गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

धरती

धरती 

मै बताता हूँ.

धरती ने इक आग का गोला
निगल लिया था 
और 
वो जलती रही
भीतर ही भीतर. 
ताकि 
तुम पर आंच ना आये. 
पर उसकी छाती को 
इतना न कोंचो 
कि
वो उगलने पर 
मजबूर हो जाये.

- वाणभट्ट 

1 टिप्पणी:

  1. सही बात है.. किसी भी चीज़ की अति खराब ही होती है और अगर वो प्रकृति से जुड़ी हो तो भयंकर हो सकती है,...

    तीन साल ब्लॉगिंग के पे आपकी टिपण्णी का इंतज़ार है
    आभार

    जवाब देंहटाएं

यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...

कृषि शोध - दशा और दिशा

भारतीय कृषि का इतिहास 9000 वर्षों से भी पुराना है. कृषि एवं पशुपालन अपनाने के साथ ही मानव सभ्यता का  विकास  एक समाज के रूप में होना आरम्भ हु...