रविवार, 1 नवंबर 2026

इन्टीग्रिटी

अख़बार के पहले पन्नों पर आये दिन ख़बरें कुछ ऐसे छपती हैं, जैसे आज तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. और प्रेस वाले ऐसी सनसनीखेज ख़बर लेकर पहली बार आपसे मुख़ातिब हुये हैं. पढ़ना एक प्रोएक्टिव काम है. ये पढ़ने वाले पर निर्भर करता है कि वो कितनी इंटेंसिटी से ख़बर को पढ़ रहा है. कई बार सनसनीखेज ख़बरें भी बिना सनसनी पैदा किये निकल जाती हैं. पहले की तरह अब कोई 'आज की ताज़ा ख़बर', कह कर अख़बार नहीं बेचता. उसे पता है कि अख़बार भले नया हो, लेकिन उसमें छपी ख़बरें वही पुरानी हैं. ख़बरें वही रहती हैं, बस तारीख़ बदल जाती है. यदि गलती से आपके हाथ हफ़्ते भर पुराना अख़बार लग जाये और आपने डेट पर गौर नहीं किया, तो आप पूरा का पूरा अख़बार पढ़ जायेंगे और आपको भनक भी नहीं लगेगी कि आप बासी ख़बरें पढ़ रहे हैं. विषय वही रहते हैं. सत्ता पक्ष ने क्या किया तो विपक्ष ने क्या कहा. कहाँ बाढ़ आयी, कहीं सूखा पड़ा. कौन सा तूफ़ान कब आने वाला है और उसके क्या दुष्प्रभाव होने वाले हैं. कौन सा मैच किसने जीता, और किसने हारा. शेयर बाज़ार का हाल भी वैसा ही है, जैसा मौसम का हाल. यदि आप मौसम का अनुमान लगा सकते हैं, तो शेयर बाज़ार में सट्टा भी खेल सकते हैं. सबसे चटकारे लेकर पढ़ी जाने वाली ख़बरें होती हैं, डकैती और लूट की. जब से साइबर अपराध बढ़ें हैं, बैन्क लूटने की ख़बरों में कमी आयी है. लगता है पहले बैन्क वाले ही बैन्क लूटने के लिये लुटेरों को इनवाईट करते थे. इस प्रकरण पर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं. आज का लेटेस्ट पसन्दीदा साइबर अपराध भी तो कहीं कर्मचारियों की शह पर तो नहीं फल-फूल रहे हैं. एक कोना फ़िल्मों की गौसिप्स के लिये समर्पित होता है. अख़बार की नज़र पाठकों की नब्ज़ पर भी रहती है. इसलिये हर अख़बार में एक कॉलम ये बताने के लिये होता है कि आपका आज का दिन कैसा रहने वाला है. शायद अख़बार का ये सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला पृष्ठ होता है. कई बार जब अख़बार पलटने का भी समय नहीं रहता, तब भी व्यक्ति घर से निकलने से पहले इस पृष्ठ को तो पलट कर देख ही लेता है. यदि ये लिखा हो कि आज किसी से उलझना सही नहीं है, तो आदमी पूरा दिन बचता हुआ घूमता है कि कहीं कोई पंगा न हो जाये. किसी से उलझने की प्रक्रिया को अगले दिनों के लिये मुल्तवी कर देता है. जिस दिन भविष्यवक्ता बता दें कि आज का दिन आपके लिये अनुकूल है, उस दिन वो बहुत हल्का महसूस करता है और उस दिन किसी पचड़े में फँसने की उसकी सम्भावना बढ़ जाती है क्योंकि उसको दूसरे के भविष्य का अनुमान नहीं होता. अख़बार में सबसे अधिक विचलित कर देने वाली ख़बरें, हत्या-आत्महत्या-बलात्कार की होती हैं. हर दिन छपने वाले अख़बारों का स्टैण्डर्ड मजमून होता है. अखबार चाहे एक दिन पुराना हो या साल भर, पैटर्न नहीं बदलता. कुछ न पढ़ने वाले लोग इसलिये भीअख़बार ख़रीद लेते हैं क्योंकि उनके विभाग में न्यूज़ पेपर बिल री-इम्बर्स करने की व्यवस्था है, और इनका कबाड़ भी कुछ दे कर जाता है.        

