रविवार, 21 सितंबर 2014

निज भाषा बनाम राष्ट्र भाषा

पंडित जी ने हिकारत से अपनी टूटी चप्पल कल्लू मोची की ओर फेंक दी। 'रे कलुआ, जरा दू ठो टाँका मार दे।' कल्लू तन्मयता से कुछ काम कर रहा था। चप्पल धप्प से उसकी निहाई के बगल में  गिरी। उसने सर उठाया और गुस्से को पीते हुए पंडित को तरेरा। बोला कुछ नहीं। फिर घिसी-पिटी चप्पल को देखने लगा। बोला 'पंडित जी दू रुपया लागी।' पंडित जी के आग लग गयी। 'कस में अब हमहू का पैसा देबे के पड़ी।' 'तो फिर खुदै टाँक लो।' कह के कल्लू अपने काम में लग गया।

बिसेसर ने एक झटके से बाल्टी कुयें में डाल दी और पानी खींच रहा था जब किसी ने पीछे से उस पर लाठी का प्रहार किया। 'सरउ तुम्हार ई हिम्मत कि ठकुरन के कुआँ से पानी लेबो।' बिसेसर रस्सी-बाल्टी छोड़ के मारने वाले से भिड़ गया। 'तुम्हार कुल ठकुरई घुसेड़ देबै।' तब तक कुछ और लठैत आ गये। पीट-पीट के भुरकस भर दिया और हाते के बाहर फेंक दिया। लेकिन बिसेसर ने गाँव में चिंगारी सुलगा दी थी।

'लाला मेरे बाप के बाप ने ऐसा कौन सा कर्जा लिया था कि सूद चुकाते-चुकाते मेरा बाप निपट गया। अब भी मूल जस का तस है। मै कुछ नहीं देने वाला।' लाला तैश में आ गया। 'सूद तो तेरे फ़रिश्ते भी चुकायेंगे। जानता नहीं मेरा खाता यमराज का खाता है। मरने पर ही ख़त्म होता है।' घसीटे का हाथ लाला के गिरहबान तक पहुँच गया। 'बोल कब पहुंचा दूँ यमराज के पास। काट मेरा नाम अपने खाते से।' युवा खौलता खून देख के लाला की आत्मा काँप गयी।

आज़ादी के अड़सठ वर्ष बाद हम अपनी उस स्वतंत्रता पर गर्व कर सकते हैं जो अंग्रेजों की ग़ुलामी से मिली। लेकिन हज़ारों-लाखों ऐसी छोटी-बड़ी लड़ाईयाँ भी लड़ीं गयीं, जिनका कहीं ज़िक्र, कहीं चर्चा तक नहीं हुयी। पर इन्ही लड़ाइयों ने भारतीय समाज को वो स्वरुप दिया, जो आज हमारे सामने है। दीन और निर्धन व्यक्ति भी आज अपनी अस्मिता को लेकर जागरूक हो गया है। जो सपना भारत के नीति-नियंताओं ने देखा था, उसने कब मूर्त रूप ले लिया पता ही नहीं चला। आज मज़दूर और कामगार के साथ भी लोग न्यूनतम शिष्टाचार का पालन करते हैं। उन्हें इस बात का भान है मात्र पैसे से आदमी को अब क्रय नहीं किया जा सकता। स्वतन्त्रता स्वतः नहीं मिलती। इसके लिये हर देश में हर पीढ़ी को मोल चुकाना होता है। बहुत से लोगों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों-असमानता को दूर करने के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी है। कहावत, रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था, हर देश-काल में सत्य सिद्ध हुयी है। आज हम जिस भी सामाजिक उन्नति को देख रहे हैं, उसके लिये अनेकानेक उच्च-निम्न-निर्धन-धनाढ्य समाज सुधारकों का त्याग और बलिदान शामिल है। ये सूची अंतहीन है और इसी सूची में कल्लू-बिसेसर-घसीटे के नाम मिल जायेंगे। बहुत कुछ हो चुका लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी भी सर्वत्र विषमतायें अनायास दीख पड़तीं हैं। किन्तु जिस दिशा में देश बढ़ चुका है, निसंदेह वो दिन अवश्य आयेगा जब स्वतन्त्र भारत का प्रत्येक नागरिक वर्षों पुरानी सामाजिक विषमताओं से मुक्त होगा। नयी विषमतायें भी निर्मित हो सकतीं हैं, किन्तु कम से कम पुरानी से तो छुटकारा मिलेगा। 

प्रति वर्ष जब हिंदी पखवाड़े का शुभारम्भ होता है, तो भारत की भाषायी स्थिति भी मुझे सामाजिक स्थिति से अलग नहीं दिखती। साल में पन्द्रह दिन तो हिंदी-प्रयोग के प्रोत्साहन हेतु कार्यक्रम होंगे, उसके बाद ठन-ठन गोपाल। विद्वत सभाओं में हिन्दी का मर्सिया पढ़ा जायेगा। कुछ केले और समोसे डकार के लोग फिर अंग्रेजी के गुणगान में लग जायेंगे। वही ढाक के तीन पात वाली बात। वर्षों की पराधीनता ने हिन्दी ही नहीं देश की समस्त भाषाओं की नींव को हिला के रख दिया है। हर कोई अंग्रेजी भक्त बना घूम रहा है। अंग्रेज़ी आज भी प्रशासन और राज-काज की भाषा बनी हुयी है। कभी हाथी माने एलिफैंट हुआ करता था, अब एलिफैंट माने हाथी बताने पर अभिवावक तीन वर्षीय बालक को दिये अपने अंग्रेजी ज्ञान पर आत्म-विभोर हो जाते हैं।शिक्षा के लिए अभी भी हमारे छात्रों को विदेशी भाषा पर निर्भर रहना पड़ता है। विज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अभी भी मान्यता प्राप्त करने के लिये पश्चिम की ओर देखने को विवश हैं। अधिकांश शोध जब विश्व बैंक द्वारा प्रदत्त ऋण पर निर्भर हैं, तो शोधपत्रों का प्रकाशन तथा प्रतिवेदन भी अंग्रेजी भाषा पर ही तो निर्भर रहेगा। भारत उन्नति के जो स्वप्न आज विदेशी निवेश से देखे और दिखाये जा रहे हैं। वो हमारे ज्ञान और क्षमता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं। हम अपने देश में स्वाधीनता के बीज बोना चाहते हैं, विदेशी तकनीक और विदेशी ज्ञान के आधार पर। हमारी नयी पौध द्वारा हिन्दी के स्थान पर हिंग्लिश का प्रयोग एक सुखद अहसास तो देता है। परन्तु हम अंग्रेजी में पारंगत न हो सके और अपनी राजभाषा हिन्दी भी हाथ से जाती रही। स्थिति त्रिशंकु जैसी है। न घर के न घाट के। 

किन्तु हमारी मिटटी में कुछ बात तो अवश्य है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विषम रहीं हों, अनेक प्रयासों के बाद भी कोई हमारी हस्ती को मिटा नहीं पाया। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये भी बहुत संघर्ष हुए हैं। तब जा कर हिन्दी को बहुत पहले सितम्बर १४, १९४९ राजभाषा का अधिकार मिला है। किन्तु तब से ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में औपचारिकता बन के रह गया है। इस दिवस की घोषणा के लिये भी कम पापड़ नहीं बेले गये होंगे। जितने लोगों ने स्वतंत्रता के लिये झंडे गाड़े होंगे उतने ही लोग हिन्दी के लिये समर्पित हुये होंगे। किसी ने हिन्दी में शपथ ली होगी तो किसी ने हिन्दी के प्रोत्साहन के लिये पर्चे बाँटे होंगे। किसी हिन्दी में शोध-प्रतिवेदन लिख डाला तो किसी ने अंग्रेज़ी स्कूलों का बहिष्कार किया। किसी ने अंग्रेजी सभा में अंग्रेजी बोलने से मना कर दिया तो किसी ने हिन्दी भाषा में व्यावसायिक परीक्षा के प्रश्नों के उत्तर लिख डाले। हिन्दी के लिये आंदोलन भी हुये और जलसे भी। तब जा कर बात पखवाड़े पर सहमति बनी होगी। हम अपनी बोल-चाल, चाल-ढाल, जाति-धर्म के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि उसके लिये हम मरने-मारने-आंदोलन-फ़तवे-जिहाद सब के लिये तैयार हैं, किन्तु देश के लिये मरने का काम भगत सिंहों और चंद्रशेखर आज़ादों के लिये छोड़ रखा है। जितनी सम्वेदना अपनी जाति-धर्म-भाषा को लेकर है उतनी यदि देश के प्रति होती तो अंग्रेज़ कितने दिन यहाँ ठहर सकते थे। किन्तु उन्होंने हमारी विषमताओं को हवा दी। देश को भाषा-धर्म-जाति के आधार इस तरह बाँटा कि स्वतन्त्रता के अड़सठ साल में भी हम उन्हीं विवादों में अटके हुये हैं। अनेकता में एकता यदि है तो क्या देश हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान पर एक नहीं हो सकता। हिन्दू से मेरा अभिप्राय हिंदुस्तान के नागरिकों से है। किन्तु ये सहज बात भी विवाद बन जाती है। और यही बात हमारे देश-प्रेम पर प्रश्नचिन्ह खड़े करतीं है। हिन्दी पखवाड़ा कब हमारे जीवन को रूपांतरित करेगा, हर हिन्दी प्रेमी उस दिन की उत्कंठा पूर्वक प्रतीक्षा कर रहा है।

