रविवार, 11 जून 2023

जान हथेली पर

 जान हथेली पर 

"तुमने किसी की जान को जाते हुये देखा है, वो देखो मुझसे रूठ कर मेरी जान जा रही है". यह गीत यमक अलंकार का एक फ़िल्मी उदाहरण है. जहाँ एक शब्द बार-बार रिपीट होता हो लेकिन हर बार उसका अर्थ बदल जाता हो, उसे यमक अलंकार कहते हैं. इस गीत में पहली वाली जान का अर्थ असली वाली जान है. दूसरी वाली जान अगर चली जाये तो तीसरी मिलने की सम्भावना रहती है, लेकिन यदि पहली वाली चली गयी तो आप माया-मोह के समस्त बन्धनों से मुक्त हो सकते हैं.

आज़ादी के पचहत्तरवें साल के आते-आते हिन्दुस्तान मेरी जान कहने और मानने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी है. पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जवनरी में देश प्रेम के रंग में रंगे जियालों को देख के लगता है अगर ये लोग पहले पैदा हो गये होते तो अंग्रेजों क्या मुग़लों की भी भारत की ओर मुँह उठा कर देखने की हिम्मत न पड़ती. हालात ये हैं कि जिसे देखो वही जान देने पर आमादा लगता है. हर कोई जान हथेली पर लिये घूम रहा है. ये बात अलग है कि अब देश अपना है, सरकार अपनी है, तो ऐसा कोई विशेष मुद्दा बचता नहीं है, विशेष रूप से सिविलियन्स के लिये, जिसके लिये जान दी जाये. बेवजह जान देने-लेने से न तो देश को कोई लाभ होता है, न ही समाज-परिवार को. लेकिन बिना रवानी के जवानी का क्या मतलब. जान देनी है तो देनी है. समझदार लोग एडवेंचर भी करते हैं तो सेफ्टी के साथ. बिना सुरक्षा के साहस दिखाने का प्रयास यदि बेवकूफी नहीं है तो उससे कम भी नहीं है. रैश ड्राइविंग एक ऐसी ही बेवकूफी है, जिससे लोग अपनी और दूसरे की जान को हमेशा जोख़िम में डालने पर आमादा दिखते हैं.

जब मोहल्ला बना होगा, तभी प्लॉटिंग से पहले सड़क बनी होंगी. बेचने के बाद सोसायटी या निगम को क्या परवाह कि सडक बची है या नहीं. पहले तो सड़कों में गड्ढे हुये फिर धीरे-धीरे गड्ढे में सड़क हो गयी. हम लोगों में सहनशीलता की भावना और भगवान के प्रति आस्था इतनी गहरी है कि 400 साल कि ग़ुलामी भी हमारे इस विश्वास को तोड़ नहीं पायी कि - होइहैं वही जो राम रची राखा. विदेशी भाषा और सभ्यता के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा आज भी हर तरफ परिलक्षित होती दिखती है. संतुष्टि का लेवल इतना अधिक है कि किसी प्रकार का धन-सम्पदा-वैभव, हमें ऊँचे मैटेरियलिस्टिक लक्ष्यों के लिये प्रेरित नहीं कर पाता. हमारी तो बस छोटी सी मंशा रहती है कि प्रभु हमें अपने पडोसी-यार-दोस्तों-नाते-रिश्तेदारों से आगे रखना. चीन-जापान-ताइवान तरक्की करें तो करें. अंत तो सबका वही होना है. खाली हाथ ही जाना है सबको. गीता के ज्ञान से हमने अपने मतलब का सार निकाल लिया है - क्या ले के आये हो, क्या ले के जाना है. कभी ये सोचने का प्रयास नहीं किया कि क्या छोड़ कर या दे कर जाना है. गीता-सार का पहला हिस्सा थोथा समझ के उड़ा दिया कि कर्म करना हमारे वश में है. और फल तो अवश्य मिलेगा लेकिन हरि इच्छानुसार. दुनिया ने पहले हमारे वेद-पुराण-ग्रंथों के कॉपीराईट की धज्जियाँ उडायीं. यहाँ पर जन्मे कर्म सिद्धान्त को चुरा कर जापान-अमरीका-चाइना-कोरिया-ताइवान, सब आगे निकल गये तो क्या हुआ. हमने भी उनके सॉफ्टवेयर के कॉपीराईट्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की ऐसी-गम-तैसी कर डाली. हमारी पाइरेसी पॉलिसी ने सबको पानी पिला रखा है. ये तो भला हो हमारे यहाँ दुनिया का सबसे जीवन्त प्रजातन्त्र जीवित है वर्ना चीन की तरह यदि एकाधिपत्य वाली सरकार होती तो हम पता नहीं क्या-क्या कर गुजरते. जिनमें थोडी बहुत भी कुछ कर गुजरने की चाहत बची है वो अमरीका-इंग्लैण्ड-जर्मनी-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया का इनविटेशन जेब में डाले घूम रहे हैं. यहाँ तो हम अपनी विश्वगुरु का स्टेटस मेंटेन करने में लगे हैं. टैलेन्ट तो हर एक में इस कदर कूट-कूट के इतना भरा है कि पूरा सोशल मीडिया त्रस्त है. पूरी बात का लब्बोलाबाब ये है कि हम चाहें तो बहुत आगे निकल जायें लेकिन हम चाहते ही नहीं हैं. हम जानते हैं कि सडकें हैं तो गड्ढे हैं. सड़क न होती तो गड्ढे ही गड्ढे होते. हमारे वाहनों को वैसे ही चलना पड़ता जैसे चाँद और मार्स पर रोवर विचरण करते हैं.      

