जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत और रामायण जैसे महाग्रंथ तो लगभग प्रत्येक भारतीय के जीवन का हिस्सा हैं. सबने बचपन से इनको सुना और गुना है. भारत में ग्रन्थ और काव्य रचना एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण के साथ की जाती थी. पन्चतंत्र हो या जातक कथायें, सबका उदेश्य था, एक संस्कारित समाज का निर्माण करना. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों के आने के पूर्व का इतिहास, न तो स्वतन्त्रता के पूर्व ढंग से पढाया गया, न ही स्वतन्त्रता के बाद किसी ने उसके पुनरावलोकन की आवश्यकता समझी. इसका परिणाम ये हुआ कि हमें हमारे अराध्य भगवानों के भी धरा पर अवतरण के साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ रही है. आज जब भी कहीं कोई कहानी या कथा लिखी जाती है, तो उस तरह की घटना घटने के बाद ही लिखी जाती है. लेखक अपनी सम्वेदना के अनुरूप कहानी को घटा या बढ़ा के प्रस्तुत करता है. अलग-अलग लेखक, उसी घटना को अपने-अपने नज़रिये से देखते हैं, और अपनी-अपनी कहानी कहते हैं. एक की कहानी में जो व्यक्ति विलेन है, दूसरे की कहानी में वही व्यक्ति हीरो हो सकता है. सब नजरिये का खेल है. ये लेखक के ऊपर निर्भर है कि किसी घटना को वो किस परिपेक्ष्य से देखता है. महाग्रन्थों को जब कोई कोरी कल्पना सिद्ध करने का प्रयास करता है तो उसे ये समझना चाहिये कि कल्पना की भी कोई सीमा है. महाभारत में हज़ारों चरित्र हैं, हर चरित्र की अपनी भूमिका है और हर चरित्र की कोई न कोई अन्तर्कथा है.
हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐतिहासिक अस्तित्व को लोग सहजता से नकार देते हैं. सम्भवतः यह हिन्दू धर्म की विशेषता है कि ये समय के साथ नवीनता ग्रहण करता गया. इसीलिये इस नित्य नूतन होते धर्म को सनातन भी कहा गया है. बुद्ध-महावीर यदि इतिहास का हिस्सा न होते तो उनके जैसे चरित्र को भी लोग कल्पना ही मानते. जिस देश में कण-कण में भगवान के वास की अवधारणा है, वहाँ उन्हें महापुरुष मान कर नहीं छोड़ दिया गया. हमने उन्हें भगवान माना. जब भी कोई राम और कृष्ण के धरा पर उनके आविर्भाव पर संशय प्रगट करता है, तो हिन्दू ही है, जो उनके विवेक पर प्रश्न नहीं उठाता. धर्म का लक्ष्य एक है, उसे प्राप्त करने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं. धर्म की सीधी-सरल परिभाषा है - धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है. प्रेम-करुणा-दया-सत्य-अहिंसा शाश्वत धर्म हैं, अपरिवर्तनीय. देश-काल-समाज के अनुसार उचित और अनुचित कर्मों की स्वीकार्यता बदल सकती है . एक समाज जिसे धर्म की संज्ञा देता है, दूसरा उसे अधर्म ठहरा सकता है. किन्तु धर्म का मूल नहीं बदलता.
