शनिवार, 29 जुलाई 2023

क़वायद

सुबह के बमुश्किल सात बजे थे, जब दरवाज़े पर किसी ने घंटी बजायी. बालकनी से झाँक के देखा तो गेट के सामने एक सरकारी गाड़ी खड़ी और सादी वर्दी में उससे उतरे कुछ लोग खड़े थे. उनके चेहरे से रुआब टपका पड़ रहा था. मुझे लगा आज ईडी ने रेड डाल ही दी. ख़ुशी भी हुयी कि मोहल्ले वाले जो मुझे किसी लायक नहीं समझते थे, उन्हें जलाने के लिये इस रेड का पड़ना आवश्यक था. नीचे आते-आते मै ये ही सोचता रहा कि कहीं समाज कल्याण में काम करने वाले मेरे पडोसी की जगह गलती से मेरी घंटी तो नहीं बजा दी. मेरे घर क्या पूरे खानदान की रेड डाल दो तो भी क्या मिलेगा. गेट पर पहुँचा तो चपरासीनुमा अधिकारी ने कुछ धमकी भरे अन्दाज़ में कहा - गेट खोलो हमारे पास तुम्हारे घर का सर्च वारेन्ट. मैंने कहा - भाई साहब आपको ग़लतफ़हमी हुयी होगी मै तो अदना सा वैज्ञानिक टाइप का निरीह प्राणी हूँ. लेकिन उसके चेहरे पर व्याप्त भाव से ऐसा लग रहा था मानो किसी माफ़िया के घर रेड डालने आया है. उसने वारेंट का कागज़ दिखाया. नाम और पता मेरा और मेरे घर का ही था. उसने बताया हम कोडेक्स अल्मेंटेरियस से आये हैं. खबर मिली है कि आपके किचन में हाइजीन का बिल्कुल ख्याल नहीं रखा जाता. आपके यहाँ का खाना खाने से आपके बच्चे, रिश्तेदार और दोस्त बीमार पड़ सकते हैं. आपके ही किसी दोस्त ने शिकायत दर्ज़ करायी है कि आपने हफ़्ता पुरानी मिठाई फ़्रिज से निकाल उन्हें सर्व कर दी. एक हफ़्ते से दिन में दस बार उठने-बैठने के कारण पैरों की मसल्स रप्चर हो गयीं हैं. डीहाईड्रेशन की दिक्क़त और डॉक्टरी खर्च अलग से. जब से बीवी-बच्चे हेल्थ कॉन्शस हुये हैं, घर में मिठाई का उपभोग कम हो गया है. लेकिन घर में मिठाई सिर्फ इस उदेश्य से रखी जाती है कि कहीं कोई मेहमान आ गया तो क्या सोचेगा. कई बार तो महीनों तक मेहमान नहीं आते तो उस मिठाई को मुझे ही खा के ख़त्म करना पड़ता है. बीवी-बच्चों का क्या सब के सब लाट साहब बने घूम रहे हैं. मेरी भी कोशिश होती है कि फंगस लगने के पहले खा लिया जाये, उसके बाद खाने में मिठाई थोड़ी खट्टी हो जाती है. आख़िर इसमें मेरे गाढे खून-पसीने की कमाई लगी है. उसे कचरे के ग्रीन डिब्बे में फेंकने से अपने ही दिल में दर्द होता है.

सहअस्तित्व में विश्वास वाले देश में मेरे घर के किचन के हालात भी वैसे ही थे जैसे शहर के. जहाँ छुट्टा सांड और कुत्ते सड़क पर चलना मुहाल किये हुये हैं, वहीं हमारे किचन में कॉकरोच और चूहों का वास हुआ करता है. छिपकली और मकड़ी का गाहे-बगाहे दिख जाना हमारे लिये सामान्य सी बात है. ये ड्रम-कनस्तर में भले न घुस पाते हों लेकिन किचन का टांड और डाइनिंग टेबल इनकी पसंदीदा सैरगाह हुआ करती है. वैसे तो ये प्राणी इतने समझदार हैं कि जब हम लोग सोने चले जाते हैं, तभी ये आबो-हवा बदलने के उद्देश्य से बाहर निकलते हैं. लेकिन यदि दिन ख़राब हुआ तो कहीं ये टीम के सामने ही हुला-हूप की प्रैक्टिस न शुरू कर दें. मुझे लगा किसी भी तरह इस टीम को किचन तक पहुँचने से रोकना होगा, नहीं तो लम्बी पेनाल्टी लगेगी. मैंने बताया कि आप जिनकी बात कर रहे हैं उनका हाजमा हमेशा खराब रहता है. वही मिठाई मैंने भी तो खायी थी, उन्हीं के साथ. मुझे तो कुछ नहीं हुआ. उनसे मैंने कई बार कहा कि शंकर जमादार के यहाँ जा के नस बैठवा लो, तुम्हारा पेट उखड गया है लेकिन भलाई का तो ज़माना ही नहीं रह गया है. उसने मेरी ही कम्प्लेंट लिखा दी. कल ही ताज़ी मिठाई आई है आप लोग बैठिये चाय-पानी पीजिये. कोई सेवा हो तो बताइये. इस पर चपरासीनुमा अफ़सर का चेहरा और कड़क हो गया. पूरी टीम जबरदस्ती मेरे किचन में घुस गयी. एक-एक डिब्बा, एक-एक कनस्तर पलट डाला. सबसे बुरा मुझे तब लगा जब उन्होंने बेचारे कॉकरोचों और चूहों की अलसुबह की नींद ख़राब कर दी. टीम को कितनी बद्दुआयें मिली होंगी गिनना संभव नहीं था. उन्होंने एक लम्बी सी चार्ज शीट बीवी के हाथों में पकड़ा दी और मुझे हथकड़ी पहना कर मेरे लाख विरोध करने के बाद भी धक्का मारते हुये गाड़ी में बैठा लिया. भयानक सपने ऐसे ही टूटते हैं. आँख खुली तो बेतरतीब हुयी चादर मेरे स्ट्रगल को बयान कर रही थी.

मेरा डर लाज़मी था. कुछ दिन पहले देश की राजधानी दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय और विश्वस्तरीय सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला. दुनिया भर के विकसित और विकासशील देशों के खाद्य और औषधि प्रशासकों का जमावड़ा था एक छत के नीचे. उनका उदेश्य बहुत ही साफ़ था कि हाइजेनिक खाद्य पदार्थ पर सबका हक़ है और उसे उपलब्ध कराना उनकी ज़िम्मेदारी. दुनिया एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो गयी है इसलिये बड़े-बड़े विकसित देशों के लिये विकासशील देशों की आम और ख़ास जनता के स्वास्थ्य का ख्याल रखना ज़रूरी हो जाता है. विकसित देशों के लिये विकासशील देशों की खाद्य सामग्री का ध्यान रखना इसलिए भी आवश्यक हो जाता है कि बहुत सा कच्चा माल तो इन्हीं देशों से जाता है. वो चाहते हैं कि यदि आप ठेकुआ-अनरसा-बेडही भी बनायें तो विश्वस्तरीय मानदंडों के अनुरूप. इसके लिये केवल घरेलू या भारतीय मानकों से काम नहीं चलने वाला. इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट आज की आवश्यकता बन चुके हैं इसलिये सभी देशों को एक मंच पर आना चाहिये और एक ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिये कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी खाद्य पदार्थ का सेवन करके बीमार पड़ने का डर न लगे. लेकिन सिर्फ मानक बना देने से काम नहीं चलने वाला इसे इम्प्लीमेन्ट करवाना लोकल प्रशासन की जिम्मेदारी होगी. विकसित देशों का तो पता नहीं पर विकासशील देशों की आम जनता प्रशासन से उचित और सुरक्षित दूरी बना कर के रहने में ही अपनी भलाई समझती है. खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कार्य करने के कारण मेरी दिलचस्पी पैकेट पर लिखी हर एक इबारत पर रहती है. इतना तो मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि अपनी पैकेजिंग तो विश्वस्तरीय हो ही गयी है. अन्दर खाद्य पदार्थ की गारेंटी लेने के लिये कुछ एक्रेडिटेड लैब्स हैं, जिन्होंने यदि सर्टिफिकेट दे दिया तो आप उत्पाद पर आँख मूँद कर भरोसा कर सकते हैं. उसके बाद भी यदि आप बीमार पड़े तो ये आपके पाचन तन्त्र की गड़बड़ी मानी जायेगी. पहले मै लोगों को फ़ूड इंडस्ट्री लगाने की सलाह दिया करता था, अब सजेस्ट करता हूँ कि भाई जितने में इंडस्ट्री लगायेगा उससे कम पैसे में एक लैब स्थापित कर ले फिर उसका एक्रेडिशन करा ले. जैसे पैथोलॉजी लैब्स में भीड़ लगी रहती है, तेरे ग्राहक भी लाइन लगाये खड़े मिलेंगे. न कुछ बनाना, न बेचना, बस फ़ायदा ही फ़ायदा. बनाने के काम में दस लफड़े हैं.   

मेरे सपने में शंकर जमादार का ज़िक्र सुधी पाठकों के ध्यान में अवश्य होगा. शंकर जमादार का घर शहर के बीचों बीच बसे एक गाँव में रहता था. उसे गाँव कहना तो सही नहीं था लेकिन किसी सरकारी विभाग के खेतों के बीच कुछ जमादार परिवार पुश्तों से रहते आये हैं. जब से शहर में सीवर व्यवस्था लागू हुयी, तब से घर वालों ने साफ़-सफ़ाई का जिम्मा खुद ही उठा लिया है. एक से एक डिज़ाइनर ब्रश और भाँति-भाँति के टॉयलेट क्लीनर्स बाथरूम की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं. पाल साहब जब शंकर के घर पहुँचे तो घर का दरवाज़ा खुला हुआ था. उन्होंने दो बार आवाज़ भी लगायी लेकिन अन्दर से कोई जवाब नहीं आया. सामने की पगडंडी से एक आदमी मटमैला सा धोती-कुर्ता पहने सायकिल से आता दिखायी दिया. पीछे जानवरों के चारे के लिये कटी हुयी घास का गट्ठर बंधा हुआ था. पाल साहब को लगा हो न हो ये ही शंकर है. वो मोटर सायकिल से उतर कर उसके आने का इंतज़ार करने लगे. पास आया तो देखा कि उसकी उम्र 30-35 के अल्ले-पल्ले रही होगी. बलिष्ठ कसा हुआ शरीर उसके मेहनतकश होने का सबूत दे रहा था. उसकी देहाती वेश-भूषा और कनपटी पर सफेद होते बालों को देख कर कोई उसे पचास के उपर भी समझ सकता था. सायकिल खड़ी कर वो सामने चबूतरे पर बैठ गया. 

शंकर भैया से मिलने आये हो. वो अभी कहीं बाहर गये हैं. आने में देर लग सकती है. पेट की नस उखड़ गयी है क्या. बिना झिझक उसने पूछ लिया. अंजान आदमी के सामने पाल साहब खुलना नहीं चाह रहे थे लेकिन उसने उनकी दुखती हुयी नब्ज़ को पकड़ लिया. हाँ कहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था. अपनी इस परेशानी के लिये वो पिछले तीन महीनों से बड़े-बड़े डॉक्टरों के चक्कर लगा कर थक चुके थे. मोटी-मोटी फ़ीस देने और एंडोस्कोपी-कोलोनोस्कोपी कराने के बाद भी समस्या का निदान नहीं हो पा रहा था. तब किसी ने शंकर से मिलने की सलाह दी. 

शंकर भैया होते तो वो आपकी नाभि सेट कर देते. करना तो मै भी जानता हूँ लेकिन शंकर भैया इसके एक्सपर्ट हैं. आप चाहें तो बाद में आ जाइयेगा. आप एक काम करके देख लीजिये शायद आराम मिल जाये. दोनों पैरों को जोड़ कर उन्कडू बैठ जाइये. कोशिश कीजियेगा कि घुटना भी मिला रहे. अब धीरे-धीरे करके आप खड़े हो जाइये. पाल साहब को पेट में कुछ खिंचाव सा अनुभव हुआ. लगा मांसपेशियाँ जवाब दे जायेंगी. लेकिन जब खड़े हुये तो उनके पेट में जो हर समय गुड़गुड़ाहट बनी हुयी थी, बन्द हो गयी. उसने कहा - अब जाइये ऊपर वाले ने चाहा तो आपको दुबारा आना नहीं पड़ेगा. पाल साहब ने उस आदमी के हाथ में पचास रूपये का नोट रखने का प्रयास किया. बड़े-बड़े डॉक्टरों को सात सौ से हज़ार रूपये की फ़ीस दे चुके पाल साहब को लगा उस मैली धोती वाले के लिये पचास रुपये काफ़ी होंगे. लेकिन उसने लेने से मना कर दिया - आप ठीक हो जायें यही प्रार्थना है. जब शंकर भैया कोई पैसे नहीं लेते तो हम कैसे ले सकते हैं. खपरैल की झोपड़ी में इतनी दरियादिली देख कर पाल साहब को धन्यवाद जैसा शब्द बहुत छोटा लगने लगा. कृतज्ञ आँखों से उन्होंने उस व्यक्ति को प्रणाम किया और चल दिये. इस पूरे प्रकरण को विज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो टोने-टोटके से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा. लेकिन ये भी सच है कि पाल साहब को दुबारा उधर जाने की जरूरत नहीं पड़ी.