गड्ढा रहित और डामर सहित काली-काली सड़कें देखे अरसा हो रखा था. भला हो नगर निगम चुनाव का. वो न आता तो कदाचित टूटी पड़ी सड़कों की ओर किसी का ध्यान जाता. वोट देना भी सबकी मजबूरी है. किसी न किसी को तो देना ही है. ये बात नेता और जनता दोनों को पता है. उसे ही वोट देना समझदारी है जिसे आप जात-पात-धर्म या पड़ोस के नाते जानते हों. वोट माँगने तो हर कोई चला आ रहा है. लेकिन कोई थोड़ा बहुत काम करके वोट माँगे तो जनता उसे कभी निराश नहीं करती. यदि नेता ने चुनाव जीतने के बाद शुरुआती दौर में काम करा दिया तो पाँचवाँ साल आते-आते जनता का स्मृति लोप होने का खतरा बना रहता है. इसलिये मँजे हुये नेता सारा का सारा काम आखिरी साल के लिये रख छोड़ते हैं. चुनाव दिवस से एक हफ्ते पहले कॉलोनी की एक-एक सड़क, एक-एक गली काली हो गयी. यहीं पर हमारे लीडरान की इच्छाशक्ति की दाद देने का मन करता है. ये चाह लें तो क्या से क्या हो जाये. लेकिन ये भी जानते हैं कि अगर बिना तरसाये-तड़पाये जनता का भला कर दिया तो जनता उसकी कद्र नहीं कर पाती. वो दिल ही क्या जो न माँगे मोर. पहले ज़्यादा कर दो तो जनता फ्री की बिजली-पानी की उम्मीद पाल बैठती है. सिलिंडर सस्ता कर दीजिये लेकिन उपलब्धता न बढाइये, जनता आप को ही वोट देगी क्योंकि वो बस सिलिंडर का दाम देखती है. यदि सिलिंडर नहीं मिला तो क्या. वो लकड़ी-कोयला-केरोसिन फूँक लेगी, लेकिन यदि मज़बूरी में भी सिलिंडर का दाम बढ़ा दिया तो वोट तो की तो भूल ही जाइये और गाली खाने को तैयार रहिये. प्याज-टमाटर-आलू पर सरकारें गिर जाती हैं. गैस तो बहुत बड़ी चीज़ है. 

