रहा था. पूरी तरह ब्रैंडेड तो नहीं हो पाया लेकिन फिर भी खाने से कम दिखाने पर ख़र्च बढ़ गया.

पाँच मिनट के बाद प्रोफेसर साहब ने दरवाज़ा खोला. साथ में उनकी धर्मपत्नी भी थीं. पाँचवें कमरे से आने में इतना समय तो लग ही सकता था. दोनों ने सहज भाव से मुस्कुराते हुये हम लोगों का स्वागत किया. दोनों दोस्तों ने गर्म जोशी से उर लगाई भुज भेंट किया. माहौल एकदम जीवंत हो गया. हा-हा, हो-हो के कहकहे गूँजने लगे. पड्डा साहब ने याद दिलाया - यार थोड़ा धीरे बोल डॉक्टर ने मना किया होगा. तू चुपचाप बैठ. हम परजाई जी से बात कर लेंगे. अभी-अभी तो तू झटके से निकला है. तू बीमार है और हम तुझे देखने आये हैं, और तू है कि बीमारी को हल्के में ले रहा है. उसी खुशनुमा माहौल में भाभी जी चाय-वाय ले आयीं. प्रोफेसर साहब पूरे मस्ती के मूड में थे. शायद दोनों दोस्त लम्बे अंतराल के बाद मिले हों. यार पड्डे हारी-बीमारी तो आती-जाती रहती है. पर मै ज़्यादा लोड नहीं लेता. डॉक्टर ने तो बहुत कुछ बताया है, ये कर वो ना कर, ये खा वो ना खा. उसने तो देसी घी तक मना कर दिया है. बोल रहा था कि आपने परहेज नहीं किया तो दोबारा अटैक पड़ सकता है. मैंने भी बोल दिया कि भाई, मैंने पूरी ज़िन्दगी घी लगा के रोटी खायी है. चाहे कुछ भी हो जाये, मै बिना देसी घी के रोटी नहीं खा सकता. तेरे को जो भी दवायी देनी हो दे दे, लेकिन मै घी छोड़ने वाला नहीं.

बालकनी में पड़ी रोटी सूख कर पापड़ बन गयी थी. कई दिन बाद मेरा ध्यान उधर गया. पत्नी जी का लुधियाना आगमन कुछ दिन पहले ही हो चुका था. मैंने श्रीमती जी को आवाज़ लगायी - ये क्या रोटी बालकनी में डाल रखी है. उन्होंने बताया कि बची हुयी बासी रोटी कौवों के लिये बालकनी में डाल दी थी. लेकिन लगता है, अभी तक किसी की नज़र नहीं पड़ी. घी-नमक लगा कर तवे पर सिकी बासी रोटी मेरा सुबह का पसंदीदा नाश्ता है. मैंने उन्हें बताया - ये पंजाब के कौवे हैं. ये बिना घी की रोटी नहीं खाने वाले. इस पर घी लगा कर रखा करो. 

पाँच मिनट बाद बालकनी से रोटी नदारद थी. 

समृद्धि कुछ ऐसी ही होनी चाहिये. हमारे आस पास, हमारे अगल-बग़ल, हर तरफ़, और सबकी.

-वाणभट्ट

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

उपनिवेशवाद

हर देश-काल में ताकतवर लोग अपनी बात को ऐसे व्यक्त करते रहे हैं, जैसे वो पत्थर की लकीर हो. समय के साथ नये ताकतवर आते गये और नयी लकीरें खींचते गये. पहले जब आम जनता को नियम-कानून जैसी चीज़ें पता नहीं थी, तो लोग छल-बल से अपनी बात मनवा लेते थे. कुछ देशों में जहाँ अभी भी तानाशाही या फिरकापरस्ती का बोलबाला है, वहाँ जनता को आज के आधुनिक युग में भी चपड़-चूं करने की इजाज़त नहीं है. वैसे देश-काल कोई भी हो पद-बल और उसमें निहित शक्तियाँ आम और अमरुद आदमी को उसी तरह अलग कर देती हैं, जैसे हंस दूध और पानी को.

