मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

आदर्शवादी

ये तो भला हुआ जो राम जी ने अपने अवतार के लिये त्रेता युग को चुना. तब और अब तक धरा पर भीषण परिवर्तन आ चुका है. मीडिया जजमेंट के दौर में किसी के लिये आदर्शवादी बन जाना तो बहुत आसान है. लेकिन आदर्शवादी बने रहना बहुत मुश्किल है. जिनका आदर्श से कुछ लेना-देना नहीं है, वो हर समय आदर्शवादी पर नज़र रखते हैं. और आप चूके नहीं कि वो मखौल उड़ाना शुरू कर देते हैं. बड़े आदर्शवादी बने फिरते थे. हो गयी ना टांय-टांय फिस्स. इसीलिये ये लोग अपने जीवन आदर्शवाद जैसी किसी बीमारी को पालना पसन्द नहीं करते. देश के हर आदर्शवादी पर हर समय, हर जगह स्पॉट लाईट तनी रहती है. वारदात जंगल में होती है और शाम होते-होते किसी न किसी चैनेल पर एक्सक्लूसिव ख़बर आ जाती है. इसी कारण से मोरों ने जंगलों में नाचना छोड़ दिया है. उनका कहना है कि जंगल में भी प्राइवेसी नाम की कोई चीज़ नहीं रह गयी है. आदर्शवादियों को सबसे अधिक तकलीफ़ तो ख़ुद अपने ही ज़मीर से है, जो मानता है - कोई देखे या न देखे अल्ला देख रहा है. गोया आदर्श न हो गया इकतरफ़ा इश्क़ हो, या तो आपको पता है या आपके अल्ला को. फ़ाकिर साहब ने बजा फ़रमाया है कि-

अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यूँ कर 

दिल ही दुश्मन है मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह  

शिक्षा के साथ रावण कम होने चाहिये थे, लेकिन समाज में रावणों संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी है. समाज में रावण इस कदर बढ़ गये हैं कि एक-दो राम से काम नहीं चलने वाला. आज जब कोई भी ऐसा काम करता है, जैसा किसी शिक्षित व्यक्ति को नहीं करना चाहिये, तो प्रायः अनपढ़ लोग भी कह देते हैं - देखने में तो पढ़े-लिखे लगते हो. जब से शिक्षा ने उद्योग का रूप ले लिया, शिक्षकों की विवशता हो गयी है कि उन्हें स्कूल भी फैक्ट्री की तरह चलाना है. घाटे के लिये तो कोई बिजनेस करता नहीं. बच्चे पढ़ें या न पढ़ें, किसी को फ़ेल नहीं करना है. बच्चों की संख्या कम नहीं होनी चाहिये. पहले आचार-व्यवहार-विचार-संस्कार घर वालों की जिम्मेदारी हुआ करती थी. अब घर वाले ख़ुद इतने बिज़ी हैं, इतने बिज़ी हैं, कि अपने बच्चों के लिये ही समय नहीं है, उनके पास. पूछो तो बिज़ी कहाँ हो तो पता चलेगा, मम्मी-पापा बच्चों को एक सुरक्षित भविष्य देने के लिये वन-टू का फ़ोर करने में व्यस्त हैं. पैसा इतना कि पूरा घर गैजेट्स से भरा पड़ा है पर बच्चों के लिये समय ही नहीं है. फ़ास्ट फ़ूड खा कर पल-बढ़ रहे बच्चे अपने माँ-बाप से तो फ़ास्ट निकलने ही थे. 