ऐसा ही तजुर्बा तब हुआ जब एक आईआईटी पास बाबा, जैसा मुझे बताया गया था, के यहाँ जाने का अवसर मिला. वो भी बीच शहर में एक गैरेज में बैठा करते थे. उनके आस-पास सीखने की इच्छा लिये कुछ चेले बैठे रहते थे. जगह बहुत गन्दी थी और हाईजीन का तो नामो-निशान तक न था. कोई सम्भ्रान्त व्यक्ति वहाँ न जाना चाहे न बैठना. लेकिन बाहर एसयूवीज़ खड़ी थीं, गाड़ियों की लाइनें लगी थीं. भेजने वाले ने पहले ही बता रखा था ज़्यादा ज्ञानी बनने की कोशिश नहीं करना वरना बाबा क्लास ले लेंगे. यथासम्भव हिन्दी बोलने के प्रयास के बाद भी कुछ अँग्रेजी शब्द आ ही गये. बाबा ने गियर शिफ़्ट किया और अँग्रेजी मोड में आ गये. उन्होंने अपनी चिकित्सा पद्यति के बारे में विस्तार से समझाया. यदि व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन करे तो बहुत सी बीमारियों से बच सकता है. वो सिर्फ़ नाड़ी देखते थे. और चन्द्र नाड़ी या सूर्य नाड़ी के अनुसार क्या खाना है और क्या नहीं इनकी पूरी लिस्ट छपवा रखी थी. कुछ सॉलिड और लिक्विड दवाइयाँ भी दीं, जिसे उन्होंने चूरन-चटनी की संज्ञा दे रखी थी. रिसाइकिल्ड प्लास्टिक की बोतलों में जो दवाइयाँ दीं. उनका सेवन हम जैसे आरओ का पानी पीने वाले शायद ही कर पायें. फ़ीस किसी भी मामले में एक एमडी डॉक्टर से कम न थी. लेकिन बाहर खड़ी लोगों की भीड़ बता रही थी कि लोगों को लाभ मिला होगा. ये भी समझ आया कि सिर्फ़ शुद्ध खाना ही काफ़ी नहीं है. जरूरी है ये जानना कि क्या खायें क्या नहीं. कभी न कभी सबने महसूस किया होगा कि स्वाद के चक्कर में सेहत ख़राब हो गयी. लेकिन ये बात शरीर को मोटरसाइकिल समझने वाले हाइली क्वालीफाइड लोगों के सेलिबस के बाहर है. और उनमें ये माद्दा है कि इस इलाज को झोला-छाप बता कर बाबा को अन्दर भी करवा दें.

कभी-कभी मुझे लगता है कि पूर्व जन्मों के कर्मों से हमें पढ़ाई का माहौल क्या मिल गया हम ने स्वयं अर्जित ज्ञान वालों को हल्के में ले लिया. आज जब कोई लंगोट पहने अपने पूर्वजों के ब्रम्हांडीय और चिकित्सकीय ज्ञान का ज़िक्र करता है तो अपनी छाती 56 इंच तक फूल जाती है. हजारों वर्षों के अपने ज्ञान-विज्ञान के इतिहास को नकार के जब हम अंग्रेजी में लिखे शब्द समूहों को ब्रम्ह्वाक्य मान लेते हैं तो भारतेंदु हरिश्चन्द्र की पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं - घर की तो बस मूँछे ही मूँछे हैं. हमको जो ज्ञान बाहर से ठूँस दिया गया उसी को हमने अपनी आधारशिला बना दिया. इसीलिये आज भी हम अपने शोध और शोधपत्रों पर बाहरी स्वीकृति खोजने में लगे हुये हैं. ज्ञान भले बाहर से आता हो लेकिन अन्तर्ज्ञान अन्दर से ही आता है. परन्तु उसके लिये मनन-चिन्तन का समय कहाँ है. पढाई का तो लक्ष्य एक अदद नौकरी से ज्यादा नहीं था. इतने स्पेशैलिटी एरियाज़ हैं. हर कोई अपने-अपने विषय में पारन्गत है किन्तु समग्रता का सर्वथा अभाव है. सब के सब अपनी आँखों पर ज्ञान की पट्टी बाँधे अपने-अपने ज्ञानानुसार हाथी को परिभाषित करने में लगे हैं. जिसके हिस्से जो लग गया उसी को समझ और समझा रहा है. जब अनपढ़ आदमी अपने तजुर्बे से पाल साहब को ठीक कर सकता है तो ये मानना पड़ेगा कि जीवन किताबी ज्ञान से पहले भी था और बाद भी रहेगा. अन्य सभी प्राणी सामान्य जीवन जीते हैं क्योंकि वहाँ न तो विशेषज्ञ होते हैं न इलाज. ज्ञानीजनों का काम है कि अपने-अपने क्षेत्र की महत्ता को बढ़-चढ़ के बताना-दिखाना. एक ज़माना था जब हम बेख़ौफ़ पानी पिया करते थे, आज अगर बिना ब्रैंड का पानी पीना पड़ जाये तो एक-दो दिन तक  साँस अटकी रहती है. अब यही खतरा भोजन और खाद्य पदार्थों में भी दिखाई दे रहा है. इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि साल में दो बार आपको अपने फ़ूड प्रोडक्ट की टेस्ट रिपोर्ट जमा करनी पड़ेगी नहीं तो लाइसेंस कैंसलेशन और पेनाल्टी के लिये तैयार रहिये.  

विकसित देश, जिनकी महारत युद्ध पोत, विध्वंसक मिसाइल और युद्धक विमान बनाने में है, वो तो अवश्य चाहेंगे कि उनके भोजन की व्यवस्था उनकी ही शर्तों पर विकासशील देश करें. इसलिये ऐसी सभाओं में बहुत ही डरावने आँकड़े प्रस्तुत किये जाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 200 प्रकार की खाद्यजनित बिमारियों के कारण हर साल लगभग 600 मिलियन लोग बीमार पड़ जाते हैं. लेकिन यदि डॉक्टर पीटर ग्लिडडेन के अमेरिकन मेडिकल जर्नल के आधार पर दिये गये बयान को सही माना जाये तो अमेरिका में मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण डॉक्टर्स द्वारा किया इलाज है. इस समिट में चालीस देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था. सबने अपने-अपने तरीके से खाद्य सुरक्षा की अनिवार्यता और कार्यान्वयन पर बल दिया. जबसे प्रसंस्कृत खाद्य सामग्रियों का उपयोग बढ़ा है, लोगों की ये जानने में दिलचस्पी है कि वो क्या खा रहे हैं. पहले ये पता नहीं था कि वो क्या-क्या खा रहे हैं. कपड़ों और जूतों की तरह यहाँ भी बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों का बोल बाला है. ब्रैंड के नाम पर लोग कुछ भी खा सकते हैं और ब्रैंड के नाम पर मुँह-माँगे दाम भी देने को तैयार रहते हैं. हर आदमी चाहता है कि उसे पता हो वो क्या खा रहा है, उसकी शेल्फ़ लाइफ़ कितनी है, उसमें किसी प्रकार का नुकसानदेह पदार्थ तो उपस्थित नहीं है. यदि कोई कमी है तो माल को वापस लौटाने तक का प्रावधान है. इस काम के लिये दुनिया के सभी देशों को चाहिये अन्तर्राष्ट्रीय मानकों का पालन करें और करायें ताकि किसी व्यक्ति कम से कम भोजन की वजह से बीमार पड़ने की नौबत न आये. प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में अप्राकृतिक रंग और संरक्षक रसायनों का उपयोग होना अवश्यम्भावी है. निश्चित रूप से फ्रेश भोजन की तुलना में प्रसंस्कृत उत्पाद स्वाद और पौष्टिकता में भले ही उन्नत हो लेकिन उसमें विषाक्तता का अंश अवश्य होगा, भले ही मानक सीमा के अन्दर हो. पूरी बात का सारांश ये है कि इतने नियम-कानून हैं कि उनका अक्षरशः पालन करना आसान तो नहीं होगा. खास तौर पर छोटे और मझोले खाद्य उद्यमियों के लिये.  

खाद्य सुरक्षा से जुड़े हर विषय के विशेषज्ञों ने दो दिवसीय सम्मलेन में ज्ञान की अविरल गंगा बहा दी. चूँकि सम्मलेन की भाषा अंग्रेज़ी थी तो ऐसा लगना लाज़मी था कि ये जो हम लोग अनब्रान्डेड और अनलेबेल्ड खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, वो देश और समाज के प्रति किसी द्रोह से कम नहीं है. उस सम्मेलन के दौरान बहुत से ऐसे पल भी मिले जिनमें समाधिस्थ अवस्था में चिन्तन-मनन किया जा सके, विशेष रूप से भोजनावकाश के बाद वाले सेशन्स में. ऐसे ही क्षणों में ये विचार भी कहीं से कूदने लगा कि विशेषज्ञों का काम ही डराना बन गया है ताकि उनकी रोजी-रोटी चलती रहे. किसी को ग्लोबल वार्मिंग की चिन्ता है, तो किसी को क्लाइमेट चेन्ज की. लेकिन 2500 सीसी के इंजन वाली कार और ढाई टन का एसी चलाते हुये उनकी आत्मा अपराधबोध से मुक्त रहती है. रोज-रोज लीवर-किडनी-हार्ट के एक्सपर्ट्स सोशल मिडिया के माध्यम से ये बताने में लगे हैं कि किस-किस तरह से आप खतरे में हैं. ख़ास बात है कि हर छोटे-बड़े शहर में हर समस्या का समाधान करने के लिये डॉक्टर्स हैं, हालाँकि उनकी संख्या आवश्यक डॉक्टर्स की संख्या से बहुत कम है. इसीलिये कितने ही झोलाछाप चिकित्सकों के धंधे भी फल-फूल रहे हैं. डॉक्टर्स की फ़ीस इतनी ज्यादा हो गयी है कि लोग मेडिकल शॉप के केमिस्ट भैया को ही हाल बता कर दवाइयाँ लेने लग गये हैं. विशषज्ञों का काम है पहले तो हर आदमी के सबकॉन्शस माइंड में ये फीड कर देना कि इतना प्रदूषण है कि हवा, भोजन सब दूषित हो रखा है. तुम स्वस्थ रह ही नहीं सकते. फिर शुरू होता है जीवनपर्यन्त चलने वाले इलाज का सिलसिला. ऐसी मेडिकल व्यवस्था के बाद खाद्य सुरक्षा का ढिंढोरा सिर्फ ये एहसास दिलाता है कि पढ़े-लिखे लोग सिर्फ अपने द्वारा अर्जित ज्ञान का बखान करने के लिये ज़िन्दगी को कॉम्प्लीकेट करते जा रहे हैं. पहले पानी कहीं भी कैसा भी पी लेते थे अब ब्रैंडेड कम्पनी की बोतल में बंद न हो तो भरोसा नहीं होता.  

