अगर मै कहूँ की चाय की लत मुझे विरासत में मिली तो शायद गलत न होगा. कोई छोटा बच्चा दूध न पिये तो माँ का मन नहीं मानता. वो सारे जतन कर लेगी कि बढ़ते बच्चे के विकास में कोई कमी न रह जाये. जब उन्होंने देख लिया कि बच्चे को चाय का रंग ही पसन्द है, तो चाय का विकल्प निकाला गया, बॉर्नविटा. बचपन से बॉर्नविटा के साथ दूध पीने वाले शुद्ध शहरी बच्चे को शुद्ध दूध हजम होने से रहा. घी का हाल तो और बुरा था. दाल में माँ घी डाल देती तो मुझे तैरता बाल नज़र आता. ये जो हाइट पाँच फ़िट पाँच इंच पर अटक गयी, उसका दोष मै किसी और को नहीं दे सकता. हालात ये हैं कि आज भी अलबत्ता तो दूध पीता नहीं और पीता भी हूँ तो कुछ न कुछ एडिटिव डाल कर.
सुबह उठते ही फ्रेश होने के बाद पिता जी चाय पी कर ही निकलते. सुबह पाँच बजे. हमारे घर में चाय पौने पाँच पर बन जाती थी. लौटने के बाद, दूसरा कप और नाश्ते के साथ तीसरा. दिन में कितने हुये उसका हिसाब नहीं. लेकिन वापस घर आने पर चाय तो बननी ही थी. तब न टीवी था, न मोबाइल. ज्ञान बाँटने के विधाओं से सभी वंचित थे. चाय के गुण-अवगुण के बारे में बताने वालों का नितान्त अभाव था. बल्कि मेरे एक मित्र के पिता जी बताया करते थे कि टी बोर्ड की नौकरी में लोगों को चाय फ़्री पिलाया करते थे, ताकि लोगों को चाय का चस्का लगे. और हिंदुस्तानियों की एक बात तो माननी पड़ेगी, अमिताभ अगर फ़ण्डू च्यवनप्राश का एड कर दे तो हम आराम से मान लें कि उनकी सेहत का राज़ यही है. अगले एड में वही फ़ायम चूर्ण के गुण गाते नज़र आ सकते हैं. जब आदत लग रही थी तब किसी ने कोई वैधानिक चेतावनी नहीं दी थी कि चाय सभी बीमारियों की जड़ है. सरदर्द का तो आज भी सबसे कारगर इलाज चाय ही है.
पूरे घर की आदत बदस्तूर चलती रही, पिता जी के रिटायर होने के बाद भी. बस फ़र्क़ इतना हुआ कि सुबह चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरे हिस्से आ गयी. पौने पाँच बजे की चाय के लिये श्रीमती जी ने हाथ खड़े कर दिये थे. अब दूसरी चाय मेरे टहल के लौटने के बाद होती. पिता जी बालकनी में टहलते और मेरे लौटने का इंतज़ार करते.