स्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों, किन्तु बादलों के उजले किनारे चमक रहे हैं। सभी देशी और विदेशी भाषा साहित्य, और चलचित्र आज अनुवाद और डबिंग के माध्यम से हिन्दी भाषियों को सहज उपलब्ध है। सभी विदेशी कम्पनियाँ अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी भाषा में कर रही हैं। विदेशी खेल और समाचार चैनेल हिन्दी में कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। कारण व्यावसायिक हो सकते हैं किन्तु इन कंपनियों के विपणन सर्वेक्षण इन्हें हिन्दी में प्रचार-प्रसार के लिए बाध्य करते हैं। यह एक शुभ संकेत है। आशा के स्वर और भी मुखर हो जाते हैं जब देश के प्रधानमन्त्री और मन्त्री, विदेशी भूमि पर अपनी बात बुलंदी के साथ हिन्दी में रखते हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के उत्थान के लिये पखवाड़े मनाना कहाँ तक उचित है, यह वाद-विवाद का विषय हो सकता है। किन्तु इन क्षेत्रों में गैर-हिंदी भाषी को प्रोत्साहित करना हिन्दी दिवस मनाने का एक प्रयोजन अवश्य होना चाहिये। अहिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिन्दी के विकास हेतु इस पखवाड़े का महत्त्व बढ़ जाता है। साल में मात्र पंद्रह दिन एक भाषा का प्रयोग करके हम एक भाषा में निपुण नहीं हो सकते, न ही उस भाषा से प्रेम कर सकते हैं। काश कि हम इन प्रदेशों में हिन्दी-वर्ष मनायें। देश के सभी महान विचारकों ने हिन्दी को भारत को जोड़ने वाली भाषा कहा है। थोड़े सरकारी सहयोग, प्रोत्साहन और जन-अभियान से वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त होगा।

सामाजिक सरोकारों के लिये जिस तरह कल्लू, बिसेसर और घसीटे जैसे अज्ञात लोगों ने छोटी-छोटी किन्तु निर्णायक लड़ाइयाँ लड़ीं। वैसी ही लड़ाईयाँ हिन्दी के लिये भी लड़ीं जा रहीं हैं। एक प्रश्न मैं सदैव पूछता हूँ कि यदि आज अँग्रेज़ों का राज होता तो हम किस तरफ़ होते। जिस दिन हम अपनी व्यक्तिगत अस्मिता को, भाषा और देश की अस्मिता से जोड़ देंगे, हिन्दी विश्व-पटल पर राज करने के लिये सक्षम हो जायेगी। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाने के लिये हमें क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। एक राष्ट्र भाषा, जो विश्व-भाषा बनने का सामर्थ्य रखती हो, के लिये सम्पूर्ण देश को एकमत होना होगा। अन्यथा पखवाड़े का अंत भी वही होता रहेगा, जैसा हमारे देवी-देवताओं का होता है। कुछ दिनों के लिये प्राण-प्रतिष्ठा फिर विसर्जन। 

भारतेंदु जी की पीड़ा इन शब्दों में सहज अभिव्यक्त होती है "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल"। वो भी सन १८७० के आस-पास। संघर्ष जारी है और रहेगा, हिन्दी के हिन्द की जन-भाषा बनने तक। फिर इसे राष्ट्र-भाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता। 

- वाणभट्ट      

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कृष्ण चेतना से

शरशय्या पर लेटे लेटे पितामह मुस्करा रहे थे। दर्द असह्य था। किन्तु अनायास मुस्कराहट का आ जाना अकारण नहीं हो सकता। कृष्ण ने इसे भाँप लिया। बोले पितामह इस कष्ट साध्य स्थिति में कोई विलक्षण व्यक्ति ही आनन्दित हो सकता है। क्या मै आपके आनन्द का कारण पूछ सकता हूँ। 

पितामह ने गम्भीर होने का प्रयास किया किन्तु बरबस हँसी छूट गयी। बोले कृष्ण - तुमसे क्या छिपा है। तुम्हारी माया तुम ही जानो। पर एक बात बताओ, पाण्डव जिन्होंने सम्पूर्ण जीवन धर्म और धर्म की रक्षा के लिये समर्पित कर दिया, उनके जीवन में कभी कष्टों का अन्त नहीं हुआ। जबकि तुम सदैव उनके साथ रहे। और कौरव जो अन्याय और अधर्म में जीवनपर्यन्त लगे रहे, उनका अधिकांश जीवन सुख और वैभव में बीता। किसे लाभ हुआ और किसे हानि इसी का आँकलन कर के मै मुस्करा रहा था।

कृष्ण अपनी चिरपरिचित शैली में मुस्कराये। पितामह प्रभु ने मनुष्य को कर्म करने का अधिकार दिया है। सही-गलत, धर्म-अधर्म के आँकलन का अधिकार नहीं दिया है। ये अधिकार उनके पास ही सुरक्षित है, अंतिम निर्णय भी उन्हीं का है। और मनुष्य है कि न्यायधीश बना फिरता है। हर काल में द्वैत रहा है। धर्म की स्थापना के लिये अधर्म आवश्यक है अन्यथा धर्म अपना अर्थ खो देता। दुःख के बिना सुख का अस्तित्व क्या रह जायेगा। और भगवान भी आदमी की तरह ही स्वार्थी होते हैं, वो चाहते हैं कि मनुष्य उनकी बनायी सृष्टि के लिये, उनके प्रति कृतज्ञ रहे, उन्हें सदैव स्मरण करता रहे। किन्तु मनुष्य है कि सुख आते ही सबसे पहले प्रभु को विस्मृत कर देता है। सफलता का सारा श्रेय तो स्वयं लेने लगता है। और असफलता प्रभु के ऊपर थोप देता है। 

इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव प्रभु की एक सर्वोत्कृष्ठ रचना है। यदि मनुष्य को कोई छोटा सा उपहार देता है तो वो धन्यवाद ज्ञापित करना नहीं भूलता। और प्रभु मानव को जितने अमूल्य उपहार सहज रूप से उपलब्ध करा दिये हैं, उसके लिये धन्यवाद प्रेषित करने का मनुष्य के पास समय नहीं है। इसलिये प्रभु को सुख-दुःख का चक्र चलाना पड़ता है। वैसे भी ईसीजी यन्त्र में कौन सीधी लाइन देखना चाहता है। जब तक रेखा ऊपर-नीचे हो रही है, जीवन चल रहा है। पितामह ने कन्फूज़ हो कर पूछा - ये ईसीजी यन्त्र क्या है। पितामह इसे जानने के लिये आपको कलियुग में पुनः धरती पर आना पड़ेगा। आप बस ये समझ लीजिये कि इसके द्वारा आपके हृदय-नाड़ी की गतिविधि को चित्रित किया जा सकेगा। इसलिये धर्म-अधर्म दोनों प्रभु की ही रचना है। इसका संतुलन बनाये रखना उनका काम है। जो हो रहा है, सही हो रहा है और जो होगा सही ही होगा। क्योंकि कर्ता जब प्रभु है तो क्या सही और क्या गलत। इस पूर्णरूप से आदर्श स्थिति में परिवर्तन की सम्भावना नहीं है।

रही मेरी बात तो विपरीत परिस्थियों में भी जो धर्म का साथ न छोड़े, वो सदैव मुझे अपने साथ पायेगा। 

-वाणभट्ट 

रविवार, 10 अगस्त 2014

गंगा सेवा

पण्डित दीना नाथ मिश्र गंगा मइया की ओर गहन चिन्तन में डूबे निहार रहे थे। पीछे से आती जलते माँस की तीक्ष्ण गन्ध उन्हें विचलित कर रही थी। ऐसा नहीं था कि उनका श्मशान आना पहली बार हुआ हो। कई बार वो पहले भी इस भूमि पर आ चुके थे। यहाँ आ कर ही आत्म-ज्ञान मिलता था, जीवन की क्षण-भंगुरता का, संसार की निस्सारता का, शरीर की नश्वरता का।पर आज मन कुछ ज्यादा उद्विग्न था।