एक और ऐसी ख़बर है, जो पहले पूरे समाज को विचलित कर जाती थी, पर अब नहीं करती. अति हर चीज़ की बुरी होती है. इसके बारे में आये दिन इतना छपता रहता है कि लोगों ने इस पर ध्यान देना ही बन्द कर दिया है. ये ख़बरें हैं, भ्रष्टाचार की. पहले समाज, भ्रष्ट व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता था. भ्रष्टाचारी अपने काले धन का किसी भी प्रकार से दिखावा करना पसन्द नहीं करता था. या ये कहें कि अपने भ्रष्ट होने पर उसको शर्म आती रही होगी. इसलिये वो प्रायः अपने गुप्त धन के दुरूपयोग से अधिक सदुपयोग पर ध्यान देता था. अपने नाते-रिश्तेदारों, आस-पास के गरीब-गुरबों की सहायता करके, उसे रॉबिन हुड वाली फीलिंग आती रही होगी. मौका लगा, तो दो-चार भाई-भतीजे भी विभाग में फ़िट कर समाज कल्याण में भी अपना योगदान दे देता था. इस भ्रष्ट आचरण में इनका अपना व्यक्तिगत स्वार्थ एक सीमा तक ही होता था. पद मिला है तो उसका उपयोग जनकल्याण में होना भी चाहिये. थोड़ा बहुत आत्मकल्याण भी हो जाये तो इसमें बुरा क्या है. किन्तु आपका सही, अन्य लोगों के लिये ग़लत भी हो सकता है. यदि उससे किसी प्रेस वाले ने अपने रिश्तेदार को सेट करने के लिये कहा और उसने नहीं किया, तो समझ लीजिये, उसकी खैर नहीं. खोजी पत्रकारिता, उसके सारे गड़े मुर्दे उखाड़ डालेगी. या तो पत्रकार की मान लो, नहीं तो अख़बार में अगले दिन अपनी फ़ोटो देखो. पहले इन लोगों ने इस बात को हल्के में लिया. नतीज़ा, अख़बार वालों ने मानों भ्रष्टाचार के विरुद्ध धारावाहिक ही छापना शुरू कर दिया. छप जाने के बाद रहा-सहा डर भी ख़त्म हो गया. बाद में लगा, छपने के बहुत लाभ हैं. अवैध कमाई का खुल कर उपयोग-उपभोग किया जा सकता है, साथ ही पास-पड़ोस, नाते-रिश्तेदारों पर रुआब भी बढ़ जाता है. सबको लगने लगता अफ़सर हो तो ऐसा. हुण-हुण दबंग टाइप का. पास-पड़ोस के बच्चों को भी मालूम हो जाता कि किस पोस्ट पर, कितना माल है. उसी के हिसाब और अपनी योग्यता के अनुसार उन्हें कॉम्पटीशंस का चयन करने में दिक्कत न होती. अब जब देश-समाज में भ्रष्टाचार, जो कभी कदाचार समझा जाता था, आज सदाचार बन चुका है, तो आँखों में जो बची-खुची शर्म थी वो भी जाती रही. 

अख़बार वालों का डर भी धीरे-धीरे कम होता गया. अगर किसी ने, किसी अख़बार में छाप भी दिया, तो जिसे भी काम करना या कराना होता, उसे मालूम हो जाता था कि साहब कड़क हैं - रेट फ़िक्स है, झुकेगा नहीं साला. जब से न्यूज़ के लिये एक्सक्लूसिव टीवी चैनेल्स की भरमार हो गयी है, लोगों का अख़बारों के प्रति मोह भंग सा हो गया है. कौन अख़बार के पन्नों में मगज़मारी करे, टीवी चलाओ, एक नहीं दस-दस चैनेल्स पर न्यूज़ देखो-सुनो. ख़बरों को सनसनीखेज़ बनाने में न्यूज़ चैनेल्स अख़बारों से बाजी मार ले गये. उसी न्यूज़ को, जिसे आप मन ही मन पढ़ सकते थे, ये चैनेल वाले पूरा घर हलकान किये रहते हैं. तहलका मचाये बिना, इनकी कोई न्यूज़ पूरी नहीं होती. सबसे अधिक फ़र्क पड़ा कि पहले अख़बार में स्टिल फ़ोटो आती थी, अब चलती-फिरती-बोलती रील पूरी भाव-भंगिमा के साथ आती है. 

