शुक्रवार, 8 मई 2026

सिक प्लॉट

खेत ख़राब हो गया था. बल्कि ये कहना अधिक उचित होगा कि खेत को जान बूझ के ख़राब किया गया था, विषाणुओं द्वारा. इन सिक प्लाट में फसलों की प्रजातियों की स्क्रीनिंग होती है. जो प्रजाति सिक प्लाट में जी गयी, अमूमन मान लिया जाता है कि उस प्रजाति पर बीमारी का असर नहीं होगा. यहाँ पर ये देखना मुख्य मकसद है कि कौन-कौन सी वेरायटीज़ फेल हुयी, कौन सी पास. प्रजातियों के चयन का एक टाइम टेस्टेड फ़ॉर्मूला है. रेस में सबको दौड़ा दो, जो जीत गया, वो जीत गया, जो हार गया, वो कहाँ गया. कौन जाने. जो रेस में शामिल नहीं हुये, उन्हें खोजो और खोज के सिक प्लाट में लगाओ. उन्हीं में कहीं प्रतिरोधकता मिल सकती है. गोया मुद्दा है कि-

अब हवायें ही करेंगी रौशनी  का फैसला

जिस दिये में जान होगी वो दिया बच जायेगा - मशहर बदायुनी  

अब दिये बेचारे को झोंक दिया तूफ़ान में तो में तो बेचारा ऊपर वाले के रहम-ओ-करम से ही बचेगा. बहुत से काम बस इसलिये किये जाते हैं कि हमसे पहले जितने भी विद्वान हुये, उन्हीं के बनाये रास्तों का अनुसरण सफलता की गारेंटी है. लीक से हट कर भला सोचने का न किसी के पास समय है, न माद्दा. पेड़-पौधे अपनी जगह तो छोड़ नहीं सकते. लड़ते तो वो भी होंगे, आखिरी साँस तक सर्वाइवल के लिये कि दो चार बीज ही बन जायें. उनका वंश तो आगे बढ़ सके. जो प्रजातियाँ फेल हो गयीं, वो भी कहीं न कहीं तो जी ही रही होंगी. लोगों ने नाम मिटा भी दिया तो क्या. जीवन तो चलता रहता है. रेस हारने वाला हर व्यक्ति धरती नहीं छोड़ देता. ये बात शायद पेड़-पौधों पर भी लागू होती हो. 

शर्मा जी का चेहरा फ़क्र से चमक उठता जब भी किसी को बताते कि उनके दोनों बच्चे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में कैसे पहुँचे. इसके पीछे मिसेज और मिस्टर शर्मा का बड़ा त्याग था. घर में पढ़ाई-लिखाई के माहौल का निर्माण तो माँ-बाप को ही करना होता है. जब तक बच्चों का सेलेक्शन नहीं हो गया, घर में टीवी नहीं आया. तब नेट और मोबाईल का जमाना नहीं था. मनोरंजन के नाम पर रेडियो पर विविध भारती और सीलोन के अलावा कुछ न था. टीवी नया-नया आया था. दस किलोमीटर रेन्ज के टावर्स लगने शुरू हुये थे. जल्द ही टीवी का आकर्षण रेडियो के उपर हावी होने लगा. चित्रहार और फिल्मों का क्रेज़ बढ़ गया. पूरे मोहल्ले ने टीवी ले लिया. बस शर्मा के घर में टीवी नहीं आया. ऐसा नहीं था कि वो अफोर्ड न कर सकते हों. अपने बच्चों को सांत्वना देते रहे कि एक बार सेलेक्ट हो जाओ, फिर ले लेंगे. बच्चों ने उन्हें निराश नहीं किया. लेकिन उनके घर टीवी तब आया जब बड़े बेटे ने जॉब जॉइन कर लिया. माँ-बाप के पास एक्सक्यूज़ था कि अब बच्चे बाहर हैं, तो हम लोग टीवी का क्या करेंगे. जल्द ही दूसरा बेटा भी ग्रेजुएशन कर के जॉब में लग गया. मल्टी-नेशनल कम्पनियाँ थीं. अच्छे पैकेज और पर्क्स थे. 

