मंगलवार, 1 जनवरी 2013

बरहमन की दुआ

इक बरहमन कब से 
कह रहा है 
कि ये साल अच्छा है

हर साल की तरह
चलो मान लो 
इस साल भी सही
जब इतने सालों से मानते आये हो

सकारात्मक दृष्टिकोण रखना है ज़रूरी
इसलिये भी
और
बीती बातों का मर्सिया कब तक पढ़ा जाए  
इसलिये भी

इसलिये भी कि जीने की वज़ह तो है तलाशनी ही
इतिहास को दफ़न करके ही
उसके ऊपर होगी ईमारत खड़ी
सुनहरे भारत के भविष्य की

भावनाओं से देश नहीं चलता
इसलिये ज़रूरी है आवाम की आवाज़ को कुचलना
जिन्हें हमने चलना सिखाया
कैसे सौंप दें उन्हें सत्ता
अभी अपरिपक्व हैं, नादान हैं
उन्हें सियासत का क्या पता

सियासत राज करने के लिये है
या सेवा करने के लिये
यहाँ सियासत सिर्फ़ सियासत के लिये है
इसलिये भी ज़रूरी हैं
नये विचार-नयी सोच
नये ज़ज्बे को क़त्ल कर देना

एक अकेले अन्ना ने, 
भ्रष्ट आचार के विरुद्ध
देश को हिला के रख दें
इतने सालों में ये सिस्टम बनाया है
जिसमें भ्रष्ट से भ्रष्टतम के सर पर
संरक्षण का साया है  

चंद लोगों पर कैसे छोड़ दें देश को
लगे 400 साल अंग्रजों से छुड़ाने में देश को
अभी हमारे तो 60 साल ही हुये हैं
इस संग्राम में 
अभी सिर्फ कुछ ही सेनानी हुये हैं
अब तो दमन की ताक़त भी है, अपने हाथ में
किसे किससे बचाओगे
कब तक खुद बच पाओगे 

इतिहास सबक तो वो सीखें जिन्हें सुधरना है
हमें तो एक नया इतिहास लिखना है
अँग्रेज़ों से लड़ना आसान था
पर अब
अब देश के लिये, 
अपनों से ही लड़ना है

बड़ी मुश्किल से तो हमने आत्मा को मारा है
बड़ी मुश्किलों से अपने ज़मीर को धिक्कारा है
अब उसे मत जगाओ
अपनी नज़रों में हम हैं नहीं गिरने को तैयार
भले ही करने पड़ें कितने भी अत्याचार

सिस्टम को बनाया है,
सिस्टम ने, सिस्टम के द्वारा, सिस्टम के लिये,
इसलिये इस सिस्टम के वास्ते
देश के वास्ते
देश की जनता के वास्ते
इसे मत छेड़ो
जैसे अब तक चलता था, वैसे ही चलने दो

इतने साल आये और चले गये
पिछले दो साल साठ सालों पर भारी रहे 
ये कैसा चमत्कार है 
आन्दोलनकारियों का अज़ब वार है
लाखों की भीड़ बिन नेता के 
अपना हक माँगने को तैयार है 

अब भी वक्त है देश एक नये मुकाम को बढ़ रहा है 
देश की ईमारत की नीव के नीचे दफना दो 
अपनी आत्मा को, ज़मीर को 
पर मत रोको इस तरक्की की रफ़्तार को 
जनता अराजक हो उठी है 
सब समाधान सडकों पर ढूँढती है
भला ऐसे कोई व्यवस्था चलती है

पर मुझे इस साल बरहमन की वाणी सच लगती है 
ये गुजरे कुछ साल बस इसका आगाज़ था
जनता के लिये जनता के द्वारा ही 
सारा नियम कानून निश्चित होगा 
जनता की आवाज़ ही तोड़ेगी तुम्हारी तन्द्रा
देश के नवजवानों की है अब टूटी निद्रा

यही संकेत है कि बरहमन का कहा सच होगा 
देश के बारे में जो सोच सकें, ये देश उनका होगा 
हर नस्ल अपनी पिछली नस्ल से उन्नत रही है
बुजुर्गों को इस बात की बेचैनी क्यों हो रही है

सौंप के देखो इस देश को ज़ज्बों को, जोश को
आन्दोलन दशकों और शताब्दियों में नहीं, वर्षों में होते हैं
नयी उम्र की नयी फसल ने देश को झकझोरा है 
परिवर्तन की बयार ने सबको जोड़ा है 

अब तो हट जाओ कि जनता आती है 
कम से कम 2013 में जो सवेरा हुआ है 
सिर्फ दिल के खुश रखने को नहीं 
किसी सकारात्मक बदलाव के लिये हुआ है

- वाणभट्ट  

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...

