रविवार, 30 मई 2021

सहानुभूति

उसने जब कमरे में प्रवेश किया तो उसे उम्मीद थी कि वो कुछ सहानुभूति से पेश आयेगा. लेकिन ऐसा कम ही होता है कि जिसकी जब-जहाँ-जिससे आपको उम्मीद हो वो तब मिल जाये जब आप चाहें. डॉक्टर की फ़ीस ज्यादा थी और भीड़ भी उसी हिसाब से कम नहीं थी. यही चलन है कि जो जितना महँगा उतना ही अच्छा मान लिया जाता है. सस्ते डॉक्टर का इलाज सस्ता होता है और मँहगे का मँहगा. डॉक्टर को भी लगता है कि जो मेरी फ़ीस अफ़ोर्ड कर सकता है तो दवाई का खर्च भी निकाल ही लेगा. सभी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. सबको नम्बर अलॉट कर दिये गये थे. कोई आपा-धापी नहीं थी. वेटिंग लाउन्ज सुविधाजनकजनक और वातानुकूलित था. उसे लगा उसने यहाँ आ कर कोई गलती नहीं की बल्कि पहले आ जाता तो जितना दर्द उसने झेला उससे बच जाता.  

लोगों की भीड़ देख कर उसका भरोसा डॉक्टर पर और बढ़ गया. उसका ख़ुद पर भी कॉन्फिडेंस कुछ बढ़ गया कि वो अकेला नहीं है. बहुत हैं उसकी तरह मानसिक बीमारी के शिकार. ये तो भला हो सहयोगियों का जिन्होंने उसे ये राय दी कि परेशान होने से अच्छा है कि एक्सपर्ट एडवाइज़ ले ही लो. ये बात अलग है कि सब उसे पीठ पीछे मेन्टल बुलाने लगे थे. लेकिन उसके पास बुरा मानने की गुंजाईश नहीं थी. हसन साहब की ग़ज़ल में ज़िक्र भी है - उनसे अलग मै रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में.  

आख़िर उसका नंबर भी आ गया. उसके पहले जो पेशेन्ट अन्दर गया था उसकी दबी हुयी सिसकियाँ बन्द दरवाज़े नहीं रोक पाये थे. उसे लगा कि डॉक्टर की आँखों में भी कुछ पानी ज़रूर उतरा होगा. लेकिन जब वो अन्दर पहुँचा तो डॉक्टर निर्विकार सा चेहरा बनाये मेज की दूसरी बैठा था. मानो इसके पहले वाला कोई गीता का ज्ञान बाँट कर गया हो. दूसरों का दुःख - दर्द सुनना उसका पेशा है. वो उसी तरह निर्लिप्त भाव से सबके दुखड़े सुनता जैसे सन्त लोग सांसारिक लोगों के कष्ट. अन्दर ही अन्दर मज़ा लेते रहते हैं कि बेटा हम क्या उल्लू के पट्ठे थे जो माया-मोह का त्याग कर आये. लेकिन यदि महात्मा जी की कुण्डली खंगाली जाये तो बहुत सम्भव है उनके इस वानप्रस्थ के मूल में रेखा-जया-सुषमा छिपी पड़ी हों. 