टीवी पर लोग दो ही कारणों से आते हैं. उचित या अनुचित. उचित के लिये आपको बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, तब जा कर टीवी वाले आपको दिखाते हैं. अनुचित कारण के लिये आपको कुछ नहीं करना. खोजी पत्रकार आपको खोज निकालेंगे और आपको पता भी तब चलेगा, जब टीवी पर आपका अपना स्टिंग ऑपरेशन चल रहा होगा. हर बुरी चीज़ का एक अच्छा पहलू भी होता है. दिनों-दिन भ्रष्टाचार सिर्फ़ इसलिये बढ़ता जा रहा है, क्योंकि हर हाथ में मोबाईल आ जाने और हर जगह सीसीटीवी लग जाने से, भ्रष्टाचार करने में रिस्क बढ़ गया है. भ्रष्टाचारी खुश हैं, उनके रेट बढ़ गये हैं. जब किसी स्टिंग में पकडे जायेंगे, तब देखा जायेगा. कौन सी माया साथ ले कर आये थे. सात पुश्तें तो तर गयीं तो सब वसूल हो गया. शर्म-लिहाज तो तब से ही खत्म हो चुका था, जब से सबको पता चल गया है कि 'हमाम: सर्वत्र व्याप्तम्'. शर्म से तो उन्हें जीना चाहिये, जिन्होंने कपड़े पहन रखे हैं. जिनमें शर्म-लिहाज नाम की चीज़ बची रह गयी है, वही आजकल शर्माये से घूम रहे हैं.  

तो प्रतिदिन अख़बार में एक-दो ख़बरें भ्रष्टाचार की भी नियमित रूप से छप जाना आम बात हो गयी है. अधजल गगरी छलकत जाये तो सुना है, लेकिन जो गगरी आकंठ भरी हो, उसका छलक जाना चिन्तनीय है. कम्पटीशन चल रहा है. देश-प्रदेश के विभाग भ्रष्ट आचरण के नये-नये प्रतिमान गढ़ने में लगे हैं. विशेष कर वे विभाग जिनकी स्थापना ही देश में व्यवस्था बनाये रखने की गयी थी, वे भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रह पाये. अभी हाल-फिलहाल में एक ऐसे विभाग के लोग रंगे हाथों पकड़े गये, जिस विभाग का सृजन ही दूसरे विभागों के भ्रष्टाचरण पर लगाम कसने के लिये किया गया था. वो भी सीनियर लेवल के लोग फँसे थे. सारे मीडिया वाले चीख़-चीख़ कर ये बताने में लगे थे कि ये लोग केवल सीनियर ही नहीं थे, इनके भ्रष्टाचार का लेवल भी अलग था. जाँच एजेन्सी की नोट गिनने वाली दस मशीनें दिन-रात काम करें तो भी सारा माल गिनने में दो-चार दिन लग सकते हैं. हर चैनेल, बाकी सारी ख़बरें छोड़ कर, ये ही बताने में लगा था कि पल-पल की ख़बर का एक्सक्लूसिव कवरेज उसके ही चैनेल पर प्रसारित किया जा रहा है. जनता भी अब अभ्यस्त हो चली है. उसे मालूम है कि ख़बरों की उम्र ही कितनी है. जनता को विश्वास है कि यदि कोई पकड़ भी गया है, तो उसका विभाग उसकी पैरवी के लिये कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा. बड़े काम सिंडिकेट बना कर किये जाते हैं. सिंडिकेट में ऊपर से नीचे तक सभी लोग बराबर के सहभागी होते हैं. और सिंडिकेट का काम है, अपने मेम्बर्स का ख्याल रखना. जो लोग सिंडिकेट द्वारा रचित खाँचे में फ़िट नहीं हो पाते, उनका तो भगवान ही मालिक है. 