स्कूल में गलती से किसी टीचर ने किसी बच्चे को सुधारने का प्रयास शुरू कर दिया, तो अगले ही दिन माँ-बाप आ कर पिल पड़ेंगे कि जिस बच्चे का हम फ़्री डेवलेपमेंट कर रहे हैं, आप उसे टेम करने का प्रयास कर रही या रहे हैं. जब तक बच्चे का उन्मुक्त विकास नहीं होगा, वो अपने और देश के लिये सही-गलत का निर्णय नहीं ले पायेगा. वैसे फ़्री डेवलपमेन्ट के पीछे कोई उनकी रणनीति नहीं है. उन्हें अपनी फ़्रीडम की अधिक चिन्ता है. ताकि बच्चे उन्हें परेशान न करें. पुरानी पीढ़ी के माँ-बाप ने अपने बच्चों को तमीज़-तहज़ीब सिखाने का बीड़ा उठा रखा था. अड़ोसी-पड़ोसियों को भी इस काम का जिम्मा दे रखा था. यदि साहबजादे कुछ गलत करते दिख जायें, तो जैसे आपका बच्चा वैसे मेरा बच्चा. छोड़ियेगा नहीं. मैथ्स और इंग्लिश की टीचर से तो अनुनय-विनय करके आते थे कि बाकी सब्जेक्ट्स में भले फ़ेल हो जाये, आप इसे सिखाने के लिये जितने भेद (साम-दाम-दण्ड) संभव हैं, सब लगा दीजियेगा. अब बेचारी टीचर भी क्या करें. साम-दाम बच्चों पर तो काम करेगा नहीं, इसलिये उन्हें दण्ड भेद लगाना पड़ जाता था. हम लोग भी पास-पड़ोस-घर पर पिट-पिटा के इतने थेंथर हो चुके होते थे कि उठक-बैठक या मुर्गा बन जाने जैसे दण्ड हमारा मनोरंजन बन गये थे. लिहाजा मजबूरन टीचर को डंडा निकालना पड़ जाता. पिटने के बाद भी ये दुविधा रहती कि घर पर टीचर की शिकायत की तो फ़िर तुड़ाई का दूसरा राउंड और चलेगा. स्कूल में तो टीचर को और भी बच्चों को सुधारना होता था, इसलिये एक-दो स्केल मार के छोड़ देतीं थीं. घर पर तो बस हम दो-हमारे दो वाली बात थी. पेरेंट्स भी इतने संस्कारित थे कि बिना गलती के दूसरे को तो पीट नहीं सकते थे. तो साहब, स्कूल की बात स्कूल में ही झाड़ कर हम वापस लौटते थे. तमाम सामाजिक विषमताओं से जूझने के बाद भी आज जो हममें संस्कार जैसी कोई चीज़ लेशमात्र भी बची रह गयी है, तो उसमें हमसे पहले वाली पीढ़ी के माता-पिता-गुरु-सगे-सम्बन्धियों का अमूल्य योगदान है. इन्हीं के कारण हमारी सैंडविच  पीढ़ी दब्बू बन के रह गयी. पहले माँ-बाप से डरती रही इसलिये बच्चों का अतिशय फ़्री डेवलपमेंट कर डाला. अब बच्चों से डरी घूम रही है.   

फ़्री डेवलपमेंट का प्रयोग जो भूतकाल में हो रहा था, उसके नतीजे अब सामने आने लगे हैं. आज का युवा घर-समाज-देश हर तरफ़ से फ़्री है. इतना फ़्री की अपनी फ़्रीडम से अधिक उसे कुछ भी पसन्द नहीं है. घर पर सब सुविधायें उसे तश्तरी में मिली हैं, इसलिये संघर्ष का अर्थ उसे समझ नहीं आता. जो उनको समझाये या उनको ज्ञान देने की कोशिश करे, तो वो क्रान्ति के मूड में आ जाते हैं. इन्कलाब ज़िन्दाबाद. बहुतों को ये भी नहीं मालूम कि इन्कलाब क्या है और ज़िन्दाबाद किस चिड़िया का नाम है. किसी ने बर्गला दिया तो फैशन समझ कर जन्तर-मन्तर पर झड़वाने-फूंकवाने पहुँच जायेंगे. और जरा सी झाड-फूँक हुयी नहीं कि अन्याय और अत्याचार की दुहाई देने लगेंगे. वाटर कैनन के प्रहार में जेन-ज़ी का डान्स देख कर लगता है, इन्हें जुल्म क्या होता है ये सिखाने के लिये स्पेशल स्कूल खोले जायें. सरकार को चाहिये कि हम लोगों की पूरी पीढ़ी को फ़्रीडम फाइटर कोटे में आरक्षण दे दे. बहुत जुल्म सहे हैं हमने, घर के अन्दर भी और बाहर भी.    

