रविवार, 6 सितंबर 2026

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत और रामायण जैसे महाग्रंथ तो लगभग प्रत्येक भारतीय के जीवन का हिस्सा हैं. सबने बचपन से इनको सुना और गुना है. भारत में ग्रन्थ और काव्य रचना एक वृहद सामाजिक दृष्टिकोण के साथ की जाती थी. पन्चतंत्र हो या जातक कथायें, सबका उदेश्य था, एक संस्कारित समाज का निर्माण करना. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों के आने के पूर्व का इतिहास, न तो स्वतन्त्रता के पूर्व ढंग से पढाया गया, न ही स्वतन्त्रता के बाद किसी ने उसके पुनरावलोकन की आवश्यकता समझी. इसका परिणाम ये हुआ कि हमें हमारे अराध्य भगवानों के भी धरा पर अवतरण के साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ रही है. आज जब भी कहीं कोई कहानी या कथा लिखी जाती है, तो उस तरह की घटना घटने के बाद ही लिखी जाती है. लेखक अपनी सम्वेदना के अनुरूप कहानी को घटा या बढ़ा के प्रस्तुत करता है. अलग-अलग लेखक, उसी घटना को अपने-अपने नज़रिये से देखते हैं, और अपनी-अपनी कहानी कहते हैं. एक की कहानी में जो व्यक्ति विलेन है, दूसरे की कहानी में वही व्यक्ति हीरो हो सकता है. सब नजरिये का खेल है. ये लेखक के ऊपर निर्भर है कि किसी घटना को वो किस परिपेक्ष्य से देखता है. महाग्रन्थों को जब कोई कोरी कल्पना सिद्ध करने का प्रयास करता है तो उसे ये समझना चाहिये कि कल्पना की भी कोई सीमा है. महाभारत में हज़ारों चरित्र हैं, हर चरित्र की अपनी भूमिका है और हर चरित्र की कोई न कोई अन्तर्कथा है. 

हिन्दू धर्मग्रंथों के ऐतिहासिक अस्तित्व को लोग सहजता से नकार देते हैं. सम्भवतः यह हिन्दू धर्म की विशेषता है कि ये समय के साथ नवीनता ग्रहण करता गया. इसीलिये इस नित्य नूतन होते धर्म को सनातन भी कहा गया है. बुद्ध-महावीर यदि इतिहास का हिस्सा न होते तो उनके जैसे चरित्र को भी लोग कल्पना ही मानते. जिस देश में कण-कण में भगवान के वास की अवधारणा है, वहाँ उन्हें महापुरुष मान कर नहीं छोड़ दिया गया. हमने उन्हें भगवान माना. जब भी कोई राम और कृष्ण के धरा पर उनके आविर्भाव पर संशय प्रगट करता है, तो हिन्दू ही है, जो उनके विवेक पर प्रश्न नहीं उठाता. धर्म का लक्ष्य एक है, उसे प्राप्त करने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं. धर्म की सीधी-सरल परिभाषा है - धर्म के अतिरिक्त सब अधर्म है. प्रेम-करुणा-दया-सत्य-अहिंसा शाश्वत धर्म हैं, अपरिवर्तनीय. देश-काल-समाज के अनुसार उचित और अनुचित कर्मों की स्वीकार्यता बदल सकती है . एक समाज जिसे धर्म की संज्ञा देता है, दूसरा उसे अधर्म ठहरा सकता है. किन्तु धर्म का मूल नहीं बदलता.

चलिये कुछ देर के लिये मान भी लेते हैं कि भारत किम्वादंतियों का देश रहा है और इतिहास अधिक प्रमाणिक इसलिये नहीं है कि जो भी वाह्य शासक आता है, वो अपने को आपके ऊपर स्थापित करने के लिये आपके मूल्यों, आपकी धरोहर और आपके इतिहास को पहले समाप्त करने का प्रयास करता है. सदियों की दासता के बाद भी हमारे पुरखों ने अपने इतिहास को किम्वदंतियों के रूप में जीवित रखा. इकबाल साहब को कहना ही पड़ गया - कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. आज़ादी के बाद सत्ता भारतीयों के हाथ में आने के बाद भी, यदि उसमें भारतीयता का अभाव रहा, तो उसके पीछे मैकॉले की शिक्षा पद्यति को दोष दे कर हम अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते. अभी हम मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतन्त्र भी न हुये थे कि ग्लोबल इकोनोमी के नाम पर हम स्वयं को विदेशी संस्कृति अपनाने के लिये बाध्य पाते हैं. व्यक्ति हो या देश दुविधा से बड़ा कोई शत्रु नहीं होता. हम आज भी ये समझने में असमर्थ हैं कि हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा सही है या विदेशी भाषा में पढाया गया ज्ञान. हम पश्चिम का अनुसरण करें या अपनी संस्कृति पर गर्व. हमारे यहाँ खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर ग्रन्थ उपलब्ध रहे हैं. ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों का हमें तब भी ज्ञान था, जब दुनिया को पृथ्वी के गोल और चपटा होने पर संदेह था. गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के सेब गिरने से पहले यहाँ विद्यमान था, इसीलिये सौर्य मंडल के सबसे बड़े ग्रह को गुरु या बृहस्पति कहा गया. ये संयोग मात्र नहीं है कि यूरोप की अधिकान्श खोजें फ़िरंगियों के भारत में पदार्पण के बाद हुयी हैं. अंग्रेजी में ज्ञान-विज्ञान पढ़ने के कारण हमारी सोच सीमित होती गयी. आज हम अपने ही ज्ञान धरोहर को संरक्षित कर पाने में विफल हो रहे हैं. निश्चय ही भौतिकतावादी पश्चिम ने मनुष्य जीवन को सरल और सहज बनाने के लिये विज्ञान के प्रायौगिक उपयोग में सफलता अर्जित की है. किन्तु एकांगी विकास के चरम पर पहुँच कर प्रत्येक मनुष्य को लगता है कि कहीं कुछ कमी है. समग्रता के साथ जीवन जीने के लिये मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता होती है. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. विश्व के महानतम अमीरों में से एक रॉकफ़ेलर (सीनियर) के बारे में कहा जाता है, जब वो अपनी सफलता के शिखर पर थे, उन्हें एक शून्यता बोध ने जकड़ लिया. दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी. तब उनके किसी शुभचिन्तक ने उन्हें दान करने के लिये प्रेरित किया. जिसने उनकी जीवन की दिशा को बदल दिया. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग परोपकार के लिये समर्पित कर दिया. आज भी उनके नाम से अनेक लोक कल्याण की योजनायें चल रही हैं और ज़रूरतमंद योग्य लोगों को लाभान्वित कर रही हैं. 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का वार्षिक आगमन भारतीयों में चेतना का नव-सृजन करने को पर्याप्त है. जहाँ भी, जब भी, कृष्ण का उल्लेख होता है, वहाँ उनके जन्म से लेकर, उनके अन्त तक के समस्त प्रकरण, हम भारतीयों के मानस पटल पर इस प्रकार अन्कित हैं, जैसे हम सभी उन घटनाओं के साक्षी हैं. कैसे कारावास में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया, कैसे कंस वध किया, कैसे महाभारत में भाग लिया और कैसे सब छोड़ कर द्वारिका प्रस्थान कर गये. कृष्ण की बात हो तो गीता और महाभारत का उल्लेख भी आना ही है. एक जीवन किसी मानव कल्पना में इतना विराट हो सकता है, असम्भव लगता है. यदि हमने उन्हें अवतार माना है, तो उसके पीछे उनके चरित्र की विशालता परिलक्षित होती है. निर्लिप्त होकर कर्म करने की अवधारणा प्रतिपादित करना, पश्चिम की भौतिकतावादी संस्कृति में सम्भव नहीं है. यही बात मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सन्दर्भ में भी लागू होती है. भारत के अतिरिक्त और किसी भी देश में इस प्रकार के आदर्शों की कल्पना क्यों नहीं की जा सकी. क्योंकि उनकी धरा पर इतने गौरवशाली, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व का आविर्भाव नहीं हुआ. यदि हमारा इतिहास कल्पना मात्र है तो उन्हें किसी ने कल्पना की उड़ान भरने से किसने रोक रखा था. रामायण-महाभारत मात्र कथायें नहीं हैं. धरती पर जिया गया जीवन है. जितने वृहद ये ग्रन्थ हैं, उससे कहीं अधिक विस्तृत इनके पात्र और इनकी अन्तर्कथायें हैं. 

श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित ईश्वर-अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या पढने के बाद यह अनुभूति हुयी कि देश, समाज, परिवार और व्यक्ति के अन्तर में जो द्वन्द घटित हो रहा है, वही महाभारत है, वही महाभारत का लघु संस्करण है. 

धृतराष्ट्र - इन्द्रिय आसक्त, प्रवृत्तियों का दास व्यक्ति दृष्टिहीन से श्रेष्ठ नहीं है. भीष्म - अस्मिता और आत्म गौरव का प्रतीक हैं, जो हस्तिनापुर को पुनर्स्थापित कर पांडवों (अच्छी प्रवृत्ति) और कौरवों (बुरी प्रवृत्ति) को साथ देखना चाहते हैं. द्रोण - हमारी आदतों के वशीभूत हो कर कार्य करने की प्रवृत्ति है. संस्कारवश, सही या गलत करने से पूर्व हम गुरु से पूछते अवश्य हैं किन्तु करते अपनी आदत के अनुरूप ही.  दुर्योधन - मनुष्य की सांसारिक सुख-सुविधाओं को साधिकार प्राप्त कर लेने की भौतिक इच्छा का प्रतीक है. कर्ण - आसक्ति का पर्याय हैं, जो हर उस काम को सही ठहरा सकते हैं, जो उन्हें करना हो. युधिष्ठिर - विवेकवान और शांति का स्वरुप हैं. भीम - शक्ति का प्रतीक हैं. अर्जुन - आत्म नियन्त्रण की शक्ति हैं.  सहदेव - वाह्य इन्द्रियों पर नियन्त्रण करते हैं. नकुल - नियमित जीवन शैली के महत्त्व दर्शाते हैं. पाँच पांडव, ब्रह्माण्ड के पाँच तत्वों के गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अश्वथामा- हमारी सुप्त इच्छाओं के द्योतक हैं. जब तक अन्तिम इच्छा पूर्ण नहीं हो जाती, कोई आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते.     

इन्हें जान कर क्या आपको नहीं लगा कि ये सभी पात्र तो जाने-पहचाने हैं. हमारे ही जीवन के अंश हैं. यानि जो गीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था, वो कुरुक्षेत्र कहीं और नहीं है, हमारे भीतर ही है. महाभारत के समस्त पात्र हमारी ही मनोवृत्तियों और प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं. विश्व, देश, समाज और मनुष्य में जो द्वन्द चल रहा है, उसे महाभारत का नाम दिया गया है. हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही है.  गलत-सही का निर्णय करने वाले हम कौन होते हैं. ये समय तय करेगा कौन पांडवों के पक्ष में है, कौन कौरवों के. अभी तो भूमिका निभानी है. भगवान आज भी धरा पर आ जायें तो लोग उन्हें साधारण मनुष्य समझने की गलती फिर करेंगे. महाभारत का एक भी पात्र, यदि अपनी भूमिका का निर्वहन यथोचित रूप से नहीं करता, तो क्या महाभारत जैसा महाग्रन्थ बन पाता. एक छोटी सी बात की कल्पना कीजिये कि यदि दुर्योधन पाँच गाँव दे देता, अपने पांडु भाइयों को, तो क्या होता. हर पात्र की अपनी भूमिका है, उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिये. धृतराष्ट्र हों या युधिष्ठिर, दुर्योधन हो या अर्जुन, सबको एक विशिष्ट भूमिका मिली है. उसका निर्वहन उनका कर्तव्य है. महाभारत चलता रहता है, हर युग में, हर काल में. कृष्ण आते रहे हैं और आते रहेंगे सदैव, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये. कहीं बाहर नही, हमारे कुरुक्षेत्र में, हमारे अन्तर में.

-वाणभट्ट

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर - श्री कृष्ण प्रेरणा से...🙏🙏🙏

सादर-साभार: ईश्वर-अर्जुन सम्वाद श्रीमद्भग्वद्गीता, योगदा सत्संग सोसायटी ऑफ़ इण्डिया (अवश्य पढ़ें) 

रविवार, 30 अगस्त 2026

मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं

जब से लोग हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, हर कोई डायट की बात कर रह है. लाइफ़ स्टाइल बीमारियों की ओर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है. स्वस्थ रहना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है. पुरानी कहावत है - इफ़ हेल्थ इज़ लॉस्ट देन एवरीथिंग इज लॉस्ट. बुजुर्गों की बातें लोग बिना अनुभव किये मान लेते तो बहुत सम्भव है कि नयी आती पीढ़ियों के साथ गलतियाँ कम होती जातीं. कम से कम रिपीट तो न होतीं. लेकिन वो युवा ही क्या जो बाप की बात बिना अनुभव किये मान ले. सौ साल का जीवन है और सब आप अपने पूर्ववर्तियों के हिसाब से करते चले गये तो आपके पास इतना समय बच जायेगा कि काटे नहीं कटेगा. इसलिये अपने बाप-दादाओं को गलत सिद्ध करने के लिये, सबसे पहले तो उनकी बात मानना बन्द कर दीजिये. फिर ऐसे-ऐसे काम (प्रयोग) कीजिये कि बाप कहे बेटवा आउट ऑफ़ कन्ट्रोल हो गया है. पहले जब दो-चार बच्चे होते थे, तो एकौ उधरा जाये तो बाप लट्ठ ले के सुधार, अब जब एक-दो ही पैदा हो रहे हैं, तो बाप किसे समझाये, किसे दौड़ाये. मन-मसोस के बोलता है - बेटा कर लो जो तुम्हें करना है. पचपन-साठ पार करते-करते जब शरीर और हौसले दोनों पस्त होने लगते हैं, तब वही बेटा बोलता है - माई डैड वाज़ राईट. लेकिन यदि वो बाप की बात मान लेता तो, सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो जीवन भर करता क्या. ये भी सच है कि ये दुनिया जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ही गयी है, वो आगे न जा पाती यदि नयी पीढ़ी उन्हीं की लकीर पीटती चलती. दुनिया की वर्तमान तरक्की नयी पीढ़ी की क्रान्तिकारी और विद्रोही, सब कुछ बदल डालने की प्रकृति के कारण ही संभव हुयी है. जो समाज से हट कर नया सोचने-समझने-करने की हिम्मत रखते थे, उन्होंने ही दुनिया बदली. बाकी तो ढर्रे पर चलते चलने को ही जीवन समझ बैठे. 

भौतिकतावादी समाज की मज़बूरी है कि वो सफलता-असफलता को भौतिक प्रगति के आधार पार आँकता है. बंगले-गाड़ी-मोटर. स्टेटस के जितने सिम्बल हैं, उनके पीछे आदमी भागते-भागते उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच जाता है जब कहता है - ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, मगर मुझको लौटा तो वो-वो चीज़ें जो बचपन से अब तक फ़्री मिला करती थीं और मिला करती हैं. माया की चाल ही यही है, पहले खूब नचाती है, फ़िर बताती है कि हम ही हैं महाठगनी. मेरे चक्कर में न पड़ते तो बेहतर रहता. जिन्हें जितनी जल्दी इस सत्य भान हो गया, वो माया-मोह के बंधन से मुक्त हो गये. पता नहीं आदमी को ये बीमारी क्यों है कि उसे लगता है कि जिस चीज़ में उसे आनन्द आ रहा है, उसे दूसरों को भी बताया-सिखाया जाये. उन्हें लगता है कि जो अनुभव उन्हें हो गया है उसका लाभ ले कर और लोग माया के चक्कर में न पड़ें. लेकिन लोग तो धरा पर भाँति-भाँति के अनुभव करने ही तो आये हैं. यदि दूसरों के कहने पर चलते रहे और आत्मानुभूति न की तो लौट कर भगवान को क्या जवाब देंगे. धरती पर आने के बाद तो भगवान भी माया के चन्गुल से नहीं बच सके, तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या है. कितने ही साधू-सन्त आये जिन्हें असार जीवन का सार मिल गया था. वो झोला-झन्डा लेकर निकल लिये दुनिया में अलख जगाने. लेकिन हर किसी को वो अपनी बात समझाने में सफल न हो सके. करोड़ों के देश में अगर हज़ार-पाँच सौ ने भी आपको पकड़ लिया तो स्वरोजगार का ये समय सिद्ध मॉडल सर्वोत्कृष्ट है. लाख दो लाख ने फौलो कर लिया तो धन्धा चल निकला समझो.    

