रविवार, 12 मई 2013

मातृ दिवस आया है

माँ को याद करने के बहाने ढूँढते हैं अब
जैसे अपने ही घर का पता पूछते हैं अब

चलने-फिरने से भी कभी बेज़ार थे
आँचल से निकल दुनिया घूमते हैं अब

तूने अपना सब कुछ दिया बिना शर्त
अपने पास तेरे लिए न वख्त है अब

खुदगर्जी के रंग में सबने खुद को रंग लिया 
माँ, तू न जाने किस ज़माने में जीती है अब  

वख्त तो करवट बिन आवाज़ बदलता है
दुनिया बदली, तू क्यों नहीं बदले है अब

बूढी हो गयीं हैं तेरे माथे की सलवटें माँ
पर तेरी आँखों में सितारे नज़र आते हैं अब  

तेरी दुआ तो हर पल रहती थी साथ मेरे 
दुश्मनों के माँ की दुआएं भी मेरे साथ हैं अब 

- वाणभट्ट 

शनिवार, 11 मई 2013

बीज

कृषि के क्षेत्र में काम करने वाले हर व्यक्ति को भली-भाँति पता होता है, बीज का महत्त्व। किसान के लिये संभवतः जमीन के बाद ये सबसे मँहगा और सार्थक निवेश है। जमीन की कीमत और उस पर लगने वाले ब्याज को अगर शामिल कर लिया जाये तो किसान भी पूँजीपति या उद्योगपति हो सकता है। पर शायद पूरी व्यवस्था ये नहीं चाहती। जब कोई सॉफ्टवेयर कम्पनी कोई सॉफ्टवेयर बनाती है तो अपने सारे ख़र्च पर मुनाफ़ा जोड़ने के बाद उसका मूल्य निर्धारित करती है। यही प्रक्रिया कमोबेश सभी उद्योगों में लागू होती है। पर कृषि कोई उद्योग तो है नहीं। भारतीय कृषक ने तो निरंतर बढ़ रही आबादी को भूख से बचाने के लिये परोपकार करने का ठेका ले रक्खा है। भारत में तो वैसे भी परोपकार की परम्परा है। ये परोपकार गरीब जनता से विश्वासघात करके कमाये गये पैसे से भी हो सकता है।  रातों-रात अरब-खरबपतियों की जो फ़ौज तैयार हो गयी है, उसकी खोज-ख़बर लेने की न किसी को चिंता है, न समय। पर आम जनता से उम्मीद की जाती है कि वो पूर्ण देशभक्ति, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ भारतवंशियों के हित में तन-मन-धन समर्पित कर देगी।    
इस देश का पेट महान उक्तियों से ही भर जाता है। और ये सब उक्तियाँ शक्ति-साधन विहीन आम आदमी के लिये हैं। महान लोगों ने तो इस देश की अज्ञानी, अकर्मण्य, अशिक्षित जनता को सुधारने के लिये ही इस पावन धरा पर अवतरित होने का निश्चय लिया। अगर ये न होते तो देश कैसे चलता। न उद्योग होते, न नेता, न प्रवचन, न प्रगति। तो आम आदमी की क्या गति होती। बेचारा इह लोक से भी जाता, उह लोक से भी। उसे तो उच्च आदर्श स्थापित करने हैं, तभी देश आगे जायेगा, दुनिया में देश का नाम होगा। सारी कबड्डी आम आदमी की हड्डी पर। अमरुद आदमी तो बस देश को लूट खाने के लिए ही पैदा हुआ है। देश का पैसा या तो गद्दों में भरा है या स्विस बैंकों में। किसान के जन्म की सार्थकता तभी है जब वो देश के लिये सब कुछ अर्पण कर दे और कुछ हद तक ये हो भी रहा है -     

वृक्ष कबहु नहीं फल भखैं
नदी न संचय नीर 
परमारथ के कारने 
साधून धरा शरीर 

भारतीय किसान ने भी शक्ति-साधन सम्पन्नों से लेकर भूखे-नंगों का पेट पालन करने का जिम्मा ले रक्खा है। इस देश में सभी उद्योग फल फूल रहे हैं। कार से लेकर मोबाईल तक। फटफटिया से लेकर हवाई जहाज़ तक। सॉफ्टवेयर से लेकर सेवा तक। हर तरफ तरक्की की बयार है नये-नये उद्योग खुल रहे हैं और बाजार में पैसा ही पैसा बहा पड़ रहा है। अमीर और अमीर होता जा रहा है, और गरीब और गरीब। दस लाख को ग्यारह लाख करना आसन है, पर दस रुपये को ग्यारह रुपया करना नामुमकिन। मोटे और सरसरी तौर पर ये कहा जा सकता है कि भारत में पूँजीवाद की जो लहर आई है, उसने देश को विश्व के अग्रिम देशों की कतार में खड़ा कर दिया है। महानगरों की संस्कृति ने कस्बों तक घुसपैठ बना ली है। बेतहाशा बढ़ाते टीवी चैनलों को इसका श्रेय देना चाहिये या नहीं वाद-विवाद का विषय हो सकता है। पर इसमें कोई शक़ नहीं की अब दूरस्थ गाँवों में भी आपका स्वागत ब्रैंडेड चिप्स और कोक से हो सकता है। 

आज देश में प्रगति का माहौल है। उद्यमिता और उद्योग के इस युग में जो पीछे रह गया वो बहुत पीछे रह जायेगा। उद्योग का सीधा तात्पर्य है मुनाफ़ा, लागत निकालने के बाद। क्या ये बात कृषि पर लागू होती है? फसल चाहे शहर के पास उगे जाये या शहर से दूर सब धान एक ही पसेरी। शहर के पास वाली जमीन की कीमत न तो उत्पादन मूल्य में जोड़ी जाती है, न ही दूर-दराज़ गाँव से फसल को मंडियों तक लाने का परिवहन शुल्क। पर किसान के ऊपर देश को भोजन करने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी है। सॉफ्टवेयर वाले और मोबाइल वाले और लैपटॉप वाले और कम्प्यूटर वाले और कार वाले और हवाई जहाज वाले और न जाने कौन-कौन इस अपराधबोध से मुक्त हैं। इसलिये उद्योग बन गये और मुनाफ़े पर ही सौदा करते है। वैसे भी उन्होंने परोपकार के लिये तो धंधा नहीं शुरू किया है। जब मुनाफ़ा हद से बढ़ जायेगा और जब उन्हें लगेगा की देश से उन्होंने कुछ ज्यादा ही निचोड़ लिया है, तो कुछ मंदिर, अनाथालय या स्कूल बना कर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लिया जायेगा।   