ऐसा नहीं है कि देश में ईमानदार और कर्मठ लोगों की कमी है, लेकिन सिस्टम तो सिस्टम से चलता है. सिस्टम में रहना है तो ईमानदारी भी उतनी चाहिये, जितनी सिस्टम में गुन्जाइश हो. सिस्टम वॉल्व की तरह काम करता है. नीचे से ऊपर जाने का तो प्रावधान है, ऊपर से नीचे आने का नहीं. प्रायः ऊपर से नीचे तभी कोई जाता है, जब जाँच की आँच ऊपर वाले तक पहुँचने का अंदेशा हो. नीचे से ऊपर जाने की यात्रा में प्रति वर्ष कर्मचारीयों का वार्षिक आँकलन होना अनिवार्य है. इसमें एक मुख्य कॉलम इंटीग्रिटी यानि सत्यनिष्ठा का होता है, जिसे कोई सीनियर ही सत्यापित करता है कि वर्षपर्यन्त व्यक्ति ने ऐसा कोई कृत्य नहीं किया जिससे इसकी सत्यनिष्ठा पर किसी प्रकार का सन्देह किया जा सके. ऐसे ही व्यक्ति धीरे-धीरे शीर्ष पदों तक पहुँच पाते हैं. किन्तु वर्षों की तपस्या करके, जब शीर्षस्थ पद पर पहुँचा व्यक्ति ही जब भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया जाये, तो पूरी की पूरी व्यवस्था का सन्देह के घेरे में आ जाती है. कोई भी व्यक्ति दिनों-दिन या रातों-रात तो भ्रष्ट नहीं हो जाता. तब लगता है कि भ्रष्टाचार के अन्कुर तो प्रारम्भ से ही विद्यमान थे, समय और प्रोन्नति के साथ उसकी जडें गहरे पैठती गयीं. अब तक वो इनता थेंथर हो चुका होता है कि मात्र फ़ोटो-वीडियो के साक्ष्यों के आधार पर स्वयं को ग़लत मानने से अस्वीकार कर देता है. कानून के जानकार कहते हैं कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाये, व्यक्ति निर्दोष है. कृतिम बुद्धिमत्ता के युग में इस बात का निर्धारण करना अत्यन्त कठिन हो गया कि साक्ष्य भी सही हैं या नहीं. दोष सिद्धि का अधिकार न्यायपालिका का है, स्टिंग ऑपरेशन करने वालों को नहीं. प्रायः न्यायिक प्रक्रिया इतनी लम्बी और जटिल है कि भ्रष्टाचार जैसे मामूली अपराध को सिद्ध करना कठिन हो जाता है. आश्चर्य की बात है कि शीर्षस्थ पद तक पहुँचने और पकड़े जाने से पूर्व, कर्मचारी की इंटीग्रिटी पर किसी को, किसी प्रकार का शुबहा नहीं हुआ. तब समझ आता है कि बॉस लोग नये रंगरूट को सिस्टम समझाने में क्यों लगे रहते हैं. दरअसल किसी की इंटीग्रिटी उर्फ़ सत्यनिष्ठा को वेरीफ़ाई कौन करता है, सिर्फ़ और सिर्फ़ उस का बॉस. शायद इसीलिये अन्ग्रेज़ों के ज़माने से बॉस को लिखे आवेदन में 'योर्स फ़ेथफुली' लिखा जाता था. 'योर्स ऑनेस्ट' भी लिखा जा सकता था, लेकिन तब संशय था कि बार-बार लिखते-लिखते कहीं ऊपर या नीचे वाले की ऑनेस्टी जागृत न हो जाये. सत्यनिष्ठा को वस्तुतः निष्ठावान (वफ़ादारी) का पर्याय मान लिया गया है. यदि आप बॉस के प्रति वफ़ादार हैं, तो आपकी सत्यनिष्ठा 'बियॉन्ड डाउट' है. यदि व्यक्ति, बॉस के बजाय, सिस्टम के प्रति ऑनेस्ट (ईमानदार) है, तो उसकी इंटीग्रिटी डाउटफुल होने की पूरी सम्भावना है. सत्यनिष्ठा ऐसा अमूर्त-निराकार गुणात्मक मानदण्ड है, जिसका परिमाण निर्धारित करना मुश्किल है. यदि आज़ादी के पचहत्तर साल बाद भी देश के कर्मचारियों, वो भी चतुर्थ श्रेणी से लेकर प्रथम श्रेणी तक, को यदि सत्यनिष्ठा की शपथ दिलानी पड़े, तो अब तक की सत्यनिष्ठा पर सन्देह होना लाज़मी है. नौकरी के आरम्भिक चरणों में ही यदि सत्यनिष्ठा के आधार पर प्रोन्नति रोकने प्रावधान हो तो बहुत सम्भव है, उच्च पदों पर भ्रष्ट लोगों के पहुँचने की सम्भावना कम हो जायेगी. भ्रष्ट आचरण में पद में निहित शक्तियों का दुरुपयोग भी सम्मिलित होना चाहिये.  