ज़िन्दगी का उसूल है कि वो कुछ नहीं तो तजुर्बा ज़रूर देती है। कुछ ऐसे ही बदलाव ज़िन्दगी में रहे गत कुछ महीनों से। आदमी अपनी चाल चलता है और ग्रह-नक्षत्र अपनी। एकदम ऊपर वाले और एकदम नीचे वाले के बीच में भी कुछ मिडिल आर्डर ऊपर वाले होते हैं। जो शतरंज की बिसात बिछाते हैं और अपने वजीर-बादशाह को बचाने के लिए प्यादों को कुर्बान कर देते हैं।

मिश्र जी का हश्र तो ऐसा होना ही था। सिस्टम में हजारों दोष हैं ये सिस्टम भी जानता है। पर भाई जड़त्व भी कोई चीज़ है। अगर सिस्टम ऐसा न होता तो जो सिस्टम के जो संभ्रांत खिलाडी हैं वो संभवतः सिस्टम से बाहर होते। उनकी ही परिभाषाएं हैं कि अकेला चना भाड़ क्या फोड़ेगा। और ये बात अवाम के जेहन में कूट-कूट के घुसेड दी गयी है। एक्का-दुक्का जो ये गलतफहमी पाल लेता है कि वो देश का भला कर के ही मानेगा, तो सारा सिस्टम उसे दुरुस्त करने में लग जाता है। उसमें लग्गू-भग्गू का रोल अहम् होता है। क्योंकि शहंशाह तो सत्ता के मद में चूर होता है ये दायें और बायें ही होते है जो खबरी का काम करते हैं। और बताते हैं कि हुजूर अमुक इलाके से बगावत की बू आ रही है। उसे निपटाना ज़रूरी है नहीं तो आपकी सत्ता हिल सकती है।

और जिन राजाओं को अपने बल, बुद्धि और विवेक पर भरोसा न हो उन्हें कन्फ्यूज़ करना कोई कठिन भी नहीं है। तो मिश्र जी कहानी "सिस्टम के अन्दर : अन्ना हज़ारे" (http://vaanbhatt.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html) जहाँ ख़त्म हुई वहां से एक नयी कहानी शुरू हुई। मिश्र जी की ईमानदारी को चुनौती देना तो नामुमकिन था। सो उनके ऊपर ड्यूटी का उचित निर्वाह न करने, उच्च अधिकारियों से अभद्र व्यवहार, कार्य संस्कृति बिगड़ने के अनर्गल आक्षेप लगा दिए गए। एक चेतावनी मिली सो अलग से की भविष्य में ऐसी ईमानदारी और देशभक्ति वाली हरकतें कीं तो उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। फिलहाल उन्हें स्थानांतरण से नवाज़ा जा रहा है। लेकिन ये भविष्य के संकेत मात्र हैं।

मिश्र जी का विश्वास और प्रबल हो गया है। जिस रस्ते को उन्होंने चुना है वो यक़ीनन सही है। वर्ना संस्थान और देश से गद्दारी करके जीना शायद उनका दम घोंट देता। मित्रों मिश्र जी को आपकी शुभकामनाओं और शुभेच्छा की सख्त ज़रूरत है। ईमानदारों के लिए जीने का यही एक संबल है।

सत्य पर असत्य की जीत चिर स्थाई तो नहीं दिखाई गयी है अब तक के वक्तव्यों में। और मिश्र जी का मानना है कि नीचे वालों की मंशा के पीछे भी ऊपर वाले की मंशा छिपी होती है। इस कहानी का ये अंत नहीं है। एक नयी शुरुआत कह सकते हैं। 

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी। मुसाफिर का काम तो बस चलते जाना है।

- वाणभट्ट              

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

प्रार्थना के शिल्प में !