फिर लगा शायद ये क़वायद सिर्फ इसलिए है कि विज्ञान अपने आप को सिद्ध करना चाहता है कि पढ़े-लिखे लोग अनपढ़ों से बेहतर हैं. और पढ़े-लिखे लोग ये एहसास दिलाना चाहते हैं कि हम तुम्हारा भला करना चाहते हैं. मेरी बात मानो, मेरे पीछे आओ. इसी में उनकी खुद की भलाई निहित है. पहले एक ईस्ट इंडिया कंपनी थी अब अनेकों कम्पनियाँ ग्लोबलाइजेशन के नाम पर घुस आयी हैं. आप के उपर अपने मानक थोपने की तैयारी है. बहुत सी कम्पनी-संस्थान-विभाग एक अंतरराष्ट्रीय मानक संस्था का सर्टिफिकेट लिये हुये हैं, लेकिन क्या मजाल कि उनकी कार्यशैली में धेले भर का भी परिवर्तन आया हो. हाँ, वो संस्था सर्टिफ़िकेट देने के नाम पर एक अच्छी खासी राशि वसूलती है. यही हाल राष्ट्रीय स्तर पर लैब्स के मानकीकरण का भी हो गया है. ये बात अलग है कि इनका हाल फोरेंसिक लैब्स सा हो रखा है. ये भी कारतूस किसी और कट्टे से निकला बता सकते हैं. अब जब करोना ने ये सिद्ध कर दिया है कि जिनकी इम्युनिटी अच्छी होगी उन्हें चिकित्सकों की आवश्यकता कम पड़ेगी. गरीबों के बच्चों की तुलना में डब्बा बंद खाद्य सामग्री और दूध का सेवन करने वाले सम्पन्न बच्चों के बीमार पड़ने की सम्भावना अधिक होती है. यही हाल रहा तो हम भी हाईजीन के नाम पर डिब्बा बंद चीजों पर भरोसा करने को विवश होंगे. ये कोई नहीं बतायेगा कि ये सब मार्किट के चोचले हैं जिनका उद्देश्य बस मुनाफ़ा कमाना है. जब हमने केमिस्ट्री-माइक्रोबायोलॉजी-फ़ूड सेफ़्टी जैसे जटिल विषयों का अध्ययन कर लिया है तो उसे जस्टिफाई करना भी तो जरूरी है. लोगों को भले उसकी कम या ज़्यादा जरुरत हो लेकिन उसके बिना हमारा क्या होगा. इसलिये ये समझना जरूरी है कि इंसान तो वैसे भी जी लेगा लेकिन साइंस को अपने आप को सिद्ध करना है कि मेरे बिना दुनिया नहीं चलेगी. वो भी इसलिये कि उपर वाले ने हमें शिक्षा का अवसर दिया. इतना पढ़-लिख के हम सबके स्वास्थ्य और सुरक्षा की बात कर सकते हैं. लेकिन जीवन इन सब चकल्लसों से उलट है, और सारे जीवों पर बराबर से लागू होता है.

किसी भी गोष्ठी का सबसे बड़ा आकर्षण वहाँ का फ़ूड कोर्ट होता है. यदि डेलिगेट्स को लजीज़ भोजन मिलता रहे तो अपने-अपने मुद्दे उठाये ये सब साइंस के लिये लड़ मरें वर्ना बस बदइंतज़ाम को कोसते घूमें. यदि पार्टिसिपेंट्स ख़ुश हैं तो मीटिंग सफल. सम्मेलन के गहन विचार-विमर्श की गम्भीरता को देखते हुये खान-पान की समुचित व्यवस्था थी. आपको भूख न लगे इसका बहुत ही अच्छे से ध्यान रखा गया था. आजकल इन्टरमिटेंट फास्टिंग की वक़ालत करने वाले दौर में हर दो घन्टे पर आपके पेट और स्वाद का ध्यान रख पाना, किसी भी मीटिंग की सफलता का द्योतक है. सब एक सुर में इस नतीजे पर पहुँचे फ़ूड क्वालिटी स्टैंडर्ड्स से कोई भी खाद्य सामग्री छूटनी नहीं चाहिये. चाहे वो रेडी वाला हो, रेस्टोरेन्ट का मालिक हो या मिठाई की दूकान वाला सब इस कानून की जद में आने चाहिये. आख़िर जनता के स्वास्थ्य का मामला है. सावन के महीने में विदेशी मेहमानों की पसन्द का ख्याल रखते हुये मुर्गे-मीट-मछली की समुचित व्यवस्था थी. एक से एक हिन्दुस्तानी तहज़ीब के शाकाहारी और माँसाहारी लजीज़ व्यंजन देखने को मिले. खाने के लिये प्लेट और पेट में जगह कम पड़ जाती थी. स्वादिष्ट भोजन को देख कर जो सबसे अच्छी बात मुझे लगी वो ये थी कि प्लेट में भोजन लेने से पहले न तो किसी ने मुर्गे का जन्मदिन पता किया, न किसी ने मछली की जात पूछी, न शाही पनीर की कैलोरी. भोजन अगर सुस्वाद हो तो ये बातें गौण हो जाती हैं. 

दो दिवसीय मीटिंग का निष्कर्ष ये निकला कि चाहे सड़क किनारे रेडी वाला हो या मल्टीनेशनल कम्पनी सभी से मानकों का पालन करना और करवाना अनिवार्य है. कानूनों का पालन कराने के लिये भी एक संस्था है और उसमें दरोगाओं की फ़ौज है. वो दिन दूर नहीं जब उसके घेरे में हमारे-आपके किचन भी होंगे. कोई दरोगा कभी भी आपके घर में मुँह उठाये घुस आयेगा और बतायेगा कि आपकी रसोईं अन्तर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन नहीं करती. इसलिए आपके किचन को बंद किया जाता है. मार्केट ब्रान्डेड प्रोडक्ट्स से भरा पड़ा है सुरक्षित भोजन हेतु अलां और फलां कम्पनी का डब्बा बन्द उत्पाद खाओ. डॉक्टर्स के पास जाना और इलाज़ कराना तो आपकी हॉबी है लेकिन हमारा प्रयास है कि कम से कम आप फ़ूड पॉइजनिंग से बीमार न हों. जब भारतीय संस्कृति स्वास्थ्य को आचार-विचार-व्यवहार से जोड़ के देखती है तो साइंस के लिये जरूरी हो जाता है कि वो अपने अस्तित्व को बचाये और बनाये रखने के लिये ऐसी क़वायद करती रहे.

-वाणभट्ट 

शनिवार, 15 जुलाई 2023

एक ग़ज़ल - बेवजह

कभी आईने में दिखते अक्स पर गौर करना...

फिर देखना धीरे-धीरे अपनी परतों का उधड़ना...


हर शख़्स जानता है दूसरे को करीब से...

बहुत मुश्किल है ख़ुद का सामना करना...


रिश्तों में अजब से जज़्बात हैं शामिल...

कहने को अपने हैं, समझे तो बेगाना...


दुनिया की रफ़्तार भी गजब की है...

सब चाहते हैं सबसे आगे निकल जाना...


बारिश कभी कम सर्दी कभी ज़्यादा...

उस पर चाहते हो तुम क़ुदरत को नचाना...


घर पे रहो तो बाहर निकलने का करता है दिल...

साथ हो जब अपने तो कैसा घबराना...


एक दिन तो जान जायेगा जीने का फ़लसफ़ा...

दूसरों के फ़लसफ़े ख़ुद पे न आजमाना...


ख़ुद से ही ख़ुद को भी कभी दाद 'भट्ट' दे ले...

मसरूफ़ ज़माने को मुमकिन नहीं फ़ुर्सत मिल पाना...


वाह-वाह क्या बात है...ये स्वरचित पंक्तियाँ हैं...योगेश जी को धन्यवाद...एक उम्दा ग़ज़ल लिखवाने के लिये...😊


-वाणभट्ट

रविवार, 11 जून 2023

जान हथेली पर

"तुमने किसी की जान को जाते हुये देखा है, वो देखो मुझसे रूठ कर मेरी जान जा रही है". यह गीत यमक अलंकार का एक फ़िल्मी उदाहरण है. जहाँ एक शब्द बार-बार रिपीट होता हो लेकिन हर बार उसका अर्थ बदल जाता हो, उसे यमक अलंकार कहते हैं. इस गीत में पहली वाली जान का अर्थ असली वाली जान है. दूसरी वाली जान अगर चली जाये तो तीसरी मिलने की सम्भावना रहती है, लेकिन यदि पहली वाली चली गयी तो आप माया-मोह के समस्त बन्धनों से मुक्त हो सकते हैं.

आज़ादी के पचहत्तरवें साल के आते-आते हिन्दुस्तान मेरी जान कहने और मानने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी है. पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जवनरी में देश प्रेम के रंग में रंगे जियालों को देख के लगता है अगर ये लोग पहले पैदा हो गये होते तो अंग्रेज़ों क्या मुग़लों की भी भारत की ओर मुँह उठा कर देखने की हिम्मत न पड़ती. हालात ये हैं कि जिसे देखो वही जान देने पर आमादा लगता है. हर कोई जान हथेली पर लिये घूम रहा है. ये बात अलग है कि अब देश अपना है, सरकार अपनी है, तो ऐसा कोई विशेष मुद्दा बचता नहीं है, विशेष रूप से सिविलियन्स के लिये, जिसके लिये जान दी जाये. बेवजह जान देने-लेने से न तो देश को कोई लाभ होता है, न ही समाज-परिवार को. लेकिन बिना रवानी के जवानी का क्या मतलब. जान देनी है तो देनी है. समझदार लोग एडवेंचर भी करते हैं तो सेफ़्टी के साथ. बिना सुरक्षा के साहस दिखाने का प्रयास यदि बेवकूफ़ी नहीं है तो उससे कम भी नहीं है. रैश ड्राइविंग एक ऐसी ही बेवकूफ़ी है, जिससे लोग अपनी और दूसरे की जान को हमेशा जोख़िम में डालने पर आमादा दिखते हैं.

जब मोहल्ला बना होगा, तभी प्लॉटिंग से पहले सड़क बनी होंगी. बेचने के बाद सोसायटी या निगम को क्या परवाह कि सड़क बची है या नहीं. पहले तो सड़कों में गड्ढे हुये फ़िर धीरे-धीरे गड्ढे में सड़क हो गयी. हम लोगों में सहनशीलता की भावना और भगवान के प्रति आस्था इतनी गहरी है कि 400 साल कि ग़ुलामी भी हमारे इस विश्वास को तोड़ नहीं पायी कि - होइहैं वही जो राम रची राखा. विदेशी भाषा और सभ्यता के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा आज भी हर तरफ परिलक्षित होती दिखती है. संतुष्टि का लेवल इतना अधिक है कि किसी प्रकार का धन-सम्पदा-वैभव, हमें ऊँचे मैटेरियलिस्टिक लक्ष्यों के लिये प्रेरित नहीं कर पाता. हमारी तो बस छोटी सी मंशा रहती है कि प्रभु हमें अपने पडोसी-यार-दोस्तों-नाते-रिश्तेदारों से आगे रखना. चीन-जापान-ताइवान तरक्की करें तो करें. अंत तो सबका वही होना है. खाली हाथ ही जाना है सबको. गीता के ज्ञान से हमने अपने मतलब का सार निकाल लिया है - क्या ले के आये हो, क्या ले के जाना है. कभी ये सोचने का प्रयास नहीं किया कि क्या छोड़ कर या दे कर जाना है. गीता-सार का पहला हिस्सा थोथा समझ के उड़ा दिया कि कर्म करना हमारे वश में है. और फल तो अवश्य मिलेगा लेकिन हरि इच्छानुसार. दुनिया ने पहले हमारे वेद-पुराण-ग्रंथों के कॉपीराईट की धज्जियाँ उड़ायीं. यहाँ पर जन्मे कर्म सिद्धान्त को चुरा कर जापान-अमरीका-चाइना-कोरिया-ताइवान, सब आगे निकल गये, तो क्या हुआ. हमने भी उनके सॉफ्टवेयर के कॉपीराईट्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की ऐसी-गम-तैसी कर डाली. हमारी पाइरेसी पॉलिसी ने सबको पानी पिला रखा है. ये तो भला हो हमारे यहाँ दुनिया का सबसे जीवन्त प्रजातन्त्र जीवित है वर्ना चीन की तरह यदि एकाधिपत्य वाली सरकार होती तो हम पता नहीं क्या-क्या कर गुजरते. जिनमें थोडी बहुत भी कुछ कर गुजरने की चाहत बची है, वो अमरीका-इंग्लैण्ड-जर्मनी-कनाडा-ऑस्ट्रेलिया का इनविटेशन जेब में डाले घूम रहे हैं. यहाँ तो हम अपनी विश्वगुरु का स्टेटस मेंटेन करने में लगे हैं. टैलेन्ट तो हर एक में इस कदर कूट-कूट के इतना भरा है कि पूरा सोशल मीडिया त्रस्त है. पूरी बात का लब्बोलबाब ये है कि हम चाहें तो बहुत आगे निकल जायें लेकिन हम चाहते ही नहीं हैं. हम जानते हैं कि सड़कें हैं तो गड्ढे हैं. सड़क न होती तो गड्ढे ही गड्ढे होते. हमारे वाहनों को वैसे ही चलना पड़ता जैसे चाँद और मार्स पर रोवर विचरण करते हैं.      