जिन विकसित देशों के लक्ष्य को हम पाना चाहते हैं, वहाँ सत्यनिष्ठा का पालन करने-कराने के लिये, शपथ का उपयोग शायद ही होता हो. वहाँ इसके अनुपालन के लिये नियम-कानून हैं. कुछ देशों में अब तक की अर्जित सारी आय को जब्त करने के बाद ही दण्डात्मक कार्यवाही होती है. कुछ देशों में 'विश्वास को ठेस' पहुँचाना भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है. इन सभी देशों में भ्रष्टाचार एक संज्ञेय अपराध है, जिसकी सजा चौबीस से अड़तालीस घन्टे में कार्यान्वित कर दी जाती है. 'भय बिना प्रीत' का फ़ॉर्मूला त्रेता युग से लेकर आज तक प्रासंगिक और व्यवहारिक है. यदि मात्र नैतिकता का पाठ पढ़ा कर नागरिक या चरित्र निर्माण हो सकता होता, तो भारत आज विश्व के शीर्ष देशों में शुमार होता. आज़ादी के पचहत्तर साल बाद हम भ्रष्टाचार से निपटने के लिये कारगर उपाय नहीं कर पाये. नियन-कानून तो बने पर उनका अनुपालन करने-करवाने वाले लोग ही भ्रष्ट आचरण में लिप्त हो गये. भ्रष्ट व्यक्ति प्रोन्नति के सभी सोपान पार करते हुये, यदि शीर्ष तक पहुँच जाता है, तो प्रक्रिया में व्यवस्थागत दोष है. जिसे दूर करने के लिये शपथ से अधिक संकल्प की आवश्यकता होगी. यदि अधिकारी के पास अधीनस्थ कर्मचारियों की सत्यनिष्ठा पर निर्णय लेने का अधिकार है तो अधिनस्थों को भी अपने अधिकारी की सत्यनिष्ठा का सत्यापन करने का अधिकार मिलना चाहिये. तब शायद 'सिस्टम में फ़िट' होने के बजाय लोग 'सिस्टम को फ़िट' करने का प्रयास करें.      

वर्षों की ग़ुलामी और जड़ता ने एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण कर दिया है, जिसमें प्रायः सत्यनिष्ठा का सत्यापन उन लोगों के हाथ है, जो स्वयं असत्यनिष्ठ हैं. विश्वासघात या ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट को तो भ्रष्ट आचरण माना ही नहीं जाता. यहाँ सत्यनिष्ठ व्यक्ति के जीवन में संघर्ष कभी समाप्त नहीं होते. यदि आपको सिस्टम का आनन्द लेना है, तो निष्ठावान रहिये, कर्तव्यों के प्रति नहीं, अपने-अपने बॉस और उनके बॉस के प्रति. इसके लिये बस एक बार अन्तरात्मा नाम की चीज़ को दफ़न करने की ज़रूरत है. उसके बाद बॉस की टीम में बॉस के साथ नाचिये-गाइये-ऐश कीजिये और क्या. बाबा दलेर पहले ही कह चुके हैं - साड्डे नाल रहोगे तो, ऐश करोगे, ज़िन्दगी के सारे मजे कैश करोगे. 

अब समय नहीं है, विशेषकर तब जब देश आज़ादी के सौ साल बाद सन 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के दिशा में अग्रसर हो चुका है. देश तो पचास साल पहले ही विकसित हो गया होता, यदि इसने भ्रष्ट आचरण के प्रति ढुल-मुल और लचीला रवैया न अपनाया होता. लेख में लिखे विचार क्रांतिकारी लग सकते हैं, लेकिन परिवर्तन के लिये क्रान्ति की ही तो आवश्यकता होती है. ज़ीरो टॉलरेन्स टू करप्शन. 

-वाणभट्ट 

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