पहली बार उनका किसी अंतिम क्रिया में आना अपने बाबा की मृत्यु के कारण हुआ। अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े दीना नाथ जी जन्म वाराणसी के असी घाट के पण्डित रामाधार मिश्र के यहाँ हुआ। उनके पिता और बाबा कथा वाचन से जीविकोपार्जन करते। सबसे बड़ा होने के कारण पण्डित दीना नाथ की शिक्षा-दीक्षा बाबा और पिता जी के कठोर नियंत्रण में हुयी। सूर्योदय से पहले उठ कर गंगा स्नान से उनके दिन की शुरुआत हुआ करती। कर्म-काण्ड और कथा वाचन  के सारे गुर उन्हें सहज उपलब्ध थे। जिसने अनियंत्रित जीवन का एक दिन भी न देखा हो, उसे नियंत्रण की कठोरता का तनिक भी आभास नहीं होगा। कम उम्र में ही उनकी पंडिताई के चर्चे होने लगे थे। उस समय उनकी स्थिति एक रट्टू तोते से ज्यादा नहीं थी। बाहर से थोपा ज्ञान आजतक कभी किसी काम आया है क्या। ज्ञान का उद्भव तो अंतर में होता है। धीरे-धीरे उन्हें समझ आ गया ये सारा ताम-झाम जीविका अर्जित करने के साधनों से अधिक नहीं है। इस सारी तपस्या का सार था - दो वक़्त की रोटी। उन्होंने जीवन में अपने पिता और बाबा की तरह जब और कुछ नहीं सीखा तो उन्हें भी जीवन-यापन के लिये इसी विधा का सहारा लेना पड़ा। कर्म-काण्ड, वेश-भूषा, आचार-व्यवहार सब नाटक करते-करते कब जीवन का हिस्सा बन गये, दीना नाथ जी को इसका पता ही नहीं चला। गंगा मइया और भगवान में आस्था इतनी गहरे पैठ गयी की पूरा जीवन प्रभु-चरणों में समर्पित हो गया। धैर्य का स्तर इतना बढ़ गया कि हर होनी-अनहोनी में प्रभु की इच्छा ही दिखाई देती।

बाबा का शव अंतिम यात्रा करते हुये मणिकर्णिका घाट पर चिता में लगाया जा चुका था। कल तक प्रभु प्रेम से उल्लसित रहने वाले बाबा का मुख अभी भी अनन्त शांति विस्तारित कर रहा था। पिता जी डोम से अग्नि लेने गये हुये थे। रिश्ते-नातेदार को, जो कल तक बाबा के प्रिय और करीबी थे, अंतिम क्रिया की बहुत जल्दी थी। एक ने कहा - बेटा देखो पण्डित जी कहाँ रह गये। सीढियाँ चढ़ के जब ऊपर पहुँचे तो देखा पिता जी डोम के आगे गिड़गिड़ा से रहे थे। अग्नि का एक कोयला देने के लिये वो जो मूल्य माँग रहा था, उसे देने में उनकी असमर्थता डोम की समझ नहीं आ रही थी। इस तिमाही उसे ठेका तीस हज़ार में मिला था। अगर वो इसी तरह सब पर दया करता रहा तो कमायेगा क्या। यहाँ वैसे भी कोई रोज-रोज तो आता नहीं कि फिर वसूल लें। डोम ने एक दृष्टि सद्यवयस्क दीना नाथ पर डाली और अँगीठी से जलता हुआ एक अंगार कुशा पर रख दिया।

तेरहवीं के बाद पिता जी ने एक दिन समझाया। बेटा पैसा पश्चिम में है। पूरब में तो यजमान अपने ही दारिद्र्य से उबर नहीं पा रहा है। थोड़ा बहुत पुण्य कमाने के लिये हम जैसे पंडितों को दान-दक्षिणा दे देता है। इससे भरण-पोषण तो हो सकता है किन्तु समय-असमय के लिये धन संचय की सम्भावना नहीं के बराबर है। तू अपने काम में निपुण है। गुणग्राही लोग तेरी विद्या का आदर करेंगे। तेरे सामने पूरा जीवन पड़ा है। यहाँ से बाहर निकल। बिठूर में अपने बनारस के एक मित्र हैं, तू उनके पास चला जा। गंगा मइया तुम्हारा कल्याण करेंगी।

पिता की आज्ञा को भगवान सन्देश मान दीना नाथ जी बिठूर आ गये। और यहीं के हो कर रह गये। कालांतर में उनका विवाह हुआ और दो पुत्र रत्नों की प्राप्ति भी। गंगा-स्नान, कर्म काण्ड और कथा वाचन उनके जीवन अभिन्न अंग बन चुके थे। किन्तु उन्होंने बच्चों को कर्म-काण्ड से विरत रख समीप के सरकारी विद्यालय में शिक्षा दिलायी। कथा वाचन की उनकी प्रतिभा के कारण उनका नाम कानपुर में काफी प्रसिद्ध हुआ। कुल मिला कर यहाँ उनकी स्थिति पिता जी की तुलना में कुछ बेहतर थी। एक एलआईजी मकान और बच्चों की बंगलौर और पूना में नौकरी, इससे ज्यादा उन्होंने ईश्वर से माँगा होता तो शायद वो मना न करता। पर धैर्य के धनी दीना नाथ जी इतने से ही संतुष्ट थे। उनके लिये सब गंगा मइया का प्रसाद और बाबा-पिता जी के आशीर्वाद से ज़्यादा कुछ नहीं था। बच्चों के नौकरी में आ जाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो चली थी। किन्तु पैसे का आनन्द लेने वाली प्रवृत्ति के लिये उम्र निकल चुकी थी। बीवी और बच्चे कभी-कभी उनकी इस पंडिताई का उपहास भी उड़ाते। किन्तु पंडित जी के कर्म-काण्ड में रत्ती भर बदलाव की कोई सम्भावना नहीं थी।

आज सुबह-सुबह खबर आई कि एक यजमान नहीं रहे। उम्र कोई चालीस की रही होगी। पण्डित जी अपनी मोपेड ले, लाश के अस्पताल से आने के पहले वहाँ पहुँच चुके थे। यजमान की पत्नी बेसुध पड़ीं थीं। बच्चे छोटे ही थे। नाते-रिश्तेदारों को खबर कर दी गयी थी। कुछ लोग पहुँच भी गये थे। पास-पड़ोस, मोहल्ले के कुछ लोग भी खड़े थे। एम्बुलेंस वाला पैसे माँग रहा था। जो रिश्तेदार आये थे, वो दूर के थे और जेब में हाथ डालने को तैयार न थे। जिनकी मृत्यु हुयी थी, थोड़ा कम सोशल व्यक्ति थे। कथा में इनके यहाँ आने वालों की संख्या कम ही रहती, इसलिये पण्डित जी को दक्षिणा भी कम मिलती। पड़ोसियों को भी घर की आर्थिक स्थिति का भान रहा होगा। पण्डित जी ने पड़ोसियों आह्वाहन किया - कोई एम्बुलेंस का पैसा दे दे। एक ने कहा - हम लोग ऑफ़िस निकल रहे हैं, पण्डित जी आप भी निकल लो।खामख्वाह बड़ी अम्मा बनने की ज़रूरत नहीं है। घर वाले आ ही रहे होंगे। हम सीधे घाट पर पहुँच जायेंगे। रुकेंगे तो एक छुट्टी खराब होगी।ऐसी परिस्थिति में वहाँ से निकल जाने के विकल्प को उनकी अंतरात्मा ने मना कर दिया। प्रत्यक्ष रूप से उन्होंने कहा आप लोग चलिये। उनके जाने के बाद पण्डित जी ने अपने बटुये से आवश्यक राशि दे कर एम्बुलेन्स वाले को विदा किया। और तेज कदमों से समीप के एटीएम की ओर बढ़ लिये।

भैरव घाट का दृश्य विकट था। जनसँख्या विस्फोट के कारण जहाँ जाओ वहीं भीड़। पाँच -छः चितायें जल रहीं थीं। उतनी ही की तैयारियाँ चल रहीं थीं। लकड़ी वाले, महाब्राम्हण, जलाने वाले सभी ने पूरे शहर का बटवारा कर रखा था। इलाके के अनुसार ही मृतक का क्रिया-कर्म कौन करेगा ये निश्चित होता है। किसी को किसी के दुःख से कुछ लेना-देना नहीं। हर तरफ़ गन्दगी का साम्राज्य। और इसी गन्दगी के बीच महाबाह्मण आत्मा की शांति के लिये विविध विधान रच रहे थे। पार्थिव शरीर के ऊपर से माला-फूल उठा कर किसी वहीं फेंक दी, तो किसी ने गंगा जी में। कोई मृतक शरीर को गंगा जी के पावन जल में डुबकी लगवा रहा है। किसी ने चिता की राख नदी की ओर धकेल दी। कुछ श्मशान में रहने वाले बच्चे मखाने और पैसों के चक्कर में लाश के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे थे। कुछ रात में रोटियाँ सेंकने के लिये अधजली चिताओं से लकड़ियाँ निकाल कर उसे गंगा जी में बुझा रहे थे। महाबाह्मण और चिता जलाने वाले अपनी धुन में थे। ऐसा मौका बार-बार तो आता नहीं। थर्ड जेंडर यदि पृथ्वी रूपी नरक में पैदा होने पर वसूली कर सकता है तो उनका हक़ तो और भी ज्यादा है। वो तो सारे कार्य-कलाप आत्मा को आवा-गमन से मुक्त करने के लिये कर रहे हैं। एक मंतर गलत पढ़ दिया तो आत्मा कहाँ जायेगी इसकी गारेंटी कौन लेगा। पैसों के लिए चिक-चिक जारी थी। 

पूरब में लोग दहन के पश्चात अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित करके ही घर जाते थे। पर पश्चिम में चिता जलते ही सब सरकना शुरू कर देते। अस्थि एकत्रित करके उसके विसर्जन का कार्य अगले दिन किया जाता। चिता जल चुकी थी। पण्डित जी गंगा के किनारे सीढ़ियों की ओर निकल आये। उनके मन में उथल-पुथल मची थी। क्या हो रहा है, हमारे देश को। पड़ोसियों और इष्ट-मित्रों द्वारा कन्धा देने में भी कोताही।मृत्यु के द्वार पर भी कारोबार। श्मशान के लोगों का अमानवीय व्यवहार। कई बार यहाँ आना हुआ पर आजतक वो कभी इतने व्यथित नहीं हुए थे। आज न जाने क्यूँ उन्हें ये लग रहा था कि ये सब उनकी लाश के साथ हो रहा है। 