कुछ दिन पूर्व बीज उत्पादक समूह की एक बैठक में भाग लेने का मौका मिला। एक ही फसल की अनेकों प्रजातियाँ हैं। सब एक से एक उन्नत एक से बढ़ कर एक। इतनी प्रजातियों का बीज उत्पादन भी वृहद् कार्य है। और एक बहुत बड़ा समूह इस काम में संलग्न है। चूँकि बीज खेती का सबसे मूल और प्रमुख निवेश है। कृषक को उचित बीज उपलब्ध कराना, एक बड़ा ही पावन और पुनीत कार्य है। इस कार्य में बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थायें एवं कम्पनियाँ लगीं हुईं हैं। बीज उत्पादन अपने आप में एक बिलियन डालर इंडस्ट्री बन चुकी है और ये दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करती जा रही है। ताकि किसान को उच्च गुणवत्ता का बीज मिल सके। इस पुनीत कार्य की महानता को देख कृषि से सम्बंधित किसी भी व्यक्ति का हृदय नत-मस्तक हुए बिना नहीं रह सकता। सभी बीज उत्पादकों का लक्ष्य कृषक ही है।

हाल ही में एक बहुराष्ट्रीय चिप्स बनाने वाली कम्पनी  में जाना हुआ। उनका पूरा का पूरा प्लान्ट ऑटोमेटेड है। एक तरफ से आलू डालो और दूसरी तरफ से चिप्स निकालो। काफी लम्बी और वृहद् प्लांट संरचना थी। विभिन्न यूनिट ऑपरेशंस से गुज़रता हुआ, आलू उस अवस्था में पहुँचता है कि पूरे देश में हम कहीं भी उस कंपनी का पैकेट खोलें तो वही चिर-परिचित स्वाद मिलेगा। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि वे लोग कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के माध्यम से कुछ चुनिन्दा प्रजातियों का ही उत्पादन करवाते हैं जिससे उनको एक सुनिश्चित गुणवत्ता का कच्चा माल मिल सके। और इससे उनके अंतिम उत्पाद यानि चिप्स की गुणवत्ता सुनिश्चित रहती है। बिना किसी मशीन पैरामीटर्स में परिवर्तन किये मशीनें पूरे साल (365x24x7) काम करती रहतीं हैं।  किसान, दाल मिलर्स और वैज्ञानिकों की एक मीटिंग में भी मिलर्स ने एक सामान कच्चे माल की आपूर्ति के लिये किसानों और वैज्ञानिकों का आह्वान किया। वे एक ही क्वालिटी के खड़े दानों के लिये समर्थन मूल्य से अधिक पैसे भी देने को तैयार हैं। क्योंकि इससे वो अपने प्रसंस्करण मूल्य को कम कर सकने में समर्थ थे। 

यहाँ ये समझना आवश्यक है कि बीजों का अंतिम उपभोक्ता, जिसे अमूमन किसान समझ लिया जाता है, नहीं है। बीज का अंतिम उपभोक्ता प्रसंस्करणकर्ता है या खुद उपभोग करने वाला व्यक्ति है। जिसे प्रजातियाँ विकसित करते समय कभी ध्यान में नहीं रखा जाता है। प्रसंस्करण उद्योग चाहता है एक सा कच्चा माल और एक सा उत्पादित पदार्थ। पूरे देश में अगर सोहन पपड़ी खायी जाये तो उसका स्वाद एक सा हो। पिज़्ज़ा चाहे कानपुर में खायें या नागपुर में, हमारी पसंद में अंतर नहीं आना चाहिये। अमृतसर की एक गली में लोग सिर्फ इसलिये खाना खाने जाते हैं कि वैसा खाना दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता। उसका कोई भी दूसरा आउटलेट नहीं है जबकि फ्रेंचाईज़ी लेने को बहुतेरे तैयार बैठे हैं। एक सामान इनपुट रॉ मटेरियल निश्चय ही प्रसंस्कृत उत्पाद की गुणवत्ता को भी बनाये रखता है। 

इसलिये बीज को डिज़ाइन के समय से ही अंतिम यूजर प्रोस्सेसर/उपभोक्ता को ध्यान में रक्खा जाना चाहिये। क्रासिंग के प्रथम चरण से अंतिम चरण तक बीज की फ़ूड वैल्यू और प्रसंस्करण गुणवत्ता का समावेश अत्यंत आवश्यक है। तब शायद हमें इतनी अधिक प्रजातियों की आवश्यकता भी न पड़े। इससे न सिर्फ हमें सामान गुणवत्ता की फसल मिलेगी बल्कि गुणवत्तापरक बीज उत्पादन भी सहज हो जायेगा। जितनी कम प्रजातियाँ होंगी उतनी ही बीज की उपलब्धता बढ़ेगी। किसानों की बीजों के लिये बीज उत्पादक संस्थाओं पर निर्भरता भी घटेगी। एक प्रजाति की फसल लेने से न सिर्फ बोआई से लेकर कटाई और प्रसंस्करण तक मशीनीकरण आसान हो जायेगा बल्कि उत्पादन मूल्य में भी काफ़ी कमी आ जायेगी। 

एक भाई ने चिंता जाहिर की कि यदि सिर्फ़ एक प्रजाति उगे गयी और कोई बीमारी या कीड़ा लग गया तो। प्रतिरोधक क्षमता टूट गयी तो। देश क्या खायेगा? विद्वानों का डर वाजिब हो सकता है। पर जिस देश में 15 विभिन्न कृषि जलवायु वाले क्षेत्र हों वहाँ, ये डर जायज़ नहीं लगता। पचास साल की उम्र में प्लेग, डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू को देश भर में दस्तक देते देखा है। पर सबकी प्रतिरोधक क्षमता जवाब दे गयी हो ऐसा नहीं सुना। बीजों की प्रजातियाँ जितनी कम होंगी, उतना ही अधिक आसानी से बीज उपलब्ध होगा। क्रॉस पोलिनेशन का भय भी कम होगा और हर साल बीज का रिप्लेसमेंट भी होता रहेगा। डाईवर्सिटी ज़रूरी है, लेकिन भगवान की बनायी डाइवर्सिटी में बिना सोचे समझे डाईवर्सिटी में निरन्तर इज़ाफ़ा करते जाने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता. एक नहीं तो दो या तीन प्रजातियाँ शायद काफी हों एक ज़ोन के लिये। नयी प्रजातियाँ तभी चिन्हित की जानी चाहिये जब न सिर्फ़ उनकी उत्पादन, उत्पादकता, प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो बल्कि उनकी खाद्य और प्रसंस्करण गुणवत्ता भी उन्नत हो।         
अफ़सोस होता है जब देखता हूँ बीज उद्योग बन गया, कीटनाशक उद्योग बन गया, खरपतवार नाशक उद्योग बन गया, मशीन उद्योग हो गया, सिंचाई उद्योग बन गयी। यहाँ तक कि भण्डारण और प्रसंस्करण भी उद्योग बन गया, पर खेती, खेती ही रह गयी। कृषि सम्बन्धी सभी उद्योगों का लक्ष्य उपभोक्ता (Target User) तो किसान ही है। सारे उद्योग मुनाफ़ा प्रधान हो गये जबकि किसान अपने उत्पाद को अभी भी समर्थन मूल्य पर बेचने को विवश है। जब मिलिअन्स हेक्टेयर पर एक ही प्रजाति की खेती होगी। खेती की भूमि का किराया/ब्याज जब उत्पाद मुल्य में जुड़ेगा। किसान के पास समुचित भण्डारण और प्रसंस्करण की सुविधा होगी। तब खेती भी एक उद्योग से कम नहीं रहेगी। तब शायद हम गर्व से कह सकें - उत्तम खेती, माध्यम बान...

