शनिवार, 16 सितंबर 2023

ऑर्गन डोनेशन

 ऑर्गन डोनेशन

जब ऑर्गन डोनेशन का फॉर्म ऑनलाइन भरा तो सरकार की तरफ़ से एक सर्टिफिकेट मिल गया. उसमें शरीर के सभी अवयव जिनको किसी की मृत्यु के उपरान्त किसी और के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, उनकी लम्बी-चौड़ी फ़ेहरिश्त लगी हुयी थी. ये देख कर मेरा मन-मस्तिष्क गर्व से भर गया. ऐसी फिलिंग आयी जो शायद महर्षि दधीचि को आयी हो जब उन्होंने देवराज इन्द्र को असुरों से लड़ने के लिये वज्र बनाने हेतु अपनी अस्थियों का दान दिया हो. पुराना जमाना होता तो शाम को यार-दोस्तों की महफ़िल में ढिंढोरा पीट देता कि मित्रों आज मैंने एक बहुत ही महान कार्य सम्पन्न किया है. मृत्योपरान्त अपने ऑर्गन्स को दान देने का निर्णय लिया है. लेकिन पुराना जमाना होता तो यार-दोस्त जम के गरियाते, इस बेवकूफ़ी भरे कार्य के लिये. जिस देश में दूसरे को खून का कतरा भी देने में लोग वर्जनाओं का शिकार हो जाते हों, वहाँ शरीर के अवयव को निकालने की कल्पना करना भी असम्भव सा लगता था. यहाँ लेने का रिवाज़ है, देने की बात करो तो इष्ट-मित्र भी कन्नी काट के निकल जाते हैं. किसी को ब्लड न डोनेट करना पड़ जाये, इसके भी सौ बहाने निकाल लेते हैं. रहीम दास जी को इसीलिये लिखना पड़ा होगा कि 'रहिमन विपदा हू भली जो थोड़े दिन होय, हित-अनहित या जगत में जान पडत सब कोय'. इस दोहे से तो यही लगता है हिमोग्लोबिन कम हो जाने के चक्कर में सम्भवतः कवि को खून की आवश्यकता हुयी हो, तब उसका दोस्तों की असलियत से सामना हुआ हो. बाद में चुकन्दर, शलजम और खजूर ही काम आये. 