राजशाही से आजिज़ आ चुकी जनता ने जब राजशाही का विरोध किया तो उन्होंने जनता को प्रजातन्त्र का झुनझुना पकड़ा दिया. ताकि जनता को लगे कि जनता ने अपनी सरकार का गठन अपने लिये, अपने द्वारा कर लिया है. इस व्यवस्था को प्रजातन्त्र की संज्ञा से नवाज़ा गया. उस समय भी राजनीति में जनता की सेवा के निस्वार्थ उद्देश्य से वो ही लोग कूदे जो साधन-सम्पन्न-समृद्ध लोग थे. जहाँ अधिकान्श जनता, दो जून के निवाले के इंतज़ाम में जुटी हो, वहाँ राजनीति भी एक प्रकार की विलासिता ही थी. और विलासिता पर आम आदमी का हक़ किसी ताक़तवर को भला कब, कैसे और क्यों सुहायेगा. सो ताकत का रूप बदला लेकिन सत्ता वहीं रही जहाँ पहले थी. जब जनता को ये एहसास हुआ कि प्रजातन्त्र तो मूलतः संख्या समीकरण है. जिसकी संख्या ज्यादा होगी, वही शासन के शीर्ष पर होगा. शक्ति के इस परिवर्तन-हस्तान्तरण को समाजवाद के रूप में परिभाषित किया गया. ठेठ भाषा में समाजवाद को इस तरह समझ सकते हैं कि पहले जिसकी लाठी (शक्ति-बल) उसकी भैंस होती थी, आज जिसके पास संख्या अधिक हो वो भैंस हाँक ले जायेगा. शक्ति के कई रूप हुआ करते थे, धन-बल-बुद्धि, लेकिन जब से संख्या बल आया बाकि सभी बल ढक्कन हो गये. जिसके पास संख्या है, वो जब चाहे, जहाँ चाहे, जो भी चाहे, अपनी बात मनवा ले. मनवा न भी पाये तो भी इनमें देश के सामान्य जन-जीवन को अस्त-व्यस्त-ठप्प करने की क्षमता तो है ही. इसमें प्रजातन्त्र बेचारा सा मुँह टापता रह जाता है.

संख्या बल की अवधारणा राजनीति तक ही रहती तो भी गनीमत थी. ये अवधारणा महामारी की तरह हर क्षेत्र में फ़ैल गयी. हर क्षेत्र मतलब हर क्षेत्र. विज्ञान जैसे विषयों का इससे अछूता रह पाना असम्भव था. परिभाषा के अनुसार विज्ञान वह विशिष्ट ज्ञान है, जिसके माध्यम से प्राकृतिक घटनाओं का सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है, जिनका अवलोकन, परीक्षण, प्रयोग और तर्क के द्वारा सिद्धान्तों के रूप में प्रतिपादन किया जा सके. यह एक ऐसी विद्या है, जो ब्रह्माण्ड के रहस्यों की व्याख्या करने में सहायता करती है. धरती की समस्त जीवों में सबसे उन्नत प्रजाति, मानव, आरम्भ से ही प्रकृति के रहस्यों को सुलझाने में लग गया. सिर्फ़ धरती पर हो रही प्रक्रियाओं को ही नहीं, मनुष्य ने ब्रह्माण्ड की सभी गतिविधियों, यहाँ तक कि ग्रह-नक्षत्रों-तारों के बारे में ज्ञान अर्जित करने का प्रयास किया. आज भी उसकी जिज्ञासा का अन्त नहीं है. नित नये प्रयोग और शोध हो रहे हैं, नित नयी खोज सामने आ रही है. 

