कृषि शोध केन्द्र में फसल उत्पादन में वृद्धि के सुझावों के लिये एक हाई पावर कमेटी बैठी थी. कमेटी की अध्यक्षता कृषि शोध क्षेत्र की एक नामचीन हस्ती डॉ. सत्य आधार जी कर रहे थे. कमेटी क्या थी, कृषि क्षेत्र की समस्त विधाओं के विद्वतजनों का समागम था. अपने ओपनिंग रिमार्क में ही चेयरमैन साहब ने उवाचा - कृषि उत्पादन में वृद्धि लाना आज की आवश्यकता है. वर्तमान परिस्थितियों में जब कृषि बहुत आगे निकल आयी है, ये काम कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है. मात्र लाइन सोइंग से हम उत्पादन 15% बढ़ा सकते हैं. मात्र प्लान्टर का प्रयोग हमें उत्पादन में 15% की वृद्धि देने में सक्षम है. ड्रिप और स्प्रिंकलर का उपयोग करके हम जल उपयोग दक्षता बढाने के साथ साथ उत्पादन में 15% वृद्धि पा सकते हैं. मैकेनाइज्ड क्रॉप प्रोडक्शन से हम कृषि लागत को कम और कृषक आय में वृद्धि कर सकते हैं. इन्जीनियर्स के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. आप लोगों को इस दिशा में काम करना चाहिये.
संयोग से कृषि अभियंत्रण अनुभाग का एकाकी अभियन्ता और अनुभागाध्यक्ष भी सभा में उपस्थित था. जिसे कुछ दिन पहले ही नया-नया चार्ज मिला था. उससे रहा नहीं गया. बोल पड़ा - सर आप ने बहुत ही अच्छे सुझाव दिये हैं. दो हेक्टेयर लैंड हमें भी मिल जाती तो ये देखा जा सकता है कि इंजीनियरिंग इन्टरवेन्शन्स से कितनी उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है. हम लोग उत्पादन वृद्धि के अधिकान्श प्रयास प्रजातियों के विकास में कर रहे हैं. यदि मात्र मैकेनाइज़ेशन से लागत कम और उत्पादन वृद्धि प्राप्त की जा सकती है, तो ऐसे अप्प्लाईड प्रयोग भी होने चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रमों में ये भी देखना चाहिये कि क्रॉप मैनेजमेन्ट से कितनी वृद्धि सम्भव है. प्रजातियों के विकास में उसके ऊपर उत्पादन वृद्धि का प्रयास करना चाहिये. फसल उन्नयन प्रोग्राम्स की टीम में कृषि के अन्य विषयों की तरह अभियान्त्रिकी को भी शामिल करना चाहिये.
उसे लगा कि चेयरमैन साहब उसके इस उद्बोधन से प्रसन्न हो कर शाबाशी देंगे. लेकिन वहाँ तो सभा में सन्नाटा छा गया. उसे जरा भी भान नहीं हुआ कि सभी को साँप क्यों सूँघ गया. उसे ये भी नहीं लगा कि उसने कोई गलत बात कह दी है. लेकिन सत्य आधार जी का आधार हिल गया. बड़े लोगों को सुनाने की आदत होती है, सुनने की नहीं. उसके बाद उन्होंने इन्जीनियर को जो-जो सुनाया है और जिन-जिन शब्दों में सुनाया है, उन शब्दों का प्रयोग किसी भी सभ्य समाज में वर्जित माना जा सकता है. फिर भी यदि पढने की इच्छा हो तो पाठकों को पिछले ब्लॉग जीनोटाइप (https://vaanbhatt.blogspot.com/2014/05/blog-post.html) पर जाना पड़ेगा.
उसका परिणाम ये हुआ कि शीघ्र ही कृषि अभियन्त्रण अनुभाग का विलय किसी अन्य विभाग में कर दिया गया. ताकि कोई इन्जीनियर पियर रिव्यू मीटिंग में अपना ज्ञान न बघार सके. अपने लोगों की बात अपनों में ही रहे तो अच्छा. आउट ऑफ़ बॉक्स विचार, और ऐसे विचार वाले लोग, बॉक्स के बाहर ही रहे तो अच्छा.