आजकल जमाना बदल चुका है. यार-दोस्त बचे नहीं. जो बचे हैं वो मिलते नहीं. और यदि आपका मन मिलने के लिए बहुत फ़ड़फ़ड़ा रहा हो, तो जेब ढीली करनी होगी और एक मस्त पार्टी रखनी पड़ेगी. लेकिन पीने-पिलाने के बाद आपके इस महान कृत्य को  सुनने लायक कोई बचेगा या नहीं, इसमें सन्देह है. इन विषम परिस्थितियों में एक सस्ता-सुन्दर-टिकाऊ माध्यम है - सोशल मीडिया. फ्री में चेपो-चिपकाओ और हजार-दो हजार लोगों तक अपनी बात पहुँचाओ. ये 'बिना हर्र फिटकरी के चोखा रंग' मुहावरे का सबसे लेटेस्ट उदाहरण है. जब लोग-बाग़ 'इटिंग मैगी और हगिंग बनाना' टाइप की पोस्ट्स को सार्वजनिक करने में लगे हुये हैं, फिर हमने तो वाकई एक महान कार्य किया है. जिससे और लोग भी प्रेरित हो सकते हैं. इस बात को पूरे भारत को जानना चाहिये. दुर्योग से हमारे व्हाट्सएप्प का स्टेटस मात्र दो-ढाई हज़ार लोगों तक ही उपलब्ध है. कॉन्टैक्ट लिस्ट में बहुत से नाते-रिश्तेदारों को ब्लॉक कर रखा है. और पता नहीं कौन-कौन स्टेटस में झाँक जाता है. इसी तरह फ़ेसबुक पर भी हज़ार लोगों को फ्रेंड बना रखा है. अब हम कोई सेलिब्रिटी तो है नहीं कि बिना रिक्वेस्ट भेजे लाखों लोग फॉलो करने लगें. जिसको फ्रेण्ड बनाना चाहते हैं, वो लोग फ्रेंड रिक्वेस्ट रिजेक्ट कर देते हैं और जो हमसे दोस्ती करना चाहते हैं, उन्हें हम पेन्डिंग लिस्ट में लटकाये हुये हैं. फिर भी ना-ना करते करते लगभग हज़ार लोग फ्रेंड बन चुके हैं. बैंक फ्रॉड के चक्कर में आजकल नयी फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेज रहा हूँ वर्ना बर्थडे विश करने में ही पूरा दिन चला जाये. फ़ेसबुक पर भी कई करीबी नाते-रिश्तेदार-दोस्त लोगों को भी या तो हमने अन्फ्रेंड कर रखा है या उन्होंने मुझको. कुल मिला के स्थिति ये हो रखी है कि - 'मै भी रानी तू भी रानी, कौन भरेगा पानी'. जिस देश में सभी आत्मनिर्भर हो जायें, उस देश का तो भगवान भी क्या भला करेगा. इसलिये थोड़ी बहुत पारस्परिक निर्भरता जरुरी है. किन्तु इस बात का ध्यान तब आता है, जब आदमी अस्पताल की ओर कूच करे या शमशान की ओर. परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. फिर वो कहता घूमता है - जमाना बहुत ख़राब है. लाइफ़ इज़ गिव एंड टेक सिर्फ़ लेते रहने वाले भले ख़ुद को बहुत चालक और अफ़लातून मानते रहें, लेकिन ज़िन्दगी बहुत सीधी और सरल है. दुनियादारी के लिये स्मार्टनेस की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन ज़िन्दगी के लिये नहीं.       

एक बारगी हमें अपने ऊपर बहुत संतोष हुआ कि कम से कम दो-ढाई हज़ार लोगों तक तो ढिंढोरा पीट ही सकते हैं. इतना महान कार्य किया है. कोई न जाने तो क्या फ़ायदा. और हो सकता है मेरा यह कृत्य किसी के लिये प्रेरणा बन जाये और वो इस मिशन में शामिल होना चाहे. इस गरज से सर्टिफिकेट अपने ब्रॉडकास्ट, सभी वाट्सएप्प ग्रूपों, स्टेटस और फ़ेसबुक पर चेप आया. इंसानी फ़ितरत है कि वो अपने हर काम में दूसरों की अप्रूवल या दूसरों से प्रशन्सा खोजता है. ढाई हज़ार में से बमुश्किल ढाई लोगों ने कहा कि भाई बड़ा महान कार्य कर दिया है. कुछ लोगों ने पोस्ट पर ठेंगा, तो कुछ ने हार्ट दिखा कर अपनी अभिव्यक्ति दे डाली. लेकिन क्या मजाल जो किसी ने कहा हो कि आपके इस कृत्य से प्रेरणा पा कर हम भी ऐसा ही करने की सोच रहे हैं. लेने वालों के देश में देने की बात लोगों के गले उतारना थोडा मुश्किल है. श्री लंका जैसे छोटे से देश में नेत्र-दान के लिये एक सोसायटी है, जिसके 450 केन्द्र हैं और 15000 वालेंटियर हैं. श्री लंका दुनिया का सबसे बड़ा कॉर्निया उपलब्ध कराने वाला देश है. लेने वाले देशों में सबसे उपर कौन सा देश हो सकता है? आपका अन्दाज़ एकदम सही है - पाकिस्तान. पहले की सरकारें रेवड़ियाँ बाँटने में विश्वास रखती थीं. सरकार क्या बदली, नयी सरकार आपसे देशप्रेम के नाम पर सब निकलवाने में लगी है. पहले गैस सब्सिडी रखवा ली, मीठी-मीठी बातें करके. फिर ना-ना प्रकार के टैक्स निकलवा रही है. अब ऑर्गन डोनेशन के लिये अपील कर रही है. अभी तो शुरुआत है. लेकिन अगर जनता समय रहते न जगी, तो पक्का है कि ये अध्यादेश ला कर ऑर्गन डोनेशन कम्पलसरी करवा देगी. चूँकि अब मै कसम खा चुका हूँ, तो इसे कम्पलसरी कर देना चाहिये. बाकी लोगों को भी चाहिये कि कम से कम शपथ तो खा ही लें. यदि गवर्नमेन्ट ऑर्गन डोनेशन को लेकर वाकई संजीदा है, तो उसे शपथ लेने वालों को एक इन्क्रीमेंट देने का प्रावधान कर देना चाहिये. यहाँ लोग लेन-देन पर बहुत विश्वास करते हैं. एक इन्क्रीमेंट के चक्कर में बहुत लोग नस बन्द करवाने से भी परहेज नहीं करते. ऐसा जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिये किया जाता है. तब मुझे उम्मीद है कि कम से कम सरकारी नौकर तो ऑर्गन डोनेशन की बात पर ज़रूर गौर करेंगे. 