जिस तरह भारतेंदु जी ने कहा था निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कै मूल, बिनु निज भाषा ज्ञान कै मिटै न हिय को शूल। उसी तर्ज पर भारत जैसे कृषि प्रधान देश को ये भी कहना चाहिए - 

औद्योगिक कृषि ही है सब उद्योगन कै मूल, 

कम्प्यूटर, मोबाइल, कार सब, है हाथे की धूल,
इक दिन खाली पेट हो, तो सब कुछ जईहौ भूल। 

जय किसान!

- वाणभट्ट

रविवार, 31 मार्च 2013

अपनी-अपनी होली

होली सर पर थी। पडोस के एक बच्चे की सालगिरह भी आन पड़ी थी। बच्चों ने मोबाईल करके बोल दिया पापा पिचकारी और गिफ्ट लेते आइयेगा। आजकल के बच्चों को तो बस सब चीज़ हाँथ में चाहिए। वो वर्चुअल दुनिया में इतने मशगूल हैं कि किसी तीज-त्यौहार के प्रति उत्साह दिखाई नहीं देता। होली हो या दिवाली फेसबुक पर ही बधाइयाँ ली-दीं  जातीं हैं। एक हम लोग थे दिवाली से दो दिन पहले पटाखे धूप में सुखाने लग जाते थे। झालरें खुद बनाई जातीं थी और अगली दिवाली के पहले जब वो जलने से मना कर देतीं तो एक-एक बल्ब को टेस्टर से टेस्ट किया जाता। होली में पीतल की पिचकारियों के वॉशर को कडुए तेल में डुबो कर रख दिया जाता था। किसको किस तरह और कहाँ-कहाँ रंग लगाना है इसकी स्ट्रेटेजी बच्चा पार्टी बनाने लगती थी। हर कोई उत्साह से अपने रंग को एकदम पक्का बताने में लगा रहता था। बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर बस त्यौहार का ज़िक्र होता। और त्यौहार की तैयारी करने की सारी जिम्मेदारी बच्चों पर होती थी। बड़ों का हस्तक्षेप सिर्फ हड्काने और मुद्रा उपलब्ध करने तक ही सीमित था। हमने भी तो बच्चों को बच्चा बना कर रख छोड़ा है। सारे गैजेट्स मोहैया करा दिए। बस्तों के बोझ के नीचे दबे बच्चों को माँ-बाप भी कुछ बोल नहीं पाते। कुरकुरे, टकाटक, चिप्स और चॉकलेट तो इन्सेन्टिव की तरह हैं कि बच्चे दफ्तर से लौटे माँ-बाप से ज्यादा मगजमारी न कर पाएं। एक हमारे ज़माने के माँ-बाप थे उन्हें बच्चों से मगजमारी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।


ट्रेडिशनल पुरखे तो अगली पीढ़ी को हमेशा अपने से कमतर बताने में लगे रहते हैं पर जब मै देश की वर्तमान अवस्था और व्यवस्था पर नज़र डालता हूँ तो हर जगह तरक्की झलकती नज़र आती है। अगर आने वाली नस्लें अपने पुरखों से ख़राब होतीं तो शायद दृश्य कुछ अलग होता। मै अपने को ट्रेडिशनल बापों की श्रेणी से अलग रखता हूँ इसलिए मुझे अगली पीढ़ी में संभावनाएं दिखाई देतीं हैं। मुझे विश्वास है कि भारत ही नहीं विश्व के सभी देशों का वर्तमान भूत से बेहतर है और आगे भी बेहतर ही होगा। ऑफिस में अपने तथाकथित मैनेजरों की तुलना में नयी पौध ज्यादा अच्छा मैनेज करती है और ज्यादा विश्वसनीय है। ये बात अलग है कि  उनकी सत्यनिष्ठा ऐसे व्यक्ति लिखते हैं जिनकी सत्यनिष्ठा देश-समाज के प्रति न हो कर आत्म-केन्द्रित रहती है। गत वर्षों में युवाओं ने जिस शिद्दत से भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी वो हमारी और हमारी पिछली पीढ़ियों ने कभी न देखा था न सुना। वो अभी भी भ्रष्ट व्यवस्था को संरक्षित-संवर्धित करने को प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते हैं। ये हम कहाँ आ गए। बात तो बात है। निकलती है तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है। मै तो खिलौनों की दुकान में पिचकारी और गिफ्ट के इरादे से घुस चुका था।

रंग-बिरंगी पिचकारियों और खिलौनों से अटा पड़ा था वो शो-रुम। ये बात अलग है कि सभी सामान चीन से आयातित ही दिखाई दे रहा था। मैंने बताया कि अपने बच्चों के लिए मुझे प्रेशर वाली पिचकारियाँ चाहिए और एक बर्थडे गिफ्ट भी। शो-रूम की हैसियत के हिसाब से हमारी क्रय शक्ति भी बढ़ जाती है। कहीं दुकानदार हमें ऐरा-गैरा न समझ ले इस लिए नौकरी-पेशा आदमी जल्दी दाम नहीं पूछता। लेबल पर दाम पढ़ने की कोशिश ही करता रहता है। पर खिलौनों के मामले में ऐसा नहीं है। प्रिंट प्राइस अगर चार सौ लिखा है तो दो-ढाई सौ तक मोल-भाव हो सकता है। ये शो-रूम भी इस बात से अलग नहीं था। रसीद तो देनी नहीं है न ही कोई टैक्स।