गड्ढा रहित और डामर सहित काली-काली सड़कें देखे अरसा हो रखा था. भला हो नगर निगम चुनाव का. वो न आता तो कदाचित टूटी पड़ी सड़कों की ओर किसी का ध्यान जाता. वोट देना भी सबकी मजबूरी है. किसी न किसी को तो देना ही है. ये बात नेता और जनता दोनों को पता है. उसे ही वोट देना समझदारी है जिसे आप जात-पात-धर्म या पड़ोस के नाते जानते हों. वोट माँगने तो हर कोई चला आ रहा है. लेकिन कोई थोड़ा बहुत काम करके वोट माँगे तो जनता उसे कभी निराश नहीं करती. यदि नेता ने चुनाव जीतने के बाद शुरुआती दौर में काम करा दिया तो पाँचवाँ साल आते-आते जनता का स्मृति लोप होने का खतरा बना रहता है. इसलिये मँजे हुये नेता सारा का सारा काम आख़िरी साल के लिये रख छोड़ते हैं. चुनाव दिवस से एक हफ्ते पहले कॉलोनी की एक-एक सड़क, एक-एक गली काली हो गयी. यहीं पर हमारे लीडरान की इच्छाशक्ति की दाद देने का मन करता है. ये चाह लें तो क्या से क्या हो जाये. लेकिन ये भी जानते हैं कि अगर बिना तरसाये-तड़पाये जनता का भला कर दिया तो जनता उसकी कद्र नहीं कर पाती. वो दिल ही क्या जो न माँगे मोर. पहले ज़्यादा कर दो तो जनता फ़्री की बिजली-पानी की उम्मीद पाल बैठती है. सिलिंडर सस्ता कर दीजिये लेकिन उपलब्धता न बढाइये, जनता आप को ही वोट देगी क्योंकि वो बस सिलिंडर का दाम देखती है. यदि सिलिंडर नहीं मिला तो क्या. वो लकड़ी-कोयला-केरोसिन फूँक लेगी, लेकिन यदि मज़बूरी में भी सिलिंडर का दाम बढ़ा दिया तो वोट तो की तो भूल ही जाइये और गाली खाने को तैयार रहिये. प्याज-टमाटर-आलू पर सरकारें गिर जाती हैं. गैस तो बहुत बड़ी चीज़ है. 

चुनाव के पहले, हफ़्ते भर में रातों-रात सारी की सारी सड़कें बन के तैयार हो गयी. रातों-रात मतलब रातों-रात. जब सोने गये तो सड़क पर सन्नाटा पसरा था और जब सो के उठे तो भी सड़क खाली थी. फ़र्क बस इतना था कि पूरी की पूरी सड़क गड्ढा मुक्त और काली थी. अब आपको टहलने के लिये किसी म्युनिसिपलिटी के पार्क का टिकट लेने की जरूरत नहीं. जहाँ चाहिये, जितना चाहिये फ़्री में टहलिये. हमारे देश में कुछ खानदानी लोगों का काम ही है हर काम में नुक्स निकालना. अभी मॉर्निंग वाक के लिये घर के बाहर कदम रखा ही था कि सार्वभौमिक रूप से निगेटिव शख्स सामने पड़ गये. बोले मै बता रहा हूँ - ये सड़क चले-वलेगी नहीं. ऐसे कहीं सड़क बनती है. मैंने बचपन से सड़क बनते देखा है. पहले मिट्टी फिर गिट्टी डाल के सालों छोड़ दिया जाता है ताकि सब अच्छे से सेटेल हो जाये फिर डामर-गिट्टी पड़ती है. बस बरसात आने दीजिये, नालियाँ तो बहती नहीं. पहली बारिश में पानी भरा नहीं कि सारी सड़क भरहरा जायेगी. पहले नाली बनानी चाहिये थी, फिर सड़क. ये वो सज्जन थे, जिन्होंने क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिये अपने घर के सामने का फुटपाथ घेर कर बगीचा जैसा कुछ बना रखा था. घर के अन्दर की एक-एक इन्च जमीन पक्की करके हरियाली और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पूरा फ़ुटपाथ कब्ज़ा लिया है. यहाँ तक कि उनके गेस्ट हमारे घर के सामने कार खड़ी करने को विवश हैं. मैंने थोडा प्रतिवाद करने का प्रयास किया कि अब सड़क बनाने की टेक्नॉलोजी बदल गयी है. उस पर उन्होंने अन्ध भक्तों को एक भद्दी से गाली दी और मेरी भी ढंग से लानत-मलानत भेज दी. गाँधी और बुद्ध जी किसी और देश में पैदा हुये होते तो मै भी उनको उनके हिसाब से उचित व्यवहार से नवाजता. लेकिन आज मै खुश था कि इतने वर्षों बाद चलो सड़क बन तो गयी इसलिये सिर्फ़ मुस्कुरा के रह गया. इस पर उन्हें और बुरा लग गया तो मैं भला क्या कर सकता हूँ.   

सड़क काली हुये अभी कुछ ही दिन हुये थे कि आदत से मजबूर हमारे मोहल्ले वालों ने दुखी हो कर मोहल्ला विकास समिति की एक मीटिंग आहूत कर ली. मुद्दा नयी सड़कों पर स्पीड ड्राइविंग को लेकर था. आजकल मोहल्ले में वो मोहल्ले वाला टच कहाँ रह गया. साठ को बुलाओ और सात पहुँच जायें तो बड़ी बात. शनिवार शाम 7 बजे का समय नियत किया गया ताकि किसी के पास ऑफ़िस या किसी काम का बहाना न रहे. नियत दिन और समय पर पाँच लोग पहुँचे. जो बढ़ते-बढ़ते साढ़े सात बजे तक दस तक पहुँच पाये. मीटिंग में न आने का कोई विशेष प्रयोजन रहा हो ऐसा नहीं था. दरअसल लोगों को लगता है कि मीटिंग में गये तो अगली मीटिंग उनके घर भी फ़िक्स हो सकती है. सारी कमेटी के चाय-पानी के इंतजाम के लिये पता नहीं बीवी तैयार होगी या नहीं. पहले आने वाले तीन लोगों में समिति के अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सचिव थे. भीड़ बढ़ाने की गरज से मै और एक और सज्जन पहुँच गये थे. अध्यक्ष जी ने धीर-गम्भीर आवाज़ में बोलना शुरू किया कि साथियों आप सभी को बधाई हो कि समिति के अथक प्रयासों से सड़क का जीर्णोद्धार हो गया है. पार्षद-महापौर-एमएलए-सांसद सब इसका क्रेडिट लेना चाहेंगे, तो अध्यक्ष जी क्रेडिट कैसे छोड़ दें. दिल के किसी कोने से ये आवाज़ अनायास आ गयी. उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुये कहा - लेकिन इधर बहुत लोगों ने शिकायत की है कि जब से सड़क बनी है, सड़क पर चलना दुश्वार हो गया है. लौंडे-लपाड़ी साले सत्तर के स्पीड पर मोटरसायकिल पेले पड़े हैं. कार वाले भी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ ऐसे दौड़ा रहे हैं जैसे हाइवे पर चल रहे हों. यदि ऐसा ही चलता रहा तो हम लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जायेगा. आये दिन एक्सिडेंट्स होंगे. कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया है कि हमें नगर निगम से कह कर हर मोड़ -  हर चौराहे के पहले स्पीड ब्रेकर बनवाने चाहिये. नहीं तो ये मोटरसायकिल सवार किसी दिन बुढ़ापे में हम लोगों की हड्डी-पसली बराबर कर देंगे. जिन-जिन लोगों ने मुझसे शिकायत की थी, उनमें से कोई भी आज दिखायी नहीं दे रहा है. कभी-कभी मुझे लगता है कि मुझे समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिये. सचिव और कोषाध्यक्ष जी ने उनके इस प्रस्ताव का त्वरित खंडन इसलिये किया कि ये बवाल किसी और के सर रहे तो अच्छा है. लेना एक न देना दो, जिसे देखो अध्यक्ष को परेशान किये रहता है. अध्यक्ष जी, स्ट्रीट लाईट गड़बड़ चल रही है, पावर कट बहुत हो रहा है, स्वीपर नहीं आ रहा है. मीटिंग्स में आ कर अपनी बात रखते नहीं लेकिन रास्ता चलना मुहाल किये रहते हैं. इस मीटिंग को बुलाने का मुख्य उद्देश्य स्पीड ब्रेकर का निर्माण कराना था. 

दुनिया एक कदम आगे बढ़ाना चाहती है तो जमाना उसे चार कदम पीछे लाने में लग जाता है. नयी सड़क पर फ़र्राटा दौड़ने का अभी बच्चों का शौक पूरा भी न हो पाया था कि पुरातनपंथी बड़े उस पर अंकुश लगाने के लिये खड़े हो गये. उन्हें स्पीड से नफ़रत हो सकती है लेकिन नये ज़माने के नये बच्चे, ज़माने की रफ़्तार से चलना चाहते हैं. उन्हीं के लिये तो हर कंपनी हाई स्पीड गाड़ियाँ निकाल रही है. और ज़माने की दुश्मन बुजुर्ग पीढ़ी हर उस चीज़ से इत्तेफाक़ नहीं रखती जो उसे करने को नहीं मिलीं. अभी सड़क बन के तैयार नहीं हुयी कि ऐसी समस्या आ जायेगी, कम से कम मैंने तो नहीं सोचा था. पुरानी पीढ़ी किसी भी बात पर नयी पीढ़ी को बुरा-भला कहने से नहीं चूकती. ये बात अलग है कि दुनिया उत्तरोत्तर आगे ही गयी है. मैंने अपनी बात कहने की कोशिश की कि अभी कुछ दिन बच्चों को इन सड़कों का आनन्द ले लेने दो. लेकिन यहाँ भी हर मीटिंग्स की तरह आवाज़ में दम वाले, बात में वजन वालों पर हावी हो गये. सारे लोग अध्यक्ष के साथ सुर मिलाते नज़र आये. इस देश में डेमोक्रेसी सिर्फ़ इसीलिये मज़ाक बन के रह गयी है कि संख्याबल कुछ भी सही-गलत करवा-मनवा सकता है. नक्कारखाने में तूती की आवाज़ दब के रह गयी. विधेयक पारित हो गया कि नयी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर बनना ज़रूरी है ताकि सभी लोग महफूज़ रह सकें. मन तो किया कि कह दें आप लोग गड्ढे में ही रहने के लायक हैं. लेकिन अगर सब लोग हर बात खुल के कह सके तो दिल के इलाज़ का धन्धा न बन्द हो जाये. समिति को जिंदा रखने के लिये कुछ मुद्दों को जिलाये रखना भी ज़रूरी होता है.      

उस दिन मेरा सामना हो ही गया. कॉलोनी की कुन्ज गली में साक्षात् यमराज का अवतार मेरी तरफ़ दौड़ा चला आ रहा था. वो मोटरसाइकिल पर सवार था और मोटरसायकिल की स्पीड सत्तर के तो ऊपर ही रही होगी. पीछे वाली ऊँची सीट पर एक दूसरा बच्चा वैसे ही बैठा दिख रहा था, जैसे विक्रम के कन्धे पर वेताल. हेलमेट लगाये होता तो मुझे लगता कि घर वालों ने कुछ नियम-कानून-संस्कार दिये हैं. लेकिन ये समझना कठिन नहीं था कि पिता जी द्वारा प्रदत्त वाहन के सारे फीचर्स को टेस्ट करने के लिये बच्चे टेस्ट ड्राइव पर निकले थे. उम्र ने अभी बमुश्किल अट्ठारह को छुआ हो. स्पीड इतनी थी कि ये समझना मुश्किल था कि वो मोटरसाइकिल चला रहा है या मोटरसाइकिल उसे उड़ाये लिये जा रही है. हेलमेट बिना सारे बाल बिना जैल लगाये सीधे खड़े थे और अगर आँखों पर स्टाइलिश जीरो नम्बर का चश्मा न चढ़ा होता तो आँखों का बाहर टपक पड़ने का अंदेशा था. शायद मोटरसाइकिल की मैक्सिमम स्पीड चेक की जा रही हो. मोटरसाइकिल की धक-धक इतनी तेज़ थी कि मेरा हार्ट दो-चार बीट तो मिस कर ही गया होगा. मैं सड़क छोड़ कर फुटपाथ के आखिरी सिरे पर कब पहुँच गया, पता नहीं. उनके गुजर जाने के थोड़ी देर बाद मेरी मिसिंग पल्स वापस लौटी तो बड़ी राहत महसूस हुयी. मैंने कल्पना की कि यदि इसी स्पीड पर ये बच्चा स्पीड ब्रेकर पर चढ़ जाता तो उसका प्रोजेक्टाइल कहाँ जाता. और बिना हेलमेट के उसका क्या हश्र होता. फिर एक क्षण बाद दिमाग में ये कल्पना भी आयी कि ख़ुदा-न-खास्ता इनकी चपेट में मै आ जाता तो मेरा क्या हाल होता. अस्पताल में हाथ और टांग लटकाये अपने चित्र के बारे में सोच कर आत्मा सिहर उठी. 