प्रार्थना के शिल्प में !

(देवी प्रसाद मिश्र की रचना 'प्रार्थना के शिल्प में नहीं' से प्रेरित ...)

क्षमा
हे अग्नि !
हे वायु !
हे जल !
हे आकाश !
हे धरा !

निवेदन है
कि
आप कहीं दूर एकांत में जा
अपने कान भींच लें
आँखें मींच लें
कि
साक्षी के सम्मुख
असत कहने का साहस
नहीं है मुझमें
कि
विजय सदा सत्य की होती है.

- वाणभट्ट

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

अयोध्या


प्रिय मित्रों, एक पुरानी रचना साझा कर रहा हूँ...

अयोध्या

अयोध्या पर लिखना ज़रूरी हो जाता है.
जब देश का ये कोना मज़हब हो जाता है.

किसी ने पूछा,
प्रयाग में माघ मेला कब से लगता है
इलाहाबाद बनने के पहले या बाद में
जवाब तो नहीं, पर एक जिद ज़रूर है.
इतिहास के पहले शायद कुछ भी नहीं था.

माघ का मेला सदियों से लगता है,
जब आस्था का समुंदर हिलोरें लेता है,
संगम पर ये विहंगम दृश्य हर साल सजता है.

शायद मानव अस्तित्व के पहले से,
भाषा के भी पहले से, कुछ तो रहा होगा,
जिसने प्रयाग को प्रयाग और कोणार्क को कोणार्क बनाया होगा.

लेकिन अब समय पीछे जाने का नहीं है
ये विद्वानों का मत है.
इन्टरनेट और फेसबुक कि दुनिया में,
अमेरिका बन जाना इनके लिए
अंतिम वक्तव्य है

जडें तो अपनी हैं,
कहाँ तक काटियेगा
कब तक  झूठलाइयेगा इस बात को
कि
तमाम परतों के नीचे एक ही है यहाँ,
आदमी का वजूद.
ज़मीन के इस घेरे के अन्दर.

मज़हब को मानिये ज़रूर,
पर खुद को भी तो पहचानिए हुज़ूर.

- वाणभट्ट

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

देशभक्ति

देशभक्ति की ऐसी मिसालें अपने इतिहास में मिलतीं हैं कि हम खुद को महान समझने से रोक नहीं पाते। भाव कुछ ऐसा की हमारे बाप-दादा ने घी खाया था, हमारा हाँथ सूँघो। अपने अगल-बगल का हाल ये है कि देशभक्त और देशभक्ति की बात परिहास का विषय बन गया है। और कुछ इच्छाधारी लोग जब चाहें इसे अपने शरीर  पर ओढ़ लें और जब चाहे आत्मा में घुसेड़ लें। ये नेता टाइप के जीव होते हैं और जो देश को हर वक्त ये एहसास दिलाते की वो न होते तो देश पता नहीं किस गर्त में डूब गया होता। साठ सालों में अन्य देश कहाँ से कहाँ पहुँच गए और हम घोटालों की परतें खोलने में लगे हैं। भला हो प्रिंट और चित्र मीडिया का, इसने इस देश में भगवान का काम किया है। यानि ये मीडिया ही है जो सर्वत्र विद्यमान है, सब कुछ देख-सुन रहा है। कुछ भी देख सकता है, सुन सकता है।

गीता प्रेस की चोखी कहानियों में एक कहानी पढ़ी थी, कि भगवान सब जगह है, सब कुछ देख रहा है। ऐसा एक पिता ने अपने बालक को बताया। कभी ऐसी स्थिति आयी कि घर में फ़ाँके की नौबत आ गयी। पिता पड़ोस के खेत में घुस कर कुछ अन्न का जुगाड़ करने लगा। अपने बच्चे को बाहर खड़ा कर दिया कि कोई देखे तो बता देना। थोड़ी देर बाद उसने पूछा बेटा कोई देख तो नहीं रहा है। बच्चे के जवाब से हम सब वाकिफ़ हैं। पिता ने चोरी करने का इरादा छोड़ दिया। बच्चे ने उसकी आँखे खोल दीं। सिर्फ महान बातें करने से कोई महान नहीं हो जाता। और किसी देश को महान बनाने के लिये उसके लोगों में आचरण और चरित्र की अहम् भूमिका है।