फ़ीस भले ही ज़्यादा थी लेकिन पेशेन्ट के लिये बमुश्किल  दस से पन्द्रह से मिनट का समय था उसके पास. इसलिये सीधे मुद्दे पर आ गया. क्या परेशानी है। वो तो पहले से ही गुब्बारे सा भरा बैठा था, बस सुई चुभाने की देर थी. अपने अन्दर के झंझावातों को रोक पाना उसके लिये असम्भव सा था. सारा दुःख दर्द उड़ेल कर रख दिया। पता नहीं कितने वर्षों का लावा था जो ज्वालामुखी फटने का इंतज़ार कर रहा था. सारी सीमायें तोड़ कर बह निकला। डॉक्टर पूरे इत्मीनान से उसकी बात या यूँ कहें बकवास को झेलता रहा। उसने भी कोई बात ऐसी नहीं समझी जिसे वो छुपाना चाहता हो। आखिर शहर का सबसे मँहगा मनोरोग चिकित्सक था। जब इतनी फ़ीस ले रहा है तो सुनेगा कैसे नहीं। वो अपने उद्गार एक नोट बुक में लिख कर लाया था। कोई बात छूट नहीं जाये।  डॉक्टर ने शायद पेशेन्ट के ठीक पीछे घडी लगा रखी थी। सुनने का समय 8 से 10 मिनट और सुनाने के लिये 5 से 7 मिनट. हर पेशेन्ट से पहले ही अश्योरेंस सर्टिफिकेट पर साइन करा लिया जाता था कि वो अपनी मर्ज़ी से इस इलाज के लिए यहाँ आया है. उसकी सारी बात रिकॉर्ड की जा सकती है जिसका उपयोग सिर्फ़ और सिर्फ़ शोध के लिये किया जा सकेगा और उसे डॉक्टर और मरीज़ के बीच पूर्णतः गुप्त रखा जायेगा. 

सुनते समय डॉक्टर के चेहरे के हाव-भाव उसी भैंस की तरह लग रहे थे जो बीन बजाते समय पगुराना पसंद करती है. 8 मिनट होते न होते उसने पेन उठा कर उनकी ओर ऐसे देखने लगा कि अब बस भी करो. बिना कुछ बोले उसने पर्चे पर दवाइयां लिखना शुरू कर दिया था. और इन जनाब के दर्द का गुबार कम होने का नाम नहीं ले रहा था. डॉक्टर के पास समय की बाध्यता थी. उसकी बात को काटते हुये बोला - दवाइयां लिख दीं हैं. बाहर मेरा केमिस्ट आपको दवाइयां दे भी देगा और समझा भी देगा कि कब-कब और कैसे खानी है. उसे लगा कि उसकी बात अधूरी रह गयी है. डॉक्टर को क्या? उसकी कौन सी बीवी भागी है. लेकिन पैसा पहले ही जमा हो चुका था. बहस की गुंजाईश नहीं थी. चुपचाप खड़ा हो गया. उसे लगा इतनी बात अगर उसने प्रिया को बोल देती तो शायद ये नौबत न आती.  

शुरुआत शायद किसी बात पर बोल-चाल बन्द होने से हुयी थी. अब तो उसे ये भी याद नहीं कि बात क्या थी. लेकिन लिव इन में 5 साल रहने के बाद 2 साल की शादी बोझ हुयी जा रही थी. आवश्यकताओं और उम्मीदों की कसौटी ज़िन्दगी पर कब हावी हो जाती है, पता भी नहीं चलता. दोनों को लगता वो एक-दूसरे के लिये अपने-अपने कैरियर का त्याग कर रहे हैं. बिना कहे-सुने फ़ासले इस कदर बढ़ गये कि साथ न रहने का निर्णय करने में दोनों को कोई झिझक नहीं हुयी. अब जब अकेला था तो कैरियर का पूरा फैलाव सामने था, लेकिन क्यों और किसके लिये बस ये ही नहीं पता. 