इन दस-बारह घन्टों में जब सोशल मीडिया पोस्ट का गर्दा सेटेल हो गया तो हम ने अनुभव किया कि बात की बात में बहुत बड़ा बयाना ले लिया. अब  अपने शरीर और उसके अवयवों को सम्हाल के रखना होगा ताकि वो मरणोपरांत किसी के काम आ सकें. अवयव तो वो ही उपयोग में आयेंगे जो स्वस्थ हालातों में होंगे. लीवर-किडनी-हार्ट-लंग्स को मरने तक स्वस्थ बनाये रखना, अब मेरी पर्सनल जिम्मेदारी है. अगर ऐसा कर सका तो ही जीते जी और मर के भी मैं देश की सेवा कर पाऊँगा. अन्यथा इस शपथ का क्या महत्व है. इस शपथ के एनेक्स्चर में एक और शपथ होनी चाहिये कि हम अपने शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिये हर संभव प्रयास करेंगे और शराब-सिगरेट-गुटके जैसे हानिकारक व्यसनों का परित्याग करेंगे. पहली बार मुझे अपने उपर गर्व हुआ. अब तक तो सिर्फ़ अपने और अपने परिवार के लिये जी रहा था. इस छोटी सी शपथ के बाद  लगा कि अब सिर्फ़ अपने लिये नहीं देश के लिये भी जी रहा हूँ. मोटिवेशन में ओत-प्रोत हो कर अर्धान्गिनी जी को आवाज़ दे दी कि शायद आज उसे अपने निकृष्ट से लगने वाले पति पर कुछ गर्व हो सके. उसको मोबाईल पर सर्टिफ़िकेट दिखा दिया और पूछा कि उसका क्या इरादा है. उम्मीद थी कि वो कुछ गौरवान्वित महसूस करेगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उसने हल्के से झिड़कते हुये कहा - आप भी खाली बैठे-बैठे कुछ न कुछ किया करते हैं. मुझे अपने शरीर की दुर्दशा नहीं करानी. सारा का सारा गौरव यकीन मानिये दो मिनट में धुल गया. लेकिन प्रबुद्ध पाठकों को इस बात की ख़ुशी अवश्य होनी चाहिये कि आज की शिक्षित व सुदृढ़  नारी अपने निर्णय स्वयं लेती है. ऐसा नहीं है कि तथाकथित पति-परमेश्वर कुछ भी कह दें तो वो मान ही ले. सबको लगता है कि उन्हें न तो कभी खून की ज़रूरत पड़ेगी, न ही किसी अवयव की. इसलिये क्या लेना और क्या देना. यही सोच कर लोग इस मिशन में जुड़ने से थोडा हिचकिचायेंगे. लेकिन उम्मीद है कि जब यह विचार एक आन्दोलन के रूप में अपने चरम पर आयेगा तो सभी इसमें भागीदार बनना चाहेंगे.       