कुछ दिन पहले एक वक्ता को सुनने का सौभाग्य मिला। बात देशभक्ति की थी। 1948 में स्थापित होने के पहले इजरायल का अत्यंत संघर्षपूर्ण इतिहास रहा है। सैकड़ों साल के संघर्ष में यहूदी पूरी दुनिया में बिखर गये थे। उन्हें दरकार थी, इस धरती पर जमीन के कुछ हिस्से की। कोई और देश उनकी इस इच्छा को कैसे मान लेता। लिहाज़ा उनके सामने एक दुश्वार जंग थी। वो दुनिया के विभिन्न कोनों में छिप के रहते। जब मिलते तो विदा के समय एक-दूसरे से कहते - फिर मिलेंगे दोस्त, अपने इजरायल में। इस तरह पुश्तों तक उन्होंने उस इजरायल को जिंदा रक्खा जो धरती पर कहीं था ही नहीं।


एक यहूदी मित्र के बाबा की मृत्यु हो गयी थी। उसमें शरीक़ होने पहुँचे लोगों ने देखा कि जब अंतिम यात्रा के लिये शव को निकला जा रहा था। मित्र की दादी ने सोने की डिबिया से चाँदी का पाउडर निकाल कर शव के नीचे बिछा दिया। कुछ अजीब सी रस्म थी ये, किसी हिन्दुस्तानी के लिये। बाद में जब मित्र से पूछा कि दादी ने शरीर के नीचे क्या बिछाया था। सुन कर इजरायली दोस्त की आँखें नम हो गयीं। बोला हम यहूदियों की ये तमन्ना होती है कि हमारी मृत्य हमारी ज़मीं पर हो। वहाँ से विस्थापित होते समय हमारे पुरखे वहाँ की मिट्टी अपने साथ ले आये थे। ये हमारे वतन की मिट्टी है जो किसी इजरायली के शरीर के नीचे डाली जाती है, मृत्य के समय।


वतन के प्रति इस प्रेम के बारे में सुन कर सभागार में उपस्थित हम भारतीयों ने खूब तालियाँ बजायीं, जोश में। बाहर निकलते समय मै सोच रहा था कि हम अपने देश से भागते हुए क्या ले जाते, अपने साथ। 


- वाणभट्ट              

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

शिक्षा का उद्देश्य

उन दिनों ऐसा न था। सरकारी स्कूलों में पढना फ़क्र की बात थी। क्योंकि अनार कम थे बीमार ज्यादा। अब की तरह हर कोई पढ नहीं सकता था। स्कूल कम थे, पढ़ने वाले ज्यादा। राजकीय विद्यालय में दाखिला एक बड़ा काम था। प्रवेश परीक्षा में सीटें सीमित थीं। छठवीं में प्रवेश होता था या नवीं में। हर कक्षा में अनुमन्य सीमा 40 छात्रों की होती थी, पर वास्तव में 120 बच्चे कक्षा को गुलज़ार कर रहे होते थे। छठवीं में सीटें ज्यादा होतीं थीं, सो दाखिला कुछ आसन होता था, पर नवीं में दाखिला मानो किसी इंजीनियरिंग कालेज का प्रवेश हो। आठवीं की गर्मी की छुट्टियाँ इसी क्रम में शहीद हो गयीं थीं। पर पूरे इलाहाबाद में दूसरा कोई ऐसा कालेज न था, जिसमें पढ़ने में पिता जी को लेश मात्र भी गर्व होता। चूँकि आगे पढना ज़रूरी था और सरकारी स्कूल के अलावा किसी और स्कूल में पढना या न पढना बराबर माना जाता था। इसलिये मन मसोस कर भाइयों अपनी छुट्टियाँ क़ुर्बान करनीं पड़ीं। 

