मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

काजी जी क्यूँ दुबले

एक जमाना था जब काजी शब्द सामने आते ही किसी दुबले-पतले व्यक्ति की इमेज आँखों के सामने आ जाया करती थी. क्योंकि एक मुहावरा होता था - काजी जी क्यूँ दुबले, शहर के अन्देशे. उसका आशय ये हुआ करता था कि शहर भर की चिन्ता में काजी जी दुबले होते रहते हैं. जब से हिन्दुस्तान में ओबेसिटी और मोटापे की बात शुरू हुयी है, तब से उस तरह के दुबले-पतले आदमी की कल्पना करना भी मुश्किल हो गया है. और इंडिया वालों की एक ख़ासियत तो माननी पड़ेगी, कि क्या मजाल ये किसी भी चीज़ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें. मुग़ल आये तो उन्हें लगा अपनी हिस्ट्री बनाने से अच्छा है दूसरों की पढ़ लेना. और जब अंग्रेज़ आये तो उन्होंने महसूस किया कि सभ्यता कोट-पैंट-बुशर्ट में चलती है और विज्ञान तो अंग्रेज़ी में ही लिखा जाता है. ये परम्परा तब से अब तक कायम है. हिन्दी या संस्कृत या किसी प्रादेशिक भाषा में लिख कर आप ज्ञानी तो कहला सकते हो, विज्ञानी नहीं. जब हर आदमी गर्भवती महिला की तरह पेट फुलाये घूम रहा हो तो इसे हम अपना आलसीपन कैसे मान लें. ये जो गेहूँ हम खा रहे हैं, सारा दोष उसी का है वरना हम तो बस दो रोटी सुबह और दो रोटी शाम खाते हैं और तोंद है कि घटने का नाम नहीं लेती. दिनभर में जो समोसा-ढोखला-बर्गर-पिज्जा डकार गये, वो तो बस हल्का सा स्नैक्स है, और वो खाने की कैटेगरी में थोड़ी नहीं आता. 

बहरहाल काजी जी का काम चिन्ता करना ही होता था. चिन्ता तो बस करने की चीज़ होती है. अगर आप किसी दिन दोनों हाथ और पाँव लेकर जुट गये, तो बहुत सम्भव है कि चिन्ता का समाधान निकल जाये. लेकिन शरीर को कष्ट देने की अपेक्षा चिन्ता करना कहीं ज़्यादा आसान काम है. आपको लगता रहता है कि बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन करना कुछ भी नहीं है. चिन्ता करने वालों का फुल टाइम काम, सिर्फ़ और सिर्फ़ चिन्ता करना है. और जब चिन्ता करने में कोई काम नहीं करना पड़ता, तो काजी जी दुबले कैसे होते थे, ये बात समझ से परे है. उन्हें तो माशाल्लाह हलाल के बकरे की तरह ख़ासा मोटा-ताज़ा होना चाहिये था. लेकिन चूँकि मुहावरे देश-काल के हिसाब से सटीक हुआ करते थे, इसलिये ये मानना पड़ेगा कि काजी जी शहर भर की चिन्ता किया करते थे और दुबले भी हुआ करते थे. 

एक कारण ये भी हो सकता है कि तब तक ग्रीन रिवोल्यूशन ने दस्तक न दी हो. या गेहूँ तब तक ईज़ाद न हुआ हो. तब के मोटे अनाज और आज के श्रीअन्न की कमी रही हो. न नौकरी का कॉनसेप्ट था, न ही पे कमिशन्स हुआ करते थे. तो बहुत सम्भव है, पैसा उनके पास चला जाता हो जो शरीर हिलाने में संकोच नहीं करते थे. और वही लोग खाते-पीते, हृष्ट-पुष्ट हुआ करते हों. ऐसे में अगर चिन्तक टाइप के लोग दुबले रह जायें, तो उसे उनकी अकर्मण्यता कहना सर्वथा अनुचित होगा. बुद्धिजीवी के लिये बुद्धिजीवी बने रहना ज़्यादा इम्पॉर्टेंट है. काम तो कोई भी कर सकता है, लेकिन सोचना हर किसी के बस की बात नहीं है. घण्टों एक जगह बैठना और बैठ कर सोचना बहुत श्रमसाध्य कार्य है. आप बस पन्द्रह मिनट एक जगह बैठ के दिखा दीजिये, सोचना तो दूर की बात है. काजी जी इसलिये भी दुबले बने रहना चाहते थे कि उनकी भुखमरी और दरिद्रता, विद्वता की आड़ में छिप जाये और किसी को उनके माली हालातों के बारे में पता न लगे. 

लेकिन अब वो दिन लद गये हैं जब काजी जी दुबले-पतले हुआ करते थे. देश भले ही डेवलपिंग का डेवलपिंग रह गया लेकिन हर कोई व्यक्तिगत रूप से डेवेलप कर गया. जिनके परदादा सायकिल के लिये तरसते थे उनका परपोता अपने एलआईजी मकान में बोलेरो के लिये गेट लगवाता है. यही तरक्क़ी है. कहाँ खाने के लाले थे, अब गली-गली खोमचे-खानों-व्यंजनों-पकवानों की दुकानें हैं.  ग्रीन रिवोल्यूशन ने आदमी को भुखमरी से सिर्फ़ निजात ही नहीं दिलायी बल्कि खाद्यान्न इतनी प्रचुरता में उपलब्ध करा दिया कि काजी जी को बिना खाये सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. वो सोच-सोच के खाने के बजाय खा-खा के सोच रहे हैं. रेडी-टू-ईट खानों की उपलब्धता के कारण, जो थोड़ी बहुत मेहनत करनी भी पड़ती थी, वो भी करने की ज़रूरत खत्म. पहले जब भूख लगती थी तो चौके तक जा कर कुछ बनाना पड़ता था. अब तो जंक फूड की बाढ़ आ रखी है. ऐसे में काजी जी को कम से कम खाने-पीने की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है. 

