शनिवार, 19 सितंबर 2026

जागृत निन्द्रा

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डायलॉग नहीं था. फिर भी इसमें कहीं कुछ तो वजन था, जो ज़ेहन में रह गया. उस समय इसका मतलब समझ नहीं आया था. लगा कुछ बोलना रहा होगा, सो राईटर ने लिख दिया होगा, कलाकार ने बोल दिया होगा. हम भी तब जुम्मा-जुम्मा दस साल के बच्चे हुआ करते थे. अब लगता है कि लेखक ने बड़ी बारीकी से देखा-समझा होगा, स्मगलरों के काम करने के तरीक़े को. ये इतनी सफ़ाई से अपना काम करते हैं कि किसी को कोई शक़-शुबहा न हो. उस फ़िल्म में किसी अंध विद्यालय के बच्चों का उपयोग तस्करी के लिये किया जाता था. शातिर लोग शतरंज की तरह चालें चलते हैं. ग्रूप बना कर जब गलत काम किये जाते हैं तो उसे साजिश की संज्ञा दी जा सकती है. प्रायः जो साजिशें समूह विशेष के लाभ के लिये होती हैं, वे देश और समाज विरोधी भी होती हैं.   

जब अपने चारों ओर आत्मकेंद्रियता से ग्रसित समाज को देखता हूँ, तो समझ आता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ इस कदर हावी है कि लोग बस मै-मेरा-अपना और बहुत हुआ तो मेरे-अपने तक सीमित हो कर रह गये हैं. जब सबको अपनी-अपनी पड़ी है, तो देश-दुनिया की चिन्ता वे करें जिन्हें घर फूँक तमाशा देखने का शौक़ है. बाकी अपन को क्या, जहाँ अपना लाभ वही मेरा रास्ता. एक तरफ़ कुछ अल्पसंख्यक राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ लोग देश के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर करने को उद्दत हैं तो दूसरी तरफ़ बहुसंख्यक कृतघ्न लोगों की कमी नहीं है. ज़िन्दगी का आनंद तो ना-समझ लोगों के पल्ले ही आता है. 'बने रहो लुल्ल, मजा लो फुल्ल'. आज का ब्रह्म वाक्य बन चुका है. ये हमारे डीएनए के भीतर तक पैठ गया है. इसके लिये क्या जेन-एक्स और क्या जेन-ज़ी, कोई अछूता नहीं रहा है. 'समझदार की मौत है' - एक मुहावरा ही बना दिया गया. सामान्यतः हर मुहावरा, हर देश, हर भाषा में अलग-अलग तरीक़े से प्रयोग में आता रहा है. लेकिन समझदार की मौत है के समानान्तर शायद ही कोई मुहावरा अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा में गढ़ा गया होगा. शून्य की खोज की तरह इस मुहावरे की खोज का श्रेय भी हमें ही मिलना चाहिये. इसके पीछे राजनैतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण हो सकते हैं. वर्षों की ग़ुलामी अकारण तो न थी. देशद्रोह के उदाहरणों से भारत का इतिहास भरा पड़ा है. दूसरे देश पर आक्रमण कर लूटने या राज करने का विचार किसी के मन में आना राजनीति है. एक बार लुटने-पिटने के बाद, पुन: लुटने के लिये तत्पर रहना, इतिहास है. और पूरी दुनिया में एक ही देश को इस पुनीत कार्य के लिये चिन्हित कर लेना, भूगोल है. जिसे देखो कहाँ जा रहा है, खोजने या लूटने, तो भारत. अमेरिका दुनिया के नक्शे में कभी न आता, यदि कोलम्बस भारत खोजने न निकलता. भ्रष्टाचार और स्वार्थ में लिप्त वर्तमान ही अतीत का इतिहास है. इतिहास पढ़ने का समय न हो तो वर्तमान को ही इतिहास की दृष्टि से देखिये. सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये चरित्रवान नेतृत्व की ही नहीं कर्तव्यपरायण नागरिकों की भी आवश्कयकता होती है. हर युग को अपना चाणक्य खोजना पड़ता है जो देश में जन-जागरण लाने में सक्षम हो. परन्तु घनानन्द जब बहुतायत में हों तो कितने ही चाणक्य खप जायेंगे देश को सही मार्ग पर लाने में. आज भी अगर आप चारों ओर दृष्टि डालें तो आपको लगेगा कि आप भविष्य के जिस इतिहास में जी रहे हैं, वो किसी भी प्रकार से अपने पूर्ववर्ती इतिहास से भिन्न नहीं है. अन्ग्रेज़ों के शासन काल में देशप्रेम का प्रदर्शन करना कतिपय आसन था. आप शासन का विरोध करते तो क्रांतिकारी घोषित हो जाते. आज जब अपनों पर अपनों का ही राज है तो ये सिद्ध करना कठिन हो जाता है कि कौन देश के लिये समर्पित है कौन नहीं. सक्षम पदों पर बैठे लोग वाह्य रूप से देश के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करने पर विश्वास करते हैं, वो भी साल में दो बार. पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी न आते तो शायद उसकी भी आवश्यकता न पड़ती. कथनी और करनी में अन्तर का भान बाबा कबीर ने चौदहवीं शताब्दी में ही हो गया था. 

कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोई। 

कथनी तज करनी करे, तो विष सों अमृत होई।।

पक्ष और विपक्ष दोनों देश प्रेम से ओत-प्रोत हैं. दोनों ही देश के विकास को ले कर कृत संकल्प हैं. लेकिन चूँकि दोनों धुर विरोधी हैं, इसलिये जब तक वे स्वयं सत्ता में न आ जायें, एक दूसरे का विरोध करते रहेंगे. ग्रेटेस्ट और लार्जेस्ट डेमोक्रेसी का उदाहरण अमेरिका और भारत के संदर्भ में प्रायः दिया जाता है. वहाँ एक तरह से दो पार्टी सिस्टम है. हमारे यहाँ छह हज़ार से अधिक पंजीकृत पार्टियाँ हैं. ये बात अलग है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में एक पक्ष को रोकने के लिये सारा विपक्ष एक हो गया है. इस प्रकार हम भी कह सकते हैं कि हम लार्जेस्ट के साथ-साथ ग्रेटेस्ट डेमोक्रेसी बनने की दिशा में अग्रसर हो चुके हैं. जनता की स्थिति भी कोई कम बुरी नहीं है. पक्ष हो या विपक्ष, जनता आँख मूँद कर अपने-अपने नेता के पीछे चल रही है. जितने सम्प्रदाय, जितनी जातियाँ, उतने नेता, उतनी पार्टियाँ. सत्ता को दिये सुझाव को कई बार राष्ट्र विरोध मान लिया जाता है और सरकार के अच्छे काम में बुराई खोजना विपक्ष का एक मात्र काम बन गया है. सिर्फ़ विरोध के लिये विरोध कहाँ तक उचित है, ये जनता को हर पाँच साल बाद देखना होता है.

कमरे में तीन लोगों ने प्रवेश किया.  दो पुरुष और एक महिला. तीनों एक प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्यालय से पधारे थे. प्रथम पुरुष - सन्युक्त निदेशक, द्वितीय पुरुष - उपनिदेशक और तृतीय महिला - सहायक निदेशक थीं. वे लोग अपने प्रदेश में प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित करवाने के उद्देश्य से हमारे यहाँ आये थे. कृषि से सम्बंधित लोगों के पास कृषि की हर समस्या का वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध है. उन्हें अभियांत्रिकी और अभियन्ताओं की आवश्यकता कम ही पड़ती है. लेकिन यहाँ मामला पूरी तरह से अभियांत्रिकी और प्रसंस्करण से सम्बन्धित था. गनीमत है किसी ने ये नहीं कहा कि हमारे यहाँ कोई अभियन्ता नहीं है. मज़बूरी थी, वे स्टेट गेस्ट थे, तो किसी ने मेरे कमरे का रास्ता बता दिया. उन्हें दरकार थी, प्रसंस्करण सम्बन्धी डीपीआर की. मैंने यथा-ज्ञान, यथा-क्षमता उनकी सहायता करने का प्रयास किया. प्रसंस्करण की विधि और तकनीकों की विस्तार से चर्चा की और डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाने में यथा-सम्भव सहायता की. संयुक्त और उप-निदेशक कृषि स्नातक थे जबकि युवा-महिला देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान से कृषि अभियांत्रिकी में परास्नातक थी. चूँकि ये मुद्दा ही अभियांत्रिकी का था इसलिये सारे के सारे प्रश्न महिला अभियन्ता द्वारा ही पूछे जा रहे थे. दो दिन के पश्चात उसने जो डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की वो निश्चय ही काबिल-ए-तारीफ़ थी.  