एक तरफ तो हम स्पीड की ओर भाग रहे हैं, दूसरी तरफ नियम-कानून का न हमें पता है और न ही हम जानना चाहते हैं. आप को पूरी आज़ादी है कि अपनी जान को आप हथेली में रखें या अपने पिछवाड़े में, जैसी आपकी इच्छा. लेकिन दूसरों की जान तो बक्श दीजिये. बढती हुयी सड़क दुर्घटनाओं के पीछे आसानी से बन सकने वाले लाइसेन्स का प्रभाव और ड्राइविंग सेन्स के नितान्त अभाव को सहज महसूस किया जा सकता है. उल्टी दिशा में चलना, ट्रिपल राइडिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट के प्रति दुराग्रह, रैश ड्राइविंग, नियमों का उल्लंघन, चलते वाहन से थूकना या कूड़ा फेंकना आदि नयी पीढ़ी को मुफ़्त में मिली घनघोर आज़ादी के लक्षण हैं. इसी कारण दिन प्रति दिन बढ़ती दुर्घटनाओं से अख़बार पटे रहते हैं. आप घर से निकले और सही सलामत वापस आ गये तो समझिये आपसे ज़्यादा खुशकिस्मत कोई नहीं है. कविवर देवी प्रसाद मिश्र ने शायद इन्हीं परिस्थितियों के लिये ये मुक्तक लिखा हो-

मै कमीज़ पहनाता हूँ,

तो जैसे कवच पहनता हूँ,

और घर से निकलता हूँ,

 तो किसी युद्ध के लिये.

दुनिया को आगे जाना है तो आगे जायेगी ही. लेकिन बिना नियम-कानून का पालन किये कहाँ पहुँचेगी, ये देखने के लिये जरुरी है कि हम सिंगल पीस में धरती पर बने रहें. सबकी जान कीमती है और सब लोगों को चाहिये कि अपनी-अपनी जान की हिफाज़त करें. जल्द ही ऐसे पोस्टर नज़र आयें कि - 'वाहन चलाने वालों से सावधान', तो आश्चर्य न कीजियेगा. वो दिन दूर नहीं जब पैदल चलने वालों के लिये भी हेलमेट कम्पलसरी करना पड़ जाये. उस दिन मुझे लगा कि मोहल्ला कमेटी की चिन्ता जायज़ थी. नयी सड़क के लिये स्पीड ब्रेकर का फंड पास करा पाना नगर निगम के लिये आसान नहीं होगा. अब तो बरसात का इन्तजार कीजिये. ताकि फिर कुछ गड्ढों का विकास हो, जो इस बेलगाम होती स्पीड पर लगाम कसने में कामयाब हों.  

-वाणभट्ट 

शनिवार, 3 जून 2023

मुस्कुराइये आप लखनऊ में हैं

उस दिन एबिडेमी का चेहरा कुछ मायूस सा लग रहा था. रात तो अच्छा भला छोड़ के गया था. उसका मूड सातवें आसमान पर था. गेस्ट हाउस की सब्जी-रोटी-दाल की जगह मुर्ग-मुसल्लम का डिनर, वो भी कॉकटेल के साथ. उसकी कई दिनों की पेंडिंग मुराद पूरी जो हो गयी थी. कुछ दिन पहले ही उसका भारत आना हुआ था. नॉलेज एक्सचेंज प्रोग्राम की तहत, नाइजेरिया से. इस एक्सचेंज प्रोग्राम के साथ-साथ उसे उम्मीद थी कि कुछ भारत देखने को भी मिलेगा. अकेले आया था. नया देश, नये लोग और नया खान-पान. उसके आने से पहले ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर ने एक नॉलिजियेबल प्रोग्राम बना दिया था. बहुत ही टाइट शेड्यूल था कि बन्दा लौटे तो ज्ञान का कोई कोना छूट न जाये. हफ़्ते भर क्लास-प्रैक्टिकल-इंडस्ट्री विज़िट और सन्डे-सन्डे उसके इंटरटेन्मेंट के नाम पर आस-पास के टूरिस्ट प्लेसेज़ का भ्रमण. ये बात अलग है कि हमारे यहाँ देशाटन से ज़्यादा तीर्थाटन की सम्भावना है. बेचारा मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च में माथा टेक-टेक के हैरान हो गया. बमुश्किल 25 साल के युवा ने ऐसी भयंकर ट्रेनिंग की कल्पना भी नहीं होगी.

उसके साथ मुझ जैसे खड़ूस आदमी को अटैच कर दिया गया. जो न खाये, ना खिलाये. जो न पिये, ना पिलाये. उस समय तक मुस्कुराने की आदत भी कम थी. हाँ, दिल का तब भी बहुत अच्छा था, जैसे कि हम सभी हिन्दुस्तानी होते हैं, दिल के अच्छे-सच्चे-साफ़. क्योंकि राज कपूर साहब बरसों पहले फ़रमा गये थे कि इस देश के लोग इसलिये सच्चे और साफ़ हैं क्योंकि सिर्फ़ इसी देश में गंगा जी बहती है. और गंगा जी हैं तो सारे पाप धोने का प्रावधान भी है. लेकिन ये बातें अगर आचार-व्यवहार और चेहरे से न झलके तो किसी को कैसे पता चले. अच्छे दिल वाली बात सिर्फ़ मुझे ही पता थी. दूसरे पता नहीं क्या सोचते हों मेरे बारे में. शायद घमण्डी-धूर्त-चालाक-मतलबी, नहीं पता. अन्फ्रेंडली टाइप के लोगों के विषय में शायद मेरे विचार भी कुछ ऐसे ही होते. एबिडेमी की ये ट्रेनिंग सरकार की ओर से प्रायोजित थी. जिसके लिये एक बजट निर्धारित  था. ये भी हो सकता है कि हमारे विश्विद्यालय ने इस ट्रेनिंग के लिये फ़ीस निर्धारण किया हो. उसमें अपने यहाँ उपलब्ध सुविधाओं के हिसाब से ट्रेनिंग ख़र्च का आँकलन लगाया गया हो. आते ही उसे आम स्टूडेंट समझ के विश्वविद्यालय के गेस्ट हॉउस में रख दिया गया. सात फुट के करीब लम्बाई वाले व्यक्ति का भारतीय एवरेज लम्बाई के बेड पर अटक पाना कठिन था. अगले ही दिन जब मैं उससे मिलने गया तो देखा गद्दा जमीन पर आ चुका था.

हफ़्ते भर तक गेस्ट हॉउस का शुद्ध शाकाहारी भोजन कर-कर के एबिडेमी की हालत बिगड़ चुकी थी. मेरा अन्फ्रेंडली, बिना मुस्कुराहट वाला चेहरा देख के उसकी कुछ कहने या डिमाण्ड करने की इच्छा भी नहीं हुयी होगी. दूसरा शनिवार आते-आते उसका सब्र टूट सा गया. उसने धीरे से कहा 'डू यू पीपल ऑलवेज़ ईट वेजेटेरियन फूड्स'. सद्भावना के तौर पर मुझे बताना पड़ा कि नहीं ऐसा नहीं है. 'वी हैव वेरी वाइड रेंज ऑफ़ नॉन-वेज डिशेज़. बट इन द गेस्ट हाउस एंड द पैकेज फ़ॉर योर ट्रेनिंग, देयर इज़ प्रोविज़न फ़ॉर वेजिटेरियन मील्स ओनली'. उसके चेहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि बहुत बड़ी गलती कर दी, यहाँ आ कर. पता नहीं कहाँ फँस गया. मेरा गुडनेस ऑफ़ हार्ट जागने लगा था. पहले थोड़ा सा मुस्कुराया, फिर खुल के मुस्कुराया. वो भी मुस्कुराने लगा. मैंने उससे कहा - भाई पहले बताना था. उसने छूटते ही कहा कि भाई तुम्हें पहले मुस्कुराना था. आइस ब्रेक होने की शुरुआत हो चली थी.

यहाँ एक से एक नॉनवेज रेस्टोरेंट्स हैं. मैं इतना कर सकता हूँ कि लंच तो नहीं पर डिनर में बाकी बचे दिनों के लिये तुम्हें लखनऊवा हॉस्पिटैलिटी का आनन्द दिलाता हूँ. वापस जा के ये मत कहना कि कोई हिन्दुस्तान मत जाना नहीं तो लौकी-तरोई-टिंडे से तुम्हारा स्वागत होगा. यहाँ के व्यंजन खा कर तुम ख़ुद बार-बार लखनऊ आना चाहोगे. फिर क्या था. रोज शाम  को पूरे के पूरे दस दिन तक लखनऊ के लज़ीज़ नॉनवेज का उसे आनन्द दिलाने में मुझे भी बहुत आनन्द आया. टुंडे कबाबी, दस्तरख़्वान, फ़लक़नुमा, करीम्स आदि का जो चस्का एबिडेमी को लगा तो वो इंडियन स्पाइसी फूड्स का दीवाना हो गया. उसके जाने में अभी चार दिन बाकी थे, जब उसने कुछ संकोच करते हुये बार के बारे में पूछा. मुझे ये तो मालूम था कि ढंग के बार-रेस्टोरेंट्स में पैग बहुत मँहगे पड़ते हैं. बाहर एक पेग की कॉस्ट में पूरा क्वार्टर आ जाता है. और ये भी पता था कि गेस्ट हॉउस की दीवारों पर लाल अक्षरों में बड़ा-बड़ा धूम्र और मदिरा पान निषेध लिखा हुआ था. ये भी अजीब विधान है कि यदि ग़लत काम छुप के किया जाये वो अपराध और खुले-आम डंके की चोट पर किया जाये तो आन्दोलन बन जाता है. अंग्रेजों की सरकार होती तो ये आन्दोलन भी मै कर गुजरता विदेशी मेहमान के लिये. लेकिन यहाँ अपने बाबा की सरकार रोकती-टोकती तो नहीं पर पकड़े जाने पर तोड़ती बहुत है. इस कर के उसकी या मेरी आन्दोलन करने कि हिम्मत नहीं हुयी. तय हुआ कि अपराध ही कर के देख लिया जाये. दिक्क़त ये थी कि दुकान से ख़रीदे कौन. पीता मै था नहीं. शहर में जानने वालों के बीच मेरी टी-टोटलर की इमेज को धक्का लगने की सम्भावना थी. यदि किसी ने देख लिया तो बची-खुची भी गयी. और ये भी पक्का था कि यदि एबिडेमी लेने गया तो दुकानदार अनाप-शनाप पैसे माँग सकता है. केयर टेकर लोग इस मामले में सहायक सिद्ध होते हैं, यदि उनका ख्याल कर लिया जाये तो. जो इन परिस्थितियों में गलत भी नहीं था. अपराध-भाव कुछ कम हो गया जब उसने बताया कि यहाँ आये नेशनल और इन्टरनेशनल अधिकांश लोगों को इस सुविधा की दरकार होती है. लोगों के घर से टूर पर निकलने का ये भी एक मुख्य कारण हुआ करता है. उनका इंतजाम उसे ही देखना पड़ता था. टुंडे के कबाब और रुमाली रोटी, और करीम के मुर्ग-मुसल्लम के साथ स्कॉच और रम की कॉकटेल ने एबिडेमी के डिनर को यादगार बना दिया. गेस्ट हॉउस अटेंडेंटस को भी उस रात अंग्रेजी से काम चलाना पड़ा.

जब एबिडेमी से पूछा कि - भाई आज क्यों बड़े मायूस से दिख रहे हो. तो उसने बताया कि सुबह जल्दी नींद खुल गयी तो मॉर्निंग वाक पर निकल गया. हर आदमी ऐसे देख रहा था, जैसे कि चिड़ियाघर से कोई जानवर निकल भागा हो. मैंने वेव किया, गुड मॉर्निंग की, स्माइल दी, लेकिन सब के सब घूरते हुये निकलते जाते थे. 

