बुधवार, 19 दिसंबर 2012

प्रार्थना के शिल्प में !


प्रार्थना के शिल्प में !

(देवी प्रसाद मिश्र की रचना 'प्रार्थना के शिल्प में नहीं' से प्रेरित ...)

क्षमा
हे अग्नि !
हे वायु !
हे जल !
हे आकाश !
हे धरा !

निवेदन है
कि
आप कहीं दूर एकांत में जा
अपने कान भींच लें
आँखें मींच लें
कि
साक्षी के सम्मुख
असत कहने का साहस
नहीं है मुझमें
कि
विजय सदा सत्य की होती है.

- वाणभट्ट

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

अयोध्या


प्रिय मित्रों, एक पुरानी रचना साझा कर रहा हूँ...

अयोध्या

अयोध्या पर लिखना ज़रूरी हो जाता है.
जब देश का ये कोना मज़हब हो जाता है.

किसी ने पूछा,
प्रयाग में माघ मेला कब से लगता है
इलाहाबाद बनने के पहले या बाद में
जवाब तो नहीं, पर एक जिद ज़रूर है.
इतिहास के पहले शायद कुछ भी नहीं था.

माघ का मेला सदियों से लगता है,
जब आस्था का समुंदर हिलोरें लेता है,
संगम पर ये विहंगम दृश्य हर साल सजता है.

शायद मानव अस्तित्व के पहले से,
भाषा के भी पहले से, कुछ तो रहा होगा,
जिसने प्रयाग को प्रयाग और कोणार्क को कोणार्क बनाया होगा.

लेकिन अब समय पीछे जाने का नहीं है
ये विद्वानों का मत है.
इन्टरनेट और फेसबुक कि दुनिया में,
अमेरिका बन जाना इनके लिए
अंतिम वक्तव्य है

जडें तो अपनी हैं,
कहाँ तक काटियेगा
कब तक  झूठलाइयेगा इस बात को
कि
तमाम परतों के नीचे एक ही है यहाँ,
आदमी का वजूद.
ज़मीन के इस घेरे के अन्दर.

मज़हब को मानिये ज़रूर,
पर खुद को भी तो पहचानिए हुज़ूर.

- वाणभट्ट

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

देशभक्ति

देशभक्ति की ऐसी मिसालें अपने इतिहास में मिलतीं हैं कि हम खुद को महान समझने से रोक नहीं पाते। भाव कुछ ऐसा की हमारे बाप-दादा ने घी खाया था, हमारा हाँथ सूँघो। अपने अगल-बगल का हाल ये है कि देशभक्त और देशभक्ति की बात परिहास का विषय बन गया है। और कुछ इच्छाधारी लोग जब चाहें इसे अपने शरीर  पर ओढ़ लें और जब चाहे आत्मा में घुसेड़ लें। ये नेता टाइप के जीव होते हैं और जो देश को हर वक्त ये एहसास दिलाते की वो न होते तो देश पता नहीं किस गर्त में डूब गया होता। साठ सालों में अन्य देश कहाँ से कहाँ पहुँच गए और हम घोटालों की परतें खोलने में लगे हैं। भला हो प्रिंट और चित्र मीडिया का, इसने इस देश में भगवान का काम किया है। यानि ये मीडिया ही है जो सर्वत्र विद्यमान है, सब कुछ देख-सुन रहा है। कुछ भी देख सकता है, सुन सकता है।

गीता प्रेस की चोखी कहानियों में एक कहानी पढ़ी थी, कि भगवान सब जगह है, सब कुछ देख रहा है। ऐसा एक पिता ने अपने बालक को बताया। कभी ऐसी स्थिति आयी कि घर में फ़ाँके की नौबत आ गयी। पिता पड़ोस के खेत में घुस कर कुछ अन्न का जुगाड़ करने लगा। अपने बच्चे को बाहर खड़ा कर दिया कि कोई देखे तो बता देना। थोड़ी देर बाद उसने पूछा बेटा कोई देख तो नहीं रहा है। बच्चे के जवाब से हम सब वाकिफ़ हैं। पिता ने चोरी करने का इरादा छोड़ दिया। बच्चे ने उसकी आँखे खोल दीं। सिर्फ महान बातें करने से कोई महान नहीं हो जाता। और किसी देश को महान बनाने के लिये उसके लोगों में आचरण और चरित्र की अहम् भूमिका है।