उसकी बेचैनी और परेशानी का सबब सुनने के लिये किसके पास फ़ुर्सत थी. और जॉब के बाद सोचने के लिये उसके पास समय ही समय था. उसे लगता कि कोई चाहिये जो उसकी बात को सुने उसे समझे. वो गलत नहीं था. जितना वो चुप रह कर संयत दिखने की कोशिश करता अन्दर की बेबसी उसे और बेचैन-परेशान कर देती. बहुत दिनों से वो अपने अंदर उठे हुये ग़ुबार को टालता जा रहा था। फिर उसे लगने लगा उसके हाव-भाव से लोग उसके अन्दर झाँक रहे हैं। हर किसी पर उसे शक होता, लगता जैसे सब उसके मन की अन्तर्व्यथा को पढ़ लेते हैं. और मन ही मन उसका उपहास उड़ा रहे हैं. हर कोई उसे अपने विरुद्ध साजिश करता नज़र आता. मनोरोग के बारे में उसने इंटरनेट खंगाल डाला। सारे श्री-श्री लोगों का ज्ञान पढ़ डाला. लेकिन वो जितना ही उसमें अन्दर जाने का प्रयास करता वो ख़ुद को उतना ही अकेला पाता। अपनी महफ़िल लूट लेने की आदत पर कभी उसे गुमान था, अब उसे जी का जंजाल लगने लगीं थीं। पार्टियों में उसने पहले की तरह शामिल होने की कोशिशें ज़रूर कीं, लेकिन मन न लगा. गम कम करने की फिराक़ में उसकी सारी कहानी पीने-पिलाने वाले ग्रूप को पूरी तरह कंठस्थ हो गयी थी. उन्हें ये तक मालूम था कि आउट होने के बाद ये क्या-क्या बकेगा और कब कब इमोशनल हो कर टेसू टपकायेगा. उनका भी मूड ख़राब हो जाता इसलिये वो भी कटने लगे थे. 

कभी वो पूरी तरह आदर्शवादी हुआ करता था. उसे ये नहीं मालूम था कि जिन आदर्शों के पीछे वो सबसे लड़ता फिरता है, वही उसे एक दिन अकेला कर जायेंगे। कुण्ठाओं की शुरुआत तो कहीं बचपन में ही हो गयी थी। पिता जी भ्रष्ट विभाग के ईमानदार अधिकारी थे। उनके अलावा उनके बारे में विभाग का कोई सीनियर या जूनियर अच्छी राय नहीं रखता था। सरकारी आवास में रहने के कारण माता जी को अड़ोस-पड़ोस से उनके ईमानदारी के चोचलों की ख़बर मिलती रहती थी। जो मियाँ-बीवी की दैनिक कलह का कारण बन चुकी थी। उनके नारी स्वभाव को पड़ोसियों की पत्नियों में रौब गाँठने का मौका चाहिये होता था। उन्हें अपने कपड़ों-लत्तों-मेकअप पर शर्म आया करती। बेटे विस्तार को पढाई की पूरी सुविधा थी लेकिन जहाँ माँ-बाप अपने ही प्यार को अँधेरे में टटोल रहे हों वहाँ बच्चे के बारे में कौन सोचता. जिस देश की भाषा में तलाक़ या डाइवोर्स जैसा शब्द ही न हो वहाँ बिना प्यार के विवाह  हो जाना कोई अजूबा नहीं है. प्रेम-विहीन दाम्पत्य में बच्चों की संख्या में वृद्धि हो जाना सहज सी बात लगती है. लेकिन बच्चों में भावनात्मक परिपक्वता का नितांत आभाव होना स्वाभाविक होता है. विस्तार पहला इशू था और चार बच्चों के बाद अंत हुआ इति से.

विस्तार के लिये पढ़ाई के अलावा ज्यादा विकल्प तो थे नहीं. जिन बच्चों के परिवार में माँ-बाप ही आपसी तादात्म्य बनाने में व्यस्त हों वहाँ बच्चों को अपना ख्याल ख़ुद रखने की आदत जल्दी पड़ जाती है. हाँ, जिस पेरेंटल प्यार की बचपन में सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वो उससे वंचित रह जाते हैं. और उसे दूसरों में खोजने की कोशिश करता है. इस प्रक्रिया में वो अपने और अपनों से दूर होता चला जाता है. सही लोग उससे सहानुभूति रखते हैं और गलत लोग उसकी भावुकता का फ़ायदा उठाने से बाज नहीं आते. इतने धोखे और झटके खाने के बाद भी जो नहीं बदली थी वो थी उसकी नये-नये दोस्त बनाने की प्रवृत्ति. पता नहीं कितने दोस्त बने और कितने छूटे. दोस्ती कोई स्थायी थोड़ी न होती. दोस्ती तो अमूमन फटे की यारी होते हैं. साथ पढ़े या साथ काम कर रहे हैं तो कुछ सम्बन्ध को नाम देना पड़ता है. जगह बदली तो दोस्तों का बदल जाना लाज़मी है. रिश्ते चाहे कैसे भी हों, कितनी भी दूर हों, स्थायित्व का आभास तो जरुर देते हैं.