जब तक विज्ञान विषय नहीं बना था, तब तक सारी खोजें मानव मात्र के लिये थीं. तब तक वो साझा ज्ञान था, सबके लिये. पिछला ज्ञान आगे के विज्ञान की आधारशिला बना. भारत में ऋषि परम्परा में ज्ञान-विज्ञान अपने उत्कर्ष पर था. जिसमें व्यक्ति नहीं ज्ञान सर्वोपरि था. इसीलिये हमने नियमों का प्रतिपादन व्यक्ति के नाम से नहीं किया. जब सारी दुनिया संशय में जी रही थी कि धरती चपटी है या चौकोर, हमें धरती का भूगोल मालूम था. जब सेब न्यूटन बाबा के सर पर नहीं गिरा था, हमें गुरु (बृहस्पति) के गुरुत्व का भान था. अणु-परमाणु की परिकल्पना का उद्भव भी 'यथा पिंन्डे तथा ब्रह्मांडे' से हुआ होगा. हमारे ऋषि-मुनि अपने ज्ञान का डंका बजाने में विश्वास नहीं करते थे, इसलिये सबने काम किया और वेदों के रूप में अपनी भाषा संस्कृत में लिपिबद्ध कर के समस्त प्राणी मात्र के उत्थान के लिये बिना किसी कॉपीराईट के उपलब्ध करा दिया. 

आर्थिक रूप से विकसित देश, अपने विचारों और शोध को तत्परता से लिपिबद्ध और प्रकाशित करने का हमेशा से प्रयास करते रहे हैं. भारत अपने कई महापुरुषों को सिर्फ़ इसलिये पहचान पाया क्योंकि उनके कृतित्व विदेशों में लिपिबद्ध हुये, वहाँ उनके कार्यों और विचारों को सराहना मिली. सैकड़ों वर्षों की पराधीनता ने देश की शिक्षा व्यवस्था को इस स्थिति तक समाप्त कर दिया कि हम अपने ही पुरातन ज्ञान-विज्ञान को संशय की दृष्टि से देखते हैं. अपने ही भारतीय विज्ञान पर प्रश्नचिंह खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूकते. न हमें अपने चिकित्सकीय ज्ञान, आयुर्वेद पर गर्व है, न ही हम अपने खगोलीय ज्ञान को प्रमाणिक मानते हैं. कारण मात्र इतना है कि हमारे ऋषि-मनीषियों ने खोज को महत्त्व दिया, अपने नाम या योगदान को रेखांकित करने पर नहीं. उनके लिये विज्ञान सर्व सुलभ ज्ञान था, जिसका उपयोग मानव कल्याण और मानवता के लिये किया जाना था. पश्चिम के वैज्ञानिक अपनी खोज को अपना नाम देने के लोभ से बच नहीं सके.  मुगलों ने भारत की धन-सम्पदा को लूटने का लक्ष्य बनाया तो यूरोप के आक्रान्ताओं ने यहाँ की बौद्धिक सम्पदा को बिना श्रेय दिये चोरी करने में सन्कोच नहीं किया. ये बात ध्यान देने वाली है कि पाश्चात्य जगत में अधिकान्श खोज का अंग्रेजों के भारत आने के बाद सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में होना संयोग मात्र नहीं है.