दो दिन उनके प्रवास के दौरान उनसे इनफॉर्मल परिचय भी हो चला था. मैंने पूछ ही लिया कि माननीय मंत्री जी ने हर प्रदेश में कृषि अभियान्त्रिकी निदेशालय बनाने के उद्देश्य से एक पत्र सभी प्रदेशों को भेजा है. उस दिशा में आपके प्रदेश ने क्या कोई प्रयास किया है. सीनियर मोस्ट संयुक्त महोदय ने मुस्कुराते हुये कहा कि हमें अभी उसकी आवश्यकता नहीं है. अलग निदेशालय बनाने से क्या लाभ होगा. अभी हम साथ-साथ काम करते हैं. जिन प्रदेशों में अलग कृषि अभियन्त्रण निदेशालय बन गया है, वहाँ यंत्रीकरण का स्तर बढ़ गया है. कृषि उत्पादन मूल्यों में कमी आयी है और सामयिक कृषि प्रबन्धन से उत्पादकता में भी वृद्धि प्राप्त हुयी है. सम्भवतः कृषि अभियन्त्रण की सफलता की पुनरावृत्ति के उद्देश्य से ही मन्त्री महोदय ने प्रत्येक प्रदेश में कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना पर बल दिया हो. 

आज कृषि आधारित हर संगठन-संस्थान में कृषि अभियांत्रिकी की आवश्यकता और महत्ता का तीव्रता से अनुभव किया जा रहा है. किन्तु विभागों में बहुतायत कृषि स्नातकों की संख्या में दो-एक अभियन्ता ही रखे गये हैं. जबकि यह सभी जानते हैं कि कृषि क्षेत्र की अधिकान्श समस्याओं के व्यापक समाधान अभियांत्रिकी के द्वारा ही सम्भव है. खेत तैयार करने से लेकर, फसल तैयार होने तक और उसके बाद उपभोक्ता की थाली तक पहुँचने में फसल को अनेक चरणों से गुजरना होता है. मूल्य श्रृंखला में उत्पादक से अधिक लाभ मूल्य श्रृंखला के अन्य हितधारक ले जाते हैं. मुख्य उत्पादक यानि किसान के लिये खेती कभी-कभी घाटे का सौदा बन जाती है. कृषक की आय मात्र उत्पादन दोगुना करने से दुगनी नहीं होने वाली. बल्कि दोगुने उत्पादन पर उपज का मूल्य आधा होने की सम्भावना अधिक है. ये बात किसान सहित सबकी समझ में आ गयी है. बिना समुचित आय के किसानों को कृषि कार्यों से जोड़े रखना आसान नहीं होगा. सतत कृषक और सतत कृषक परिवार की संकल्पना के बिना, सतत कृषि की परिकल्पना नहीं की जा सकती. 

विभिन्न कमेटियों की संस्तुति में कृषि अभियान्त्रिकी को बढ़ावा देने की बात हो रही है. लेकिन कहीं न कहीं, डर ये भी है कि छद्म आत्मा-परमात्मा टाइप के कार्यों को जो तथाकथित विज्ञान का स्वरुप दिया गया है, वो खंडित न हो जाये. इसी लिये कृषि अभियन्त्रण निदेशालय की स्थापना के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कृषि स्नातक बाहुल्य वाले विभागों ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखायी है. शोध कार्य भी प्रायः समस्याओं का स्थायी निदान करने की दिशा में लगे हुये हैं, वो भी बिना अभियन्त्रण को सम्मिलित किये. ये तो भला हो विश्व के लघु और सीमांत किसानों का, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों का, जिनका उत्पादन और आय बढ़ाने की फ़िक्र में विश्व के सभी ज्ञानी-विज्ञानी लगे हुये हैं. ऐसे भी अनपढ़ लोग हैं, जिन्होंने वर्षा जल को संचित करके भूमि जल का स्तर बढ़ा दिया, वन क्षेत्र में विस्तार कर दिया. मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान में यही अन्तर है. व्यवहारिक ज्ञान के लिये डिग्री-डिप्लोमा नहीं चाहिये. जमीनी हक़ीक़त के लिये विज्ञान को भी यथार्थ के धरातल पर आना ही होगा. समस्या का निर्धारण किसी शोध का पहला चरण है. लेकिन समस्या ये है कि विज्ञान के पास इसके लिये समय नहीं है. जिस लीक पर सब काम कर रहे हैं, सब उसी दिशा में जुट जाते हैं. एक समस्या पर अनेकों लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं. जिस अंधाधुंध गति से अनुसंधान चल रहे हैं, कभी-कभी लगता है, ऐसे विषयों पर श्रम, समय और धन व्यय हो रहा है, जिसकी आवश्यकता ही नहीं है. जिन काल्पनिक समस्याओं के काल्पनिक स्थायी समाधान पर वैश्विक स्तर पर शोध कार्य चल रहे हैं, उनका एकीकृत प्रबन्धन सम्भवतः किफ़ायती विकल्प हो. विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित प्रयोग अधिक प्रभावशाली और विश्वसनीय सिद्ध हुआ है और भविष्य में भी होगा. जहाँ कृषि विज्ञान, कृषि क्षेत्र की समस्त समस्याओं का निराकरण विज्ञान के द्वारा करने के लिये कृतसंकल्प है, वहीं उनका प्रबन्धन, स्थायी समाधान से कहीं अधिक मितव्ययी, आसान और प्रभावी है.    

