शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

इतिहास

कभी-कभी आपको लगता होगा कि इतिहास हमें पढाया ही क्यों जाता है, जब सारे प्रीमियम क्वालिटी जॉब्स पर विज्ञान के छात्र काबिज हैं. लोग तर्क दे सकते हैं कि सभी विषय बराबर हैं और सभी में जॉब्स की अभूतपूर्व संभावनायें हैं. लेकिन ये भी एक ज्ञात सत्य है कि हाईस्कूल और इन्टर आते-आते हर छात्र को ये अनुमान लग जाता है कि किस विषय से उसका आगे पाला न पड़े तो बेहतर है. समाजवाद, जिसे मसाजवाद कहना अधिक श्रेयस्कर होगा, सबको बराबर सिद्ध करने में लगा है. मसाजवाद, शब्द इसलिये अधिक एप्रोप्रियेट है, कि इसमें हर एक के अहम् की तुष्टि करनी होती है. तानाशाही होती तो किसी को तेल लगाने की ज़रूरत न होती. प्रजातन्त्र में जनता ही जनार्दन है. किसी भी देशकाल में विद्वानों की संख्या अल्पज्ञों से अधिक नहीं रही है, न हो सकती. विक्रमादित्य हों या अक़बर, उन्होंने कन्सल्टेंसी के लिये नौ रत्न ही क्यों चुने, वो सौ रत्न भी अपॉइन्ट कर सकते थे, उन्हें भला क्या कमी थी. लेकिन उन्हें सुराज डिलीवर करना था.  योग्यता जब उस ज़माने में आपेक्षित थी, तो आज तो उसकी आवश्यकता और भी प्रासंगिक है. लेकिन जब से ये मसाजवाद आया, हर किसी को ये बताया जाने लगा कि ईश्वर ने इंसान बनाया है और हर इंसान बराबर है. चूँकि हर इंसान बराबर है, तो हर जगह बराबरी एक नैसर्गिक न्याय है. ये बात अलग है कि एक ही घर में एक ही माता-पिता से उत्पन्न चार भाई बराबर नहीं हैं. और माँ-बाप भी बच्चों के साथ समानता का व्यवहार नहीं कर पाते. लेकिन अगर समानता सरकार से लेनी हो तो हर कोई तैयार है धरना-प्रदर्शन के लिये. 

यही व्यवस्था पाठ्यक्रम के सभी विषयों पर भी लागू कर दी गयी. हर विषय बराबर महत्वपूर्ण है. फिर क्या तबला, क्या सितार, इतिहास, क्या भूगोल, क्या क्वांटम फिज़िक्स, क्या थर्मोडायनमिक्स, सब एक तराजू में तौल दिये गये. बचपन से रगड़-घिस के इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाने वालों की कुण्ठा जायज़ है जब मौज मस्ती के साथ बीए पास सहपाठी प्रशासक बन कर उसी पर रौब गाँठने का मौका नहीं छोड़ता. एक परिवार में सब बराबर नहीं हैं, तो एक देश में हर व्यक्ति बराबर करने का सपना देखने और दिखाने वाले, मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं. कितने ही महापुरुष सबको बराबर करते-करते, बिना कोई उद्यम लगाये अम्बानी-अडानी से टक्कर ले रहे हैं. अगर सब आदमी बराबर हैं तो फिर एग्ज़ाम्स की अवधारणा ही गलत है. जो जिस इलाके में पैदा हुआ, उसी इलाके में पढ़े-लिखे, काम करे. हर जगह हर काम की ज़रूरत है. ये क्या कि पढ़ाई की कन्नौज में और नौकरी करने जा रहा है, फ़ौज में. उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग पूरी दुनिया में झंडे गाड़ रहे हैं, उनके लिये उनके अपने प्रदेश में ही रोजगार के अवसर नहीं हैं. 