देश की इज्जत का सवाल था. मैंने समझाने का प्रयास किया - इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. तुम हो भी तो सबसे अलग. इतने लम्बे हो कि देखने वाले के सर की टोपी गिर जाये. हम लोग थोड़े रिज़र्व टाइप के लोग होते हैं. हम आर्टिफ़िशियल तरीके से मुस्कुराना नहीं जानते. हमें इस बारे में न बताया जाता है, न सिखाया. पहले तुम भी मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचते थे. एबिडेमी ने बताया कि हम लोग भी किसी अनजान को देख कर नहीं मुस्कुराते लेकिन जब आँखों से आँखें मिल ही जायें तो हेलो-हाय-गुड मॉर्निंग/इवनिंग कह के मुस्कुरा देने में कोई बुराई तो नहीं. लेकिन यहाँ लोग देख तो रहे थे पर रिस्पोंस बिल्कुल नहीं दे रहे थे. मुझे बड़ा अजीब लगा. उसे समझाने के लिये बताना पड़ा कि ये चिन्तकों-मनीषियों का देश है. यहाँ लोग देखते कहीं हैं और सोचते कुछ और हैं. लेकिन सब दिल के अच्छे हैं, बस प्रकट करना नहीं जानते. 

उसे क्या बताता कि आजकल यहाँ यही लेटेस्ट ट्रेन्ड चल रहा है. बचपन में नमस्ते करना सिखाया जाता था. लेकिन उसमें इतना आदर-भाव निहित होता था, जितने आदर के लायक हर व्यक्ति नहीं होता. शनै-शनै लोगों ने नमस्कार अपना लिया क्योंकि इसके माध्यम से आप थोडा तिरस्कार प्रदर्शित कर सकते हैं. लेकिन उसमें भी कम्पटीशन है कि पहले कौन करे. यहाँ बाद में करने वाला ख़ुद को विजेता महसूस करता है. हम मुस्कुराते ही तब हैं जब हमारा किसी से कोई काम पड़ने वाला हो. अगला भी तभी मुस्कुरायेगा जब अगले को मालूम हो कि उसे आप से भी कोई काम पड़ सकता है. यदि ये मालूम हो कि आप से कोई काम नहीं पड़ना, तो खामख्वाह मुस्कराहट क्यों वेस्ट करनी. और कभी जब काम पड़ ही गया, तब मुस्कुरा भी लिया जायेगा. मुस्कराहट की डेप्थ से आप नाप सकते हैं कि किसका किससे काम पड़ने वाला है. जिसके चेहरे पर बत्तीसी दिखाऊ टूथपेस्ट के विज्ञापन वाली स्माइल हो, उसका काम पड़ने वाला है. और फ़ीकी स्माइल वाला जानता है कि जरा सा ज़्यादा मुस्कुरा दिये तो ये अभी ही काम बता देगा. अगर कोई बिना कारण मुस्कुरा रहा है, तो समझ लो कुछ गड़बड़ है. कोई काम पड़ने वाला है. अनजान लोगों से तो कोई काम पड़ना नहीं, तो मुस्कुराना कैसा. सामने से निकलने वाले हर स्त्री-पुरुष को घूरते हुये चलना तो हमारी राष्ट्रीय बीमारी है. लेकिन क्या मजाल कि कोई मुस्कुरा दे या विश कर दे. मेरे एक पड़ोसी और उनकी पत्नी को नाती होने के उपलक्ष्य में बेटी-दामाद ने अमरीका का टिकट भिजवा दिया. न्यूक्लियर फ़ैमिली में, बच्चा जब तक सम्हल न जाये, दादी-बाबा-नानी-नाना की अहमियत बनी रहती है. उनके दो दिन वहाँ रहने के बाद ही एक शाम दामाद जी दो काले चश्मे लेकर ऑफ़िस से लौटे. बेटी ने धीरे से बताया कि जब आप लोग शोना को घुमाने ले जाते हैं तो ये चश्मे लगा के जाया कीजिये. जाने-अनजाने आप लोग जिसे देखते हैं, देखते ही रह जाते हैं. इसे यहाँ लोग बुरा समझते हैं. पड़ोसी का बच्चा हो या कुत्ता किसी को भी घूरने की जरूरत नहीं है. आप लोग इतनी जल्दी आदत तो बदल नहीं सकते इसलिये चश्मा लगा के निकला कीजिये. 

कुछ आत्मनिर्भर टाइप के लोग भी होते हैं. जो लोग चाहते हैं कि ना वो किसी से काम लें और ना किसी के काम आयें, वो अन्तर्मुखी हो जाते हैं. न किसी की ओर देखते हैं, न मुस्कुराते हैं. सम्भवतः वे ही श्रेष्ठ प्राणी हैं.

-वाणभट्ट

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

अंतिम संस्कार

वर्मा पीपल के एक पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर पहुँच के उल्टा लटक गया. कैम्पस में बहुत से पीपल के पेड़ बिना प्लानिंग के उग आये थे. चूँकि पीपल में देवी-देवताओं का वास होता है इसलिये श्रद्धा के कारण कोई उन्हें हटाने को तैयार न था. पाप का भागी कौन बने. सरकारी कैम्पस किसी की व्यक्तिगत प्रॉपर्टी तो होती नहीं. अपना घर-जमीन हो तो मट्ठा डाल-डाल के निकालें. अब आलम ये है कि-

उग रहा है दर-ओ-दीवार पर सब्जा 'ग़ालिब'

हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आयी है 

जुम्मा-जुम्मा आठ साल ही हुये थे, वर्मा को रिटायर हुये. घर-बार-परिवार आज जो कुछ भी उसके पास था, उसके पीछे एक अदद नौकरी का होना ही मुख्य कारण था. वरना दिल के अच्छे और सच्चे लोगों की दुनिया में कोई कमी है क्या. लेकिन क्या मजाल कि कोई लड़की या लड़की का बाप ऐसे इंसान को अपना पति या दामाद, क्रमशः, बनाने को तैयार हो, जिसके पास नौकरी न हो. नौकरी लगना अपने आप में एक लॉटरी है. जहाँ एक-एक, दो-दो नम्बर से सफलता चूक जाती हो, वहाँ सफलता का श्रेय अपनी कड़ी मेहनत को देना और असफलता का ठीकरा भगवान की मर्ज़ी पर फोड़ना ही नियति बन जाती है. और सबसे बड़ी बात ये थी कि माशाल्लाह वर्मा की शुद्ध सरकारी नौकरी थी. जब तक प्राइवेट में काम करता रहा, वर्मा को ख़ुद ही डाउट हुआ करता था कि शादी होगी भी या नहीं. लड़की वाले इंजीनियर समझ कर आते थे और प्राइवेट के नाम पर मुँह बिचका के चले जाते थे. बाद में कितने ही प्रपोजल सिर्फ़ इसलिये आये कि वर्मा के पीछे सरकार खड़ी थी. ये बात तब की है जब प्राइवेट कम्पनियों में पैकेज का दौर शुरू नहीं हुआ था. लड़कियाँ भी स्मार्ट से ज़्यादा लल्लू टाइप के भरोसेमन्द लड़कों को पसन्द करती थीं, जो उनके हिसाब से दिन को रात और रात को दिन बता सके. इस प्रकार उनके घर-बार की स्थापना हुयी. समय के साथ परिवार और समृद्धि में वृद्धि होनी ही थी और हुयी भी. अब उनको काफी हद तक सुखी कहा जा सकता था.  

चूँकि उनके सब कुछ का आधार नौकरी ही थी, इसलिये उन्होंने 'कर्म ही पूजा है' का स्लोगन अपने ऑफ़िस में अपनी कुर्सी के पीछे लगा रखा था. जिससे हर आने वाला उसे बिना मिस किये पढ़ सके. जिसका नज़रिया सरकारी नौकरी में भी ऐसा हो, वो व्यक्ति कितना महान होगा. वैसे वर्मा कर्मठ व्यक्ति था भी. लेकिन सिर्फ़ कर्मठ होने से काम नहीं चलता. अपने को कर्मठ सिद्ध करने के लिये, हर समय मथे रहिये कि आप कर्मठ हैं (और बाक़ी सब निकम्मे). मार्केटिंग का जमाना कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. सेल्फ़ प्रमोशन के लिये जो भी करना हो, करना चाहिये. भविष्य के इतिहास के जिस हिस्से को हम जी रहे हैं, उसे देख कर सहज आभास हो जाता है, जब महान लोग जीवित रहे होंगे, तो उन्हें लोगों की कितनी आलोचना झेलनी पड़ती होगी. और लोग अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप उन्हें कितने हल्के शब्दों से नवाज़ते रहे होंगे. वो तो तब कैमरे और न्यूज़ चैनेल्स नहीं थे, बस प्रिन्ट मीडिया हुआ करता था और पढना सब जानते नहीं थे. आज के इतने खुले वातावरण में जब मीडिया को गोदी में बैठाया जा सकता है तो तब का इतिहास भी आकाओं के हिसाब से लिखवाया गया होगा. चूँकि वर्मा को उस जमाने में काफी रगड़-घिस के नौकरी मिली थी, तो वो उसके महात्म्य को भली-भाँती समझता था. जो भी जिम्मेदारी मिलती थी, उसे यथायोग्यता अनुसार पूरी करने का प्रयास करता था. एक कहावत है 'जहाँ गधे पर नौ मन वहाँ एक मन और' भी डाल दो तो वो चीं नहीं करेगा. जिम्मेदारी निभाते-निभाते वर्मा का हाल वैसा ही हो गया था. सारे थैंकलेस टाइप के कामों के लिये वो हमेशा डिमाण्ड में रहता. ऑफ़िस के चक्कर में उसने घर को घर नहीं समझा. जाने का तो टाइम था, लौटने का कोई पुरसा हाल नहीं. ज़िन्दगी ऐसे ही चलती रही और वर्मा को कभी कोई शिकायत रही हो, ऐसा भी न था. साठ साल की उम्र में जब वो रिटायरगति को प्राप्त हुआ तो उसके बॉसों ने उस पर कशीदों की झड़ी लगा दी. उनके बिना एक निर्वात खड़ा होने वाला था. उसकी पूर्ति कैसे होगी. एक बारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि क्या वो वाकई इतना अच्छा आदमी था, जितना बताया जा रहा था.

लेकिन ये तो समय चक्र है जो नौकरी में आया है, वो साठ का होते ही जायेगा, चाहे वो कितना भी स्वस्थ और एक्टिव हो. कर्मयोगी लोग रिटायर्मेंट के बाद अक्सर इसीलिये बीमार हो जाते हैं कि पूरे दिन में इतना समय है, करें तो करें क्या. रिटायर्मेंट के एक दिन पहले तक इतने व्यस्त रहे कि पूजा-अर्चना-योग-ध्यान-शौक के लिये समय ही नहीं था. अब रोज उठते हैं तो देखते हैं पूरा दिन पहाड़ की तरह सामने खड़ा है. कितना टहलें, कितनी सब्जी लायें. बच्चे सब बंगलौर-पूना-कनाडा-अमरीका निकल लिये. जब तक बच्चों के बच्चों को बस्ते नहीं टंगे थे, दादी-बाबा को लगता था, मूल का सूद ही अब उनके जीवन का मकसद है. लेकिन बस्ता टंगते ही थ्री बीएचके फ्लैट्स में जगह की कमी हो जाना स्वाभाविक सी बात है. टिन्कू को एक अपना अलग स्पेस चाहिये और यदा-कदा आने वाले आगंतुकों के लिये गेस्ट रूम. पापा हर समय टिन्कू को टीवी में घुसाये रखते हैं और मम्मी के लाड ने तो टिन्कू को बिगाड़ रखा है. जब तक शरीर स्वस्थ था, तो वर्मा जी साल में चार बार बच्चों के यहाँ चक्कर काट आते थे. लेकिन पिछले विजिट में उन्हें ये आभास हो गया कि उनके रहने से टिन्कू की पढायी डिस्टर्ब होती है. वो अपने बनाये मकान और अपने कर्मक्षेत्र वाले शहर वापस आ गये. पुराने यार-दोस्तों के बीच कुछ समय सब ठीक चला. उसके बाद जो उन्हें हुआ उसे बीमारी नहीं कहा जा सकता. डिप्रेशन से बचने के लिये योग-प्राणायाम की जगह बच्चों के सजेशन पर डॉक्टरों की सलाह ले ली. लेकिन जैसे-जैसे दवा करते गये मर्ज बढ़ता ही गया. कुछ दिन आईसीयू में बीते.

आज वो बहुत हल्का महसूस कर रहे थे. 'गाईड' की वहीदा रहमान की तरह जीने की तमन्ना और मरने का इरादा साथ-साथ कुलाँचे मार रहा था. आईसीयू से उनके शरीर को बाहर कर दिया गया था. बच्चे आये. जल्दी में थे. तीन दिन में सभी संस्कारों को समाप्त करके सब निकल गये. पत्नी को भी साथ लेते गये कि मम्मी का मन बदल जाये. बच्चों का माता जी के प्रति प्रेम और सम्मान वर्मा को खुश कर गया. तेरह दिन तक तो आत्मा अपने घर में ही रहती है इसलिये वो वहाँ रहे.

वापस चलने ही वाले थे कि उन्हें ध्यान आया, सोने के समय को छोड़ दें तो जगते हुये समय का अधिकांश समय तो उसने ऑफ़िस में ही बिताया है. वही ऑफ़िस जिसके लिये उनका दिल-औ-जाँ समर्पित हुआ करती थी. वहाँ भी तो कोई संस्कार बाक़ी होगा. लोग बाग हैं कि बस फ़ेसबुक और वाट्सएप्प पर आरआईपी और ओम शांति से काम चलाना चाहते हैं. वो आ गये और तब से उल्टे लटके पड़े हैं, पीपल के पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर कि कन्डोलेंस हो जाये तो चलें.          

-वाणभट्ट 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

काज़ी जी क्यूँ दुबले

एक जमाना था जब काज़ी शब्द सामने आते ही किसी दुबले-पतले व्यक्ति की इमेज आँखों के सामने आ जाया करती थी. क्योंकि एक मुहावरा होता था - काज़ी जी क्यूँ दुबले, शहर के अन्देशे. उसका आशय ये हुआ करता था कि शहर भर की चिन्ता में काज़ी जी दुबले होते रहते हैं. जब से हिन्दुस्तान में ओबेसिटी और मोटापे की बात शुरू हुयी है, तब से उस तरह के दुबले-पतले आदमी की कल्पना करना भी मुश्किल हो गया है. और इंडिया वालों की एक ख़ासियत तो माननी पड़ेगी, कि क्या मजाल ये किसी भी चीज़ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें. मुग़ल आये, तो उन्हें लगा अपनी हिस्ट्री बनाने से अच्छा है, दूसरों की पढ़ लेना. और जब अंग्रेज़ आये तो उन्होंने महसूस किया कि सभ्यता कोट-पैंट-बुशर्ट में चलती है और विज्ञान तो अंग्रेज़ी में ही लिखा जाता है. ये परम्परा तब से अब तक क़ायम है. हिन्दी या संस्कृत या किसी प्रादेशिक भाषा में लिख कर आप ज्ञानी तो कहला सकते हो, विज्ञानी नहीं. जब हर आदमी गर्भवती महिला की तरह पेट फुलाये घूम रहा हो तो इसे हम अपना आलसीपन कैसे मान लें. ये जो गेहूँ हम खा रहे हैं, सारा दोष उसी का है वरना हम तो बस दो रोटी सुबह और दो रोटी शाम खाते हैं और तोंद है कि घटने का नाम नहीं लेती. दिनभर में जो समोसा-ढोखला-बर्गर-पिज्जा डकार गये, वो तो बस हल्का सा स्नैक्स है, और वो खाने की कैटेगरी में थोड़ी नहीं आता. 

बहरहाल काज़ी जी का काम चिन्ता करना ही होता था. चिन्ता तो बस करने की चीज़ होती है. अगर आप किसी दिन दोनों हाथ और पाँव लेकर जुट गये, तो बहुत सम्भव है कि चिन्ता का समाधान निकल जाये. लेकिन शरीर को कष्ट देने की अपेक्षा चिन्ता करना कहीं ज़्यादा आसान काम है. आपको लगता रहता है कि बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन करना कुछ भी नहीं है. चिन्ता करने वालों का फ़ुल टाइम काम, सिर्फ़ और सिर्फ़ चिन्ता करना है. और जब चिन्ता करने में कोई काम नहीं करना पड़ता, तो काज़ी जी दुबले कैसे होते थे, ये बात आज के लोगों की समझ से परे है. उन्हें तो माशाल्लाह हलाल के बकरे की तरह ख़ासा मोटा-ताज़ा होना चाहिये था. लेकिन चूँकि मुहावरे देश-काल के हिसाब से सटीक हुआ करते थे, इसलिये ये मानना पड़ेगा कि उन दिनों काज़ी जी शहर भर की चिन्ता किया करते थे और उसी चिन्ता को कर कर के दुबले हो जाया करते थे. ये बात किसी फ़िटनेस ट्रेनर को पता चल जाये तो इसका भी बिज़नेस शुरू हो जाये. 

एक कारण ये भी हो सकता है कि तब तक ग्रीन रिवोल्यूशन ने दस्तक न दी हो. या गेहूँ तब तक ईज़ाद न हुआ हो. तब के मोटे अनाज और आज के श्रीअन्न की कमी रही हो. न नौकरी का कॉनसेप्ट था, न ही पे कमिशन्स हुआ करते थे. तो बहुत सम्भव है, पैसा उनके पास चला जाता हो जो शरीर हिलाने में संकोच नहीं करते थे. और वही लोग खाते-पीते, हृष्ट-पुष्ट हुआ करते हों. ऐसे में अगर चिन्तक टाइप के लोग दुबले रह जायें, तो उसे उनकी अकर्मण्यता कहना सर्वथा अनुचित होगा. बुद्धिजीवी के लिये बुद्धिजीवी बने रहना ज़्यादा इम्पॉर्टेंट है. काम तो कोई भी कर सकता है, लेकिन सोचना हर किसी के बस की बात नहीं है. घण्टों एक जगह बैठना और बैठ कर सोचना, बहुत श्रमसाध्य कार्य है. आप बस पन्द्रह मिनट एक जगह बैठ के दिखा दीजिये, सोचना तो दूर की बात है. काज़ी जी इसलिये भी दुबले बने रहना चाहते थे कि उनकी भुखमरी और दरिद्रता, विद्वता की आड़ में छिप जाये और किसी को उनके माली हालातों के बारे में पता न लगे. 

लेकिन अब वो दिन लद गये हैं जब काज़ी जी दुबले-पतले हुआ करते थे. देश भले ही डेवलपिंग का डेवलपिंग रह गया लेकिन हर कोई व्यक्तिगत रूप से डेवेलप कर गया. जिनके परदादा सायकिल के लिये तरसते थे, उनका परपोता अपने एलआईजी मकान में बोलेरो के लिये गेट लगवाता है. यही तरक्क़ी है. कहाँ खाने के लाले थे, अब गली-गली खोमचे-खानों-व्यंजनों-पकवानों की दुकानें हैं.  ग्रीन रिवोल्यूशन ने आदमी को भुखमरी से सिर्फ़ निजात ही नहीं दिलायी बल्कि खाद्यान्न इतनी प्रचुरता में उपलब्ध करा दिया कि काज़ी जी को बिना खाये सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. वो सोच-सोच के खाने के बजाय खा-खा के सोच रहे हैं. रेडी-टू-ईट खानों की उपलब्धता के कारण, जो थोड़ी बहुत मेहनत करनी भी पड़ती थी, वो भी करने की ज़रूरत खत्म. पहले जब भूख लगती थी तो चौके तक जा कर कुछ बनाना पड़ता था. अब तो जंक फूड की बाढ़ आ रखी है. ऐसे में काज़ी जी को कम से कम खाने-पीने की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती है. 

हर तरफ़ बेडौल से डोलते लोगों को देख कर आप सोच सकते हैं कि अब काज़ियों की प्रजाति लुप्तप्राय हो गयी है. लेकिन ये एक्सटिंक्ट हो जाने वाले जीव नहीं हैं. ये खाना मिले तो खा लेंगे और नहीं मिले तो कॉकरोच की तरह हाइबरनेशन में चले जायेंगे, लेकिन सोचना नहीं छोड़ सकते. आज के हालात ये हैं कि कोई भूखा मरना भी चाहे तो सरकार मरने नहीं देगी, कम से कम भूख की वजह से तो बिल्कुल नहीं. मुफ़्त राशन वितरण एक ऐसी ही योजना है, जिसमें लोग राशन ले कर मार्केट में बेच भी सकते हैं. पुरानी फ़िल्म का एक डायलॉग याद आ रहा है, जिसमें विलेन कहता है कि - मैं तुम्हें ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिलेगा. उस पर अपने धरम पा जी का रिप्लाई था - कुत्ते, मैं तुझे पानी पिला पिला के मारूँगा. अगर मेडिकल साइंस का लेटेस्ट इतिहास लिखा जाये, तो पता चलेगा कि वाकई लोग भूख से कम मगर खा-खा के ज़्यादा मर रहे हैं. क्या खायें या क्या न खायें बताने से अच्छा है, मँहगी-मँहगी दवाई ही खिलायें. पूरा का पूरा चिकित्सा उद्योग इसी सिद्धांत पर चल रहा है. समीकरण सीधा है, लोग हैं तो खायेंगे. भोजन उपलब्ध हो तो हर समय खायेंगे. सुबह उठने से रात के सोने तक खायेंगे. वो तो अच्छा है कि बीच में नींद आ जाती है, वरना मुँह और पेट के थोड़े आराम की किसे चिन्ता है. गलती से रात में नींद खुल गयी तो कभी-कभी ये समझ नहीं आता कि तीन बजे रात को खायें तो खायें क्या. कृषि क्षेत्र में इतनी क्रांतियाँ आ चुकी हैं कि भोजन प्रचुरता में उपलब्ध है. उस पर तुर्रा ये है कि न आपको बनाना है, न पकाना. बस पैकेट खोलो और शुरू हो जाओ. इन परिस्थितियों में आप दुबले-पतले काज़ी की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं.

काज़ी हैं तो एक जगह बैठ के ही सोचेंगे. सोचेंगे तो दिमाग़ पर लोड पड़ेगा. दिमाग़ दौड़ेगा तो थकेगा भी और उसे भूख भी लगेगी. भूख लगेगी तो कहीं भी उठ के जाने की ज़रूरत भी नहीं है. बगल में चिप्स-कुरकुरे-टकाटक-मंच-न्यूट्रीबार-शेक-जूस का अम्बार लगा है. बस हाथ बढ़ाने की देरी है. और उसके बाद यदि बीच में लंच-डिनर का टाइम आ जाये तो थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, बस दरवाज़े तक जाने में. स्विग्गी-ज़ोमैटो हैं न. ट्रेडिशनल खाने में मुँह की बेवजह कसरत हो जाती है और चिन्तन से ध्यान भटकने की गुंजाइश रहती है. इस दृष्टि से पिज़्ज़ा-बर्गर-मोमोज़-फ्रेंच फ्राइज़ आपको कम डिस्ट्रैक्ट करते हैं. आपने खाया भी लेकिन नहीं खाने वाली फ़ीलिंग उसी तरह बनी रहती है जैसे व्रत में सिंघाड़े के आटे का हलुआ और साबूदाने-मखाने की खीर और कुट्टू के आटे की पूड़ी खाने के बाद भी व्यक्ति कह सकता है कि वो उपवास कर रहा है.

इसलिये आपको जो आस-पास डायनासॉर के भतीजे सरीखे घूमते हुये लोग दिख रहे हैं, दरअसल ये नये जमाने के काज़ी हैं. वाणभट्ट कोई इनसे अलग नहीं है. लेकिन क्लेम हमारा ब्लेम तुम्हारा टाइप के हर उस आदमी के बुद्धिजीवी होने पर लानत है, जो ब्लेम अपने सर ले ले. जब श्रीअन्न खाते थे, अच्छा सोचते थे, और अच्छा सोचते थे तो स्वस्थ भी रहते थे. ये गेहूँ न होता तो हम बस भूखे ही तो रहते. मौके, दस्तूर और नज़ाकत का फ़ायदा उठा कर इन काज़ियों ने सारी तोहमत लाद दी, गेहूँ पर, इसी के कारण तो व्हीट बेली होती है. ये गेहूँ ही हमारे उभरते या उभर चुके तोंद का मुख्य अपराधी है. इस परिपेक्ष्य में पुराने मुहावरे को रिवाइज़ करने की आवश्यकता है - काज़ी जी क्यूँ मोटे, शहर के अन्देशे.