जीवन में जो कुछ अच्छा हुआ वो प्रिया के आने के बाद हुआ था. प्यार की दरकार तो उसे हमेशा से थी. जब प्रिया ने उसे अप्रोच किया तो उसके पास ना करने का कोई कारण नहीं था. दोस्ती कॉलेज के ज़माने से थी और बाकी दोस्त भी कॉमन ही थे इसलिये उन्हें शादी से पहले ही साथ रहने में कोई झिझक रही हो ऐसा नहीं था. यदि पत्नी में वो सारे गुण हों जो दोस्तों को भी पसन्द हों तो कुछ दोस्तियाँ पक्की सी हो जाती हैं. प्रिया को जल्दी ही समझ आ गया कि प्यार विस्तार की सबसे बड़ी ताकत है. वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी थी. किसी भी बात के लिये विस्तार को इशारों पर नचाना उसका पसन्दीदा शगल बन गया. विस्तार भी उसे हर हाल में खुश करने को राजी था. इसलिये दोस्तों द्वारा दिये उपनाम 'जोरू का ग़ुलाम' से भी उसे कोई आपत्ति नहीं थी. न्यूक्लियर फ़ैमिली की ये ख़ासियत होती है कि जब तक साथ हैं तब तक हैं जब भी जरा ग़लतफ़हमी हुयी तो बाक़ी लोग सिर्फ़ घी डालते नज़र आते हैं. इनके यहाँ जब सारी बातें विस्तार को ही माननी थीं तो किसी प्रकार की गड़बड़ी की कोई सम्भावना ही नहीं थी. फ़र्क तब पड़ा जब छोटे भाई-बहनों ने कहना शुरू कर दिया कि बुज़ुर्ग होते माँ-बाप सिर्फ़ हमारी जिम्मेदारी नहीं हैं. तय ये हुआ कि चारों बच्चे तीन-तीन महीने पेरेन्ट्स को अपने पास रखेंगे. विवाह के पश्चात् पहली बार विस्तार को कोई स्टैण्ड लेना पड़ा था. लेकिन प्रिया इसके लिये तैयार नहीं थी. वादे के मुताबिक़ जिस दिन माँ-पिता जी ने घर में कदम रखा प्रिया ने अपना फैसला सुना दिया. विस्तार सहृदय ज़रूर था लेकिन कहीं दिल के कोने में छिपा उसके अन्दर के पुरुष अड़ गया. नतीजा उसकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा भयावह निकला. 

तीन महीने के बाद उसे उम्मीद थी कि सब कुछ वापस नार्मल हो जायेगा. लेकिन नहीं हुआ. कुछ लोगों के लिये प्रेम का अर्थ पूर्ण समर्पण होता है. प्रिया कुछ ऐसी ही थी. अब विस्तार के लिये ख़ुद को सम्हालने की बारी थी. यार-दोस्त उसका गम गलत करने के लिये हर शाम इकठ्ठा हो जाते थे. बहुतों के घर में परिवार के सामने पीने की मनाही थी. उन्हें एक परमानेन्ट अड्डा मिल गया था. जल्दी ही विस्तार को दोस्ती-यारी-प्यार सबके मायने समझ आ गये. जब तक वो झेलता रहा दोस्तियाँ बरकरार रहीं. जिस दिन खुल कर मना किया, दोस्ती के सारे कस्में-वादे हवा हो गये. उसे आज से पहले कभी इतना अकेलापन नहीं लगा था. पहली बार उसने अपने लिये अकेले बोतल खोली थी. जितना वो अपने डिप्रेशन से उबरने की कोशिश करता उतना ही और डूबता जाता. 