जब से इतिहास और हिन्दी जैसे मानविकीय (ह्यूमैनिटीज़) विषयों को लेकर लोग शासक-प्रशासक बनने लगे, इंजीनियर्स ने प्रशासनिक सेवाओं को अपना लक्ष्य बनाना आरम्भ कर दिया. नतीज़ा पिछले दस सालों में प्रशासनिक सेवाओं में इंजीनियर्स का चयन 70% तक पहुँच गया. और विशेषता ये है कि इनमें से 90% इंजीनियर्स ने परीक्षा के लिये मानविकीय विषयों का ही चयन किया. यहाँ भी मसाज करने के उद्देश्य से कला-विज्ञान-वाणिज्य-मेडिकल-इंजीनियरिंग सबको बराबर मान लिया गया. किन्तु प्रशासन में जिस संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, उसको मापने के लिये कोई टेस्ट नहीं डिज़ाइन किया गया है. प्रशासनिक पदों पर रहते हुये आपने यदि अपनी संवेदना का प्रदर्शन कर दिया, तो वही बॉस जो आपका वार्षिक मूल्याङ्कन करता है, उसके नाराज़ होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है. चूँकि नौकरी में ना-करी का रिवाज़ नहीं है, इसलिये यदि आप पद में निहित शक्तियों का उपयोग कर वाकई समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं, तो आपको अपने ही विभाग के धृतराष्ट्रों-दुर्योधनों-कर्णों से लड़ना पड़ेगा. शरद जोशी साहब ने अपने किसी ग्रन्थ में पहले से ही लिख रखा है - युद्धभूमि में अर्जुन ने कृष्ण से कहा, प्रभु चाचा-भाई-भतीजों से तो मै निपट सकता हूँ, पर आप देख नहीं रहे हैं, सामने बॉस भी खड़े हैं, इस तरह के धर्म युद्ध से मै बाज आया. 

जिनका ज़मीर जरुरत से ज्यादा जाग्रत होता है, वे हर जगह यूँ और क्यूँ करने लगते हैं. ऐसे लोगों को सिस्टम मिसफिट डिक्लेयर करके किनारे बैठा देता है या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. जिन्हें अंदेशा हो जाता है कि यहाँ सर्वाइवल कठिन है, तो नौकरी में रहते हुये जो न कर पाये, उसे करने का सन्कल्प लेकर, स्वतः ही पद छोड़ के निकल लेते हैं. उन्हें समझ आ जाता है कि नेतागिरी ही एक माध्यम है जिसके द्वारा वो समाजसेवा कर सकते हैं. ये अलग बात है कि आत्म-उत्थान के लिये समर्पित जनसेवक, प्रायः इस बीमारी से ग्रसित नहीं होते और नौकरी में संवेदनशीलता की कतिपय गुंजाइश नहीं होती.

विज्ञान और अभियांत्रिकी का छात्र होने के नाते मुझे सब्जेक्टिव विषय वैसे ही लगते हैं, जैसे वाणभट्ट के ब्लॉग. जब जैसा मन हुआ, वैसी व्याख्या कर डाली. सही को गलत और गलत को सही सिद्ध करने का कार्य, या तो कवि-लेखक कर सकते हैं या इतिहासकार. भूगोल भी कुछ हद तक वैज्ञानिक है. इसमें अपने मन से कुछ भी भाँजने की गुंजाइश कम होती है. लेकिन इतिहास और हिन्दी ऐसे विषय हैं, जिसमें यदि आप थोड़े भी कल्पनाशील हैं, तो कॉपी खाली नहीं रहने वाली. शायद इसीलिये सिविल सेवा के एग्ज़ाम्स में ये छात्रों के पसन्दीदा विषय होते हैं. इतिहास में थोडा क्रोनोलॉजी का मग्घा मारने की आवश्यकता होती है, हिन्दी में तो वो भी नहीं करना. कला विषयों की प्रत्येक पुस्तक में पहला अध्याय मात्र ये सिद्ध करने में लग जाता है कि इतिहास भी विज्ञान है. राजनीति शास्त्र को तो पॉलिटिकल साइंस ही घोषित कर दिया गया. हिन्दी और अन्ग्रेज़ी के भी अपने भाषा विज्ञान हैं. संस्कृत पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है, जिसमें गणित की तरह दो और दो के जोड़ का फ़ॉर्मूला लगता है. सही तो सही, फुल मार्क्स. गलत तो ज़ीरो. लेकिन जिस तरह समर्थ लोग किसी को अपना औचित्य सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं समझते, संस्कृत ने भी अपनी गरिमा बनाये रखी, और विज्ञान या अविज्ञान की परिभाषा के चक्कर से बची रही. 

