शनिवार, 15 मार्च 2014

पिता की घोषणा

समस्त मानवीय सम्वेदनाओं में लिपटा
संशयों से घिरा
प्रवृत्तियों में जकड़ा   
मै। 

सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ 
स्वयं को 
यह कह सकने में असमर्थ पाता हूँ 
कि 
भगवान हूँ
मात्र इसलिये 
कि 
मै पिता हूँ।  

जन्म के समय 
देखा है मैंने  
प्रभु का अंश 
साक्षात तुझमें। 

यदि सम्भव हो 
तो क्षमा करना  
कि 
पूर्वाग्रहों से ग्रसित 
मैंने प्रयास किया 
भगवान को
इन्सान बनाने का। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 9 मार्च 2014

सहअस्तित्व

जीवन है
किसी भी तरह की
मुक्ति के विरुद्ध

इस काल्पनिक लालसा ने
कर दिया चिंतन 
अवरुद्ध

हर कोई चाहता है मुक्ति
बंधन से मुक्ति
उत्तरदायित्वों से मुक्ति

पर क्या सम्भव है जीवन
बिन
बन्धन

सहअस्तित्व है आधार जीवन का 
सामंजस्य है विपरीत ध्रुवों का

द्वैत
ही तो है
सर्वत्र व्याप्त

तप्त सूर्य और शीतल धरा
चुम्बक का उत्तरी-दक्षिणी सिरा
धनावेश-ऋणावेश
सकारात्मक-नकारात्मक
परमाणु का इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन
सभी पदार्थ में है अणुओं का बंधन
अलग है फ्री रेडिकल्स की कथा
अल्पायु है,
चिपक लिया यदि कुछ खाली मिला

सन्यासी ने जाते हुये 
न देखा मुड़ के
सन्यास भी मिलता है
किसी अज्ञात से जुड़ के

अद्वैत है
तो द्वैत भी है
दो है तभी अलग हैं
तभी जुड़ेंगे
अद्वैत बनेगा   

अकेले को सदैव खोज रहेगी
जो केवल मिल के ही पूरी होगी

विपरीत में है नैसर्गिक सामंजस्य
एक-दूसरे के पूरक
सबकी प्रकृति है पृथक
फिर क्यूँ भटकते हैं मुक्ति के लिए
जो बँट रही है अनायास
और
मिल जाती है बिन प्रयास

दृष्टि न कर सकेगी श्रवण
स्वाद-सुगंध के लिये हैं भिन्न अंग
सहअस्तित्व के लिये नहीं आवश्यक युद्ध-वृत्ति
गढ़ रक्खी है प्रकृति ने,
सहज प्रवृत्ति

सामाजिक विषमताओं 
और 
अधिकार के लिये
तो युद्ध होना चाहिये
पर श्रेष्ठता को मापना
अब बंद होना चाहिये

मुक्ति में नहीं है जीवन
किन्तु
बंधन से ही मुक्ति है सम्भव

दूसरे के बिना पूरक,
आधा और एकाकी है, 
है ना!!! 

- वाणभट्ट

गुरुवार, 6 मार्च 2014

दंश

दंश 

नारी 
जब माँ बनती है 
तो बड़े गर्व से कहती है 
मैंने बेटा जना

जनखों की 
बलैयों पे
देती है सब लुटा 

कभी  
अंदर गहरे 
उतर जाती है 
ये विडम्बना 

पर माँ खुश है 
कि  
नारी होने का दंश
जो  
इस देश में उसने भोगा 
उसकी संतति को 
न भोगना होगा

- वाणभट्ट


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

सम्बल

सम्बल 

झुर्रियों से लदी 
लाठी के सहारे रेंगती बुढ़िया  

चुम्बक लगी लकड़ी से 
लोहा बटोरती बंजारन सी औरत 

कुछ सिक्कों के लिए दिन-रात 
मेहनत करता अपाहिज भिखारी 

ट्रेन से कटी जाँघ पर 
कृत्रिम पाँव बाँधता आदमी 

बजबजाती गलियों में 
घोड़ी के आगे नाचते लोग

तेल चुपड़े बालों को गूँथ 
चटक बिंदी लगाती मजदूरन 

कूड़े में खज़ाना खोजती 
अबोध लड़कियाँ 

गंदे मैले कपड़ों में 
चमकती आँखें वाले बच्चे 

झोपड़ी से आती 
मासूम की किलकारी 

सबूत हैं जीवन का  

जो 
झकझोर के उठा देते हैं 
सोयी पड़ी
जिजीविषा को

और ज़िन्दगी बढ़ जाती है 

- वाणभट्ट   

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

मिशन जीवन - V

ऑपरेशन संतति समाप्ति पर था। अमर-मानसी की संतानें जीवनयुक्त नये ग्रह अर्थेरा पर स्थापित हो चुकीं थीं। अब उनके समक्ष पृथ्वी के लिये 350 वर्षों की लम्बी वापसी-यात्रा की चुनौती थी। अर्थेरा पर सामान्य भोजन और वायु के उपयोग के कारण उनका जीर्णन प्रारम्भ हो चला था। उन्हें यथाशीघ्र मिशन जीवन के अंतिम चरण को कार्यान्वित करना था। अर्थेरा पर कोई भी इनकी भिन्न वेश-भूषा और पद्यतियों के बाद भी दूसरे ग्रह का वासी मानने को तैयार न था। उन्हें पिछले 25 वर्षों में निरंतर यही लगता रहा कि अमर-मानसी किसी विकसित कबीले से निष्काषित युगल हैं।

अर्थेरा आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से पिछड़ा अवश्य था, परन्तु समुदाय के रूप में एक बहुत ही संगठित समूह था। इतने वर्षों में उनका सामना किसी भी अप्रिय घटना से नहीं हुआ था। यदि राजा अपनी प्रजा के प्रति जवाबदेह हो, तो प्रजा भी उसकी आज्ञा को सर-माथे लेती है। पूरा अर्थेरा समाज सभी अपनी आवश्यकताओं और उत्तरदायित्वों का वहन परस्पर मिलजुल के सौहार्द पूर्ण तरीके से करता था। पृथ्वी के सभ्य समाज में व्याप्त आतंरिक विद्वेष का लेशमात्र लक्षण भी पिछले वर्षों में देखने को नहीं मिला। इन 25 वर्षों में कबीले  ने अमर-मानसी के सहयोग से अपनी जीवन शैली में अनेक सुधार किये, परन्तु उनकी मूलभूत व्यवस्था और आंतरिक ताने-बाने में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया। सहअस्तित्व सम्भवतः प्रकृति की मौलिक संरचना है। 