कुछ दिन पहले एक वक्ता को सुनने का सौभाग्य मिला। बात देशभक्ति की थी। 1948 में स्थापित होने के पहले इजरायल का अत्यंत संघर्षपूर्ण इतिहास रहा है। सैकड़ों साल के संघर्ष में यहूदी पूरी दुनिया में बिखर गये थे। उन्हें दरकार थी, इस धरती पर जमीन के कुछ हिस्से की। कोई और देश उनकी इस इच्छा को कैसे मान लेता। लिहाज़ा उनके सामने एक दुश्वार जंग थी। वो दुनिया के विभिन्न कोनों में छिप के रहते। जब मिलते तो विदा के समय एक-दूसरे से कहते - फिर मिलेंगे दोस्त, अपने इजरायल में। इस तरह पुश्तों तक उन्होंने उस इजरायल को जिंदा रक्खा जो धरती पर कहीं था ही नहीं।


एक यहूदी मित्र के बाबा की मृत्यु हो गयी थी। उसमें शरीक़ होने पहुँचे लोगों ने देखा कि जब अंतिम यात्रा के लिये शव को निकला जा रहा था। मित्र की दादी ने सोने की डिबिया से चाँदी का पाउडर निकाल कर शव के नीचे बिछा दिया। कुछ अजीब सी रस्म थी ये, किसी हिन्दुस्तानी के लिये। बाद में जब मित्र से पूछा कि दादी ने शरीर के नीचे क्या बिछाया था। सुन कर इजरायली दोस्त की आँखें नम हो गयीं। बोला हम यहूदियों की ये तमन्ना होती है कि हमारी मृत्य हमारी ज़मीं पर हो। वहाँ से विस्थापित होते समय हमारे पुरखे वहाँ की मिट्टी अपने साथ ले आये थे। ये हमारे वतन की मिट्टी है जो किसी इजरायली के शरीर के नीचे डाली जाती है, मृत्य के समय।


वतन के प्रति इस प्रेम के बारे में सुन कर सभागार में उपस्थित हम भारतीयों ने खूब तालियाँ बजायीं, जोश में। बाहर निकलते समय मै सोच रहा था कि हम अपने देश से भागते हुए क्या ले जाते, अपने साथ। 


- वाणभट्ट              

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

शिक्षा का उद्देश्य

उन दिनों ऐसा न था। सरकारी स्कूलों में पढना फ़क्र की बात थी। क्योंकि अनार कम थे बीमार ज्यादा। अब की तरह हर कोई पढ नहीं सकता था। स्कूल कम थे, पढ़ने वाले ज्यादा। राजकीय विद्यालय में दाखिला एक बड़ा काम था। प्रवेश परीक्षा में सीटें सीमित थीं। छठवीं में प्रवेश होता था या नवीं में। हर कक्षा में अनुमन्य सीमा 40 छात्रों की होती थी, पर वास्तव में 120 बच्चे कक्षा को गुलज़ार कर रहे होते थे। छठवीं में सीटें ज्यादा होतीं थीं, सो दाखिला कुछ आसन होता था, पर नवीं में दाखिला मानो किसी इंजीनियरिंग कालेज का प्रवेश हो। आठवीं की गर्मी की छुट्टियाँ इसी क्रम में शहीद हो गयीं थीं। पर पूरे इलाहाबाद में दूसरा कोई ऐसा कालेज न था, जिसमें पढ़ने में पिता जी को लेश मात्र भी गर्व होता। चूँकि आगे पढना ज़रूरी था और सरकारी स्कूल के अलावा किसी और स्कूल में पढना या न पढना बराबर माना जाता था। इसलिये मन मसोस कर भाइयों अपनी छुट्टियाँ क़ुर्बान करनीं पड़ीं। 