पिता जी शायद नर्सरी में प्रवेश करने गये हों तो गये हों, उसके बाद तो हर जगह अपने अभिभावक बन कर हम स्वयं ही गये। जीआईसी, इलाहाबाद में प्रवेश करने की ख़ुशी पहले दिन ही काफ़ूर हो गयी, जब कक्षा में सौ-सवा सौ बच्चे बैठे मिले। हम छोटे स्कूल से गये थे, जहाँ प्रार्थना ग्राउंड पर सारा स्कूल एक साथ खड़ा हो जाता था। ज्यादातर टीचर हर छात्र-छात्रा को नाम से जानतीं थीं। प्रधानाचार्या से लेकर दाई तक सभी महिलायें थीं। बसों के ड्राइवर या चपरासी ही बस पुरुष थे। सख्त अनुशासन हमारी अध्यापिकाओं का शगल था। और ये शौक़ सिर्फ़ स्कूल या क्लास की चारदीवारियों तक सीमित नहीं था। मैनर्स-एटिकेट्स पर भी लेक्चर दिये जाते थे। क्या मजाल कि हम स्कूल के बाहर भी चाट या चूरन या पाँच पैसे की सेक्रीन वाली आइसक्रीम खाते दिख जायें। एक लेक्चर पक्का समझिये। एक बार कुछ लड़कों को सिर्फ़ इसलिये सजा मिल गयी कि उन्होंने हँसी-हँसी में पीने के पानी के लिये लिखे स्लोगन को कुछ तोड़-मरोड़ दिया था। एक छात्र ने मज़ाक में फ़रमाया 'पानी बहाओ, पियो मत', बाकि छात्र हँस दिये। किसी अध्यापिका ने सुन लिया। फिर तो उस ग्रूप की जो क्लास ली गयी वो वाकया आज तक जेहन में है। तभी से मुझे लगता है कि महिलायें जितनी कानून व्यवस्था बना के रखतीं हैं, उतना पुरुषों के बस की बात नहीं है। पुरुष वैसे भी कानून तोड़ कर ज़्यादा ख़ुश होते हैं।

जीआईसी में राम राज्य था। कितने बच्चे उपस्थित हैं, कितने नहीं जानने के लिये प्राचार्य महोदय के पास न कोई जिन्न था, न कोई चिराग। अगर सारे बच्चे किसी दिन क्लास करने के मूड में आ भी गये, तो समस्या थी कि बैठें कहाँ। और किसी तरह खिड़की-दरवाज़ों पर चढ़ के बैठ भी गये तो उन्हें कंट्रोल करके विषय को पढ़ा पाना असंभव तो नहीं था, पर अध्यापकों के लिये कठिन ज़रूर था। जैसे ही अध्यापक महोदय बोर्ड की ओर मुड़ते कक्षा जीवंत हो जाती। यहाँ सारे पुरुष अध्यापक थे और उनका अनुशासन, जैसा मैंने पहले ही कहा है, हमारी आठवीं की अध्यापिकाओं जितना नहीं था। विज्ञान और गणित की कक्षाओं में उपस्थिति फुल रहती थी। हिन्दी, अंग्रेज़ी और वैकल्पिक विषयों में छात्र नदारद रहते। जैसे ही हिन्दी या इंग्लिश के अध्यापक कक्षा में प्रवेश करते, बच्चे खिड़कियों से कूद-काद कर भाग लेते। गलती से कभी क्लास में ज़्यादा बच्चे होते, तो हमारे हिंदी के प्राध्यापक पूछ बैठते - बेटा तुम लोग भाग नहीं पाये या वाकई हिन्दी पढ़ने की इच्छा जागृत हो गयी है। इस माहौल के बाद भी पढ़ने वाले पढ़ ही लेते। 120 बच्चों में कोई बोर्ड टॉप भी करता कोई आईआईटी निकालता। श्रेय निश्चय ही हमारे स्कूल और अध्यापकों को मिलता। इसलिये हर अभिभावक, जो कान्वेंट की फ़ीस नहीं अफोर्ड कर सकता था, का सपना होता कि मेरा बच्चा जीआईसी में पढ़े।  