उचित अवसर पर एक दिन अमर-मानसी अपने यान तक गये। अंदर जा कर अपनी पृथ्वी वाली पोशाकों को पुनः धारण किया। यान को धरती पर चलाते हुए उसे अपने कबीले वाले गाँव ले आये। यान पूरे कबीले के लिये कौतुहल का विषय बन गया। दोनों ने सभी कबीले वालों के सामने अपने मिशन जीवन को विस्तार से समझाया। पृथ्वी से लाये चित्रों के द्वारा उन्होंने वहाँ की सभ्यता से सबको अवगत कराने का प्रयास भी किया। दोनों ने समस्त काबिले को उनके सहयोग के लिये धन्यवाद ज्ञापित किया और साम्राज्ञी से अपनी वापसी-यात्रा के लिये अनुमति भी माँगी। उन्हें अब दूसरे ग्रह वाली बातों में कुछ सत्यता तो दिखाई दी। परन्तु पूर्ण प्रमाणिकता तो यान के आकाश में लोप होने के बाद ही हुयी।

यान में बैठने के बाद अमर ने मानसी से कहा अर्थेरा से निकलने के लिये हमें पृथ्वी की डेढ़ गुनी ज्यादा एस्केप वेलोसिटी चाहिये। यहाँ का गुरुत्व बल पृथ्वी की तुलना में ज्यादा है। इसलिये वातावरण को न्यूनतम दूरी में पार करना होगा। उसने प्रक्षेपण के लिये यान में लगे चारों राकेट को एक साथ आरम्भ होने का निर्देश कम्प्यूटर पर दे दिया। उलटी गिनती आरम्भ हो गयी थी। सेकेण्ड अंक के शून्य होते ही कम्प्यूटर ने चारों राकेट एक साथ दाग दिये। यान धरती की लंबवत दिशा में उठ गया और कुछ ही क्षणों में अर्थेरा वासियों की चकित दृष्टि से ओझल हो गया।

अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रहे मुख्य यान से संलग्न होना एक कठिन प्रक्रिया थी। लघु यान और मुख्य यान में माइक्रोवेव संचार के द्वारा अमर ने दोनों यानों को एक ही दिशा के लिए संचालित कर लिया। लघु यान के मुख्य यान में जुड़ने में हुयी एक भी गलती उन्हें सदैव अंतरिक्ष में ही रहने के लिये विवश कर देती। लघु यान को एक बार ही प्रयोग में लाने के लिए बनाया गया था। इसलिये वापस अर्थेरा ले वातावरण में प्रवेश करते ही वो छिन्न-भिन्न हो जाता। लघु यान को इस प्रकार जोड़ना था कि मुख्य यान पर किसी भी प्रकार का बल न लगे अन्यथा मुख्य यान अंतरिक्ष की असीम गहराइयों में डूब सकता था। मानसी ने इस पूरी प्रक्रिया को सहजता से पूर्ण किया। इस कार्य के लिये नियत 30 सेकेण्ड में पूरी क्रिया को संपन्न करना था। अमर ने मानसी को कुशल संचालन के लिये बधाई दी। 

मुख्य यान पर आने के बाद अमर ने यान के ऑटो ट्रैकिंग उपकरण को सक्रिय कर दिया। इस उपकरण में यान के पथ से समस्त आँकड़े उपलब्ध थे। अब यान को स्वचालित प्रणाली में वापस पृथ्वी की कक्षा में स्थित चंद्रमा तक जाना था, जहाँ से इस यान की यात्रा प्रारम्भ हुयी थी। यात्रा लम्बी अवश्य थी पर उबाऊ बिलकुल नहीं। ग्रह-नक्षत्रों को इंफ्रा रेड टेलीस्कोप की सहायता से इतने निकट से देखना एक अलग ही अनुभव था। पुनः अमर और मानसी ने अपनी दिनचर्या को इस प्रकार व्यवस्थित किया कि दोनों में से एक पूर्ण रूप से चैतन्य रहे। श्वांस नियंत्रण और ध्यान का उनका पुराना खेल पुनः आरम्भ हो गया। तीन शताब्दी से अधिक अवधि की यह यात्रा उनके जीवन की अंतिम यात्रा हो सकती थी। अतः वे उसका सम्पूर्ण आनंद लेना चाहते थे।

लगभग 600 वर्ष बीत चुके थे जब उन्होंने सौर्य मंडल में प्रवेश किया। इन वर्षों में सूर्य मंडल कुछ बदल सा गया था। शनि के वलय समाप्त हो चुके थे। बृहस्पति के आकार में भी कमी आ गयी थी। मंगल की लालिमा में कुछ हरा-नीला रंग भी सम्मिलित था। मंगल और बृहस्पति के बीच एक पृथ्वी जैसे एक नये ग्रह का प्रादुर्भाव हो रहा था। पृथ्वी के चारों ओर दो-दो चन्द्र परिक्रमा कर रहे थे। ये सब उनके किये एक सुखद स्वप्न जैसा था। छः सौ साल पहले कोई ये कल्पना भी नहीं कर सकता था कि सौर्य मंडल में इस प्रकार परिवर्तन भी हो सकता है। दोनों को हर्ष था कि  वे इस घटना के साक्षी बने।उनकी यात्रा का अंत निकट आ रहा था। मात्र 45-50 वर्ष और। 