भारत में कृषि शोध का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. इस सन्दर्भ में वाणभट्ट का पुराने ब्लॉग कृषि शोध की दशा और दिशा (https://vaanbhatt.blogspot.com/2025/03/blog-post_31.html?m=1) पर जाने की कृपा करें. बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कृषि शिक्षा के महत्त्व को समझा गया. इसी दशक में शाही कृषि अनुसन्धान संस्थान और इलाहाबाद कृषि संस्थान भी अपने अस्तित्व में आये. जहाँ कृषि शिक्षा की विभिन्न विधाओं पर अध्ययन, अध्यापन व शोध का कार्य आरम्भ हुआ. शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में मानव श्रम को कम करने के उद्देश्य से अभियान्त्रिकी आवश्यकता का अनुभव किया गया. इस दिशा में प्रथम प्रयास भी इलाहाबाद कृषि संस्थान से हुआ. कृषि में अभियान्त्रिकी के महत्त्व को देखते हुये, वर्ष 1943 में संस्थान ने कृषि अभियान्त्रिकी में पहला स्नातक पाठ्यक्रम आरम्भ किया. आईएआरआई, आईआईटी, खड़गपुर और पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय में क्रमशः 1945, 1952 और 1960 में कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना हुयी. आज कृषि अभियान्त्रिकी शिक्षा लगभग सभी कृषि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उपलब्ध है. साठ के दशक में कृषि क्षेत्र में हुयी हरित क्रांति में कृषि अभियान्त्रिकी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. ये बात अलग है कि उन्नत प्रजातियों को पूरा श्रेय मिला.
आज़ादी के 80 साल होने जा रहे हैं और देश में कृषि मशीनीकरण अभी भी मात्र 45-55 प्रतिशत ही हुआ है, जबकी अनेक विकसित और विकासशील देशों में मशीनीकरण 90-95 प्रतिशत हो चुका है. इसके पीछे देश में लघु और सीमान्त किसानों की अधिक संख्या और छोटी जोत को मुख्य कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जहाँ समस्या है वहीं तो समाधान खोजने की आवश्यकता है. हमारा कृषि शोध आज भी उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि में उलझा हुआ है. सारे प्रयास उत्पादन बढ़ाने के लिये किये जा रहे हैं. जबकि किसान इससे कहीं आगे निकल गया है. वो कम खर्च पर टिकाऊ और लाभदायक खेती की बात कर रहा है. यदि शोध आवश्यकताओं के अनुसार नहीं होंगे तो क्या होगा. कृषि क्षेत्र में मजदूरों की घटती संख्या आज चिंता का प्रमुख विषय है. इस कारण खेती के रकबे घटते और बढ़ते रहते हैं. जिन फ़सलों में मशीनीकरण अधिक हुआ है, वे कृषकों की प्रमुख पसंद बनाते जा रहे हैं. जिन राज्यों ने कृषि अभियान्त्रिकी के विकास पर ध्यान दिया उन राज्यों में कृषि उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है. मध्य प्रदेश पहला राज्य बना, जिसने कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की स्थापना की. यंत्र दूत योजना के माध्यम से प्रदेश के कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ लागत में कमी भी आयी है. प्रदेश में निदेशालय की सफलता के परिदृश्य में सभी राज्यों में कृषि अभियंत्रण निदेशालय के स्थापना की पहल आरम्भ हो चुकी है.
कृषि शिक्षा और शोध में उन्नत प्रजातियों के विकास, नवीन उत्पादन पद्यतियों और फसल संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुये हैं और हो रहे हैं. किन्तु आज आवश्यकता किसान को कृषि से जोड़े रखने की है. यह तभी सम्भव है है जब कृषि को व्यवसाय के रूप में किया जाये और ये एक लाभकारी उद्यम बन सके. छोटी जोत और अधिक उत्पादन लागत के कारण कृषक परिवार खेती से विमुख होते जा रहे हैं और ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो नियमित आय का जरिया बन सकें. विकसित देशों में लैंड होल्डिंग्स बड़ी हैं इसलिये वहाँ मशीनीकरण एक आवश्यकता बन गया है. हमारे देश में छोटी जोत के कारण मशीनों में निवेश कम है. इस कारण फसल उत्पादन के प्रमुख चरणों में मानव श्रम की उपलब्धता एक संकट बन जाता है. समय से कृषि कार्य न हो पाने से फसल की हानि के साथ-साथ कृषि लागत में भी वृद्धि होती है. कृषि शोध संस्थानों में कृषि के तीन आयामों - 1. प्रजाति उन्नयन, 2. उत्पादन तकनीक और 3. पादप संरक्षण पर तो बहुत कार्य हो रहा है. किन्तु कृषि अभियन्त्रण की दिशा में पूर्ण समर्पण के साथ विशेष प्रयास नहीं किया जा रहा है.