किसी ने पीछे से आ कर पण्डित जी के कन्धे पर हाथ रखा। आइये पंडित जी आचमन कर लेते हैं, नहाने के लिए कपडे तो लाये न होंगे। उनके साथ पंडित जी कुछ और सीढियाँ उतर के गंगा तट तक पहुँच गये। गंगाजल में अजीब पीलापन था। बिठूर में शहर में घुसने से पहले की गंगा और भैरव घाट की गंगा के रंग में अंतर उनकी आँखों में खटक गया। बायीं ओर शहर का मुख्य नाला धारा-प्रवाह गंगा जी में गन्दगी विसर्जित कर रहा था। पण्डित जी बिना आचमन किये ही लौट लिये।  

जिस गंगा ने जीवन भर उन्हें इतना कुछ दिया मर के उसे मै गन्दा करूँ, ये सवाल उनके जेहन में कौंध रहा था। उन्होंने डायरेक्टरी में देख कर मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को फोन लगा दिया। सर मै देहदान करना चाहता हूँ...उसके लिये क्या करना होगा...क्या ये सम्भव है कि मेरे मृत शरीर का एक भी हिस्सा गंगा जी में ना जाये...इसे आप मेरी अंतिम इच्छा समझ लीजिये...कल मिलता हूँ।     

- वाणभट्ट

रविवार, 3 अगस्त 2014

फटा पोस्टर

एक अगस्त का अख़बार हमेशा की तरह बोर ख़बरों से भरा पड़ा था। कानपुर में बिजली कटौती। पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोत्तरी। सभी चैनलों के बाबा ये कहते रहते हैं कि सुबह-सुबह भगवान को याद करो तो दिन पॉजिटिविटी से भर जाये। पर अख़बार पलट लेने की बीमारी का क्या किया जाये। आम आदमी को तो इसी धरती पर जीना है। इस ग़रज़ से अख़बार पलट लेने में कोई बुराई नहीं है। सो मैंने भी अख़बार पलट लिया। और न पलटता तो अफ़सोस रहता। कोई अगर गलती से पूछ लेता कि आज कोई ख़ास खबर तो मै क्या जवाब देता। आज अख़बार में फिल्म 'पी के' का पहला प्रोमोशनल पोस्टर रिलीज़ हुआ। फिल्म गज़नी से ही आमिर के लक्षण समझ नहीं आ रहे थे। इस बार तो भाई पूरे साफ़ थे, कपड़ों से।

मै अपने एमएसटी ग्रुप के साथ कानपुर-लखनऊ मेमू में ट्रेन में जगह घेरने की जद्दोज़हद में लगा था। सारा ग्रुप एक-दूसरे के लिये जगह का जुगाड़ कर ही लेता। सब साथ-साथ बैठते। ग्रूप के खबरची त्रिवेदी ने अख़बार निकाल लिया। और पूरी तन्मयता से पढने लगा। उसके अगल-बगल बैठे बाजपेयी और लोहानी ने भी अपनी नज़रें अखबार में गड़ा दीं। पन्ने पलटते रहे और मैं 'पी के' के पोस्टर पर इनकी भाव-भंगिमा का इंतज़ार करता रहा। मुझे पूरी उम्मीद थी कि ज़ोर का झटका धीरे से लगने वाला है।

उस पृष्ठ पर पहुँचते ही तीनों की आँखें अप्रत्याशित दृश्य देख चमक उठीं। भरपूर निगाह मार के त्रिवेदी ने अखबार का वो पन्ना मेरी ओर कर दिया। देख भई ये लोग अपनी फिल्म को हिट कराने के लिये कुछ भी कर सकते हैं। अब मैंने उस पृष्ठ पर गहन दृष्टि डाली। विधु विनोद और हिरानी की फिल्म है 'पी के'। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्में मैं 'सजा-ए-मौत' और 'खामोश' के ज़माने से देख रहा हूँ। वो भी हॉल में। तभी से मै इनका मुरीद बन चुका था। 'परिंदा' और '1942 - अ लव स्टोरी' के बाद वे किसी परिचय के मोहताज नहीं रह गये। 'एकलव्य' के अलावा उनकी किसी फिल्म ने मुझे निराश नहीं किया।  यही बात कुछ हद तक आमिर के साथ भी लागू है। उसकी फिल्में हर वर्ग के दर्शक का ध्यान रखतीं हैं। तो जो सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक बात थी कि ये टीम अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिये नहीं जानी जाती। इनका नाम सुन कर लोग ख़ुद-ब-ख़ुद हॉल तक पहुँच जाते हैं। ये शायद पहली बार है जब चोपड़ा को पूरे एक पेज का विज्ञापन देना पड़ा है। आजकल फिल्मों पर दाँव इतने बढ़ते जा रहे हैं कि इस विज्ञापन से मुझे कोई आपत्ति होने से रही। पहले ही दिन में सौ करोड़ का टारगेट रख कर शाहरुख़, सलमान और आमिर को साइन किया जाता है। इसलिये ये अपने कपड़े तो उतारेंगे ही और दूसरों के भी।

आमिर-सलमान-शाहरुख़ और मुझमें एक बात कॉमन है। हमारा इयर ऑफ़ बर्थ सेम है। ये बात अलग है कि मैंने बम्बई का रुख नहीं किया नहीं तो शायद खानों के बीच एक भट्ट भी शामिल होता। ये सभी अपनी फिल्मों के बारे में सस्पेंस बना के चलते हैं। चोपड़ा-हिरानी-आमिर की जो टीम आखिर तक अपनी फिल्मों के बारे में कुछ नहीं बताती थी। उसका इस तरह का विज्ञापन थोड़ा अप्रत्याशित है। लोग उनकी फिल्मों का इंतज़ार करते हैं। जो एक सरप्राइज़ ट्रीट की तरह होतीं हैं। हर बार नये कलेवर में। हर बार नयी कहानी। हर बार किस्सागोई की नयी मिसाल। पर इस बार दिसम्बर की फिल्म के लिये अगस्त में प्रमोशन चौंकाने वाला काम था। 

मैंने पोस्टर को और गौर से देखा। तो देखा रेलवे ट्रैक के स्लीपर लकड़ी के थे। आमिर ने टू-इन-वन के पीछे अपने शरीर का बाकी हिस्सा छिपा रखा है। मोनो स्पीकर वाला साउंड सिस्टम देखे भी अरसा हो गया। ये दोनों ही बीते ज़माने की चीज़ हैं। सीन देख के कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कोई विक्षिप्त व्यक्ति अपने कपड़े फाड़ के खड़ा हो गया हो। पर सेंसर बोर्ड के डर से उसे टू-इन-वन पकड़ा दिया गया हो। इस दृश्य में अश्लीलता देख पाना मेरे बस की बात नहीं थी। ऐसा आये दिन दिखता ही रहता है। लोहानी जी बोल उठे देखो ये लोग किस हद तक गिर गये हैं। फिल्म हिट कराने के लिए नंगे होने से भी इन्हें कोई ऐतराज़ नहीं। त्रिवेदी जो पिछले सात सालों से एमएसटी कर रहा था। बोला गुरु ये मामला कुछ अपनी तरह का है। लगता है आमिर कोई एमएसटी वाला बना है। साला रोज ट्रेन लेट। ७२ किलोमीटर के सफ़र में तीन घंटे। अड़ोसी-पडोसी, यहाँ तक कि बच्चे भी पहचानना भूल गये हैं। बीवी को बस तनख्वाह से मतलब है। दस साल होते-होते शायद मेरा हाल भी ऐसा ना हो जाये। लेकिन यार अब टू-इन-वन तो मिलता नहीं आइपॉड से कैसे काम चलेगा।   

अगले दिन नैतिकता के ठेकेदारों ने इस विज्ञापन को कोर्ट में घसीट लिया। उनकी वैचारिक नग्नता  का क्या किया जाये। फिल्म तो हिट होगी ही। और मेरे साथ-साथ वो लोग तो ज़रूर देखेंगे, जिन्हें इस दृश्य पर ऐतराज़ होगा। टीम को बधाई एडवान्स में। ये तो बानगी है अभी और हथकण्डे आजमाने बाकी हैं।  

 -वाणभट्ट 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

खुली चिट्ठी

ये सरकार क्या बदली, जिसे देखो राय बहादुर बना घूम रिया है। इसके पहले की सरकारें तो कान में कड़ुआ तेल डाले पड़ीं रहतीं थीं। पर अब तेल के दाम जब बढ़ गये हैं तो लोग एक-एक बूँद तेल खाने के काम में लाना पसंद कर रहे हैं। कान में डालने वालों पर स्विस बैंक में अकाउन्ट होने का शक़ हो सकता है। सीबीआई और आयकर वाले तो छुट्टा सांड की तरह घूम रहे हैं। काले धन की उगाही स्विस बैंक से कर पाना थोड़ी टेंढ़ी खीर है। इसलिये देश के ज़र्रे-ज़र्रे में व्याप्त ब्लैक मनी वालों को मेरी ये राय है कि कोई भी ऐसा काम न कीजिये जिससे किसी को आप पर शक़ हो सके। सरकार के जासूस सब्जी मंडी तक में छाये हुए हैं। कौन प्याज़ और कौन टमाटर खा रहा है इसका ब्यौरा प्रतिदिन सरकार को भेजा जा रहा है। अगर नज़र में चढ़ गए तो ये न कहना कि आगाह नहीं किया। 