चुनाव के पहले, हफ्ते भर में रातों-रात सारी की सारी सडकें बन के तैयार हो गयी. रातों-रात मतलब रातों-रात. जब सोने गये तो सड़क पर सन्नाटा पसरा था और जब सो के उठे तो भी सड़क खाली थी. फ़र्क बस इतना था कि पूरी की पूरी सड़क गड्ढा मुक्त और काली थी. अब आपको टहलने के लिये किसी म्युनिसिपलिटी के पार्क का टिकट लेने की जरूरत नहीं. जहाँ चाहिये जितना चाहिये फ्री में टहलिये. हमारे देश में कुछ खानदानी लोगों का काम ही है हर काम में नुक्स निकालना. अभी मॉर्निंग वाक के लिये घर के बाहर कदम रखा ही था कि सार्वभौमिक रूप से निगेटिव शख्स सामने पड़ गये. बोले मै बता रहा हूँ - ये सडक चले-वलेगी नहीं. ऐसे कहीं सडक बनती है. मैंने बचपन से सडक बनते देखा है. पहले मिट्टी फिर गिट्टी डाल के सालों छोड़ दिया जाता है ताकि सब अच्छे से सेटेल हो जाये फिर डामर-गिट्टी पड़ती है. बस बरसात आने दीजिये, नालियाँ तो बहती नहीं. पहली बारिश में पानी भरा नहीं कि सारी सड़क भरहरा जायेगी. पहले नाली बनानी चाहिये थी, फिर सड़क. ये वो सज्जन थे जिन्होंने क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिये अपने घर के सामने का फुटपाथ घेर कर बगीचा जैसा कुछ बना रखा था. घर के अन्दर की एक-एक इन्च जमीन पक्की करके हरियाली और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूरा फुटपाथ कब्ज़ा लिया है. यहाँ तक की उनके गेस्ट हमारे घर के सामने कार खड़ी करने को विवश हैं. मैंने थोडा प्रतिवाद करने का प्रयास किया कि अब सड़क बनाने की टेक्नॉलोजी बदल गयी है. उस पर उन्होंने अन्ध भक्तों को एक भद्दी से गाली दी और मेरी भी ढंग से लानत-मलानत भेज दी. गाँधी और बुद्ध जी किसी और देश में पैदा हुये होते तो मै भी उनको उनके हिसाब से उचित व्यवहार से नवाजता. लेकिन आज मै खुश था कि इतने वर्षों बाद चलो सड़क बन तो गयी इसलिये सिर्फ़ मुस्कुरा के रह गया. इस पर उन्हें और बुरा लग गया तो मैं भला क्या कर सकता हूँ.   

सड़क काली हुये अभी कुछ ही दिन हुये थे कि आदत से मजबूर हमारे मोहल्ले वालों ने दुखी हो कर मोहल्ला विकास समिति की एक मीटिंग आहूत कर ली. मुद्दा नयी सड़कों पर स्पीड ड्राइविंग को लेकर था. आजकल मोहल्ले में वो मोहल्ले वाला टच कहाँ रह गया. साठ को बुलाओ और सात पहुँच जायें तो बड़ी बात. शनिवार शाम 7 बजे का समय नियत किया गया ताकि किसी के पास ऑफिस या किसी काम का बहाना न रहे. नियत दिन और समय पर पाँच लोग पहुँचे. जो बढ़ते-बढ़ते साढ़े सात बजे तक दस तक पहुँच पाये. मीटिंग में न आने का कोई विशेष प्रयोजन रहा हो ऐसा नहीं था. दरअसल लोगों को लगता है कि मीटिंग में गये तो अगली मीटिंग उनके घर भी फिक्स हो सकती है. सारी कमेटी के चाय-पानी के इंतजाम के लिये पता नहीं बीवी तैयार होगी या नहीं. पहले आने वाले तीन लोगों में समिति के अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सचिव थे. भीड़ बढ़ाने की गरज से मै और एक और सज्जन पहुँच गये थे. अध्यक्ष जी ने धीर-गम्भीर आवाज़ में बोलना शुरू किया कि साथियों आप सभी को बधाई हो कि समिति के अथक प्रयासों से सड़क का जीर्णोद्धार हो गया है. पार्षद-महापौर-एमएलए-सांसद सब इसका क्रेडिट लेना चाहेंगे तो अध्यक्ष जी क्रेडिट कैसे छोड़ दें. दिल के किसी कोने से ये आवाज़ अनायास आ गयी. उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुये कहा - लेकिन इधर बहुत लोगों ने शिकायत की है कि जब से सड़क बनी है, सड़क पर चलना दुश्वार हो गया है. लौंडे-लपाड़ी साले सत्तर के स्पीड पर मोटरसायकिल पेले पड़े हैं. कार वाले भी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ ऐसे दौड़ा रहे हैं जैसे हाइवे पर चल रहे हों. यदि ऐसा ही चलता रहा तो हम लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जायेगा. आये दिन एक्सिडेंट्स होंगे. कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया है कि हमें नगर निगम से कह कर हर मोड़ -  हर चौराहे के पहले स्पीड ब्रेकर बनवाने चाहिये. नहीं तो ये मोटरसायकिल सवार किसी दिन बुढ़ापे में हम लोगों की हड्डी-पसली बराबर कर देंगे. जिन-जिन लोगों ने मुझसे शिकायत की थी, उनमें से कोई भी आज दिखायी नहीं दे रहा है. कभी-कभी मुझे लगता है कि मुझे समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिये. सचिव और कोषाध्यक्ष जी ने उनके इस प्रस्ताव का त्वरित खंडन इसलिये किया कि ये बवाल किसी और के सर रहे तो अच्छा है. लेना एक न देना दो, जिसे देखो अध्यक्ष को परेशान किये रहता है. अध्यक्ष जी, स्ट्रीट लाईट गड़बड़ चल रही है, पावर कट बहुत हो रहा है, स्वीपर नहीं आ रहा है. मीटिंग्स में आ कर अपनी बात रखते नहीं लेकिन रास्ता चलना मुहाल किये रहते हैं. इस मीटिंग को बुलाने का मुख्य उद्देश्य स्पीड ब्रेकर का निर्माण कराना था. 