कुछ नया करने और करते रहने की जुगत हर जगह हर तरफ़ जारी है. लेकिन क्रांति वहीं होती है, जब आपके विचार इतने अधिक लोगों तक पहुँच जाये कि वो लोगों को उनका अपना विचार लगने लगे. फिर आपका काम ख़त्म. बाकी लोग आपके विचार को सर-माथे पर ढोने लगेंगे. आप भीड़ को एक दिशा दिखा कर छोड़ दीजिये. बाकी काम भीड़ अपने आप करने लग पड़ेगी. आप पतली गली देखिये, और धीरे से निकल लीजिये. फ़सलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन बढ़ाने का विचार एक क्रांति की तरह उछाला गया, और भाई लोग तो तैयार बैठे ही थे कैच करने के लिये. नतीजा, हर कोई लग गया इस दिशा में. फ़सल में ये तत्व पहुँचेंगे कैसे इसका विज्ञान बहुत पेचीदा हो सकता है लेकिन इसकी तकनीक शायद आसानी से समझ आ जाये. हर फ़सल में पोषक तत्वों की नियत मात्रा और क्षमता है. शायद इसीलिये दुनिया के हर देश में संतुलित भोजन की महत्ता पर बल दिया गया है. थाली विशेष रूप से भारतीय थाली में दाल-चावल-रोटी-सब्जी-सलाद-रायता-पापड़-अंचार का समावेश किया गया होगा. हमारे यहाँ तो पथ्य और अपथ्य दोनों को परिभाषित किया गया है कि कब क्या-क्या खाना है और कब क्या नहीं खाना है. शरीर की प्रकृति और प्रकार के अनुसार ही वैद्य भोजन का निर्धारण करते थे. जो पदार्थ एक व्यक्ति के लिये अमृत हो सकता है, दूसरे के लिये विष भी बन सकता है. 

जब से विज्ञान नौकरी बना है, लोगों को कुछ न कुछ करते रहना और उसे छापते रहना, मज़बूरी बन गया है. ताकि समय आधारित प्रमोशन निर्धारित समय सीमा पर बिना किसी दिक़्क़त के होता रहे. इसके लिये उपर वालों की मेहरबानी भी बहुत जरूरी है. क्योंकि महान लोग जिस पथ से गये हैं, उनके पद चिन्हों का अनुसरण करते रहना शायद आसान और सुरक्षित मार्ग है. लकीर पीटने का लाभ ये है कि विज्ञान के पीर और फ़कीर आपके काम को अपने काम का विस्तार मान कर आनन्दित होते रहें. नया सोचने-समझने की तथा दूसरों को समझाने की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद प्राय: समाप्ति की कगार पर होती है. उस पर कोई नया विचार भी आ जाये तो अपने पुरातन विचारों और कर्मों को सही सिद्ध करने के लिये ये नये विचारों के औचित्य पर सवाल खड़े करने से नहीं चूकते. ऐसा ही हुआ जब किसी ने गेहूँ, धान और दालों में पोषक तत्वों को फ़सल सुधार से बढ़ाने के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये. इन तत्वों को मृदा में डाला जाता है ताकि पौधे की जड़ें मृदा से इन तत्वों का अवशोषण व स्थानान्तरण कर इन्हें फसलों के बीजों में भण्डारित कर सकें. विभिन्न प्रजातियों में पोषक तत्वों के अवशोषण की क्षमता भिन्न हो सकती है. 

जब कुछ प्रभावशाली लोग एक दिशा में कार्य आरम्भ कर देते हैं, तो वे आगे की दिशा भी निर्धारित कर देते हैं. स्थापित विषयों पर काम करना, अधिकांश विज्ञानियों के लिये आसान होता है. नये काम और विचारों के लिये आपको उनका ही समर्थन चाहिये होता है, जो इस क्षेत्र अपने बरसों खपा चुके हैं. भीड़ भी भेंड़ चाल में उसी मार्ग का अनुसरण करने लगती है, प्राय: बिना सोचे-समझे. सस्य क्रियाओं और फ़सल सुधार के द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाने के प्रयास वैश्विक स्तर पर वृहद् रूप से चल रहे हैं. कोई भी फ़सल इन प्रयासों से अछूती नहीं रह सकी है. इस पद्यति को बायो-फोर्टीफिकेशन (जैव सम्वर्धन) की संज्ञा दी गयी. इस प्रक्रिया की विशेषता ये थी कि लौह, जस्ता, प्रोटीन व अन्य पोषक तत्वों की  मात्रा की माप बीज स्तर पर की जाती है. जबकि अन्न को उत्पादन से लेकर थाली में भोजन के रूप में पहुँचने की यात्रा में अनेकानेक प्रसंस्करण व पाक क्रियाओं से हो कर गुजरना होता है. इसलिये ये अत्यावश्यक है कि अनाज के स्तर पर ही नहीं, प्रसंस्करण और व्यंजन बनने के बाद इन पोषक तत्वों का आँकलन किया जाये. बहुत सम्भव है कि छिलका उतारने, उबालने और खाना बनाने की प्रक्रिया में पोषक तत्वों में क्षति होती हो. अनाज में कुछ पोषण विरोधी पदार्थ भी प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं, जो इन पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं. पाक विधियों के मध्य इन तत्वों के लीच कर जाने की भी सम्भावना रहती है. 

पोषण बढ़ाने के लिये खाना पकाने के दौरान या खाना बन जाने के बाद पोषक तत्वों को बिना किसी हानि के सहजता से भोजन में मिलाया जा सकता है. पकाने के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में कुछ ह्रास अवश्य सम्भव है.  भोजन का पोषण सम्वर्धन अन्न के पोषण सम्वर्धन से आसान और कम लागत की प्रक्रिया है. आयरन, जिन्क, प्रोटीन आदि तत्व आज प्रीमिक्स के रूप में उपलब्ध हैं. जिन्हें आटा, चावल, दाल, नमक में मिलाया जा सकता है. पोषक तत्व, खाद्य मैट्रिक्स में आसानी से घुल कर पूरे भोजन में फैल जाते हैं. अधिक तापमान पर तत्वों में आंशिक हानि सम्भव है. लेकिन तापरोधी यौगिकों के उपयोग से इस समस्या से भी बचा जा सकता है. पोस्ट-प्रोसेसिंग फोर्टीफिकेशन का उपयोग औद्योगिक व संस्थागत स्तर पर पहले से ही किया जा रहा है. अब तो पोषक तत्व टैबलेट के रूप में भी सहजता से सस्ते दामों में उपलब्ध हैं, जिनका वितरण स्कूलों और संस्थाओं में किया जा रहा है. 

हर प्रकार के अन्न में कार्बोहाईड्रेट्स और प्रोटीन प्राकृतिक मात्रा में उपलब्ध रहता है. विभिन्न प्रजातियों में इनकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है. फ़सलों और उनकी प्रजातियों में बायो-फोर्टीफिकेशन से प्रोटीन बढ़ाने की सम्भावनाओं की तलाश विश्व स्तर पर जारी है. भारत जैसे  शाकाहारी बाहुल्य देश में भी अन्डे, चिकन और माँस का उपयोग बढ़ा है. ऐसे में बायो-फोर्टीफिकेशन माध्यम अन्न में प्रोटीन बढ़ाने के उद्देश्य कहाँ तक सार्थक हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है. सोयाबीन में प्राकृतिक रूप से 36-40% तक प्रोटीन उपलब्ध होता है. शाकाहारियों में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने में सोयाबीन एक मुख्य भूमिका निभा रहा है. इस स्तर तक किसी भी अन्न में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के समस्त प्रयास समय और धन के अपव्यय से अधिक कुछ नहीं है. बायो-फोर्टीफिकेशन के द्वारा सोयाबीन की चुनौती के बराबर या ऊपर निकलने प्रयास चलते रहेंगे. कुछ समूहों के लिये समस्या बनाये रखना, समाधान से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. पूर्वी यूपी में एक कहावत है - मूस मोटइहैं तो लोढ़ा होईहैं, हाथी तो बनने से रहा. समय बिताने के लिये, यदि कुछ काम करते रहने की ही ज़िद है, तो करते रहिये. 

-वाणभट्ट

सोमवार, 20 जुलाई 2026

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी

हाय क्या चीज़ है जवानी भी

रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेपाल में एक आंदोलन होता है, जिसका नेतृत्व युवा पीढ़ी ने किया. आंदोलन सफ़ल रहा. सरकार गिरी, सरकार बनी. मीडिया के माध्यम से मालूम हुआ कि इस आंदोलन में जेन-ज़ी की महती भूमिका रही है. जेन-ज़ी शब्द ने बहुत आकृष्ट किया. तो हमने ये पता करने के लिये गूगल किया कि ये जेन-ज़ी हैं, तो हम क्या हैं. तब पता चला कि 1965 से 1980 के मध्य पैदा हुये लोग जेन-एक्स से वास्ता रखते हैं. ज़्यादा अन्तर नहीं है. बस बीच में जेन-वाई ही तो है. अब तो जेन-अल्फ़ा (2013 के बाद) भी धरा पर अवतरित हो चुकी है. हम पैदा हुये, जवान हुये और आज साठ की दहलीज़ भी पार कर ली, किसी ने इतनी इज़्ज़त नहीं दी कि हमारी जेनरेशन को कोई नाम देता. आगे भी पीढ़ियाँ आती रहेंगी, अब चूँकि चलन पड़ गया है, उनका नामकरण इसी ढर्रे पर होगा. उनके लिये ग्रीक अल्फाबेट्स के अक्षरों की बस शुरूआत ही हुयी है. नाम चाहे कुछ भी दे लो, पिछली पीढ़ी अगली को और अगली पीढ़ी पिछड़ी को अपने से कमतर ही मानती रहेगी. 

हमेशा पिछली पीढ़ी ने, अगली पीढ़ी को संशय से देखा है. प्रायः उसका मुख्य आधार सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कार तक ही सीमित रहा है. शायद ही सास ने बहू और बेटी में समता मूलक सिद्धांत का पालन किया हो. किसी बाप ने तब तक अपने बेटे की बातों का अनुसरण नहीं किया, जब तक उसने जग में उनका नाम रोशन करने वाला काम न कर दिया हो. जब भी किसी ने लीक से हट कर काम करने का प्रयास किया है, सबसे अधिक विरोध उसे अपने घर, अपने ही समाज से हुआ है. माँ-बाप का तो काम ही था, बच्चों में संस्कार इतना कूट-कूट कर भर देना कि कम से कम उनका बच्चा अपने से बड़ों के सामने अधिक चूँ-चपड़ न कर सके. जब तक परिवार में चार-छ: बच्चों का चलन था, एक-दो बच्चे संस्कारी बच जाते थे. अमूमन ये वो बच्चे होते थे, जिन्होंने अपने माँ-बाप को गर्व करने का मौका नहीं दिया होता था. उनकी भी विवशता थी कि आर्थिक स्थिति के लिये वे अपने पेरेंट्स पर निर्भर रहते. जब से न्युक्लीयर और छोटे परिवार का चलन बढ़ा है, माँ-बाप की मजबूरी बन गयी है कि बच्चों का फ़्री डेवलपमेंट करें. डबल इनकम परिवार में किसके पास समय है कि बच्चों के पीछे भागे. उनकी सारी ख्वाहिशें बिना किसी विशेष जिद के पूरी होने लगीं. नतीजा ये पीढ़ी इतनी पैम्पर्ड है कि पैरेंट्स स्वयं ज्यादा टोका-टाकी करने से परहेज करते हैं कि साहब जादे/जादी नाराज़ न हो जायें. 

जब से दुनिया है, तब से पुरानी पीढ़ी को लगता रहा है कि अगली पीढ़ी नकारा है. लेकिन दुनिया हमेशा आगे ही गयी है. बिना किसी वैज्ञानिक हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आदमी की प्रजाति विकसित होती चली गयी. इसमें टेक्नोलॉजी की विशेष भूमिका रही है. ये कहने में मुझे कतई गुरेज नहीं है कि अगली पीढ़ी हमेशा पिछ्ली से उन्नत रही है. समृद्धि भी बढ़ी है. पुराने लोग तो ये बताने से भी नहीं चूकते कि पहले इतने स्कूल नहीं थे, और थे भी तो किसी प्रकार की सुविधायें नहीं होती थीं. साधन सीमित थे. मीलों पैदल जाना पड़ता था. ये बात सच भी है. हमारे अपने बचपन में रेडियो ही मनोरंजन का एक मात्र साधन था. पिता जी के पास एक अदद साइकिल हुआ करती थी, जिसे वो चमका कर रखते थे. शाम को कोई बच्चा घर में नहीं रुकता था. एक रबर की छोटी सी बॉल से पूरा मोहल्ला गेंद तड़ी  और सेवन स्टोंस खेल लेता था. चालीस पैसे की वो बॉल भी चंदे से आती थी. समय के साथ समृद्धि बेतहाशा बढ़ी है. अब हर बच्चा फ़ुटबॉल लिये घूम रहा है, लेकिन साथ खेलने वाले बच्चे नहीं हैं. पढ़ाई का प्रेशर इतना बढ़ गया है कि बच्चों ने खेलना छोड़ दिया है. और जिन्हें खेलने का शौक हो तो उन्हें स्पोर्ट्स एकेडमी जॉइन करनी पड़ती है. जब तक ये कॉलेज पहुँचे, सीनियर-जूनियर का लिहाज भी खत्म हो चला था. पेरेंट्स जिन्हें सूरमा भोपाली बनाने में लगे रहते थे, कॉलेज के स्वछंद वातावरण में ये और भी उच्छृंखल हो गये. स्वछंद और स्वतंत्र पालन पोषण का ये प्रभाव है कि नयी पीढ़ी पहले से अधिक बुद्धिमान, रचनात्मक और सृजनशील है. हमने ही इन्हें पंख दिये हैं, तो हमारा कर्तव्य भी है कि इन्हें उड़ने दें. जब कोई कहता है कि वो बच्चे किस काम के जो बुढ़ापे में अपने माँ-बाप का ख्याल न रख सकें. तो मुझे लगता है कि बच्चों से ऐसी अपेक्षा रखना उचित नहीं है. अपना सर्कल, अपना ओल्ड होम बनाइये और बच्चों को देश समाज के लिये अपना काम करने दीजिये. अपनी उम्मीदों को उनके विकास का रोड़ा न बनाइये. 

जब मै जेन-ज़ी को प्रोत्साहित करने की बात करता हूँ तो ये भी उम्मीद करता हूँ कि स्कूल-कॉलेज का अर्थ है - शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. आपके ज्ञानार्जन का लाभ यदि देश और समाज को मिलता है, तब तो उसका कोई लाभ है, अन्यथा जीविकोपार्जन तो सब कर रहे हैं. शिक्षा का ध्येय यदि व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित हो जाये, तो शायद शिक्षा अपना अर्थ खो देती है. आज की आज़ाद ख़्याल, जेन-ज़ी आत्मविश्वास और साहस से लबरेज है. प्रमाणिक सूचनायें जिन तक हमारी पहुँच पुस्तकों और पुस्तकालयों पर निर्भर थीं, आज मोबाइल के माध्यम से फिंगरटिप्स पर उपलब्ध हैं. आप इन्हें गुमराह नहीं कर सकते. आपका जन्म इनसे पहले हो गया था, सिर्फ़ इसलिये आपको ये ज्ञानी मान लें, ये इनके संस्कार में नहीं है. 