विज्ञान का आरम्भ सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय से ही हुआ होगा. आवश्यकता अविष्कार की जननी है. लोगों ने आवश्यकता के अनुसार अविष्कार किये होंगे, जिनका उपयोग करने के लिये सर्वसाधारण को शिक्षित किया होगा कि सबका जीवन उन्नत और सुखद हो सके. जीवन के लिये आवश्यक मूलभूत खोजों पर किसी महान वैज्ञानिक का नाम नहीं है. किसने आग खोजी, किसने शिकार के लिये हथियार बनाये, किसने पहिये का अविष्कार किया, किसने खेती को जीवन का आधार बनाया. खेती ने ही आगे चल कर मानव समाज की स्थापना की. किसी भी खोज से किसी का नाम नहीं जुड़ा है. विज्ञान का ज्ञान भले सीमित लोगों के द्वारा विकसित किया गया हो लेकिन उसका लाभ सबके लिये था. तब विज्ञान शौक था, रोजगार नहीं. फिर यूनीवर्सिटीज़ में विज्ञान के अलग-अलग विषय बने. शोध का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और लाभ के लिये होने लगा. जहाँ भी ताकत का प्रवेश होगा, वहाँ राजनीति का आना भी तय है. मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भी अपने सिद्धांतों को प्रतिपादित करने, अपने स्व को प्रोन्नत करने और भिन्न विचारधारा के व्यक्ति को कमतर दिखाने के लिये, संख्या बल की राजनीति का सहारा लिया. समय के साथ विज्ञान में राजनीति का घालमेल बढ़ता गया. दिन प्रति दिन शोध में धन की आवश्यकता बढ़ती गयी. इसके लिये कम्पनी प्रायोजित शोध आरम्भ हो गये. और जो शोध प्रायोजित करेगा तो उसके पीछे उसका अपना कोई न कोई स्वार्थ तो अवश्य सिद्ध हो रहा होगा. कई बार तो लगता है कि समस्याओं को अनायास विस्तारित किया जाता है ताकि वित्तीय प्रावधान को आकृष्ट किया जा सके. एलोपैथी इसका एक सबसे जीवन्त उदाहरण है. दवा कम्पनियाँ विभिन्न बीमारियों को लक्ष्य करके उनके उपचार हेतु दवा या टीकाकरण पर शोध और उनका वृहद् स्तर पर क्लीनिकल परिक्षण करवाती हैं. चूँकि आयुर्वेद और होम्योपैथी, जो सापेक्ष रूप से कम ख़र्चीली चिकित्सा पद्यति है, इसलिये इस में फण्डिंग भी कम है. बीमारियों को जड़ से ठीक करने के इनके बड़े से बड़े दावों की अभी भी पुष्टि नहीं हो पायी है, क्योंकि इस प्रकार के शोध को फण्ड करने में लाभ भी कम है. फण्ड की उपलब्धता प्रतिभाशाली मस्तिष्क को आकृष्ट करती है. जो जितना बड़ा भौकाल बना ले, वो उतना अधिक फण्ड खींच सकता है. यहीं पर वैज्ञानिक का व्यक्तिगत प्रभाव, नेटवर्क और व्यक्तित्व काम आता है. थोड़ी बहुत भी राजनीति कर ली तो मुद्दा देश या विश्वव्यापी बन जाता है. 

शिक्षा और ज्ञान को आर्थिक रूप से लाभ उठाने का विचार पाश्चात्य सभ्यता की देन है. पहले से स्थापित ज्ञान-विज्ञान को अधिसंख्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली, अंग्रेजी भाषा में लिख कर, उन्होंने लगभग प्रत्येक विषय में अपने आप को अग्रणी मान लिया. विश्व के अधिकांश देश उनके उपनिवेश रहे इसलिये उनको दुनिया भर पर अपने विचार थोपने में अधिक प्रयास नहीं करना पड़ा. हमारे वेद-पुराणों को पिछड़ा और अप्रमाणिक सिद्ध करके, उसी ज्ञान पर पश्चिम के वैज्ञानिकों ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर ली. संख्याबल यहाँ भी अपना काम कर गया. आप लाख प्रयास कीजिये, उद्धरण दीजिये, बहुमत से चलने वाली सभ्यतायें, आप को सक्षम और स्वयं को पिछड़ा मानने को तैयार नहीं हैं. और माने भी क्यों जब उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करके, अपने विचारों को हमारी जड़ों में इतना गहरे रोप दिया कि हमारा स्वयं पर से विश्वास डगमगा गया. विश्व के स्वतन्त्र और विकसित देशों, यूरोप, अमेरिका, जापान, चीन आदि ने अपनी भाषा और संस्कृति की गरिमा और प्रतिष्ठा का परित्याग नहीं किया. मुगलों और अंग्रेजों की ग़ुलामी ने हमारे भीतर इतनी गहरी पैठ बना ली कि हम आज भी न अपनी भाषा बना पाये, न अपना विज्ञान. जो अंग्रेजी में पढ़ लिया, उसी को सही और सत्य मान लिया. इस कारण हमारा विज्ञान और चिकित्सा पद्यति पश्चिमोन्मुखी हो कर रह गयी. अपने अत्यन्त उन्नत और विकसित पुरातन ज्ञान को नकार कर हम आज अपनी ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की स्वीकृति के लिये पश्चिम का मुख देख रहे हैं. अपने चिकित्साशास्त्र, आयुर्वेद को कोई बाहर वाला नहीं, अपने ही आधुनिक भारतीय चिकित्सा जगत के लोग चुनौती दे रहे हैं. जबकि वर्तमान में पाश्चात्य जगत, योग और आयुर्वेद के लाभ को समझ रहा है और उसकी ओर झुकाव महसूस कर रहा है. अपनी भाषा में विज्ञान की पुस्तकों का आज भी नितान्त अभाव है. वैज्ञानिक पत्रिकाओं के न होने से हमारे वैज्ञानिक अपने शोध को अंग्रेजी में छापने-छपवाने को विवश हैं. शोध पत्रों का प्रकाशन एक सर्वकालिक लाभप्रद व्यवसाय बन गया है. कोरोना की विश्वव्यापी महामारी के दौरान जब अन्य उत्पादक क्षेत्र भीषण मंदी के शिकार हो गये थे, छापाखाना ही एक ऐसा व्यवसाय था, जो फूला और फला. 