अमर-मानसी ने यान की स्वचालित प्रणाली को बंद कर यान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सबसे पहले उन्होंने चन्द्र अंतरिक्ष केंद्र से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। उधर से कुछ अस्फुट से सन्देश आ रहे थे। सन्देश कि भाषा भी उनकी समझ में नहीं आ रही थी। उन्हें लगा कि कहीं भारतीय अंतरिक्ष केन्द्र पर किसी अन्य देश ने अधिपत्य तो नहीं जमा लिया। दो चंद्रमाओं ने उनकी निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर दिया था। अमर ने मानसी से कहा धरती वालों ने लगता है चाँद के भी टुकड़े कर डाले। मानव के विकास और विनाश में अधिक अंतर नहीं है। अर्थेरा के लोग एक सम्पूर्ण जीवन जी रहे हैं। जबकि धरती पर इंसान तकनीक और क्षमताओं का उपयोग प्रकृति पर शासन करने के लिए कर रहा है।भारत का अंतरिक्ष केंद्र किस चाँद पर है, यह खोज पाना असम्भव सा लग रहा है। हम सीधे पृथ्वी पर प्रवेश करें। ये ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है, मानसी ने अपनी सहज प्रतिक्रिया दे दी थी। 

अमर ने यान की दिशा पृथ्वी की ओर मोड़ दी। वातावरण के घर्षण से उत्पन्न यान के वाह्य तापमान को अनुज्ञेय सीमा से अंदर रखने हेतु अमर ने संक्षिप्त मार्ग का अनुसरण करते हुये वातावरण में प्रवेश लिया। अर्थेरा पर उतरने की पुनरावृत्ति करते हुये शीघ्र सम्पूर्ण यान पृथ्वी की विशाल जल राशि में समा गया। कुछ क्षणों के बाद यान समुद्र की सतह पर तैर रहा था। अपनी इस यात्रा को समाप्त करके अमर-मानसी के आनंद का ठिकाना नहीं रहा। वो हर्षातिरेक में चीख पड़े। यह यात्रा और उनका जीवन एक स्वप्न से कम नहीं था। सामान्य होने के बाद दोनों ने एक साथ  यान के प्रकोष्ठ से बाहर कदम रखा ही था कि उन्होंने यान को चारों तरफ से अन्य स्टीमरों से घिरा पाया। स्टीमरों पर सवार सभी की स्वचालित बंदूकों का लक्ष्य अमर-मानसी ही थे। उस समूह के मुखिया ने कुछ कहा। उसकी भाषा दोनों की समझ से परे थी। ये वही अस्फुट सी भाषा थी जिसे उन्होने चन्द्र अंतरिक्ष केन्द्र से संपर्क साधते हुए सुनी थी। दोनों ने क्षीण सी मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये। 

चारों ओर से घेर कर उन्हें उनके यान के साथ निकटस्थ तट तक लाया गया। वहाँ पर यान को उस समूह ने अधिकृत कर लिया। अमर-मानसी को बंधक बना कर मुखिया सिपाहियों की एक टुकड़ी के साथ एक गाड़ी में शहर की ओर चल दिया। उन्नति के सन्दर्भ में ये देश 700 साल पहले छोड़े भारत से आगे लग रहा था। लगभग उस समय के अमेरिका जैसा। शीघ्र ही वे लोग एक विशाल भवन के सामने थे। उस भवन पर अंकित संकेत चिन्हों से अमर-मानसी ने अनुमान लगा लिया कि यह इस देश की अंतरिक्ष संस्था है। इसी ने अमर के माइक्रोवेव तरंग सन्देश का अंतरावरोधन किया होगा और तब से ही ये लोग यान के पृथ्वी पर प्रवेश की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। अमर-मानसी संतुष्ट थे कि वे वापस अपनी धरती पर आ गये हैं। दोनों ने किसी प्रकार का विरोध करना उचित नहीं समझा। उन्हें आशा थी कि शीघ्र ही वे अपनी बात इन लोगों को समझा सकेंगे। 

एक प्रतीक्षा कक्ष में दोनों को बैठा दिया गया। सिपाहियों का मुखिया भी उनके साथ बैठ गया। उसने अपनी भाषा में कुछ बात करने का प्रयास किया। थोड़ी ही देर में वे संकेतों की भाषा में कामचलाऊ बात कर रहे थे। शीघ्र उनकी प्रतीक्षा समाप्त हुयी। भीतर एक सभा कक्ष में कई लोग उपस्थित थे। सभा में उपस्थित लोगों ने अमर-मानसी से कई सवाल पूछे परन्तु वे विचारों का आदान-प्रदान कर सकने की स्थिति में नहीं थे। सभा की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति ने अमर को एक विशेष कुर्सी पर बैठने का आदेश दिया। उनके पूरे शरीर को कुर्सी पर पट्टों की  सहायता से बांधने के पश्चात् उनके सर पर एक टोपी जैसा यंत्र लगा दिया गया। उसे आशा थी कि अब शायद बिजली के झटके दिये जायेंगे, परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। अध्यक्ष ने संकेत से अमर को अपनी बात कहने के लिये कहा। कुछ ही देर में अमर जो-जो सोच कर बोल रहे थे वो चलचित्र की भाँति सामने परदे पर दिखाई देने लगा। सभा में उपस्थित लोग कभी कौतुहल तो कभी असमंजस में वो दृश्य चित्र देख रहे थे। अमर ने अपनी पूरी यात्रा को अक्षरशः चित्रपट पर प्रदर्शित होते देखा। सभी पूरी तरह शान्त बैठे थे। पूरा वृतान्त समाप्त होते ही सभागार करतल ध्वनि से गूंज गया। सब लोग अपने स्थान पर खड़े हो गये थे।

मानसी सभाकक्ष के कोने में रखे ग्लोब को एकटक देख रही थी। उस पर अंकित महाद्वीप पृथ्वी के महाद्वीपों से अलग जान पड़ रहे थे।

(समाप्त)