सेल्समैन ने मेरे बजट का एक अनुमान पूछा। जैसे टोह लेना चाहता हो कि बन्दे ने सिर्फ ढंग के कपडे पहन रक्खे हैं या जेब में पैसा भी है। मेरी पुरानी मारुती दूर खड़ी थी वर्ना आदमी की औकात बताने के लिए कार और कार का मॉडल काफी है। ये बात अलग है कि कार भाड़े की हो सकती है या कर्जे की। सेल्समैन ने मेरे मतलब के सामान दिखाने शुरू कर दिए थे जब उसने प्रवेश किया। 

उसके चहरे पर कुछ वैसे ही भाव थे जैसा पढ़ते समय कभी बिन पैसे रेमंड्स के शो-रूम में घुसते हुए मेरे हुआ करते थे। लगता था सेल्स मैन ने नज़रों से मेरी पॉकेट अपनी आँखों से स्कैन कर लिया हो। और उसे पता हो फटीचर सिर्फ कपड़ों को हाथ लगा लगा के गन्दा करेगा और खरीदेगा फुटपाथ से। एक बार जब आदमी को पढ़ने की आदत लग जाये तो उसके हाव-भाव, वेश-भूषा, चाल-चलन सब बता देता है कि बन्दे की वकत कितनी, कुछ खरीदेगा या नहीं। और सेल्समैन के सामने से तो रोज़ सैकड़ों लोग निकलते रहते हैं। पर उसने बड़े लोगों की तरह अपनी असलियत छुपाने का कोई प्रयास भी नहीं किया था।

कपड़ों से देख कर कोई भी ये निष्कर्ष निकाल सकता था कि वो मेहनत-मजदूरी कर के अपना जीवन-यापन करता होगा। मेहनतकश बलिष्ठ शरीर उसके कई दिनों से साफ़ न किये गए कपड़ों से साफ़ झलकता था। आँखों की चमक बताती थी कि उसे अपने और अपने काम पर भरोसा था। आत्मविश्वास से लबरेज लगीं थीं उसकी आँखें। वर्ना ऐसे कपडे पहन कर कोई उस शो-रूम में घुसने से पहले कई बार सोचता। उसके साथ उसका ६-८ साल का खूबसूरत प्यारा सा बेटा भी था। बच्चे ने देखते ही हाई -प्रेशर वाली पिचकारी पकड़ ली। पापा यही वाली चाहिए। सेल्समैन ने बच्चे के बाप को ऐसे देखा जैसे कोई धन्नासेठ की औलाद बनाने की कोशिश कर रहा हो। बाप मुस्कराया। बेटा चला के तो देख लो। देखो कितनी दूर तक फ़ेंक सकती है ये रंग। कहीं फुस्फुसिया पटाखे सी फुस्स न हो जाये। फिर वो सेल्समैन से बोल भाई जरा इसको चला के तो दिखाओ।

सेल्समैन सुबह से कितनी ही पिचकारियाँ बेच चुका था। पर ये पहला ग्राहक था जिसने चला के पिचकारी देखने का आग्रह किया होगा। थोडा हिकारत से बोला ३०० की है। अरे मैंने दाम तो नहीं पूछा बस चला के दिखाने को कहा है। मुझे उसकी दिल्लगी और सेल्समैन की बेरुखी में मज़ा आने लगा था। इसलिए बोला पहले आप इसे ही निपटा लो तब तक मै खिलौने देख लेता हूँ। सेल्समैन ने पानी भर कर उस पिचकारी को दुकान के बाहर चलाया। अब बाप ने उसे हिकारत से देखा। ये कोई प्रेशर पिचकारी है? हमारी प्लास्टिक की पिचकारी भी १५ मीटर से ज्यादा दूर फ़ेंक सकती है। ये तो बस १० मीटर ही तक गयी। लड़का बोला पापा मुझे ये पिचकारी पसंद है। पर बाप था कि अड़ गया। नहीं बेटा ये बड़ी दुकान वाले घटिया सामान रखते हैं। दाम की तो पूछो नहीं। सेल्समैन और मै  दोनों उसकी मंशा ताड़ने की कोशिश कर रहे थे। सेल्समैन ने मुस्करा के देखा बोला भाई पिचकारी पसंद नहीं आई या दाम। 

वो मुस्करा कर बोला बेटा चल ये पिचकारी अच्छी नहीं है। अपने मोहल्ले के पंसारी के यहाँ बहुत नयी-नयी पिचकारियाँ आयीं हैं वहीँ से ले लेंगे।  बच्चा इतना प्यारा था कि मन में आया एक पिचकारी उसे गिफ्ट कर दूँ। पर हीरो की तरह जीने वाले उस बाप से बेटे के सामने कुछ कहने की इच्छा नहीं हुयी। बच्चे का हाथ पकड़ वो झट से बाहर निकल गया। 

- वाणभट्ट 

रविवार, 24 मार्च 2013

मरने के बाद

यमराज सामने खड़ा था। फॉर्मल ड्रेस में नहीं था। भैंसा भी आस-पास नज़र नहीं आ रहा था। हाँ, एक रजिस्टर था हाथ में और उसमें कुछ लिफ़ाफ़े। चित्रगुप्त के हिसाब वाला रजिस्टर लग रहा था। एक लिफ़ाफ़ा उसने हाथ में थमा दिया। लिफ़ाफ़े पर कांफिडेंशियल लिखा था। लिफ़ाफ़ा खोला तो धरती के उस क्षेत्र से मेरा आबोदाना उठ चुका था। चूँकि आत्मा अमर होती है, सो मेरा किसी दूसरे क्षेत्र में पैदा होना लाज़मी था। यहाँ के लिये मै मर चुका था। उस पत्र को पढ़ने के बाद कुछ ऐसा ही एहसास हुआ।

इस धरती पर दो ही सच हैं। एक पैदा होना और दूसरा मर जाना। उसके बीच में जो भी कबड्डी है, वो रंगमंच की कठपुतलियों का लिखा-लिखाया नाटक है। ऐसा कह कर खुद को सांत्वना दी। पर जैसे पैदा होने की वजहें होतीं हैं, वैसे ही मरने की भी कोई न कोई वजह तो होनी ही चाहिये। सही या गलत। आत्मा तो अजर है, अमर है, न ये पानी में भीगती है, न ही इसे सुखाया जा सकता है और न ही जलाया। फिर भला दरवाजे इसे कैसे रोक पाते।

उस कमरे में जश्न का माहौल था। लग्गू और भग्गू बॉस को बधाई देने पहुँचे थे। बॉस आप महान हो। क्या बात है। बॉस क्या तीर मारा है। आपने अन्ना को फ़्रेम कर लिया। ऐसे तो वो हाथ आता न था। आपने ऐसा क्या पासा फेंका जो उसका बोरिया-बिस्तर ही सिमट गया। लग्गू-भग्गू को मालूम है की बॉस से कुछ उगलवाने के लिये इतना चारा तो डालना ही पड़ेगा। बॉस की मूंछें फड़क रहीं थी। वो भी कुछ बताने को उतावला हो रहा था।