नवोन्मेषी प्रायोगिक समाधान उन्मुख शोध भले समस्या का निवारण करने में सक्षम हों, किन्तु उन्हें उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान नहीं मिलता. आज कल शोध दो धडों में विभक्त दिखायी देता है. अव्यवहारिक, मौलिक शोध और व्यवहारिक, प्रायोगिक शोध. मौलिक शोध जनित शोध पत्रों को उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान मिल जाता है, जबकि प्रायोगिक व्यावहारिक शोध, प्रायः तकनीक के रूप में ही सीमित रह जाते हैं. यद्यपि कि इनका उपयोग समस्या के समाधान के लिये किया जा सकता है किन्तु इनको उच्च रेटिंग के शोध पत्र में परिवर्तित करना दुष्कर कार्य है. हाई रेटिंग के कारण आज मौलिक और व्यवहारिक शोध का अन्तर इतना अधिक हो गया है कि मौलिक शोध के वैज्ञानिक मौलिक शोध को ही विज्ञान मानने की भूल कर बैठते हैं, और व्यवहारिक शोध को हेय दृष्टि से देखते हैं. यही कारण है कि व्यवहारिक शोध करने वाले भी मौलिक शोध करने और उनके प्रकाशन की ओर आकृष्ट हो रहे हैं. मौलिक शोध भी एक चूहा दौड़ सिद्ध होती जा रही है क्योंकि मौलिक शोध के लिये मौलिक सोच का होना अत्यंत आवश्यक है. जबकि अधिकांश मौलिक शोध के लिये हम आज भी पश्चिम देशों के शोध की दिशा का अनुसरण कर रहे हैं. जिन संस्थाओं ने मौलिक और व्यवहारिक शोध का समन्वय कर लिया, वे ऐसी लोकोपयोगी तकनीक विकसित करने में सफल हुये, जिनका आधार मौलिक शोध था.

मौलिक शोध आवश्यक हैं, किन्तु यदि उसकी परिणति प्रायोगिक या व्यवहारिक समाधान में नहीं होती तो उसकी उपयोगिता व्यक्तिगत प्रोन्नति के लिये तो उचित हो सकती है, लेकिन देश-समाज के लिये नहीं. वर्तमान समय में शोध को समावेशी बनाने की आवश्यकता है ताकि वित्तीय प्रावधानों और संसाधनों का लक्ष्य समाधान केन्द्रित हो. अपने मौलिक शोध के स्तर पर हमारा स्वयं का विश्वास आवश्यक है, इसके पुष्टिकरण के लिये हमें विदेशी संस्थाओं की स्वीकृति पर निर्भर न रहना पड़े. जब तक व्यवहारिक विज्ञान की अवहेलना होगी, वैज्ञानिक मौलिक शोध करके आत्मुत्थान का प्रयास करते रहेंगे. इन परिस्थितियों में यदि देश को नवोन्मेषी उन्नत तकनीकों के लिये आयातित तकनीकों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, तो ये अत्यन्त दुःखद होगा. 