- वाणभट्ट  

सोमवार, 13 जनवरी 2014

मिशन जीवन - IV

इस घटना से इतना तो तय हो गया कि जितना पिछड़ा अमर अर्थेरा वासियों को मान रहा था, वो उससे कहीं आगे थे। उन्हें अयस्क से इस्पात बनाने की विधि का ज्ञान था। तलवार की तीव्र चुभन दोनों के शरीर पर बढती ही जा रही थी। अमर का हाथ त्वरित प्रतिक्रिया में अपने स्वचालित रिवॉल्वर की ओर बढ़ा ही था कि मानसी ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया। उसने लगभग चिल्ला के कहा हम यहाँ लड़ने नहीं आये हैं। प्रतिउत्तर में अमर ने कहा कि हम मरने भी तो नहीं आये हैं, प्रिये। देखो ये क्या करते हैं, मानसी ने कहा। तलवार के कुछ नियंत्रित प्रहारों से अमर-मानसी के वस्त्र भूमि पर आ गिरे। ये सौभाग्य ही था कि उनके हथियार वस्त्रों के भीतर ही छिपे रह गये। दोनों के नग्न शरीर को देख कर उपस्थित जन समुदाय में हर्ष की लहर दौड़ गयी। दूसरों का नग्न शरीर धरती पर भी हास्य का विषय हो जाता है, जब अन्य सभी के शरीर वस्त्रों से ढंकें हों। बच्चों के ठहाकों ने उस स्तब्ध सभा में गुंजायमान हो गये। अब अमर-मानसी ने गौर किया कि वहाँ उपस्थित सभी बच्चों की आयु 10 वर्ष या उससे अधिक थी। एक वर्ष से छोटे बच्चे अपनी माँओं के गोद की शोभा बढ़ा रहे थे। दोनों ने ग्रह वासियों की नितांत मानवीय भावना को सहज स्वीकार किया। संदिग्ध व्यक्ति का स्वागत नये देश में कुछ इसी प्रकार होता आया है। इस परिस्थिति में ये अनिवार्य भी था। भवन के अंदर गयी स्त्री उनके लिये अर्थेरा वासियों जैसे वस्त्र ले कर मंच पर आ चुकी थी। उन वस्त्रों को धारण करने के बाद अमर-मानसी को आम अर्थेरा वासियों से अलग पहचान पाना कठिन था। कबीले की साम्राज्ञी ने सिपहसालार जैसे व्यक्ति को कुछ और निर्देश दिये। और सभा विसर्जित हो गयी।

सिपहसालार अमर-मानसी को मुख्य भवन के समीपस्थ एक गृह में ले गया। अपनी भाषा में उसने कुछ कहा। अमर-मानसी को लगा कि ये उनके रहने की व्यवस्था है। अमर अपने और मानसी के फटे वस्त्रों को समेट लाया था। उसे डर था कि उनके स्वचलित हथियार किसी और के हाथ न पड़ जायें। इस समय उनके पास पृथ्वी के सिर्फ दो चिन्ह ही रह गये थे, फटे वस्त्र और लघु हथियार। वो गृह नहीं था। घर के नाम पर मिट्टी की चार दीवारें थीं और ऊपर था फूस का छाजन। गृह के अंदर सोने के लिये उच्च स्थान पर फसलों के पुआल से यथासम्भव नर्म शैय्या बनायी गयी थी। पेड़ के तनों को काट कर बैठने की व्यवस्था थी। एक द्वार प्रवेश के लिये अग्र भाग में था। दूसरा पीछे की तरफ खुलता था, जहाँ शौच और स्नानागार नियत स्थान पर प्रतिष्ठित थे। आवरण विहीन द्वारों से आता प्रकीर्णन-प्रकाश गृह के कोने-कोने को आलोकित कर रहा था। अमर ने शाम को उस गृह से बाहर निकलने का प्रयास किया तो दोनों द्वार पर दो-दो सशस्त्र व्यक्तियों ने उन्हें बाहर निकलने से रोक दिया। यानि उनकी उपस्थिति के प्रति अर्थेरा वासी अभी भी संदिग्ध थे। उनका विश्वास प्राप्त करने के लिये उन्हें यान तक जाना आवश्यक था। जहाँ से वो उनके लिये पृथ्वी से लाये उपहार ला सकें। उन्हें रात्रि की प्रतीक्षा करनी होगी। यहाँ रात भी बीस घंटे की होती थी। मानवीय स्वभाव के अनुसार रात्रि में सामान्य व्यक्ति के लिये अपनी चैतन्यता को बनाये रखना दुष्कर हो जाता है।

मुख्य ग्रह जिबेका से परावर्तित प्रकाश के कारण अर्थेरा पर रात्रि में भी अप्राकृतिक प्रकाश की आवश्यकता नहीं थी। लगभग तीन महीने से अधिक समय अर्थेरा पर व्यतीत कर लेने के पश्चात् अमर-मानसी की जैविक घड़ी ग्रह के अनुकूल हो चली थी। पूरा दिन दोनों ने भरपूर नींद का आनन्द लिया। रात्रि होने के बाद चौथे प्रहर तक का समय दोनों ने बिना नींद के व्यतीत किया। उस समय तक सभी प्रहरी गहन निद्रा में डूब चुके थे। आदिवासी वस्त्रों में उन्हें चलने में कठिनाई का अनुभव हो रहा था। संयोग से उनके जूतों पर किसी का ध्यान नहीं गया था, अन्यथा जंगल में नये मार्ग पर चलना और भी दुरूह हो जाता। आत्मसुरक्षा की दृष्टि से अमर ने अपना स्वचालित हथियार साथ ले लिया था। वे यथाशीघ्र यान से उपहार ले कर दिन निकलने से पूर्व बंदी गृह लौट आना चाहते थे। वे यान के निकट पहुँचने ही वाले थे कि एक तीर सरसराता हुआ मानसी के सर के पास से निकल गया। त्वरित प्रतिक्रिया में अमर ने रिवाल्वर से मनुष्य की सामान्य ऊंचाई से ऊपर एक गोली दाग दी। जंगल का निस्तब्ध वातावरण गोली की ध्वनि से गूँज गया। जिस व्यक्ति ने तीर चलाया था, धराशायी हो गया। मानसी ने अमर को डाँटा तुम्हें ये हथियार ले कर नहीं आना चाहिए था। दोनों दौड़ते हुये उस व्यक्ति के पास पहुँचे। वो कोई और नहीं सिपहसालार था। धमाके की आवाज़ सुन कर वो दहशत से गिर गया था, अन्यथा उसे कुछ भी नहीं हुआ था। अमर ने मुस्करा कर मानसी की ओर देखा। अपनी रिवॉल्वर मानसी को देते हुए उसने कहा तुम इन भाईसाहब को सम्हालो, मै इनके लिये मित्रता की कुछ भेंट ले कर आता हूँ। देखना किसी भी परिस्थिति में इन्हें यान का पता नहीं लगना चाहिये।