गला खखार कर वो गुरु गंभीर आवाज़ बोला - डियर फ्रेंड्स इट वाज़ नॉट पॉसिबिल विथाउट यू पीपल। यू नो, मै तो अपने कमरे से निकलता नहीं। मुग़लिया नवाबों ने जैसे अपनी रियासतें हुक्मरानों के भरोसे छोड़ रक्खीं थीं। मै भी कुर्सी के प्रति आप लोगों की वफ़ादारी देख कर, शासन का पुनीत कार्य आप लोगों के सुपुर्द कर निश्चिन्त हो गया। आप लोगों ने ये भी सिद्ध कर दिया कि अगर इंसान वफ़ादारी दिखाने पर आ जाये तो वो कुत्तों को भी पीछे छोड़ सकता है। ये आप ही थे, जो हमें हर व्यक्ति के बारे में हर समय आगाह करते रहे। कौन मेरा कुर्सी का भक्त है और किस बन्दे ने अभी भी अपना दिमाग़ इस्तेमाल करना बंद नहीं किया। कौन बागवत पर आमादा है। किसे ठिकाने लगाना ज़रूरी है। आई ऐम सो प्राउड ऑफ़ यू गाइज़। 

अन्ना को ठिकाने लगाना सिर्फ मेरे बस की बात नहीं थी, अगर दिल्ली साथ नहीं देती। पर दिल्ली को भी उल्लू बनाना भी आसान न था। मेरी इंटिग्रिटी अब तुम लोगों से तो छुपी है नहीं। तुम लोग मेरी महारत फ़र्जी मेडिकल और टीए बिल बनाने के लिए तो जानते ही हो। मैंने अन्ना को फँसाने के लिये भी फ़र्जी केस बना कर दिल्ली भेजा तब उन्हें यकीन हुआ। यही वो मछली है, जो सारे तालाब को ख़राब कर सकती है। सबसे खतरनाक हैं विचार। इसलिये अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर पहले विचार को मारता है। बाकि सब तो ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाता है। ये देश एक अन्ना तो अफोर्ड कर नहीं पा रहा है और जिसे देखो हर कोई अन्ना बना जा रहा है। इसलिये इस अन्ना को ठिकाने लगाना ज़रूरी था। अब हमारे यहाँ कोई दूसरा अन्ना बनने की कोशिश नहीं करेगा। लेट्स सेलिब्रेट। लग्गू तुम फ्रिज से आइस और सोडा निकालो, और भग्गू तुम पेग बनाओ आज जश्न मनाया जाये। तेइस मार्च को ही तो शहीद दिवस मनाया जाता है। आज इसे शहीद कर दिया हमने। उसकी मूँछें ख़ुशी से और भी फड़क उठी थीं।   

आत्मा वहाँ से निकली तो लोगों ने रस्ते बदल लिए। मरे हुए के साथ किसी ने देख लिया...तो। 

वहाँ से निकल कर आत्मा उन लोगों के पास पहुँची जो कुछ दोस्त और खैरख्वाह टाइप के लोग थे। नौकरी की दोस्ती कोई दाँत काटी दोस्ती तो होती नहीं। बस फटे की यारी समझ लो। किस्मत ने साथ कर दिया तो समय काटने की ग़रज़ से दोस्ती कर ली। कुछ कॉमन फ़ायदे हैं, जो समाज में मिलने-जुलने से मिल जाते हैं, वर्ना दोस्ती निभाने के लिये दोस्ती थोड़ी न होती है, नौकरी में। एक दुखी था। बोला - कितना समझाया भाई भगत सिंह दूसरे के घर ही अच्छे। पर उसे तो शहीद होने का शौक चर्राया था। अब हो गया न शहीद। दूसरा बोला - भाई इतने लोग नौकरी कर रहे हैं क्या उन्हें नहीं मालूम सही-गलत। नौकरी तो नौकरी है। दिल-दिमाग़ घर छोड़ के आओ, बस हाँ में हाँ ही तो मिलानी है बॉस की। तीसरा बोला भ्रष्ट सिस्टम में रह कर, उसे ही भ्रष्ट कहना कहाँ की समझदारी है। हम भी तो बीवी-बच्चे पाल रहे हैं। नौकरी में और क्या कर सकते हो। मरने दो साले को अन्ना बनने चला था।          

घर पर बीवी-बच्चे भी दुखी से लग रहे थे। स्वाभाविक है। बाप के कहीं और जीने का क्या मतलब जब वो साथ न हो। सुख-दुःख न बाँट पाये। अगर अन्ना ही बनना था, तो परिवार बनाने की क्या ज़रूरत थी। अकेले रहते फिर जो मर्जी करते। वृद्ध पिता जी की स्थिति 'नमक के दरोगा' के वंशीधर के पिता सरीखी हो रक्खी थी। जो बेटे को हमेशा नसीहत देते आये कि बेटा मेरी तो ईमानदारी से कट गयी पर तब ज़माना दूसरा था। बेईमान लोग भी ईमानदार की कद्र करते थे। पर अब वो बात नहीं रही। लोग ईमानदार की परछाईं से भी परहेज करते हैं। देश-समाज में रहना है तो उसके ही चाल-चलन निभाने पडेंगे। पर माँ तो आखिर माँ ही होती है। वो बोल तो नहीं रही थी, पर रब का शुकराना कर रही थी। वाहेगुरु तू जो भी करता है, भला ही करता है। लाखों में एक है मेरा बेटा। दिल का सच्चा और नेक। मेरे बेटे को बुरे लोग, बुरी नज़र से बचाना। तूने उसे बलाओं से दूर कर दिया, तेरा बहुत-बहुत शुक्रिया।

माँ को शायद ये नहीं पता उसने भगत पैदा किया है, जिसे पडोसी के घर पैदा होना था। वो भोली है और ये भूल चुकी है कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं, चाहे कहीं चले जायें।