चूँकि आज का विषय इतिहास है, तो ये बताना आवश्यक हो जाता है कि इतिहास, इतिहासकार लोग लिखते हैं. और जब वो घटना या दुर्घटना हो रही होती है तब वो वहाँ उपस्थित नहीं होते. बाद में प्रत्यक्षदर्शी जो उन्हें रिपोर्ट देते हों, उसी के आधार पर वो उस घटना/दुर्घटना को अपने नज़रिये से कलमबन्द करते रहते हैं. ये आज का अटल सत्य बन गया है, जो लिख गया, वो पत्थर की लकीर. किला बनेगा तो समय के साथ खँडहर हो जायेगा, लेकिन जो लिखा जायेगा, वही पीढ़ियों तक पढ़ा-पढ़ाया जायेगा. समय के साथ वही लिखा अमर हो जायेगा. उसी के रेफरेन्स कोट किये जायेंगे, वाणभट्ट  एट आल सन फलाना-फलाना. यदि आप इतिहास पढ़िये तो लगता है कि सारे महापुरुषों को इतिहास में ही जन्म लेना था. आज़ादी की लड़ाई तो बहुतों ने लड़ी, लेकिन हर किसी को स्वतंत्रता सन्ग्राम सेनानी नहीं माना गया. स्वतन्त्रता के पश्चात् जिस पार्टी की सरकार बनी, सारे महान पुरुषों उसी के डिक्लेयर हो गये. हर गली-मोहल्ले-चौराहों पर उनकी प्रतिमायें लगीं, तो लोगों की स्मृतियों में वे आज भी जीवित हैं. जिन्होंने शहादत दी या यातनायें सहीं, उनके नाम इतिहास के पृष्ठों में खो से गये. जब से हमने होश सम्हाला एक भी पुरुष (या महिला), महापुरुष (या महामहिला) नहीं बन पाये. आज़ादी के बाद से तो महापुरुषों ने जन्म लेना ही बन्द कर दिया. जो पैदा हुये भी, तो पक्ष और विपक्ष ने उनकी पूरी कुण्डली खंगाल डाली. जब हर पार्टी अपने-अपने महापुरुष लिये घूम रही है, तो किसी एक पुरुष को महापुरुष घोषित करना मुश्किल हो जाता है. स्वीकार्यता इस बात पर बनती है कि एक आपका तो एक हमारा भी. नहीं तो न आपका, न हमारा. इतिहास के इतिहास पर यदि गहन दृष्टि डाली जाये तो ज्ञात होता है कि जो शासक होता है, वो इतिहास लिखवाता है. अब किसी कलमकार की क्या मजाल कि जिल्ल-ए-सुभानी की अमानत में खयानत कर जाये. जान है तो जहान है. इसलिये जिसने भी भारत जैसे धर्मपरायण और सहिष्णु देश पर लूट-खसोट के उद्देश्य से हमला किया, उसने ख़ुद को महान घोषित कर दिया. शमशीर के साये में कुछ भी इतिहास लिखवा लो. सत्ता या पद में निहित शक्तियों के दुरूपयोग के आज भी बहुत से उदाहरण मिल जाते हैं. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी जनता का, जनता के लिये, जनता के द्वारा स्थापित प्रजातन्त्र में ऐसी बानगी देखने को मिलती हो, तो ग़ुलामी काल की बात ही क्या करनी. 