मैंने मेरे बच्चों के जेन-ज़ी और मेरे जेन-एक्स होने के बारे में जानने का प्रयास न किया होता, यदि नेपाल में बवाल न हुआ होता. इतना जबरदस्त आंदोलन कि चन्द दिनों में जेन-ज़ी ने सत्ता ही पलट दी. जेन-ज़ी का ये प्रयोग किस हद तक और कब तक सफ़ल होता है, ये देखना होगा. आजकल अपने यहाँ भी एक आंदोलन चल रहा है. बहुत से लोग इस तरह के हर आंदोलनों में इसलिये भाग लेने पहुँच जाते हैं कि उन्हें सरकार से हर बात पर शिकायत है. हर मोर्चे पर वो पूरी तत्परता से खड़े मिलेंगे. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. पक्ष-विपक्ष किसी को भी दोष देने से पहले मुझे लगता है, हमें उस समाज का अध्ययन करना चाहिये, जिसमें हम पढ़े-बढ़े हैं या पल-बढ़ रहे हैं. नेता-अभिनेता उसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें हम रहते हैं. आज जेन-ज़ी आंदोलन की राह पर है. जब तक 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' नहीं आयी थी, किसी और की जगह कोई और इम्तेहान देता हो, ये मै सोच नहीं सकता था. आज हर प्रतियोगी परीक्षा में सॉल्वर्स पकड़े जा रहे हैं. सन् अस्सी में भी बोर्ड के पेपर्स लीक हो जाया करते थे. आज भी डिग्री आसानी से पाने के लिये तमाम कॉलेज हैं, जहाँ गारेंटी से डिग्री दिलायी जाती है. पेपर्स लीक कराने वाले भी उसी जेनरेशन से आते हैं, जिससे उसका विरोध करने वाले. जब पैसा कमाना ही लोगों का ध्येय बन गया हो, पैसा आना चाहिये, क्या सही क्या ग़लत. बिना माँ-बाप के आर्थिक सहयोग के यह कार्य सम्भव नहीं हुआ होगा. आंदोलन का कारण सही है या ग़लत इस पर सभी के विचार भिन्न हो सकते हैं. साठ साल धरती पर गुजारने के बाद और कुछ हो न हो, तजुर्बा तो होता ही है, एक नज़रिया बनता है. ऐसा नहीं है कि ये कोई पहली गलती है, ऐसा भी नहीं है कि ये आख़िरी गलती होगी. समस्या है तो समाधान की बात कीजिये. आज जो हो रहा है, वो पहले भी होता था. आगे भी होता रहेगा. जब भी गलत काम करने वाले लोग पकड़े जाते हैं, तो हल्ला-गुल्ला होना कोई नयी बात नहीं है. मीडिया ऐसे ख़बर बनाता है, जैसे इसके पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था. भ्रष्टाचार जिस समाज में मान्यता प्राप्त आचार-व्यवहार बन गया हो, वहाँ किस-किस का नाम लीजिये, किस-किस को रोइये. लेकिन हर जगह जहाँ हमारा व्यक्तिगत लाभ हो रहा होता है, हमने विरोध करने के बजाय समझौता करना सीख लिया है. हर किसी को बड़े मुद्दे चाहिये, आंदोलन करने के लिये. छोटी-छोटी बातों के लिये क्या लड़ना. विकसित और विकासशील देश में शायद यही अन्तर है. वहाँ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते हैं. सॉरी-थैंक्स-एस्क्यूज़ मी जैसे शब्द भले छोटे लगते हों, लेकिन ये हमारी परवरिश को दिखाते हैं. सर्विस बिफ़ोर सेल्फ़. एक मित्र यूरोप में रहते हैं, उनका कहना है, बिल्डिंग, रोड्स, मेट्रो, नो डाउट तरक्की है, लेकिन मैनर्स मैटर्स. हमारे यहाँ पीएचडी याफ़्ता भी यदि दबंगई न दिखाये तो लोग उसे हल्के में ले लेंगे. स्मार्टनेस की परिभाषा इसी पर निर्भर है कि आप कितने उजड्ड हैं. यही जेन-ज़ी जब अपने आस-पास घटने वाली रोज मर्रा की छोटी समस्याओं से मुँह मोड़ लेती है, तो बड़े मुद्दे की बातें बस ऐसी लगती हैं कि अंग्रेज़ों से लड़ने का मौका हमें नहीं मिल सका, इसलिये हम वर्तमान व्यवस्था से लड़ेंगे. जिन विकसित देशों की तरह जेन-ज़ी अपने देश को देखना चाहती है, उसके लिये लड़ना होगा, हर समय, हर जगह. जहाँ भी गलत हो रहा है, लड़ो नहीं तो कम से कम विरोध तो दर्ज़ करो. शिक्षा, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, सफाई, घूस, भ्रष्टाचार, पक्षपात, तमाम मुद्दे हैं, चिर-विकासशील देश में. विकसित होने के लिये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ मानव विकास पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. सर्वमंगल और लोक कल्याण की विरासत वाला देश कब आत्म केन्द्रित हो गया, इस पर भी विचार करे, जेन-ज़ी. 

उम्र के इस पड़ाव, मुझे लगता  है, मुद्दे छोटे हों या बड़े, विरोध करना जरूरी. देश ने, समाज ने जो भी प्रगति की है, उसके पीछे कुछ वो लोग थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ का आँकलन नहीं किया. यदि आपके पड़ोसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप चुप हैं, तो अगला नम्बर आपका हो सकता है. छोटे कुछ मुद्दे मै बताता हूँ, जेन-ज़ी आंदोलन की शुरूआत यहाँ से कर सकती हैं. 1. घर के बाहर कूड़ा फेंकना, 2. पार्क में फूल तोड़ना, 3. दूसरों के घर के आगे कुत्ता टहलाना, 4. सड़क पर अतिक्रमण हटाना, 5. बिना हेलमेट-बेल्ट के ड्राइविंग करना, 6. गलत साइड चलना, 7. बेवजह हॉन्क करना, 8. गालियों का प्रयोग, 9. क्यू में लगना, 10. अनुचित लाभ को ना, 11. नियम कानून का पालन, 12. ईधर-उधर थूकना, 13. रोड रेज आदि ये कुछ छोटे मुद्दे हैं. मंत्री का इस्तीफ़ा यदि आपके लिये बड़ा मुद्दा है, तो एक उससे और बड़ा मुद्दा देता हूँ आपको - एक देश-एक शिक्षा, वन नेशन-वन एजुकेशन. ये मुद्दा खान सर ने अपने एक पॉडकास्ट में उठाया था. मुद्दे बड़े हों और जिनमें सर्व मंगल का भाव हो, तो आंदोलन को कौन समर्थन नहीं देगा. 

किन राहों से दूर है मन्ज़िल कौन सा रस्ता आसां है

हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे - निदा फ़ाज़ली

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 जुलाई 2026

तीसरी आँख का अंत, तुरन्त

हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके  विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं. 

बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर  वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा. 

जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-

हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये 

बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये 

आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े. 

हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरि नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.

मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास बताया था बाबा जी ने. ये बात अलग है कि जरा ध्यान लगा नहीं कि नींद आ जाती थी. बाबा की गारेंटी भला कैसे पूरी होती. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी.  बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपश्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. गरिष्ठ भोजन और गहरी नींद से जो स्वास्थ्य लाभ हुआ, उससे अपने ही जूते के तस्मे बाँधने में अड़चन होने लगी. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी महसूस हुयी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है. 

बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र  की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टिगोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व है और मेरे बॉस को अफ़सोस, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. 

समस्याओं के समाधान प्रायः सरल और सस्ते ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये. अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.  

- वाणभट्ट

शनिवार, 11 जुलाई 2026

नैनो कहानियाँ: लक्ष्य

लक्ष्य 1:

कॉंग्रचुलेशन्स, तीसरे राउंड के इंटरव्यू के बाद आप सेलेक्ट हो गये हैं. हमारी कम्पनी में साठ लोग हैं, जो छ: प्रोजेक्ट्स पर काम रहे हैं. आपको एक विशिष्ट टीम के लिये चयनित किया गया है. आपके प्रोजेक्ट मैनेजर बतायेंगे कि उनकी टीम की आपसे क्या आपेक्षायें हैं. वही आपको ट्रेनिंग देंगे, सिखायेंगे और आपका मूल्यांकन भी करेंगे. 

लक्ष्य 2:

वेलकम टु आवर ऑर्गनाइजेशन. दो रिटन और एक साक्षात्कार के बाद हाइली क्वालिफ़ाइड लोगों का चयन होता है. यहाँ साठ लोग छिहत्तर प्रोजेक्ट्स पर का काम कर रहे हैं ताकि किसी को प्रमोशन में दिक्कत न हो. हमारे यहाँ काम करने की फ्रीडम है. आप भी एक प्रोजेक्ट बनाइये. अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित कीजिये. हम साल भर नियंत्रण और एक बार मूल्यांकन करते हैं. 

लक्ष्य 3:

बॉस एम्प्लॉयी से - अपना लक्ष्य निर्धारित करो ताकि हम उसकी मॉनिटरिंग कर सकें. 

एम्प्लॉयी बॉस से - सर लक्ष्य और दिशा आप तय करें. वी विल नॉट लीव सिंगल स्टोन अनटर्नड. उसकी प्राप्ति के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे. 

बॉस एम्प्लॉयी से - नौकरी करो नौकरी. ये बातें इंटरव्यू में ही अच्छी लगती हैं. प्रोन्नति तुम्हें चाहिये, मुझे नहीं. 

लक्ष्य 4:

समस्यायें बहुत हैं, बहुआयामी हैं. एकांगी प्रयास भूत में नाकाफ़ी सिद्ध हुये हैं. आवश्यकता है एकीकृत समाधान पर मिल कर काम करने की. शीर्ष नेतृत्व का कार्य है, समस्याओं की प्राथमिकता तय करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मार्गदर्शन देना. यदि लक्ष्य का ज्ञान और भान है, तो काम करना और करवाना आसान हो जाता है. इसके लिये ज़रूरी है, बॉस के लिये लक्ष्य और उसकी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता. 

लक्ष्य 5:

लक्ष्य विहीनता की स्थिति में ऑर्गेनाइज़ेशन के कर्मचारियों को व्यस्त रखना भी कला है. पुरखन दादी भी स्वयं को व्यस्त रखने के लिये करती थीं, इस कोठरी का माल उस कोठरी. लक्ष्य तय हो तो काम खत्म हो सकता है. फिर मैनपावर क्या करेगी. अलादीन के जिन्न को बिज़ी भी तो रखना है.

लक्ष्य 6:

विकसित देश को विकसित युवा चाहिये होंगे. हमारा प्रयास है, अगले दो साल में ऐसे हज़ारों-लाखों युवाओं को भविष्य के लिये तैयार करना. 

वर्तमान में कुछ करेंगे, तभी तो विकास आयेगा.

अब विकास को आने से कोई रोक नहीं सकता. वो आ कर ही रहेगा. अगले दो साल युवाओं को 2047 के लिये तैयार करने में समर्पित कर दूँगा. फ़िलहाल तो लक्ष्य अगले दो साल का है. 

-वाणभट्ट

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

लघु कथा - दिशा

सभा सुधारकों की थी. कोई जलवायु परिवर्तन से प्रभावित न होने वाली प्रजाति के विकास में लगा था. कोई बिना खाद-पानी के उत्पादन बढ़ाने पर उद्दत था. किसी ने कीट-बीमारी की चुनौती को स्वीकार किया था. कुछ जीन ही बदल देने की फिराक़ में थे. वहाँ उपस्थित एक प्रोसेसर बोला पड़ा - सर, अरहर में गोंद कम हो जाये, तो इसका छिलका भी मटर की तरह उतर जाये. मिलिंग लॉस कम हो जायेगा. राजमा रात भर भिगोये बिना दो सीटी में गल जाये तो क्या बात है. सबने समवेत स्वर में जवाब दिया - बड़ी चुनौतियाँ ही विज्ञान को आकर्षित करती हैं. समस्यायें बड़ी हों तभी फण्ड भी मिलता है. इन कामों के लिये भला कौन फण्ड देगा. कभी आवश्यकता थी जननी, आविष्कार की. अब फण्डिंग तय करती है, दिशा विज्ञान की. 


-वाणभट्ट

शनिवार, 23 मई 2026

चहास

अगर मै कहूँ की चाय की लत मुझे विरासत में मिली तो शायद गलत न होगा. कोई छोटा बच्चा दूध न पिये तो माँ का मन नहीं मानता. वो सारे जतन कर लेगी कि बढ़ते बच्चे के विकास में कोई कमी न रह जाये. जब उन्होंने देख लिया कि बच्चे को चाय का रंग ही पसन्द है, तो चाय का विकल्प निकाला गया, बॉर्नविटा. बचपन से बॉर्नविटा के साथ दूध पीने वाले शुद्ध शहरी बच्चे को शुद्ध दूध हजम होने से रहा. घी का हाल तो और बुरा था. दाल में माँ घी डाल देती तो मुझे तैरता बाल नज़र आता. ये जो हाइट पाँच फ़िट पाँच इंच पर अटक गयी, उसका दोष मै किसी और को नहीं दे सकता. हालात ये हैं कि आज भी अलबत्ता तो दूध पीता नहीं और पीता भी हूँ तो कुछ न कुछ एडिटिव डाल कर. 

सुबह उठते ही फ्रेश होने के बाद पिता जी चाय पी कर ही टहलने निकलते. सुबह पाँच बजे. हमारे घर में चाय पौने पाँच पर बन जाती थी. लौटने के बाद, दूसरा कप और नाश्ते के साथ तीसरा. दिन में कितने हुये, उसका हिसाब नहीं. लेकिन वापस घर आने पर चाय तो बननी ही थी. तब न टीवी था, न मोबाइल. ज्ञान बाँटने के विधाओं से सभी वंचित थे. चाय के गुण-अवगुण के बारे में बताने वालों का नितान्त अभाव था. बल्कि मेरे एक मित्र के पिता जी बताया करते थे कि टी-बोर्ड की नौकरी में वो लोगों को चाय फ़्री पिलाया करते थे, ताकि लोगों को चाय का चस्का लगे. और हिंदुस्तानियों की एक बात तो माननी पड़ेगी, अमिताभ अगर फ़ण्डू च्यवनप्राश का एड कर दे तो हम आराम से मान लें कि उनकी सेहत का राज़ यही है. अगले एड में वही फ़ायम चूर्ण के गुण गाते नज़र आ सकते हैं. जब आदत लग रही थी तब किसी ने कोई वैधानिक चेतावनी नहीं दी थी कि चाय सभी बीमारियों की जड़ है. सरदर्द-सर्दी-जुकाम का तो आज भी सबसे कारगर इलाज चाय ही है. 

पूरे घर की आदत बदस्तूर चलती रही, पिता जी के रिटायर होने के बाद भी. बस फ़र्क़ इतना हुआ कि सुबह चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से आ गयी. पौने पाँच बजे की चाय के लिये श्रीमती जी ने हाथ खड़े कर दिये थे. अब दूसरी चाय मेरे टहल के लौटने के बाद होती. पिता जी बालकनी में टहलते और मेरे लौटने का इंतज़ार करते. 