बच्चे तेज तो थे ही. शीघ्र ही उन्हें अंदाज़ लग गया कि ये कम्पनियाँ दरअसल सस्ते मानव श्रम के लिये भारत में अपने ऑफ़िस खोल लेती हैं. यहाँ की सैलरी और टीए-डीए के दाम में उन्हें विदेशों के प्रोजेक्ट में काम कराती हैं. पेरेंट्स इसी में खुश की मेरा बेटा हवाई जहाज से यूरोप-अमरीका जा रहा है. वो भी कम्पनी के खर्चे पर. वहाँ जा कर उन्हें पता चला कि उसी काम के लिये वहाँ के लोगों की तनख्वाह उनकी सैलरी से दो गुनी और तीन गुनी है. यहाँ कम्पनी में मैनेजमेंट हावी था. प्राय: एमबीए किये लोग उच्च पदों पर काबिज थे. उनका काम, दूसरों से काम करवाना होता है, करना नहीं. वो काम भी बताते तो मानो आदेश दे रहे हों. इतना पढने-लिखने के बाद कभी-कभी बॉसों बद्तमीज़ी अखरती. वो ह्युमिलियेट करने का कोई भी मौका न छोड़ते. टीम में, टीम भावना की कमी बनाये रखना मैनेजमेंट का ब्रह्मास्त्र था. प्रोफ़ेशनल्स होने के बाद भी प्रमोशंस-इंक्रीमेंट में भाई-भतीजा वाद झलक ही जाता. अब तक वो कई बार कई विकसित देश भ्रमण कर चुके थे. विकसित देशों में वर्किंग एनवायरमेन्ट बहुत बढ़िया था. मैनेजमेंट में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं था, कम से कम दिखता तो नहीं था. बाहरी होने के बाद भी सब मिल कर टीम में काम करते. यहाँ कई बार उनका सामना देश-समाज में व्याप्त मल्टी लेवल भ्रष्टाचार से भी हो चुका था. बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अन्तर को उन्होंने महसूस किया. इस वातावरण में, विशेषकर विदेश में देखने के बाद, कभी-कभी उन्हें घुटन होने लगती. लगता यही काम हम विकसित देशों में रह कर भी तो कर सकते हैं. उनके ज्ञान चक्षु खुलने लगे. ज्ञान-विज्ञान की कोई सीमा तो है नहीं. दोनों ने निर्णय लिया कि बाहर ही निकल लिया जाये. 

अपने देश में बच्चों को सेटेल करने की जिम्मेदारी भी पेरेंट्स की तब पूरी मानी जाती है जब तक बच्चों का विवाह न हो जाये. अच्छी नौकरी हो तो शादी में अधिक दिक्कत नहीं होती. शादी करवा के शर्मा जी अभी बहू-बच्चों के सुख की कल्पना में ही डूबे थे, जब बच्चों ने अपना निर्णय सुना दिया. कारण पर्याप्त थे. बच्चों को उन्होंने पढ़ाया ही इस लिये था कि खुले आसमान में अपनी उड़ान उड़ सकें. अपने लिये उन्हें रोकना उन्हें उचित नहीं लगा. बुरा भी लगा कि बच्चों के पर निकल आये, निर्णय से पहले पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा. बच्चों का तर्क था कोई हमेशा के लिये थोड़ी न जा रहे हैं. जैसे बंगलोर, वैसे जर्मनी. जब आप चाहेंगे, हम आ जायेंगे. परिंदे घोसले से इस तरह अचानक उड़ जायेंगे, ऐसा शर्मा जी ने न सोचा था. बच्चे अपना भला-बुरा समझते हैं, ये सोच कर उन्हें संतोष करना पड़ा. 

