एक नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं...पहचान का प्रतीक...सादे पन्नों पर लिख कर नाम...स्वीकारता हूँ अपने अस्तित्व को...सच के साथ हूँ...ईमानदार आवाज़ हूँ...बुराई के खिलाफ हूँ...अदना इंसान हूँ...जो सिर्फ इंसानों से मिलता है...और...सिर्फ और सिर्फ इंसानियत पर मिटता है...
रविवार, 12 मई 2013
मातृ दिवस आया है
शनिवार, 11 मई 2013
बीज
रविवार, 31 मार्च 2013
अपनी-अपनी होली
होली सर पर थी। पडोस के एक बच्चे की सालगिरह भी आन पड़ी थी। बच्चों ने मोबाईल करके बोल दिया पापा पिचकारी और गिफ्ट लेते आइयेगा। आजकल के बच्चों को तो बस सब चीज़ हाँथ में चाहिए। वो वर्चुअल दुनिया में इतने मशगूल हैं कि किसी तीज-त्यौहार के प्रति उत्साह दिखाई नहीं देता। होली हो या दिवाली फेसबुक पर ही बधाइयाँ ली-दीं जातीं हैं। एक हम लोग थे दिवाली से दो दिन पहले पटाखे धूप में सुखाने लग जाते थे। झालरें खुद बनाई जातीं थी और अगली दिवाली के पहले जब वो जलने से मना कर देतीं तो एक-एक बल्ब को टेस्टर से टेस्ट किया जाता। होली में पीतल की पिचकारियों के वॉशर को कडुए तेल में डुबो कर रख दिया जाता था। किसको किस तरह और कहाँ-कहाँ रंग लगाना है इसकी स्ट्रेटेजी बच्चा पार्टी बनाने लगती थी। हर कोई उत्साह से अपने रंग को एकदम पक्का बताने में लगा रहता था। बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर बस त्यौहार का ज़िक्र होता। और त्यौहार की तैयारी करने की सारी जिम्मेदारी बच्चों पर होती थी। बड़ों का हस्तक्षेप सिर्फ हड्काने और मुद्रा उपलब्ध करने तक ही सीमित था। हमने भी तो बच्चों को बच्चा बना कर रख छोड़ा है। सारे गैजेट्स मोहैया करा दिए। बस्तों के बोझ के नीचे दबे बच्चों को माँ-बाप भी कुछ बोल नहीं पाते। कुरकुरे, टकाटक, चिप्स और चॉकलेट तो इन्सेन्टिव की तरह हैं कि बच्चे दफ्तर से लौटे माँ-बाप से ज्यादा मगजमारी न कर पाएं। एक हमारे ज़माने के माँ-बाप थे उन्हें बच्चों से मगजमारी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
रविवार, 24 मार्च 2013
मरने के बाद
यमराज सामने खड़ा था। फॉर्मल ड्रेस में नहीं था। भैंसा भी आस-पास नज़र नहीं आ रहा था। हाँ, एक रजिस्टर था हाथ में और उसमें कुछ लिफ़ाफ़े। चित्रगुप्त के हिसाब वाला रजिस्टर लग रहा था। एक लिफ़ाफ़ा उसने हाथ में थमा दिया। लिफ़ाफ़े पर कांफिडेंशियल लिखा था। लिफ़ाफ़ा खोला तो धरती के उस क्षेत्र से मेरा आबोदाना उठ चुका था। चूँकि आत्मा अमर होती है, सो मेरा किसी दूसरे क्षेत्र में पैदा होना लाज़मी था। यहाँ के लिये मै मर चुका था। उस पत्र को पढ़ने के बाद कुछ ऐसा ही एहसास हुआ।
गुरुवार, 7 मार्च 2013
जेनेटिक मैनिपुलेशन
मंगलवार, 1 जनवरी 2013
बरहमन की दुआ
कि ये साल अच्छा है
हर साल की तरह
चलो मान लो
इस साल भी सही
जब इतने सालों से मानते आये हो
सकारात्मक दृष्टिकोण रखना है ज़रूरी
इसलिये भी
और
बीती बातों का मर्सिया कब तक पढ़ा जाए
इसलिये भी
इसलिये भी कि जीने की वज़ह तो है तलाशनी ही
इतिहास को दफ़न करके ही
उसके ऊपर होगी ईमारत खड़ी
सुनहरे भारत के भविष्य की
भावनाओं से देश नहीं चलता
इसलिये ज़रूरी है आवाम की आवाज़ को कुचलना
जिन्हें हमने चलना सिखाया
कैसे सौंप दें उन्हें सत्ता
अभी अपरिपक्व हैं, नादान हैं
उन्हें सियासत का क्या पता
सियासत राज करने के लिये है
या सेवा करने के लिये
यहाँ सियासत सिर्फ़ सियासत के लिये है
इसलिये भी ज़रूरी हैं
नये ज़ज्बे को क़त्ल कर देना
एक अकेले अन्ना ने,
देश को हिला के रख दें
इतने सालों में ये सिस्टम बनाया है
जिसमें भ्रष्ट से भ्रष्टतम के सर पर
संरक्षण का साया है
चंद लोगों पर कैसे छोड़ दें देश को
लगे 400 साल अंग्रजों से छुड़ाने में देश को
अभी हमारे तो 60 साल ही हुये हैं
अब तो दमन की ताक़त भी है, अपने हाथ में
किसे किससे बचाओगे
कब तक खुद बच पाओगे
इतिहास सबक तो वो सीखें जिन्हें सुधरना है
हमें तो एक नया इतिहास लिखना है
अँग्रेज़ों से लड़ना आसान था
अब देश के लिये,
बड़ी मुश्किल से तो हमने आत्मा को मारा है
बड़ी मुश्किलों से अपने ज़मीर को धिक्कारा है
अब उसे मत जगाओ
अपनी नज़रों में हम हैं नहीं गिरने को तैयार
भले ही करने पड़ें कितने भी अत्याचार
सिस्टम को बनाया है,
सिस्टम ने, सिस्टम के द्वारा, सिस्टम के लिये,
इसलिये इस सिस्टम के वास्ते
देश के वास्ते
देश की जनता के वास्ते
इसे मत छेड़ो
जैसे अब तक चलता था, वैसे ही चलने दो
इतने साल आये और चले गये
पिछले दो साल साठ सालों पर भारी रहे
ये कैसा चमत्कार है
आन्दोलनकारियों का अज़ब वार है
लाखों की भीड़ बिन नेता के
अपना हक माँगने को तैयार है
अब भी वक्त है देश एक नये मुकाम को बढ़ रहा है
देश की ईमारत की नीव के नीचे दफना दो
अपनी आत्मा को, ज़मीर को
पर मत रोको इस तरक्की की रफ़्तार को
जनता अराजक हो उठी है
सब समाधान सडकों पर ढूँढती है
भला ऐसे कोई व्यवस्था चलती है
पर मुझे इस साल बरहमन की वाणी सच लगती है
ये गुजरे कुछ साल बस इसका आगाज़ था
जनता के लिये जनता के द्वारा ही
सारा नियम कानून निश्चित होगा
जनता की आवाज़ ही तोड़ेगी तुम्हारी तन्द्रा
देश के नवजवानों की है अब टूटी निद्रा
यही संकेत है कि बरहमन का कहा सच होगा
देश के बारे में जो सोच सकें, ये देश उनका होगा
हर नस्ल अपनी पिछली नस्ल से उन्नत रही है
बुजुर्गों को इस बात की बेचैनी क्यों हो रही है
सौंप के देखो इस देश को ज़ज्बों को, जोश को
आन्दोलन दशकों और शताब्दियों में नहीं, वर्षों में होते हैं
नयी उम्र की नयी फसल ने देश को झकझोरा है
परिवर्तन की बयार ने सबको जोड़ा है
अब तो हट जाओ कि जनता आती है
कम से कम 2013 में जो सवेरा हुआ है
सिर्फ दिल के खुश रखने को नहीं
किसी सकारात्मक बदलाव के लिये हुआ है
- वाणभट्ट
शनिवार, 22 दिसंबर 2012
एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...
ज़िन्दगी का उसूल है कि वो कुछ नहीं तो तजुर्बा ज़रूर देती है। कुछ ऐसे ही बदलाव ज़िन्दगी में रहे गत कुछ महीनों से। आदमी अपनी चाल चलता है और ग्रह-नक्षत्र अपनी। एकदम ऊपर वाले और एकदम नीचे वाले के बीच में भी कुछ मिडिल आर्डर ऊपर वाले होते हैं। जो शतरंज की बिसात बिछाते हैं और अपने वजीर-बादशाह को बचाने के लिए प्यादों को कुर्बान कर देते हैं।
मिश्र जी का हश्र तो ऐसा होना ही था। सिस्टम में हजारों दोष हैं ये सिस्टम भी जानता है। पर भाई जड़त्व भी कोई चीज़ है। अगर सिस्टम ऐसा न होता तो जो सिस्टम के जो संभ्रांत खिलाडी हैं वो संभवतः सिस्टम से बाहर होते। उनकी ही परिभाषाएं हैं कि अकेला चना भाड़ क्या फोड़ेगा। और ये बात अवाम के जेहन में कूट-कूट के घुसेड दी गयी है। एक्का-दुक्का जो ये गलतफहमी पाल लेता है कि वो देश का भला कर के ही मानेगा, तो सारा सिस्टम उसे दुरुस्त करने में लग जाता है। उसमें लग्गू-भग्गू का रोल अहम् होता है। क्योंकि शहंशाह तो सत्ता के मद में चूर होता है ये दायें और बायें ही होते है जो खबरी का काम करते हैं। और बताते हैं कि हुजूर अमुक इलाके से बगावत की बू आ रही है। उसे निपटाना ज़रूरी है नहीं तो आपकी सत्ता हिल सकती है।
और जिन राजाओं को अपने बल, बुद्धि और विवेक पर भरोसा न हो उन्हें कन्फ्यूज़ करना कोई कठिन भी नहीं है। तो मिश्र जी कहानी "सिस्टम के अन्दर : अन्ना हज़ारे" (http://vaanbhatt.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html) जहाँ ख़त्म हुई वहां से एक नयी कहानी शुरू हुई। मिश्र जी की ईमानदारी को चुनौती देना तो नामुमकिन था। सो उनके ऊपर ड्यूटी का उचित निर्वाह न करने, उच्च अधिकारियों से अभद्र व्यवहार, कार्य संस्कृति बिगड़ने के अनर्गल आक्षेप लगा दिए गए। एक चेतावनी मिली सो अलग से की भविष्य में ऐसी ईमानदारी और देशभक्ति वाली हरकतें कीं तो उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। फिलहाल उन्हें स्थानांतरण से नवाज़ा जा रहा है। लेकिन ये भविष्य के संकेत मात्र हैं।
मिश्र जी का विश्वास और प्रबल हो गया है। जिस रस्ते को उन्होंने चुना है वो यक़ीनन सही है। वर्ना संस्थान और देश से गद्दारी करके जीना शायद उनका दम घोंट देता। मित्रों मिश्र जी को आपकी शुभकामनाओं और शुभेच्छा की सख्त ज़रूरत है। ईमानदारों के लिए जीने का यही एक संबल है।
सत्य पर असत्य की जीत चिर स्थाई तो नहीं दिखाई गयी है अब तक के वक्तव्यों में। और मिश्र जी का मानना है कि नीचे वालों की मंशा के पीछे भी ऊपर वाले की मंशा छिपी होती है। इस कहानी का ये अंत नहीं है। एक नयी शुरुआत कह सकते हैं।
एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी। मुसाफिर का काम तो बस चलते जाना है।
- वाणभट्ट
जेन-ज़ी
रात भी नींद भी कहानी भी हाय क्या चीज़ है जवानी भी रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेप...
-
धर्म के नाम पर बहुत कन्फ्यूजन फैला हुआ है. मजहब-सम्प्रदाय को लोग धर्म से कन्फ्यूज कर गये हैं. जिस तरह धर्म शाश्वत है, उसी तरह अधर्म भी अपरिव...
-
देवेश का फोन आया तो उसमें आग्रह के भाव से कहीं ज्यादा अधिकार का भाव था. 'भैया हमका महाकुम्भ नय नहलउबो का. तुम्हार जइस इलाहाबादी के रहे ह...
-
जंज़ीर -दीवार-शोले में अमिताभ के होने के अलावा और क्या समानता हो सकती है. शायद ही कोई इसे गेस कर पाये. उस समय तक हमें अपनी मर्ज़ी से पिक्चर दे...