रविवार, 13 मार्च 2011

आस

आस

एक भिखारी
पुरानी, अनजान कब्र के पास,
रोज़ बैठता है.

इस उम्मीद में
कि
कभी तो होगा इसका जीर्णोद्धार 
लगेंगे इस पर भी मेले हर शुक्रवार
तब
वो
अच्छन, झुम्मन और कल्लन की तरह
हेड भिखारी होगा
और
वहां बैठने वाले हर भिखारी से
वसूलेगा हफ्ता.

- वाणभट्ट  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत औ...