चूँकि मै अनुशासित स्कूल का छात्र था, इसलिये कक्षा बंक करने का विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। मै सभी विषयों की क्लास अटेंड करता। विज्ञान और गणित के टीचर तो सिर्फ टॉपर और पढ़ाकू किस्म के छात्रों को जानते थे, जो स्टाफ़रूम में उनसे मिल कर उनसे अपनी समस्याओं पर डिस्कशन करते थे। मेरी उपस्थिति सभी विषयों की कक्षाओं में अनिवार्य थी। टॉपर तो मै नहीं था, पर सभी विषयों में मेरा दख़ल टॉपरों से कुछ ही कम था। हिन्दी से लेकर मैथ तक सभी विषयों में मै लगभग बराबर अंक प्राप्त करता। हिन्दी और अंग्रेजी के अध्यापक मेरी निष्ठा से ज्यादा प्रभावित थे और विशेष स्नेह दिया करते थे। अंग्रेज़ी के अध्यापक थे, नूर साहब। बेहद चलते-पुर्जे। अनेक सरकारी इम्तहानों की कॉपियाँ जाँच कर वो ख़ासी आय अर्जित कर लिया करते। अपने घर पर 15-20 बच्चों को बुला लेते। उनकी पत्नी मेज़ पर बैठ जातीं और जोर-जोर से आन्सर बोलती जातीं, पहले का ए, दूसरे का सी...। और चंद घंटों में सारी कापियाँ जँच जातीं। सिर्फ चाय-नाश्ते की 
ख़्वाहिश में हम सभी उनके पेपर जाँचने के लिये श्रमदान करने को उतावले रहते। नूर साहब की आँखों की शोभा एक ऐसा चश्मा बढाता था जिसमें से उनकी आँखें किधर देख रहीं हैं, ये जान पाना कठिन था। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि वो सनग्लास नहीं था, पावर इतना ज्यादा था कि उसके ग्लास में गोले के अन्दर गोले और गोले के अन्दर गोले और गोले के अन्दर गोले पड़ा करते थे। कितने गोले पता नहीं। वो बच्चों से ही किताब पढ़वाते और एक-एक लाइन की व्याख्या करते। जो बच्चा फँस जाता वो और नूर साहब ही उस पढ़ाई का लुफ़्ट उठा पाते। बाकी मटरगश्ती किया करते।  

मेरी स्थिति वही थी जैसे जेल से छूटे कैदी की। अत्यधिक अनुशासन से अनुशासनविहीनता की स्थिति। और अब मुझे इसका आनंद भी आने लगा था। नूर साहब की क्लास इसके लिये सर्वथा उपयुक्त हुआ करती थी। अमूमन क्लास टॉपर मेरे ठीक आगे बैठता था, लेक्चर थियेटर की पहली पंक्ति में। हमारी अच्छी मित्रता भी थी। इसलिये किसी भी बोर से बोर क्लास में हम आनन्द के कुछ पल खोज ही लेते थे। उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी कुर्सी के पटरे की कील निकल गयी थी। और वो जरा भी हिलता-डुलता पटरा सरक जाता। वो दोस्त ही क्या जो फटे में टाँग न अड़ाये। बाकि क्लासें तो ठीक-ठाक गुज़र गयीं। नूर साहब की क्लास का मै इंतज़ार कर रहा था। आते ही उन्होंने 'अ प्ले बाई टैगोर' के पाठ के लिये एक लडके को चुन लिया और सराबोर हो कर उसकी पंक्तियों को एक्सप्लेन करने लगे। मैंने टॉपर के पटरे को लात से हिलाना शुरू कर दिया। इस खेल में उसे भी मज़ा आने लगा। उसने मेरा पैर पकड़ लिया। मै भी टाँग छुड़ाने के प्रयास में लग गया। इस पूरे कार्यक्रम हम इतना डूब गये की देश-काल-सीमा का ज्ञान ही नहीं रहा। मास्टर जी पहले से ही टैगोर की गाथा में आकंठ डूबे हुये थे। 

