हमारे देश के ऋषि-मुनि इतने ज्ञानी थे कि उन्होंने दुनिया की हर चीज़ पर अपना ज्ञान दिया हुआ है. लम्बे समय तक मुग़लिया सल्तनत और अंग्रेज़ी राज ने हमारे स्वर्णिम अतीत को विस्मृत करा दिया था. लेकिन जब से वही ज्ञान गंगा वाट्सएप्प और इन्स्टाग्राम के माध्यम से अथाह रूप से निर्झर प्रवाहित होने लगी है तो हर कोई उस ज्ञान को आगे फॉरवर्ड करके उस गंगा को ज्ञान के सागर तक पहुँचने ही नहीं दे रहा. भले लोग किस कदर समाज में बढ़ गये हैं, इसका सहज अनुमान आप लोगों का स्टेटस देख कर लगा सकते हैं. यदि आप का उनसे व्यक्तिगत पाला न पड़ा हो तो ये अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन है कि बंदा कितना चगड़ है. सुबह होते न होते, फोन टनटनाने लगते हैं. सुप्रभात के साथ एक धार्मिक चित्र आपको ये एहसास दिलाने के लिये काफी है कि बन्दा सुबह आपसे पहले उठ कर, नहा-धो कर, पूजा-पाठ-ध्यान-चिंतन करके विश्व और जन कल्याण की भावना के साथ कर्म क्षेत्र में कूद चुका है. आप यदि अभी तक रात्रि में देर से सोने की आत्मग्लानी से नहीं उबरे हैं, और यदि आपने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है, तो आपको डिप्रेशन में जाने से कोई नहीं रोक सकता. आप लेटे-लेटे गुड मॉर्निंग का रिप्लाई इसलिये कर देते हैं कि अगला ये न समझ ले कि आप लेट राइज़र हैं. जब से लोग बाथरूम भी फोन ले कर जाने लगे हैं, मुझे शंका होती है कि इनका सूर्योदय कहीं वहीं बैठे-बैठे तो नहीं हो रहा है. ऐसे लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप सुप्रभात बिस्तर से ही भेज दें तो चलेगा, किन्तु वहाँ बैठ कर धार्मिक चित्र न देखें, न भेजें, हमारी आस्था को ठेस लग सकती है. ये विचार आते ही मन में नाना प्रकार के अराजक दृश्य सामने आने लगे. कवियों-लेखकों के जीवन का कष्ट ही यही है कि जहाँ रवि भी न पहुँच पाये, वहाँ भी पहुँच जाते हैं और खामख्वाह दुःखी होते हैं.
बहरहाल घड़ी की ओर देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे. ऑफ़िस में जब से समय की पाबन्दी को ही ड्यूटी मान लिया गया है तब से जरुरी हो गया है कि सुबह की दिनचर्या को आनन-फ़ानन में निपटाया जाये. जाने-अनजाने इस दिनचर्या में एक काम सुप्रभात का जवाब देना भी शामिल हो गया है. सारे रिश्ते, सारी यारी-दोस्ती अंगूठे पर टिकी हो तो गुड मॉर्निंग का जवाब देना भी जरुरी हो जाता है. फ्री की कोई भी सेवा मिल जाये तो हम भारतीय उसका उपयोग-उपभोग करने में समस्त विश्व में अग्रणी पाये जायेंगे. मुफ़त का चन्दन घिसने की हमारी पुरानी आदत है. इस बात का फ़ायदा आज भी वैश्विक कम्पनियाँ उठाने से चूकती नहीं. कोई बिजनेस मॉडल चैरिटी के लिये नहीं होता. विशेषरूप से सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ पहले फ़्री वर्ज़न दे कर आपकी आदत ख़राब करेंगी, बाद में पेड वर्ज़न ख़रीदना आपकी मज़बूरी बन जाता है. इमेल, फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम जो भी आपको मुफ़्त दे रहे हैं, विज्ञापन के माध्यम से आपसे कमा रहे हैं. फ़ेसबुक आज आपको नाते-रिश्तेदारों के जन्मदिन फ़्री में प्रोम्प्ट कर रहा है. कल इसी सुविधा का वो चार्ज करेगा तो हम को देना ही पड़ेगा. पढ़े-लिखे होने के बाद भी हमने पढना-लिखना छोड़ दिया है. किताबों से लोगों का मोह भंग हो गया है. ऑडियो बुक पंद्रह मिनट में कहानी या पुस्तक की पूरी थीम बता देती हैं, तो कौन पढ़ने की मगज़मारी करे. लैपटॉप और कम्प्यूटर पर उदगार लिख कर हमें