पिता जी शायद नर्सरी में प्रवेश करने गये हों तो गये हों, उसके बाद तो हर जगह अपने अभिभावक बन कर हम स्वयं ही गये। जीआईसी, इलाहाबाद में प्रवेश करने की ख़ुशी पहले दिन ही काफ़ूर हो गयी, जब कक्षा में सौ-सवा सौ बच्चे बैठे मिले। हम छोटे स्कूल से गये थे, जहाँ प्रार्थना ग्राउंड पर सारा स्कूल एक साथ खड़ा हो जाता था। ज्यादातर टीचर हर छात्र-छात्रा को नाम से जानतीं थीं। प्रधानाचार्या से लेकर दाई तक सभी महिलायें थीं। बसों के ड्राइवर या चपरासी ही बस पुरुष थे। सख्त अनुशासन हमारी अध्यापिकाओं का शगल था। और ये शौक़ सिर्फ़ स्कूल या क्लास की चारदीवारियों तक सीमित नहीं था। मैनर्स-एटिकेट्स पर भी लेक्चर दिये जाते थे। क्या मजाल कि हम स्कूल के बाहर भी चाट या चूरन या पाँच पैसे की सेक्रीन वाली आइसक्रीम खाते दिख जायें। एक लेक्चर पक्का समझिये। एक बार कुछ लड़कों को सिर्फ़ इसलिये सजा मिल गयी कि उन्होंने हँसी-हँसी में पीने के पानी के लिये लिखे स्लोगन को कुछ तोड़-मरोड़ दिया था। एक छात्र ने मज़ाक में फ़रमाया 'पानी बहाओ, पियो मत', बाकि छात्र हँस दिये। किसी अध्यापिका ने सुन लिया। फिर तो उस ग्रूप की जो क्लास ली गयी वो वाकया आज तक जेहन में है। तभी से मुझे लगता है कि महिलायें जितनी कानून व्यवस्था बना के रखतीं हैं, उतना पुरुषों के बस की बात नहीं है। पुरुष वैसे भी कानून तोड़ कर ज़्यादा ख़ुश होते हैं।

जीआईसी में राम राज्य था। कितने बच्चे उपस्थित हैं, कितने नहीं जानने के लिये प्राचार्य महोदय के पास न कोई जिन्न था, न कोई चिराग। अगर सारे बच्चे किसी दिन क्लास करने के मूड में आ भी गये, तो समस्या थी कि बैठें कहाँ। और किसी तरह खिड़की-दरवाज़ों पर चढ़ के बैठ भी गये तो उन्हें कंट्रोल करके विषय को पढ़ा पाना असंभव तो नहीं था, पर अध्यापकों के लिये कठिन ज़रूर था। जैसे ही अध्यापक महोदय बोर्ड की ओर मुड़ते कक्षा जीवंत हो जाती। यहाँ सारे पुरुष अध्यापक थे और उनका अनुशासन, जैसा मैंने पहले ही कहा है, हमारी आठवीं की अध्यापिकाओं जितना नहीं था। विज्ञान और गणित की कक्षाओं में उपस्थिति फुल रहती थी। हिन्दी, अंग्रेज़ी और वैकल्पिक विषयों में छात्र नदारद रहते। जैसे ही हिन्दी या इंग्लिश के अध्यापक कक्षा में प्रवेश करते, बच्चे खिड़कियों से कूद-काद कर भाग लेते। गलती से कभी क्लास में ज़्यादा बच्चे होते, तो हमारे हिंदी के प्राध्यापक पूछ बैठते - बेटा तुम लोग भाग नहीं पाये या वाकई हिन्दी पढ़ने की इच्छा जागृत हो गयी है। इस माहौल के बाद भी पढ़ने वाले पढ़ ही लेते। 120 बच्चों में कोई बोर्ड टॉप भी करता कोई आईआईटी निकालता। श्रेय निश्चय ही हमारे स्कूल और अध्यापकों को मिलता। इसलिये हर अभिभावक, जो कान्वेंट की फ़ीस नहीं अफोर्ड कर सकता था, का सपना होता कि मेरा बच्चा जीआईसी में पढ़े।  