आज हम भविष्य के जिस इतिहास को जी रहे हैं, उसे देख कर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि हर तस्वीर के दो रुख होते हैं. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरफ़ से, किस एंगल से देख रहे हैं. पक्ष को कोई कमी नहीं दिखती और विपक्ष को कमी ही कमी दिखती है. पक्ष-विपक्ष दोनों देश का विकास चाहते हैं लेकिन सत्ता में रहने या आने के बाद. तब तक सब गलत. जब इतने विकास और निष्पक्ष पत्रकारिता के बाद भी  लोग मीडिया को गोदी मीडिया कह सकते हैं, तो ये मानना पड़ता है कि वृहद् समाज प्रायः सत्ता के पक्ष में रहता है. विरोध भी वही दर्ज़ करते हैं जो मलाई से वंचित रह जाते हैं. पत्रकारिता को प्रजातन्त्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है. जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते विचार और मूल्य बदल जाते हों, तो आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि भूतकाल में भी शासकों का प्रभाव किस हद तक लेखक और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करता रहा होगा. इतिहास के पन्नों से आज़ादी के कितने ही दीवानों के नाम तक मिटा दिये गये. 

संयोग से हम भविष्य के बनते हुये इतिहास का हिस्सा हैं. 3000 के अल्ले-पल्ले पंजीकृत राजनैतिक पार्टियों के कारण हम हिन्दुस्तान के प्रजातन्त्र को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र मान कर गौरवान्वित होते हैं. जब तक प्रजातन्त्र एक परिवार-व्यवस्था के अधीन रहा, सारे महापुरुषों पर उन्हीं का वर्चस्व रहा. जैसे-जैसे प्रजातन्त्र का विकास हुआ, पार्टियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुयी. मल्टी पार्टी सिस्टम में हर पार्टी के अपने महापुरुष हैं. कुछ पार्टियों में तो लीडरान की संख्या की तुलना में समर्थकों की संख्या कम है. पार्टी में भी तो हर कोई किसी न किसी पद का आकान्क्षी है. हर वह व्यक्ति जो हज़ार-पाँच सौ वोटों को प्रभावित कर सकता है, नेता बना घूम रहा है. क्या मजाल कि कोई उनके नेता के विरुद्ध कुछ लिख-बोल दे, इतने अनुयायी तो पले ही हुये हैं कि कहीं भी, कोई भी, चक्का जाम कर दें. व्यापक बेरोजगारी में धरना-प्रदर्शन-चक्का जाम एक उद्योग की तरह फल-फूल रहा है. जिस इतिहास को हम जी रहे हैं, उसे देख-सुन कर पढ़े हुये इतिहास से विश्वास उठ सा गया है. बताइये आज कोई ऐसा नेता हो सकता है, जिसके पीछे पूरा देश खड़ा हो जाये. तब भी नहीं रहा होगा, लेकिन जिसका मीडिया मैनेजमेंट जितना बढ़िया रहा होगा, वो महान बन गया. जिस देश में सबको अपनी-अपनी पड़ी हो उससे समझदार देश खोजना मुश्किल है. यदि दीवाने होते तो क्या समझते हैं आप, अन्ग्रेज़ हों या मुग़ल कितने दिन टिक पाते. छोटे-छोटे व्यक्तिगत लाभ के लिये, जब आज भी लोग नैतिक मूल्यों और आदर्शों को तिरोहित कर सकते हैं, तो वफ़ादारी के ईनाम के तौर पर मुगलों के ज़माने में तो निजाम और अंग्रेजों के ज़माने में राय बहादुर की पदवियों से नवाज़ा जाता था. इस देश में क्रान्ति करने की प्रथा नहीं है, वर्ना देश को सैकड़ों वर्षों की गुलामी न झेलनी पड़ती. अमरीकी क्रान्ति पाँच-सात साल में ख़त्म हो गयी. सौ-दो सौ साल भला कौन सी क्रांति चलती है.   