जिन बच्चों के कारण जो माँ-बाप कभी मोहल्ले वालों की ईर्ष्या के पात्र थे, वही माँ-बाप देश में अकेले रह गये. जितने लोग उतनी बातें. देखो बुढ़ापे में पेरेंट्स को भला कौन छोड़ के जाता है. देश-प्रेम भी कुछ होता है. भाई सेवा ही करनी है तो अपने देश की करो. फ़िरंगी तो अभी भी हमें ग़ुलाम ही समझते हैं. डोयम दर्जे का व्यवहार होता है. कभी बच्चों को इतना न पढ़ाओ कि आपके ही काम न आ सकें. इससे अच्छा तो मेरा बेटा है, नौकरी नहीं लगी तो क्या, कम से कम साथ तो रहता है. शर्मा जी को बच्चों के जाने का उतना ग़म नहीं था, जितना पास-पड़ोस-रिश्तेदारों के तानों का था. वो सबसे कटने लगे. अन्दर ही अन्दर कुछ टूट सा गया था. अँग्रेजी में चिकित्सा शास्त्र पढ़े डॉक्टर्स ने उनकी समस्या को मानसिक बीमारी डिप्रेशन मान लिया. मॉडर्न चिकित्सा साइंस में हर मर्ज़ का शर्तिया इलाज है, वो ज्ञान डॉक्टर्स नें वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद अर्जित किया है. आयुर्वेद-योग-ध्यान को टोटका-टोना मानने वालों के तरकश में दवाईयों की एक लम्बी लिस्ट है. शर्मा जी को डिप्रेशन से बचाने वाली दवाइयों की डोज़ जैसे-जैसे बढ़ती गयी, उनका मर्ज बढ़ता गया. 

मरीज-ए-इश्क पर रहमत खुदा की

मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की - शाद लखनवी 

जिस देश की खासियत है कि लोग दूसरे के दुःख से कम, सुख से अधिक दुःखी होते हों, वहाँ मिसेज और मिस्टर शर्मा अपने बच्चों की सफलता को ठीक से सेलिब्रेट भी नहीं कर पाये. कभी-कभी शर्मा जी लगता कि वो जीत के भी बाज़ी हार गये. हार नहीं मानी थी, तो मैसेज शर्मा ने. वो शर्मा की छोटे बच्चे की तरह देख सम्हाल करतीं. 

दो-तीन साल बीत गये जब बच्चों को माँ ने पिता के डीप डिप्रेशन के बारे में बताया. वहाँ के व्यवस्थित जीवन में उनके परिवार को रास आ गया था. इसलिये वापस लौटने का प्रश्न ही न था. बच्चे लायक तो थे ही. विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में सफल भी थे. अब तक ठीक से इस्टैब्लिश हो चुके थे. उन्होंने पापा-मम्मी को अपने पास बुलाने का निश्चय किया. जिनके बच्चे वहाँ हों, वो अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप को भी ला सकते थे. वहाँ नियमों में ऐसा भी प्रावधान है. उनके देश के लिये काम करने वाले एक्सपीरियेन्सड व्यक्ति को रोकने के संभावनायें तलाश ली जाती हैं. बच्चों और बच्चों के बच्चों के साथ शर्मा का डिप्रेशन छूमंतर हो गया. स्वस्थ लाइफ़ स्टाइल और दिनचर्या के कारण शर्मा की सभी दवायें जल्द बन्द हो गयीं. शर्मा परिवार अब सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एक सफल परिवार था. वहाँ की आबो-हवा उन्हें भा गयी. कभी कभार वो पास-पड़ोस-रिश्तेदारों को वीडियो फोन कर लिया करते. उनके खुशी से दमकते चेहरों को देख इष्ट-मित्रों के चेहरे मुरझा जाते. अब वो एक खुशहाल परिवार था. 

हवा में प्रदूषण कम और हरियाली हर तरफ़. टैक्स ज़्यादा पर भ्रष्टाचार कम. इसलिये जनता को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सरकारी सुविधाओं पर भी भरोसा था. शिक्षा लगभग फ़्री. सीनियर सिटिज़न्स को थीं, एडिशनल सुविधायें, वो भी मुफ़्त. शर्मा ने बच्चों के पास वहीं सेटेल होने का निश्चय कर लिया. मिसेज शर्मा भी वो दिन भूल न पायी थीं, कैसे तमाम करीबी पास-पड़ोस-नाते-रिश्तेदारों के रहते हुये भी वो अकेले रह गये थे. विकसित, और पचास से अधिक सालों से सतत विकासशील, देश में बड़ा अन्तर है. वहाँ कोई जानता हो या न जानता हो, मिलेगा तो आत्मीयता से. मैनर्स उनको बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है. बिल्डिंग और मेट्रो से देश नहीं बनता. देश बनता है लोगों से. उनकी शिक्षा व्यवस्था से. वाह्य भौतिक प्रगति जिसे दुनिया देखती है, उस वातावरण का उप-उत्पाद है. शीघ्र ही मिसेज और मिस्टर शर्मा वहाँ रम गये. आखिरी बार वो आये तो अपनी सारी चल-अचल सम्पत्ति डिस्पोज़ करने के लिये आये.  