आदमी क्या है, कुछ नहीं बस अपने विचारों की प्रतिमूर्ति है. जो जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है. अपने अन्दर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार-ईर्ष्या-द्वेष-हिंसा समेटे आदमी अपने को धरती का सबसे श्रेष्ठ प्राणी मानता है. कुछ अच्छाइयाँ, जैसे प्रेम-करुणा-दया-वात्सल्य-दान-धर्म-सहयोग भी इसी मानव जीवन का अभिन्न अंग है. लेकिन प्रायः स्वार्थ और आत्म-केन्द्रित होने की प्रवृत्तियों के कारण बुराइयाँ, अच्छाइयों पर हावी हो जाती हैं. शायद दुनियादारी के लिये आवश्यक समझी जाने वाली चालाकी अंततः सभी सामाजिक व्यवस्थाओं पर भारी पड़ती है. यदि हम अपने अन्तर में निहित अच्छी प्रवित्तियों का निरीक्षण करें तो ज्ञात होगा कि उनकी उत्पत्ति हृदय में होती है. डार्विन के 'सर्वाइवल फॉर द फिटेस्ट' को मूल मन्त्र मानने वाले, 'वीर भोग्या वसुन्धरा' पर विश्वास करते हैं. उनका जीवन सिर्फ़ उन्हीं तक ही सीमित रहता है. बस वन टू का फ़ोर और लाभ-हानि का गणित. मानव जीवन में व्याप्त बुराइयों की जड़ यदि हम खोजने चलेंगे तो वो मस्तिष्क यानि दिमाग़ से उपजी मिलेंगी. यानि कि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके दिल और दिमाग़ के सम्मिश्रण को प्रदर्शित करता है. और यहीं पर आदमी और इंसान का अंतर समझ आता है. दिमाग़ का अत्यधिक उपयोग आपको सफल तो बना सकता है, लेकिन यदि दिल का संतुलन न हो तो, सम्भव है इंसानियत आप से दूर रहना पसन्द करे. मृत्यु केवल शरीर की नहीं होती. जब दिल या दिमाग़ या दोनों फेल हो जाते हैं, तभी मृत्यु होती है. लेकिन मेडिकल रूप से तभी डेथ डिक्लेयर की जाती है जब अन्दर की घृणा-क्रोध-अहंकार जैसी सभी बुराइयाँ निकल जाती हैं. यानी डॉक्टरी रूप से आदमी तभी मृत माना जाता है जब ब्रेन डेथ होती है. सर्टिफ़िकेट से एक बात समझ आयी कि दिमाग, जिस पर हम सबसे ज़्यादा गुमान करते हैं, स्मार्ट और चालाक होने का, जिसके अहं का पोषण करने में पूरा जीवन निकाल देते हैं, न मरने के पहले किसी और के काम आता है, न मरने के बाद. 

दिल ने भले मान लिया कि सिर्फ़ शपथ ले कर हमने कोई बड़ा काम नहीं किया लेकिन दिमाग़ क्रेडिट लेने को बेताब दिख रहा था. उसने तुरन्त घमण्ड में आ कर कबीर की भाषा में कहा - 'हम न मरब मरिहै संसारा', कम से कम अगले चार सौ सालों तक. तब उसे कदाचित भान न रहा हो कि बुराई का अन्त शरीर के साथ ही हो जायेगा. केवल अच्छाईयाँ ही आगे जा सकती हैं. फिर भी दिल अपनी अच्छाई कैसे छोड़ देता. वो घमंडिया दिमाग़ का दिल नहीं तोडना चाहता था, सो बस मुस्करा कर रह गया.

-वाणभट्ट 

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