जेन-ज़ी की फ़्रीडम की परिभाषा अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को लेकर है. ये बस कम्प्लीट फ़्रीडम चाहते हैं. इतनी फ़्रीडम कि जिम्मेदारी जैसी कोई चीज़ न हो. इतनी फ़्रीडम कि आज का युवा समाज पति या पत्नी बनने की भी जिम्मेदारी लेने से भी इसलिये बचना चाह रहा है कि इसके बाद अपनी आज़ादी तो गयी. जिन विकसित देशों से लिव-इन की अवधारणा ले कर आये हैं, वहाँ लिव-इन भी एक अनुबन्ध की तरह है. उसके अपने नियम-कानून-क़ायदे हैं. उसमें भी सबसे अधिक मूल्य सामाजिक नैतिकता का है. कुछ लिव-इन तो जीवनपर्यन्त चल जाते हैं. यहाँ युवाओं में लिव-इन की स्वीकृति ही ट्रायल के कॉन्सेप्ट से हुयी है. दो-चार साल साथ रह कर देखते हैं कि साथ रह पायेंगे भी या नहीं. जब मेरा-तेरा दोनों का डेवलपमेंट फ़्री वातावरण में हुआ है तो देखना ये होता है कि कौन किसे, कब-तक झेल पाता है. अमूमन जिसके साथ ट्रायल चल रहा हो, उसके साथ शादी की नौबत नहीं आती. यदि शादी की नौबत आ भी जाये तो कच्चों-बच्चों का झंझट क्यों पालना. इस स्तर की आज़ादी हम जैसी बैकवर्ड पीढ़ी की समझ से बाहर है.   

साठ साल की उम्र में केबीसी के माध्यम से ज्ञानार्जन करने का मेरा कोई विशेष प्रयोजन नहीं रहता. लेकिन उसमें आये प्रतिभागियों के बारे में सुनने और जानने की उत्सुकता इस कार्यक्रम को देखने को बाध्य करती है. उस पर बड़े भाई, अमिताभ जी का क्या कहना. सबको इस सहजता से सहज बनाये रखते हैं कि लोग खुलने में देर नहीं लगाते. हम तो यही सोचते रहते हैं कि यदि कभी अमिताभ जी से आमना-सामना हो ही गया, तो फिराक़ साहब की तरह, 'उनको देखें कि उनसे बात करें' वाली स्थिति न आ जाये. केबीसी फॉलो करने के कारण मुझे कुछ-कुछ आभास हो जाता है कि नयी पीढ़ी किधर जा रही है और कहाँ तक सोच सकती है. यदि आपको 'डीआईएनके' के बारे में नहीं पता, तो आपको केबीसी देखने की मुफ़्त सलाह मै बिना माँगे दे देना उचित समझता हूँ. मुझे नहीं मालूम था. एक कन्टेस्टेंट ने इस पर प्रकाश डाला कि इसका मतलब है 'डबल इनकम, नो किड'. 

जब से जेन-ज़ी का प्रोटेस्ट देख रहा हूँ, समझना कठिन नहीं है कि देश को फ़्री डेवलपमेन्ट की कीमत चुकानी पड़ रही है. भारत एक जीवन्त संस्कृति है, इसे आप एक दृष्टि या दृष्टिकोण से नहीं देख सकते. इसके लिये चाहिये विहंगम दृष्टि, जो सब कुछ आत्मसात कर सके, सही को भी और गलत को भी. हमारे ग्रन्थ इस बात के प्रमाण हैं. लेकिन अपनी जड़ों से दूर होती, सिर्फ़ अन्ग्रेज़ी को ही ज्ञान मान लेने वाली पीढ़ी के साथ देर-सवेर ये दिक्कत आनी ही थी. शायद वर्तमान व्यवस्था युवाओं में इन्हीं जीवन मूल्यों का पुन: रोपण करने का प्रयास कर रही है. वर्ना घर में भी यदि कोई जेन-ज़ी हो या अल्फ़ा, बेसिर-पैर की बात करे तो बाप लतिया कर बाहर का रास्ता दिखा दे. 