चलिये कुछ देर के लिये मान भी लेते हैं कि भारत किम्वादंतियों का देश रहा है और इतिहास अधिक प्रमाणिक इसलिये नहीं है कि जो भी वाह्य शासक आता है, वो अपने को आपके ऊपर स्थापित करने के लिये आपके मूल्यों, आपकी धरोहर और आपके इतिहास को पहले समाप्त करने का प्रयास करता है. सदियों की दासता के बाद भी हमारे पुरखों ने अपने इतिहास को किम्वदंतियों के रूप में जीवित रखा. इकबाल साहब को कहना ही पड़ गया - कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. आज़ादी के बाद सत्ता भारतीयों के हाथ में आने के बाद भी, यदि उसमें भारतीयता का अभाव रहा, तो उसके पीछे मैकॉले की शिक्षा पद्यति को दोष दे कर हम अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते. अभी हम मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतन्त्र भी न हुये थे कि ग्लोबल इकोनोमी के नाम पर हम स्वयं को विदेशी संस्कृति अपनाने के लिये बाध्य पाते हैं. व्यक्ति हो या देश दुविधा से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता. हम आज भी ये समझने में असमर्थ हैं कि हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा सही है या विदेशी भाषा में पढाया गया ज्ञान. हम पश्चिम का अनुसरण करें या अपनी संस्कृति पर गर्व. हमारे यहाँ खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर ग्रन्थ उपलब्ध रहे हैं. ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों का हमें तब भी ज्ञान था, जब दुनिया को पृथ्वी के गोल और चपटा होने पर संदेह था. गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के सेब गिरने से पहले यहाँ विद्यमान था, इसीलिये सौर्य मंडल के सबसे बड़े ग्रह को गुरु या बृहस्पति कहा गया. ये संयोग मात्र नहीं है कि यूरोप की अधिकान्श खोजें फ़िरंगियों के भारत में पदार्पण के बाद हुयी हैं. अंग्रेजी में ज्ञान-विज्ञान पढ़ने के कारण हमारी सोच सीमित होती गयी. आज हम अपने ही ज्ञान धरोहर को संरक्षित कर पाने में विफल हो रहे हैं. निश्चय ही भौतिकतावादी पश्चिम ने मनुष्य जीवन को सरल और सहज बनाने के लिये विज्ञान के प्रायौगिक उपयोग में सफलता अर्जित की है. किन्तु एकांगी विकास के चरम पर पहुँच कर प्रत्येक मनुष्य को लगता है कि कहीं कुछ कमी है. समग्रता के साथ जीवन जीने के लिये मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता होती है. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. विश्व के महानतम अमीरों में से एक रॉकफ़ेलर (सीनियर) के बारे में कहा जाता है, जब वो अपनी सफलता के शिखर पर थे, उन्हें एक शून्यता बोध ने जकड़ लिया. दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी. तब उनके किसी शुभचिन्तक ने उन्हें दान करने के लिये प्रेरित किया. जिसने उनकी जीवन की दिशा को बदल दिया. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग परोपकार के लिये समर्पित कर दिया. आज भी उनके नाम से अनेक लोक कल्याण की योजनायें चल रही हैं और ज़रूरतमंद योग्य लोगों को लाभान्वित कर रही हैं.
श्री कृष्ण जन्माष्टमी का वार्षिक आगमन भारतीयों में चेतना का नव-सृजन करने को पर्याप्त है. जहाँ भी, जब भी, कृष्ण का उल्लेख होता है, वहाँ उनके जन्म से लेकर, उनके अन्त तक के समस्त प्रकरण, हम भारतीयों के मानस पटल पर इस प्रकार अन्कित हैं, जैसे हम सभी उन घटनाओं के साक्षी हैं. कैसे कारावास में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया, कैसे कंस वध किया, कैसे महाभारत में भाग लिया और कैसे सब छोड़ कर द्वारिका प्रस्थान कर गये. कृष्ण की बात हो तो गीता और महाभारत का उल्लेख भी आना ही है. एक जीवन किसी मानव कल्पना में इतना विराट हो सकता है, असम्भव लगता है. यदि हमने उन्हें अवतार माना है, तो उसके पीछे उनके चरित्र की विशालता परिलक्षित होती है. निर्लिप्त होकर कर्म करने की अवधारणा प्रतिपादित करना, पश्चिम की भौतिकतावादी संस्कृति में सम्भव नहीं है. यही बात मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सन्दर्भ में भी लागू होती है. भारत के अतिरिक्त और किसी भी देश में इस प्रकार के आदर्शों की कल्पना क्यों नहीं की जा सकी. क्योंकि उनकी धरा पर इतने गौरवशाली, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का आविर्भाव नहीं हुआ. यदि हमारा इतिहास कल्पना मात्र है तो उन्हें किसी ने कल्पना की उड़ान भरने से किसने रोक रखा था. रामायण-महाभारत मात्र कथायें नहीं हैं. धरती पर जिया गया जीवन है. जितने वृहद ये ग्रन्थ हैं, उससे कहीं अधिक विस्तृत इनके पात्र और इनकी अन्तर्कथायें हैं.