चूँकि मै अनुशासित स्कूल का छात्र था, इसलिये कक्षा बंक करने का विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। मै सभी विषयों की क्लास अटेंड करता। विज्ञान और गणित के टीचर तो सिर्फ टॉपर और पढ़ाकू किस्म के छात्रों को जानते थे, जो स्टाफ़रूम में उनसे मिल कर उनसे अपनी समस्याओं पर डिस्कशन करते थे। मेरी उपस्थिति सभी विषयों की कक्षाओं में अनिवार्य थी। टॉपर तो मै नहीं था, पर सभी विषयों में मेरा दख़ल टॉपरों से कुछ ही कम था। हिन्दी से लेकर मैथ तक सभी विषयों में मै लगभग बराबर अंक प्राप्त करता। हिन्दी और अंग्रेजी के अध्यापक मेरी निष्ठा से ज्यादा प्रभावित थे और विशेष स्नेह दिया करते थे। अंग्रेज़ी के अध्यापक थे, नूर साहब। बेहद चलते-पुर्जे। अनेक सरकारी इम्तहानों की कॉपियाँ जाँच कर वो ख़ासी आय अर्जित कर लिया करते। अपने घर पर 15-20 बच्चों को बुला लेते। उनकी पत्नी मेज़ पर बैठ जातीं और जोर-जोर से आन्सर बोलती जातीं, पहले का ए, दूसरे का सी...। और चंद घंटों में सारी कापियाँ जँच जातीं। सिर्फ चाय-नाश्ते की 
ख़्वाहिश में हम सभी उनके पेपर जाँचने के लिये श्रमदान करने को उतावले रहते। नूर साहब की आँखों की शोभा एक ऐसा चश्मा बढाता था जिसमें से उनकी आँखें किधर देख रहीं हैं, ये जान पाना कठिन था। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि वो सनग्लास नहीं था, पावर इतना ज्यादा था कि उसके ग्लास में गोले के अन्दर गोले और गोले के अन्दर गोले और गोले के अन्दर गोले पड़ा करते थे। कितने गोले पता नहीं। वो बच्चों से ही किताब पढ़वाते और एक-एक लाइन की व्याख्या करते। जो बच्चा फँस जाता वो और नूर साहब ही उस पढ़ाई का लुफ़्ट उठा पाते। बाकी मटरगश्ती किया करते।  

मेरी स्थिति वही थी जैसे जेल से छूटे कैदी की। अत्यधिक अनुशासन से अनुशासनविहीनता की स्थिति। और अब मुझे इसका आनंद भी आने लगा था। नूर साहब की क्लास इसके लिये सर्वथा उपयुक्त हुआ करती थी। अमूमन क्लास टॉपर मेरे ठीक आगे बैठता था, लेक्चर थियेटर की पहली पंक्ति में। हमारी अच्छी मित्रता भी थी। इसलिये किसी भी बोर से बोर क्लास में हम आनन्द के कुछ पल खोज ही लेते थे। उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी कुर्सी के पटरे की कील निकल गयी थी। और वो जरा भी हिलता-डुलता पटरा सरक जाता। वो दोस्त ही क्या जो फटे में टाँग न अड़ाये। बाकि क्लासें तो ठीक-ठाक गुज़र गयीं। नूर साहब की क्लास का मै इंतज़ार कर रहा था। आते ही उन्होंने 'अ प्ले बाई टैगोर' के पाठ के लिये एक लडके को चुन लिया और सराबोर हो कर उसकी पंक्तियों को एक्सप्लेन करने लगे। मैंने टॉपर के पटरे को लात से हिलाना शुरू कर दिया। इस खेल में उसे भी मज़ा आने लगा। उसने मेरा पैर पकड़ लिया। मै भी टाँग छुड़ाने के प्रयास में लग गया। इस पूरे कार्यक्रम हम इतना डूब गये की देश-काल-सीमा का ज्ञान ही नहीं रहा। मास्टर जी पहले से ही टैगोर की गाथा में आकंठ डूबे हुये थे। 