उस दिन जगमोहन को सुबह पाँच बजे बुला लिया था. इलाहाबाद जाना था. जब से सठियाया हूँ, श्रीमती जी अकेले कार ले कर जाने को मना करती हैं. विशेषकर शहर से बाहर. साठ के बाद बगावती तेवर भी ढीले पड़ जाते हैं, चाहे घर में हो या बाहर. वैसे भी जिनकी जीत में मज़ा आता हो, उनसे हारना अच्छा लगता है. अब तक ये समझ आ गया होता है कि दुनिया चलाना बस उसी का काम है. चपरासीनुमा अफ़सर और अफ़सरनुमा चपरासी (कॉपीराइट - श्रीलाल शुक्ल)  सब उसी का खेल है. कभी-कभी ये भी लगता है कि इललॉजिकल बॉस और लॉजिकल सबोर्डिनेट बना कर भगवान ने गलती तो नहीं कर दी. तब जा कर पूर्व जन्मों के कर्मों पर विश्वास होने लगता है. बहरहाल अब ये भी विश्वास होने लगा है कि सुकरात अगर समय से पहले पैदा हो जाये तो समाज उसे जहर न दे तो उसका करे क्या. मौका लगा है तो चिटकाता चलूँ कि बीस साल पहले ही मुझे अंदाज़ होने लगा था कि मनुष्य के डॉक्टर्स ह्युमन हेल्थ की बात करेंगे और कृषि के डॉक्टर्स सॉयल हेल्थ, फ़सल प्रबंधन और कृषक आय की बात करेंगे. जो आज होता दिख रहा है. बीस साल बाद के लिये ये लिखे दे रहा हूँ कि सुपर स्पेशलिस्ट धूल फ़ाँकते नज़र आयेंगे. ये हर समस्या का समाधान अपनी विषय विशेषज्ञता के दृष्टिकोण से खोजते हैं. स्पेशलिस्ट रिपोर्ट का इलाज करते हैं, आदमी का नहीं. अपने अभूतपूर्व विकास के बाद भी एलोपैथी, सिम्पटम बेस्ड इलाज में, आयुर्वेद और होम्योपैथी की तुलना में असफल सिद्ध हुयी है. इन्होंने मानव शरीर को मशीन समझ लिया. जबकि हमारे पुरखों को भी मालूम था कि मनुष्य मन, बुद्धि, अहं और चित्त से जुड़ा है. जब इसके उपर उठेगा तभी जीव से शिव की यात्रा पूरी होगी. आदमी और पेड़-पौधों का मैनेजमेंट होलिस्टिकली होगा. दो हज़ार साल की अंग्रेज़ी साइंस, अरबों साल की पृथ्वी की प्राकृतिक जीवन शैली पर हावी हो गयी है. विज्ञान का प्रयास जहाँ तक प्रकृति को समझने तक सीमित था, वहाँ तक विज्ञान ने प्रगति की. विज्ञान के साइंस बनने के बाद इंसान भगवान के डोमेन में हस्तक्षेप करने लगी है. यहीं से साइंस ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ आरम्भ कर दिया. आज वातावरण में व्याप्त विसंगतियों के मूल में मानव द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिये प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व अनियंत्रित दोहन ही जिम्मेदार है.  देर-सवेर साइंस को वापस विज्ञान पर लौटना होगा. प्रकृति का अध्ययन करो, उसके एक्सट्रीम्स के कारणों को समझो, उन पर नियंत्रण करने का प्रयास करो, किन्तु उसे बदलने या लड़ने का नहीं. विज्ञान ऐसी धरती का निर्माण करता है, जहाँ धरती पर सब प्राणियों का बराबर का हक़ और हिस्सा हो. ये बात अलग है कि तब शायद हम फिर झिंगालाल-हूम करते घूम रहे हों. शायद सिर्फ़ लैंडरेसेज़ (आदिवासी) ही बचें. साइंस फ़िक्शंस में दो हज़ार साल आगे जिस विकास की कल्पना प्रस्तुत की जाती है, उसका उलट भी हो सकता है. जिस तरह मानव, साइंस के नाम पर सेल्फ़ डिस्ट्रक्शन्स का इंतज़ाम करता घूम रहा है, जीवन बचा ले जाना ही सबसे बड़ी चुनौती है. 

पौने पाँच बजने से पहले ही जगमोहन ने घण्टी बजा दी. नहा-धो के चाय के कप को हाथ लगाया ही था. जितनी जल्दी निकलेंगे उतनी ही जल्दी वापस लौटने की प्रक्रिया होगी. सो हड़बड़ी में बिना चुस्की लिये, चाय गले में उतार ली. इरादा था 'मोहन पेड़ा' पर उनकी चाय का लुफ़्त लिया जायेगा. जगमोहन भाई का हाल ये है कि वो क्या खाते-पीते हैं और कब खाते-पीते हैं, उनके साथ कई बार रहने के बाद भी मुझे पता नहीं लग सका. जब मै और जो मै खाता, उसी से उनका काम चल जाता. शायद ही उन्होंने कभी अपनी तरफ़ से चाय-कॉफ़ी-स्नैक्स या खाने की डिमांड की हो. 

जब 'मोहन पेड़ा' के सामने से निकले, उसके खुलने का समय नहीं हुआ था. फ़तेहपुर के पास एक 'मोरिंगा' रेस्टोरेंट खुला था. जगमोहन को वहाँ रोकने के लिये बोल कर मै फ़ेसबुक पर बर्थडे की विशेज़ और व्हाट्सएप्प पर गुड मॉर्निंग के अपने दैनिक शगल में लग गया. जब इससे फ़ारिग हुआ तो पूछा - अभी तक 'मोरिंगा' नहीं आया. जगमोहन खाली सड़क पर कार दाबे हुआ था. बोला - सर मिस कर गया, वो तो निकल गया. मैंने फिर कहा - आगे रिलायंस पेट्रोल पम्प पर भी एक 'वाइल्डबीन कैफ़े' है, वहाँ चाय मिल सकती है. जगमोहन कूटनीतिक तरीके से मुस्कराते हुये बोला - सर वो भी निकल गया. मेरे दिल में एक वहम हमेशा रहा है, घर से चाय पी कर न निकलो तो कहीं चाय नहीं मिलती. सुबह चाय पी तो क्या थी, निपटा दी थी. चाय पीने वाली फ़ीलिंग नहीं हुयी. मुझे लगा आज अपना टोटका टेस्ट करने के लिये सही दिन है. 

निर्णय ये हुआ कि किसी के यहाँ जाने से पहले थोड़ी पेट पूजा कर ली जाये. गाड़ी हीरा हलवाई की तरफ़ मोड़ दी गयी. दही-जलेबी थी, समोसा था, चटनी थी, लेकिन चाय न थी. बगल में एक चाय की दुकान हुआ करती थी. सुबह की वजह शायद खुली न थी. टहलने के बाद लोग समोसा-जलेबी खा भी लें लेकिन चाय भला कौन पीता है. 

अगला पड़ाव मनु के यहाँ था. कुछ व्यक्तिगत काम था. अब सुबह-सवेरे पौने आठ बजे किसी के घर बिना बताये पहुँच जाओगे तो वो नहाता-धोता ही मिलेगा. आधे घण्टे बाद जब वो बाहर आया तो कहीं जाने के लिये तैयार दिख रहा था. भैया आपका काग़ज़ मेज पर ही रखा हुआ है. आज आपको समय नहीं दे पा रहा हूँ. बेटी का इम्तहान है, उसे लेकर सेंटर जाना है. साथ बेटी भी थी.

वहाँ से निकल कर अपने घर आ गया. जब तक मम्मी-पापा थे, हर महीने दो महीने पर ख़ुद आने की ज़िद कर लेते थे या मुझे धक्का लगा कर भेज देते थे. उनके बाद ये धक्का मुझे ख़ुद को लगाना पड़ता था. इस बार चार महीने से उपर हो चुके थे. मित्र धरम पा जी का विदेश से आगमन न हुआ होता तो शायद ये विज़िट भी टल जाता. उनसे फिर भी मुलाकात उनके भारत आगमन पर किसी न किसी रूप में हो जाया करती थी. उनकी माता जी से मिले अरसा हो गया था. उनसे मिलने की इच्छा इस बार बलवती थी. जो इलाहाबाद खींच लायी. उनके यहाँ बाबा सत्य नारायण की कथा का आयोजन भी था. सोचा घर साफ़-सफ़ाई कर के, दो अभिन्न मित्रों से मिलते हुये जमुनापार धरम पा जी के घर चला जायेगा. तब तक कथा भी समाप्त हो चुकी होगी. प्रसाद लेकर एलआईसी कॉलोनी में मौसी जी का भी आशीर्वाद प्राप्त करता हुआ वापस निकल लूँगा. 

घर महीनों से बन्द था. साफ़-सफ़ाई में दो घण्टे लग गये. तब चाय की याद आयी. घर पर बेसिक कुकिंग की सारी सुविधायें हैं. चाय का रेडी मिक्स भी पिछले विज़िट में रख गया था. इंडक्शन पर पानी चढ़ा दिया. बड़े कॉफ़ी मग में में पूरा सैशे पलट दिया. सोचा अब सुकून से सिप ले ले कर, आराम से बैठ कर, चाय पियूँगा. चाय पीना एक क्रिया है. इसे निपटाना नहीं होता. रेडी मिक्स में पानी डालते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो गया. डिब्बे पर देखा तो चाय अपनी एक्सपायरी पूरी कर चुकी थी. 

अब पवन या शिशिर के यहाँ चाय की टेस्टिंग होनी थी. फोन पर पवन को लेते हुये शिशिर के यहाँ जाने का प्रोग्राम बना. पवन के यहाँ ज़्यादा बैठने कोई इरादा नहीं था. फिर भी भाभी जी ने चाय के लिये आग्रह किया. समयाभाव के कारण हमने शिशिर के यहाँ चलने का निर्णय ले लिया. चलते-चलते भी भाभी जी ने सप्रेम फ़्रिज से निकाल कर चिल्ड लाहौरी जीरा की बोतल पकड़ा दी. शिशिर के यहाँ हम तीनों ने पूरे दो घण्टे नये-पुराने किस्से बुने. एनी बेसेंट स्कूल का नौसटैलजिया ऐसा है कि घण्टों गुज़र जायें और समय कम पड़ जाये. आवभगत के मामले में भाभी जी का जवाब नहीं. क्या-क्या नहीं खिलाया. पर पीने के मामले में बोलीं - गर्मी बहुत पड़ रही है इसलिये माज़ा ला रही हूँ. उनके स्नेह के आगे चाय की फ़र्माइश करने की इच्छा न हुयी. मेरा प्रयोग भी अभी ख़त्म नहीं हुआ था. 

धरम पा जी के यहाँ पहुँचते-पहुँचते तीन-साढ़े-तीन हो चुके थे. तीसरा अध्याय समाप्ति की ओर अग्रसर था. पा जी भाव विभोर से कथावाचक की वचनवक्रता के मुरीद हुये जा रहे थे. जजमान विदेश से आया था इसलिये पंडित जी भी उन्हें पूरी तरह छाप लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. शायद जजमान उनकी विद्वता देख अमरिका बुला ले. आरती-भजन ख़त्म होते-होते समय साढ़े चार के आस-पास पहुँच गया. चरणामृत-प्रसाद ग्रहण करते-करते घड़ी की सुई पाँच पार कर चुकी थी. अभी मौसी से मिलना था और वापस कानपुर भी निकलना था. संयोग से पा जी को भी कहीं एपॉइंटमेंट के लिये देर हो रही थी. चाची जी का चरण स्पर्श करके हम शीघ्र ही धरम पा के साथ उनको उनके गंतव्य पर छोड़ने के लिये निकल पड़े. 

मौसी के यहाँ बचपन से अब तक शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मातृतुल्य मौसी जी ने अपने हाथों से कुछ बना के न खिलाया हो. अब उम्र के इस पड़ाव पर वो वॉकर के सहारे चलने को विवश हैं. वहाँ चाय की इच्छा न थी, बस मौसी से मिलना और उनका आशीर्वाद लेना ही प्रयोजन था. देर पहले ही हो रखी थी. किन्तु तुरन्त उठना भी सही न लगा. इतने दिनों बाद तो आना हुआ था. बेटा-बहू, बच्चों के पास गये हुये थे, इसलिये छोटी बहन उनकी देख भाल को आयी हुयी थी. उसे मालूम था कि दादा चाय को ना नहीं कहते. बोली - दादा आप मम्मी के पास बैठिये, मै चाय बना कर लाती हूँ. मैंने कहा - देखो पहले ही बहुत देर हो चुकी है. कल ऑफ़िस भी है. वापस कानपुर घर पहुँचते-पहुँचते देर हो जायेगी. मन ही मन मुझे डर था कि कहीं ये मेरी बात मान न जाये. शायद उसने मेरे मन को भाँप लिया. वो मुस्कुराई - आप और चाय के लिये मना. बैठिये मै तुरन्त लाती हूँ.  चाय के साथ वो कुछ स्नैक्स भी ले आयी. जिसके लिये मैंने मना कर दिया. शुद्ध खालिस चाय का जो स्वाद था, उसे खराब करने का मेरा कोई इरादा न था. 

लौटते समय 'मोहन पेड़ा' खुला था. हमेशा की तरह कारों का हुजूम खड़ा था. जगमोहन को घर पहुँचने की जल्दी थी. हमारे ख़स्ते-चाय के चक्कर में उसे देर हो जाती. ग्यारह बजे घर पहुँचने के बाद नहा-धो कर कुछ खाने का विचार नहीं आया. श्रीमती जी से बोला - एक कप चाय मिलेगी क्या, कड़क एकदम कड़क.

सवेरे पौने पाँच बजे बाहर से अख़बार और चाय लेकर कार्डियोलॉजी में पिता जी की बेड पर पहुँचा. रात बारह बजे थोड़ी अनइज़ीनेस लगने के कारण पड़ोसी डॉक्टर की सलाह पर पापा को लेकर कार्डियोलॉजी आना पड़ा. बयासी साल की उम्र में पिता जी ने शायद पहली और आख़िरी बार चाय को ना कहा था.

-वाणभट्ट

शनिवार, 9 मई 2026

शुक्रवार, 8 मई 2026

सिक प्लॉट

खेत ख़राब हो गया था. बल्कि ये कहना अधिक उचित होगा कि खेत को जान बूझ के ख़राब किया गया था, विषाणुओं द्वारा. इन सिक प्लाट में फसलों की प्रजातियों की स्क्रीनिंग होती है. जो प्रजाति सिक प्लाट में जी गयी, अमूमन मान लिया जाता है कि उस प्रजाति पर बीमारी का असर नहीं होगा. यहाँ पर ये देखना मुख्य मक़सद है कि कौन-कौन सी वेरायटीज़ फेल हुयी, कौन सी पास. प्रजातियों के चयन का एक टाइम टेस्टेड फ़ॉर्मूला है. रेस में सबको दौड़ा दो, जो जीत गया, वो जीत गया, जो हार गया, वो कहाँ गया. कौन जाने. जो रेस में शामिल नहीं हुये, उन्हें खोजो और खोज के सिक प्लाट में लगाओ. उन्हीं में कहीं प्रतिरोधकता मिल सकती है. गोया मुद्दा है कि-

अब हवायें ही करेंगी रौशनी  का फैसला

जिस दिये में जान होगी वो दिया बच जायेगा - मशहर बदायुँनी  

अब जब दिये को झोंक ही दिया तूफ़ान में, तो बेचारा ऊपर वाले के रहम-ओ-करम से ही बचेगा. बहुत से काम बस इसलिये किये जाते हैं कि हमसे पहले जितने भी विद्वान हुये, उन्हीं के बनाये रास्तों का अनुसरण सफलता की गारेंटी है. लीक से हट कर भला सोचने का न किसी के पास समय है, न माद्दा. पेड़-पौधे अपनी जगह तो छोड़ नहीं सकते. लड़ते तो वो भी होंगे, आखिरी साँस तक सर्वाइवल के लिये कि दो-चार बीज ही बन जायें. उनका वंश तो आगे बढ़ सके. जो प्रजातियाँ फेल हो गयीं, वो भी कहीं न कहीं तो जी ही रही होंगी. लोगों ने नाम मिटा भी दिया तो क्या. जीवन तो चलता रहता है. रेस हारने वाला हर व्यक्ति धरती नहीं छोड़ देता. ये बात शायद पेड़-पौधों पर भी लागू होती हो. 

शर्मा जी का चेहरा फ़क्र से चमक उठता, जब भी किसी को बताते कि उनके दोनों बच्चे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में कैसे पहुँचे. इसके पीछे मिसेज और मिस्टर शर्मा का बड़ा त्याग था. घर में पढ़ाई-लिखाई के माहौल का निर्माण तो माँ-बाप को ही करना होता है. जब तक बच्चों का सेलेक्शन नहीं हो गया, घर में टीवी नहीं आया. तब नेट और मोबाईल का जमाना नहीं था. मनोरंजन के नाम पर रेडियो पर विविध भारती और सीलोन के अलावा कुछ न था. टीवी नया-नया आया था. दस किलोमीटर रेन्ज के टावर्स लगने शुरू हुये थे. जल्द ही टीवी का आकर्षण रेडियो के उपर हावी होने लगा. चित्रहार और फिल्मों का क्रेज़ बढ़ गया. पूरे मोहल्ले ने टीवी ले लिया. बस शर्मा के घर में टीवी नहीं आया. ऐसा नहीं था कि वो अफोर्ड न कर सकते हों. अपने बच्चों को सांत्वना देते रहे कि एक बार सेलेक्ट हो जाओ, फिर ले लेंगे. बच्चों ने उन्हें निराश नहीं किया. लेकिन उनके घर टीवी तब आया जब बड़े बेटे ने जॉब जॉइन कर लिया. माँ-बाप के पास एक्सक्यूज़ था कि अब बच्चे बाहर हैं, तो हम लोग टीवी का क्या करेंगे. जल्द ही दूसरा बेटा भी ग्रेजुएशन कर के जॉब में लग गया. मल्टी-नेशनल कम्पनियाँ थीं. अच्छे पैकेज और पर्क्स थे. 