कुछ शुभचिंतकों की सलाह पर उसने चिकित्सकीय परामर्श लेने का निर्णय लिया. उसे उम्मीद थी कि अपना हाल-ए-बयाँ करने के बाद उसका दर्द कुछ कम हो जायेगा. लेकिन डॉक्टर का तो ये पेशा है उसे अपनी प्रैक्टिस के छह घंटों में अधिक से अधिक लोगों का दर्द कम करना है. विस्तार की कहानी चाहे कितनी ही दर्द भरी और लम्बी हो, उसके पास बमुश्किल पन्द्रह मिनट ही थे. फिर भी विस्तार को अच्छा लगा कि बहुत दिनों बाद ही सही किसी ने उसको सुना. ये सिलसिला चल निकला. महीने में एक बार वो डॉक्टर के पास आता और अपनी व्यथा कथा बता कर फारिग हो लेता. डॉक्टर भी दवाइयों में थोड़ी बहुत तब्दीली कर अपनी फ़ीस को जस्टिफाई कर देता. 

आज विस्तार कुछ ठान कर आया था. उसने कमरे में घुसते ही डॉक्टर की आँख में अपनी आँख डाल  दी. डॉक्टर साहब 6 - 8 महीने होने को आये आप कर क्या रहे हो. सिर्फ़ मेरी कहानी सुनते हो और इतनी मोटी फ़ीस झाड़ लेते हो. मँहगी मँहगी दवाइयाँ लिख देते हो. ऐसा कब तक चलेगा. डॉक्टर को रीएक्ट न करने की ट्रेनिंग मिली थी. तटस्थ भाव से उसे बोलते हुये देखता रहा. जब विस्तार को लगा कि बहुत बोल चुके तो वो अपने आप चुप हो गया.  

पहली बार डॉक्टर मुस्कुराया होगा. बहुत छोटी सी बात थी तुम्हें अब समझ आयी. जब तुम अपने आप में नहीं थे तुम्हें मेरी और दवाइयों की ज़रूरत थी. ये ज़िन्दगी तुम्हारी है जिसकी बागडोर तुम्हें अपने हाथ में रखनी होगी. नहीं तो सब तुम्हें इधर-उधर घुमाते रहेंगे. मेरा काम ही है दूसरों को उनके पैरों पर खड़ा करना. मुझे तुम्हारी सारी परेशानियों का अंदाज़ है लेकिन मै भी यदि तुमसे सहानुभूति दिखाने लगता तो तुम अपने ही बनाये जाल में उलझ के रह जाते. इन परिस्थितियों में लोग दूसरों से सहानुभूति की आशा पाल लेते हैं. और लोग भी उन्हें दया का पात्र समझ कर कुछ शब्द बोल देते हैं. कभी कभी परेशानियों से उबरने में समय लगता है. कोई परेशानी ज़िन्दगी से बड़ी नहीं है. जीवन में जीवन से बड़ा बस स्वास्थ्य है. कोई किसी के संग नहीं आता-जाता. सब अकेले हैं. जीवन छोड़ते जाओ तो छूटता चला जाता है. जीना है तो छोड़ना कुछ नहीं. सुख और दुःख दोनों जीवन के हिस्से हैं. तुम्हारे हिस्से सिर्फ़ सुख आयेगा ऐसा नहीं है. जीवन जीना है तो उसकी आँख में आँख मिला कर देखना पड़ेगा जैसे आज तुम मेरी ओर देख रहे हो. भागने से काम नहीं चलेगा. जिंदगी बहुत लम्बी है. ज़िन्दगी का नज़रिया बदलना पड़ता है. 

आज के बाद शायद तुम्हें मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी. और पड़ेगी तो बेहिचक चले आना. बस पन्द्रह सौ ही तो कंसल्टेशन फ़ीस है तुम्हारी व्यथा सुनने की. 

- वाणभट्ट