मैंने अपने पैर को ज़ोर से खींचा, टॉपर ने उसे आगे खींचा। और ये क्या मेरा पैर बिना किसी व्यवधान के पीछे आ गया। पर देखता हूँ कि मेरा जूता एक परफेक्ट प्रोजेक्टाइल लेता हुआ आगे की ओर जा रहा है। मैथ के प्राचार्य जिस प्रोजेक्टाइल को थ्योरी में समझाया था और वो मेरी समझ में कम आया था, इस दुर्घटना से एकदम क्लियर हो गया। 45 डिग्री पर गोला दागो तो सबसे दूर जाता है। नूर साहब के कान को मिस करता हुआ वो जूता मेज पर विराजमान हो गया। तन्मयता से पढ़ा रहे नूर साहब को पहले तो कुछ समझ नहीं आया। पर मेज पर गिरी अजीबोगरीब आकृति और धप्प की आवाज़ ने उनका ध्यान खींच  ही लिया। उन्होंने झुक कर उस बला का मुआयना करना शुरू कर दिया। ख़ुशबु से या आकार से उन्हें शीघ्र समझ आ गया कि ये किसी का जूता है और शायद उन्हें लगा होगा किसी ने फ़ेंक कर मारा है। पूरी क्लास सन्नाटे में आ गयी। मै भी और टॉपर भी। कोई और होता तो गुस्से से आग-बबूला हो गया होता पर नूर साहब का सब्र काबिलेतारीफ़ था। उन्हें अपनी लिमिटेशन भी मालूम थी। उन्होंने क्लास की ओर निहारा। उन्हें कुछ दिखाई तो देने से रहा। इसलिये मै कुछ निश्चिन्त था। पर सभी जानते हैं कि टॉपर लोग कैसे होते हैं। वो घबरा गया। "सर ये मेरा नहीं है।" "तो फिर किसका है।" नूर साहब ने अपनी दूर-दृष्टि का उपयोग किया। "सर इसका।" नूर साहब का चेहरा गुस्से में लाल हो गया। लगा कच्चा चबा जायेंगे। टॉपर की उंगली मेरी ओर इशारा करने ही वाली थी कि मै मेज के नीचे घुस गया। नूर साहब ने मेरे पीछे वाले छात्र पर अपनी क्रोधित निगाह डाली। मेरा पकड़ा जाना तय था। मरता क्या न करता, जूता छोड़ कर मै खिड़की की ओर भागा। जब तक नूर साहब समझ पाते मै ये-जा, वो-जा।  

अगले दिन मै उनकी क्लास में वैसे ही बैठा था जैसे की कुछ हुआ ही न हो। उन दोस्तों का मै अभी भी शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने मेरा नाम अपनी ज़ुबान से नहीं लिया। आज मै नूर साहब, जहाँ भी हों, से इस लेख के माध्यम से उस कृत्य के लिये क्षमा की रिक्वेस्ट भी प्रेषित कर रहा हूँ।

प्रोजेक्टाइल का जो फंडा उस दिन मिला, उसके बाद मैंने कभी भी क्लासरूम को अपने और अपने अध्ययन के बीच आने नहीं दिया। आउट ऑफ़ बॉक्स होने के कारण अक्सर आउट ऑफ़ क्लास ही रहा. वैसे भी शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की प्रवृत्तियों को मुक्त करना ही तो है।

- वाणभट्ट
        

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

बुद्ध-भाव

जाते-जाते वो मुड़ा। उसके चेहरे पर बुद्ध-भाव था।

जामनगर स्टेशन पर मै दिल्ली जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था। यू पी के स्टेशनों के विपरीत गुजरात के प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ कम हुआ करती है। दुकानें सजी हुयीं थीं पर उन पर भीड़ नदारद। वेण्डर ज्यादा, लोग कम। पुरसुकून की स्थिति में मै ट्रेन के टाइम पर स्टेशन आ चुका था। पर भारतीय रेल की अपनी सार्वभौमिक विशेषतायें हैं, जो देश-काल से प्रभावित नहीं होतीं। ट्रेन दो घंटे लेट थी। किताबें मेरी यात्रा का सहज हिस्सा हैं और ऐसी ही परिस्थितियों के लिये इनका साथ होना ज़रूरी भी है।

एक खाली पड़ी बेंच पर मै अधलेटा सा बैठ गया। बैग का सहारा लेकर। असगर वजाहत की एक किताब मेरे हाथों में थी। मुझे लेखन में जब तक लेखक का अक्स नज़र ना आये, पढ़ने का मज़ा नहीं आता। और ये जनाब पूरे दिल और शिद्दत से लिखते हैं। शैली भी रोचक और कथ्य भी। "मै हिन्दू हूँ" की कहानियों में मै खोया हुआ था कि बगल में एक किशोर ने अपना बैग रखते हुए कहा "अंकल कहाँ जाना है आपको।" अमूमन तो मै यात्रा में बोलता नहीं। पर बच्चे के चेहरे पर एक आकर्षण था। "बेटा मै दिल्ली जा रहा हूँ, वहाँ से कानपुर जाना है।"

