रविवार, 13 मार्च 2011

आस

आस

एक भिखारी
पुरानी, अनजान कब्र के पास,
रोज़ बैठता है.

इस उम्मीद में
कि
कभी तो होगा इसका जीर्णोद्धार 
लगेंगे इस पर भी मेले हर शुक्रवार
तब
वो
अच्छन, झुम्मन और कल्लन की तरह
हेड भिखारी होगा
और
वहां बैठने वाले हर भिखारी से
वसूलेगा हफ्ता.

- वाणभट्ट  

गुरुवार, 10 मार्च 2011

आशाओं का दीप जला है

एक और... 
एकांत संगीत के प्रति ...

आशाओं का दीप जला है

कुछ कहा मधुर मुस्कानों ने
कुछ सुना ह्रदय के कानों ने
मन के भीतर था जो गुमसुम
फूल वही आज खिला है

आशाओं का दीप जला है

चाँद से शबनम गिरी है
ओस में मिश्री घुली है
हर रात है आँखों में बीती
हर रात का ये सिलसिला है

 आशाओं का दीप जला है

खुशबु सी है क्यूँ पवन में 
मदहोश क्यूँ बदल गगन में
हर तरफ आलम है ये अब 
नज़रों को जब से पढ़ा है

आशाओं का दीप जला है

(मज़े की बात है, सूत न कपास है)

- वाणभट्ट 



गुरुवार, 3 मार्च 2011

भोर का तारा हुआ मै

बच्चन जी के एकांत संगीत से प्रेरित :

१. भोर का तारा हुआ मै

रात गए जागा देर तक, 
तडपा बेबस सा अब तक
सुबह आ गयी जलाने,
यूँ ओस से पारा हुआ मै

भोर का तारा हुआ मै

चाँद से बातें हुई कुछ,
भूली  मुलाकातें हुईं कुछ
कुछ उसने, मैंने कहा कुछ, 
यूँ चाँद का प्यारा हुआ मै

भोर का तारा हुआ मै

याद तेरी खींच मैंने, 
भींच लीं सीने से अपने 
रात यूँ काटी है मैंने, 
अब बेसहारा हुआ मै

भोर का तारा हुआ मै 

२. रात्रि का चौथा प्रहर है

तारों को मेरे पास पा कर, 
नींद बैठी दूर जा कर
लाखों आवाहन का मेरे, 
उस पर न कोई असर है

रात्रि का चौथा प्रहर है

मौन मै हूँ मौन नीरवता,
वातावरण में है सरसता
रात अँधेरे में खिली, 
जूही पर जैसे भ्रमर है 

रात्रि का चौथा प्रहर है

चाँद है टूटा हुआ सा,
जिंदगी से ऊबा हुआ सा
कोसता किस्मत को अपनी, 
क्योंकि बेचारा अमर है

रात्रि का चौथा प्रहर है

- वाणभट्ट 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

घोड़े और गदहे

होने और लगने में है अंतर इतना
घोड़े और गदहे में है अंतर जितना
घोड़ा, घोड़ा होता है, जबकि गधा घोडा लगता है

भगवन सारे गुण एक को छांट के देते नहीं
ईमानदारी की चर्चा कर आड़ में घूस लेते नहीं
वो बनाते नहीं किसी को सर्व-गुण-संपन्न
किसी को देते हैं गुण और
किसी और को कर देते हैं संपन्न
गुण हमको दे दिया बांचने के लिए
संपन्न उनको कर दिया गुण का प्रसाद चाटने के लिए
चाटते-चाटते उन्होंने चर डाला
पूरा का पूरा देश
फिर भी खाली है उनका पेट
स्विस बैंकों में उनके हैं खाते
लिस्ट जाहिर हो गयी
पर सत्ता वाले नहीं हैं शरमाते
कहते हैं उन्हें भी मालूम है सब नाम
पर वो नहीं चाहते किसी को करना बदनाम
उन्हें कुछ और समय चाहिए
किसी और गुमनाम बैंक का पता चाहिए
ताकि पैसा जल्दी से जल्दी वहां ट्रान्सफर हो जाये
और जांच में किसी पर कोई आंच न आये
आखिर ये भी तो अपने बिरादर हैं
विदेशों में संजोये देश कि धरोहर हैं
जब देशी लोग तो देश बेच रहे थे
तब इनके जेहन में ये ख्याल आये
देश का पैसा आड़े वक्त में देश के काम आये
इसीलिए इन भाइयों ने ये काम किया
देश का पैसा विदेशी बैंकों में अपने नाम किया

