सोमवार, 20 जुलाई 2026

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी

हाय क्या चीज़ है जवानी भी

रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेपाल में एक आंदोलन होता है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी ने किया. आंदोलन सफ़ल रहा. सरकार गिरी, सरकार बनी. मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि इस आंदोलन में जेन-ज़ी की महती भूमिका रही है. जेन-ज़ी शब्द ने बहुत आकृष्ट किया. तो हमने ये पता करने के लिये गूगल किया कि ये जेन-ज़ी हैं, तो हम क्या हैं. तब पता चला कि 1965 से 1980 के मध्य पैदा हुये लोग जेन-एक्स से वास्ता रखते हैं. ज़्यादा अन्तर नहीं है. बस बीच में जेन-वाई ही तो है. अब तो जेन-अल्फ़ा (2013 के बाद) भी धरा पर अवतरित हो चुकी है. हम पैदा हुये, जवान हुये और आज साठ की दहलीज़ भी पार कर ली, किसी ने इतनी इज़्ज़त नहीं दी कि हमारी जेनरेशन को कोई नाम देता. आगे भी पीढ़ियाँ आती रहेंगी, अब चूँकि चलन पड़ गया है, उनका नामकरण इसी ढर्रे पर होगा. उनके लिये ग्रीक अल्फाबेट्स के अक्षरों की बस शुरूआत ही हुयी है. नाम चाहे कुछ भी दे लो, पिछली पीढ़ी अगली को और अगली पीढ़ी पिछड़ी को अपने से कमतर ही मानती रहेगी. 

हमेशा पिछली पीढ़ी ने, अगली पीढ़ी को संशय से देखा है. प्रायः उसका मुख्य आधार सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार तक ही सीमित रहा है. शायद ही सास ने बहू और बेटी में समता मूलक सिद्धांत का पालन किया हो. किसी बाप ने तब तक अपने बेटे की बातों का अनुसरण नहीं किया, जब तक उसने जग में उनका नाम रोशन करने वाला काम न कर दिया हो. जब भी किसी ने लीक से हट कर काम करने का प्रयास किया है, सबसे अधिक विरोध उसे अपने घर, अपने ही समाज से हुआ है. माँ-बाप का तो काम ही था, बच्चों में संस्कार इतना कूट-कूट कर भर देना कि कम से कम उनका बच्चा अपने से बड़ों के सामने अधिक चूँ-चपड़ न कर सके. जब तक परिवार में चार-छ: बच्चों का चलन था, एक-दो बच्चे संस्कारी बच जाते थे. अमूमन ये वो बच्चे होते थे, जिन्होंने अपने माँ-बाप को गर्व करने का मौका नहीं दिया होता था. उनकी भी विवशता थी कि आर्थिक स्थिति के लिये वे अपने पेरेंट्स पर निर्भर रहते. जब से न्युक्लीयर और छोटे परिवार का चलन बढ़ा है, माँ-बाप की मजबूरी बन गयी है कि बच्चों का फ़्री डेवलपमेंट करें. डबल इनकम परिवार में किसके पास समय है कि बच्चों के पीछे भागे. उनकी सारी ख्वाहिशें बिना किसी विशेष जिद के पूरी होने लगीं. नतीजा ये पीढ़ी इतनी पैम्पर्ड है कि पैरेंट्स स्वयं ज्यादा टोका-टाकी करने से परहेज करते हैं कि साहब जादे/जादी नाराज़ न हो जायें. 

