शनिवार, 19 सितंबर 2026

अन्धेरगर्दी

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डायलॉग नहीं था. फिर भी इसमें कहीं कुछ तो वजन था, जो ज़ेहन में रह गया. उस समय इसका मतलब समझ नहीं आया था. लगा कुछ बोलना रहा होगा, सो राईटर ने लिख दिया होगा, कलाकार ने बोल दिया होगा. हम भी तब जुम्मा-जुम्मा दस साल के बच्चे हुआ करते थे. अब लगता है कि लेखक ने बड़ी बारीकी से देखा-समझा होगा, स्मगलरों के काम करने के तरीक़े को. ये इतनी सफ़ाई से अपना काम करते हैं कि किसी को कोई शक़-शुबहा न हो. उस फ़िल्म में किसी अंध विद्यालय के बच्चों का उपयोग तस्करी के लिये किया जाता था. शातिर लोग शतरंज की तरह चालें चलते हैं. ग्रूप बना कर जब गलत काम किये जाते हैं तो उसे साजिश की संज्ञा दी जा सकती है. प्रायः जो साजिशें समूह विशेष के लाभ के लिये होती हैं, वे देश और समाज विरोधी भी होती हैं.   

जब अपने चारों ओर आत्मकेंद्रियता से ग्रसित समाज को देखता हूँ, तो समझ आता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ इस कदर हावी है कि लोग बस मै-मेरा-अपना और बहुत हुआ तो मेरे-अपने तक सीमित हो कर रह गये हैं. जब सबको अपनी-अपनी पड़ी है, तो देश-दुनिया की चिन्ता वे करें जिन्हें घर फूँक तमाशा देखने का शौक़ है. बाकी अपन को क्या, जहाँ अपना लाभ वही मेरा रास्ता. एक तरफ़ कुछ अल्पसंख्यक राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ लोग देश के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर करने को उद्दत हैं तो दूसरी तरफ़ बहुसंख्यक कृतघ्न लोगों की कमी नहीं है. ज़िन्दगी का आनंद तो ना-समझ लोगों के पल्ले ही आता है. 'बने रहो लुल्ल, मजा लो फुल्ल'. आज का ब्रह्म वाक्य बन चुका है. ये हमारे डीएनए के भीतर तक पैठ गया है. इसके लिये क्या जेन-एक्स और क्या जेन-ज़ी, कोई अछूता नहीं रहा है. 'समझदार की मौत है' - एक मुहावरा ही बना दिया गया. सामान्यतः हर मुहावरा, हर देश, हर भाषा में अलग-अलग तरीक़े से प्रयोग में आता रहा है. लेकिन समझदार की मौत है के समानान्तर शायद ही कोई मुहावरा अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा में गढ़ा गया होगा. शून्य की खोज की तरह इस मुहावरे की खोज का श्रेय भी हमें ही मिलना चाहिये. इसके पीछे राजनैतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण हो सकते हैं. वर्षों की ग़ुलामी अकारण तो न थी. देशद्रोह के उदाहरणों से भारत का इतिहास भरा पड़ा है. दूसरे देश पर आक्रमण कर लूटने या राज करने का विचार किसी के मन में आना राजनीति है. एक बार लुटने-पिटने के बाद, पुन: लुटने के लिये तत्पर रहना, इतिहास है. और पूरी दुनिया में एक ही देश को इस पुनीत कार्य के लिये चिन्हित कर लेना, भूगोल है. जिसे देखो कहाँ जा रहा है, खोजने या लूटने, तो भारत. अमेरिका दुनिया के नक्शे में कभी न आता, यदि कोलम्बस भारत खोजने न निकलता. भ्रष्टाचार और स्वार्थ में लिप्त वर्तमान ही अतीत का इतिहास है. इतिहास पढ़ने का समय न हो तो वर्तमान को ही इतिहास की दृष्टि से देखिये. सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये चरित्रवान नेतृत्व की ही नहीं कर्तव्यपरायण नागरिकों की भी आवश्कयकता होती है. हर युग को अपना चाणक्य खोजना पड़ता है जो देश में जन-जागरण लाने में सक्षम हो. परन्तु घनानन्द जब बहुतायत में हों तो कितने ही चाणक्य खप जायेंगे देश को सही मार्ग पर लाने में. आज भी अगर आप चारों ओर दृष्टि डालें तो आपको लगेगा कि आप भविष्य के जिस इतिहास में जी रहे हैं, वो किसी भी प्रकार से अपने पूर्ववर्ती इतिहास से भिन्न नहीं है. अन्ग्रेज़ों के शासन काल में देशप्रेम का प्रदर्शन करना कतिपय आसन था. आप शासन का विरोध करते तो क्रांतिकारी घोषित हो जाते. आज जब अपनों पर अपनों का ही राज है तो ये सिद्ध करना कठिन हो जाता है कि कौन देश के लिये समर्पित है कौन नहीं. सक्षम पदों पर बैठे लोग वाह्य रूप से देश के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करने पर विश्वास करते हैं, वो भी साल में दो बार. पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी न आते तो शायद उसकी भी आवश्यकता न पड़ती. कथनी और करनी में अन्तर का भान बाबा कबीर ने चौदहवीं शताब्दी में ही हो गया था. 

कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोई। 

कथनी तज करनी करे, तो विष सों अमृत होई।।

पक्ष और विपक्ष दोनों देश प्रेम से ओत-प्रोत हैं. दोनों ही देश के विकास को ले कर कृत संकल्प हैं. लेकिन चूँकि दोनों धुर विरोधी हैं, इसलिये जब तक वे स्वयं सत्ता में न आ जायें, एक दूसरे का विरोध करते रहेंगे. ग्रेटेस्ट और लार्जेस्ट डेमोक्रेसी का उदाहरण अमेरिका और भारत के संदर्भ में प्रायः दिया जाता है. वहाँ एक तरह से दो पार्टी सिस्टम है. हमारे यहाँ छह हज़ार से अधिक पंजीकृत पार्टियाँ हैं. ये बात अलग है कि वर्तमान परिपेक्ष्य में एक पक्ष को रोकने के लिये सारा विपक्ष एक हो गया है. इस प्रकार हम भी कह सकते हैं कि हम लार्जेस्ट के साथ-साथ ग्रेटेस्ट डेमोक्रेसी बनने की दिशा में अग्रसर हो चुके हैं. जनता की स्थिति भी कोई कम बुरी नहीं है. पक्ष हो या विपक्ष, जनता आँख मूँद कर अपने-अपने नेता के पीछे चल रही है. जितने सम्प्रदाय, जितनी जातियाँ, उतने नेता, उतनी पार्टियाँ. सत्ता को दिये सुझाव को कई बार राष्ट्र विरोध मान लिया जाता है और सरकार के अच्छे काम में बुराई खोजना विपक्ष का एक मात्र काम बन गया है. सिर्फ़ विरोध के लिये विरोध कहाँ तक उचित है, ये जनता को हर पाँच साल बाद देखना होता है.

कमरे में तीन लोगों ने प्रवेश किया.  दो पुरुष और एक महिला. तीनों एक प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्यालय से पधारे थे. प्रथम पुरुष - सन्युक्त निदेशक, द्वितीय पुरुष - उपनिदेशक और तृतीय महिला - सहायक निदेशक थीं. वे लोग अपने प्रदेश में प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित करवाने के उद्देश्य से हमारे यहाँ आये थे. कृषि से सम्बंधित लोगों के पास कृषि की हर समस्या का वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध है. उन्हें अभियांत्रिकी और अभियन्ताओं की आवश्यकता कम ही पड़ती है. लेकिन यहाँ मामला पूरी तरह से अभियांत्रिकी और प्रसंस्करण से सम्बन्धित था. गनीमत है किसी ने ये नहीं कहा कि हमारे यहाँ कोई अभियन्ता नहीं है. मज़बूरी थी, वे स्टेट गेस्ट थे, तो किसी ने मेरे कमरे का रास्ता बता दिया. उन्हें दरकार थी, प्रसंस्करण सम्बन्धी डीपीआर की. मैंने यथा-ज्ञान, यथा-क्षमता उनकी सहायता करने का प्रयास किया. प्रसंस्करण की विधि और तकनीकों की विस्तार से चर्चा की और डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाने में यथा-सम्भव सहायता की. संयुक्त और उप निदेशक कृषि स्नातक थे जबकि महिला देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से कृषि अभियांत्रिकी में परास्नातक थी. चूँकि ये मुद्दा ही अभियांत्रिकी का था इसलिये सारे के सारे प्रश्न महिला अभियन्ता द्वारा ही पूछे जा रहे थे. दो दिन के पश्चात उसने जो रिपोर्ट तैयार की वो निश्चय ही काबिल-ए-तारीफ़ थी.  