जिनके ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं, उन्हें व्यक्तिगत हानि-लाभ का बखूबी पता है. वे देश-काल से ऊपर उठ चुके हैं. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद कृषि अभियांत्रिकी के महत्त्व पर बात आरम्भ तो हुयी है लेकिन अभियन्त्रण को बढ़ावा देने के ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं. संस्तुतियों पर ध्यान दिया जाये तो सभी अभियान्त्रिकी की उपयोगिता को रेखांकित तो करते हैं, लेकिन अभियंत्रण विभाग-प्रभाग स्थापित करने की नहीं. हर संस्थान में कृषि के सभी महत्वपूर्ण व गौण विषयों के विभाग मिल जायेंगे, लेकिन संस्तुतियों के बाद भी कृषि अभियन्त्रण विभाग या प्रभाग नहीं मिलेगा. न ही कोई प्रयास कर रहा है कि हर संस्थान में कृषि अभियंत्रण प्रभाग होना चाहिये. कृषि विज्ञान के अन्य सभी विषय अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के बाहर नहीं झाँकते तक नहीं. एक कृषि अभियन्त्रण ही है, जो बीज से लेकर अन्तिम उत्पाद (भोज्य पदार्थ) तक हर चरण के सभी पक्षों से किसी न किसी रूप में सम्बद्ध है. इस बात का संज्ञान कृषि से सम्बद्ध सभी लोगों को है किन्तु विषय विशेषज्ञ अपने विषय की महत्ता से इतने अभिभूत हैं कि वो अन्य विकल्पों और सम्भावनाओं पर विचार नहीं करना चाहते. हर जगह दुनिया तो आँख वाले ही चला रहे हैं और वो चाहते हैं कि बाकी सब उन्हीं के चश्मे से देखें. कृषि क्षेत्र भी इससे इतर नहीं है. कृषि विज्ञान सब कुछ जानते और समझते हुये भी कृषि अभियंत्रण का उपयोग तो करना चाहता है लेकिन उसे विज्ञान की संज्ञा देने को तैयार नहीं है. व्यवहारिक विज्ञान के लिये प्रायः यह कहते सुना जा सकता है, इसमें विज्ञान क्या है. तभी एक निपट अनपढ़ आदिवासी सूखा ग्रस्त क्षेत्र में मात्र गड्ढे खोद कर हरियाली ला कर क्रांति ले लाता है, तो विज्ञान को भी प्रमोशन और शोधपत्रों से आगे निकल कर, समस्या समाधान और आय संवर्धन की दिशा में कार्य करना होगा. आज सबको भली-भाँति मालूम है कि समस्याओं का व्यापक समाधान कृषि अभियंत्रण के बिना नहीं निकलने वाला. लेकिन ज्ञानी-विज्ञानी इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं. धीरे-धीरे सन पचहत्तर में आयी फ़िल्म के डॉयलॉग - 'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी' का मतलब समझ आने लगा है. देर-सबेर कृषि अभियन्त्रिकी निदेशालय हर प्रदेश में स्थापित होगा. पहले ही बहुत विलम्ब हो चुका है. ये पहल जितनी जल्दी हो उतना अच्छा. शुभस्य शीघ्रम.