इस देश का भी अजब दस्तूर है
पैसेवाला धन के नशे में चूर है
कोई नहीं पूछता पैसा कहाँ से आया
कोई नहीं पूछता पैसा कहाँ गया
जो पैसा देश के निर्माण में था लगना
वो कुछ घरों में ही रह गया
डर था कि कहीं किसी को भनक न लग जाए
और पता नहीं कब देश छोड़ना पड़ जाये
घोड़े के रूप में गधे बहुत स्मार्ट थे
पूरे देश को उल्लू बना माल ले उड़े

भला हो बाबा रामदेव का
उनके जन जागरण अभियान का
कि सरकार भी अब बात करने लगी है
पैसे लौटने कि उम्मीद बंधने लगी है
पर क्या पैसा लौट पायेगा
और देश के विकास में लगेगा
और दबे कुचले लोगों के उत्थान का कारण बनेगा
कितनों की तमन्नाएं मचलने लगी हैं
देश के विकास के लिए भुजाएं फड़कने लगीं हैं
पैसा गर लौटा तो तो हमारे भी दरिदर दूर होंगे
गधों की बिसात छोड़ हम भी घोड़ों में रहेंगे
भले ही ज़रुरत से ज्यादा पैसा गद्दों या दीवारों में रहेगा
पर देश का पैसा कम से कम देश में तो रहेगा

अबे गधों अब तो घोड़े बन जाओ
सुनहरा मौका है मत गवाओं
देश के नेता, पूंजीपति और अफसरों से कुछ सीखो
वो तो लूट रहे हैं तुम भी कुछ लूटो
वो दिन दूर नहीं जब स्विस बैंक में तुम्हारा भी अकाउंट होगा
और तहलका की साईट पर तुम्हारा भी नाम होगा

आप मुस्कराए,
लगता है कविता समझ में आ गई
अलबत्ता तो ये कविता लगती नहीं
क्योंकि जो होती है वो लगती नहीं.

- वाणभट्ट

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

एक एहसान

एक एहसान

मै सुखा ठूंठ, तना,
तना खड़ा हूँ,
तुम्हारी खिड़की के सामने.
नहीं देखने दूंगा तुम्हें संध्याकाश कि चादर.
देखने से पूर्व हो मुझसे साक्षात्कार.

चिढाऊँगा तुमको
हर शाम,
जिससे कि शायद,
तुम ये समझ सको.
कि बचपन में तुम इसी कि छाया में खेले हो
इसी पर लटक कर लम्बे होने कि कवायद कि है
इसी के तने पर चाकू से तुमने नाम गोदे हैं

पर जब हरीतिमा ने मेरा साथ छोड़ा
तुम्हारी उपेक्छा ने मुझे और भी तोडा
टूटता जा रहा हूँ
पर फिर भी खड़ा हूँ

हो सकता है कल तुम मुझको कटवा दो
और मेरी लकड़ी से अपना दरवाज़ा बनवा लो
तो
एक एहसान करना
ठोंकने न पाए कोई,
कम से कम,
एक कालबेल तो लगवा लेना.

- वाणभट्ट


शनिवार, 22 जनवरी 2011

अकेले हम, अकेले तुम

अकेले हम, अकेले तुम

कितना अलग है,
आदमी,
आज आदमी से.

अपने में ही लिपटा.
अपने में ही खोया.

सबके हैं अपने सपने.
सब के सब हैं बेगाने से.
ढपली है सबकी अपनी.
राग सभी के हैं अपने.

ऐसी भी क्या लाचारी है,
कि सब बेजुबान से हैं.
एक ही छत के नीचे,
अब कितने मकान से हैं.

- वाणभट्ट

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

दो शब्द

ज़ुबाँ कलाम
दिल सद्दाम
रहनुमाओं ने
रचा स्वांग

वतन में
आज़ादी कैसी
देशी अँगरेज़
भाषा अंग्रेज़ी

नहीं रहे
सर ऊँचा
जो जिये
सर झुका

अंजन - इंजन
विदेशी तकनीकें
अपनी तो
केवल मूंछें

- वाणभट्ट

आदर्शवादी

ये तो भला हुआ जो राम जी ने अपने अवतार के लिये त्रेता युग को चुना. तब से अब तक धरा पर, विशेष रूप से इण्डिया में, भीषण परिवर्तन आ चुका है. मीड...