दो दिन उनके प्रवास के दौरान उनसे इनफॉर्मल परिचय भी हो चला था. मैंने पूछ ही लिया कि माननीय मंत्री जी ने हर प्रदेश में कृषि अभियान्त्रिकी निदेशालय बनाने के उद्देश्य से एक पत्र सभी प्रदेशों को भेजा है. उस दिशा में आपके प्रदेश ने क्या कोई प्रयास किया है. सीनियर मोस्ट संयुक्त महोदय ने मुस्कुराते हुये कहा कि हमें अभी उसकी आवश्यकता नहीं है. अलग निदेशालय बनाने से क्या लाभ होगा. अभी हम साथ-साथ काम करते हैं. जिन प्रदेशों में अलग कृषि अभियन्त्रण निदेशालय बन गया है, वहाँ यंत्रीकरण का स्तर बढ़ गया है, कृषि उत्पादन मूल्यों में कमी आयी है और सामयिक कृषि प्रबन्धन से उत्पादकता में भी वृद्धि मिली है. सम्भवतः कृषि अभियन्त्रण की सफलता की पुनरावृत्ति के उद्देश्य से ही मन्त्री महोदय ने प्रत्येक प्रदेश में कृषि अभियांत्रिकी निदेशालय की आवश्यकता पर बल दिया हो. 

आज कृषि आधारित हर संगठन-संस्थान में कृषि अभियांत्रिकी की आवश्यकता और महत्ता का तीव्रता से अनुभव किया जा रहा है. किन्तु विभागों में कृषि स्नातकों की भीड़ में दो-एक अभियन्ता ही रखे गये हैं. जबकि यह सभी जानते हैं कि कृषि क्षेत्र की अधिकान्श समस्याओं के व्यापक समाधान अभियांत्रिकी के द्वारा ही सम्भव है. खेत तैयार करने से लेकर, फसल तैयार होने तक और उसके बाद उपभोक्ता की थाली तक पहुँचने में फसल को अनेक चरणों से गुजरना होता है. मूल्य श्रृंखला में उत्पादक से अधिक लाभ मूल्य श्रृंखला के अन्य हितधारकों ले जाते हैं. मुख्य उत्पादक यानि किसान के लिये खेती कभी-कभी घाटे का सौदा बन जाती है. कृषक की आय मात्र उत्पादन दोगुना करने से दुगनी नहीं होने वाली. बल्कि दोगुने उत्पादन पर उपज का मूल्य आधा होने की सम्भावना अधिक है. ये किसान सहित सबकी समझ में आ गयी है. बिना समुचित आय के किसानों को कृषि कार्यों से जोड़े रखना आसान नहीं होगा. सतत कृषक और सतत कृषक परिवार की संकल्पना के बिना, सतत कृषि की परिकल्पना नहीं की जा सकती. 