ये गर्वानुभूति होती है कि पर्यावरण संरक्षण में हम अपरोक्ष रूप से योगदान दे रहे हैं. कागज़ का उपयोग न करके हम पेड़ बचा रहे हैं. गलती होने पर बार-बार पेपर फाड़ना नहीं पड़ता. इधर वाट्सएप्प ने भी गेम खेल दिया. उसने पाँच लोगों से अधिक लोगों को मैसेज एक बार में भेजने से रोक दिया. मैंने उसकी काट निकाली और एक ब्रॉडकास्ट ग्रूप बना लिया. एक क्लिक किया नहीं कि पोस्ट दो-ढाई सौ लोगों को पहुँच गयी. शायद मेरे इस फ़ीचर को बहुतायत से उपयोग में लेने के कारण कम्पनी ने इस सुविधा को महीने में तीस बार तक सीमित कर दिया. अब यदि कभी ब्रॉडकास्ट की सुविधा अधिक यूज़ कर लिया तो ये सुविधा ब्लाक हो जाती है और अगले महीने की पहली तारीख को बहाल होती है. ये तो बानगी थी. फेसबुक पर तो विज्ञापन आते ही थे, अब वाट्सएप्प ने भी मैसेज और अपडेट्स में विज्ञापन शुरू कर दिये. आदमी को सोशल मिडिया का चस्का लगा कर उसे लगभग असहाय स्थिति में पहुँचा दिया है. फोन कोई करता नहीं, वाट्सएप्प का भरोसा था. लेकिन वो किसी भी दिन अपना पैकेज लॉन्च कर देगा. अम्बानी-अडानी यही करें तो समाज के जाग्रत लोग सरकार को लानत-मलानत भेजना शुरू कर दें. विदेशी लूटें तो हम सहर्ष लुट जाने को तत्पर हैं. अपने लूटें तो हाय-तौबा.
जीवन के साठ वसंत पार करते-करते आदमी को ये एहसास होने लगता है, जो पच्चीस की उम्र में जो दुनिया बदलने का माद्दा रखता था, वो दुनिया से पिट-पिटा के हार मान लेता है. मुग़लों और अन्ग्रेज़ों की ताबेदारी करते-करते, ग़ुलामी हमारे डीएनए तक पहुँच गयी. पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य नौकरी बन गया और नौकरशाही अच्छी नौकरी का पर्याय. यानि रहना तो नौकर ही है लेकिन कुछ नौकर नीचे हों तो रौब-दाब बना रहता है. नौकरी में हुक्म उदूली और नाफ़रमानी की कोई जगह नहीं है. गांधी जी सविनय अवज्ञा आन्दोलन कर सकते थे, सरकार अन्ग्रेज़ों की थी. अब तो आप ही के आदमी, आप पर राज कर रहे हैं. मंत्रियों के इरादे कितने ही नेक हों, देश के विकास का मानचित्र बना रखा हो, लेकिन उनके संत्री जिन्हें विकास के मॉडल को एक्जिक्यूट करना-कराना है, वो ढर्रे पर चलने के आदी हो चुके हैं. जो आज रेस में आप से आगे निकल गये हैं तो ये समझिये कि उन्होंने नौकरी को नौकरी ही समझा. कभी ना करी ही नहीं. बॉस की हाँ में हाँ मिलाते-मिलाते बॉस को राय देने लायक ही नहीं रहे. सिस्टम में फ़िट होते-होते वो ख़ुद सिस्टम बन गये. अब आप उनसे किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो वो बेमानी है. वैसे भी सिस्टम, सिस्टम को सपोर्ट करता है. नौकरी, वो भी सरकारी, का परम उद्देश्य अपना-अपना समय काट कर निकल जाना है. यहाँ किसी प्रकार की क्रांति नहीं होती. मशीन ढर्रे पर चलती रहती है. गलती से अनफिट व्यक्ति सिस्टम में आ गया तो मशीन चूँ चूँ करने लगती है. सिस्टम को अपच होना स्वाभाविक है और अपच का निदान केवल वमन है. सिस्टम में फ़िट लोगों के लिये अक़बर इलाहाबादी का ये शेर बहुत मुफ़ीद है-
हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गये
बी.ए. हुये नौकर हुये पेंशन मिली और मर गये
आपके विचार कितने भी क्रान्तिकारी हों, समय के साथ सिस्टम के ढर्रे में दफ़न हो जाते हैं. साठ आते-आते आदमी को ये एहसास हो जाता है कि दुनिया बदलने का काम दूसरों का है. भगत सिंह, पड़ोसी के घर. अपना काम तो ख़ुद को बदलना है ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियों का दुष्प्रभाव हम पर न पड़े.
हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान है. 'हारे को हरी नाम'. यदि इह लोक में हारी मान ही ली है तो उह लोक में हरि से मिलने के लिये प्रयास करना होगा. तो साहब, बहुतायत से मिलने वाले देश में आपको एक अदद बाबा की खोज करनी होगी. जिसे पुरातन काल से इन्सान और भगवान के बीच का पुल माना जाता रहा है. बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय. कबीर-सूर-तुलसी किसी को भगवत प्राप्ति न होती, यदि उन्होंने सद् गुरु का सानिध्य न मिला होता. मरता क्या न करता. एक बाबा की खोज करनी पड़ी. बाबा ने एक साल में भगवत दर्शन करने का ठेका ले लिया.
मुझे लगा ये जीवन तो व्यर्थ गया, चलो अगला ही सुधार लिया जाये. इसलिये बाबा जी जो-जो कहते, वो-वो करता. घन्टों बाबा की फ़ोटो के आगे मेरुदण्ड सीधे करके बैठने और कुटस्थ पर नेत्र टिकाने का अभ्यास भी धीरे-धीरे हो ही गया. साल भर होने को आये. सारी विधियाँ ट्राई कर डालीं, पर भगवान क्या भगवान की परछाईं भी न दिखी. बाकी चेले तो ऐसे बताते जैसे रोज भगवान से वार्तालाप होता है. हमेशा ये ही लगता कि मेरी तपस्या में ही कोई कमी रह गयी है. तपस्चर्या में और जोर लगाता, लेकिन परिणाम वही, ढाक के तीन पात. धीरे-धीरे साल गुजर गया. बाबा के पास चेलों की पूरी फ़ौज थी. फ़ौज मतलब फ़ौज. बाबा के नाम पर मर-मिटने को तैयार. एक सीनियर चेले ने पूछा - क्यों भाई वर्मा जी, भगवत दर्शन हुये या नहीं. मैंने सच-सच बता दिया. तब उन्होंने जो बताया उसका लब्बो लबाब ये था कि मुझे तो बता दिया, किसी और को न बता देना, नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं. बात उन्होंने बहुत ही प्यार और स्नेह से कही थी. मुझे कुछ धमकी सी लगी. झोला-झन्डा वहीं छोड़ कर धीरे से निकल आया. हर जगह सिस्टम काम करता है. जो फ़िट न हो, जो सुर में सुर न मिला सके, उसे दिक़्क़त तो होनी ही है.
बाहर निकल कर ये एहसास हुआ कि तीसरी आँख जो कूटस्थ पर खुलनी थी, वो शर्ट के पाँचवें और छठवें बटन के बीच खुल चुकी है. इस अवान्छित नेत्र की समस्या का अन्त करना जरुरी था, नहीं तो भीतर से बारम्बार हार्ड वाटर में धुल कर पीतवर्णी हुयी बनियान अनचाहे दृष्टि गोचर होने लगती थी. समस्या समाधान की अपनी आउट ऑफ़ बॉक्स सोच, जिस पर मुझे गर्व और मेरे बॉस को शर्म आती है, ने तुरन्त उसका समाधान निकाल दिया. समाधान था, टी-शर्ट. शर्ट की तीसरी आँख को दुरुस्त करने के लिये योग और जिम का सहारा लेना होगा, लेकिन उसमें लगेगा समय. तब तक टी-शर्ट ही इज़्ज़त बचायेगी. समाधान प्रायः सरल ही होते हैं, यदि दिल्ली बिना माँगे फण्ड न भेज दे. गलती से फण्ड मिल गया तो जिनके पास समाधान का कोई आईडिया न हो, उनके अरमान भी फण्ड को हिल्ले लगाने के लिये फड़फड़ाने लगते हैं. इस पुनीत कार्य के लिये वे दिन-रात एक कर देते हैं. एक गीत भी है - जब जाग उठे अरमान तो कैसे नींद आये.
अगर आपके पास समाधान नहीं है, तो आप समस्या का हिस्सा हैं, किसी ने कहा था. लेकिन साठ साल गुजरने के बाद ये कहने में गुरेज नहीं है कि कभी-कभी समस्या का समाधान बॉक्स के बाहर होता है और हम घिसे-पिटे तरीकों पर लकीर पीटते रह जाते हैं. कभी-कभी लगता है समस्या बनाना और समस्या को बनाये रखना, भी एक तरह की आजीविका है.
- वाणभट्ट
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