सोते को जगाने के यत्न किये जा सकते हैं, किन्तु जगे हुये को कौन, कैसे जगाये. योग में जागृत निन्द्रा का प्रावधान है. लेकिन योग व्यक्तिगत अनुभूति है. कृषि समस्याओं का समाधान व प्रबन्धन, विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित उपयोग में निहित है. वैसे भी किसी ने ठीक ही कहा है - साइंस इज़ अबाउट नोइंग, इंजीनियरिंग इज़ अबाउट डूइंग.   

-वाणभट्ट 

रविवार, 6 सितंबर 2026

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत और रामायण जैसे महाग्रंथ तो लगभग प्रत्येक भारतीय के जीवन का हिस्सा हैं. सबने बचपन से इनको सुना और गुना है. भारत में ग्रन्थ और काव्य रचना एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण के साथ की जाती थी. पन्चतंत्र हो या जातक कथायें, सबका उदेश्य था, एक संस्कारित समाज का निर्माण करना. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों के आने के पूर्व का इतिहास, न तो स्वतन्त्रता के पूर्व ढंग से पढाया गया, न ही स्वतन्त्रता के बाद किसी ने उसके पुनरावलोकन की आवश्यकता समझी. इसका परिणाम ये हुआ कि हमें हमारे अराध्य भगवानों के भी धरा पर अवतरण के साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ रही है. आज जब भी कहीं कोई कहानी या कथा लिखी जाती है, तो उस तरह की घटना घटने के बाद ही लिखी जाती है. लेखक अपनी सम्वेदना के अनुरूप कहानी को घटा या बढ़ा के प्रस्तुत करता है. अलग-अलग लेखक, उसी घटना को अपने-अपने नज़रिये से देखते हैं, और अपनी-अपनी कहानी कहते हैं. एक की कहानी में जो व्यक्ति विलेन है, दूसरे की कहानी में वही व्यक्ति हीरो हो सकता है. सब नजरिये का खेल है. ये लेखक के ऊपर निर्भर है कि किसी घटना को वो किस परिपेक्ष्य से देखता है. महाग्रन्थों को जब कोई कोरी कल्पना सिद्ध करने का प्रयास करता है तो उसे ये समझना चाहिये कि कल्पना की भी कोई सीमा है. महाभारत में हज़ारों चरित्र हैं, हर चरित्र की अपनी भूमिका है और हर चरित्र की कोई न कोई अन्तर्कथा है. 

हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐतिहासिक अस्तित्व को लोग सहजता से नकार देते हैं. सम्भवतः यह हिन्दू धर्म की विशेषता है कि ये समय के साथ नवीनता ग्रहण करता गया. इसीलिये इस नित्य नूतन होते धर्म को सनातन भी कहा गया है. बुद्ध-महावीर यदि इतिहास का हिस्सा न होते तो उनके जैसे चरित्र को भी लोग कल्पना ही मानते. जिस देश में कण-कण में भगवान के वास की अवधारणा है, वहाँ उन्हें महापुरुष मान कर नहीं छोड़ दिया गया. हमने उन्हें भगवान माना. जब भी कोई राम और कृष्ण के धरा पर उनके आविर्भाव पर संशय प्रगट करता है, तो हिन्दू ही है, जो उनके विवेक पर प्रश्न नहीं उठाता. धर्म का लक्ष्य एक है, उसे प्राप्त करने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं. धर्म की सीधी-सरल परिभाषा है - धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है. प्रेम-करुणा-दया-सत्य-अहिंसा शाश्वत धर्म हैं, अपरिवर्तनीय. देश-काल-समाज के अनुसार उचित और अनुचित कर्मों की स्वीकार्यता बदल सकती है . एक समाज जिसे धर्म की संज्ञा देता है, दूसरा उसे अधर्म ठहरा सकता है. किन्तु धर्म का मूल नहीं बदलता.