श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित ईश्वर-अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या पढने के बाद यह अनुभूति हुयी कि देश, समाज, परिवार और व्यक्ति के अन्तर में जो द्वन्द घटित हो रहा है, वही महाभारत है, वही महाभारत का लघु संस्करण है.
धृतराष्ट्र - इन्द्रिय आसक्त, प्रवृत्तियों का दास व्यक्ति दृष्टिहीन से श्रेष्ठ नहीं है. भीष्म - अस्मिता और आत्म गौरव का प्रतीक हैं, जो हस्तिनापुर को पुनर्स्थापित कर पांडवों (अच्छी प्रवृत्ति) और कौरवों (बुरी प्रवृत्ति) को साथ देखना चाहते हैं. द्रोण - हमारी आदतों के वशीभूत हो कर कार्य करने की प्रवृत्ति है. संस्कारवश, सही या गलत करने से पूर्व हम गुरु से पूछते अवश्य हैं किन्तु करते अपनी आदत के अनुरूप ही. दुर्योधन - मनुष्य की सांसारिक सुख-सुविधाओं को साधिकार प्राप्त कर लेने की भौतिक इच्छा का प्रतीक है. कर्ण - आसक्ति का पर्याय हैं, जो हर उस काम को सही ठहरा सकते हैं, जो उन्हें करना हो. युधिष्ठिर - विवेकवान और शांति का स्वरुप हैं. भीम - शक्ति का प्रतीक हैं. अर्जुन - आत्म नियन्त्रण की शक्ति हैं. सहदेव - वाह्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण करते हैं. नकुल - नियमित जीवन शैली के महत्त्व दर्शाते हैं. पाँच पांडव, ब्रह्माण्ड के पाँच तत्वों के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अश्वथामा- हमारी सुप्त इच्छाओं के द्योतक हैं. जब तक अन्तिम इच्छा पूर्ण नहीं हो जाती, कोई आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते.
इन्हें जान कर क्या आपको नहीं लगा कि ये सभी पात्र तो जाने-पहचाने हैं. हमारे ही जीवन के अंश हैं. यानि जो गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था, वो कुरुक्षेत्र कहीं और नहीं है, हमारे भीतर ही है. महाभारत के समस्त पात्र हमारी ही मनोवृत्तियों और प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं. विश्व, देश, समाज और मनुष्य में जो द्वन्द चल रहा है, उसे महाभारत का नाम दिया गया है. हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही है. गलत-सही का निर्णय करने वाले हम कौन होते हैं. ये समय तय करेगा कौन पांडवों के पक्ष में है, कौन कौरवों के. अभी तो भूमिका निभानी है. भगवान आज भी धरा पर आ जायें तो लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझने की गलती फिर करेंगे. महाभारत का एक भी पात्र, यदि अपनी भूमिका का निर्वहन यथोचित रूप से नहीं करता, तो क्या महाभारत जैसा महाग्रन्थ बन पाता. एक छोटी सी बात की कल्पना कीजिये कि यदि दुर्योधन पाँच गाँव दे देता, अपने पांडु भाइयों को, तो क्या होता. हर पात्र की अपनी भूमिका है, उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिये. धृतराष्ट्र हों या युधिष्ठिर, दुर्योधन हो या अर्जुन, सबको एक विशिष्ट भूमिका मिली है. उसका निर्वहन उनका कर्तव्य है. महाभारत चलता रहता है, हर युग में, हर काल में. कृष्ण आते रहे हैं और आते रहेंगे सदैव, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये. कहीं बाहर नही, हमारे कुरुक्षेत्र में, हमारे अन्तर में.
-वाणभट्ट
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर - श्री कृष्ण प्रेरणा से...🙏🙏🙏
सादर-साभार: ईश्वर-अर्जुन सम्वाद श्रीमद्भग्वद्गीता, योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इण्डिया (अवश्य पढ़ें)