दुनिया एक कदम आगे बढ़ाना चाहती है तो जमाना उसे चार कदम पीछे लाने में लग जाता है. नयी सड़क पर फर्राटा दौड़ने का अभी बच्चों का शौक पूरा भी न हो पाया था कि पुरातनपंथी बड़े उस पर अंकुश लगाने के लिये खड़े हो गये. उन्हें स्पीड से नफ़रत हो सकती है लेकिन नये ज़माने के नये बच्चे, ज़माने की रफ़्तार से चलना चाहते हैं. उन्हीं के लिये तो हर कंपनी हाई स्पीड गाड़ियाँ निकाल रही है. और ज़माने की दुश्मन बुजुर्ग पीढ़ी हर उस चीज़ से इत्तेफाक़ नहीं रखती जो उसे करने को नहीं मिलीं. अभी सड़क बन के तैयार नहीं हुयी कि ऐसी समस्या आ जायेगी, कम से कम मैंने तो नहीं सोचा था. पुरानी पीढ़ी किसी भी बात पर नयी पीढ़ी को बुरा-भला कहने से नहीं चूकती. ये बात अलग है कि दुनिया उत्तरोत्तर आगे ही गयी है. मैंने अपनी बात कहने की कोशिश की कि अभी कुछ दिन बच्चों को इन सड़कों का आनन्द ले लेने दो. लेकिन यहाँ भी हर मीटिंग्स की तरह आवाज़ में दम वाले बात में वजन वालों पर हावी हो गये. सारे लोग अध्यक्ष के साथ सुर मिलाते नज़र आये. इस देश में डेमोक्रेसी सिर्फ़ इसीलिये मज़ाक बन के रह गयी है कि संख्याबल कुछ भी सही-गलत करवा-मनवा सकता है. नक्कारखाने में तूती की आवाज़ दब के रह गयी. विधेयक पारित हो गया कि नयी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर बनना ज़रूरी है ताकि सभी लोग महफूज़ रह सकें. मन तो किया कि कह दें आप लोग गड्ढे में ही रहने के लायक हैं. लेकिन अगर सब लोग हर बात खुल के कह सके तो दिल के इलाज़ का धन्धा न बन्द हो जाये. समिति को जिंदा रखने के लिये कुछ मुद्दों को जिलाये रखना भी ज़रूरी होता है.      

उस दिन मेरा सामना हो ही गया. कॉलोनी की कुन्ज गली में साक्षात् यमराज का अवतार मेरी तरफ़ दौड़ा चला आ रहा था. वो मोटरसाइकिल पर सवार था और मोटरसायकिल की स्पीड सत्तर के तो ऊपर ही रही होगी. पीछे वाली ऊँची सीट पर एक दूसरा बच्चा वैसे ही बैठा दिख रहा था, जैसे विक्रम के कन्धे पर वेताल. हेलमेट लगाये होता तो मुझे लगता कि घर वालों ने कुछ नियम-कानून-संस्कार दिये हैं. लेकिन ये समझना कठिन नहीं था कि पिता जी द्वारा प्रदत्त वाहन के सारे फीचर्स को टेस्ट करने के लिये बच्चे टेस्ट ड्राइव पर निकले थे. उम्र ने अभी बमुश्किल अट्ठारह को छुआ हो. स्पीड इतनी थी कि ये समझना मुश्किल था कि वो मोटरसाइकिल चला रहा है या मोटरसाइकिल उसे उड़ाये लिये जा रही है. हेलमेट बिना सारे बाल बिना जैल लगाये सीधे खड़े थे और अगर आँखों पर स्टाइलिश जीरो नम्बर का चश्मा न चढ़ा होता तो आँखों का बाहर टपक पड़ने का अंदेशा था. शायद मोटरसाइकिल की मैक्सिमम स्पीड चेक की जा रही हो. मोटरसाइकिल की धक-धक इतनी तेज़ थी कि मेरा हार्ट दो-चार बीट तो मिस कर ही गया होगा. मैं सड़क छोड़ कर फुटपाथ के आखिरी सिरे पर कब पहुँच गया, पता नहीं. उनके गुजर जाने के थोड़ी देर बाद मेरी मिसिंग पल्स वापस लौटी तो बड़ी राहत महसूस हुयी. मैंने कल्पना की कि यदि इसी स्पीड पर ये बच्चा स्पीड ब्रेकर पर चढ़ जाता तो उसका प्रोजेक्टाइल कहाँ जाता. और बिना हेलमेट के उसका क्या हश्र होता. फिर एक क्षण बाद दिमाग में ये कल्पना भी आयी कि ख़ुदा-न-खास्ता इनकी चपेट में मै आ जाता तो मेरा क्या हाल होता. अस्पताल में हाथ और टांग लटकाये अपने चित्र के बारे में सोच कर आत्मा सिहर उठी. 