अतीत के इतिहास ने कितने ही महापुरुषों को हाशिये में दफ़न हो गये. स्थापित महापुरुषों को इतना महिमामंडित किया गया कि युवा पीढ़ी आज़ादी के अन्य वीर सपूतों के विषय में नहीं जान पायी. सुभाष-आज़ाद-भगत-पटेल-सावरकर के योगदान को उतनी तरजीह नहीं मिल सकी. एक बार भारत के सम्पूर्ण इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है. ताकि हम जान सकें कि हमारा इतिहास और अस्तित्व, अन्ग्रेज़ों-मुग़लों के काल तक ही सीमित नहीं था, और दिल्ली ही भारत नहीं था. आज़ादी की लड़ाई में कितनों ने अपना सर्वस्व गँवाया. उनको भी इतिहास के पन्नों में जगह मिलनी चाहिये. अहिंसक आज़ादी की जिस परिकल्पना पढ़-सुन कर हम बड़े हुये, वही हमारा इतिहास है, वही हमारा सच है. वर्तमान परिस्थितियों को देख कर सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि इतिहासकारों ने उस समय के शासकों के मनमाफ़िक ही लिखा होगा. और जनता को भी वही दिखाया गया होगा. आज इन्फोर्मेशन एक्सप्लोज़न के युग में आम आदमी भी जागरूकता के चरम पर है, कोई किसी को यूँ ही महान नहीं मान लेगा. हर व्यक्ति, हर महापुरुष को अपने चश्मे से देख रहा है. यदि किसी ने गलती से किसी को महान बोल दिया, तो लोग बैठे हैं उसकी महानता का नक़ाब उतारने को. गनीमत है इतिहास के महापुरुष आज नहीं पैदा हुये, नहीं तो चैटजीपीटी के युग में उनका पूरा इतिहास और भूगोल निकाल लिया जाता. समर्थक समर्थन करते और विरोधी विरोध.  

खोजी पत्रकारिता के नाम पर कोई घोषित कर देता है, कौवा कान ले गया. और रोजगार की तलाश में बैठे लोगों को मुद्दा मिल जाता है. कभी-कभी लगता है, शायद नयी पीढ़ी के मन में आज़ादी के आन्दोलन में भाग लेने की तमन्ना अभी भी बाकी है, इसलिये ये बस मुद्दे खोजते रहते हैं. कुकरमुत्ते की तरह उग जाने वाली पार्टियाँ, आज फ़ेसबुक-इन्स्टा-ट्विटर पर बैठ कर व्यवस्था बदलने का दंभ भर रही हैं. युवा जेन-ज़ी को लोगों ने ऐसे चढ़ा दिया है जैसे इनके पहले की पीढ़ियाँ कभी जवान नहीं थीं और इनके बाद आने वाली नस्लें ढक्कन पैदा होने वाली हैं. अरे भाई दुनिया को आगे ही जाना है, यदि पुतिन-नेतान्याहू-ट्रम्प से बच गयी तो. सिर्फ़ इस्तीफ़ा-इस्तीफ़ा खेलने से  समस्या का समाधान नहीं निकलना, ये बात उन्हें भी पता है. प्रजातन्त्र है इसलिये सबको आज़ादी है, सोचने की, बोलने की. सोचने-बोलने से भला किस सत्ता को फ़र्क पड़ता है, इसलिये इन्हें धरना-प्रदर्शन-चक्का जाम में ही समाधान दिखायी देता है. टीवी चैनल्स, यू-ट्यूब, सोशल मीडिया किसी अनजान नाम को पूरे देश के घर-घर में पहचान दिला सकने में सक्षम है. और ये पीढ़ी इलेक्ट्रोनिक मीडिया की इस ताक़त को भली-भाँति समझती है. मेरे विचार से जो कुकुरमुत्ते-कॉकरोच टाइप की पार्टियाँ पैदा हो गयी हैं, उन्हें नैशनल लेवल पर आने से पहले अपने आस-पास के ज्वलंत मुद्दों पर काम करना चाहिये.