उस लड़के ने मुड़ कर गुजराती में अपने माँ-बापू को बताया - ये अंकल भी कानपुर जा रहे हैं। पूरा परिवार मेरे पास आ गया। उसकी एक छोटी बहन भी थी जो 10वीं में पढ़ रही थी। पिता ने बहुत ही गर्व से बताया मेरा लड़का देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थान आईआईटी, कानपुर में दाख़िला लेने जा रहा है। आप भी क्या कानपुर के रहने वाले हैं। कैसा शहर है, कैसे लोग हैं। आदि-आदि प्रश्न। मेरा लड़का तो अभी बहुत छोटा है। पहली ही बार में सेलेक्ट हो गया। घर से इतनी दूर पहली बार जा रहा है। बड़ी चिंता हो रही है।

मैंने अपने कनपुरिया ज्ञान को कायम रखते हुये आईआईटी की शान में कसीदे पढ़ दिये। अरे एकदम अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है। आपको बिल्कुल चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ बच्चे पढाई में रमे रहते हैं। सिर्फ ज्ञान की चाह वाले ही वहाँ पहुँच पाते हैं। आपका बेटा तो लाखों में एक है, तभी वहाँ पहुँच पाया।

पिता, माँ व बहन सभी अपनी-अपनी जिज्ञासा को शांत कर लेना चाहते थे। परन्तु बच्चे को कोई कौतुहल नहीं था। वो मुस्कराता हुआ सब बातें सुन रहा था। माँ-बहन अपनी संवेदनाओं को छिपा कर शांत बने रहने का भरसक प्रयास कर थीं। पिता ऊपर से सहज बने हुए थे। मुझे पढाई के लिये पहली बार घर छोड़ते हुये जो एहसास हुआ था। देश के इस कोने से इतर नहीं था। माँ-पिता-बहन का वो चेहरा भुलाने में दशकों गुज़र गये। पर अभी भी वो दृश्य जेहन में ताज़ा है। आज वो दृश्य पुनर्जीवित हो गया।

दो-ढाई घंटे कब बीत गये पता ही नहीं चला। तभी ट्रेन आने की घोषणा हुई। असुविधा के लिये औपचारिक खेद भी व्यक्त हुआ। माँ की आँखे डबडबा आयीं। बेटी, माँ की ओर देख कर उसके दर्द को समझने का प्रयास कर रही थी। पिता ट्रेन आने की दिशा में शून्य सा ताक रहा था। बेटा अन्यमनस्क सा ट्रेन जाने वाली दिशा में निहार रहा था। 

ट्रेन ने प्लैटफ़ॉर्म के बायें सिरे से प्रवेश किया।

माँ की सब्र का बाँध टूट चूका था। उसकी आँखों से आंसू झर-झर बहने लगे। बहन की आँखें नम हो आयीं थीं। उसने मुँह को रुमाल से दबा लिया पर उसकी सिसकी बरबस बाहर निकल ही गयी। पिता मिनरल वाटर की बोतल लेने के बहाने दृश्य से बाहर हो गये थे।

हमारा कोच अलग था। ट्रेन के रुकते ही हम फिर अजनबी हो गये। मै अपने कोच की ओर बढ़ चला था।

ट्रेन चलने में देर लग रही थी। मै प्लैटफ़ॉर्म पर उतर आया चहल-कदमी के इरादे से या पुनः उस परिवार को देखने, कह नहीं सकता।

माँ-बेटी एक-दूसरे को गले लगाये ज़ार-ज़ार रो रहीं थीं। पिता उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा था कि कौन सा बेटा परदेश जा रहा है। बेटा भावहीन सा गेट पर खड़ा था। पिता ने उसे अन्दर जाने का इशारा किया। अन्दर जाते-जाते वो मुड़ा। उसके चेहरे पर बुद्ध-भाव था।

ज्ञान की तलाश में घर तो छोड़ना ही पड़ता है। बुद्ध वापस आने के लिये घर नहीं छोड़ते। पिता को मालूम है।

- वाणभट्ट

शनिवार, 18 अगस्त 2012

गुलज़ार की सालगिरह पर

एक लम्हा गली के मुहाने पर ठिठक गया 
एक ने हिम्मत करके अन्दर झाँका 
गली बहुत संकरी थी 
और दूसरे मुहाने पर बंद भी