बच्चे तेज तो थे ही. शीघ्र ही उन्हें अंदाज़ लग गया कि ये कम्पनियाँ दरअसल सस्ते मानव श्रम के लिये भारत में अपने ऑफ़िस खोल लेती हैं. यहाँ की सैलरी और टीए-डीए के दाम में उन्हें विदेशों के प्रोजेक्टस् में काम कराती हैं. पेरेंट्स इसी में खुश की मेरा बेटा हवाई जहाज से यूरोप-अमरीका जा रहा है. वो भी कम्पनी के ख़र्चे पर. वहाँ जा कर उन्हें पता चला कि उसी काम के लिये वहाँ के लोगों की तनख्वाह उनकी सैलरी से दो गुनी और तीन गुनी है. यहाँ पर कम्पनी में मैनेजमेंट हावी था. प्राय: एमबीए किये लोग उच्च पदों पर काबिज़ थे. उनका काम, बड़ी-बड़ी प्लानिंग करना और वो काम दूसरों से करवाना होता है. यहाँ सबॉर्डिनेशन का तरीक़ा ही है हाँकने वाला. वो काम भी बताते, तो मानो आदेश दे रहे हों. इतना पढने-लिखने के बाद कभी-कभी बॉसों बद्तमीज़ी अखर जाती. वो ह्युमिलियेट करने का कोई भी मौका न छोड़ते. टीम में, टीम भावना की कमी बनाये रखना, मैनेजमेंट का गुर था. प्रोफ़ेशनल्स होने के बाद भी प्रमोशंस-इंक्रीमेंट में भाई-भतीजा वाद झलक ही जाता. अब तक वो कई बार कई विकसित देश भ्रमण कर चुके थे. विकसित देशों में वर्किंग एनवायरमेन्ट अलग था. मैनेजमेंट में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं था, कम से कम दिखता तो नहीं था. बाहरी होने के बाद भी सब मिल कर टीम में काम करते. यहाँ पर कई बार उनका सामना देश-समाज में व्याप्त मल्टी लेवल भ्रष्टाचार से भी हो चुका था. बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अन्तर को उन्होंने महसूस किया. इस वातावरण में, विशेषकर विदेश में देखने के बाद, कभी-कभी उन्हें घुटन होने लगती. लगता यही काम हम विकसित देशों में रह कर भी तो कर सकते हैं. उनके ज्ञान चक्षु खुलने लगे. ज्ञान-विज्ञान की कोई सीमा तो है नहीं. दोनों ने निर्णय लिया कि बाहर ही निकल लिया जाये. 

अपने देश में बच्चों को सेटेल करने की जिम्मेदारी भी पेरेंट्स की तब पूरी मानी जाती है, जब तक बच्चों का विवाह न हो जाये. अच्छी नौकरी हो तो शादी में अधिक दिक्कत नहीं होती. शादी करवा के शर्मा जी अभी बहू-बच्चों के सुख की कल्पना में डूबे ही थे, जब बच्चों ने अपना निर्णय सुना दिया. कारण पर्याप्त थे. बच्चों को उन्होंने पढ़ाया ही इसी लिये था कि खुले आसमान में अपनी उड़ान उड़ सकें. अपने लिये उन्हें रोकना, उन्हें उचित नहीं लगा. बुरा भी लगा कि बच्चों के पर निकल आये हैं, निर्णय से पहले पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा. बच्चों का तर्क था, कोई हमेशा के लिये थोड़ी न जा रहे हैं. जैसे बंगलोर, वैसे जर्मनी. जब आप चाहेंगे, हम आ जायेंगे. परिंदे घोसले से इस तरह अचानक उड़ जायेंगे, ऐसा शर्मा जी ने न सोचा था. बच्चे अपना भला-बुरा समझते हैं, ये सोच कर उन्हें संतोष करना पड़ा. 

जिन बच्चों के कारण जो माँ-बाप कभी मोहल्ले वालों की ईर्ष्या के पात्र थे, वही माँ-बाप देश में अकेले रह गये. जितने लोग उतनी बातें. देखो बुढ़ापे में पेरेंट्स को भला कौन छोड़ के जाता है. देश-प्रेम भी कुछ होता है. भाई सेवा ही करनी है तो अपने देश की करो. फ़िरंगी तो अभी भी हमें ग़ुलाम ही समझते हैं. दोयम दर्ज़े का व्यवहार होता है. कभी बच्चों को इतना न पढ़ाओ कि आपके ही काम न आ सकें. इससे अच्छा तो मेरा बेटा है, नौकरी नहीं लगी तो क्या, कम से कम साथ तो रहता है. शर्मा जी को बच्चों के जाने का उतना ग़म नहीं था, जितना पास-पड़ोस-रिश्तेदारों के तानों का था. वो सबसे कटने लगे. अन्दर ही अन्दर कुछ टूट सा गया था. अँग्रेजी में चिकित्सा शास्त्र पढ़े डॉक्टर्स ने उनकी समस्या को मानसिक बीमारी, डिप्रेशन मान लिया. मॉडर्न मेडिकल साइंस में हर मर्ज़ का शर्तिया इलाज है. उस ज्ञान का अर्जन डॉक्टर्स नें वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किया है. आयुर्वेद-योग-ध्यान को टोटका-टोना मानने वालों के तरकश में दवाईयों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है. शर्मा जी को डिप्रेशन से बचाने वाली दवाइयों की डोज़ जैसे-जैसे बढ़ती गयी, उनका मर्ज़ बढ़ता गया. 

मरीज-ए-इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की

मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की - शाद लखनवी 

जिस देश की खासियत है कि लोग दूसरे के दुःख से कम, सुख से अधिक दुःखी होते हों, वहाँ मिसेज और मिस्टर शर्मा अपने बच्चों की सफलता को ठीक से सेलिब्रेट भी नहीं कर पाये. कभी-कभी शर्मा जी लगता कि वो जीत के भी बाज़ी हार गये. हार नहीं मानी थी, तो मिसेज शर्मा ने. वो शर्मा की छोटे बच्चे की तरह देख-सम्हाल करतीं. 

दो-तीन साल बीत गये जब बच्चों को माँ ने पिता के डीप डिप्रेशन के बारे में बताया. वहाँ के व्यवस्थित जीवन में बच्चों के परिवार को रास आ गया था. इसलिये वापस लौटने का प्रश्न न था. बच्चे लायक थे ही. विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में सफल भी थे. अब तक ठीक से इस्टैब्लिश हो चुके थे. उन्होंने पापा-मम्मी को अपने पास बुलाने का निश्चय किया. जिनके बच्चे वहाँ हों, वो अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप को भी ला सकते थे. वहाँ नियमों में ऐसा भी प्रावधान है. उनके देश के लिये काम करने वाले एक्सपीरियेन्सड व्यक्ति को रोकने के संभावनायें तलाश ली जाती हैं. बच्चों और बच्चों के बच्चों के साथ शर्मा का डिप्रेशन छूमंतर हो गया. स्वस्थ लाइफ़ स्टाइल और दिनचर्या के कारण शर्मा की सभी दवायें जल्द बन्द हो गयीं. शर्मा परिवार अब सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एक सफल परिवार था. वहाँ की आबो-हवा उन्हें भा गयी. कभी कभार वो पास-पड़ोस-रिश्तेदारों को वीडियो फोन कर लिया करते. उनके खुशी से दमकते चेहरों को देख इष्ट-मित्रों के चेहरे मुरझा जाते. अब वो एक खुशहाल जीवन जी रहे थे. 

हवा में प्रदूषण कम. एक्यूआई 2-4 के बीच. हरियाली हर तरफ़. टैक्स ज़्यादा पर भ्रष्टाचार कम. इसलिये जनता को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सरकारी सुविधाओं पर भी भरोसा था. शिक्षा लगभग फ़्री. सीनियर सिटिज़न्स को थीं, एडिशनल सुविधायें, वो भी मुफ़्त. शर्मा ने बच्चों के पास वहीं सेटेल होने का निश्चय कर लिया. मिसेज शर्मा भी वो दिन भूल न पायी थीं, कैसे तमाम करीबी पास-पड़ोस-नाते-रिश्तेदारों के रहते हुये भी वो अपने देश, अपने शहर में अकेले रह गये थे. यहाँ सोशल सेक्योरिटी अधिक थी. विकसित, और पचास से अधिक सालों से सतत विकासशील, देश में बड़ा अन्तर है. वहाँ आदमी की वैल्यू थी. कोई जानता हो या न जानता हो, मिलेगा तो आत्मीयता से. मैनर्स, सॉरी-थैंक यू-एक्यूज़ मी, उनको बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है. हमारे यहाँ तो एरोगेंस को स्मार्टनेस का पर्याय मान लिया गया है. जो जितना सक्षम है, उतना ही बदतमीज़. ऊँची- ऊँची बिल्डिंग्स, मॉल्स और मेट्रो से देश नहीं बनता. देश बनता है लोगों से. उनकी शिक्षा व्यवस्था से. वाह्य भौतिक प्रगति जिसे दुनिया देखती है, उस वातावरण का उप-उत्पाद है. शीघ्र ही मिसेज और मिस्टर शर्मा वहाँ रम गये. आखिरी बार वो आये तो अपनी सारी चल-अचल सम्पत्ति डिस्पोज़ करने के लिये आये.  

दस-पन्द्रह दिन के प्रवास में उनका प्रयास था, रिश्तेदारों-पास-पड़ोस से मिल लिया जाये. पता नहीं फिर आना हो, न हो. मेरा उनसे परिचय बस आते-जाते सामने पड़ जाने पर दुआ-सलाम तक ही सीमित था. पता चला कि वो हमेशा के लिये इंडिया छोड़ के जा रहे हैं, तो मेरी जिज्ञासा बलवती हो गयी, ये जानने के लिये कि इस उम्र में कैसे कोई अपना देश छोड़, विदेश में बसने की सोच सकता है. मेरे शाम की चाय के इन्वीटेशन को उन्होंने स्वीकार कर लिया. 

वो शाम को आये. उनके साथ थीं, बच्चों के लिये चॉकलेट्स, हम लोगों के लिये कुछ गिफ्ट्स, और हमें दिखाने के लिये उनकी फ़ोटो एल्बम. चाय पीने के बाद उन्होंने अपनी एल्बम दिखानी शुरू कर दी. साफ़-सुथरे शहर, वेल मेंटेण्ड पार्क्स, नियंत्रित ट्रैफ़िक, मॉल और अस्पताल, सब अद्भुत, सब वर्ल्ड क्लास. हम भारतीयों को सम्वेदना देने की ग़ज़ब बीमारी है. मैंने उनकी दुखती रग कुरेदने की कोशिश की. 'अपने जन्म स्थल से इतनी दूर जा के रहना, वो भी उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ अजीब नहीं है'. दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराये. बोले 'जाना कौन चाहता है, अपना घर, अपना देश छोड़ कर. लेकिन बुज़ुर्गों का जीवन यहाँ कठिन है, विशेषकर जब बच्चे साथ न हों. बच्चों को भी लगता है उन्हें उचित वातावरण नहीं मिला, जिसमें उनकी प्रतिभा को चुनौती मिले. उन्हें लगता कि बाहर उनके काम की अधिक कद्र है, वो ग्रो कर सकते हैं. प्रतिष्ठित कॉलेजों में पढ़ने के बाद भी मेरे बच्चे आय के मामले में भ्रष्ट विभागों के अपने दोस्तों से कहीं पीछे थे. वहाँ वो अच्छा कर रहे हैं. संतुष्ट हैं. सब सुविधायें सबके लिये, और सुविधाओं के लिये किसी प्रकार का संघर्ष नहीं है. यहाँ तो अनार कम और बीमार अधिक हैं. जीवन क्या होता है, वहाँ जा के हमने जाना. कोई आपा धापी नहीं, कोई होड़ नहीं. जीवन में जितना जीवन है, बस उसी को जीना है. अब बच्चे तो आने से रहे. हमारा भी मन लग गया है. तरक्की की होड़ में हमने इंसानियत को तिलांजलि दे दी. शिक्षित लोगों में भी देश-समाज के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना का अभाव है. वहाँ जा के पता लगता है कि वो क्यों विकसित हैं और हम क्यों विकासशील. आप ऐसा वातावरण बनाइये जिसमें लोग फलें-फूलें, आगे बढ़ें. अच्छे लोग जब आगे जाते हैं तो वो देश-समाज को कुछ दे कर ही जाते हैं. इस तरह समाज का विकास होता है. 'सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट' और 'माइट इज़ राइट' का नियम जंगल का कानून हो सकता है, किसी सभ्य समाज का नहीं. सब रेस में लगे हैं, अपने ही पास-पड़ोस-साथी-रिश्तेदारों से आगे निकलने के लिये. देश को अगर विकसित बनना है तो वातावरण बनाना होगा. देश का आधार सुदृढ़ करने के लिये, बच्चों पर, शिक्षा पर निवेश करना होगा. उन्हें सिर्फ़ मैनर्स सिखाना होगा, उन्हें शिक्षा का उद्देश्य सिखाना होगा. शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. 25 साल बाद जो भारत बनेगा, वो सही मायनों में विकसित होगा. जब तक ये बात समझ नहीं आती, लोग इमारतों-मेट्रो और सड़कों विकास मान कर उसी में ही उलझे रहेंगे. ब्रेन ड्रेन न हो इसके लिये, स्कूल से रोजगार तक, एक समन्वित योजना बनानी होगी. ताकि बच्चों को इन्वेंशन और इनोवेशन के लिये प्रोत्साहन मिले'. चन्द घण्टों में उनका पूरा जीवन चरित हमारे सामने था. उनके मन में कहीं ये मलाल ज़रूर था, कि यहाँ सब ठीक होता तो हमें और हमारे बच्चों को बाहर जाने की क्या ज़रूरत थी.

मेरी आँखों के सामने सिक प्लॉट घूम रहा था. प्रजातियों की स्क्रीनिंग के लिये मृदा में विषाणुओं को विकसित किया है ताकि ये चेक किया जा सके कि कौन सी प्रजाति जीवित बचती है. जैसे हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, पेड़-पौधों में भी होगी. एक अवगुण के कारण बाकी सारे गुण समाप्त तो नहीं हो जाते. उसी तरह पेड़ पौधों को भी उनके गुण के आधार पर सेलेक्ट किया जाना चाहिये. स्वस्थ मृदा के खेत में सम्भव है, उसके अन्य गुण निखर के सामने आते. सिर्फ़ उत्पादन और उत्पादकता की रेस में शायद हम खोते जा रहे हैं, उन प्रजातियों को, जिनका चयन स्वाद, गंध, आकार, रंग, व्यन्जन विधि आदि कितने ही गुणों के लिये किया जा सकता था. स्वस्थ मृदा और वातावरण में गुण आधारित स्क्रीनिंग करने की आवश्यकता है. ये कुछ वैसा ही है कि भ्रष्ट और बेईमान समाज में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का फ़ेल हो जाना. दुराग्रही लोगों के बाहुल्य ने पूरे देश को ही सिक प्लॉट बना दिया है. सीधे और शरीफ़ लोग सर्वाईवल मोड में चले जाते हैं. अपने को समाज के हिसाब से फ़िट रखने के प्रयास में लगे रहना, उनके लिये बड़ी चुनौती है. सड़क, बिजली, मेट्रो, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स आदि भौतिक तरक्की की बानगी तो दिखाते हैं, किन्तु गिरते नैतिक मूल्यों और सभ्यता विहीन समाज, निकट भविष्य में हमारे विकसित राष्ट्र के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं. व्यक्तिगत समृद्धि तो हो रही है, किन्तु एक देश, एक समाज के रूप में कभी-कभी लगता है, हम पिछड़ते जा रहे हैं. जिनमें क्षमता-योग्यता होगी, वो सही वातावरण की तलाश में लगा रहेगा. इसलिये जिसको मौका मिल रहा है वो पलायन कर जाता है. चाहे गाँव से शहर की ओर, चाहे शहर से मेट्रो सिटी की ओर, और चाहे मेट्रो सिटी से विदेश की ओर. जिस व्यक्ति के लिये यहाँ सर्वाइव करने के लाले पड़े थे, वही विदेश में झंडे गाड़ रहा है. 