विभिन्न कमेटियों की संस्तुति में कृषि अभियान्त्रिकी को बढ़ावा देने की बात हो रही है. लेकिन कहीं न कहीं, डर ये भी है कि छद्म आत्मा-परमात्मा टाइप के कार्यों को जो तथाकथित विज्ञान का स्वरुप दिया गया है, वो खंडित न हो जाये. इसी लिये कृषि अभियन्त्रण निदेशालय की स्थापना के स्पष्ट निर्देश के बाद भी कृषि स्नातक बाहुल्य वाले विभागों ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखायी है. शोध कार्य भी प्रायः समस्याओं का स्थायी निदान करने की दिशा में लगे हुये हैं, वो भी बिना अभियन्त्रण सम्मिलित किये. इसी कारण से ऐसे विषयों पर शर्म, समय और धन व्यय हो रहा है, जिसकी आवश्यकता ही नहीं है. जिन काल्पनिक समस्याओं के काल्पनिक स्थायी समाधान पर वैश्विक स्तर पर शोध कार्य चल रहे हैं, उनका एकीकृत प्रबन्धन सम्भवतः किफ़ायती विकल्प हो. विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित प्रयोग अधिक प्रभावशाली और विश्वसनीय सिद्ध हुआ है और भविष्य में भी होगा. जहाँ कृषि विज्ञान, कृषि क्षेत्र की समस्त समस्याओं का निराकरण विज्ञान के द्वारा करने के लिये कृतसंकल्प है, वहीं उनका प्रबन्धन निराकरण से कहीं अधिक मितव्ययी, आसान और प्रभावी है.    

जिनके ज्ञान चक्षु खुल चुके हैं, उन्हें व्यक्तिगत हानि-लाभ का बखूबी पता है. वे देश-काल से ऊपर उठ चुके हैं. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी कृषि में अभियांत्रिकी के महत्त्व पर तो बात हो रही है लेकिन कोई अभियन्त्रण को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं कर रहा. संस्तुतियों पर ध्यान दिया जाये तो सभी अभियान्त्रिकी की बात तो करते हैं, लेकिन अभियंत्रण विभाग-प्रभाग स्थापित करने की नहीं. हर संस्थान में कृषि के सभी महत्वपूर्ण व गौण विषयों के विभाग मिल जायेंगे, लेकिन संस्तुतियों के बाद भी कृषि अभियन्त्रण विभाग या प्रभाग नहीं मिलेगा. कृषि विज्ञान के सभी विषय अपने कार्यक्षेत्र (डोमेन) के बाहर नहीं झाँकते तक नहीं. एक कृषि अभियन्त्रण ही है, जो बीज से लेकर अन्तिम उत्पाद तक हर चरण के सभी पक्षों से किसी न किसी रूप में सम्बद्ध है. इस बात का संज्ञान कृषि से सम्बद्ध सभी लोगों को है किन्तु हर विषय विशेषज्ञ अपने विषय की महत्ता से इतना अभिभूत है कि वो अन्य विकल्पों और सम्भावनाओं पर विचार नहीं करना चाहता. हर जगह दुनिया तो आँख वाले ही चला रहे हैं और वो चाहते हैं कि बाकी सब उन्हीं चश्मे से देखें. कृषि क्षेत्र इससे इतर नहीं है. कृषि विज्ञान सब कुछ जानते और समझते हुये भी कृषि अभियंत्रण के अस्तित्व को नकारने में लगा हुआ है. जब की उन्हें भी भली-भाँति मालूम है कि समस्याओं का व्यापक समाधान कृषि अभियंत्रण के बिना नहीं निकलने वाला. अब जा कर सन पचहत्तर में आयी फ़िल्म के डॉयलॉग का मतलब समझ आया - 'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. देर-सबेर कृषि अभियन्त्रिकी निदेशालय हर प्रदेश में स्थापित होगा. देर पहले ही बहुत हो चुकी है. ये पहल जितनी जल्दी हो उतना अच्छा. शुभस्य शीघ्रम.

कृषि समस्याओं के समाधान व प्रबन्धन विज्ञान और अभियन्त्रण का समेकित उपयोग में निहित है. वैसे भी कहा गया है - साइंस इज़ अबाउट नोइंग, इंजीनियरिंग इज़ अबाउट डूइंग.   

-वाणभट्ट 

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