बात राय बहादुरी से शुरू हुयी थी। सब लोग अपने-अपने क्षेत्र के विषय में सरकार को राय दे रहे हैं। वो भी खुली चिट्ठी के रूप में। सरकार को पढ़ने की फ़ुर्सत मिले न मिले। पर अड़ोसी-पड़ोसी को तो ये चिट्ठी दिखाई जा सकती है कि फ़लाँ विषय पर उन्होंने सरकार को क्या राय दी है। लोग हड़बड़ी में हैं कि कहीं कोई काम उनकी राय के बिना हो गया तो क्रेडिट सरकार ले जायेगी। इसलिये खुली चिट्ठियाँ अख़बारों में छपवायी जा रहीं हैं। चाहे उद्योग का मसला हो, चाहे विदेश नीति का, चाहे सुरक्षा का, चाहे कृषि का, चाहे काले धन का। हर कोई क्रेडिट लूट लेना चाहता है। वो गर्व से बताते हैं कि वित्त मंत्री ने उन्हीं के कहने पर रेडीमेड कपडे में टैक्स बढ़ा दिया ताकि लोग कपड़े मोहल्ले के झुम्मन टेलर की दुकान पर ही सिलायें। आजकल ज्ञान टीवी और वीडियो के माध्यम से सहजता से प्राप्त हो सकता है इसलिये एलसीडी के दाम कम कर दिए गये। वाट्सएप से लोग अपना ज्ञान शेयर कर सकते हैं इसलिये मोबाइल सस्ते करना ज़रूरी था। 

पर गुटके-तम्बाखू पर टैक्स बढ़ा कर सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। इसे बिना खाये तो बहुतों की अक्ल का ताला ही नहीं खुलता । गुटखे को मुख में धारण करके बोल पाना कतिपय मुश्किल होता है। जब आदमी चुप होगा, तभी तो सोच पायेगा, विचार आयेंगे। बड़े-बड़े खिलाड़ी खेल में ध्यान लगाने के लिये चुइंगम चबाते नज़र आते हैं। कैमरे के सामने चुल्लू भर थूक उगलने में उन्हें शर्म आती होगी। इसलिये तमाम मल्टीनेशनल (मेरी नज़र में एण्टीनेशनल) कम्पनियाँ चुइंगम के निर्माण में रत हैं। जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों की देशी मुद्रा विदेशों में जा रही है। गुटका हमारे स्वावलम्बन का प्रतीक है। कम से कम ये एक ऐसा उद्योग है जो स्वदेशी तकनीक और ज्ञान पर पूरी तरह आधारित है। इस उद्योग को लगा के रातों-रात कितने फ़क़ीर, धन्ना सेठ बन गये। सोच तो बहुत लोग सकते हैं पर सोच कर के बोल पाना एक कठिन कार्य है। बहुत लोग इसलिये नहीं बोल पाते कि ऊपर वाले को बुरा लग जायेगा। ऊपर वाले को बुरा लगा तो उनका भला तो होने से रहा। तो सोच और बोल वही सकता है जिसका माइंड इज़ विदआउट फियर। गुटका खाने वाले निश्चित रूप से फीयरलेस लोग होते हैं। ये आपके ऊपर थूक दें और लड़ने लग जायें कि गलती आपकी है कि आप उनके मुँह और ज़मीन के बीच जानबूझ कर आ गये। अभी चीन को इस शौक़ का पता नहीं है वर्ना हमारा पान, हमारा तम्बाखू, हमारा गुलकन्द हम ही को चाँदी के वर्क में लपेट के बेच दे।  

मुझे पहले भी कोई जल्दी नहीं रही। आपाधापी में कोई भी महान चिंतक काम नहीं कर पाया है। चिंतन अपने आप में एक महान कार्य है। पर इस देश में कर्मण्येवाधिकारस्ते की ऐसी जबरदस्त फीलिंग है कि लोग बिना सोचे समझे काम किये जा रहे हैं। कोई सोचे तो बहुत से काम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़े। बहुत से पुनीत कार्य तो लोग सिर्फ़ इस गरज से कर रहे हैं कि सरकार ने बजट एलोकेट कर दिया है। उस बजट को ठिकाने लगाने के लिये काम करना पड़ रहा है। मज़बूरी ये हो गयी है कि बजट को हिल्ले लगाना सबसे बड़ा काम हो गया है। एजी, सीएजी, चिल्लाते रहें कि फण्ड का मिसयूज़ हुआ है, पर फण्ड को कंज़्यूम करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें क्या मालूम। ये आउटसोर्सिंग न होती तो कितने ही ठेकेदार और बिचौलिये जो आलिशान गाड़ियों में घूमते हैं, आज चाय-पान बेच रहे होते। एक दलाल ने तो अधिकारी को चैलेंज कर दिया कि बिना मेरे सहयोग के आप एक आइटम खरीद के दिखाओ। तीन कोटेशन तो हम ही मुहैया करा सकते हैं। 

फिनलैंड एक छोटा सा देश है। सुना है वहाँ किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले सालों डिस्कशन होता है। विचार विमर्श के वर्षों में यदि उस कार्य की आवश्यकता महसूस नहीं हुयी तो प्रोजेक्ट ड्राप कर दिया जाता है। लेकिन एक बार जब प्रोजेक्ट अप्रूव हो गया तो उसे टाइम से खत्म करने के प्रयास किये जाते हैं ताकि प्रोजेक्ट कॉस्ट न बढ़े। हमारे यहाँ फ्लाईओवर बनाने के विचार आते ही मंत्री जी उसका शिलान्यास करने पर आमादा हो जाते हैं। और प्रोजेक्ट जितना डिले होगा बजट उतनी बार रिवाइज़ होगा। एक बार काम का लोकार्पण हो गया तो मंत्री, अफ़सर, ठेकेदार बेचारों को नया पुल बनाना पड़ेगा इसलिये एक ही पुल जितने साल बनता रहे, उतना भला। पब्लिक के लिये गीता का पाठ है कि जो हो रहा है, अच्छा है और जो होगा वो और भी अच्छा होगा। सब अच्छा ही अच्छा होगा तो देश के धर्मगुरुओं का क्या होगा। 

इस मामले में मै आलसी लोगों का कायल हूँ। उनके पास सोचने का समय होता है। सेब तो बहुत गिरे पर गुरुत्वाकर्षण के बारे में कौन सोच पाया। कर्मयोगी उसे कर्मफल समझ के खाने में जुट जाते थे। कर्मयोगी को उबलते पानी की केतली में इंटरेस्ट भला क्यों आयेगा। आलसी सिर्फ़ उतना ही काम करेगा जितना आवश्यक है। वो ज़िन्दगी में आरामतलबी के सारे साधन के स्वप्न देखेगा। वो ट्रेन खोजेगा, वो प्लेन खोजेगा, वो एसी डिज़ाइन करेगा, वो कार को आरामदेह बनाने की हर सम्भव कोशिश करेगा। कर्मयोगी खोज की पुनरावृत्ति तो कर सकते हैं पर नयी सोच उनके बस का रोग नहीं है। लेकिन देश के दुर्भाग्य का क्या रोना रोया जाये, यहाँ ऐसे आदमियों की कदर नहीं है। यहाँ हर आदमी यही दम भरने में लगा है कि उसने एक 30 साल के प्रभावी जीवन में कितने ही महान कर डाले। वास्तव में उसमें से अधिकांश कार्य करने के लिये उसे पश्चाताप होना चाहिये कि गरीब देश के करोड़ों रुपये उसने सिर्फ़ अपनी कर्मयोगिता सिद्ध करने में फूँक दिये। ये अलग बात है कि इस बहती गंगा ने उसकी कई पीढ़ियों के भाग्य तार दिये। इसलिये मेरे विचार से सोचना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें से एक-दो कार्य भी मूर्त रूप ले सके तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये। इसलिये मैंने सोचा कि जब सब भाई लोग सोच-सोच के थक जायेंगे, तब हम अपनी मूल्यवान राय देंगे। पर राय का कॉपीराइट तो होता नहीं। इसलिये क्यों न खुली चिट्ठी का सहारा लिया जाये। ताकि सनद रहे और वक़्त आने पर काम आ सके कि इन महान रायों का प्रणेता कौन था।  