आदमी और पेड़, दोनों में जीवन है. अन्तर बस इतना है, पेड़ स्थिर है, जड़ है, जमीन के बिना उसका अस्तित्व नहीं है. वो अपनी जगह, अपना वातावरण नहीं बदल सकता, आदमी बदल सकता है. आदमी भी जब एक जगह रुक जाता है, तो कुछ-कुछ पेड़ बन जाता है. उसी जमीन, उसी वातावरण में रहना उसकी बाध्यता बन जाती है. 

- वाणभट्ट

मंगलवार, 5 मई 2026

तीसरी आँख

हमारे देश की एक खासियत है. हर व्यक्ति अपने अपने दृष्टिकोण से सही है. और एक खासियत है कि अगर हम गलत हों भी तो मान क्यों लें. अगर आवाज़ में दम है और पीछे से किसी महापुरुष का बैकअप है, तो आप कुछ भी कीजिये, कोई आप का बाल भी बाँका नहीं कर सकता. निरीह वो व्यक्ति है, जिसको संशय है. उसकी बात में वो कॉन्फिडेंस नहीं आता, जितना संशयरहित व्यक्ति की बातों में रहता है. 'मोर स्टडी, मोर कंफ्यूज़न, नो स्टडी नो कंफ्यूज़न' का सिद्धांत जिसने भी प्रतिपादित किया होगा, गहन अनुभव के बाद ही किया होगा. बातों के बताशे फोड़ने वाले, हथेली पर सरसों उगा दें. 

कॉन्फिडेंस की कमी भारत की एक मूल बीमारी है. यहाँ पैदा होने से मरने तक सब अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिये दूसरे का कॉन्फिडेंस तोड़ने में लगे रहते हैं. घर में बाप को और स्कूल में टीचर को सब बच्चे नाकारा लगते हैं, यदि आप टॉप थ्री में रैंक नहीं करते. टॉप टेन तक भी बच्चों को फ़्रंट रो मिल जाती थी. बाकी के कॉन्फिडेंस को तोड़ने में टीचर-माँ-बाप कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ते. पिछली सीट पर बैठने वाले भी कॉन्फ़िडेंट बच्चे होते थे. उन्हें मालूम था कि कब और कितना पढ़ना है. ये न टीचर के हत्थे चढ़े, ना पेरेंट्स के. इनके कॉन्फ़िडेस को ठेस लगाने में कोई कामयाब न हो सका. ये ही वो लोग थे, जो दूसरे के कॉन्फ़िडेस की ऐसी-तैसी करने में लगे रहते. 

जिनमें कॉन्फ़िडेस का बाहुल्य था, उन्हें किसी गुरु, किसी भगवान की ज़रूरत न थी. जिनके पास कमी थी, उन्हीं के लिये आकाश के ऊपर किसी सुपर पावर की परिकल्पना की गयी होगी. स्वर्ग-नर्क और पुनर्जन्म का कांसेप्ट भी उन्हीं के लिये खोजा गया होगा. जिनका ये फण्डा क्लियर हो गया कि इस जीवन के पहले और बाद कोई जीवन नहीं है, तो समझ लीजिये उसे किसी देवी-देवता की ज़रूरत नहीं है. वो कर्म के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. लेकिन प्रायः तभी तक जब तक उसका सामना असफलता से नहीं होता. सफलता और असफलता में बस इतना ही अन्तर है कि जब तक आदमी सफल हो रहा होता है, सारा श्रेय स्वयं के कर्म और मेहनत को देता है, और असफल होते ही उसका ठीकरा प्रभु की मर्ज़ी पर फोड़ देता है. प्रभु को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप उसे मानते हैं या नहीं. उसकी प्रेम की कृपा-वृष्टि सबके उपर समान रूप से बरसती रहती है. उसे महसूस करने के लिये आपको दिव्य-दृष्टि चाहिये. 

कभी कभी व्यक्ति अपने घमंड में अपनी औकात से ज़्यादा पंगे ले लेता है. तो उपर वाला अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने के लिये बिना आवाज़ की लाठी का प्रयोग कर लेता है. जिन देशों में नियम-कानून का राज है, वहाँ भगवान को जल्दी कोई याद नहीं करता. लेकिन जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उन्हें भी भगवान की ज़रूरत पड़ ही जाती है. विकसित सुविधा संपन्न देशों में कोई कारण नहीं है कि कोई भगवान को याद करे और याद करे भी तो क्यों. लेकिन द्वैत जीवन का हिस्सा है. सफलता है तो कहीं बगल में असफलता इंतज़ार कर रही होगी. सुख है तो दुःख भी आ सकता है. इसका उल्टा भी होता है. सुख-दुःख, सफलता-असफलता का कॉम्बो पैक है. जीवन, उतार-चढ़ाव का नाम है. निश्चय ही सरल रेखा तो नहीं होता. ईसीजी की सीधी लाइन कौन देखना चाहता है. 

सुमेरु पर्वत पर विश्व विजेताओं के नाम लिखने के लिये जगह ही नहीं है. हर सौ साल में हज़ार-पाँच सौ के नाम लिख जाते हैं. सिकन्दर जब विश्व विजय करके सुमेरु पर्वत पर नाम लिखवाने की गरज से पहुँचा, तो दरबान ने बिना इंप्रेस हुये उसे एक चॉक थमा दी और कहा जाओ जा के अपना नाम लिख आओ. थोड़ी देर बाद सिकन्दर परप्लेक्स मूड में बाहर आया और दरबान से बोला कहाँ लिखूँ, वहाँ कोई कोना भी खाली नहीं है. दरबान आराम से बोला - जाओ कोई भी नाम मिटा के अपना लिख लो. बताने वाले बताते हैं कि सिकन्दर को उसी पल ब्रह्म ज्ञान मिल गया और वो बिना नाम लिखे लौट आया. 

हमारे यहाँ, जहाँ प्राय: माइट को ही राइट समझ लिया जाता है, तो मानसिक सुकून के लिये दो-चार भगवान (बाप) तो नीचे ही बनाने पड़ जाते हैं. अगर नहीं बना पाये, तो ये समझ लीजिये, देर-सवेर आपको असली बाप (भगवान) की ज़रूरत पड़ने वाली है. 

जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों, 

मै नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों. 

तब शर्मा नया रंगरूट था. उसे लगता था दुनिया पलट देगा. सो जहाँ जाता एक न एक बखेड़ा कर आता. आज़ादी के सत्तर सालों में एक सिस्टम बना है, लोग उसमें फ़िट होने में लगे हैं, और भाई सुधार करने लग जाते. तब तक तो फिर भी ठीक था जब तक बाहरी विभागों से भिड़ते रहे. अपने विभाग में पंगा नहीं लेना था. सिनियर्स ने समझाया. खामख्वाह रगड़ दिये जाओगे. क्रांतिकारी विचारधारा वाले अगर समझाने से समझ जाते तो हम अभी भी क्वीन विक्टोरिया के सामने सजदा कर रहे होते. किसी भी सिस्टम के उत्थान में तमाम अनाम लोगों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है, जिन्होंने नक्कारखाने में तूती की आवाज़ को मरने नहीं दिया. अपने त्याग का लाभ उन्हें भले न मिला हो, लेकिन अगली पीढ़ियों ने उनका लाभ उठाया. नयी पीढ़ी को उन अंजान लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, जिनके नाम सिस्टम की मेमो फ़ाइलों में आज भी कहीं दफ़्न पड़े होंगे. 

लड़ने-भिड़ने की भी एक उम्र होती है. शर्मा को भी उम्र से मात मिलनी ही थी. समाज सुधार के लिये लड़ने वाले ने हथियार डाल दिये और आत्म सुधार के मार्ग पर चल दिया. वैसे भी हमारे यहाँ कहा गया है - हारे को हरि नाम. और हरि भी बिना गुरु के तो मिलते नहीं. सो शर्मा जी ने एक गुरु खोज निकाला. गुरु ने गारेंटी ली कि इसी जन्म में ईश्वर से साक्षात्कार करवा देगा बशर्ते वो उनकी बताई विधि का पालन करे. इसके  लिये कोई कठिन विधि भी नहीं बतायी. आरम्भ एक जगह स्थिर बैठ के साँसों पर ध्यान लगाने से था, बस. थोड़ा अभ्यास करना पड़ता है. चलते-फिरते आदमी का एक जगह बैठना ही कठिन है लेकिन शर्मा को गुरु पर पूरा विश्वास था. वो जैसा कहते शर्मा उसको शब्दशः फॉलो करता. 

आँख बन्द करते ही उसका ध्यान लग जाता. साँसों की माला में लगातार हरि का नाम सुमिरता रहता. उसका अंतरज्ञान निरन्तर विकसित हो रहा था. सामने घट रहे घटनाक्रम के पीछे की पृष्ठभूमि भी उसके सामने होती. बिना प्रभावित हुये साक्षी भाव से दुनिया की माया को निर्लिप्त भाव से देखने की अपनी क्षमता पर उसे स्वयं आश्चर्य होता. शब्दों और पंक्तियों को ही नहीं पंक्तियों के बीच की भाषा भी वो समझ जाता. वो ये भी सोच लेता कि सामने वाला क्या सोच रहा है. वो ध्यानावस्था में बिना हिले-डुले घण्टों बैठा रहता. कभी-कभी उसे यकीन होने लगता, उसका तीसरा नेत्र जागृत हो रहा है. 

एक दिन किसी सामाजिक कार्यकलाप के लिये शहर के नामचीन होटल में जाना हुआ. बहुत दिनों बाद होटल के रिसेप्शन पर आदमक़द आईने से सामना हुआ था. उसका तीसरा नेत्र खुल चुका था. शर्ट के 5वें और 6वें बटन के मध्य.

-वाणभट्ट

शनिवार, 2 मई 2026

कृषि शोध में साइंस का प्रादुर्भाव

सभा भवन में छिहत्तर रंगरूट शोधकर्ता बैठे हुये थे. उनकी ट्रेनिंग का पहला दिन था और इंट्रोडक्शन चल रहा था. तभी मुख्य ट्रेनिंग अधिकारी ने हवा में एक प्रश्न उछाल दिया - ये बताइये आपमें से कितने छात्रों का पैशन था, कृषि क्षेत्र में शोध करने का. हँसती-मुस्कुराती सभा में सन्नाटा छा गया. केवल तीन हाथ ही उठे. ये एक सटीक आंकलन भी था कि उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों का मात्र 4 प्रतिशत छात्र ही शिक्षण या शोध से जुड़ना चाहता है. 

ये लगभग 30 साल पुराना परिदृश्य है. साठ और सत्तर के दशक में जन्मे लोगों को भली-भाँती याद होगा कि तब कृषि की पढ़ाई वही लोग किया करते थे, जिन्हें स्वयं को ही नहीं, उनके पिता जी और पास-पड़ोस को भी ये विश्वास होता था कि बेटे से इन्टर में बायो या मैथ्स नहीं चलनी. तब पास-पड़ोस मोहल्ला वैसा नहीं था, जैसा अब होता है, इनडिफ़रेन्ट. सभी अतिशय कंसर्न्ड होते थे. किस-किस का बेटा हाईस्कूल या इंटर का बोर्ड दे रहा है, पूरे मोहल्ले को पता होता था. हाईस्कूल के अंकों के आधार पर निर्णय लिया जाता था कि लड़का साइंस पढ़ने लायक है भी या नहीं. लायक है तो मैथ्स के मार्क्स के आधार पर उसे पीसीएम पढ़ने या बायो के मार्क्स के हिसाब से उसे जेडबीसी पढ़ने की सलाह दी जाती थी. कला या वाणिज्य के क्षेत्र उसके बाद क्रमशः, दूसरी और तीसरी पसन्द हुआ करते थे. कृषि की तो कोई बात भी नहीं करता था. जिनके चाचे-मामे-ताये, कृषि क्षेत्र से किसी न किसी रूप में जुड़े थे, उन्हें ही मालूम था कि कृषि में रोजगार का क्या पोटेंशियल है. हर्डल रेस दो तरह की हो सकती है. एक - हर्डल के ऊपर से. उसके लिये आपको अधिक प्रयास करना होता है. दूसरी - हर्डल के नीचे से सर्राते हुये निकल जाओ. फिनिश पॉइंट पर देर-सबेर सब पहुँच ही जाते हैं. वहाँ सब बराबर हैं. 

सरकारें समानता और बहुजन हिताय के सिद्धान्त को ध्यान में रख कर काम करती हैं. इसीलिये तो सभी डिग्री वाले एक ही तराजू में तौल दिये गये. उनकी नज़र में, इन्जीनियरिंग हो या मेडिकल, सितार हो या तबला, सब बराबर. नतीजा ये हुआ कि नौकरी लगने के बाद क्या साइंस-क्या मैथ्स और क्या कला-क्या संगीत. सब एक समान. यहाँ किसी विषय की श्रेष्ठ्ता सिद्ध करने का इरादा नहीं है. लेकिन हॉबीज़ और विषयों में कुछ फ़र्क किया जा सकता है. कुछ लोग स्नातक लेने में ही रगड़ दिये जाते हैं, कुछ हँसते-खेलते ग्रेजुएट हो जाते. उन्हें मिडनाईट ऑयल बर्निंग का पता ही नहीं. प्रशासनिक सेवाओं के लिये योग्यता स्नातक की ही थी और आज भी है. डिग्री के विषयों से कोई अन्तर नहीं पड़ता. किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन्जीनियरिंग के छात्र भी आर्ट्स के विषय लेकर एग्जाम लिखते हैं, और सफल भी होते हैं. प्रशासनिक सेवा के माध्यम से देश सेवा का अरमान भी ग्रेजुएशन करते-करते जगता था. वहाँ सब धान बाईस पसेरी. बीए पास जब प्रशासन में आता है तो उसका साइंस के प्रति जो कॉम्प्लेक्स, हाईस्कूल-इन्टर से बना था, उसकी कसर वो इन्जीनियर और डॉक्टर से जरुर निकालता है. अब उसका काम, काम करना नहीं करवाना है. और जो काम करेगा, उसके काम और उसमें कमी निकालना, काम करने से कहीं आसान है. 

शोध और शिक्षण सेवाओं में भी जो लोग आते हैं, उन्हें प्राय: पता नहीं होता कि पीएचडी कर क्यों रहे हैं. एक भाई ने तो सेब की जगह केला लिख कर पूरी थीसिस जमा कर दी. एग्ज़ामिनर शरीफ़ था, उसने जहाँ-जहाँ सेब रह गया था वहाँ-वहाँ करेक्शन्स करवाके डिग्री दिलवा दी. बच्चे हैं, गल्तियाँ बच्चों से ही होती हैं. जब तक प्रशानिक सेवा के अटेम्प्ट बचे रहते हैं, तब तक युनिवर्सिटी के हॉस्टल एक आश्रय का काम करते हैं. और पिता जी से भी सिविल की तैयारी के नाम पर पैसे माँगने में संकोच कम होता है. तीन के अलावा जो तिहत्तर लोग थे, उन सब के अटेम्प्ट या तो ख़त्म हो चुके थे या ख़त्म होने वाले थे. उसके पहले ही शोध का एग्जाम क्रैक कर लिया था. एक अदद नौकरी की दरकार तो सबको होती है. जब तक नीली बत्ती न मिले तब तक कुछ तो करना ही है. पोस्टिंग होने के बाद उनमें से कई ने हार नहीं मानी. अपने-अपने शहर का आईएएस स्टडी सर्कल ज्वाइन कर लिया. कोचिंग के लिये अर्जित और चिकित्सा अवकाश ले कर, जीएस के लिये दिल्ली में भी डेरा डाल आते. जब तक अटेम्प्ट बचे रहते, वो आईएएस की तरह ही बिहेव करते. आदत पहले से बनानी होती है. प्रीलिम्स और मेन्स तक जाने के कारण, साथी शोधकर्ताओं में भी उनकी हनक बनी रहती. जब यूपीएससी में बात न बनती तो टारगेट बदल कर यूपीपीएससी कर लिया जाता. तुर्रा ये कि देश की सेवा करेंगे तो प्रशासक बन कर ही. शोध का निरीह रुतबा विहीन जीवन, उनके बस की बात न थी. नौकरी हो तो जलवे वाली. कुछ ने सफलता अर्जित की. प्रॉपर और अलाइड सर्विसेस में उनका सेलेक्शन विभाग के लिये भी गर्व का विषय बना. रुतबे के चक्कर में, कुछ ने तहसीलदार पद को तरजीह देते हुये शोध मार्ग का परित्याग कर दिया. जो शोध में बने रह गये, उनके लिये शोध एक मज़बूरी था. कुछ ने पार्ट टाइम कोचिंग खोल ली, कुछ ने एकेडेमी बना ली, कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये क्वेश्चन बैंक बना डाले. जिनकी लह गयी, वो कोचिंग में लिप्त हो गये. जिनकी नहीं चली उनके दिल में प्रशासक बनने की इच्छा दबी की दबी रह गयी. जिसके अन्कुर हमेशा सीने में दफ़न रहे और पद मिलते ही प्रस्फुटित हो गये.