जबसे भारत की अधिकांश शोध संस्थाओं ने शोध पत्रों को वैज्ञानिक प्रोन्नति का आधार बना लिया है, वैज्ञानिकगण भी वैश्विक स्तर पर होने वाली समस्याओं पर शोध और शोध पत्र लेखन को वरीयता दे रहे हैं. मौलिक विषयों पर किये शोध पत्रों को उच्च स्तर की शोध पत्रिकाओं में स्थान मिल जाता है. ये पत्र शोध समस्या के सैद्धान्तिक निवारण की ओर इन्गित तो करते हैं, किन्तु प्रायोगिक और प्रयुक्त किये जा सकने व्यवहारिक समाधानों से प्रायः कोसों दूर होते हैं. उच्च स्तर के शोध के लिये, हम मुख्य रूप से आयातित यन्त्रों पर निर्भर रहते हैं. इनकी आवश्यकता मात्र इसलिये होती है कि इन यंत्रों के परिणाम पर सारा विश्व विश्वास करता है और इनमें अधिकांश उपकरण विकसित देशों द्वारा निर्मित किये गये हैं. परिणामस्वरूप वित्तीय प्रावधान का महत्तम भाग, आयातित उपकरणों की खरीद पर व्यय हो जाता है. इस प्रकार विकसित देश हमारे ऊपर न केवल अपने विचार प्रत्यारोपित कर रहे हैं, बल्कि अपने शोध उपकरणों को खरीदने और शोध पत्रिकाओं में लेख छापने के लिये हमें बाध्य कर रहे हैं. 

स्वतन्त्रता के पचहत्तर साल बाद, हम आज भी बौद्धिक परतन्त्रता में जकड़े हुये हैं. समस्यायें क्षेत्रीय हैं, तो उनका समाधान भी यहीं से निकलेगा. 'थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली' का नारा ही काफ़ी नहीं है. धरातल पर इस विचार को लाना होगा. प्रयोगशाला के लिये अपने उपकरणों, अपने रसायनों पर विश्वास, सम्भवतः इस दिशा में पहला कदम हो. हमारे पुरखों ने आत्मानुभूति और गहन अंतदृष्टि से आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों की खोज की वो भी बिना किसी तथाकथित उन्नत यन्त्र-उपकरण के. वे ऐसा इसलिये कर सके क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के लिये उनके पास कोई विदेशी पुस्तक या मानक नहीं थे. आज आवश्यकता है कि भारत के पुरातन ज्ञान-विज्ञान को वैश्विक पटल पर स्वीकार्य बनाने की, उन्हें पुनर्स्थापित करने की. किन्तु इसके लिये आवश्यक है कि भारत का विज्ञान भी उपनिवेशवाद से बाहर निकले. अपने ग्रन्थों में लिखे विज्ञान का पठन-पाठन-अध्ययन, उनका परीक्षण और पुष्टिकरण, अपनी ही भाषा में आज की मुख्य आवश्यकता है. इस विषय में एक विज्ञापन की टैग लाइन ध्यान आ रही है - ये एक दिन में नहीं होगा, लेकिन एक दिन ज़रुर होगा. प्रयास तो कीजिये. 

-वाणभट्ट

सौ सियार और शेर का शिकार

सियारों को अपनी बुद्धि पर बहुत भरोसा था.  चालक वो इतने थे कि कोई शिकार स्वयं न करते. शेर-चीता-बाघ शिकार करते. उनके खाने के बाद जो बच जाता, व...