इस देश में गहन चिंतकों का सर्वथा अभाव रहा है। दिमाग में राय आई नहीं कि झोंक दी। कोई हनीमून मनाने के मूड में है और आप हैं कि राय पे राय दिये जा रहे हैं। किसी को हनीमून में डिस्टर्ब करना कहाँ की सभ्यता है। साठ दिनों में भाई लोगों ने इतनी ढेर सारी राय दे डाली कि सरकार को एक पोर्टल बनाना पड़ गया। जिनके माइंड में फियर था, वो बेनामी चिट्ठीयाँ भेज रहे थे। दिल्ली के अफ़सरशाहों को जल्दी समझ में आ गया कि ऐसी चुनिंदा रायें आम आदमी तो दे नहीं सकता। विभाग के छिपे विभीषण ही लंका ढहाने पर आमादा हैं। ऐसे तो अपनी दुकान बंद हो जायेगी। इसलिये पोर्टल पर पूरा नाम-पता देना कम्पलसरी कर दिया गया है। इन परिस्थितियों में कम से कम सरकारी लोग तो मुँह बंद रखेंगे। बाकि लोगों को किसी विभाग के बारे में पूरी जानकारी जुटाने के लिये आरटीआई तक जाना होगा। आँकड़े बताते हैं कि आरटीआई से सूचना निकलवा पाना नाकों चने चबाने के समान है। पूरा विभाग भ्रष्ट लोगों को बचाने की मुहिम में शामिल हो जाता है। जब एक इंजिनियर, एक डॉक्टर, एक अफसर, एक कर्मचारी अपने विभाग में वांछित सुधारों के लिये लिखेगा तो वो एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बन सकता है। इसलिये इन पर नकेल ज़रूरी है। 
पर इससे मुझे क्या। मै तो खुली चिट्ठी देश के मेरे जैसे उदीयमान व्यंगकारों के लिये लिख रहा था। यदि देश में सब कुछ वैसा हो गया जैसा होना चाहिये तो हमारे जैसे लोग तो भूखे मर जायेंगे। हम किस पर व्यंग लिखेंगे और कार्टूनिस्ट क्या कार्टून बनायेंगे। लोग गुटके नहीं खायेंगे तो देश की सड़कें काली दिखने लगेंगी। पता ही नहीं चलेगा कि इस सड़क से कोई गुजरता भी है या इंजीनियरों ने सिर्फ कमीशन खाने के चक्कर में इस सड़क का निर्माण करा दिया। ट्रेन के सिंक साफ़-सुथरे होंगे तो लोग खामख्वाह मुँह धोते रहेंगे और पानी बहाते। डिब्बे साफ़ रहेंगे तो लोग जमीन में बैठ के यात्रा करने लगेंगे। पहले ही ट्रेन में लोग लदे-फंदे रहते हैं। प्लेटफार्म और टॉयलेट साफ़-सुथरे होंगे तो लोग होटल भला क्यों जायेंगे। इस गन्दगी का मुख्य उद्देश्य लोगों को यातायात से विमुख करना है। जिससे लोग अपने घर-गाँव को छोड़ने से पहले दस बार सोचें। अपने घर में गैया चराना भला है या मुम्बई तक जनरल कोच में भेंड़-बकरी की तरह यात्रा करना।

दरअसल सरकारें समस्या पैदा करने में विश्वास रखतीं थीं। वर्ना काम तो वो सारे यूपी में भी होने हैं, जो कर्नाटक में होते हैं। अपने ही घर में काम की कमी नहीं है तो परदेस में जा के धक्के खाने की क्या ज़रुरत। पर प्रदेश सरकार चाहती है कि पंजाब का पैसा हमारे यहाँ आये। हमारा पैसा पंजाब क्यों जाये। मैंने देखा कानपुर से लखनऊ के बीच तक़रीबन 30 हज़ार लोग रोज आते-जाते होंगे। पढने के लिये, पढ़ाने के लिये, बैंक के लिये, दफ्तरों के लिये। लखनऊ का आदमी कानपुर आ रहा है और कानपुर का आदमी लखनऊ जा रहा है। अगर कानपुर वाला कानपुर में और लखनऊ वाला लखनऊ में काम करे तो ट्रेन पर भीड़ कम हो जायेगी। ऐसे में रेलवे और उन्नाव के समोसे वालों को होने वाले घाटे का ख्याल सरकार नहीं रखेगी तो और कौन रक्खेगा। ट्रांसफर पर कमीशन नहीं मिले तो मंत्री-संत्री का दरबार क्यों सजे। ट्रेन में भीड़ होगी तभी तो हवाई यात्रा को बढ़ावा मिलेगा। बंगलुरु से दिल्ली के जहाज खाली चलेंगे तो एयरलाइंस बंद हो सकती है। इसलिये दिल्ली वाले को बंगलुरु भेजो और बेंगलुरु वाले को दिल्ली। जो लोग एक जगह रहते-रहते उकता जाते हैं उनके लिये ट्रांसफर मतलब एक महीने की तनख्वाह और टीटीए के साथ नये स्थान की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों से रूबरू होने का मौका है।  

देश में विकास की अपरिमित संभावनायें हैं। लेकिन जब महानगरों में ही ज़िन्दगी के समस्त सार उपलब्ध हों तो बहराइच और गोण्डा में भला कौन रहना चाहेगा। फटी पड़ी जनसंख्या के बीच महानगरों की चकाचौंध आम भारतीय को आमंत्रित करती रहती है। और एक बार जिसे महानगर की हवा लग गयी उसका देवरिया और भदोही में तो दम घुटेगा ही। अब नये-नये शहर बनाने की बात हो रही है। नयी-नयी गाड़ियाँ चलाने की बात हो रही है। जो चल रहा है, वो और सुचारू रूप से चलता रहे इस पर कोई सोचना नहीं चाहता। गोया बजाज के एड की तरह सारे घर के बल्ब बदलने की बात हो रही है। और होनी भी चाहिये। नये काम के लिये नया वित्तीय प्रावधान। पुराने को ठीक करने का काम तो सस्ते में हो सकता है। और एक सशक्त सरकार को टुच्चे काम नहीं करने चाहिये। देश का सुधार होगा, वो भी विश्वस्तरीय तकनीक से। दुनिया भर में टेक्नोलॉजी की भरमार है तो अपनी तकनीक को क्या विकसित करना। इसका मूलमंत्र है एफडीआई। 

हम तो अपने लोगों की बेहतरी नहीं सोच पाये इसलिये विदेशी कंपनियों से आह्वाहन है कि आप आइये हमारी अर्थव्यवस्था को समृद्ध कीजिये। हमारे बेरोजगारों को रोजगार दीजिये। सन छियासी में जब मैंने काइनेटिक हौंडा खरीदी थी, तभी मुझे लग गया था, बजाज के दिन लदने वाले हैं। पंद्रह सालों के बाद जब मेरी हीरो-हौंडा का क्लच वायर टूटा तो मुझे भरोसा हो गया कि हीरो को अब साइकिल बनाने तक सीमित हो जाना चाहिये। पहले एक ईस्ट इण्डिया कंपनी थी, आज पूरी दुनिया यहाँ घुसी पड़ी है। चूँकि हम रीइनवेंटिंग व्हील के सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखते इसलिये पूरी दुनिया को निमंत्रण देते घूम रहे हैं कि आप यहाँ आईये, हम बड़े कद्रदान लोग हैं। हुनर पहचान लेते हैं। आप कार बनाइये, हम खरीदेंगे। आप जहाज बनाइये, हम उसे उड़ायेंगे। आप बम बनाइये, हम पड़ोसियों को डरायेंगे। लेकिन ये भूल जाते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध चीज़ें हमारे पडोसी भी खरीद सकते हैं। और हमेशा नया वर्ज़न पुराने वर्ज़न से बेहतर होता है। तो जो बाद में खरीदेगा वो फायदे में रहेगा। वैसे देश में अच्छे, सच्चे, देशभक्त और चारित्रिक नेताओं का भी सदैव अभाव रहा है। तकनीक की तरह इस क्षेत्र में भी एफडीआई की अभूतपूर्व संभावनायें हैं। हम तो हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम के हिमायती रहे हैं। अब हमारे कुटुम्ब वाले ही गच्चा दे जायें तो ये उनकी नियत है। भगवान सब देख रहा है और सबके कर्मों का लेखा, चित्रगुप्त जी की डायरी में नोट होता रहता है।    

मेरे विचारों का आयाम देश की सभी समस्याओं तक फैला हुआ है। राय इतनी कि ब्लॉग वालों द्वारा दी गयी फ्री स्पेस कम पड़ जाये। ये तो सिर्फ विचारों की बानगी है। मेरे पाठक मुझे हर बार चेताते हैं कि भट्ट जी आपके विचारों से हमें क्या सरोकार। मै उन्हें समझाता हूँ कि देश हित में है विचारों का आदान-प्रदान। अब मुझे ख़ुशी है कि सरकार ने मेरे जैसे अपठनीय लेखक के लिये एक ऐसा मंच तैयार किया है जहाँ मै फर्जी आई-डी बना के विचारों की भड़ास निकाल सकता हूँ। पढ़ना, न पढ़ना सरकार का काम है। मै इसी प्रकार निर्विकार भाव से अपने मनन और चिंतन को लेखनी बद्ध करता रहूँगा। ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये. 