उसकी हालत बकरे की खैर मनाती माँ से बेहतर मुझे तो नहीं लगती।  

-वाणभट्ट 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

जेनेटिक मैनिपुलेशन

साथियों पिछले कुछ साल मुझे ऐसे लोगों के साथ रहने का सौभाग्य मिला जो भगवान तो नहीं, पर लगभग भगवान ही हैं। जिन्होंने पूरी दुनिया की खाद्य चीजों की नस्ल सुधारने का ठेका ले रक्खा है। सामान्य भाषा में आप इन्हें ब्रीडर कह सकते हैं। ब्रीडिंग यानि कि एक ऐसा विज्ञान जो भगवान की बनायी इस धरती पर अपना योगदान देकर उपलब्ध वनस्पतियों/पशु/पक्षियों को संवर्धित कर रहा है। ताकि कोई भूखा न मरे, और यदि मरे भी तो खा-खा के। (बतर्ज़: धर्मेन्द्र की किसी फिल्म में विलेन बोलता है मै तुम्हें ऐसी जगह मारूँगा जहाँ पानी भी न मिलेगा। इस पर अपने धरम पा जी की रिप्लाई थी "और मै तुम्हें पानी पिला-पिला के मारूँगा)। इसीलिये इस कौम को लगभग भगवान मानना ज़रूरी तो है ही और मज़बूरी भी है। ये न होते तो सारी सृष्टि भूखों मर जाती. ये लोक तो जाता ही जाता, उह लोक भी बिगड़ जाता। क्योंकि भूखे भजन न होहिं गोपाला।

भगवान तो आवश्यकता अनुसार फल, फूल, पेड़, पौधे, पशु, पक्षी और उनकी जितनी आवश्यक थीं, उतनी जातियाँ-प्रजातियाँ बना कर, संतुष्ट हो गये। पर ये कौम भगवान की इस बायोडाइवर्सिटी से भरी दुनिया में नित नयी डाईवर्सिटी ऐड करती जा रही है। नयी-नयी किस्मों पर किस्में दिये जा रही है या देने को आतुर है। हमारे पुरखों ने तो उपलब्ध समस्त वनस्पतियों-प्राणियों में से उपयोगी वस्तुओं को ग्रहण कर ही लिया था। अपने पुरखों ने ये बताया की चिरौंजी कहाँ मिलती है या पुदीने में क्या गुण होते हैं। कडुआ खीरा भले खा लो पर कड़वी ककड़ी और लौकी कतई नहीं। लवण भास्कर चूर्ण में क्या-क्या इनग्रेडीएन्ट पड़ते हैं। मेथी के गुण के क्या होते हैं, उन्होंने खोज निकला था। दाल, चावल, गेहूँ, पपीता खरबूजा, तरबूजा, कटहल, कुंदरू क्या-क्या-क्या खाया जा सकता है, मेरे विचार से ये जान पाना ही अपने आप में एक बड़ा विज्ञान रहा होगा. वो भी बिना किसी आधुनिक यंत्र और प्रोटोकॉल के। इसके लिये हम सदैव अपने पूर्वजों के ऋणी रहेंगे।

पर इन भाइयों ने जब से धरा को अवतरण लिया है, इन्होने पुरखों के द्वारा आइडेंटीफाइड सभी चीजों को और भी अधिक संवर्धित करने का बीड़ा उठा रक्खा है। तुर्रा ये कि जनसंख्या बेतहाशा बढ़ रही है, उसे खिलाने के लिए भोजन तभी आयेगा, जब अधिक उत्पादन वाली प्रजातियों का विकास होगा। सो भाई लोग क्या बछड़ा, क्या मुर्गी, क्या पालक, क्या मूली, सबकी नस्ल सुधारे जा रहे हैं। रोज-रोज नयी नयी प्रजातियों की बाढ़ आ गयी है. कुम्भ के मेले में देसी गाय के बछड़े के दान का प्रयोजन किया जाता है. पर अब की इस वर्ण-संकर व्यवस्था में गोपालकों की चाँदी हो गयी। देसी बछड़ा 40 से 50 हज़ार रुपये में बिका है और एक ही बछड़ा कई बार बिका. इतने वर्षों में कोई नयी खाद्य फसल, फल/फूल या सब्जी तो नहीं खोजी गयी, पर अपने पुरखों के द्वारा खोजी गयी चीजों की नस्ल को सुधार ज़रूर दिया। जिनकी नहीं सुधार पाये, भविष्य में उन सभी की नस्ल सुधारने का दावा भी किया जा रहा है. अधिक लवण और अधिक भास्कर वाली प्रजातियों का चयन संभवत: आसन प्रक्रिया होती, बनिस्पत ऐसी प्रजाति विकसित करने की जिसमें लवण और भास्कर की मात्र बढा दी जाये। अब इन्हें कौन समझाये। और हम रोकने वाले होते भी कौन हैं।   

ऐसी प्रजातियों का विकास हो चुका है या किया जा रहा है, जो सूखे में भी जी सकें और मौसम की मार को हँसते-हँसते झेल जायें। बढ़ती हुई आबादी का हौव्वा बनाया गया है. भाई उत्पादन नहीं बढेगा तो सब के सब भूखे मर जायेंगे। इस लिये अधिक उत्पादन वाली प्रजातियों का विकास ज़रूरी है। इन पर न तो बिमारियों का असर होगा न ही कीट-पतंगों का। हर आदमी के हिस्से में समुचित मात्र में खाना होगा, तभी सभी स्वस्थ और खुशहाल रहेंगे। बकौल किसी शायर "भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोयेगा, चैन की नींद हर इक शख्स यहाँ सोयेगा"। लेकिन आखिर में शायर पेसीमिस्ट हो गया और कहता है "दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है"। क्योंकि जब मै अपने इर्द-गिर्द फटी पड़ रही तोंदों और खाना पचाने के लिये दौड़ते लोगों को देखता हूँ। भारी फ़ीस दे कर डाक्टरों के यहाँ लगी अंतहीन लाइनों को देखता हूँ। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते डायनासोर सरीखे लोगों के देखता हूँ। तो महसूस करता हूँ, खाने की कमी नहीं है। हाँ, दूसरे का हिस्सा खा जाने की होड़ साफ़ दिखाई देती है। प्रकृति ने आवश्यकता के हिसाब से सब दिया है, पर लालच के हिसाब से नहीं। ऐसा मै नहीं कहता हमारे महापुरुषों ने कहा है और कईयों ने इसे दोहराया है। ये बात समझनी ज़रूरी है।

अभी आप तोंद पर टैक्स रख दीजिये, और देखिये, खाने की उपलब्धता बढ़ती है या नहीं। मेरे एक जापान रिटर्न मित्र ने बताया की वहाँ बॉडी मास इंडेक्स के हिसाब से बीमा का प्रीमियम रक्खा जाता है। यदि वो गड़बड़ाया तो आपको जेब ढीली करनी पड़ सकती है। वहाँ बिना इंश्योरेंस के डॉक्टर की फ़ीस भी देना शायद मुमकिन नहीं है और डॉक्टर के पर्चे के बिना दवाई तो खैर मिलने से रही। यहाँ एक भाई साहब इसी चक्कर में गुजर गये कि वो सूखी रोटी नहीं खा सकते थे और ओपन हार्ट सर्जरी मात्र पचास हज़ार में हो जाती है। दूसरी सर्ज़री में किस्मत उनके साथ नहीं थी।   

ये मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे धरती के भगवानों के बीच रहने और उनके पावन विचार जानने-सुनने-समझने का अवसर मिला। एक भाई का विचार था कि जेनेटिक मैनिपुलेशन से ऐसी प्रजाति विकसित की जा सकती है जो हेलिकोवर्पा का दाँत तोड़ने में कामयाब होगी। एक ने फ़रमाया कि मै ऐसी प्रजाति विकसित करूँगा जो धरती के बढ़ते तापमान से बेअसर रहे। एक ने कहा कि मेरी प्रजाति कम पानी में भी अच्छी पैदावार देगी। यहाँ ख़ास बात ये है कि हर कोई ये सुधार अलग-अलग प्रजाति में करने में लगा है। एक ही वैरायटी में ये सारी कोशिशें नहीं की जा रही हैं। एक भाई ने तो छोटी पादप संरचना के पौधे को ऊँचा करने का बीड़ा सिर्फ इसलिये उठा लिया है कि कम्बाइन हार्वेस्टर गेंहूँ की फसल के हिसाब से बनाये गये हैं। मुझ नाचीज़ के मुँह से ये निकल गया कि भाई पौधे को ऊँचा करना आसन है या कम्बाइन को नीचा करना। भाई ने मुझे ऐसा घूरा जैसे कच्चा चबा जायेंगे। खैर मुझे ही अपनी नज़रें चुरानी पड़ गयीं। संभवत: हम हर समस्या का इलाज़ जेनेटिक इम्प्रूवमेंट में खोज रहे हैं। यदि ऐसा ही संभव है तो मेरे विचार से शुरुआत आदमी से होनी चाहिये क्योंकि अधिकांश समस्या की जड़ तो खुद इंसान ही है। कुछ साइंस फिक्शनस और फेंटेसीज़ में ऐसा जिक्र ज़रूर हुआ है। क्या अच्छा होता जो हम ईमानदार-देशभक्त-सत्यनिष्ठ लोगों को भी ब्रीड कर पाते।  

इस धरती पर अवतरित हुए मुझे भी लगभग पचास वर्ष हो चुके है। और मै अब तक के तजुर्बे से ये मानता हूँ कि जिंदगी नयी-नयी चुनौतियाँ लाती है और कभी भी दो समय पर दो चुनौतियाँ एक सी नहीं होती। हर चुनौती पिछले से बड़ी और भयावह महसूस होती है। पर सही प्रबंधन ज्ञान से हमारे पुरखों ने उन्हें सुलझाया है। अभी भी अगर हजारों प्रजातियाँ इस धरती पर है, तो ये सिद्ध होता है की कोई भी नस्ल एक्सटिंकट होना नहीं चाहती और कहीं न कहीं वो संरक्षित और फल-फूल रही है। इन्हीं को एक्सप्लोर किया जाना है और किया भी जा रहा है। जिस प्रकार हर फूल की अपनी अलग रंग-रूप-सुगंध है वैसे ही हर प्रजाति की अपनी विशेषता होती है। इसका आदर किया जाना चाहिये। इंसान के रंग-नस्ल भेद को लेकर तो लोग जागरूक हो रहे हैं पर फसलों, पेंड़, पौधों, पशुओं में ये वर्ग बनाया जा रहा है। एक ही क्षेत्र के लिए 25 लोगों की 25 प्रजातियाँ हैं और हर किसी में कुछ न कुछ ख़ास है पर सिर्फ एक में सब कुछ नहीं है। शायद हो भी नहीं सकता।             

भारत में नदियों का एक व्यापक संजाल है जिसका दोहन अभी भी सम्पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है। जितनी उर्जा, समय और धन हम प्रजातियों के विकास पर कर रहे हैं, उसका कुछ अंश भी अगर जल के समुचित उपयोग पर किया जाये तो हम अधिक से अधिक असिंचित क्षेत्र को सिंचित क्षेत्र में परिवर्तित कर सकते हैं। सूखे और जलवायु परिवर्तन के विपरीत असर को निष्प्रभावी करने के लिये नदीय जल का उचित प्रबंधन हमारी खाद्य सुरक्षा पर धनात्मक दूरगामी परिणाम देगा। विभिन्न चुनौतियों/परिस्थितियों के लिए उचित प्रजातियों का चयन और उनके प्रबंधन से उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता को आसनी से सुधारा जा सकता है. सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से ही काम ख़त्म नहीं हो जाता। आवश्यकता होती है कटाई के उपरांत फसल की समुचित भण्डारण और प्रसंस्करण की। बिना जिसके खेत से उत्पादित खाद्य सामग्री भोजन के रूप में थाली तक नहीं पहुँच सकती। आवश्यकता है तो सही सोच और समग्र दृष्टि की।

- वाणभट्ट  

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

बरहमन की दुआ

इक बरहमन कब से 
कह रहा है 
कि ये साल अच्छा है

हर साल की तरह
चलो मान लो 
इस साल भी सही
जब इतने सालों से मानते आये हो

सकारात्मक दृष्टिकोण रखना है ज़रूरी
इसलिये भी
और
बीती बातों का मर्सिया कब तक पढ़ा जाए  
इसलिये भी

इसलिये भी कि जीने की वज़ह तो है तलाशनी ही
इतिहास को दफ़न करके ही
उसके ऊपर होगी ईमारत खड़ी
सुनहरे भारत के भविष्य की

भावनाओं से देश नहीं चलता
इसलिये ज़रूरी है आवाम की आवाज़ को कुचलना
जिन्हें हमने चलना सिखाया
कैसे सौंप दें उन्हें सत्ता
अभी अपरिपक्व हैं, नादान हैं
उन्हें सियासत का क्या पता

सियासत राज करने के लिये है
या सेवा करने के लिये
यहाँ सियासत सिर्फ़ सियासत के लिये है
इसलिये भी ज़रूरी हैं
नये विचार-नयी सोच
नये ज़ज्बे को क़त्ल कर देना

एक अकेले अन्ना ने, 
भ्रष्ट आचार के विरुद्ध
देश को हिला के रख दें
इतने सालों में ये सिस्टम बनाया है
जिसमें भ्रष्ट से भ्रष्टतम के सर पर
संरक्षण का साया है  

चंद लोगों पर कैसे छोड़ दें देश को
लगे 400 साल अंग्रजों से छुड़ाने में देश को
अभी हमारे तो 60 साल ही हुये हैं
इस संग्राम में 
अभी सिर्फ कुछ ही सेनानी हुये हैं
अब तो दमन की ताक़त भी है, अपने हाथ में
किसे किससे बचाओगे
कब तक खुद बच पाओगे 