मैंने अपने पैर को ज़ोर से खींचा, टॉपर ने उसे आगे खींचा। और ये क्या मेरा पैर बिना किसी व्यवधान के पीछे आ गया। पर देखता हूँ कि मेरा जूता एक परफेक्ट प्रोजेक्टाइल लेता हुआ आगे की ओर जा रहा है। मैथ के प्राचार्य जिस प्रोजेक्टाइल को थ्योरी में समझाया था और वो मेरी समझ में कम आया था, इस दुर्घटना से एकदम क्लियर हो गया। 45 डिग्री पर गोला दागो तो सबसे दूर जाता है। नूर साहब के कान को मिस करता हुआ वो जूता मेज पर विराजमान हो गया। तन्मयता से पढ़ा रहे नूर साहब को पहले तो कुछ समझ नहीं आया। पर मेज पर गिरी अजीबोगरीब आकृति और धप्प की आवाज़ ने उनका ध्यान खींच  ही लिया। उन्होंने झुक कर उस बला का मुआयना करना शुरू कर दिया। ख़ुशबु से या आकार से उन्हें शीघ्र समझ आ गया कि ये किसी का जूता है और शायद उन्हें लगा होगा किसी ने फ़ेंक कर मारा है। पूरी क्लास सन्नाटे में आ गयी। मै भी और टॉपर भी। कोई और होता तो गुस्से से आग-बबूला हो गया होता पर नूर साहब का सब्र काबिलेतारीफ़ था। उन्हें अपनी लिमिटेशन भी मालूम थी। उन्होंने क्लास की ओर निहारा। उन्हें कुछ दिखाई तो देने से रहा। इसलिये मै कुछ निश्चिन्त था। पर सभी जानते हैं कि टॉपर लोग कैसे होते हैं। वो घबरा गया। "सर ये मेरा नहीं है।" "तो फिर किसका है।" नूर साहब ने अपनी दूर-दृष्टि का उपयोग किया। "सर इसका।" नूर साहब का चेहरा गुस्से में लाल हो गया। लगा कच्चा चबा जायेंगे। टॉपर की उंगली मेरी ओर इशारा करने ही वाली थी कि मै मेज के नीचे घुस गया। नूर साहब ने मेरे पीछे वाले छात्र पर अपनी क्रोधित निगाह डाली। मेरा पकड़ा जाना तय था। मरता क्या न करता, जूता छोड़ कर मै खिड़की की ओर भागा। जब तक नूर साहब समझ पाते मै ये-जा, वो-जा।  

अगले दिन मै उनकी क्लास में वैसे ही बैठा था जैसे की कुछ हुआ ही न हो। उन दोस्तों का मै अभी भी शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने मेरा नाम अपनी ज़ुबान से नहीं लिया। आज मै नूर साहब, जहाँ भी हों, से इस लेख के माध्यम से उस कृत्य के लिये क्षमा की रिक्वेस्ट भी प्रेषित कर रहा हूँ।

प्रोजेक्टाइल का जो फंडा उस दिन मिला, उसके बाद मैंने कभी भी क्लासरूम को अपने और अपने अध्ययन के बीच आने नहीं दिया। आउट ऑफ़ बॉक्स होने के कारण अक्सर आउट ऑफ़ क्लास ही रहा. वैसे भी शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की प्रवृत्तियों को मुक्त करना ही तो है।

- वाणभट्ट
        

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

बुद्ध-भाव

जाते-जाते वो मुड़ा। उसके चेहरे पर बुद्ध-भाव था।

जामनगर स्टेशन पर मै दिल्ली जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था। यू पी के स्टेशनों के विपरीत गुजरात के प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ कम हुआ करती है। दुकानें सजी हुयीं थीं पर उन पर भीड़ नदारद। वेण्डर ज्यादा, लोग कम। पुरसुकून की स्थिति में मै ट्रेन के टाइम पर स्टेशन आ चुका था। पर भारतीय रेल की अपनी सार्वभौमिक विशेषतायें हैं, जो देश-काल से प्रभावित नहीं होतीं। ट्रेन दो घंटे लेट थी। किताबें मेरी यात्रा का सहज हिस्सा हैं और ऐसी ही परिस्थितियों के लिये इनका साथ होना ज़रूरी भी है।

एक खाली पड़ी बेंच पर मै अधलेटा सा बैठ गया। बैग का सहारा लेकर। असगर वजाहत की एक किताब मेरे हाथों में थी। मुझे लेखन में जब तक लेखक का अक्स नज़र ना आये, पढ़ने का मज़ा नहीं आता। और ये जनाब पूरे दिल और शिद्दत से लिखते हैं। शैली भी रोचक और कथ्य भी। "मै हिन्दू हूँ" की कहानियों में मै खोया हुआ था कि बगल में एक किशोर ने अपना बैग रखते हुए कहा "अंकल कहाँ जाना है आपको।" अमूमन तो मै यात्रा में बोलता नहीं। पर बच्चे के चेहरे पर एक आकर्षण था। "बेटा मै दिल्ली जा रहा हूँ, वहाँ से कानपुर जाना है।"