एक तरफ तो हम स्पीड की ओर भाग रहे हैं, दूसरी तरफ नियम-कानून का न हमें पता है और न ही हम जानना चाहते हैं. आप को पूरी आज़ादी है कि अपनी जान को आप हथेली में रखें या अपने पिछवाड़े में, जैसी आपकी इच्छा. लेकिन दूसरों की जान तो बक्श दीजिये. बढती हुयी सड़क दुर्घटनाओं के पीछे आसानी से बन सकने वाले लाइसेन्स का प्रभाव और ड्राइविंग सेन्स के नितान्त अभाव को सहज महसूस किया जा सकता है. उल्टी दिशा में चलना, ट्रिपल राइडिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट के प्रति दुराग्रह, रैश ड्राइविंग, नियमों का उल्लंघन, चलते वाहन से थूकना या कूड़ा फेंकना आदि नयी पीढ़ी को मुफ्त में मिली घनघोर आज़ादी के लक्षण हैं. इसी कारण दिन प्रति दिन बढ़ती दुर्घटनाओं से अख़बार पटे रहते हैं. आप घर से निकले और सही सलामत वापस आ गये तो समझिये आपसे ज़्यादा खुशकिस्मत कोई नहीं है. कविवर देवी प्रसाद मिश्र ने शायद इन्हीं परिस्थितियों के लिये ये मुक्तक लिखा हो-

मै कमीज़ पहनाता हूँ,

तो जैसे कवच पहनता हूँ,

और घर से निकलता हूँ,

 तो किसी युद्ध के लिये.

दुनिया को आगे जाना है तो आगे जायेगी ही. लेकिन बिना नियम-कानून का पालन किये कहाँ पहुँचेगी, ये देखने के लिये जरुरी है कि हम सिंगल पीस में धरती पर बने रहें. सबकी जान कीमती है और सब लोगों को चाहिये कि अपनी-अपनी जान की हिफाज़त करें. जल्द ही ऐसे पोस्टर नज़र आयें कि - 'वाहन चलाने वालों से सावधान', तो आश्चर्य न कीजियेगा. वो दिन दूर नहीं जब पैदल चलने वालों के लिये भी हेलमेट कम्पलसरी करना पड़ जाये. उस दिन मुझे लगा कि मोहल्ला कमेटी की चिन्ता जायज़ थी. नयी सड़क के लिये स्पीड ब्रेकर का फंड पास करा पाना नगर निगम के लिये आसान नहीं होगा. अब तो बरसात का इन्तजार कीजिये. ताकि फिर कुछ गड्ढों का विकास हो, जो इस बेलगाम होती स्पीड पर लगाम कसने में कामयाब हों.  