हर तरफ़ बेडौल से डोलते लोगों को देख कर आप सोच सकते हैं कि अब काजियों की प्रजाति लुप्तप्राय हो गयी है. लेकिन ये एक्सटिंक्ट हो जाने वाले जीव नहीं हैं. ये खाना मिले तो खा लेंगे और नहीं मिले तो कॉकरोच की तरह हाइबरनेशन में चले जायेंगे, लेकिन सोचना नहीं छोड़ सकते. आज के हालात ये हैं कि कोई भूखा मरना भी चाहे तो सरकार मरने नहीं देगी, कम से कम भूख की वजह से तो बिल्कुल नहीं. मुफ़्त राशन वितरण एक ऐसी ही योजना है, जिसमें लोग राशन ले कर मार्केट में बेच भी सकते हैं. पुरानी फ़िल्म का एक डायलॉग याद आ रहा है, जिसमें विलेन कहता है कि - मैं तुम्हें ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिलेगा. उस पर अपने धरम पा जी का रिप्लाई था - कुत्ते, मैं तुझे पानी पिला पिला के मारूँगा. अगर मेडिकल साइंस का लेटेस्ट इतिहास लिखा जाये, तो पता चलेगा कि वाकई लोग भूख से कम मगर खा-खा के ज़्यादा मर रहे हैं. क्या खायें या क्या न खायें बताने से अच्छा है, मँहगी-मँहगी दवाई ही खिलायें. पूरा का पूरा चिकित्सा उद्योग इसी सिद्धांत पर चल रहा है. समीकरण सीधा है, लोग हैं तो खायेंगे. भोजन उपलब्ध हो तो हर समय खायेंगे. सुबह उठने से रात के सोने तक खायेंगे. वो तो अच्छा है कि बीच में नींद आ जाती है, वरना मुँह और पेट के थोड़े आराम की किसे चिन्ता है. गलती से रात में नींद खुल गयी तो कभी-कभी ये समझ नहीं आता कि तीन बजे रात को खायें तो खायें क्या. कृषि क्षेत्र में इतनी क्रांतियाँ आ चुकी हैं कि भोजन प्रचुरता में उपलब्ध है. उस पर तुर्रा ये है कि न आपको बनाना है, न पकाना. बस पैकेट खोलो और शुरू हो जाओ. इन परिस्थितियों में आप दुबले-पतले काजी की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं.

काजी हैं तो एक जगह बैठ के ही सोचेंगे. सोचेंगे तो दिमाग़ पर लोड पड़ेगा. दिमाग़ दौड़ेगा तो थकेगा भी और उसे भूख भी लगेगी. भूख लगेगी तो कहीं भी उठ के जाने की ज़रूरत भी नहीं है. बगल में चिप्स-कुरकुरे-टकाटक-मंच-न्यूट्रीबार-शेक-जूस का अम्बार लगा है. बस हाथ बढ़ाने की देरी है. और उसके बाद यदि बीच में लंच-डिनर का टाइम आ जाये तो थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, बस दरवाज़े तक जाने में. स्विग्गी-ज़ोमैटो हैं न. ट्रेडिशनल खाने में मुँह की बेवजह कसरत हो जाती है और चिन्तन से ध्यान भटकने की गुंजाइश रहती है. इस दृष्टि से पिज़्ज़ा-बर्गर-मोमोज़-फ्रेंच फ्राइज़ आपको कम डिस्ट्रैक्ट करते हैं. आपने खाया भी लेकिन नहीं खाने वाली फ़ीलिंग उसी तरह बनी रहती है जैसे व्रत में सिंघाड़े के आटे का हलुआ और साबूदाने-मखाने की खीर और कुट्टू के आटे की पूड़ी खाने के बाद भी व्यक्ति कह सकता है कि वो उपवास कर रहा है.

इसलिये आपको जो आस-पास डायनासॉर के भतीजे सरीखे घूमते हुये लोग दिख रहे हैं, दरअसल ये नये जमाने के काजी हैं. वाणभट्ट कोई इनसे अलग नहीं है. लेकिन क्लेम हमारा ब्लेम तुम्हारा टाइप के हर उस आदमी के बुद्धिजीवी होने पर लानत है जो ब्लेम अपने सर ले ले. जब श्रीअन्न खाते थे, अच्छा सोचते थे, और अच्छा सोचते थे तो स्वस्थ भी रहते थे. ये गेहूँ न होता तो हम बस भूखे ही तो रहते. मौके, दस्तूर और नज़ाकत का फ़ायदा उठा कर इन काजियों ने सारी तोहमत लाद दी, गेहूँ पर, इसी के कारण तो व्हीट बेली होती है. ये गेहूँ ही हमारे उभरते या उभर चुके तोंद का मुख्य अपराधी है. इस परिपेक्ष्य में पुराने मुहावरे को रिवाइज़ करने की आवश्यकता है - काजी जी क्यूँ मोटे, शहर के अन्देशे.

-वाणभट्ट

3 टिप्‍पणियां:

  1. काजी जी के मुहावरे का नया वर्जन और लेख शानदार व्यंग्य है।खानपान की बिगड़ी आदतों से ही मोटापा निमंत्रित हम ही करते है।उपवास के नाम पर बहुत सारा तला भुना मीठा खाकर मोटापा बढ़ाते है।हमेशा की तरह शानदार लेख, आत्मावलोकन को विवश करता है।🙏🙏👌👌

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