जब प्रेस और मीडिया उतना सशक्त नहीं था, बहुत लोगों को देश ने महान बना दिया या मान लिया. आज तथाकथित नयी सोच के लोग राम और कृष्ण के अस्तित्व और व्यक्तित्व पर प्रश्न उठाने लगे हैं. देश को अपने आदर्शों, अपने मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है. चीन-जापान-अमरीका-ब्रिटेन या अन्य विकसित देशों ने कभी विदेशी मूल्यों को महिमामंडित करने का प्रयास नहीं किया. वैश्वीकरण के इस युग में जब दुनिया भारत के आदर्शों और जीवन मूल्यों के प्रति सहिष्णु होती जा रही है, हम अपने ही घर में दुविधा पाल कर बैठ गये हैं. इसके पीछे अन्ग्रेज़ी शिक्षा पद्यति ने विशिष्ट भूमिका निभायी है. हमने अन्ग्रेज़ी में लिखी हर बात और शिक्षा को ही पूर्ण सत्य, और अपने ही पुरातन ज्ञान-विज्ञान पर प्रश्नचिन्ह उठाने को विकास मान लिया है. आज का भौतिकतावादी ज्ञान पे-पैकेज में तौला जा रहा है. जबकि शिक्षा का उद्देश्य है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. 

भौतिक विकास के साथ, स्वार्थ, सेवा पर हावी होता चला गया. वर्तमान परिदृश्य के लिये हमारी ही पीढ़ी जिम्मेदार है, जिसे लगता था कि हमें बहुत अंकुश में रखा गया, इसलिये हम बच्चों के लिये फ़्री डेवलपमेंट का वातावरण तैयार करेंगे. लेकिन हम भूल गये - फ़्रीडम इज़ नॉट फ़्री. हर पीढ़ी को अपनी लड़ाई लड़नी होती है. बिना लड़े आज़ादी मिल जाती है, तो लोग उसका मूल्य नहीं समझते. वे अपने देश-समाज और यहाँ तक की अपने माँ-बाप से भी आज़ादी माँगने लगते हैं. एक तरफ़ वो उन देशों से तुलना करते हैं जहाँ आज़ादी है, लेकिन नियम-कानून-कर्तव्यों में लिपटी. ढाई साल के बच्चे को भी पता है कि क्या चीज़ कानूनन गलत है या सही. नियम-तमीज़ का पालन करना उनको घुट्टी में पिलाया जाता है. इसीलिये जब भी कोई विकसित भारत की बात करता है तो सबसे पहले नागरिक और व्यक्तिगत विकास पर बल देना होगा. ढाई साल के बच्चे पर निवेश कीजियेगा, तब ही हम पच्चीस साल बाद विकसित देश बन पायेंगे. लेकिन तब तक बहुत देर हो जायेगी. इसका दूसरा तरीका है पच्चीस से साठ साल के युवाओं (आजकल कोई बुजुर्ग नहीं होता) से लट्ठ ले कर नियम-कानूनों का पालन कराया जाये. उन्हें लगेगा कि उनकी आज़ादी पर हमला है लेकिन लेट देम फ़ील, हाउ आज़ादी वाज़ ऑबटेंड. तब शायद वे समझ पायें, आज़ादी की क़ीमत. ख़ास तौर पर वे लोग जो जन्तर-मन्तर के पीसफुल नियन्त्रण को ही अत्याचार बताने में लगे हैं.  

हम लोगों को बचपन से आज तक, राम और रावण के बेसिक चरित्र के विषय में कोई दुविधा नहीं रही है. राम यानि मर्यादा पुरुषोत्तम, कुछ भी हो जाये, राम गलत हो ही नहीं सकते. यदि कुछ गलत करना भी पड़ा, तो उसके पीछे लक्ष्य धर्म की स्थापना का ही रहा है. आज अन्ग्रेज़ी में हिन्दी पढ़े लोग जब राम और कृष्ण की अवधारणा पर प्रश्न करते हैं तो लगता है, इस पर भी नियम और कानून बनना चाहिये कि आपकी स्वतन्त्रता कहाँ पर समाप्त होती है. बचपन में एक कोट पढ़ा था - योर फ़्रीडम एंड्स वेयर माई नोज़ बिगिन्स. कानून बनाना ही काफ़ी नहीं है, उसका पालन करना और कराना सरकार ही नहीं, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है. तो ले-दे कर बात हम सब पर आती है कि हम जैसा भारत देखना चाहते हैं, उसके लिये हम सबको प्रयास करना होगा. 