जब से दुनिया है, तब से पुरानी पीढ़ी को लगता रहा है कि अगली पीढ़ी नकारा है. लेकिन दुनिया हमेशा आगे ही गयी है. बिना किसी वैज्ञानिक हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आदमी की प्रजाति विकसित होती चली गयी. इसमें टेक्नोलॉजी की विशेष भूमिका रही है. ये कहने में मुझे कतई गुरेज नहीं है कि अगली पीढ़ी हमेशा पिछ्ली से उन्नत रही है. समृद्धि भी बढ़ी है. पुराने लोग तो ये बताने से भी नहीं चूकते कि पहले इतने स्कूल नहीं थे, और थे भी तो किसी प्रकार की सुविधायें नहीं होती थीं. साधन सीमित थे. मीलों पैदल जाना पड़ता था. ये बात सच भी है. हमारे अपने बचपन में रेडियो ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था. पिता जी के पास एक अदद साइकिल हुआ करती थी, जिसे वो चमका कर रखते थे. शाम को कोई बच्चा घर में नहीं रुकता था. एक रबर की छोटी सी बॉल से पूरा मोहल्ला गेंद तड़ी  और सेवन स्टोंस खेल लेता था. चालीस पैसे की वो बॉल भी चंदे से आती थी. समय के साथ समृद्धि बेतहाशा बढ़ी है. अब हर बच्चा फ़ुटबॉल लिये घूम रहा है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई का प्रेशर इतना बढ़ गया है कि बच्चों ने खेलना छोड़ दिया है. और जिन्हें खेलने का शौक हो तो उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जॉइन करनी पड़ती है. जब तक ये कॉलेज पहुँचे, सीनियर-जूनियर का लिहाज भी खत्म हो चला था. पेरेंट्स जिन्हें सूरमा भोपाली बनाने में लगे रहते थे, कॉलेज के स्वछंद वातावरण में ये और भी उच्छृंखल हो गये. स्वछंद और स्वतंत्र पालन पोषण का ये प्रभाव है कि नयी पीढ़ी पहले से अधिक बुद्धिमान, रचनात्मक और सृजनशील है. हमने ही इन्हें पंख दिये हैं, तो हमारा कर्तव्य भी है कि इन्हें उड़ने दें. जब कोई कहता है कि वो बच्चे किस काम के जो बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का ख्याल न रख सकें. तो मुझे लगता है कि बच्चों से ऐसी अपेक्षा रखना उचित नहीं है. अपना सर्कल, अपना ओल्ड होम बनाइये और बच्चों को देश समाज के लिये अपना काम करने दीजिये. अपनी उम्मीदों को उनके विकास का रोड़ा न बनाइये. 

जब मै जेन-ज़ी को प्रोत्साहित करने की बात करता हूँ तो ये भी उम्मीद करता हूँ कि स्कूल-कॉलेज का अर्थ है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. आपके ज्ञानार्जन का लाभ यदि देश और समाज को मिलता है, तब तो उसका कोई लाभ है, अन्यथा जीविकोपार्जन तो सब कर रहे हैं. शिक्षा का ध्येय यदि व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित हो जाये, तो शायद शिक्षा अपना अर्थ खो देती है. आज की आज़ाद ख़्याल, जेन-ज़ी आत्मविश्वास और साहस से लबरेज है. प्रमाणिक सूचनायें जिन तक हमारी पहुँच पुस्तकों और पुस्तकालयों पर निर्भर थीं, आज मोबाइल के माध्यम से फिंगरटिप्स पर उपलब्ध हैं. आप इन्हें गुमराह नहीं कर सकते. आपका जन्म इनसे पहले हो गया था, सिर्फ़ इसलिये आपको ये ज्ञानी मान लें, ये इनके संस्कार में नहीं है. 