कुछ समय बाद अमर दो बड़े-बड़े थैलों में कुछ सामान ले कर आ गया। सिपहसालार अभी तक भय से उबर  नहीं पाया था। अमर ने उसे पृथ्वी से लायी एक चॉकलेट दी। वो उसे कुछ देर तक उलटता-पलटता रहा। मानसी ने उसकी सहायता के लिये चॉकलेट का बाहरी आवरण उतार दिया। अमर ने उसे खाने का संकेत दिया। सिपहसालार ने क्षणिक दुविधा के साथ इस नये पदार्थ को सूँघा फिर अपनी जिव्हा से चखा। तुरंत ही उसके मुख पर आनंद के भाव आ गये। अमर ने उसे गले से लगा लिया। ये उनकी मैत्री का आरम्भ था। अमर-मानसी को हर्ष था कि जिस प्रथम अर्थेरावासी ने उन पर विश्वास किया वो उस कबीले का मुख्य सिपहसालार था। उन्हें आशा थी कि अब उनके लिए अर्थेरावासियों का हृदय परिवर्तन करना कतिपय सहज होगा। 

गाँव तक पहुँचते-पहुँचते दिन निकल आया था। मंच पर साम्राज्ञी अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ विराजमान थीं। गाँव के सभी लोग मंच के नीचे बैठे हुये थे, जब इन लोगों ने सभा में प्रवेश किया। अमर-मानसी के भाग जाने का समाचार फ़ैल चुका था। सिपहसालार ने अपनी भाषा में पूरा वृतांत कह सुनाया। मंचासीन सभी के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान दौड़ गयी थी। अमर-मानसी ने सभी का हाथ हिला कर अभिवादन किया। अपने थैलों से सभी को कुछ न कुछ उपहार दिया। सुंदर आवरण में बँधे उपहारों और चॉकलेटों ने समस्त अर्थेरावासियों को आनंदित कर दिया। सभा के विसर्जित होने तक अमर-मानसी को ये विश्वास हो चला था कि वे अर्थेरावासियों के हृदय परिवर्तन के अपने अभियान में सफल हो गए थे।

इसका प्रमाण भी उन्हें शीघ्र मिल गया। उनके द्वारों पर यवनिका लगा दी गयी थी और प्रहरियों को भी हटा लिया गया। अब वे एक आम अर्थेरा वासी की तरह जीवन जीने को स्वतन्त्र थे। वहाँ की भाषा सीखना, अब उनका मुख्य लक्ष्य था। कुछ महीनों के मेलजोल में ही वे लोग कबीलों की स्थानीय भाषा में दक्ष हो गये। इन कबीलों का जीवन पृथ्वी के किसी सामान्य आदिवासी जीवन से अलग नहीं था, अपितु वे कुछ विषयों में पृथ्वी के आदिवासियों से अधिक समृद्ध और संस्कारवान थे। वहाँ स्त्रियों और पुरुषों को सामान रूप से देखा जाता था। प्रत्येक कार्य क्षेत्र में स्त्री-पुरुष को सामान प्रशिक्षण दिया जाता था। स्त्रियाँ शिकार और खेती में उसी प्रकार प्रवीण थीं, जैसे पुरुष गृहकार्यों में। सभी काम मिल-जुल कर किया जाता। हर्ष-उल्लास के आयोजनों में भी दोनों की भागीदारी होती। ये भी पता चला कि अर्थेरा पर अन्य कबीले भी हैं। आपस में संघर्ष न हो इसलिये ये आपस में एक निश्चित दूरी नियत रखते हैं। इस लक्ष्मण रेखा का सभी कबीले सम्पूर्ण पालन करते थे। ग्रह पर जगह की कमी नहीं थी इसलिये आपसी सामंजस्य को बनाये रखने के लिये एक कबीला किसी दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता था। सभी कबीलों पर महिलाओं का शासन था। अमर ने अनुभव किया कि महिला प्रशासक अपनी प्रजा के लिये अधिक संवेदनशील होती है। सम्भवतः अर्थेरा पर जीवन इसीलिये बहुत सौहार्दपूर्ण था। 

एक से दस वर्ष आयु तक के बच्चों की देखरेख कुछ महिलायें एक पृथक स्थान पर करतीं। दस वर्ष की आयु पूरी कर लेने के बाद बच्चे बड़े लोगों के साथ काम करके जीवन के लिये आवश्यक गतिविधियों में निपुणता पाते। वयस्क अवस्था तक आते-आते सभी स्त्री-पुरुष भवन निर्माण, पत्र-वस्त्र बनाने, अन्न उत्पादन, शिकार, आत्म रक्षा, हथियार और औजार बनाने की कला में पारंगत हो जाते। यहाँ एक मुख्य बात थी कि बच्चों में किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं था। बच्चे कबीले के होते थे और उनका लालन-पालन का उत्तरदायित्व भी कबीले का होता। उनका विवाह अपनी पसंद से होता केवल सम्पूर्ण सभा में स्त्री-पुरुष को एक बार एक-दूसरे का सानिध्य स्वीकार करना होता। इसके बाद पूरा कबीला उन्हें घर बनाने में सहायता करता। द्वार पर लगी यवनिका उस गृह में विवाहित युगल के होने का द्योतक था। अतिशय वृद्ध लोगों के लिये भी पृथक व्यवस्था थी। रोगियों के लिये रुग्णालय था। बाल आश्रम, वृद्धाश्रम और रुग्णालय सभी का कार्यभार पूरा कबीला वहाँ करता।   