जिन लोगों को भारत के स्वतंत्रता सन्ग्राम में भाग लेने का मौका नहीं मिला, उनकी तमन्ना पूरी करने के उद्देश्य से एक नया विभाग बनाना चाहिये, जिसमें अन्ग्रेज़ों और मुग़लों के अत्याचारों को सिम्युलेट किया जाये. जिसे भी आज़ादी का ज़्यादा शौक चर्राये, उसे हफ़्ते-दस दिन के लिये सिम्युलेटर में भेज दिया जाये. इनकी आज़ादी की क्रान्ति में भाग लेने की तमन्ना भी पूरी हो जाये और देश का अनावश्यक धरने-प्रदर्शन में होने वाले धन और समय का अपव्यय भी बच जाये. बाकि प्रजातन्त्र में बात रखने के अपने तरीक़े हैं, उस तरह से भी समस्याओं को निपटाया जा सकता है.    

देश में करने के लिये बहुत काम हैं, आपको देखना है कि कहाँ से शुरू होना है. गली-मोहल्ले में काम करने से नैशनल आइडेंटिटी नहीं बनने वाली इसलिये राष्ट्रीय मुद्दे उठाना बहुत ज़रूरी है. जिन्होंने अपने इर्द-गिर्द स्कूल-कॉलेज-समाज-ऑफ़िस में घटती विसंगतियों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठायी  वो पूरी व्यवस्था बदलना चाहते हैं, वो भी बिना इलेक्शन लड़े. जेन-ज़ी को देश बदलना है तो बदलाव का हिस्सा बने. शुरुआत अपने अगल-बगल होने वाली अव्यवस्था से लड़ने से शुरू करो. देश सुधारने से अच्छा है, आप जहाँ जिस जगह हैं, वहीं से सुधार आरम्भ कीजिये. आज़ादी की लड़ाई जन्तर-मन्तर पर नहीं लड़ी गयी थी. हर किसी ने अपने-अपने स्तर पर प्रतिरोध किया था. कुछ ने नौकरियाँ छोड़ीं, कुछ ने अखबार निकला, कुछ ने किस्से-कहानी-कवितायें लिखीं. उसके लिये भी प्रताड़ित हुये. आज़ादी नारे लगाने से नहीं मिली होगी. तब मीडिया के इतने माध्यम नहीं थे. आज हर मोबाइल धारक एक पत्रकार है. सच दिखाना जितना आसान हो गया है, उतना ही कठिन हो गया है, सच को छिपाना. भारत में हर किसी के लिये महान बनने के अभी भी बहुत अवसर हैं. बस फ़र्क ये है कि वास्तविकता जमीन पर दिखनी चाहिये. 

जिन लोगों में महान बनने का कीड़ा विद्यमान है, वाणभट्ट उनका आह्वाहन करता है कि आइये, तन-मन-धन से अपना योगदान दीजिये. मीडिया के विकास के युग में कम से कम ये गारेन्टी तो दी जा सकती है कि भविष्य के इतिहास के जिस हिस्से में हम जी रहे हैं, उसमें मैनिपुलेशन की सम्भावना नगण्य है. आप को महान बनने के लिये कठोरतम प्रयास करना होगा. आपके विरोधी हर वो सम्भव हथकण्डे अपनायेंगे जो आपको महान बनने से रोक सके. बाकि अगर ये सरकार भी पिछली सरकार की तरह सत्तर बरस रह गयी, तो नये इतिहास में पुराने किरदारों के गुम हो जाने का भी अंदेशा है.  आज अगर गाँधी, कृष्ण या राम भी आ जायें, तो कृतिम बुद्धिमत्ता के इस युग में उनको भी स्वयं को महान सिद्ध करना मुश्किल हो जाये. यकीन मानिये, आज के समय में, बहुत कठिन है, डगर महानता की. 

-वाणभट्ट

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