दस-पन्द्रह दिन के प्रवास में उनका प्रयास था, रिश्तेदारों-पास-पड़ोस से मिल लिया जाये. पता नहीं फिर आना हो, न हो. मेरा उनसे परिचय बस आते-जाते सामने पड़ जाने पर दुआ-सलाम तक ही सीमित था. पता चला कि वो हमेशा के लिये इंडिया छोड़ के जा रहे हैं, तो मेरी जिज्ञासा बलवती हो गयी ये जानने के लिये कि इस उम्र में कैसे कोई अपना देश छोड़, विदेश में बसने की सोच सकता है. मेरे शाम की चाय के इन्वीटशन को उन्होंने स्वीकार कर लिया. 

वो शाम आये. उनके साथ थीं, बच्चों के लिये चॉकलेट्स, हम लोगों के लिये कुछ गिफ्ट्स,और हमें दिखाने के लिये उनकी फ़ोटो एल्बम. चाय पीने के बाद उन्होंने अपनी एल्बम दिखानी शुरू कर दी. साफ़-सुथरे शहर, वेल मेंटेण्ड पार्कस्, नियंत्रित ट्रैफ़िक, मॉल और अस्पताल, सब अद्भुत, सब वर्ल्ड क्लास. हम भारतीयों को सम्वेदना देने की ग़ज़ब बीमारी है. मैंने उनकी दुखती रग कुरेदने की कोशिश की. 'अपने जन्म स्थल से इतनी दूर जा के रहना, वो भी उम्र के इस पड़ाव पर, कुछ अजीब नहीं है'. दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराये. बोले 'जाना कौन चाहता है, अपना घर, अपना देश छोड़ कर. लेकिन बुज़ुर्गों का जीवन यहाँ कठिन है, विशेषकर जब बच्चे साथ न हों. बच्चों को भी लगता उन्हें उचित वातावरण नहीं मिला, जिसमें उनकी प्रतिभा को चुनौती मिले. उन्हें लगता कि बाहर उनके काम की अधिक कद्र है, वो ग्रो कर सकते हैं. प्रतिष्ठित कॉलेजों में पढ़ने के बाद भी मेरे बच्चे आय के मामले में अपने कई भ्रष्ट दोस्तों से कहीं पीछे थे. वहाँ वो अच्छा कर रहे हैं. संतुष्ट हैं. सब सुविधायें सबके लिये, और सुविधाओं के लिये किसी प्रकार का संघर्ष नहीं है. यहाँ तो अनार कम और बीमार अधिक हैं. जीवन क्या होता है, वहाँ जा के हमने जाना. कोई आपा धापी नहीं, कोई होड़ नहीं. जीवन में जितना जीवन है, बस उसी को जीना है. अब बच्चे तो आने से रहे. हमारा भी मन लग गया है. तरक्की की होड़ में हमने इंसानियत को भी तिलांजलि दे दी. शिक्षित लोगों में भी देश-समाज के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना का अभाव है. वहाँ जा के पता लगता है कि वो क्यों विकसित हैं और हम क्यों विकासशील. आप ऐसा वातावरण बनाइये जिसमें लोग फलें-फूलें, आगे बढ़ें. अच्छे लोग जब आगे जाते हैं तो वो देश-समाज को कुछ दे कर ही जाते हैं. इस तरह समाज का विकास होता है. सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट और माइट इज़ राइट का नियम जंगल का कानून हो सकता है, किसी सभ्य समाज का नहीं. सब रेस में लगे हैं, अपने ही पास-पड़ोस-साथी-रिश्तेदारों से आगे निकलने के लिये. देश को अगर विकसित बनना है तो पूरा वातावरण बदलना होगा. देश का आधार सुदृढ़ करने के लिये, बच्चों पर निवेश करना होगा. उन्हें सिर्फ़ मैनर्स सिखाना होगा, उन्हें शिक्षा का उद्देश्य सिखाना होगा. शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये. 25 साल बाद जो भारत बनेगा वो विकसित होगा. जब तक ये बात समझ नहीं आती, विकास इमारतों-मेट्रो और सड़कों में ही उलझा रहेगा. ब्रेन ड्रेन न हो इसके लिये, स्कूल से रोजगार तक, एक समन्वित योजना बनानी होगी. ताकि बच्चों को इन्वेंशन और इनोवेशन के लिये प्रोत्साहन मिले'. चन्द घण्टों में उनका पूरा जीवन चरित्र हमारे सामने था. उनके मन में कहीं ये मलाल ज़रूर था, कि यहाँ सब ठीक होता तो हमें और हमारे बच्चों को बाहर जाने की क्या ज़रूरत थी.