अमर-मानसी ने कबीलों के इस समूह की भाषा को लिपिबद्ध करना सिखाया। उन्हें अंक ज्ञान, कैलेण्डर और गणनाओं को अवधारणा से परिचित कराया। पृथ्वी पर प्राप्त किये अपने ज्ञान को उन्होंने कबीलाई भाषा में समझाया और लिपिबद्ध किया। इस समूह के साथ वो अपना सम्पूर्ण ज्ञान साझा कर लेना चाहते थे। कपास के बीज, जो वे पृथ्वी से लाये थे, से कपास की खेती और उसके रेशों से कपडे बनाना सिखाया। लकड़ी की लुगदी से कागज़ का उत्पादन कि विधि भी सिखायी। अगले अर्थेरा के चार वर्षों में मानसी ने दो स्वस्थ पुत्रियों को जन्म दिया। जिन्हें एक वर्ष की अवधि के पश्चात् बाल गृह में भेज दिया गया। बीस वर्ष की आयु होने पर के होने पर दोनों उसी कबिले में अपना विवाह करके जीवन व्यतीत करने लगीं। प्रायः अमर-मानसी बातें करते कि अर्थेरा के अन्य किसी भाग पर विकसित जीवन भी हो सकता है। उन्होंने अर्थेरा का मात्र एक जीवन देखा था। यदि कोई पृथ्वी के आदिवासी क्षेत्र में पहुँच जाये तो बहुत सम्भव है, वो पूरी पृथ्वी को उतना ही पिछड़ा मानने की भूल कर बैठे। कभी-कभी अमर उस जहाज का उल्लेख भी करता, जिसे उसने अर्थेरा पर उतरने के बाद दूरबीन से देखा था।अर्थेरा की धरती पर कदम रखे हुये अमर-मानसी को 25 वर्ष हो चुके थे। उनके जीर्णन की गति ऑक्सीजन के आधिक्य से प्रभावित होने लगी थी। अभी उन्हें अभियान का अंतिम चरण पूरा करना बाकी था। 
(क्रमशः )
- वाणभट्ट

बुधवार, 8 जनवरी 2014

मिशन जीवन - III

अर्थेरा पर उतरने से पूर्व अमर-मानसी ने ग्रह की एक पूरी परिक्रमा कर लेना उचित समझा। इस परिक्रमा के दौरान यान में लगे संवेदी उपकरणों ने दर्शा दिया कि पानी की वाष्प और ऑक्सीजन वातावरण में  प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। संवेदनशील कैमरों ने ग्रह के तीन-चौथाई हिस्से पर पानी जैसे पदार्थ की पुष्टि भी कर दी। इस ग्रह पर भी भूमि महाद्वीपों और द्वीपों के रूप में अवस्थित थी। ऊँचे हिम आच्छादित पर्वत थे, घने जंगल थे, झील और नदियाँ भी। जीवन की सारी सम्भावनाओं से भरा हुआ था, अर्थेरा। धीरे-धीरे यान ने ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश किया। गणनाओं के आधार पर तय हो गया कि ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में दो गुना ज्यादा था। इस कारण यान की गति अपेक्षा से अधिक रूप से बढ़ती जा रही थी। सिर्फ अर्थेरा का वातावरण ही यान की गति के विरुद्ध कार्य कर रहा था। वातावरण के प्रतिरोध के कारण यान का वाह्य तापमान बढ़ता जा रहा था। वाह्य तापमान 1650 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। वाह्य तापमान का प्रभाव दोनों यान के भीतर भी महसूस कर सकते थे। यान की ताप अवरोधी सतह को 1800 डिग्री के लिए डिज़ाइन किया गया था। उन्हें डर था कि इस सीमा के बाद यान एक अग्नि के गोले में ना परिवर्तित हो जाये। इसलिये तापमान की उच्चतम सीमा तक पहुँचने से पहले उनके लिए यान को अर्थेरा पर सकुशल उतारना आवश्यक था। अंतः न्यूनतम दूरी वाले मार्ग का चयन किया गया। मानसी ने यान को उस दिशा में मोड़ दिया जिधर यान का अल्ट्रासोनिक उपकरण जल की अधिकतम गहराई प्रदर्शित कर रहा था। यान अब पूरी तरह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में था। उसकी गति को किसी भी तरह नियंत्रित कर पाना अब उनके हाथ में नहीं था। एक दहकते हुये उल्का पिंड की तरह लघु यान अर्थेरा के समुद्र की अथाह गहराइयों में समा गया। लघु यान का निर्माण ऐसे कम्पोज़िट मैटेरियल से किया गया था, जिसका घनत्व जल से कम था। इसलिये यान के जल में डूबने की सम्भावना नहीं थी। बस भय था उच्च तापमान पर इस पदार्थ का पानी से किसी भी प्रकार संपर्क यान को पिघला देता। तापमान वृद्धि से यान की बाहरी परत में दरार पड़ने की सम्भावना थी। डर जल के नीचे स्थित किसी अदृश्य चट्टान का भी था। संयोग से यान की बाहरी सतह पर कोई दरार नहीं आयी, ना ही जल प्रवेश में कोई अवरोध। 

कुछ ही समय में यान जल की सतह पर आ गया। अब वह यान एक जलपोत के रूप में कार्य कर रहा था। बाहर का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस था। अमर और मानसी शीघ्रातिशीघ्र अर्थेरा के वातावरण में साँस लेने को लालायित थे। पोत के कक्ष से बाहर निकल कर उन्होंने धीरे से नये वातावरण में पहली साँस ली। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब एकदम शुद्ध ऑक्सीजन ने उनके शरीर में प्रवेश किया। हर्षातिरेक में अमर ने मानसी को आलिंगनबद्ध कर लिया। पृथ्वी और अर्थेरा के वातावरण में कोई विशेष अंतर भी महसूस नहीं हो रहा था। सिवाय इसके कि यहाँ आकाश के हरा होने का आभास होता था। वातावरण में उपस्थित वायु कण प्रकाश अपवर्तन और प्रकीर्णन का निर्धारण करते हैं। आकाश के प्रतिबिम्ब के कारण समुद्र का जल भी हरा दिखाई देता था। समुद्र के जल में हरित शैवालों की उपस्थिति इस विशाल जल राशि को गहन हरीतिमा प्रदान कर रही थी। पोत को समीपस्थ भूमि की दिशा में मोड़ दिया गया। मिशन का मुख्य कार्य जीवन की खोज संपन्न हो गया था। अमर-मानसी ने ऐसे ग्रह पर पदार्पण कर दिया था, जिस पर जीवन की सारी सम्भावनायें विद्यमान थीं। मन ही मन दोनों ने डॉ संदीपन को नमन किया। उनकी प्रेरणा और इस मिशन के प्रति उनका विश्वास आज पृथ्वी के 300 वर्षों बाद फलीभूत हुआ। उन्हें इस बात के लिए गर्व की अनुभूति भी हुयी कि यह महती कार्य उनके द्वारा संपन्न हुआ।