उस दिन जगमोहन को सुबह पाँच बजे बुला लिया था. इलाहाबाद जाना था. जब से सठियाया हूँ, श्रीमती जी अकेले कार ले कर जाने को मना करती हैं. विशेषकर शहर से बाहर. साठ के बाद बगावती तेवर भी ढीले पड़ जाते हैं, चाहे घर में हो या बाहर. वैसे भी जिनकी जीत में मज़ा आता हो, उनसे हारना भी आनन्ददायी होता है. अब तक ये समझ आ गया होता है कि दुनिया चलाना बस उसी का काम है. चपरासीनुमा अफ़सर और अफ़सरनुमा चपरासी (कॉपीराइट - श्री लाल शुक्ल) सब उसी का खेल है. कभी-कभी ये भी लगता है कि इललॉजिकल बॉस और लॉजिकल सबोर्डिनेट बना कर भगवान ने गलती तो नहीं कर दी. तब जा कर पूर्व जन्मों के कर्मों पर विश्वास होने लगता है. बहरहाल अब ये भी विश्वास होने लगा है कि सुकरात अगर समय से पहले पैदा हो जाये तो समाज उसे जहर न दे तो उसका करे क्या. मौका लगा है तो चिटकाता चलूँ कि बीस साल पहले ही मुझे अंदाज़ था कि मनुष्य के डॉक्टर्स ह्युमन हेल्थ की बात करेंगे और कृषि के डॉक्टर्स सॉयल हेल्थ, फ़सल प्रबंधन और कृषक आय की बात करेंगे. जो आज होता दिख रहा है. बीस साल बाद के लिये ये लिखे दे रहा हूँ कि सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट धूल फ़ाँकते नज़र आयेंगे. आदमी और पेड़-पौधों का होलिस्टिक इलाज होगा. दो हज़ार साल की अंग्रेज़ी साइंस, अरबों साल की पृथ्वी की प्राकृतिक जीवन शैली पर हावी हो गयी है. विज्ञान का प्रयास जहाँ तक प्रकृति को समझने तक सीमित था, वहाँ तक विज्ञान ने प्रगति की. विज्ञान के साइंस बनने के बाद इंसान भगवान के डोमेन में हस्तक्षेप करने लगा. यहीं से साइंस ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ आरम्भ कर दिया. आज वातावरण में व्याप्त विसंगतियों के मूल में मानव द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिये प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित व अनियंत्रित दोहन ही जिम्मेदार है. देर-सवेर साइंस को वापस विज्ञान पर लौटना होगा. प्राकृतिक का अध्ययन करो, उस पर नियंत्रण का प्रयास नहीं. ऐसी धरती का निर्माण जहाँ धरती पर सब प्राणियों का बराबर हिस्सा हो. ये बात अलग है कि तब शायद हम फिर झिंगालाल-हूम करते घूम रहे हों. साइंस फ़िक्शंस में दो हज़ार साल बाद जिस विकास की कल्पना प्रस्तुत की जाती है उसका उलट भी हो सकता है. जिस तरह मानव, साइंस के नाम पर सेल्फ़ डिस्ट्रक्शन्स का इंतज़ाम करता घूम रहा है, जीवन बचा ले जाना ही चुनौती है.
पौने पाँच बजने से पहले ही जगमोहन ने घण्टी बजा दी. नहा-धो के चाय के कप को हाथ लगाया ही था. जितनी जल्दी निकलेंगे उतनी ही जल्दी वापस लौटने की प्रक्रिया होगी. सो हड़बड़ी में बिना चुस्की लिये, चाय गले में उतार ली. इरादा था 'मोहन पेड़ा' पर उनकी चाय का लुफ़्त लिया जायेगा. जगमोहन भाई का हाल ये है कि वो क्या खाते-पीते हैं और कब खाते-पीते हैं, उनके साथ कई बार रहने के बाद भी मुझे पता नहीं लग सका. जब मै और जो मै खाता, उसी से उनका काम चल जाता. शायद ही उन्होंने कभी अपनी तरफ़ से चाय-कॉफ़ी-स्नैक्स या खाने की डिमांड की हो.
जब 'मोहन पेड़ा' के सामने से निकले, उसके खुलने का समय नहीं हुआ था. फ़तेहपुर के पास एक 'मोरिंगा' रेस्टोरेंट खुला था. जगमोहन को वहाँ रोकने के लिये बोल कर मै फ़ेसबुक पर बर्थडे की विशेज़ और व्हाट्सएप्प पर गुड मॉर्निंग के अपने दैनिक शगल में लग गया. जब इससे फ़ारिग हुआ तो पूछा - अभी तक 'मोरिंगा' नहीं आया. जगमोहन खाली सड़क पर कार दाबे हुआ था. बोला - सर मिस कर गया, वो तो निकल गया. मैंने फिर कहा - आगे रिलायंस पेट्रोल पम्प पर भी एक 'वाइल्डबीन कैफ़े' है, वहाँ चाय मिल सकती है. जगमोहन कूटनीतिक तरीके से मुस्कराते हुये बोला - सर वो भी निकल गया. मेरे दिल में एक वहम हमेशा रहा है, घर से चाय पी कर न निकलो तो कहीं चाय नहीं मिलती. सुबह चाय पी तो क्या थी, निपटा दी थी. चाय पीने वाली फ़ीलिंग नहीं हुयी. मुझे लगा आज अपना टोटका टेस्ट करने के लिये सही दिन है.