उस लड़के ने मुड़ कर गुजराती में अपने माँ-बापू को बताया - ये अंकल भी कानपुर जा रहे हैं। पूरा परिवार मेरे पास आ गया। उसकी एक छोटी बहन भी थी जो 10वीं में पढ़ रही थी। पिता ने बहुत ही गर्व से बताया मेरा लड़का देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थान आईआईटी, कानपुर में दाख़िला लेने जा रहा है। आप भी क्या कानपुर के रहने वाले हैं। कैसा शहर है, कैसे लोग हैं। आदि-आदि प्रश्न। मेरा लड़का तो अभी बहुत छोटा है। पहली ही बार में सेलेक्ट हो गया। घर से इतनी दूर पहली बार जा रहा है। बड़ी चिंता हो रही है।

मैंने अपने कनपुरिया ज्ञान को कायम रखते हुये आईआईटी की शान में कसीदे पढ़ दिये। अरे एकदम अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है। आपको बिल्कुल चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ बच्चे पढाई में रमे रहते हैं। सिर्फ ज्ञान की चाह वाले ही वहाँ पहुँच पाते हैं। आपका बेटा तो लाखों में एक है, तभी वहाँ पहुँच पाया।

पिता, माँ व बहन सभी अपनी-अपनी जिज्ञासा को शांत कर लेना चाहते थे। परन्तु बच्चे को कोई कौतुहल नहीं था। वो मुस्कराता हुआ सब बातें सुन रहा था। माँ-बहन अपनी संवेदनाओं को छिपा कर शांत बने रहने का भरसक प्रयास कर थीं। पिता ऊपर से सहज बने हुए थे। मुझे पढाई के लिये पहली बार घर छोड़ते हुये जो एहसास हुआ था। देश के इस कोने से इतर नहीं था। माँ-पिता-बहन का वो चेहरा भुलाने में दशकों गुज़र गये। पर अभी भी वो दृश्य जेहन में ताज़ा है। आज वो दृश्य पुनर्जीवित हो गया।

दो-ढाई घंटे कब बीत गये पता ही नहीं चला। तभी ट्रेन आने की घोषणा हुई। असुविधा के लिये औपचारिक खेद भी व्यक्त हुआ। माँ की आँखे डबडबा आयीं। बेटी, माँ की ओर देख कर उसके दर्द को समझने का प्रयास कर रही थी। पिता ट्रेन आने की दिशा में शून्य सा ताक रहा था। बेटा अन्यमनस्क सा ट्रेन जाने वाली दिशा में निहार रहा था। 

ट्रेन ने प्लैटफ़ॉर्म के बायें सिरे से प्रवेश किया।

माँ की सब्र का बाँध टूट चूका था। उसकी आँखों से आंसू झर-झर बहने लगे। बहन की आँखें नम हो आयीं थीं। उसने मुँह को रुमाल से दबा लिया पर उसकी सिसकी बरबस बाहर निकल ही गयी। पिता मिनरल वाटर की बोतल लेने के बहाने दृश्य से बाहर हो गये थे।

हमारा कोच अलग था। ट्रेन के रुकते ही हम फिर अजनबी हो गये। मै अपने कोच की ओर बढ़ चला था।

ट्रेन चलने में देर लग रही थी। मै प्लैटफ़ॉर्म पर उतर आया चहल-कदमी के इरादे से या पुनः उस परिवार को देखने, कह नहीं सकता।

माँ-बेटी एक-दूसरे को गले लगाये ज़ार-ज़ार रो रहीं थीं। पिता उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सा बेटा परदेश जा रहा है। बेटा भावहीन सा गेट पर खड़ा था। पिता ने उसे अन्दर जाने का इशारा किया। अन्दर जाते-जाते वो मुड़ा। उसके चेहरे पर बुद्ध-भाव था।

ज्ञान की तलाश में घर तो छोड़ना ही पड़ता है। बुद्ध वापस आने के लिये घर नहीं छोड़ते। पिता को मालूम है।

- वाणभट्ट

जागृत निन्द्रा

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डाय...