अर्थेरा के तीन माह की अनवरत जल यात्रा के पश्चात दोनों ने स्वयं को अर्थेरा की धरती पर पाया। इस यात्रा में उन्होंने स्वग्रहित सभी प्रतिबंधों से स्वयं को मुक्त कर लिया। साँसों का नियंत्रण अब तक उनकी मूल प्रवृत्तियों में रच-बस गया था। नव ग्रह पर संसर्ग-सुख उनकी इस चरम तपस्या की अंतिम परिणति नहीं था। उन्हें इस ग्रह पर ऑपरेशन संतति पर भी कार्य करना था। लक्ष्य के अनुसार उन्हें अगले 20-25 वर्षों में प्रजनन और संतति को स्थापित करके वापस पृथ्वी की ओर लौटना था। अन्यथा इस खोज का पृथ्वी वासियों के लिए कोई महत्त्व न होता। ये एक एकल मार्ग यात्रा मात्र रह जाती।  छः - सात सौ वर्षों की अवधि में 20-25 वर्ष का महत्त्व कुछ घंटों से अधिक नहीं था। इस युगल के पास व्यर्थ करने के लिये समय नहीं था।

लघु यान या पोत ही अमर-मानसी का स्थायी घर बन गया था। मौका मिलते ही ये यान सहित अगले ठिकानों पर बढ़ते जाते। अर्थेरा की धरती पर जीवन के सभी लक्षण विद्यमान थे। समुद्री जीव-जंतु के दर्शन तो पहले ही हो चुके थे। भूमि पर पशु-पक्षी भी बहुतायत में थे। किसी भी अद्भुत या विचित्र प्राणी से इनका सामना अब तक नहीं हो पाया था। अंतिम आशा मानव पर ही टिकी हुयी थी। पृथ्वी पर अधिकांश सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर ही हुआ था। इस परिकल्पना के आधार पर उन्होंने नदियों की तलाश आरम्भ कर दी। यहाँ 20 घंटों का दिन उन्हें अपने खोज अभियान में भरपूर सहयोग देता महसूस होता था। एक दिन उन्हें समुद्र की क्षितिज पर कुछ गतिविधि दिखायी दी। दूरबीन से उन्हें एक जहाज़ जैसी आकृति का आभास हुआ। अथक प्रयास के बाद वे एक नदी के मुहाने पर थे। यहाँ से उन्होंने धारा के विपरीत दिशा अपना ली। वे प्रति दिन मुख्य भूमि भीतर चलते चले जा रहे थे। उन्हें मानव जीवन की पुष्टि के संकेत भी मिलने लगे। कभी एकांत जंगल में पताकाओं का होना। कभी नदी के जल में अप्राकृतिक वस्तुओं की उपस्थिति उनकी अवधारणा को बल देती थी। एक टूटी नौका का कुछ हिस्सा उनके यान के निकट से बह निकला था। उन्हें ये विश्वास भी हो रहा था कि यदि इस ग्रह पर मानव हैं, तो मानवीय भावनायें भी होंगी। कहीं किसी ने अनायास हमें अपना शत्रु समझ लिया तो अकारण युद्ध की स्थिति बन जायेगी। ये तो तय था कि इस ग्रह की सभ्यता पृथ्वी जैसी विकसित नहीं जान पड़ रही थी। अमर-मानसी के स्वचालित हथियारों का सामना करना इस ग्रह के वासियों के लिए सम्भव न होता।

एक स्थान पर पहुँच कर दोनों ने पैदल यात्रा करना उचित समझा। यान को नदी के किनारे उच्च स्थान पर छिपा कर रख दिया। वे संभल-संभल नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ रहे थे। हर आहट के प्रति सजग और चौकन्ने। मानव की उपस्थिति के संकेत बढ़ते ही जा रहे थे। फलों के बाग और खेतों को देख कर कहना कठिन हो रहा था कि वे किसी अन्य ग्रह पर हैं सिर्फ़ आकाश और जल की हरीतिमा उन्हें याद दिलाती थी कि वे पृथ्वी पर नहीं हैं। शीघ्र ही उन्हें एक मंदिर जैसे भवन के दर्शन हुए। ये भवन ज्यादा बड़ा तो नहीं था परन्तु उस पर विद्यमान पताकाओं ने उसे एक पूजनीय स्थल का रूप दे रक्खा था। दोनों ने अपनी हिन्दू प्रवृत्ति के अनुसार चरण पादुकायें उतार कर मंदिर में प्रवेश किया। अंदर एक मूर्ति स्थापित थी। उसके निकट पूजन सामग्री रक्खी थी। एक फूस की चटाई मूर्ति के सामने बिछी हुई थी। मंदिर की साफ़-सफाई वहाँ लोगों के नियमित आने की पुष्टि कर रही थी। दोनों ने श्रद्धा भाव से हाथ जोड़ कर अर्थेरा के प्रथम देव का आराधन किया। फिर दोनों अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही दरी पर ध्यानावस्थित हो कर बैठ गए। श्वांस-प्रश्वांस का उनका मानसिक खेल प्रारंभ हो चुका था।