निर्णय ये हुआ कि किसी के यहाँ जाने से पहले थोड़ी पेट पूजा कर ली जाये. गाड़ी हीरा हलवाई की तरफ़ मोड़ दी गयी. दही-जलेबी थी, समोसा था, चटनी थी, लेकिन चाय न थी. बगल में एक चाय की दुकान हुआ करती थी. सुबह की वजह शायद खुली न थी. टहलने के समय लोग समोसा-जलेबी भले खा लें लेकिन चाय भला कौन पीता है.
अगला पड़ाव मनु के यहाँ था. कुछ व्यक्तिगत काम था. अब सुबह-सवेरे पौने आठ बजे किसी के घर बिना बताये पहुँच जाओगे तो वो नहाता-धोता ही मिलेगा. आधे घण्टे बाद जब वो बाहर आया तो कहीं जाने के लिये तैयार दिख रहा था. भैया आपका काग़ज़ मेज पर ही रखा हुआ है. आज आपको समय नहीं दे पा रहा हूँ. बेटी का इम्तहान है, उसे लेकर सेंटर जाना है. साथ बेटी भी थी.
वहाँ से निकल कर अपने घर आ गया. जब तक मम्मी-पापा थे, हर महीने दो महीने पर ख़ुद आने की ज़िद कर लेते थे या मुझे धक्का लगा कर भेज देते थे. उनके बाद ये धक्का मुझे ख़ुद को लगाना पड़ता था. इस बार चार महीने हो चुके थे. मित्र धरम पा जी का विदेश से आगमन न हुआ होता तो शायद ये विज़िट भी टल जाता. उनसे फिर भी मुलाकात उनके भारत आगमन पर किसी न किसी रूप में हो जाया करती थी. उनकी माता जी से मिले अरसा हो गया था. उनसे मिलने की इच्छा इस बार बलवती थी. जो इलाहाबाद खींच लायी. उनके यहाँ बाबा सत्य नारायण की कथा का आयोजन भी था. सोचा घर साफ़-सफ़ाई कर के, दो अभिन्न मित्रों से मिलते हुये जमुनापार धरम पा जी के घर चला जायेगा. तब तक कथा भी समाप्त हो चुकी होगी. प्रसाद लेकर एलआईसी कॉलोनी में मौसी जी का आशीर्वाद भी प्राप्त करता हुआ वापस निकल लूँगा.
घर महीनों से बन्द था. साफ़-सफ़ाई में दो घण्टे लग गये. तब चाय की याद आयी. घर पर बेसिक कुकिंग की सारी सुविधायें हैं. चाय का रेडी मिक्स भी पिछले विज़िट में रख गया था. इंडक्शन पर पानी चढ़ा दिया. बड़े कॉफ़ी मग में में पूरा सैशे पलट दिया. सोचा अब सुकून से सिप ले ले कर, आराम से बैठ कर, चाय पियूँगा. चाय पीना एक क्रिया है. इसे निपटाना नहीं होता. रेडी मिक्स में पानी डालते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो गया. डिब्बे पर देखा तो चाय अपनी एक्सपायरी पूरी कर चुकी थी.
अब पवन या शिशिर के यहाँ चाय की टेस्टिंग होनी थी. फोन पर पवन को लेते हुये शिशिर के यहाँ जाने का प्रोग्राम बना. पवन के यहाँ ज़्यादा बैठने कोई इरादा नहीं था. फिर भी भाभी जी ने चाय के लिये आग्रह किया. समयाभाव के कारण हमने शिशिर के यहाँ चलने का निर्णय ले लिया. चलते-चलते भी भाभी जी ने सप्रेम फ़्रिज से निकाल कर चिल्ड लाहौरी जीरा की बोतल पकड़ा दी. शिशिर के यहाँ हम तीनों ने पूरे दो घण्टे नये-पुराने किस्से बुने. एनी बेसेंट स्कूल का नौसटैलजिया ऐसा है कि घण्टों गुज़र जायें और समय कम पड़ जाये. आवभगत के मामले में भाभी जी का जवाब नहीं. क्या-क्या नहीं खिलाया. पर पीने के मामले में बोलीं - गर्मी बहुत पड़ रही है इसलिये माज़ा ला रही हूँ. उनके स्नेह के आगे चाय की फ़र्माइश करने की इच्छा न हुयी. मेरा प्रयोग भी अभी ख़त्म नहीं हुआ था.