इतिहास सबक तो वो सीखें जिन्हें सुधरना है
हमें तो एक नया इतिहास लिखना है
अँग्रेज़ों से लड़ना आसान था
पर अब
अब देश के लिये, 
अपनों से ही लड़ना है

बड़ी मुश्किल से तो हमने आत्मा को मारा है
बड़ी मुश्किलों से अपने ज़मीर को धिक्कारा है
अब उसे मत जगाओ
अपनी नज़रों में हम हैं नहीं गिरने को तैयार
भले ही करने पड़ें कितने भी अत्याचार

सिस्टम को बनाया है,
सिस्टम ने, सिस्टम के द्वारा, सिस्टम के लिये,
इसलिये इस सिस्टम के वास्ते
देश के वास्ते
देश की जनता के वास्ते
इसे मत छेड़ो
जैसे अब तक चलता था, वैसे ही चलने दो

इतने साल आये और चले गये
पिछले दो साल साठ सालों पर भारी रहे 
ये कैसा चमत्कार है 
आन्दोलनकारियों का अज़ब वार है
लाखों की भीड़ बिन नेता के 
अपना हक माँगने को तैयार है 

अब भी वक्त है देश एक नये मुकाम को बढ़ रहा है 
देश की ईमारत की नीव के नीचे दफना दो 
अपनी आत्मा को, ज़मीर को 
पर मत रोको इस तरक्की की रफ़्तार को 
जनता अराजक हो उठी है 
सब समाधान सडकों पर ढूँढती है
भला ऐसे कोई व्यवस्था चलती है

पर मुझे इस साल बरहमन की वाणी सच लगती है 
ये गुजरे कुछ साल बस इसका आगाज़ था
जनता के लिये जनता के द्वारा ही 
सारा नियम कानून निश्चित होगा 
जनता की आवाज़ ही तोड़ेगी तुम्हारी तन्द्रा
देश के नवजवानों की है अब टूटी निद्रा

यही संकेत है कि बरहमन का कहा सच होगा 
देश के बारे में जो सोच सकें, ये देश उनका होगा 
हर नस्ल अपनी पिछली नस्ल से उन्नत रही है
बुजुर्गों को इस बात की बेचैनी क्यों हो रही है

सौंप के देखो इस देश को ज़ज्बों को, जोश को
आन्दोलन दशकों और शताब्दियों में नहीं, वर्षों में होते हैं
नयी उम्र की नयी फसल ने देश को झकझोरा है 
परिवर्तन की बयार ने सबको जोड़ा है 

अब तो हट जाओ कि जनता आती है 
कम से कम 2013 में जो सवेरा हुआ है 
सिर्फ दिल के खुश रखने को नहीं 
किसी सकारात्मक बदलाव के लिये हुआ है

- वाणभट्ट  

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी...

ज़िन्दगी का उसूल है कि वो कुछ नहीं तो तजुर्बा ज़रूर देती है। कुछ ऐसे ही बदलाव ज़िन्दगी में रहे गत कुछ महीनों से। आदमी अपनी चाल चलता है और ग्रह-नक्षत्र अपनी। एकदम ऊपर वाले और एकदम नीचे वाले के बीच में भी कुछ मिडिल आर्डर ऊपर वाले होते हैं। जो शतरंज की बिसात बिछाते हैं और अपने वजीर-बादशाह को बचाने के लिए प्यादों को कुर्बान कर देते हैं।

मिश्र जी का हश्र तो ऐसा होना ही था। सिस्टम में हजारों दोष हैं ये सिस्टम भी जानता है। पर भाई जड़त्व भी कोई चीज़ है। अगर सिस्टम ऐसा न होता तो जो सिस्टम के जो संभ्रांत खिलाडी हैं वो संभवतः सिस्टम से बाहर होते। उनकी ही परिभाषाएं हैं कि अकेला चना भाड़ क्या फोड़ेगा। और ये बात अवाम के जेहन में कूट-कूट के घुसेड दी गयी है। एक्का-दुक्का जो ये गलतफहमी पाल लेता है कि वो देश का भला कर के ही मानेगा, तो सारा सिस्टम उसे दुरुस्त करने में लग जाता है। उसमें लग्गू-भग्गू का रोल अहम् होता है। क्योंकि शहंशाह तो सत्ता के मद में चूर होता है ये दायें और बायें ही होते है जो खबरी का काम करते हैं। और बताते हैं कि हुजूर अमुक इलाके से बगावत की बू आ रही है। उसे निपटाना ज़रूरी है नहीं तो आपकी सत्ता हिल सकती है।

और जिन राजाओं को अपने बल, बुद्धि और विवेक पर भरोसा न हो उन्हें कन्फ्यूज़ करना कोई कठिन भी नहीं है। तो मिश्र जी कहानी "सिस्टम के अन्दर : अन्ना हज़ारे" (http://vaanbhatt.blogspot.in/2011/04/blog-post_12.html) जहाँ ख़त्म हुई वहां से एक नयी कहानी शुरू हुई। मिश्र जी की ईमानदारी को चुनौती देना तो नामुमकिन था। सो उनके ऊपर ड्यूटी का उचित निर्वाह न करने, उच्च अधिकारियों से अभद्र व्यवहार, कार्य संस्कृति बिगड़ने के अनर्गल आक्षेप लगा दिए गए। एक चेतावनी मिली सो अलग से की भविष्य में ऐसी ईमानदारी और देशभक्ति वाली हरकतें कीं तो उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। फिलहाल उन्हें स्थानांतरण से नवाज़ा जा रहा है। लेकिन ये भविष्य के संकेत मात्र हैं।

मिश्र जी का विश्वास और प्रबल हो गया है। जिस रस्ते को उन्होंने चुना है वो यक़ीनन सही है। वर्ना संस्थान और देश से गद्दारी करके जीना शायद उनका दम घोंट देता। मित्रों मिश्र जी को आपकी शुभकामनाओं और शुभेच्छा की सख्त ज़रूरत है। ईमानदारों के लिए जीने का यही एक संबल है।

सत्य पर असत्य की जीत चिर स्थाई तो नहीं दिखाई गयी है अब तक के वक्तव्यों में। और मिश्र जी का मानना है कि नीचे वालों की मंशा के पीछे भी ऊपर वाले की मंशा छिपी होती है। इस कहानी का ये अंत नहीं है। एक नयी शुरुआत कह सकते हैं। 

एक राह रुक गयी तो और जुड़ गयी। मुसाफिर का काम तो बस चलते जाना है।

- वाणभट्ट              

जेन-ज़ी

रात भी नींद भी कहानी भी हाय क्या चीज़ है जवानी भी रघुपति सहाय 'फ़िराक़' की इन पंक्तियों को आप युवावस्था की परिभाषा मान सकते हैं. नेप...