कितनी देर वे इस अवस्था में रहे ये भान उन्हें नहीं रहा। सहसा अमर ने अपने मस्तक पर मानसी के स्पर्श का अनुभव किया। उसने धीरे से अपनी आँखें खोल कर मानसी की ओर देखा। मानसी ने उसे चारों ओर देखने का संकेत किया। कई लोगों ने उनको घेर रक्खा था। उसने द्वार की दिशा में दृष्टि डाली। द्वार के बाहर भी उसे लोगों की गतिविधि का अनुभव हुआ। वहाँ से निकल भागने का कोई अवसर नहीं था। और वे लोग मानव खोज के लिए आये थे इसलिये उनको भागने की आवश्यकता भी नहीं थी। दोनों ने सहज रूप से हाथ ऊपर उठा दिये। किसी भी प्रकार कि हड़बड़ी नये लोगों में अविश्वास उत्पन्न कर सकती थी। उनमें से एक व्यक्ति ने इन्हें बाहर निकलने का संकेत किया। दोनों ने बाहर निकल कर अपनी पादुकाओं को पहन लिया। उन्हें इन व्यक्तियों और स्वयं में कोई विशेष अंतर नहीं दिख रहा था, सिवाय इसके कि इनकी सभ्यता पृथ्वी से हज़ारों वर्ष पुरानी लग रही थी। एक जो सबसे बड़ा अंतर था वो थी उनकी वेशभूषा। इनके कपड़े पृथ्वी के सामान्य कपडे थे, पैंट-शर्ट परन्तु अर्थेरा वासियों ने भिन्न प्रकार के पत्र-वस्त्रों से अपने शरीर को ढँक रखा था। एक व्यक्ति आगे चल रहा था और 15 -20 लोग इनके पीछे।

जैसे ही इस दल ने आवासीय क्षेत्र में प्रवेश किया, अन्य सामान्य जन भी इस दल में शामिल होते गये। स्त्रियाँ, पुरुष और बच्चे-कच्चे मार्ग के किनारे खड़े इन्हें कौतूहल से देख रहे थे। मार्ग के दोनों ओर कतारबद्ध तरीके से घरों का निर्माण किया गया था। प्रत्येक घर के बीच एक निश्चित दूरी थी। मकान कच्चे थे और मिटटी के बने हुये थे। छत के लिये घास-फूस का प्रयोग किया गया था। सभी घर एक ही प्रकार के थे। घरों के द्वार पर जूट के परदे लगे हुए थे। घरों के पिछले हिस्से में स्नानागार तथा शौचालय की व्यवस्था दिखाई दे रही थी। उनके भी पीछे खेती के संकेत भी मिल रहे थे। इतने साधारण रहन-सहन में भी एक असाधारण बात थी, वहाँ की साफ़ सफाई। सभी घर असामान्य रूप से स्वच्छ लग रहे थे। पत्र-वस्त्र भी मानो नये हों। मार्ग के अंत में एक वृहद् आकार का भवन था। ये भी मिटटी से ही निर्मित था परन्तु इसकी ऊंचाई और आकार इसे अन्य भवनों से विशिष्ट बनता था। भवन का मुख्य द्वार 5 फिट की ऊंचाई पर था। मुख्य द्वार के सामने एक सिंघासन नुमा तख़्त पड़ा था। उसके बगल में तीन छोटे सिंघासन दाईं और बायीं ओर लगे हुये थे। अमर-मानसी को लगा कि ये यहाँ के राजा का घर हो सकता है।  

सबसे आगे चल रहे व्यक्ति ने सिंघासन के बगल में रखे एक ढोल नुमा यंत्र से कुछ सन्देश भेजा। थोड़ी ही देर में लगता है सारे गाँव के निवासी उस स्थान पर एकत्र हो गए। कुल जमा संख्या सभी पुरुषों, महिलाओं बच्चों को मिला कर 100-150 की रही होगी। सभी आयु वर्ग के लोग इस समूह में उपस्थित थे। अमर-मानसी इस बात से प्रसन्न थे कि उन्होंने एक अन्य जीवित ग्रह की खोज कर ली है। इंसान एक सामाजिक प्राणी है, तो अन्य ग्रह पर भी उनके कुछ चाल-चलन होंगे, कुछ मान्यताएं और रिवाज़ भी होंगे। उन्हें ख़ुशी इस बात की भी थी उनका सामना किसी अजीबोगरीब एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल प्राणी, जैसे हॉलीवुड फिल्मों में दिखाये गये थे, से नहीं हुआ था। किसी विदेशी को देख कर जैसा धरती के लोग व्यवहार करते उससे भिन्न नहीं था इन अर्थेरावासियों का व्यवहार। उसी व्यक्ति ने पुनः ढोल पर भिन्न तरह की थाप दी। लोग कुछ सावधान सी मुद्रा में खड़े हो गये। भवन के द्वार से छः स्त्रियाँ बाहर निकल आयीं। और मुख्य सिंघासन के समीप स्थित छोटे सिंहासनों के सामने आ कर खड़ीं हो गयीं। अंत में एक अत्यंत गरिमा से युक्त स्त्री का पदार्पण हुआ। निसंदेह वो इस कबीले की साम्राज्ञी लग रही थी। उसके आसन पर बैठते ही मंचासीन सभी स्त्रियाँ यथास्थान बैठ गयीं। जनता भी अपने-अपने स्थान पर बैठ गयी। जिस व्यक्ति के नेतृत्व में अमर-मानसी को यहाँ लाया गया था उसने अपनी भाषा में साम्राज्ञी से कुछ कहना शुरू कर दिया। सभी के चेहरे पर गम्भीर भाव  थे। रानी ने अपनी ही भाषा में अमर-मानसी से कुछ पूछा। फिर उसने अपने प्रश्न को पुनः दोहराया। अमर ने अपनी अनभिज्ञता दिखाते हुये आकाश की ओर इशारा किया। सभी लोग ऊपर देखने लगे। फिर वो कभी ऊपर तो कभी इन दोनों को देखते। अमर को लगा हर भाषा में घुटने टेकना समर्पण की ही निशानी होगी। उसने मानसी से घुटने के बल बैठते हुये साम्राज्ञी के सामने नतमस्तक होने के लिये कहा। और स्वयं नतमस्तक हो गया। उसकी देखा-देखी मानसी ने भी वही मुद्रा दोहरा दी। साम्राज्ञी ने अपने दायें और बायीं ओर बैठी औरतों को कुछ आदेश दिया। फिर उसने पुरुष सिपहसालार को भी कुछ आदेश दिया। एक स्त्री भवन के भीतर चली गयी और दूसरी स्त्री व पुरुष तलवार नुमा अस्त्र लेकर अमर-मानसी की ओर बढ़ गए। उन्होंने तलवार की नोक अमर और मानसी के सीने पर रख दी।

(क्रमशः)
-वाणभट्ट 

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत औ...