चलिये कुछ देर के लिये मान भी लेते हैं कि भारत किम्वादंतियों का देश रहा है और इतिहास अधिक प्रमाणिक इसलिये नहीं है कि जो भी वाह्य शासक आता है, वो अपने को आपके ऊपर स्थापित करने के लिये आपके मूल्यों, आपकी धरोहर और आपके इतिहास को पहले समाप्त करने का प्रयास करता है. सदियों की दासता के बाद भी हमारे पुरखों ने अपने इतिहास को किम्वदंतियों के रूप में जीवित रखा. इकबाल साहब को कहना ही पड़ गया - कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. आज़ादी के बाद सत्ता भारतीयों के हाथ में आने के बाद भी, यदि उसमें भारतीयता का अभाव रहा, तो उसके पीछे मैकॉले की शिक्षा पद्यति को दोष दे कर हम अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते. अभी हम मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतन्त्र भी न हुये थे कि ग्लोबल इकोनोमी के नाम पर हम स्वयं को विदेशी संस्कृति अपनाने के लिये बाध्य पाते हैं. व्यक्ति हो या देश दुविधा से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता. हम आज भी ये समझने में असमर्थ हैं कि हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा सही है या विदेशी भाषा में पढाया गया ज्ञान. हम पश्चिम का अनुसरण करें या अपनी संस्कृति पर गर्व. हमारे यहाँ खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर ग्रन्थ उपलब्ध रहे हैं. ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों का हमें तब भी ज्ञान था, जब दुनिया को पृथ्वी के गोल और चपटा होने पर संदेह था. गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के सेब गिरने से पहले यहाँ विद्यमान था, इसीलिये सौर्य मंडल के सबसे बड़े ग्रह को गुरु या बृहस्पति कहा गया. ये संयोग मात्र नहीं है कि यूरोप की अधिकान्श खोजें फ़िरंगियों के भारत में पदार्पण के बाद हुयी हैं. अंग्रेजी में ज्ञान-विज्ञान पढ़ने के कारण हमारी सोच सीमित होती गयी. आज हम अपने ही ज्ञान धरोहर को संरक्षित कर पाने में विफल हो रहे हैं. निश्चय ही भौतिकतावादी पश्चिम ने मनुष्य जीवन को सरल और सहज बनाने के लिये विज्ञान के प्रायौगिक उपयोग में सफलता अर्जित की है. किन्तु एकांगी विकास के चरम पर पहुँच कर प्रत्येक मनुष्य को लगता है कि कहीं कुछ कमी है. समग्रता के साथ जीवन जीने के लिये मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता होती है. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. विश्व के महानतम अमीरों में से एक रॉकफ़ेलर (सीनियर) के बारे में कहा जाता है, जब वो अपनी सफलता के शिखर पर थे, उन्हें एक शून्यता बोध ने जकड़ लिया. दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी. तब उनके किसी शुभचिन्तक ने उन्हें दान करने के लिये प्रेरित किया. जिसने उनकी जीवन की दिशा को बदल दिया. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग परोपकार के लिये समर्पित कर दिया. आज भी उनके नाम से अनेक लोक कल्याण की योजनायें चल रही हैं और ज़रूरतमंद योग्य लोगों को लाभान्वित कर रही हैं. 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का वार्षिक आगमन भारतीयों में चेतना का नव-सृजन करने को पर्याप्त है. जहाँ भी, जब भी, कृष्ण का उल्लेख होता है, वहाँ उनके जन्म से लेकर, उनके अन्त तक के समस्त प्रकरण, हम भारतीयों के मानस पटल पर इस प्रकार अन्कित हैं, जैसे हम सभी उन घटनाओं के साक्षी हैं. कैसे कारावास में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया, कैसे कंस वध किया, कैसे महाभारत में भाग लिया और कैसे सब छोड़ कर द्वारिका प्रस्थान कर गये. कृष्ण की बात हो तो गीता और महाभारत का उल्लेख भी आना ही है. एक जीवन किसी मानव कल्पना में इतना विराट हो सकता है, असम्भव लगता है. यदि हमने उन्हें अवतार माना है, तो उसके पीछे उनके चरित्र की विशालता परिलक्षित होती है. निर्लिप्त होकर कर्म करने की अवधारणा प्रतिपादित करना, पश्चिम की भौतिकतावादी संस्कृति में सम्भव नहीं है. यही बात मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सन्दर्भ में भी लागू होती है. भारत के अतिरिक्त और किसी भी देश में इस प्रकार के आदर्शों की कल्पना क्यों नहीं की जा सकी. क्योंकि उनकी धरा पर इतने गौरवशाली, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का आविर्भाव नहीं हुआ. यदि हमारा इतिहास कल्पना मात्र है तो उन्हें किसी ने कल्पना की उड़ान भरने से किसने रोक रखा था. रामायण-महाभारत मात्र कथायें नहीं हैं. धरती पर जिया गया जीवन है. जितने वृहद ये ग्रन्थ हैं, उससे कहीं अधिक विस्तृत इनके पात्र और इनकी अन्तर्कथायें हैं. 