- वाणभट्ट

सोमवार, 9 जून 2014

ज़ंजीर

सन तिहत्तर में एक फिल्म आयी जिसने एक आम नायक को महानायक में बदल डाला। ज़ंजीर देखने के लिये चाचा को बच्चों ने पटा लिया। हॉल पहुँच गये रिक्शे में लद-लदा के। लेकिन टिकट नहीं मिला। चाचा बेचारे को ब्लैक में टिकट लेना पड़ा। उन्हें तो पिक्चर में क्या मज़ा आया होगा पर बच्चों ने पैसा वसूल लिया। उस समय जुम्मा-जुम्मा उम्र थी यही कोई आठ साल। मार धाड़ और ढिशुंग-ढिशुंग में बहुत मज़ा आया। एक-एक डाइलॉग पर हॉल तालियों से गूँज जाता। शानदार फिल्म के लिये विलेन भी जानदार होना चाहिये। अगर राम से टक्कर हो तो रावण जैसा किरदार भी आपेक्षित है। अजीत की दमदार डायलॉग डिलीवरी और अमिताभ का एंग्री यंग मैन का रूप भारत की जनता के सर चढ़ के बोला। प्राण साहब तो लाज़वाब थे ही हमेशा से। फिल्म तो सुपर हिट हुयी ही पर अमिताभ को भी उसके बाद पीछे मुड़ के देखना नहीं पड़ा। उस समय मेरे बाल मन में एक जिज्ञासा जगी कि फिल्म का नाम घोड़ा होना चाहिये था। ज़ंजीर का इस फिल्म में क्या मतलब। किस अनाड़ी ने रख दिया। विलेन जब गोली चला रहा था तो घोडा ज़ंजीर से लटक रहा था। मेरा ध्यान घोड़े पर तो गया पर हाथ पर बंधी चेन से फिल्म के नामकरण का तात्पर्य मेरी बालबुद्धि के परे था। मेरे हिसाब से फिल्म का नाम अश्व या अश्वथामा या सिर्फ़ घोड़ा होना चाहिये था।     

आप चाहिये या न चाहिये आपको बड़े तो होना ही है। और बचपन में तो बड़े होने की बड़ी जल्दी भी थी। मै बड़ा हुआ भी उम्र के लिहाज़ से। अक्ल के लिहाज़ से मेरे बड़े होने पर मित्र गणों को थोड़ा संदेह हमेशा बना रहता है। ईमानदारी-देशभक्ति-सत्य-अहिंसा-न्याय-धर्म की बातें आजकल या तो बच्चे करते हैं या कमज़ोर लोग। वीर लोग तो इस धरा-वसुंधरा पर अवतरित सभी भोग्य वस्तुओं का भोग लगाने में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। और वो भी डेली बेसिस पर। हफ़्ते-महीने में कुछ भोग लगाया तो क्या लगाया। हनुमान जी को भी लोग मंगल-मंगल प्रसाद चढ़ा देते हैं। ताक़तवर को तो रोज प्रसाद चाहिये। तभी उसे एहसास बना रहता है कि वो वीर है। और माल दूसरे के हिस्से का हो तो और स्वादिष्ट लगता है। बहरहाल जैसे-तैसे बड़े होने था, बड़े हो गये। लेकिन बचपन की जिज्ञासा शांत न हो पायी। तब और भी आश्चर्य हुआ जब पता चला कि ये गलती सलीम-जावेद जैसे महान स्क्रीन प्ले लेखकों ने की थी। भाई मर्ज़ी है उनकी और उनके प्रोड्यूसरों की। पैसा उनका, फ़िल्म उनकी, वो भी सुपर-डुपर हिट तो मै भला कौन - खामख्वाह।        

अंग्रेजों के ज़माने में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ज़ंजीर से बांधा जाता था। किसी बलिष्ठ व्यक्ति को यदि बेड़ियों में रखा जाता तो बात समझ आती थी कि ये किसी को पीट-पाट सकता है। पर कभी-कभी निरीह से मरियल लोगों के भी हाथ-पैर ज़ंजीर से जकड़े रहते। पता चलता था कि उस आदमी की सोच ख़तरनाक थी जिससे अंग्रेजी साम्राज्य की नीवें हिल सकतीं थीं। बाबर से लेकर अंग्रेजों तक, और आज के दौर में सरकारी अफ़सरान, जिसकी भी राज करने की लालसा थी, उसे बगावत का फोबिया बना रहता। कोई राजा अगर प्रजा की सेवा करना चाहता हो तो उससे बड़ा सेवक खोजना मुश्किल है। लेकिन फिर राजा बनने में उसने जितने पापड़ बेले हैं, जिन षड्यंत्रों का वो भागी बना, उसका मज़ा जाता रहेगा। इसलिये जब एक बार येन-केन-प्रकारेण सिंघासन मिल जाये तो बगावत की बू को दूर करने में ही सारा प्रोडक्टिव समय व्यर्थ कर देना एक राजसी मानसिकता है। तब समझ आया कि ज़ंजीर प्रतीक है, मानसिक ग़ुलामी का। एक कैदी को बमशक़्क़त सजा भी दे दो तो भूख खुल के लगेगी। उसका स्वास्थ्य बन सकता है। पर एक को बेड़ियों में जकड के रख दो तो उसकी सोच की धार धीरे-धीरे कुंद हो जायेगी। मै सलीम-जावेद का कायल हो गया नायक के सपने में भले ही घोडा आता हो पर उन्होंने फिल्म का नाम रखा - ज़ंजीर।ज़ंजीर नायक की बेबसी को बहुत ही संजीदा तरीके से दर्शाती थी। लेखकद्वय  ने अगर मेरे कहे अनुसार फिल्म का नाम अश्व, अश्वथामा या घोडा रखा दिया होता तो शायद न फिल्म हिट होती, न अमिताभ।     

एक दिन जब ऑफ़िस पहुँचे, तो देखा प्रशासनिक भवन के सामने कुछ नाप-जोख चल रही है। जब भी विभाग में कहीं से फंड आ जाता है, इस प्रकार का काम शुरू हो जाता है। ये कोई गौर करने लायक बात न थी। फिर कुछ दिनों के बाद देखा की कालेज के प्रधानाचार्य महोदय के पोर्टिको वाली सड़क पर चेन का बैरियर लग गया है। हुआ यूँ कि पूरे परिसर में साईकिल, स्कूटर, गाड़ी पार्क करने की कोई समुचित व्यवस्था न थी, न प्रशासन ने इस ओर कभी ध्यान दिया। कुछ छायादार हिस्सों में पहले-आओ, पहले-पाओ के आधार पर कुछ गाड़ियाँ खड़ीं हो जातीं थीं। कुछ के लिये  गिने-चुने पेड़ थे और उनके अलावा लोगों के लिये जाड़ा-गर्मी-बरसात था, खुला आसमान। आम आदमी तो प्रशासनिक भवन से दूर ही रहने का प्रयास करता। किन्तु मुँहबोले प्रशासनिक कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी प्राचार्य महोदय की गैर-हाज़िरी में पोर्टिको की छाया का आस्वादन करने से नहीं चूकते थे। 

कोई भी विभाग बिना विभागाध्यक्ष के तो चल सकता है पर बिना लग्गू-भग्गुओं के नहीं। लग्गू ने प्राचार्य महोदय को खोंस दिया कि हुज़ूर जब आपकी अम्बेस्डर पोर्टिको की शोभा नहीं बढ़ा रहीं होतीं तो ऑफिस के बाबुओं के दुपहिया वाहन उस पोर्टिको की शोभा ख़राब कर रहे होते हैं। भग्गू कहाँ पीछे रहता बोला सर आप जिस कार्यकुशलता से प्रशासनिक निर्णय लेते हैं, बहुत सम्भावना है कोई आपको रिटायरमेंट से पहले हुर-हुरा न दे। इसलिये इस रस्ते पर एंट्री रिस्ट्रिक्ट कर दीजिये। प्राचार्य ने अनमना सा विरोध किया कि लोगों का रास्ता लंबा हो जायेगा, उन्हें घूम के जाना पड़ेगा। लग्गू-भग्गू ने समझाया सर इस पोर्टिको पर सिर्फ़ और सिर्फ़ आपका और आपकी अम्बेस्डर का हक़ है। और किसी भी प्रशासक को अपने हक़ के प्रति जागरूक और जनता के हक़ के प्रति यदि सुसुप्त नहीं तो निर्विकार तो रहना ही चाहिये। अभी ये लोग आपके पोर्टिको में कब्ज़ा करेंगे कल आप की अनुपस्थिति में आप के कमरे के एसी की ठंडी हवा भी खाने लगेंगे। दोनों प्रवेश द्वार पर सीकड़ लग जायेगी जैसी इण्डिया गेट पर लगी रहती है, फिर किसी की क्या मजाल जो आपके पोर्टिको की छाया का मिसयूज़ कर सके। प्रस्ताव पास हो गया और अमल में भी आ गया। 