एक कहावत है पूत के पाँव पालने से ही दिखने शुरू हो जाते हैं. दसवीं-बारहवीं तक आते-आते शिक्षकों को भी अंदाज़ लग जाता है कि बच्चे के लिये मैथ्स सही होगी या बायो. लेकिन शायद ही कोई कृषि के बारे में सोचता हो. मैथ्स और बायो स्ट्रीम का बच्चा ख़ुद जब तक दो-एक प्रयास न कर ले, इन्जीनियरिंग और मेडिकल का सपना पाले बैठा रहता है. उसके बाद विकल्प बचता है, ग्रेजुएशन में बीएससी बायो या मैथ्स का. उन दिनों बायो ग्रुप के बच्चे जोलॉजी-बौटनी-केमिस्ट्री में बीएससी करना पसंद करते थे. मैथ्स वाले स्नातक में फ़िजिस्क-केमिस्ट्री-मैथ्स लेते थे. एग्रीकल्चर वही पढ़ने जाते थे, जिन्हें आभास रहता था कि बीएससी-जेडबीसी की प्योर साइंस, थ्योरेटिकल और टफ़ है. एग्रीकल्चर अप्प्लाईड क्षेत्र है, यहाँ थोड़ी साइंस और थोडा प्रयोग कर के साइंस में डिग्री मिल जाती है. जिनकी साइंस इन्टर तक अच्छी हुआ करती थी, वो इंजिनियर या डॉक्टर बन गये. उसके बाद भी जिसकी साइंस में रूचि थी, उन्होंने स्नातक में पीसीएम या जेडबीसी विषय चुने. जिनका साइंस से वास्ता सबसे कम था, उन्होंने कृषि का वरण किया. कम्पटीशन कोई भी हो, हमारे ग्रेडिंग सिस्टम की विशेषता है कि सबका वर्गीकरण कर देता है. कोई टॉप करेगा तो कोई लास्ट भी आयेगा. अब तो कृषि एक बहुत ही रोजगार परक विषय बन गया है, इसलिये कम्पटीशन बढ़ने से अच्छे बच्चे विज्ञान से अधिक कृषि को प्रेफरेंस दे रहे हैं. लेकिन तीस-चालीस साल पहले ये बात न थी. छिहत्तर में मात्र तीन की शोध में रूचि, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था. 

जब आईएएस-पीसीएस के सभी अटेम्प्ट समाप्त हो गये तो साइंस करनी ही थी. नौकरी के इस चरण में सारा माया-मोह भंग हो चुका होता था. जब लगता, अब साइंस किये बिना गुजारा नहीं चलने वाला, तो साइंस भी कर लेते. पीएचडी तक तो यही किया. पीएचडी गुरु के प्रति अतीव श्रद्धा भाव रखने का बाइप्रोडक्ट है. नौकरी के इस दौर में ही साइंस का प्रादुर्भाव होना लाज़मी है. साइंस भी क्या थी, जो बीएससी-एमएससी-पीएचडी में किया था, करना वही था. इस शोध में कुछ ऐसी शाखायें हैं, जिनमें विशेष उपकरणों की आवश्यकता भी नहीं होती. हाथ झुलाते हुये आइये और साठ के होते ही हाथ झुलाते हुये निकल लीजिये. बहुत तो अपने प्रमोशन के मद्देनज़र जो कुछ लिखा-पढ़ी की क़वायद की थी, वो यथावत अपने ऑफ़िस में छोड़ कर निकल गये. नये बच्चे समझ न पाते कि उस विरासत (कबाड़) का करें तो करें क्या. वो भी दस साल पहले किये गये कामों पर पुन: प्रोजेक्ट ऐसे बनाते जैसे अब तक किसी ने कुछ किया ही नहीं. पोस्ट साइंस की है, तो तनख्वाह भी उसी बात की  मिलनी थी. जहाँ तनख्वाह है, वहाँ प्रमोशन है. प्रमोशन है तो बॉस हैं. बॉस हैं तो चमचे हैं. चमचे हैं तो साइंस वही है, जो वो करें-कहें. कृषि की साइंस में आप चाहते कुछ हैं और होता कुछ है. बायलॉजिकल मटेरियल है. तमाम फैक्टर्स हैं - देश-काल-वातावरण-भूमि-जल-वर्षा हैं. कोई भी फैक्टर गड़बड़ाया तो नतीजा बदल सकता है. अन्य साइंस की तरह, यहाँ प्रयोगों को दोहराना थोडा कठिन है. इसलिये कृषि साइंस में एक इन्हेरेन्ट फेक्सिबिलिटी है. चूँकि ये प्रायोगिक विषय भी है इसलिये फसल प्रबन्धन को आर्ट/कला भी माना जा सकता है. 

अब जब आज़ादी के सत्तर साल बाद प्राकृतिक और आर्गेनिक खेती की बात होती है तो इन्हें लगता है कि अंग्रेज़ी में पढ़ा इनका सारा ज्ञान धराशायी न हो जाये, इसलिये कुछ गूढ़ विषय, बायो-टेक्नॉलजी, नैनो-टेक्नॉलजी, बायो-इंफोर्मेटिक्स आदि नये विषयों में प्रमुखता से निवेश किया जा रहा है. वैश्विक परिदृश्य में नवीन विषयों में निवेश और शोध आज की आवश्यकता भी है. समस्या ये है कि इनके अधिकान्श लक्ष्य काल्पनिक हैं. एक ऐसी सुपर रेस विकसित करने की परिकल्पना है, जिसमें रोग-कीट-जलवायु परिवर्तन-सूखा-जल भराव-पोषण आदि समस्त समस्याओं का स्थायी निदान हो जाये. सुपर ह्यूमन रेस की अवधारणा पर कई विज्ञान कथायें लिखी जा चुकी हैं और उन पर फिल्में भी बनी हैं. वैसे कभी-कभी लगता है, सभी समस्याओं की जड़ आदमी के दिमाग़ को ही जीन स्तर पर सुधार दिया जाये, तो बहुत सी समस्यायें स्वतः ही समाप्त हो जायेंगी. यदि प्रबन्धन मात्र से उत्पादन बढ़ भी गया तो उसमें साइंस क्या. भोजन का हव्वा दिखाये बिना फण्ड नहीं मिलता. ये बात अलग है कि रसायन आधारित खेती से उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन डॉक्टर्स के यहाँ भीड़ भी बढ़ी है. भूख से कम और खा-खा कर मरने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुयी है. कृषि शोध में प्रजातियों का विकास और विकास करने वालों का दर्जा सबसे ऊपर है. ये कृषि की सभी समस्याओं का निदान प्रजाति विकास में देखते हैं. भगवान रचित डायवर्सीटी में नित्य प्रति मानव निर्मित डायवर्सीटी ऐड होती जा रही है. जिस तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद और होम्योपैथी को हिकारत से देखता है, इनके लिये भी पारम्परिक बीजों द्वारा प्राकृतिक और जैविक खेती के लाभ को स्वीकार करना कठिन है. अब जब फिर मोटे अनाज और प्राकृतिक खेती की बात हो रही है, इन्हें लगता है इनके अंग्रेज़ी में पढ़े ज्ञान को चुनौती दी जा रही है. आज कृषि को एक समेकित-समावेशी विज्ञान की आवश्यकता है. जो मानव-मृदा-जल सभी के लिये सतत रूप से स्वस्थ और लाभकारी हो. ये तो तय है कि 10-12 हज़ार पहले खेती के आरम्भ से पहले भी पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिये पर्याप्त भोजन था. वो व्यवस्था टिकाऊ थी और पर्यावरण अनुकूल भी. हज़ार-दो हज़ार साल का अंग्रेज़ी में पढ़ा-पढ़ाया ज्ञान सस्टेनेबल होगा या नहीं, अब लोगों को शक़ होने लगा है. रासायनिक खादों, कीटनाशकों और खर-पतवारनाशी के अन्धाधुन्ध उपयोग के कारण, अविश्वास और विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं. विज्ञान सतत प्रवाहमान है. विभिन्न विषयों की संकीर्ण विचारधारा से विज्ञान का विकास सम्भव नहीं है.

और कुछ हो न हो, नौकरी में प्रमोशन का एक सटीक विज्ञान होता है. ठीक वैसे ही जैसे दो दुनी चार होता है. सीआर आउटस्टैंडिंग प्राप्त करने का सेट पैटर्न है. काम उतना जितना सीआर में लिखना हो. कोई कॉलम खाली नहीं रहना चाहिये. सो शोधकर्ता से कुछ भी करा लीजिये. कम से कम प्रमोशन के लिये, जितना करना हो उतना तो कर ही लेता है. प्रमोशन भी समय निर्धारित है. यदि आप का दृष्टिकोण सुधारवादी नहीं है, तो कोई माई का लाल नहीं है, जो प्रमोशन रोक ले. नतीजा पिरामिड उलट गया है, प्रोफ़ेसर अधिक और असिस्टेंट कम हो गये हैं. शोधकर्ता पूरा मैनेजर बन गया है. और मैनेजर कुछ भी मैनेज कर सकता है. वो शोध भी करता है, उसे छपवाता है, नेटवर्किंग करता है, मेला भी लगाता-लगवाता है, गाहे-बगाहे सेमिनार-सिम्पोजिया में शिरकत करके अपनी और अपने विषय की प्रासंगिकता बनाये रखता है, कभी-कभी बुद्धि मन्थन (ब्रेन स्टोर्मिंग) भी करवा देता है. वो हर वो काम करने को आतुर रहता है, जिसके लिये क्रेडिट मिल रहा हो. कभी-कभी तो दूसरों का क्रेडिट भी हड़पने से नहीं चूकता. ये पेटेन्ट की प्रथा इसीलिये बनायी गयी है, ताकि शोधकर्ता को उसका लाभ मिल सके. लेकिन चूँकि हर फ़ाइल नीचे से ऊपर तक जाती है, तो कुछ लोगों को इसलिये कृतार्थ करना पड़ता है कि फ़ाइल रुक ना जाये. यहाँ उनकी भूतकाल में की गयी प्रशासन की पढ़ाई काम आती है. येन-केन-प्रकारेण काम करवाना-निकलवाना नितान्त आवश्यक है. आज का शोध स्मार्ट शोध है. यदि आपका लक्ष्य प्रमोशन मात्र हो तो बिना स्मार्टनेस के भूल जाइये. शिक्षा और शोध कभी हॉबी हुआ करते थे, अब चूँकि शिक्षा और शोध नौकरी बन गये हैं तो नौकरी में प्रमोशन के जितने हथकंडे हैं, सब अपनाने पड़ते हैं. जिसमें सबसे पहली कड़ी है, बॉस. बाबा रहीम दास जी पहले ही बता गये थे - 

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।

रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥

आप ने गलती से ये वहम पाल लिया कि साइंस करके आप कोई तोप मार लेंगे तो आप को ग़लतफ़हमी का इलाज कराना चाहिये, यदि उसका कोई इलाज हो, तो. बड़े-बड़े आये और बह गये. विनम्रता ज्ञानियों का लक्षण है. इसलिये शोधकर्ता को अतिशय विनम्र होना चाहिये. एरियर, टीए और मेडिकल बिल रुक जाये, तो भले लड़ लीजिये, लेकिन साइंस के लिये दुश्मनी मोल लेने की ज़रूरत नहीं है. जिनका बचपन से साइंस और नवोन्मेषी विचारों से ज़्यादा सरोकार न रहा हो, उनके हिस्से साइंस आयेगी तो वो साइंस को रॉकेट साइंस बना के मानेंगे. वैसा ही काम करेंगे, जिसे या तो आत्मा समझ सके या परमात्मा. अपने विषय की विशिष्टता में इतना डूबे रहते हैं कि दूसरे क्षेत्रों में क्या हो रहा है, इससे इनको कोई सरोकार नहीं रहता है. बीस साल फसल की ऊँचाई बढ़ाने में बर्बाद कर दिये. यदि इन्जीनियर को समस्या बतायी होती तो वो बताता कि कम्बाइन की कटर बार को नीचा करना पौधे को ऊँचा करने से अपेक्षाकृत आसान और सरल विकल्प था. नया करने के नाम पर कुछ लोग शैटरिंग रेजिस्टेंट प्रजाति बनाने की सोच रहे हैं, ताकि कटाई के समय शैटरिंग न हो. कोई ऐसी प्रजाति की खोज में लगा है जो कीटों के दांत खट्टे कर दे. इनोवेशन के नाम पर पुराने कामों को नये कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. रोग और कीट प्रतिरोधी बीजों के विकास से आसान, फसलों का प्रबंधन है. मृदा स्वास्थ्य के बिना खेती, सतत खेती नहीं बन सकती. जल और मृदा संरक्षण कृषि शोध का एक उपेक्षित पक्ष रहा है. लेकिन इन कामों में शोध से अधिक सुनियोजित योजनाओं की आवश्यकता होती है. फण्ड की उपलब्धता वो सागर है जहाँ शोध करने की तमन्नायें हिलोरें मारने लगती हैं. फण्ड न हो तो न कोई समस्या हो, न उनके समाधान की तलाश. 

एकल दिशा में फंडिंग से कृषि शोध के अन्य आयाम संकुचित हो कर रह गये हैं. विशेष रूप से कृषि अभियांत्रिकी. सभी विद्यालयों-संस्थानों में कृषि के सभी विषयों के विभाग मिल जायेंगे, बस अभियांत्रिकी नहीं मिलेगा. जबकि कृषि की लागत कम करने और उत्पादन का समुचित उपयोग करने में इस विधा का महती योगदान है. बस दिक़्क़त ये है कि अप्लाइड साइंस में कुछ भी ढँका-छिपा नहीं रहता, इसलिये ये साइंस जैसा नहीं लगता. चन्द्रयान की सफलता मौलिक और व्यवहारिक विज्ञान की सफलता की चरम परिणति है. दोनों मिल के काम करें तो इसमें कोई शक़-शुबहा नहीं है कि कृषि को एक लाभकारी उद्यम बनाया जा सकता है. जैसा पहले कहा जा चुका है, साइंस को आत्मा-परमात्मा के बीच की चीज़ न बनाइये. कई बार बक्से के बाहर समस्या का समाधान होता है, किन्तु ये कर्मयोगी अपने विषय पर ही काम करते रहेंगे, चाहे किसी और ने समाधान निकाल लिया हो. 