थोडा ठिठक कर 
थोडा झिझक कर 
एक लम्हा अन्दर घुस पड़ा

अन्दर पूरा लम्हों का कब्रिस्तान था
सड़े - गले लम्हों से बचता बचाता 
वो लम्हा आगे बढ़ता गया 

गली के अंत में 
खुले बालों वाली लड़की मिली 
जिसकी फिराक में कई लम्हों ने दम तोड़ दिया था 
कुछ सिसकियाँ ले रहे थे 
कुछ हिचकियाँ 

अचानक वो लड़की लम्हे में तब्दील हो गई   
इस लम्हे ने कुछ साँसे उसके तैरते बदन पर रख दीं 
सुनहरे परों वाली परी में बदल गयी वो  
साँसों ने साँसों को भर लिया 
और सांसें एक हो गयीं

संकरी बंद गली के भीतर 
एक मैदान मिल गया 

और हर लम्हे को जीने का मकसद 

- वाणभट्ट 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

इन्साफ की डगर पर...

इस गीत को सुन-सुन के हम बड़े हुए हैं. 1961 में गंगा-जमुना आई थी. और 1965 में मै अवतरित हुआ. बचपन से ये गाना कुछ जेहन में अन्दर तक घुस गया है. और हर पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी को ये मेरे रोम-रोम से फूटता है. अब लगभग पचास का होने को आ गया हूँ. और पता नहीं क्यों मुझे लगता है ये गीत हमारे हम-उम्र लोगों के लिए ही लिखा गया होगा. तब गीतकार शकील बदायूँनी साहब ने उस समय के हम जैसे बच्चों से ये उम्मीद लगाईं रही होगी कि ये बड़े होकर नेता बनेंगे, उनके सपनों के भारत की. 

अब हम बच्चे तो रहे नहीं. पर अब हमारी उम्र के ही लोग अब नेताओं के जगह पर आ गए हैं. खींच-तान कर कोई किसी विभाग का हेड हो गया, कोई निदेशक. कोई उससे भी उपर बैठा है प्राइवेट कंपनी में मैनेजर बन कर. हमारी संस्कारों में कहीं तो कमी ज़रूर रही होगी जो हमने आदर्श बच्चों के लिये छोड़ दिये और समाज की सारी विकृतियों के अपने में ज़ज्ब कर लिया. हमारे तथाकथित मैनेजर आज उसी बीमारी से पीड़ित हैं, जिससे भूत के राजा-महाराजा, दूसरों पर राज करने की. जिसके पास पैसा-पावर-पद है, वो इतिहास में अपना नाम दर्ज करने को लालायित है. वो ये भूल गया है उसको पद या पावर यूज़ करने के लिए मिला है, मिसयूज़ करने के लिए नहीं. पर वो पावर भी किस काम की जिसे मिसयूज़ न किया जा सके. 

सत्ता की हनक क्या सरकार क्या अधिकारी सभी के पोर-पोर में समा गयी है. और उनकी आत्मा में अंग्रेजों की रूह. भई हमने इतनी मेहनत सिर्फ समाज सेवा करने के लिये तो की नहीं. शुरू से ही अपने अफसरों की चाकरी इसलिये की कि  भविष्य में हमें भी ऐसे ही चाकर मिलें. उनके हर-सही गलत काम को सर आँखों पर लिया तभी आज यहाँ तक पहुँचें हैं. कितनी गलत बातों में सहमति दी, कितना घूस कमा-कमा कर ऊपर पहुँचाया, कितने सिस्टम में अनफिट लोगों को फिट किया, कितने अनफिट को आगे बढ़ने नहीं दिया, ऊपर वाले के आगे कभी सर नहीं उठाया, कभी उनके निर्णय को मना नहीं किया, भले ही उससे देश का कितना भी बड़ा नुक्सान हो गया हो. आउटस्टैंडइंग पाने के लिए "बॉस इज अल्वेज़ राइट" को मूल मन्त्र बनाया. इतने जतन के बाद जब कुर्सी मिली है तो अब देश-समाज हमसे इमानदारी-भाईचारे-उत्थान-भारत निर्माण की उम्मीद कर रहा है. इम्पोसिबल. कतई नहीं.