-वाणभट्ट 

शनिवार, 3 जून 2023

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

उस दिन एबिडेमी का चेहरा कुछ मायूस सा लग रहा था. रात तो अच्छा भला छोड़ के गया था. उसका मूड सातवें आसमान पर था. गेस्ट हाउस की सब्जी-रोटी-दाल की जगह मुर्ग-मुसल्लम का डिनर, वो भी कॉकटेल के साथ. उसकी कई दिनों की पेंडिंग मुराद पूरी जो हो गयी थी. कुछ दिन पहले ही उसका भारत आना हुआ था. नॉलेज एक्सचेंज प्रोग्राम की तहत, नाइजेरिया से. इस एक्सचेंज प्रोग्राम के साथ-साथ उसे उम्मीद थी कि कुछ भारत देखने को भी मिलेगा. अकेले आया था. नया देश, नये लोग और नया खान-पान. उसके आने से पहले ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर ने एक नॉलिजियेबल प्रोग्राम बना दिया था. बहुत ही टाइट शेड्यूल था कि बन्दा लौटे तो ज्ञान का कोई कोना छूट न जाये. हफ़्ते भर क्लास-प्रैक्टिकल-इंडस्ट्री विज़िट और सन्डे-सन्डे उसके इंटरटेन्मेंट के नाम पर आस-पास के टूरिस्ट प्लेसेज़ का भ्रमण. ये बात अलग है कि हमारे यहाँ देशाटन से ज़्यादा तीर्थाटन की सम्भावना है. बेचारा मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च में माथा टेक-टेक के हैरान हो गया. बा-मुश्किल 25 साल के युवा ने ऐसी भयंकर ट्रेनिंग की कल्पना भी नहीं होगी.

उसके साथ मुझ जैसे खड़ूस आदमी को अटैच कर दिया गया. जो न खाये, ना खिलाये. जो न पिये, ना पिलाये. उस समय तक मुस्कुराने की आदत भी कम थी. हाँ, दिल का तब भी बहुत अच्छा था, जैसे कि हम सभी हिन्दुस्तानी होते हैं, दिल के अच्छे-सच्चे-साफ़. क्योंकि राज कपूर साहब बरसों पहले फरमा गये थे कि इस देश के लोग इसलिये सच्चे और साफ़ हैं क्योंकि सिर्फ़ इसी देश में गंगा बहती है. और गंगा जी हैं तो सारे पाप धोने का प्रावधान भी है. लेकिन ये बातें अगर आचार-व्यवहार और चेहरे से न झलके तो किसी को कैसे पता चले. अच्छे दिल वाली बात सिर्फ़ मुझे ही पता थी. दूसरे पता नहीं क्या सोचते हों मेरे बारे में. शायद घमण्डी-धूर्त-चालाक-मतलबी, नहीं पता. अन्फ्रेंडली टाइप के लोगों के विषय में शायद मेरे विचार भी कुछ ऐसे ही होते. एबिडेमी की ये ट्रेनिंग सरकार की ओर से प्रायोजित थी. जिसके लिये एक बजट निर्धारित  था. ये भी हो सकता है कि हमारे विश्विद्यालय ने इस ट्रेनिंग के लिये फीस निर्धारण किया हो. उसमें अपने यहाँ उपलब्ध सुविधाओं के हिसाब से ट्रेनिंग ख़र्च का आँकलन लगाया गया हो. आते ही उसे आम स्टूडेंट समझ के विश्वविद्यालय के गेस्ट हॉउस में रख दिया गया. सात फुट के करीब लम्बाई वाले व्यक्ति का भारतीय एवरेज लम्बाई के बेड पर अटक पाना कठिन था. अगले ही दिन जब मैं उससे मिलने गया तो देखा गद्दा जमीन पर आ चुका था.

हफ़्ते भर तक गेस्ट हॉउस का शुद्ध शाकाहारी भोजन कर-कर के एबिडेमी की हालत बिगड़ चुकी थी. मेरा अन्फ्रेंडली, बिना मुस्कुराहट वाला चेहरा देख के उसकी कुछ कहने या डिमाण्ड करने की इच्छा भी नहीं हुयी होगी. दूसरा शनिवार आते-आते उसका सब्र टूट सा गया. उसने धीरे से कहा 'डू यू पीपल ऑलवेज़ ईट वेजेटेरियन फूड्स'. सद्भावना के तौर पर मुझे बताना पड़ा कि नहीं ऐसा नहीं है. 'वी हैव वेरी वाइड रेंज ऑफ़ नॉन-वेज डिशेज़. बट इन द गेस्ट हाउस एंड द पैकेज फ़ॉर योर ट्रेनिंग, देयर इज़ प्रोविज़न फ़ॉर वेजिटेरियन मील्स ओनली'. उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि बहुत बड़ी गलती कर दी यहाँ आ कर. पता नहीं कहाँ फँस गया. मेरा गुडनेस ऑफ़ हार्ट जागने लगा था. पहले थोड़ा सा मुस्कुराया, फिर खुल के मुस्कुराया. वो भी मुस्कुराने लगा. मैंने उससे कहा - भाई पहले बताना था. उसने छूटते ही कहा कि भाई तुम्हें पहले मुस्कुराना था. आइस ब्रेक होने की शुरुआत हो चली थी.