मेरी आँखों के सामने सिक प्लॉट घूम रहा था. प्रजातियों की स्क्रीनिंग के लिये मृदा में विषाणुओं को विकसित किया है ताकि ये चेक किया जा सके कि कौन सी प्रजाति जीवित बचती है. जैसे हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है, पेड़-पौधों में भी होगी. एक अवगुण के कारण बाकी सारे गुण समाप्त तो नहीं हो जाते. उसी तरह पेड़ पौधों को भी उनके गुण के आधार पर सेलेक्ट किया जाना चाहिये. स्वस्थ मृदा के खेत में सम्भव है, उसके अन्य गुण निखर के सामने आते. सिर्फ़ उत्पादन और उत्पादकता की रेस में शायद हम खोते जा रहे हैं, उन प्रजातियों को जिनका चयन स्वाद, गंध, आकार, रंग, व्यन्जन विधि आदि कितने ही गुणों के लिये किया जा सकता था. स्वस्थ मृदा और वातावरण में गुण आधारित स्क्रीनिंग करने की आवश्यकता है. ये कुछ वैसा ही है कि भ्रष्ट और चरित्र रहित समाज में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति फेल का फेल हो जाना. दुराग्रही लोगों ने पूरे देश को ही सिक प्लॉट बना रखा है. सीधे और शरीफ़ लोग सर्वाईवल मोड में चले जाते हैं. अपने को समाज के हिसाब से फ़िट रखने के प्रयास में लगे रहना, उनके लिये बड़ी चुनौती है. सड़क, बिजली, मेट्रो, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स आदि  भौतिक तरक्की की बानगी तो दिखाते हैं, किन्तु गिरते नैतिक मूल्यों और सभ्यता विहीन समाज, निकट भविष्य में हमारे विकसित राष्ट्र के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है. व्यक्तिगत उन्नति तो हो रही है, किन्तु एक देश, एक समाज के रूप में कभी-कभी लगता है हम पिछड़ते जा रहे हैं. जिनमें क्षमता-योग्यता होगी, वो सही वातावरण की तलाश में लगा रहेगा. इसलिये जिसको मौका मिल रहा है वो पलायन कर जाता है, चाहे गाँव से शहर की ओर, चाहे शहर से मेट्रो सिटी की ओर, और चाहे मेट्रो सिटी से विदेश की ओर. जिस व्यक्ति के लिये यहाँ सर्वाइव करने के लाले पड़े थे, वही विदेश में झंडे गाड़ रहा है. 

आदमी और पेड़, दोनों में जीवन है. अन्तर बस इतना है, पेड़ स्थिर है, जड़ है. अपनी जगह, अपना वातावरण नहीं बदल सकता, आदमी बदल सकता है. आदमी भी जब एक जगह रुक जाता है, तो कुछ-कुछ पेड़ बन जाता है.

- वाणभट्ट

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सिक प्लॉट

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