अब तो हम इस स्तर पर आये हैं कि राज कर सकें. किसी की जिंदगी बना और बिगाड़ सकें. अब हम बच्चे नहीं रहे. ये आदर्श, कोरे-आदर्श या तो समाजसेवियों के लिये हैं या साधू-संतों के लिये. मै तो आम आदमी हूँ, जैसी दुनिया देखी है वैसे ही चलूँगा. इस भूखे-नंगे देश में अगर आप अपनी आने वाली नस्ल के लिये एक समृद्ध विरासत नहीं छोड़ पाये, वो भी उच्च पद पर रहते हुए, तो क्या किया. सो मै अपनी सात पुश्तों को तारने के लिए हर संभव कोशिश करूँगा. जंग और प्यार में सब जायज़ है. जहाँ 125 करोड़ लोग आपसी प्यार की निशानी हैं, वहाँ खाने के लिये चुपड़ी रोटी का इंतजाम एक जंग से कम नहीं है. मैंने तो अपनी जंग जीत  ली है. अब चिंता निक्कमे पप्पू, ऐय्याश चुन्नू, बदनाम मुन्नी की है. हराम का पैसा इनकी रग-रग में बह रहा है. इनके सुखमय जीवन के लिए मै नहीं कुछ करूँगा तो और कौन करेगा.          

किसी बच्चे को हमने अन्याय करते या दादागिरी करते तो देखा नहीं. यहाँ सब आदर्श बच्चों के लिये मान लिये जाते हैं. कोई मुझ सा अधेड़ अगर उस की बात भी करे तो ये उसकी अपरिपक्वता की निशानी है. कहाँ चुप रहना है, कहाँ बोलना है, कहाँ आँखें मींच लेनी है. अब ये सब कोर्स में होना चाहिए. आदर्श की किताबों को आग लगा दो और जमीन के नीचे दफ़न कर दो. कम से कम बच्चों को कन्फ्यूज़ न करो ईमानदारी और आदर्श के चक्कर में. करना है तो बड़ों के लिए आचारसंहिता बनाओ. उनसे आदर्श के पालन करवाओ और न करने पर सजा दिलवाओ. 

सो मुझे लगता है ज़रूरत है इस गीत को नये सिरे से लिखे जाने, हम बड़ों के लिये. बदायूँनी साहब से माफ़ी के साथ मै इस गीत को इस देश के हम-उम्र लोगों के लिए समर्पित कर रहा हूँ, जिन पर वाकई देश की व्यवस्था है, और जिनका एक-एक निर्णय देश को आगे या पीछे ले जा सकता है. इन्हें न बच्चों की कैटेगरी में रखा जा सकता है, न युवाओं की. बुड्ढे  तो ये अभी हुये नहीं हैं. अधेड़ शब्द मुझे अजीब लगता है इसलिये इन्हें क्या कहा जाये मुझे नहीं मालूम. पर देश के लिये कुछ करने का ज़ज्बा इन लोगों में जागृत करने की ज्यादा आवश्यकता है.  

इन्साफ की डगर  पे ______ दिखाओ चल के... 
ये देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो अब के ...

दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुंह से कहना 
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना 
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के...


इन्साफ की डगर  पे ______ दिखाओ चल के... 
ये देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो अब के ...


अपने हों या पराये सबके लिये हो न्याय 
देखो कदम तुम्हारा हरगिज़ न डगमगाये 
रस्ते बड़े कठिन हैं चलना सम्हल-सम्हल के...


इन्साफ की डगर पे ______ दिखाओ चल के... 
ये देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो अब के ...


इंसानियत के सर पर इज्ज़त का ताज रखना 
तन मन की भेंट दे कर भारत की लाज रखना 
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के...


इन्साफ की डगर  पे  ______ दिखाओ चल के... 
ये देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो अब के ...


इस गीत को अपने बच्चों के सामने जोर से गाइये, देखियेगा आपको अपना बचपन याद आ जायेगा. कितने जोश से हम इसे अपने स्कूलों में सुबह की प्रार्थनाओं में गाया करते थे. हम बिगड़े नहीं थे, हम बिगड़ नहीं सकते और हम बिगड़े नहीं हैं. जीवन की चूहा-दौड़ में हम अपना वजूद भूल गए हैं बस.

जय हिंद, जय भारत, वन्दे मातरम !!!

- वाणभट्ट

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