यहाँ एक से एक नॉनवेज रेस्टोरेंट्स हैं. मैं इतना कर सकता हूँ कि लंच तो नहीं पर डिनर में बाकी बचे दिनों के लिये तुम्हें लखनऊवा हॉस्पिटैलिटी का आनन्द दिलाता हूँ. वापस जा के ये मत कहना कि कोई हिन्दुस्तान मत जाना नहीं तो लौकी-तरोई-टिंडे से तुम्हारा स्वागत होगा. यहाँ के व्यंजन खा कर तुम ख़ुद बार-बार लखनऊ आना चाहोगे. फिर क्या था. रोज शाम  को पूरे के पूरे दस दिन तक लखनऊ के लज़ीज़ नॉनवेज का उसे आनन्द दिलाने में मुझे भी बहुत आनन्द आया. टुंडे कबाबी, दस्तरख़्वान, फ़लक़नुमा, करीम्स आदि का जो चस्का एबिडेमी को लगा तो वो इंडियन स्पाइसी फूड्स का दीवाना हो गया. उसके जाने में अभी चार दिन बाकी थे, जब उसने कुछ संकोच करते हुये बार के बारे में पूछा. मुझे ये तो मालूम था कि ढंग के बार-रेस्टोरेंट्स में पैग बहुत मँहगे पड़ते हैं. बाहर एक पेग की कॉस्ट में पूरा क्वार्टर आ जाता है. और ये भी पता था कि गेस्ट हॉउस की दीवारों पर लाल अक्षरों में बड़ा-बड़ा धूम्र और मदिरा पान निषेध लिखा हुआ था. ये भी अजीब विधान है कि यदि ग़लत काम छुप के किया जाये वो अपराध और खुले-आम डंके की चोट पर किया जाये तो आन्दोलन बन जाता है. अंग्रेजों की सरकार होती तो ये आन्दोलन भी मै कर गुजरता विदेशी मेहमान के लिये. लेकिन यहाँ अपने बाबा की सरकार रोकती-टोकती तो नहीं पर पकड़े जाने पर तोडती बहुत है. इस कर के उसकी या मेरी आन्दोलन करने कि हिम्मत नहीं हुयी. तय हुआ कि अपराध ही कर के देख लिया जाये. दिक्क़त ये थी कि दुकान से ख़रीदे कौन. पीता मै था नहीं. शहर में जानने वालों के बीच मेरी टी-टोटलर की इमेज को धक्का लगने की सम्भावना थी. यदि किसी ने देख लिया तो बची-खुची भी गयी. और ये भी पक्का था कि यदि एबिडेमी लेने गया तो दुकानदार अनाप-शनाप पैसे माँग सकता है. केयर टेकर लोग इस मामले में सहायक सिद्ध होते हैं, यदि उनका ख्याल कर लिया जाये तो. जो इन परिस्थितियों में गलत भी नहीं था. अपराध-भाव कुछ कम हो गया जब उसने बताया कि यहाँ आये नेशनल और इन्टरनेशनल अधिकांश लोगों को इस सुविधा की दरकार होती है. लोगों के घर से टूर पर निकलने का ये भी एक मुख्य कारण हुआ करता है. उनका इंतजाम उसे ही देखना पड़ता था. टुंडे के कबाब और रुमाली रोटी, और करीम के मुर्ग-मुसल्लम के साथ स्कॉच और रम के कॉकटेल के साथ एबिडेमी ने अपना यादगार डिनर किया. गेस्ट हॉउस अटेंडेंटस को भी उस रात अंग्रेजी से काम चलाना पड़ा.

जब एबिडेमी से पूछा कि - भाई आज क्यों बड़े मायूस से दिख रहे हो. तो उसने बताया कि सुबह जल्दी नींद खुल गयी तो मॉर्निंग वाक पर निकल गया. हर आदमी ऐसे देख रहा था, जैसे कि चिड़ियाघर से कोई जानवर निकल भागा हो. मैंने वेव किया, गुड मॉर्निंग की, स्माइल दी, लेकिन सब के सब घूरते हुये निकलते जाते थे. 