धरम पा जी के यहाँ पहुँचते-पहुँचते तीन-साढ़े-तीन हो चुके थे. तीसरा अध्याय समाप्ति की ओर अग्रसर था. पा जी भाव विभोर से कथावाचक की वचनवक्रता के मुरीद हुये जा रहे थे. जजमान भी विदेश से आया था इसलिये पंडित जी भी उन्हें पूरी तरह छाप लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. शायद जजमान उनकी विद्वता देख अमरिका बुला ले. आरती-भजन ख़त्म होते-होते समय साढ़े चार के आस-पास पहुँच गया. प्रसाद ग्रहण करते-करते पाँच हो चुका था. अभी मौसी से मिलना था और वापस कानपुर भी निकलना था. संयोग से पा जी को भी कहीं एपॉइंटमेंट के लिये देर हो रही थी. चाची जी का चरण स्पर्श करके हम शीघ्र ही धरम पा के साथ उनको उनके गंतव्य पर छोड़ने के लिये निकल पड़े.
मौसी के यहाँ बचपन से अब तक शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि मातृतुल्य मौसी जी ने अपने हाथों से कुछ बना के न खिलाया हो. अब उम्र के इस पड़ाव पर वो वॉकर के सहारे चलने को विवश हैं. वहाँ चाय की इच्छा न थी, बस मौसी से मिलना और उनका आशीर्वाद लेना ही प्रयोजन था. देर पहले ही हो रखी थी. किन्तु तुरन्त उठना भी सही न लगा. इतने दिनों बाद तो आना हुआ था. बेटा-बहू, बच्चों के पास गये हुये थे, इसलिये छोटी बहन उनकी देख भाल को आयी हुयी थी. उसे मालूम था कि दादा चाय को ना नहीं कहते. बोली - दादा आप मम्मी के पास बैठिये, मै जल्दी से चाय बना कर लाती हूँ. मैंने कहा - देखो पहले ही बहुत देर हो चुकी है. कल ऑफ़िस भी है. वापस कानपुर घर पहुँचते-पहुँचते देर हो जायेगी. वो मुस्कुराई - आप और चाय के लिये मना. बैठिये मै तुरन्त लाती हूँ. मन ही मन मुझे डर था कि कहीं ये मेरी बात मान न जाये. चाय के साथ वो कुछ स्नैक्स भी ले आयी. जिसके लिये मैंने मना कर दिया. शुद्ध खालिस चाय का जो स्वाद था, उसे खराब करने का मेरा कोई इरादा न था.
लौटते समय मोहन पेड़ा खुला था. हमेशा की तरह कारों का हुजूम खड़ा था. जगमोहन को घर पहुँचने की जल्दी थी. ख़स्ते-चाय के चक्कर में देर हो जाती. ग्यारह बजे घर पहुँचने के बाद नहा-धो कर कुछ खाने का विचार नहीं आया. श्रीमती जी से बोला - एक कप चाय मिलेगी क्या, कड़क एकदम कड़क.
सवेरे पौने पाँच बजे बाहर से अख़बार और चाय लेकर कार्डियोलॉजी में पिता जी की बेड पर पहुँचा. रात बारह बजे थोड़ी अनइज़ीनेस लगने के कारण पड़ोसी डॉक्टर की सलाह पर पापा को लेकर कार्डियोलॉजी आना पड़ा. बयासी साल की उम्र में पिता जी ने शायद पहली और आख़िरी बार चाय को ना कहा था.
- वाणभट्ट
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