श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित ईश्वर-अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या पढने के बाद यह अनुभूति हुयी कि देश, समाज, परिवार और व्यक्ति के अन्तर में जो द्वन्द घटित हो रहा है, वही महाभारत है, वही महाभारत का लघु संस्करण है. 

धृतराष्ट्र - इन्द्रिय आसक्त, प्रवृत्तियों का दास व्यक्ति दृष्टिहीन से श्रेष्ठ नहीं है. भीष्म - अस्मिता और आत्म गौरव का प्रतीक हैं, जो हस्तिनापुर को पुनर्स्थापित कर पांडवों (अच्छी प्रवृत्ति) और कौरवों (बुरी प्रवृत्ति) को साथ देखना चाहते हैं. द्रोण - हमारी आदतों के वशीभूत हो कर कार्य करने की प्रवृत्ति है. संस्कारवश, सही या गलत करने से पूर्व हम गुरु से पूछते अवश्य हैं किन्तु करते अपनी आदत के अनुरूप ही.  दुर्योधन - मनुष्य की सांसारिक सुख-सुविधाओं को साधिकार प्राप्त कर लेने की भौतिक इच्छा का प्रतीक है. कर्ण - आसक्ति का पर्याय हैं, जो हर उस काम को सही ठहरा सकते हैं, जो उन्हें करना हो. युधिष्ठिर - विवेकवान और शांति का स्वरुप हैं. भीम - शक्ति का प्रतीक हैं. अर्जुन - आत्म नियन्त्रण की शक्ति हैं.  सहदेव - वाह्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण करते हैं. नकुल - नियमित जीवन शैली के महत्त्व दर्शाते हैं. पाँच पांडव, ब्रह्माण्ड के पाँच तत्वों के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अश्वथामा- हमारी सुप्त इच्छाओं के द्योतक हैं. जब तक अन्तिम इच्छा पूर्ण नहीं हो जाती, कोई आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते.     

इन्हें जान कर क्या आपको नहीं लगा कि ये सभी पात्र तो जाने-पहचाने हैं. हमारे ही जीवन के अंश हैं. यानि जो गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था, वो कुरुक्षेत्र कहीं और नहीं है, हमारे भीतर ही है. महाभारत के समस्त पात्र हमारी ही मनोवृत्तियों और प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं. विश्व, देश, समाज और मनुष्य में जो द्वन्द चल रहा है, उसे महाभारत का नाम दिया गया है. हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही है.  गलत-सही का निर्णय करने वाले हम कौन होते हैं. ये समय तय करेगा कौन पांडवों के पक्ष में है, कौन कौरवों के. अभी तो भूमिका निभानी है. भगवान आज भी धरा पर आ जायें तो लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझने की गलती फिर करेंगे. महाभारत का एक भी पात्र, यदि अपनी भूमिका का निर्वहन यथोचित रूप से नहीं करता, तो क्या महाभारत जैसा महाग्रन्थ बन पाता. एक छोटी सी बात की कल्पना कीजिये कि यदि दुर्योधन पाँच गाँव दे देता, अपने पांडु भाइयों को, तो क्या होता. हर पात्र की अपनी भूमिका है, उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिये. धृतराष्ट्र हों या युधिष्ठिर, दुर्योधन हो या अर्जुन, सबको एक विशिष्ट भूमिका मिली है. उसका निर्वहन उनका कर्तव्य है. महाभारत चलता रहता है, हर युग में, हर काल में. कृष्ण आते रहे हैं और आते रहेंगे सदैव, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये. कहीं बाहर नही, हमारे कुरुक्षेत्र में, हमारे अन्तर में.

-वाणभट्ट

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर - श्री कृष्ण प्रेरणा से...🙏🙏🙏

सादर-साभार: ईश्वर-अर्जुन सम्वाद श्रीमद्भग्वद्गीता, योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इण्डिया (अवश्य पढ़ें) 

आदर्शवादी

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