रविवार, 30 अगस्त 2026

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है. पुरानी कहावत है - हेल्थ इज़ लॉस्ट देन एवरीथिंग इज लॉस्ट. बुजुर्गों की बातें लोग बिना अनुभव किये मान लेते तो बहुत सम्भव है कि नयी आती पीढ़ियों के साथ गलतियाँ कम होती जातीं. कम से कम रिपीट तो न होतीं. लेकिन वो युवा ही क्या जो बाप की बात बिना अनुभव किये मान ले. सौ साल का जीवन है और सब आप अपने पूर्ववर्तियों के हिसाब से करते चले गये तो आपके पास इतना समय बच जायेगा कि काटे नहीं कटेगा. इसलिये अपने बाप-दादाओं को गलत सिद्ध करने के लिये, सबसे पहले तो उनकी बात मानना बन्द कर दीजिये. फिर ऐसे-ऐसे काम (प्रयोग) कीजिये कि बाप कहे बेटवा आउट ऑफ़ कन्ट्रोल हो गया है. पहले जब दो-चार बच्चे होते थे तो एकौ उधरा जाये तो बाप लट्ठ ले के सुधार दे, अब जब एक-दो ही पैदा हो रहे हैं, तो बाप किसे समझाये, किसे दौड़ाये. मन-मसोस के बोलता है - बेटा कर लो जो तुम्हें करना है. पचपन-साठ पार करते-करते जब शरीर और हौसले दोनों पस्त होने लगते हैं, तब वही बेटा बोलता है - माई डैड वाज़ राईट. लेकिन यदि वो बाप की बात मान लेता तो, सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो जीवन भर करता क्या. ये भी सच है कि ये दुनिया जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ही गयी है, वो आगे न जा पाती यदि नयी पीढ़ी उन्हीं की लकीर पीटती चलती. दुनिया की वर्तमान तरक्की नयी पीढ़ी की क्रान्तिकारी और विद्रोही, सब कुछ बदल डालने की प्रकृति के कारण ही संभव हुयी है. जो समाज से हट कर नया सोचने-समझने-करने की हिम्मत रखते थे, उन्हों ने ही दुनिया बदली. बाकी तो ढर्रे पर चलते चलने को ही जीवन समझ बैठे. 

भौतिकतावादी समाज की मज़बूरी है कि वो सफलता-असफलता को भौतिक प्रगति के आधार पार आँकता है. बंगले-गाड़ी-मोटर. स्टेटस के जितने सिम्बल हैं, उनके पीछे आदमी भागते-भागते उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच जाता है जब कहता है - ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा तो वो-वो चीज़ें जो बचपन से अब तक फ़्री मिला करती थीं और मिला करती हैं. माया की चाल ही यही है, पहले खूब नचाती है, फ़िर बताती है कि हम ही हैं महाठगनी. मेरे चक्कर में न पड़ते तो बेहतर रहता. जिन्हें जितनी जल्दी इस सत्य भान हो गया, वो माया-मोह के बंधन से मुक्त हो गये. पता नहीं आदमी को ये बीमारी क्यों है कि उसे लगता है कि जिस चीज़ में उसे आनन्द आ रहा है, उसे दूसरों को भी बताया-सिखाया जाये. उन्हें लगता है कि जो अनुभव उन्हें हो गया है उसका लाभ ले कर और लोग माया के चक्कर में न पड़ें. लेकिन लोग तो धरा पर भाँति-भाँति के अनुभव करने ही तो आये हैं. यदि दूसरों के कहने पर चलते रहे और आत्मानुभूति न की तो लौट कर भगवान को क्या जवाब देंगे. धरती पर आने के बाद तो भगवान भी माया के चन्गुल से नहीं बच सके, तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या है. कितने ही साधू-सन्त आये जिन्हें असार जीवन का सार मिल गया था. वो झोला-झन्डा लेकर निकल लिये दुनिया में अलख जगाने. लेकिन हर किसी को वो अपनी बात समझाने में सफल न हो सके. करोड़ों के देश में अगर हज़ार-पाँच सौ ने भी आपने पकड़ लिया तो स्वरोजगार का ये समय सिद्ध मॉडल सर्वोत्कृष्ट है. लाख दो लाख ने फौलो कर लिया तो धन्धा चल निकला समझो.    