उच्च स्तर पर गठित वरिष्ठ अधिकारियों की समीतियाँ, कृषि अभियान्त्रिकी की आवश्यकता पर तो बल देती हैं, लेकिन इसके लिये एक पूर्ण विकसित (फुल फ्लेजेड) विभाग की संस्तुति नहीं करतीं. कारण कुछ और नहीं है, लोग अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के दायरे में ही सोचने को विवश हैं. जो उन्होंने पढ़ा है या जो उन्हें पढ़ाया गया है, उससे इतर वो न सोचना चाहते हैं, न समझना. वर्तमान में कृषि क्षेत्र की अधिकांश समस्याओं का निराकरण अभियन्त्रण के माध्यम से किया जा सकता है. किन्तु प्रयुक्त (एप्लाइड) शोध की तुलना में मौलिक (बेसिक) शोध अधिक चुनौतीपूर्ण लगता है. साठ शोधकर्ता और छिहत्तर परियोजनाओं के मॉडल से शोध पत्र तो निकल सकते हैं किन्तु ऐसी समेकित तकनीक का विकास सम्भव नहीं है, जिसे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके. आज की आवश्यकता है, साठ शोधकर्ताओं को छ: लक्ष्य उन्मुख (टारगेट ओरिएंटेड) परियोजनाओं पर केन्द्रित करना. जिसमें मृदा सम्वर्धन, जल संचयन-संरक्षण, कृषि उत्पादन से लेकर भण्डारण-प्रसंस्करण और कृषि के उप और सह उत्पादों का उपयोग भी सम्मिलित हो. टीम के माध्यम से हर विषय एक दूसरे से पृथक नहीं, पूरक बन के काम करेंगे और एक सम्पूर्ण (कम्प्लीट) तकनीक के विकास में सहायक होंगे.
विकसित देशों के कृषि मॉडल में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 1-2 प्रतिशत है तो लगभग उतनी ही जनसँख्या कृषि उत्पादन में संलग्न है, जबकि भारत में कृषि, सकल घरेलू उत्पाद में 16-18 प्रतिशत का योगदान करता है किन्तु कृषि पर निर्भर जनसँख्या 45-50 प्रतिशत है. इसलिये विकसित देशों के मॉडल को हम पूर्णरूप से नहीं अपना सकते. भारत के लिये आवश्यक है कि वो कृषि एवं कृषि से सम्बद्ध क्षेत्रों को एक उद्योग के रूप में विकसित करें. इसके लिये कृषि शोध की दिशा में भी एक आमूल-चूल परिवर्तन की दरकार है. हाशिये में डाल दिये गये कृषि अभियंत्रण शोध को कृषि शोध के अन्य आयामों के साथ समन्वित करना न सिर्फ़ आज की आवश्यक है, बल्कि भारतीय कृषि का भविष्य भी है. लाभदायक कृषि के द्वारा ही भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, कृषि, को सुदृढ़ किया जा सकता है और उसके द्वारा प्राप्त आय में निरन्तरता प्राप्त की जा सकती है. लाभ, आज समाज का मूलमन्त्र है और इसकी अवस्थापना के लिये कृषि शोध को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है. लाभप्रदता के लिये कृषि शोध को आज समग्र सम्पूर्णता से देखने की आवश्यकता है.
मृदा एवं जल संरक्षण अभियान्त्रिकी, सिंचाई और जल निकासी अभियान्त्रिकी, कृषि शक्ति एवं यंत्र अभियांत्रिकी, प्रसंस्करण एवं खाद्य अभियन्त्रिकी, आदि विषय कृषि अभियान्त्रिकी के प्रमुख घटक हैं. एक या दो अभियांत्रिकी संस्थान समस्त कृषि उत्पादों की समस्त समस्याओं का वृहद स्तर पर समाधान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं. इसके लिये हर संस्थान में एक कृषि अभियंत्रण विभाग की स्थापना की अनिवार्यता सुनिश्चित की जानी चाहिये. यदि संस्थान लाभोन्मुखी परियोजनाओं पर कार्य करेंगे, तभी उनके द्वारा विकसित तकनीकें अपना कर किसान लाभान्वित हो सकेंगे. भविष्य में वो ही शोध संस्थान सफल होंगे जो अपने संसाधनों का सृजन स्वयं कर सकेंगे. इसके लिये उन्हें कृषि से जुड़े उद्योगों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रख कर शोध करना होगा. इस कार्य में कृषि अभियन्त्रण विभाग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. देश का किसान आज सम्पूर्ण तकनीक, उत्पादन से अंतिम उत्पाद तक, माँग रहा है. इसलिये प्रयोग भी समेकित होने चाहिये. खण्ड-खण्ड में किये श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य एक सम्पूर्ण तकनीक में परिवर्तित नहीं हो सकते. इसके लिये आवश्यकता है, कृषि के अन्य आयामों के साथ कृषि शोध के चतुर्थ आयाम - कृषि अभियांत्रिकी को सुदृढ़ करने की.
जड़त्व का सिद्धांत है कि जो वस्तु जैसे चल रही है वैसे ही चलती रहती है (और रुकी है तो रुकी रहती है) जब तक कोई वाह्य बल नहीं लगता. भारतीय कृषकों और कृषि आधारित उद्योग की आकांक्षायें वही बल हैं, जो कृषि शोध को एक नयी दिशा प्रदान करेंगी.
-वाणभट्ट
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