मैंने मेरे बच्चों के जेन-ज़ी और मेरे जेन-एक्स होने के बारे में जानने का प्रयास न किया होता, यदि नेपाल में बवाल न हुआ होता. इतना जबरदस्त आंदोलन कि चन्द दिनों में जेन-ज़ी ने सत्ता ही पलट दी. जेन-ज़ी का ये प्रयोग किस हद तक और कब तक सफ़ल होता है, ये देखना होगा. आजकल अपने यहाँ भी एक आंदोलन चल रहा है. बहुत से लोग इस तरह के हर आंदोलनों में इसलिये भाग लेने पहुँच जाते हैं कि उन्हें सरकार से हर बात पर शिकायत है. हर मोर्चे पर वो पूरी तत्परता से खड़े मिलेंगे. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. पक्ष-विपक्ष किसी को भी दोष देने से पहले मुझे लगता है, हमें उस समाज का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें हम पढ़े-बढ़े हैं या पल-बढ़ रहे हैं. नेता-अभिनेता उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें हम रहते हैं. आज जेन-ज़ी आंदोलन की राह पर है. जब तक 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' नहीं आयी थी, किसी और की जगह कोई और इम्तेहान देता हो, ये मै सोच नहीं सकता था. आज हर प्रतियोगी परीक्षा में सॉल्वर्स पकड़े जा रहे हैं. सन् अस्सी में भी बोर्ड के पेपर्स लीक हो जाया करते थे. आज भी डिग्री आसानी से पाने के लिये तमाम कॉलेज हैं, जहाँ गारेंटी से डिग्री दिलायी जाती है. पेपर्स लीक कराने वाले भी उसी जेनरेशन से आते हैं, जिससे उसका विरोध करने वाले. जब पैसा कमाना ही लोगों का ध्येय बन गया हो, पैसा आना चाहिये, क्या सही क्या ग़लत. बिना माँ-बाप के आर्थिक सहयोग के यह कार्य सम्भव नहीं हुआ होगा. आंदोलन का कारण सही है या ग़लत इस पर सभी के विचार भिन्न हो सकते हैं. साठ साल धरती पर गुजारने के बाद और कुछ हो न हो, तजुर्बा तो होता ही है, एक नज़रिया बनता है. ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली गलती है, ऐसा भी नहीं है कि ये आख़िरी गलती होगी. समस्या है तो समाधान की बात कीजिये. आज जो हो रहा है, वो पहले भी होता था. आगे भी होता रहेगा. जब भी गलत काम करने वाले लोग पकड़े जाते हैं, तो हल्ला-गुल्ला होना कोई नयी बात नहीं है. मीडिया ऐसे ख़बर बनाता है, जैसे इसके पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था. भ्रष्टाचार जिस समाज में मान्यता प्राप्त आचार-व्यवहार बन गया हो, वहाँ किस-किस का नाम लीजिये, किस-किस को रोइये. लेकिन हर जगह जहाँ हमारा व्यक्तिगत लाभ हो रहा होता है, हमने विरोध करने के बजाय समझौता करना सीख लिया है. हर किसी को बड़े मुद्दे चाहिये, आंदोलन करने के लिये. छोटी-छोटी बातों के लिये क्या लड़ना. विकसित और विकासशील देश में शायद यही अन्तर है. वहाँ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं. सॉरी-थैंक्स-एस्क्यूज़ मी जैसे शब्द भले छोटे लगते हों, लेकिन ये हमारी परवरिश को दिखाते हैं. सर्विस बिफ़ोर सेल्फ़. एक मित्र यूरोप में रहते हैं, उनका कहना है, बिल्डिंग, रोड्स, मेट्रो, नो डाउट तरक्की है, लेकिन मैनर्स मैटर्स. हमारे यहाँ पीएचडी याफ़्ता भी यदि दबंगई न दिखाये तो लोग उसे हल्के में ले लेंगे. स्मार्टनेस की परिभाषा इसी पर निर्भर है कि आप कितने उजड्ड हैं. यही जेन-ज़ी जब अपने आस-पास घटने वाली रोज मर्रा की छोटी समस्याओं से मुँह मोड़ लेती है, तो बड़े मुद्दे की बातें बस ऐसी लगती हैं कि अंग्रेज़ों से लड़ने का मौका हमें नहीं मिल सका, इसलिये हम वर्तमान व्यवस्था से लड़ेंगे. जिन विकसित देशों की तरह जेन-ज़ी अपने देश को देखना चाहती है, उसके लिये लड़ना होगा, हर समय, हर जगह. जहाँ भी गलत हो रहा है, लड़ो नहीं तो कम से कम विरोध तो दर्ज़ करो. शिक्षा, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, घूस, भ्रष्टाचार, पक्षपात, तमाम मुद्दे हैं, चिर-विकासशील देश में. विकसित होने के लिये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ मानव विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. सर्वमंगल और लोक कल्याण की विरासत वाला देश कब आत्म केन्द्रित हो गया, इस पर भी विचार करे, जेन-ज़ी. 

उम्र के इस पड़ाव, मुझे लगता  है, मुद्दे छोटे हों या बड़े, विरोध करना जरूरी. देश ने, समाज ने जो भी प्रगति की है, उसके पीछे कुछ वो लोग थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ का आँकलन नहीं किया. यदि आपके पड़ोसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं, तो अगला नम्बर आपका हो सकता है. छोटे कुछ मुद्दे मै बताता हूँ, जेन-ज़ी आंदोलन की शुरूआत यहाँ से कर सकती हैं. 1. घर के बाहर कूड़ा फेंकना, 2. पार्क में फूल तोड़ना, 3. दूसरों के घर के आगे कुत्ता टहलाना, 4. सड़क पर अतिक्रमण हटाना, 5. बिना हेलमेट-बेल्ट के ड्राइविंग करना, 6. गलत साइड चलना, 7. बेवजह हॉन्क करना, 8. गालियों का प्रयोग, 9. क्यू में लगना, 10. अनुचित लाभ को ना, 11. नियम कानून का पालन, 12. ईधर-उधर थूकना, 13. रोड रेज आदि ये कुछ छोटे मुद्दे हैं. मंत्री का इस्तीफ़ा यदि आपके लिये बड़ा मुद्दा है, तो एक उससे और बड़ा मुद्दा देता हूँ आपको - एक देश-एक शिक्षा, वन नेशन-वन एजुकेशन. ये मुद्दा खान सर ने अपने एक पॉडकास्ट में उठाया था. मुद्दे बड़े हों और जिनमें सर्व मंगल का भाव हो, तो आंदोलन को कौन समर्थन नहीं देगा. 

किन राहों से दूर है मन्ज़िल कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे - निदा फ़ाज़ली

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 जुलाई 2026

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके  विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं. 

बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर  वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा. 

जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये 

बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये 

आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े. 

हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरि नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.

मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास बताया था बाबा जी ने. ये बात अलग है कि जरा ध्यान लगा नहीं कि नींद आ जाती थी. बाबा की गारेंटी भला कैसे पूरी होती. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी.  बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपश्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. गरिष्ठ भोजन और गहरी नींद से जो स्वास्थ्य लाभ हुआ, उससे अपने ही जूते के तस्मे बाँधने में अड़चन होने लगी. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी महसूस हुयी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है. 

बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र  की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टिगोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व है और मेरे बॉस को अफ़सोस, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. 

समस्याओं के समाधान प्रायः सरल और सस्ते ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये. अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.  

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जुलाई 2026

नैनो कहानियाँ: लक्ष्य

लक्ष्य 1:

कॉंग्रचुलेशन्स, तीसरे राउंड के इंटरव्यू के बाद आप सेलेक्ट हो गये हैं. हमारी कम्पनी में साठ लोग हैं, जो छ: प्रोजेक्ट्स पर काम रहे हैं. आपको एक विशिष्ट टीम के लिये चयनित किया गया है. आपके प्रोजेक्ट मैनेजर बतायेंगे कि उनकी टीम की आपसे क्या आपेक्षायें हैं. वही आपको ट्रेनिंग देंगे, सिखायेंगे और आपका मूल्यांकन भी करेंगे. 

लक्ष्य 2:

वेलकम टु आवर ऑर्गनाइजेशन. दो रिटन और एक साक्षात्कार के बाद हाइली क्वालिफ़ाइड लोगों का चयन होता है. यहाँ साठ लोग छिहत्तर प्रोजेक्ट्स पर का काम कर रहे हैं ताकि किसी को प्रमोशन में दिक्कत न हो. हमारे यहाँ काम करने की फ्रीडम है. आप भी एक प्रोजेक्ट बनाइये. अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कीजिये. हम साल भर नियंत्रण और एक बार मूल्यांकन करते हैं. 

लक्ष्य 3:

बॉस एम्प्लॉयी से - अपना लक्ष्य निर्धारित करो ताकि हम उसकी मॉनिटरिंग कर सकें. 

एम्प्लॉयी बॉस से - सर लक्ष्य और दिशा आप तय करें. वी विल नॉट लीव सिंगल स्टोन अनटर्नड. उसकी प्राप्ति के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे. 

बॉस एम्प्लॉयी से - नौकरी करो नौकरी. ये बातें इंटरव्यू में ही अच्छी लगती हैं. प्रोन्नति तुम्हें चाहिये, मुझे नहीं. 

लक्ष्य 4:

समस्यायें बहुत हैं, बहुआयामी हैं. एकांगी प्रयास भूत में नाकाफ़ी सिद्ध हुये हैं. आवश्यकता है एकीकृत समाधान पर मिल कर काम करने की. शीर्ष नेतृत्व का कार्य है, समस्याओं की प्राथमिकता तय करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मार्गदर्शन देना. यदि लक्ष्य का ज्ञान और भान है, तो काम करना और करवाना आसान हो जाता है. इसके लिये ज़रूरी है, बॉस के लिये लक्ष्य और उसकी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता. 

लक्ष्य 5:

लक्ष्य विहीनता की स्थिति में ऑर्गेनाइज़ेशन के कर्मचारियों को व्यस्त रखना भी कला है. पुरखन दादी भी स्वयं को व्यस्त रखने के लिये करती थीं, इस कोठरी का माल उस कोठरी. लक्ष्य तय हो तो काम खत्म हो सकता है. फिर मैनपावर क्या करेगी. अलादीन के जिन्न को बिज़ी भी तो रखना है.

-वाणभट्ट

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

लघु कथा - दिशा

सभा सुधारकों की थी. कोई जलवायु परिवर्तन से प्रभावित न होने वाली प्रजाति के विकास में लगा था. कोई बिना खाद-पानी के उत्पादन बढ़ाने पर उद्दत था. किसी ने कीट-बीमारी की चुनौती को स्वीकार किया था. कुछ जीन ही बदल देने की फिराक़ में थे. वहाँ उपस्थित एक प्रोसेसर बोला पड़ा - सर, अरहर में गोंद कम हो जाये, तो इसका छिलका भी मटर की तरह उतर जाये. मिलिंग लॉस कम हो जायेगा. राजमा रात भर भिगोये बिना दो सीटी में गल जाये तो क्या बात है. सबने समवेत स्वर में जवाब दिया - बड़ी चुनौतियाँ ही विज्ञान को आकर्षित करती हैं. समस्यायें बड़ी हों तभी फण्ड भी मिलता है. इन कामों के लिये भला कौन फण्ड देगा. कभी आवश्यकता थी जननी, आविष्कार की. अब फण्डिंग तय करती है, दिशा विज्ञान की. 


-वाणभट्ट

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी हाय क्या चीज़ है जवानी भी रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेप...