यमराज सामने खड़ा था। फॉर्मल ड्रेस में नहीं था। भैंसा भी आस-पास नज़र नहीं आ रहा था। हाँ, एक रजिस्टर था हाथ में और उसमें कुछ लिफ़ाफ़े। चित्रगुप्त के हिसाब वाला रजिस्टर लग रहा था। एक लिफ़ाफ़ा उसने हाथ में थमा दिया। लिफ़ाफ़े पर कांफिडेंशियल लिखा था। लिफ़ाफ़ा खोला तो धरती के उस क्षेत्र से मेरा आबोदाना उठ चुका था। चूँकि आत्मा अमर होती है, सो मेरा किसी दूसरे क्षेत्र में पैदा होना लाज़मी था। यहाँ के लिये मै मर चुका था। उस पत्र को पढ़ने के बाद कुछ ऐसा ही एहसास हुआ।
इस धरती पर दो ही सच हैं। एक पैदा होना और दूसरा मर जाना। उसके बीच में जो भी कबड्डी है, वो रंगमंच की कठपुतलियों का लिखा-लिखाया नाटक है। ऐसा कह कर खुद को सांत्वना दी। पर जैसे पैदा होने की वजहें होतीं हैं, वैसे ही मरने की भी कोई न कोई वजह तो होनी ही चाहिये। सही या गलत। आत्मा तो अजर है, अमर है, न ये पानी में भीगती है, न ही इसे सुखाया जा सकता है और न ही जलाया। फिर भला दरवाजे इसे कैसे रोक पाते।
उस कमरे में जश्न का माहौल था। लग्गू और भग्गू बॉस को बधाई देने पहुँचे थे। बॉस आप महान हो। क्या बात है। बॉस क्या तीर मारा है। आपने अन्ना को फ़्रेम कर लिया। ऐसे तो वो हाथ आता न था। आपने ऐसा क्या पासा फेंका जो उसका बोरिया-बिस्तर ही सिमट गया। लग्गू-भग्गू को मालूम है की बॉस से कुछ उगलवाने के लिये इतना चारा तो डालना ही पड़ेगा। बॉस की मूंछें फड़क रहीं थी। वो भी कुछ बताने को उतावला हो रहा था।
गला खखार कर वो गुरु गंभीर आवाज़ बोला - डियर फ्रेंड्स इट वाज़ नॉट पॉसिबिल विथाउट यू पीपल। यू नो, मै तो अपने कमरे से निकलता नहीं। मुग़लिया नवाबों ने जैसे अपनी रियासतें हुक्मरानों के भरोसे छोड़ रक्खीं थीं। मै भी कुर्सी के प्रति आप लोगों की वफ़ादारी देख कर, शासन का पुनीत कार्य आप लोगों के सुपुर्द कर निश्चिन्त हो गया। आप लोगों ने ये भी सिद्ध कर दिया कि अगर इंसान वफ़ादारी दिखाने पर आ जाये तो वो कुत्तों को भी पीछे छोड़ सकता है। ये आप ही थे, जो हमें हर व्यक्ति के बारे में हर समय आगाह करते रहे। कौन मेरा कुर्सी का भक्त है और किस बन्दे ने अभी भी अपना दिमाग़ इस्तेमाल करना बंद नहीं किया। कौन बागवत पर आमादा है। किसे ठिकाने लगाना ज़रूरी है। आई ऐम सो प्राउड ऑफ़ यू गाइज़।
अन्ना को ठिकाने लगाना सिर्फ मेरे बस की बात नहीं थी, अगर दिल्ली साथ नहीं देती। पर दिल्ली को भी उल्लू बनाना भी आसान न था। मेरी इंटिग्रिटी अब तुम लोगों से तो छुपी है नहीं। तुम लोग मेरी महारत फ़र्जी मेडिकल और टीए बिल बनाने के लिए तो जानते ही हो। मैंने अन्ना को फँसाने के लिये भी फ़र्जी केस बना कर दिल्ली भेजा तब उन्हें यकीन हुआ। यही वो मछली है, जो सारे तालाब को ख़राब कर सकती है। सबसे खतरनाक हैं विचार। इसलिये अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर पहले विचार को मारता है। बाकि सब तो ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाता है। ये देश एक अन्ना तो अफोर्ड कर नहीं पा रहा है और जिसे देखो हर कोई अन्ना बना जा रहा है। इसलिये इस अन्ना को ठिकाने लगाना ज़रूरी था। अब हमारे यहाँ कोई दूसरा अन्ना बनने की कोशिश नहीं करेगा। लेट्स सेलिब्रेट। लग्गू तुम फ्रिज से आइस और सोडा निकालो, और भग्गू तुम पेग बनाओ आज जश्न मनाया जाये। तेइस मार्च को ही तो शहीद दिवस मनाया जाता है। आज इसे शहीद कर दिया हमने। उसकी मूँछें ख़ुशी से और भी फड़क उठी थीं।
आत्मा वहाँ से निकली तो लोगों ने रस्ते बदल लिए। मरे हुए के साथ किसी ने देख लिया...तो।
वहाँ से निकल कर आत्मा उन लोगों के पास पहुँची जो कुछ दोस्त और खैरख्वाह टाइप के लोग थे। नौकरी की दोस्ती कोई दाँत काटी दोस्ती तो होती नहीं। बस फटे की यारी समझ लो। किस्मत ने साथ कर दिया तो समय काटने की ग़रज़ से दोस्ती कर ली। कुछ कॉमन फ़ायदे हैं, जो समाज में मिलने-जुलने से मिल जाते हैं, वर्ना दोस्ती निभाने के लिये दोस्ती थोड़ी न होती है, नौकरी में। एक दुखी था। बोला - कितना समझाया भाई भगत सिंह दूसरे के घर ही अच्छे। पर उसे तो शहीद होने का शौक चर्राया था। अब हो गया न शहीद। दूसरा बोला - भाई इतने लोग नौकरी कर रहे हैं क्या उन्हें नहीं मालूम सही-गलत। नौकरी तो नौकरी है। दिल-दिमाग़ घर छोड़ के आओ, बस हाँ में हाँ ही तो मिलानी है बॉस की। तीसरा बोला भ्रष्ट सिस्टम में रह कर, उसे ही भ्रष्ट कहना कहाँ की समझदारी है। हम भी तो बीवी-बच्चे पाल रहे हैं। नौकरी में और क्या कर सकते हो। मरने दो साले को अन्ना बनने चला था।
घर पर बीवी-बच्चे भी दुखी से लग रहे थे। स्वाभाविक है। बाप के कहीं और जीने का क्या मतलब जब वो साथ न हो। सुख-दुःख न बाँट पाये। अगर अन्ना ही बनना था, तो परिवार बनाने की क्या ज़रूरत थी। अकेले रहते फिर जो मर्जी करते। वृद्ध पिता जी की स्थिति 'नमक के दरोगा' के वंशीधर के पिता सरीखी हो रक्खी थी। जो बेटे को हमेशा नसीहत देते आये कि बेटा मेरी तो ईमानदारी से कट गयी पर तब ज़माना दूसरा था। बेईमान लोग भी ईमानदार की कद्र करते थे। पर अब वो बात नहीं रही। लोग ईमानदार की परछाईं से भी परहेज करते हैं। देश-समाज में रहना है तो उसके ही चाल-चलन निभाने पडेंगे। पर माँ तो आखिर माँ ही होती है। वो बोल तो नहीं रही थी, पर रब का शुकराना कर रही थी। वाहेगुरु तू जो भी करता है, भला ही करता है। लाखों में एक है मेरा बेटा। दिल का सच्चा और नेक। मेरे बेटे को बुरे लोग, बुरी नज़र से बचाना। तूने उसे बलाओं से दूर कर दिया, तेरा बहुत-बहुत शुक्रिया।
माँ को शायद ये नहीं पता उसने भगत पैदा किया है, जिसे पडोसी के घर पैदा होना था। वो भोली है और ये भूल चुकी है कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं, चाहे कहीं चले जायें।
उसकी हालत बकरे की खैर मनाती माँ से बेहतर मुझे तो नहीं लगती।
-वाणभट्ट