कुछ नया करने और करते रहने की जुगत हर जगह हर तरफ़ जारी है. लेकिन क्रांति वहीं होती है जब आपके विचार इतने अधिक लोगों तक पहुँच जाये कि वो लोगों को अपना विचार लगने लगे. फिर आपका काम ख़त्म. बाकी लोग आपके विचार को सर-माथे पर ढोने लगेंगे. आप भीड़ को एक दिशा दिखा कर छोड़ दीजिये. बाकी काम भीड़ अपने आप करने लग पड़ेगी. आप पतली गली देखिये, और धीरे से निकल लीजिये. फ़सलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन बढ़ाने का विचार एक क्रांति की तरह उछाला गया, और भाई लोग तो तैयार बैठे ही थे कैच करने के लिये. नतीजा हर कोई लग गया इस दिशा में. फ़सल में ये तत्व पहुँचगे कैसे इसका विज्ञान बहुत पेचीदा हो सकता है लेकिन इसकी तकनीक शायद आसानी से समझ आ जाये. हर फ़सल में पोषक तत्वों की नियत मात्रा और क्षमता है. शायद इसीलिये दुनिया के हर देश में संतुलित भोजन की महत्ता पर बल दिया गया है. थाली विशेष रूप से भारतीय थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-सलाद-रायता-पापड़-अंचार का समावेश किया गया होगा. हमारे यहाँ तो पथ्य और अपथ्य दोनों को परिभाषित किया गया है कि कब क्या-क्या खाना है और कब क्या नहीं खाना है. शरीर की प्रकृति और प्रकार के अनुसार ही वैद्य भोजन का निर्धारण करते थे. जो पदार्थ एक व्यक्ति के लिये अमृत हो सकता है, दूसरे के लिये विष भी बन सकता है. 

जब से विज्ञान नौकरी बना है, लोगों को कुछ न कुछ भी करते रहना है और उसे छापते रहना है, मज़बूरी बन गया है. ताकि समय आधारित प्रमोशन निर्धारित समय सीमा पर बिना किसी दिक़्क़त के होता रहे. इसके लिये उपर वालों की मेहरबानी भी बहुत जरूरी है. क्योंकि महान लोग जिस पथ से गये हैं, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करते रहना शायद आसान और सुरक्षित मार्ग है. लकीर पीटने का लाभ ये है कि विज्ञान के पीर और फ़कीर आपके काम को अपने काम का विस्तार मान कर आनन्दित होते रहें. नया सोचने-समझने की तथा दूसरों को समझाने की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद प्राय: समाप्ति की कगार पर होती है. उस पर कोई नया विचार भी आ जाये तो अपने पुरातन विचारों और कर्मों को सही सिद्ध करने के लिये ये नये विचारों के औचित्य पर सवाल खड़े करने से नहीं चूकते. ऐसा ही हुआ जब किसी ने गेहूँ, धान और दालों में पोषक तत्वों को फ़सल सुधार से बढ़ाने के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये. इन तत्वों को मृदा में डाला जाता है ताकि पौधे की जड़ें मृदा से इन तत्वों का अवशोषण व स्थानान्तरण कर इन्हें फसलों के बीजों में भण्डारित कर सकें. विभिन्न प्रजातियों में पोषक तत्वों के अवशोषण की क्षमता भिन्न हो सकती है. 

जब कुछ प्रभावशाली लोग एक दिशा में कार्य आरम्भ कर देते हैं, तो वे आगे की दिशा भी निर्धारित कर देते हैं. स्थापित विषयों पर काम करना अधिकांश विज्ञानियों के लिये आसान होता है. नये काम और विचारों के लिये आपको उनका ही समर्थन चाहिये होता है, जो इस क्षेत्र अपने बरसों खपा चुके हैं. भीड़ भी भेंड़ चाल में उसी मार्ग का अनुसरण करने लगती है, प्राय: बिना सोचे-समझे. सस्य क्रियाओं और फ़सल सुधार के द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ने के प्रयास वैश्विक स्तर पर वृहद् रूप से चल रहे हैं. कोई भी फ़सल इन प्रयासों से अछूती नहीं रह सकी है. इस पद्यति को बायो-फोर्टीफिकेशन (जैव सम्वर्धन) की संज्ञा दी गयी. इस प्रक्रिया की विशेषता ये थी कि लौह, जस्ता, प्रोटीन व अन्य पोषक तत्वों की  मात्रा की माप बीज स्तर पर की जाती है. जबकि अन्न को उत्पादन से लेकर थाली में भोजन के रूप में पहुँचने की यात्रा में अनेकानेक प्रसंस्करण व पाक क्रियाओं से हो कर गुजरना होता है. इसलिये ये अत्यावश्यक है कि अनाज के स्तर पर ही नहीं,प्रसंस्करण और व्यंजन बनने के बाद इन पोषक तत्वों का आँकलन किया जाये. बहुत सम्भव है कि छिलका उतारने, उबालने और खाना बनाने की प्रक्रिया में पोषक तत्वों में क्षति होती हो. अनाज में कुछ पोषण विरोधी पदार्थ भी प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं, जो इन पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं. पाक विधियों के मध्य इन तत्वों के लीच कर जाने की भी सम्भावना रहती है. 

पोषण बढ़ाने के लिये खाना पकाने के दौरान या खाना बन जाने के बाद पोषक तत्वों को बिना किसी हानि के सहजता से भोजन में मिलाया जा सकता है. पकाने के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में कुछ ह्रास अवश्य सम्भव है.  भोजन का पोषण सम्वर्धन अन्न के पोषण सम्वर्धन से आसान और कम लागत की प्रक्रिया है. आयरन, जिन्क, प्रोटीन आदि तत्व आज प्रीमिक्स के रूप में उपलब्ध हैं. जिन्हें आटा, चावल, दाल, नमक में मिलाया जा सकता है. पोषक तत्व, खाद्य मैट्रिक्स में आसानी से घुल कर पूरे भोजन में फैल जाते हैं. अधिक तापमान पर तत्वों में आंशिक हानि सम्भव है. लेकिन तापरोधी यौगिकों के उपयोग से इस समस्या से भी बचा जा सकता है. पोस्ट-प्रोसेसिंग फोर्टीफिकेशन का उपयोग औद्योगिक व संस्थागत स्तर पर पहले से ही किया जा रहा है. 

हर प्रकार के अन्न में कार्बोहाईड्रेट्स और प्रोटीन प्राकृतिक मात्रा में उपलब्ध रहता है. विभिन्न प्रजातियों में इनकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है. फसलों और उनकी प्रजातियों में बायो-फोर्टीफिकेशन से प्रोटीन बढ़ाने की सम्भावनाओं की तलाश विश्व स्तर पर जारी है. भारत जैसे  शाकाहारी बाहुल्य देश में भी अन्डे, चिकन और माँस का उपयोग बढ़ा है. ऐसे में बायो-फोर्टीफिकेशन माध्यम अन्न में प्रोटीन बढ़ाने के उद्देश्य कहाँ तक सार्थक हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है. सोयाबीन में प्राकृतिक रूप से 36-40% तक प्रोटीन उपलब्ध होता है. शाकाहारियों में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने में सोयाबीन एक मुख्य भूमिका निभा रहा है. इस स्तर तक किसी भी अन्न में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के समस्त प्रयास समय और धन के अपव्यय से अधिक कुछ नहीं है. बायो-फोर्टीफिकेशन के द्वारा सोयाबीन की चुनौती के बराबर या ऊपर निकलने प्रयास चलते रहेंगे. कुछ समूहों के लिये समस्या बनाये रखना, समाधान से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. पूर्वी यूपी में एक कहावत है - मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं, हाथी तो बनने से रहा. समय बिताने के लिये, यदि कुछ काम करते रहने की ही ज़िद है, तो करते रहिये. 

-वाणभट्ट

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की स...