आज विजयदशमी है. सब लोग एक-दूसरे को विजयदशमी की शुभकामनायें भेज रहे हैं. उसमें कुछ-कुछ सन्देश रावण के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने से नहीं चूक रहे हैं. वो ये बताते घूम रहे हैं कि समाज में बहुतायत से पाये जाने वाले रावण, आज राम बन कर रावण-दहन करेंगे. रावण को ज्ञानी-ध्यानी बताने का भी प्रयास हो रहा है. नयी सोच, कुछ नया नहीं सोचेगी तो क्या सोचेगी. ये हर उस विचार के विरोध में हैं, जो इन्हें मर्यादा और कर्तव्य का पालन करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास करे. प्रजातन्त्र को भीड़तन्त्र बनाने में राजनीति ने महती भूमिका निभायी है. हाल ही में एक राजनेता के सुपुत्र से मिलने का मौका मिला. उनकी चाल-ढाल और लक्षण अभी से वही थे जो रगड़-घिस के उनके पिता जी के थे. ताक़त की अपनी भाषा, अपना मिजाज़ और अपना रुआब हुआ करता है. इसके बिना इन्हें सारा जग सूना-सूना सा लगता है. मेरे एक बॉस हुआ करते थे. जब तक वो कुर्सी पर रहे, रावण और दुर्योधन को जस्टीफ़ाई किया करते रहे. बताओ कोई किसी की बहन की नाक काट ले या किसी के बाप को ज्येष्ठ पुत्र होने के बाद भी उत्तराधिकार न मिले, तो वो क्या करेगा. कुर्सी से उतरते ही उनके विचारों में अमूल-चूल परिवर्तन आ गया. अब वे गाँधी के आदर्शों की बात करते हैं.

परिवर्तन प्रकृति का नियम है. समाज में आदर्श स्थापित किये जाते हैं ताकि उनका एक सभ्य-सुसंस्कृत समाज का निर्माण हो सके. मीडिया युग में यदि राम और कृष्ण भी पुन: धरा पर अवतरित हो जायें, तो लोग ये कह कर ख़ारिज कर देंगे कि आज के युग में कौन ऐसा व्यक्ति है, जिसने समाज में मूल्यों की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से जन्म लिया है. जीवन के उतरार्द्ध में पहुँचने के बाद एक बात तो स्पष्ट है, दुनिया बदलने के लिये, दुनिया को बदलने की कोई ज़रूरत नहीं है, ज़रुरत है ख़ुद को बदलने की. आप जैसी दुनिया चाहते हैं, वैसी दुनिया अपने साथ ले कर चलिये. आपको देख कर शायद दो-चार लोग भी स्वयं को बदलने का प्रयास करें. जेन-ज़ी के पास आत्ममन्थन का समय नहीं है. अन्ग्रेज़ों से आज़ादी में चार सौ साल लग गये. इन्हें इसी जीवन में अमरीका-इंग्लैण्ड जैसा विकसित देश चाहिये, वो भी अपनी निरन्कुश-बेलगाम आज़ादी के साथ. इन्स्टा और यूट्यूब के माध्यम से देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो कर जो रातों-रात महापुरुष बनने का ख़ुमार तारी है, उससे किसी का भला होने वाला नहीं. न इनका, न देश का. विश्व को अहिन्सा का सन्देश देने वाले देश में, इनको भली भाँति मालूम है कि पिछवाड़े ढंग से लट्ठ तो बजने से रहा. यहाँ बस ईश्वर से सबके लिये सद्बुद्धि की कामना ही की जा सकती है. हमारे कॉलेज की दीवार पर अन्कित अधोलिखित वाक्य आज भी हमारे विवेक को चुनौती देता रहता है.

'शिक्षा मनुष्य की प्रवृत्ति को मुक्त करने के लिये है'.

-वाणभट्ट 

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