आज कृषि की 90 प्रतिशत समस्याओं को उचित फसल प्रबंधन और कृषि अभियांत्रिकी के द्वारा मैनेज किया जा सकता है. शोध बैकयार्ड में किया जाने वाला काम है, सामने तो तकनीक या उत्पाद ही दिखता है. लेकिन शोध को हाईलाईट करने के चक्कर में शोधपत्रों की महिमा को ज़रूरत से ज़्यादा तरजीह दे दी गयी. सब प्रबंधन के बजाय, समाधान पर लट्ठ लिये पिले पड़े हैं. समाधान के प्रयास पहले से होते चले आ रहे हैं. ये कभी ख़त्म नहीं होते, जीवन भले कम पड़ जाये. सिस्टम का सीधा सरल सपाट सिद्धांत है, काम ऐसे ही करते रहिये, जैसे सब करते रहे हों. सब तर गये आप भी तर जाइये. सिस्टम, सिस्टम से चलता है. इस के हिसाब से ख़ुद को ढालिये. इसके अनुसार स्वयं को सुधारने की तो गुन्जाइश है, लेकिन सिस्टम के सुधरने की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमोशन विज्ञान के रूल्स एकदम क्लियर रखिये. सबके दिन फिरते हैं, बस सब्र रखिये. तब तक पद न मिले, चुप मार के वही कीजिये जिसे आपके पियर्स साइंस मानते हैं. प्रशासन के गुण तो पहले से ही विद्यमान हैं, पद पा कर वो पुष्पित और पल्लवित होंगे. जब आप ऊपर पहुँच जायेंगे, तब साइंस भी करवा लीजियेगा. अभी तो वही साइंस है, जो ऊपर वाला कहे. प्रमोशन विज्ञान में इस बात का बहुत महत्त्व है - बॉस इज़ आलवेज़ राईट. 

जिन तीन लोगों ने हाथ उठाया था, वो कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, ये कोई नहीं जानता. लेकिन ये तो तय है कि बाकी तिहत्तर इतिहास लिख रहे होंगे और शोध में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहे होंगे.  

-वाणभट्ट

वैधानिक चेतावनी: इस लेख में उल्लिखित वृतान्तों का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है. चरित्र में किसी प्रकार का मेल संयोग मात्र है. ये लेख उनके लिये नहीं है जो साइंस में विज्ञान खोजने में सक्षम हैं. इस लेख का उद्देश्य मौलिकता और व्यवहारिकता के समेकित समाधान परक शोध की ओर ध्यान आकर्षित करना है. जिन्हें शोध के नाम पर लकीर पीटने की आदत है, उन्हें ये आलेख बुरा लग सकता है. कृपया अपने रिस्क पर पढ़ें. 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

कृषि शोध का चतुर्थ आयाम

कृषि शोध केन्द्र में फसल उत्पादन में वृद्धि के सुझावों के लिये एक हाई पावर कमेटी बैठी थी. कमेटी की अध्यक्षता कृषि शोध क्षेत्र की एक नामचीन हस्ती, डॉ. सत्य आधार जी कर रहे थे. कमेटी क्या थी, कृषि क्षेत्र की समस्त विधाओं के विद्वतजनों का समागम था. अपने ओपनिंग रिमार्क में ही चेयरमैन साहब ने उवाचा - कृषि उत्पादन में वृद्धि लाना आज की आवश्यकता है. वर्तमान परिस्थितियों में जब कृषि बहुत आगे निकल आयी है, ये काम कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. मात्र लाइन सोइंग से हम उत्पादन 15% बढ़ा सकते हैं. मात्र प्लान्टर का प्रयोग हमें उत्पादन में 15% की वृद्धि देने में सक्षम है. ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग करके हम जल उपयोग दक्षता बढाने के साथ साथ उत्पादन में 15% वृद्धि पा सकते हैं. मैकेनाइज्ड क्रॉप प्रोडक्शन से हम कृषि लागत को कम और कृषक आय में वृद्धि कर सकते हैं. इन्जीनियर्स के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. आप लोगों को इस दिशा में काम करना चाहिये. 

संयोग से कृषि अभियंत्रण अनुभाग का एकाकी अभियन्ता और अनुभागाध्यक्ष भी सभा में उपस्थित था. जिसे कुछ दिन पहले ही नया-नया चार्ज मिला था. उससे रहा नहीं गया. बोल पड़ा - सर आप ने बहुत ही अच्छे सुझाव दिये हैं. दो हेक्टेयर लैंड हमें भी मिल जाती तो ये देखा जा सकता है कि इंजीनियरिंग इन्टरवेन्शन्स से कितनी उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है. हम लोग उत्पादन वृद्धि के अधिकान्श प्रयास प्रजातियों के विकास में कर रहे हैं. यदि मात्र मैकेनाइज़ेशन से लागत कम और उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है, तो ऐसे अप्प्लाईड प्रयोग भी होने चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रमों में ये भी देखना चाहिये कि क्रॉप मैनेजमेन्ट से कितनी वृद्धि सम्भव है. प्रजातियों के विकास में उसके ऊपर उत्पादन वृद्धि को लक्ष्य करने का प्रयास करना चाहिये. फसल उन्नयन प्रोग्राम्स की टीम में कृषि के अन्य विषयों की तरह अभियान्त्रिकी को भी शामिल करना चाहिये. बहुत सी समस्याओं का निदान प्रबंधन द्वारा किया जा सकता है, उन पर शोध में समय और धन व्यय करने से बचा जा सकता है. 

उसे लगा कि चेयरमैन साहब उसके इस उद्बोधन से प्रसन्न हो कर शाबाशी देंगे. लेकिन वहाँ सभा में सन्नाटा छा गया. उसे जरा भी भान नहीं हुआ कि सभी को साँप क्यों सूँघ गया. उसे ये भी नहीं लगा कि उसने कोई गलत बात कह दी है. लेकिन सत्य आधार जी का आधार हिलने लगा. बड़े लोगों को सुनाने की आदत होती है, सुनने की नहीं. उसके बाद उन्होंने इन्जीनियर को जो-जो सुनाया है और जिन-जिन शब्दों में सुनाया है, उन शब्दों का प्रयोग किसी भी सभ्य समाज में वर्जित माना जाता है. फिर भी यदि पढने की इच्छा हो तो पाठकों को पिछले ब्लॉग जीनोटाइप (https://vaanbhatt.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) पर जाना पड़ेगा. 

उसका परिणाम ये हुआ कि शीघ्र ही कृषि अभियन्त्रण अनुभाग का विलय अन्य विभाग में कर दिया गया. ताकि कोई इन्जीनियर पियर रिव्यू मीटिंग में अपना ज्ञान बघारने की हिमाक़त न कर सके. अपने लोगों की बात अपनों में ही रहे तो अच्छा. आउट ऑफ़ बॉक्स विचार, और ऐसे विचार वाले लोग, बॉक्स के बाहर ही रहे तो ही अच्छा.  

भारत में कृषि शिक्षा और शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. इस सन्दर्भ में वाणभट्ट का पुराने ब्लॉग - कृषि शोध की दशा और दिशा (https://vaanbhatt.blogspot.com/2025/03/blog-post_31.html?m=1) पर जाने की कृपा करें. बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कृषि शिक्षा के महत्त्व को समझा गया. इसी दशक में शाही कृषि अनुसन्धान संस्थान और इलाहाबाद कृषि संस्थान भी अपने अस्तित्व में आये. जहाँ कृषि शिक्षा की विभिन्न विधाओं पर अध्ययन, अध्यापन व शोध का कार्य आरम्भ हुआ. शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में मानव श्रम को कम करने के उद्देश्य से अभियान्त्रिकी आवश्यकता का अनुभव किया गया. इस दिशा में प्रथम प्रयास भी इलाहाबाद कृषि संस्थान से हुआ. कृषि में अभियान्त्रिकी के महत्त्व को देखते हुये, वर्ष 1943 में संस्थान ने कृषि अभियान्त्रिकी में पहला स्नातक पाठ्यक्रम आरम्भ किया. आईएआरआई, आईआईटी, खड़गपुर और पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय  में क्रमशः  1945, 1952 और 1960 में कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना हुयी. आज कृषि अभियान्त्रिकी शिक्षा लगभग सभी कृषि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उपलब्ध है. साठ के दशक में कृषि क्षेत्र में हुयी हरित क्रांति में कृषि अभियान्त्रिकी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. ये बात अलग है कि उन्नत प्रजातियों को पूरा श्रेय दिया गया.

आज़ादी के 80 साल होने जा रहे हैं और देश में कृषि मशीनीकरण अभी भी मात्र 45-55 प्रतिशत ही हुआ है, जबकी अनेक विकसित और विकासशील देशों में मशीनीकरण 90-95 प्रतिशत हो चुका है. इसके पीछे देश में लघु और सीमान्त किसानों की अधिक संख्या और छोटी जोत को मुख्य कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जहाँ समस्या है, वहीं तो समाधान खोजने की आवश्यकता है. हमारा कृषि शोध आज भी उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि में उलझा हुआ है. सारे प्रयास उत्पादन बढ़ाने के लिये किये जा रहे हैं. जबकि किसान इससे कहीं आगे निकल गया है. वो कम ख़र्च पर टिकाऊ और लाभदायक खेती की बात कर रहा है. यदि शोध आवश्यकताओं के अनुसार नहीं होंगे तो किस लिये होंगे. कृषि क्षेत्र में मजदूरों की घटती संख्या आज चिंता का प्रमुख विषय है. इस कारण खेती के रकबे घटते और बढ़ते रहते हैं. जिन फ़सलों में मशीनीकरण अधिक हुआ है, वे कृषकों की प्रमुख पसंद बनाते जा रहे हैं. जिन राज्यों ने कृषि अभियान्त्रिकी के विकास पर ध्यान दिया, उन राज्यों में कृषि उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है. मध्य प्रदेश पहला राज्य बना, जिसने कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना की. यंत्र दूत योजना के माध्यम से प्रदेश के कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ लागत में कमी भी आयी है. प्रदेश में निदेशालय की सफलता के परिदृश्य में सभी राज्यों में कृषि अभियंत्रण निदेशालय के स्थापना की पहल आरम्भ हो चुकी है. 

कृषि शिक्षा और शोध में उन्नत प्रजातियों के विकास, नवीन उत्पादन पद्यतियों और फसल संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुये हैं और हो रहे हैं. किन्तु आज आवश्यकता किसान को कृषि से जोड़े रखने की है. यह तभी सम्भव है है जब कृषि को व्यवसाय के रूप में किया जाये और ये एक लाभकारी उद्यम बन सके. छोटी जोत और अधिक उत्पादन लागत के कारण कृषक परिवार खेती से विमुख होते जा रहे हैं और ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो नियमित आय का जरिया बन सकें. विकसित देशों में लैंड होल्डिंग्स बड़ी हैं इसलिये वहाँ मशीनीकरण एक आवश्यकता बन गया है. हमारे देश में छोटी जोत के कारण मशीनों में निवेश कम है. इस कारण फसल उत्पादन के प्रमुख चरणों में मानव श्रम की उपलब्धता एक संकट बन जाता है. समय से कृषि कार्य न हो पाने से फसल की हानि के साथ-साथ कृषि लागत में भी वृद्धि होती है. कृषि शोध संस्थानों में कृषि के तीन आयामों - 1. प्रजाति उन्नयन, 2. उत्पादन तकनीक और 3. पादप संरक्षण पर तो बहुत कार्य हो रहा है. किन्तु कृषि अभियन्त्रण की दिशा में पूर्ण समर्पण के साथ विशेष प्रयास नहीं किया जा रहा है. 

उच्च स्तर पर गठित वरिष्ठ अधिकारियों की समीतियाँ, कृषि अभियान्त्रिकी की आवश्यकता पर तो बल देती हैं, लेकिन इसके लिये एक पूर्ण विकसित (फुल फ्लेजेड) विभाग की संस्तुति नहीं करतीं. कारण कुछ और नहीं है, लोग अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के दायरे में ही सोचने को विवश हैं. जो उन्होंने पढ़ा है या जो उन्हें पढ़ाया गया है, उससे इतर वो न सोचना चाहते हैं, न समझना.  वर्तमान में कृषि क्षेत्र की अधिकांश समस्याओं का निराकरण अभियन्त्रण के माध्यम से किया जा सकता है. किन्तु प्रयुक्त (एप्लाइड) शोध की तुलना में मौलिक (बेसिक) शोध अधिक चुनौतीपूर्ण लगता है. साठ शोधकर्ता और छिहत्तर परियोजनाओं के मॉडल से शोध पत्र तो निकल सकते हैं किन्तु ऐसी समेकित तकनीक का विकास सम्भव नहीं है, जिसे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके. आज की आवश्यकता है, साठ शोधकर्ताओं को छ: लक्ष्य उन्मुख (टारगेट ओरिएंटेड) परियोजनाओं पर केन्द्रित करना. जिसमें मृदा सम्वर्धन, जल संचयन-संरक्षण, मशीनीकरण, कृषि उत्पादन से लेकर भण्डारण-प्रसंस्करण और कृषि के उप और सह उत्पादों का उपयोग भी सम्मिलित हो. टीम के माध्यम से हर विषय एक दूसरे से पृथक नहीं, पूरक बन के काम करेंगे और एक सम्पूर्ण (कम्प्लीट) तकनीक के विकास में सहायक होंगे. 

विकसित देशों के कृषि मॉडल में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 1-2 प्रतिशत है तो लगभग उतनी ही जनसँख्या कृषि उत्पादन में संलग्न है, जबकि भारत में कृषि, सकल घरेलू उत्पाद में 16-18 प्रतिशत का योगदान करता है किन्तु कृषि पर निर्भर जनसँख्या 45-50 प्रतिशत है. इसलिये विकसित देशों के मॉडल को हम पूर्णरूप से नहीं अपना सकते. भारत के लिये आवश्यक है कि वो कृषि एवं कृषि से सम्बद्ध क्षेत्रों को एक उद्योग के रूप में विकसित करें. इसके लिये कृषि शोध की दिशा में भी एक आमूल-चूल परिवर्तन की दरकार है. हाशिये में डाल दिये गये कृषि अभियंत्रण शोध को कृषि शोध के अन्य आयामों के साथ समन्वित करना न सिर्फ़ आज की आवश्यक है, बल्कि भारतीय कृषि का भविष्य भी है. लाभदायक कृषि के द्वारा ही भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, कृषि, को सुदृढ़ किया जा सकता है और उसके द्वारा प्राप्त आय में निरन्तरता प्राप्त की जा सकती है. लाभ, आज समाज का मूलमन्त्र है और इसकी स्थापना के लिये कृषि शोध को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है. लाभप्रदता के लिये कृषि शोध को आज समग्र सम्पूर्णता से देखना आवश्यक है. 

मृदा एवं जल संरक्षण अभियान्त्रिकी, सिंचाई और जल निकासी अभियान्त्रिकी, कृषि शक्ति एवं यंत्र अभियांत्रिकी, प्रसंस्करण एवं खाद्य अभियन्त्रिकी, आदि विषय कृषि अभियान्त्रिकी के प्रमुख घटक हैं. एक या दो अभियांत्रिकी संस्थान समस्त कृषि उत्पादों की समस्त समस्याओं का वृहद स्तर पर समाधान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिये हर संस्थान में एक कृषि अभियंत्रण विभाग की स्थापना की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिये. यदि संस्थान लाभोन्मुखी  परियोजनाओं पर कार्य करेंगे, तभी उनके द्वारा विकसित तकनीकें अपना कर किसान लाभान्वित हो सकेंगे. भविष्य में वो ही शोध संस्थान सफल होंगे जो अपने संसाधनों का सृजन स्वयं कर सकेंगे. इसके लिये उन्हें कृषि से जुड़े उद्योगों से जुड़ कर उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर शोध करना होगा. इस कार्य में कृषि अभियन्त्रण विभाग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. देश का कृषक और कृषि आधारित उद्योग, आज सम्पूर्ण तकनीक, उत्पादन से अंतिम उत्पाद तक, माँग रहा है. इसलिये प्रयोग भी समेकित होने चाहिये. खण्ड-खण्ड में किये गये श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य एक सम्पूर्ण तकनीक में परिवर्तित नहीं हो सकते. इसके लिये आवश्यकता है, कृषि के अन्य आयामों के साथ कृषि शोध के चतुर्थ आयाम - कृषि अभियांत्रिकी को सुदृढ़ करने की.

जड़त्व का सिद्धांत है कि जो वस्तु जैसे चल रही है वैसे ही चलती रहती है (और रुकी है तो रुकी रहती है) जब तक कोई वाह्य बल नहीं लगता. भारतीय कृषकों और कृषि आधारित उद्योगों की आकांक्षायें व अपेक्षायें वही बल हैं, जो कृषि शोध को एक नयी दिशा प्रदान करेंगी.

-वाणभट्ट

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत औ...