मंगलवार, 5 मई 2026

तीसरी आँख

हमारे देश की एक खासियत है. हर व्यक्ति अपने अपने दृष्टिकोण से सही है. और एक खासियत है कि अगर हम गलत हों भी तो मान क्यों लें. अगर आवाज़ में दम है और पीछे से किसी महापुरुष का बैकअप है, तो आप कुछ भी कीजिये, कोई आप का बाल भी बाँका नहीं कर सकता. निरीह वो व्यक्ति है, जिसको संशय है. उसकी बात में वो कॉन्फिडेंस नहीं आता, जितना संशयरहित व्यक्ति की बातों में रहता है. 'मोर स्टडी, मोर कंफ्यूज़न, नो स्टडी नो कंफ्यूज़न' का सिद्धांत जिसने भी प्रतिपादित किया होगा, गहन अनुभव के बाद ही किया होगा. बातों के बताशे फोड़ने वाले, हथेली पर सरसों उगा दें. 

कॉन्फिडेंस की कमी भारत की एक मूल बीमारी है. यहाँ पैदा होने से मरने तक सब अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिये दूसरे का कॉन्फिडेंस तोड़ने में लगे रहते हैं. घर में बाप को और स्कूल में टीचर को सब बच्चे नाकारा लगते हैं, यदि आप टॉप थ्री में रैंक नहीं करते. टॉप टेन तक भी बच्चों को फ़्रंट रो मिल जाती थी. बाकी के कॉन्फिडेंस को तोड़ने में टीचर-माँ-बाप कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ते. पिछली सीट पर बैठने वाले भी कॉन्फ़िडेंट बच्चे होते थे. उन्हें मालूम था कि कब और कितना पढ़ना है. ये न टीचर के हत्थे चढ़े, ना पेरेंट्स के. इनके कॉन्फ़िडेस को ठेस लगाने में कोई कामयाब न हो सका. ये ही वो लोग थे, जो दूसरे के कॉन्फ़िडेस की ऐसी-तैसी करने में लगे रहते. 

जिनमें कॉन्फ़िडेस का बाहुल्य था, उन्हें किसी गुरु, किसी भगवान की ज़रूरत न थी. जिनके पास कमी थी, उन्हीं के लिये आकाश के ऊपर किसी सुपर पावर की परिकल्पना की गयी होगी. स्वर्ग-नर्क और पुनर्जन्म का कांसेप्ट भी उन्हीं के लिये खोजा गया होगा. जिनका ये फण्डा क्लियर हो गया कि इस जीवन के पहले और बाद कोई जीवन नहीं है, तो समझ लीजिये उसे किसी देवी-देवता की ज़रूरत नहीं है. वो कर्म के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. लेकिन प्रायः तभी तक जब तक उसका सामना असफलता से नहीं होता. सफलता और असफलता में बस इतना ही अन्तर है कि जब तक आदमी सफल हो रहा होता है, सारा श्रेय स्वयं के कर्म और मेहनत को देता है, और असफल होते ही उसका ठीकरा प्रभु की मर्ज़ी पर फोड़ देता है. प्रभु को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप उसे मानते हैं या नहीं. उसकी प्रेम की कृपा-वृष्टि सबके उपर समान रूप से बरसती रहती है. उसे महसूस करने के लिये आपको दिव्य-दृष्टि चाहिये. 

कभी कभी व्यक्ति अपने घमंड में अपनी औकात से ज़्यादा पंगे ले लेता है. तो उपर वाला अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने के लिये बिना आवाज़ की लाठी का प्रयोग कर लेता है. जिन देशों में नियम-कानून का राज है, वहाँ भगवान को जल्दी कोई याद नहीं करता. लेकिन जीवन के किसी न किसी मोड़ पर उन्हें भी भगवान की ज़रूरत पड़ ही जाती है. विकसित सुविधा संपन्न देशों में कोई कारण नहीं है कि कोई भगवान को याद करे और याद करे भी तो क्यों. लेकिन द्वैत जीवन का हिस्सा है. सफलता है तो कहीं बगल में असफलता इंतज़ार कर रही होगी. सुख है तो दुःख भी आ सकता है. इसका उल्टा भी होता है. सुख-दुःख, सफलता-असफलता का कॉम्बो पैक है. जीवन, उतार-चढ़ाव का नाम है. निश्चय ही सरल रेखा तो नहीं होता. ईसीजी की सीधी लाइन कौन देखना चाहता है. 