देश की इज्जत का सवाल था. मैंने समझाने का प्रयास किया - इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. तुम हो भी तो सबसे अलग. इतने लम्बे हो कि देखने वाले के सर की टोपी गिर जाये. हम लोग थोड़े रिज़र्व टाइप के लोग होते हैं. हम आर्टिफिशियल तरीके से मुस्कुराना नहीं जानते. हमें इस बारे में न बताया जाता है ना सिखाया. पहले तुम भी मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचते थे. एबिडेमी ने बताया कि हम लोग भी किसी अनजान को देख कर नहीं मुस्कुराते लेकिन जब आँखों से आँखें मिल ही जायें तो हेलो-हाय-गुड मॉर्निंग/इवनिंग कह के मुस्कुरा देने में कोई बुराई तो नहीं. लेकिन यहाँ लोग देख तो रहे थे पर रिस्पोंस बिल्कुल नहीं दे रहे थे. मुझे बड़ा अजीब लगा. उसे समझाने के लिये बताना पड़ा कि ये चिन्तकों-मनीषियों का देश है. यहाँ लोग देखते कहीं हैं और सोचते कुछ और हैं. लेकिन सब दिल के अच्छे हैं, बस प्रकट करना नहीं जानते. 

उसे क्या बताता कि आजकल यहाँ यही लेटेस्ट ट्रेन्ड चल रहा है. बचपन में नमस्ते करना सिखाया जाता था. लेकिन उसमें इतना आदर-भाव निहित होता था, जितने आदर के लायक हर व्यक्ति नहीं होता. शनै-शनै लोगों ने नमस्कार अपना लिया क्योंकि इसके माध्यम से आप थोडा तिरस्कार प्रदर्शित कर सकते हैं. लेकिन उसमें भी कम्पटीशन है कि पहले कौन करे. यहाँ बाद में करने वाला ख़ुद को विजेता महसूस करता है. हम मुस्कुराते ही तब हैं जब हमारा किसी से कोई काम पड़ने वाला हो. अगला भी तभी मुस्कुरायेगा जब अगले को मालूम हो कि उसे आप से भी कोई काम पड़ सकता है. यदि ये मालूम हो कि आप से कोई काम नहीं पड़ना, तो खामख्वाह मुस्कराहट क्यों वेस्ट करनी. और कभी जब काम पड़ ही गया, तब मुस्कुरा भी लिया जायेगा. मुस्कराहट की डेप्थ से आप नाप सकते हैं कि किसका किससे काम पड़ने वाला है. जिसके चेहरे पर बत्तीसी दिखाऊ टूथपेस्ट के विज्ञापन वाली स्माइल हो, उसका काम पड़ने वाला है. और फीकी स्माइल वाला जानता है कि जरा सा ज़्यादा मुस्कुरा दिये तो ये अभी ही काम बता देगा. अगर कोई बिना कारण मुस्कुरा रहा है, तो समझ लो कुछ गड़बड़ है. कोई काम पड़ने वाला है. अनजान लोगों से तो कोई काम पड़ना नहीं, तो मुस्कुराना कैसा. सामने से निकलने वाले हर स्त्री-पुरुष को घूरते हुये चलना तो हमारी राष्ट्रीय बीमारी है. लेकिन क्या मजाल कि कोई मुस्कुरा दे या विश कर दे. मेरे एक पड़ोसी और उनकी पत्नी को नाती होने के उपलक्ष्य में बेटी-दामाद ने अमरीका का टिकट भिजवा दिया. न्यूक्लियर फ़ैमिली में, बच्चा जब तक सम्हल न जाये, दादी-बाबा-नानी-नाना की अहमियत बनी रहती है. उनके दो दिन वहाँ रहने के बाद ही एक शाम दामाद जी दो काले चश्मे लेकर ऑफिस से लौटे. बेटी ने धीरे से बताया कि जब आप लोग शोना को घुमाने ले जाते हैं तो ये चश्मे लगा के जाया कीजिये. जाने-अनजाने आप लोग जिसे देखते हैं, देखते ही रह जाते हैं. इसे यहाँ लोग बुरा समझते हैं. पड़ोसी का बच्चा हो या कुत्ता किसी को भी घूरने की जरूरत नहीं है. आप लोग इतनी जल्दी आदत तो बदल नहीं सकते इसलिये चश्मा लगा के निकला कीजिये. 

कुछ आत्मनिर्भर टाइप के लोग भी होते हैं. जो लोग चाहते हैं कि ना वो किसी से काम लें और ना किसी के काम आयें, वो अन्तर्मुखी हो जाते हैं. न किसी की ओर देखते हैं, न मुस्कुराते हैं. सम्भवतः वे ही श्रेष्ठ प्राणी हैं.


-वाणभट्ट

एआई

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