-वाणभट्ट

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

कद्दू में तीर


बात उन दिनों की है जब मुझे नया-नया आत्म ज्ञान मिला कि अन्य नौकरियों की तरह शोध और शिक्षा अब शौक़ या हॉबी न रह कर नौकरी बन चुके हैं. जैसे की बहुत से ज्ञानीजन बता चुके हैं कि इन्टर के बाद सबसे इन्टेलीजेन्ट लोग इंजीनियरी या डॉक्टरी में प्रवेश ले लेते हैं. उसके बाद वाले आईएएस या एमबीए में सेलेक्ट हो जाते हैं. जिनके पास सामाजिक गतिविधियों के कारण पढने-लिखने का समय कम होता है, वो नेता बन सकते हैं और उनके नीचे आइएएस और इंजीनियर काम करते हैं. बीटेक या ग्रेजुएशन करते करते छात्र अक्सर इतना पक जाते हैं कि एक अदद नौकरी की तलाश शुरू कर देता है. खुद्दार टाइप के बच्चे ट्यूशन और छोटी-मोटी नौकरी करके अपनी पढायी जारी रखने का प्रयास करते हैं, ताकि पिता जी के बोझ को कुछ कम किया जा सके. वहीं कुछ बाप ऐसे भी होते हैं, जो बच्चों में ये विश्वास भरते हैं कि बेटा लौटना तो अशोक की लाट वाली नौकरी ले कर वर्ना घर में इतना पुदीना सूख रहा है कि तेरी सात पुश्तों को भी नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ने वाली. शायद ही किसी बाप ने सपने में भी बेटे को वैज्ञानिक बनाने का सपना पाला हो. और शायद ही कोई बेटा भी ऐसा हुआ हो जिसने वैज्ञानिक बनने की इच्छा दिखायी हो. जिन्हें ऐसा स्वप्न आया भी होगा तो उन्हें नासा और इसरो से कम का तो नहीं ही आया होगा. 

अक्सर एक अदद सरकारी नौकरी के प्रति अदम्य इच्छा शक्ति ही उच्च से उच्चतर शिक्षा कम्प्लीट कर लेने के लिये प्रेरित करती रहती है. जब तक नौकरी न मिल जाये, उच्च शिक्षा ज़माने में सर छुपाने का सबसे कारगर हथियार है. ग्रेजुएशन करके कोई गलती से गाँव-घर पहुँच गया तो सभी इष्ट-मित्र-ख़ैरख्वाह पूछ-पूछ के जीना हराम कर देते हैं कि बेटा आगे क्या करने का इरादा है. सो घर पर रह कर कॉम्पटीशन्स की तैयारी करना एक कठिन काम है. शहर में या घर से दूर रहिये तो बाप को भी बता सकते हैं कि बस दो नम्बर से मेन्स चूक गया. पिता जी को भी फ़ख्र करने का मौका मिल जाता है कि बेटा सिविल की तैयारी में जुटा है. कला संकाय वालों के पास तो बहुत ऑप्शन हैं. बीए, एमए करने के बाद एलएलबी-एलएलएम करने की गुंजाईश बची रहती है. लेकिन विज्ञान संकाय वाले बच्चों के पास पीएचडी का ही स्कोप बचता है. ऐसा नहीं कि उन्हें एलएलबी करने की मनाही है. लेकिन टू द पॉइन्ट और पूर्णतः सही या गलत उत्तर देने वाले बच्चों के लिये बेवजह भाँजना थोड़ा कठिन तो है. जबकि वहाँ का सिद्धांत है कि कॉपी पर लिखोगे नहीं तो एग्ज़ामिनर नम्बर कैसे देगा. इसलिये लिख के ज़रूर आना. खेत पूछे तो खलिहान लिखना लेकिन कागज़ कोरे मत छोड़ना. बी और सी कॉपी ले लोगे तो अच्छे मार्क्स भी मिल सकते हैं. बहुत से लोग कॉम्प्टिशन्स की तैयारी में पीएचडी तक कर डालते हैं. शोध शुरू करने से पहले ये भी शोध किया जाता है कि किस विश्वविद्यालय का कौन सा एडवाइजर टाइम से डिग्री दिलवा सकता है और कौन शोध में इतना डूब जाता है कि उसे आपकी डिग्री की चिन्ता ही नहीं रहती. वैसे भी डिग्री जब आपकी है तो किसी और को भला क्यों चिन्ता होने लगी.

और अब जब शोध नौकरी बन गया है तो आइन्स्टाइन-एडिसन-न्यूटन की तरह मनमर्जी से शोध नहीं कर सकते. ऑफिस टाइम में अगर आप पेंड के नीचे झपकी ले रहे हो तो कोई भी आपकी फोटो निकाल के बॉस को प्रेषित कर सकता है. और गलती से सेब आपके ऊपर गिर भी जाता तो आप हडबडा कर ऑफिस की ओर भागेंगे या ये सोचेंगे कि सेब क्यों गिरा. शुक्र मनाते कि सेब न गिरता तो पता ही न चलता कि शाम होने को आयी. नौकरी के अपने नियम हैं. यहाँ ना-करी नहीं कर सकते. बॉस इज़ ऑलवेज राईट का सिद्धांत भी चलता है. अन्य नौकरी की तरह यहाँ भी तेल-मालिश और बटर-पॉलिश प्रमोशन के अमोघ अस्त्र हैं. जब पहली बार प्राइवेट नौकरी ज्वाइन की तो फैक्टरी मैनेजर ने वेलकम करने के लिये कमरे में बुलाया और डूज़ और डोंट्स की एक लिस्ट पकड़ा दी. काम वेल डिफाइंड था. जब शोध संस्थान पहुँचा तो बॉस ने वेलकम करते हुये कहा कि वर्मा तुम क्या करना चाहते हो. मेरे अंडर में काम करने वालों को काम करने की पूरी छूट है. जो चाहे करो मेरा पूरा सपोर्ट रहेगा. तब से हर हफ्ते में एक-दो प्रोजेक्ट बना कर बॉस से मिलता. और बॉस के पास कई तर्क होते - इस काम के लिये यहाँ सुविधा नहीं है, ये काम बहुत ही कठिन है, अभी तुम कर नहीं पाओगे और सबसे अच्छा तर्क था कि यदि ये हो सकता होता तो अमरीका-जापान वाले कर चुके होते. बॉस चूँकि सदैव सही होते हैं इसलिये मै फिर अगले हफ्ते मिलने का वादा लेकर विदा हो लेता. और अगले मिलन में मेरे दिल में उठ रहे यूरेका वाले भाव की अच्छी तरह से बत्ती बनायी जाती और डस्टबिन के हवाले कर दी जाती. अगली बार जब मै गया तो उनके चेहरे पर कुछ निश्चयात्मक भाव पहले से व्याप्त था. उन्होंने मेरे माइक्रोवेव ड्राइंग के प्रोजेक्ट को पूरे गौर से सुना. लेकिन उस पर कोई कमेन्ट नहीं किया. बल्कि राय दी कि यदि मै आटा चक्की पर काम करूँ तो कैसा रहेगा. मै हतप्रभ सा अपलक नेत्रों से उनके मुखारबिन्दु की ओर देखता रह गया. बाद में पता चला कि उन्होंने उसे घूरने की संज्ञा दे दी. बहरहाल वो मेरे लिये पहली सीख थी कि सजेशन्स नीचे से ऊपर नहीं जाते, ऊपर से जो इंस्ट्रकशंस आयेंगे उन्हीं को फ़ॉलो करना है. सही भी है. बॉस कौन है, ये हमेशा याद रखना चाहिये. बॉस वहाँ तक देख सकता है, जहाँ तक हम सोच भी नहीं सकते.      

अब चूँकि ये नौकरी है इसमें प्रमोशन के लिये कुछ शर्तें भी ज़रूर होंगी. उसमें से एक शर्त थी कि काम चाहे आप कुछ भी कर लीजिये, प्रमोशन के लिये एक पीएचडी की डिग्री होनी ही चाहिये. दिल का तो काम ही है कि रोज कोई ख्वाहिश, कोई तमन्ना पैदा की जाये. तब तक बीवी-बच्चों की ओर से कुछ-कुछ निपट चुके थे, तो सोचा कैरियर की ओर भी ध्यान दे लिया जाये. पीएचडी करने से पहले वाली खोज शुरू की गयी कि किस विश्वविद्यालय में किस प्रोफेसर के अन्तर्गत शोध किया जाये ताकि तीन साल की डिग्री तीन साल में ही मिल जाये. अब मै इन सर्विस कैंडिडेट था इसलिये स्टडी लीव में ही काम खत्म करना आवश्यक था. जब रैगिंग का दौर चला करता था, सीनियर्स और जूनियर्स के रिश्ते बने रहते थे. अमुक युनिवर्सिटी में अमुक प्रोफ़ेसर बहुत ही सीधे और सहज स्वभाव के हैं. तीन साल में यदि लड़का डिग्री नहीं भी करना चाहे तो वो धक्का लगा कर बाहर करवा ही देते हैं ताकि उनका रिकॉर्ड खराब न हो. वो ईमेल और डब्ल्यु डबल्यु डब्ल्यु डॉट इन वाला ज़माना तो था नहीं कि मुलाकात फिक्स करके निकलते. अगले ही मौके पर मै उनके सामने प्रस्तुत था.

गुरु जी में गुरु के सारे लक्षण थे. चेहरे पर अन्तस का तेज दैदीप्यमान था. इतनी सहृदयता से मिले कि मेरी अन्तरात्मा कहने लगी गर फ़िरदौस डिग्री करनी है तो बस यहीं अस्तो, यहीं अस्तो, यहीं अस्तो. मै अपने ढेर सारे प्रोजेक्ट प्लान्स ले कर इस उम्मीद में गया था कि किसी न किसी पर तो प्रोफ़ेसर साहब मान ही जायेंगे. उन्होंने ने भी उतने ही गौर से सुना जितनी उत्सुकता से मै बता रहा था. सारी बातें सुनने कर बाद उन्होंने गुरु-गंभीर आवाज़ में बोलना शुरू किया. देखो बेटा तुम लोग यंग हो, अभी बहुत कुछ करना चाहते हो लेकिन समय सीमित है. तुम्हारी तो नौकरी ही शोध की है, और काम करने के लिये पूरी ज़िन्दगी पड़ी है. मेरा कन्सर्न ये है कि तुम तीन साल में डिग्री लो और यहाँ से चले जाओ. तुम्हारे सारे के सारे काम अप्प्लाइड और सोल्यूशन ओरियेंटेड हैं. मै हमेशा पाथब्रेकिंग काम करता हूँ. एकदम नया एरिया खोजता हूँ और उस पर काम शुरू कर देता हूँ. जब तक दूसरों का ध्यान उधर जाता है और वो उस एरिया में काम शुरू कर दें, उससे पहले मै नया पाथ ब्रेक करने में लग जाता हूँ. मान लो तुमने कोई मशीन बनाने का प्रयास किया तो दो बातें होंगी. या तो मशीन चलेगी, या नहीं चलेगी. चल गयी तो ठीक, लेकिन नहीं चली तो तुम्हारी डिग्री लटक जायेगी. थोडा आध्यात्मिक होते हुये उन्होंने बोलना जारी रखा. शोध आत्मा-परमात्मा की तरह होना चाहिये. या तो आत्मा को पता हो कि उसने क्या किया या परमात्मा को. अप्प्लाईड काम चाहे कितना भी उपयोगी हो, हाई रेटिंग के जर्नल्स में छापना मुश्किल हो जाता है. जब कि अबूझ शोधपत्र बहुत ही अच्छी रेटिंग पाते हैं. ऐसे शोध से सदैव बचना चाहिये जिसका जवाब आपसे हाँ या ना में माँगा जाये. जवाब के बदले में  आप और दस सवाल पैदा कर दें. फ्यूचर रिसर्च के क्षेत्र आइडेंटिफाई करना भी शोध का एक प्रमुख लक्ष्य होता है. समस्या ऐसी होनी चाहिये, जिस पर सारी दुनिया काम कर रही हो, पर कर कोई कुछ भी न पा रहा हो. समाधान के चक्कर में कभी पड़ना ही नहीं चाहिये. समस्या खत्म हो गयी तो तुम करोगे क्या. इतिहास साक्षी है कि समस्यायें वहीं की वहीं हैं, कितने ही शोधकर्ता आये और आ कर चले गये. हाँ ये बात अलग है कि अब समाधान खोजने के लिये शोध पर खर्च बढ़ते जा रहे हैं. क्योंकि उच्च रेटिंग के जर्नल में छापने के लिये काम उन्नत तकनीकों और यन्त्रों द्वारा करना पड़ता है, इसलिये शोध का ख़र्च बढ़ना लाज़मी है. समाधान न उनको मिलना है, न तुमको मिलेगा. सब कद्दू में तीर मार रहे हैं, तुम भी मारो. न उनका तीर लगेगा, न तुम्हारा. अलबत्ता तुम्हारी पीएचडी समय पर ज़रूर हो जायेगी. भाव विह्वल हो कर मैंने उनके चरणों की ओर हाथ बढ़ाना चाहा लेकिन उन्होंने मुझे गले से लगा लिया. 

कृष्ण ने जैसे महाभारत काल में अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी थी, वैसे ही मेरे ज्ञान चक्षु खुलते जा रहे थे. हर कोई हाथ में धनुष लिये कद्दू पर निशाना साधता हुआ दिखायी दे रहा था.

-वाणभट्ट 

जेन-ज़ी

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