सुमेरु पर्वत पर विश्व विजेताओं के नाम लिखने के लिये जगह ही नहीं है. हर सौ साल में हज़ार-पाँच सौ के नाम लिख जाते हैं. सिकन्दर जब विश्व विजय करके सुमेरु पर्वत पर नाम लिखवाने की गरज से पहुँचा, तो दरबान ने बिना इंप्रेस हुये उसे एक चॉक थमा दी और कहा जाओ जा के अपना नाम लिख आओ. थोड़ी देर बाद सिकन्दर परप्लेक्स मूड में बाहर आया और दरबान से बोला कहाँ लिखूँ, वहाँ कोई कोना भी खाली नहीं है. दरबान आराम से बोला - जाओ कोई भी नाम मिटा के अपना लिख लो. बताने वाले बताते हैं कि सिकन्दर को उसी पल ब्रह्म ज्ञान मिल गया और वो बिना नाम लिखे लौट आया. 

हमारे यहाँ, जहाँ प्राय: माइट को ही राइट समझ लिया जाता है, तो मानसिक सुकून के लिये दो-चार भगवान (बाप) तो नीचे ही बनाने पड़ जाते हैं. अगर नहीं बना पाये, तो ये समझ लीजिये, देर-सवेर आपको असली बाप (भगवान) की ज़रूरत पड़ने वाली है. 

जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों, 

मै नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों. 

तब शर्मा नया रंगरूट था. उसे लगता था दुनिया पलट देगा. सो जहाँ जाता एक न एक बखेड़ा कर आता. आज़ादी के सत्तर सालों में एक सिस्टम बना है, लोग उसमें फ़िट होने में लगे हैं, और भाई सुधार करने लग जाते. तब तक तो फिर भी ठीक था जब तक बाहरी विभागों से भिड़ते रहे. अपने विभाग में पंगा नहीं लेना था. सिनियर्स ने समझाया. खामख्वाह रगड़ दिये जाओगे. क्रांतिकारी विचारधारा वाले अगर समझाने से समझ जाते तो हम अभी भी क्वीन विक्टोरिया के सामने सजदा कर रहे होते. किसी भी सिस्टम के उत्थान में तमाम अनाम लोगों की एक लम्बी फ़ेहरिश्त है, जिन्होंने नक्कारखाने में तूती की आवाज़ को मरने नहीं दिया. अपने त्याग का लाभ उन्हें भले न मिला हो, लेकिन अगली पीढ़ियों ने उनका लाभ उठाया. नयी पीढ़ी को उन अंजान लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये, जिनके नाम सिस्टम की मेमो फ़ाइलों में आज भी कहीं दफ़्न पड़े होंगे. 

लड़ने-भिड़ने की भी एक उम्र होती है. शर्मा को भी उम्र से मात मिलनी ही थी. समाज सुधार के लिये लड़ने वाले ने हथियार डाल दिये और आत्म सुधार के मार्ग पर चल दिया. वैसे भी हमारे यहाँ कहा गया है - हारे को हरि नाम. और हरि भी बिना गुरु के तो मिलते नहीं. सो शर्मा जी ने एक गुरु खोज निकाला. गुरु ने गारेंटी ली कि इसी जन्म में ईश्वर से साक्षात्कार करवा देगा बशर्ते वो उनकी बताई विधि का पालन करे. इसके  लिये कोई कठिन विधि भी नहीं बतायी. आरम्भ एक जगह स्थिर बैठ के साँसों पर ध्यान लगाने से था, बस. थोड़ा अभ्यास करना पड़ता है. चलते-फिरते आदमी का एक जगह बैठना ही कठिन है लेकिन शर्मा को गुरु पर पूरा विश्वास था. वो जैसा कहते शर्मा उसको शब्दशः फॉलो करता. 

आँख बन्द करते ही उसका ध्यान लग जाता. साँसों की माला में लगातार हरि का नाम सुमिरता रहता. उसका अंतरज्ञान निरन्तर विकसित हो रहा था. सामने घट रहे घटनाक्रम के पीछे की पृष्ठभूमि भी उसके सामने होती. बिना प्रभावित हुये साक्षी भाव से दुनिया की माया को निर्लिप्त भाव से देखने की अपनी क्षमता पर उसे स्वयं आश्चर्य होता. शब्दों और पंक्तियों को ही नहीं पंक्तियों के बीच की भाषा भी वो समझ जाता. वो ये भी सोच लेता कि सामने वाला क्या सोच रहा है. वो ध्यानावस्था में बिना हिले-डुले घण्टों बैठा रहता. कभी-कभी उसे यकीन होने लगता, उसका तीसरा नेत्र जागृत हो रहा है. 

एक दिन किसी सामाजिक कार्यकलाप के लिये शहर के नामचीन होटल में जाना हुआ. बहुत दिनों बाद होटल के रिसेप्शन पर आदमक़द आईने से सामना हुआ था. उसका तीसरा नेत्र खुल चुका था. शर्ट के 5वें और 6वें बटन के मध्य.

-वाणभट्ट

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