लोगों की असुविधा का ख्याल रखना कुशल प्रशासकों का काम नहीं है। कुछ को बुरा लगा, कुछ को भला। पर बुरा-भला लगने या कहने की गुंजाईश न थी। प्राचार्य जी कलम के पक्के थे। मुँह से कुछ न कहते पर कलम से रगड़ देते। और रोजी-रोटी में पूरी आस प्रमोशन पर ही टिकी रहती है। वही तो बरक़्क़त है। सो लोगों ने मुँह सिल लिये। राजाज्ञा भी कोई चीज़ होती है।एक दिन हमारे शर्मा जी इमोशनलिया गये। बोले साला खाली पोर्टिको में भी गाड़ी नहीं खड़ी कर सकते लानत है ऐसी जहालत पर। जोश आ गया चेन हटा के अपनी स्कूटी पोर्टिको में लगा दी। उस क्षण उन्हें लगा किसी गोरी सरकार का नमक कानून तोड़ दिया। प्राचार्य ने एक जाँच आयोग बैठाया दिया। बगावत की बू पर काबू ज़रूरी था। आयोग ने प्राचार्य के कहे अनुसार शर्मा के इस जघन्य कृत्य की घनघोर भर्तस्ना की। आखिर उनकी भी सत्यनिष्ठा यानि इंटीग्रिटी का मामला था। शर्मा को भयंकर सा मेमो मिला पर्सनल फाइल में एडवर्स एंट्री हुयी सो अलग से। शर्मा के सपने में अब बिना घोड़े वाली ज़ंजीर अक्सर आती है। जिन्हें मेमो नहीं मिला उनके सपनों में भी वो ज़ंजीर जरूर आती होगी उन्हें उनकी बेबसी का एहसास दिलाने।   

- वाणभट्ट               

गुरुवार, 29 मई 2014

पुरवा बयार

शर्मा जी की उम्र पचास के अल्ले-पल्ले रही होगी। मोहल्ले के इको पार्क वॉकर्स क्लब के संस्थापक सदस्य। बहुत ही नियमित। बहुत ही जिंदादिल। मँहगे हेयर डाई से बालों को रंग के अपनी उम्र के आधे ही जान पड़ते। मुझे मिला कर कुल जमा दस लोगों को अपनी प्रेरणा से जोड़ रक्खा था। ट्रैक पर टहलने के बाद सभी मिल के योग (योगा) करते फिर लाफ्टर सेशन शुरू होता। पूरा एक घंटे का पैकेज है। पार्क में आना उतना ही अनिवार्य है जितना दफ्तर जाना। अटेंडेंस रजिस्टर तो नहीं था पर न आना बहुत मँहगा पड़ता। एक दिन भी कोई चूक गया तो तय है कि पेनल्टी के रूप में उसके घर सब चाय पीने जायेंगे। और कोई शरीफ़ आदमी सिर्फ़ चाय तो पिलायेगा नहीं, कुछ खिलायेगा भी। ये दो तरफ़ा टैक्टिस बहुत कारगर रही। पार्क नहीं आये तो दोस्त हाल लेने घर पहुँच जायेंगे। और जिस बीवी को सुबह-सुबह बिस्तर से उठ कर चाय बनानी पड़ेगी, वो अगले दिन ख़ुद अलार्म लगा के उठेगी और आपको ठीक समय पर घर के बाहर कर देगी। इस तरह हमारा क्लब कई वर्षों से फल-फूल रहा है। शर्मा जी शारीरिक रूप से बिलकुल स्वस्थ थे और मानसिक रूप से और भी ज़्यादा। देखने में पचीस के लगते पर दिल बीस का ही था। लाफ्टर सेशन के लिये अलग से तैयारी करके आते थे। अपने क्रैकिंग जोक्स से सबका जीना मुहाल कर देते। हमेशा हॅंसने-हँसाने को तत्पर रहते।

जाड़ा-गर्मी-बरसात शर्मा जी को हमने कभी पार्क में नदारद नहीं पाया। लिहाजा हमें उनके घर कभी चाय पीने का सौभाग्य नहीं मिला। नमक-मिर्च के साथ बताने वाले बताते हैं कि शर्मा जी ने लव मैरिज की थी। और उनकी पत्नी, यानि हमारी भाभी जी, अपने दिनों में अनिन्द्य सुंदरी हुआ करतीं थीं। शर्मा से शादी के बाद नियमित खान-पान से इंशा-अल्ला उनका स्वास्थ्य आवश्यकता से अधिक भरा-पूरा हो गया था। उम्र का असर शर्मा जी की ही तरह उन पर भी हावी नहीं हुआ था। आदमी वही जवान है जो उम्र को मानसिक रूप से दरकिनार कर दे। लिहाजा उन्हें हर आने-जाने वाले पर शक़ रहता कि उसके इरादे गलत हैं। और शर्मा जी के टहलने वाले दोस्तों पर तो उन्हें कतई विश्वास नहीं था। टहलने वाले सर्किल का तो स्टेटस भी नहीं पता। अफ़सर है, क्लर्क है या चपरासी। शर्मा जी की नियमितता का शायद ये भी एक कारण रहा हो। शर्मा जी तन-मन दोनों से जवान थे, जबकि उनकी पत्नी मन से पूर्णतः युवा। उनसे मिलने की सभी की इच्छा मन ही मन बनी रहती पर शर्मा भूले से भी किसी को अपने घर आने का न्योता न देता। 

चाय की पेनल्टी से बचने का एक मात्र तरीका था - मास बंक। किस-किस के घर जा पायेंगे शर्मा जी। ये भी हो सकता है कि हमारे बीच का कोई जासूस शर्मा जी को मास बंक की खबर कर देता हो और वो भी छुट्टी मार लेते हों। कुछ लोगों ने सन्डे ऑफ़ का सिस्टम बना रक्खा था। उन्हें सन्डे एग्जम्प्टेड था। पर आज सन्डे नहीं था। न ही कोई मास बंक का फरमान था। मै यथा समय ठीक साढ़े पाँच बजे उद्यान में था। पार्क में मेरे अलावा सिर्फ़ शर्मा जी ही पहुँच पाये थे। बाकी सबने गच्चा दे दिया। पहले से बता दिया होता तो मै भी फ़रलो मार लेता। ये भाईसाहब अमूमन सबसे जल्दी आ जाया करते थे। इस समय टहलने के बाद प्राणायाम में लगे हुए थे। मेरे पार्क में एंट्री लेते ही उन्होंने धीमे स्वर में हरि-ओम की आवाज़ लगाई। उनकी आवाज़ से गर्मजोशी गायब थी।

मुझे शक हुआ कि हो न हो कुछ गड़बड़ है। लगता है शर्मा जी की तबियत ठीक नहीं है। मुझे लगा उन्हें आत्मीयता की ज़रूरत है। पार्क में कोई अन्य मित्र दिख भी नहीं रहा था। सो टहलने का कार्यक्रम स्थगित करके मैंने पूरी गर्मजोशी से पूछा - शर्मा क्या बात है, बड़े बुझे-बुझे से लग रहे हो। वो एक ठंडी आह भर के चुप लगा गये। थोड़ा और कुरेदा तो बोले कुछ नहीं यार जब पुरवा हवा चलती है तो पूरे बदन में हल्का-हल्का दर्द रहता है। पुरानी चोटें फिर से हरी हो जातीं हैं। एक सिसकारी के साथ वो फिर चुप हो गए। उनका ध्यान आज प्राणायाम में नहीं लग रहा था। मुझे लगा राख में कहीं अंगार छिपा है। बोला - पुरवा तो सबके लिये है। हाँ थोड़ा आलस्य ज़रूर लगता है शायद इसीलिये आज अनुपस्थिति ज़्यादा है। पर घर के अंदर एसी में सोने वालों पर भला पुरवा क्या असर करेगी। आपको कौन सी चोट लग गयी शर्मा जी। शर्मा जी मेरे अतिक्रमण पर थोड़ा बुरा सा मान गये। लेकिन बड़ी शराफ़त से बोले वर्मा जी आज चलता हूँ, कल मिलूँगा। और वो बिना हँसे-हँसाये, मेरे अंदर जिज्ञासा का तूफ़ान खड़ा करके पार्क से निकल लिये। जिसका शीघ्र निवारण होना ज़रूरी था। लिखने वाले को तो बस लिखने का मसाला चाहिये। कोई सुख में हो या दुःख में लेखक अगर अपने स्वार्थ से उबर जाए तो कितनी ही कहानियाँ अनकही रह जायें।  

शर्मा जी के एक पुराने मित्र जो हमारे वॉकर क्लब के सदस्य भी थे वही मेरी शंका का समाधान कर सकते थे। रास्ता थोड़ा लम्बा था पर आज टहलना भी तो नहीं हुआ था। मिश्रा जी ने सोचा आज वर्मा जी अकेले ही पेनल्टी वसूल करने कैसे आ गये। जब हम ड्राइंग रूम में चाय का इंतज़ार कर रहे थे, मैं अपनी जिज्ञासा पर ज़्यादा संयम न रख सका। तुरंत मुद्दे पर आ गया। यार शर्मा आज बड़ा सेंटी सा लग रहा था कह रहा था पुरवा हवा चलती है तो बदन टूटता है। मिश्रा थोड़ा संजीदा हो गया फिर बोला यार मै शर्मा को बचपन से जानता हूँ। शुरू से ही बहुत ही हृष्ट-पुष्ट सुन्दर और स्मार्ट बंदा है। कालेज के दौरान इसे इश्क का रोग लग गया। जिस लड़की से लगा वो इससे भी ज्यादा सुन्दर थी लेकिन इसे घास भी नहीं डालती थी। उसकी अपनी सीमायें थीं, जात-बिरादरी की। भाईसाहब उसकी राह में मारे-मारे फिरा करते। जाति और सम्प्रदाय के हिसाब से तो दोनों में जो अंतर था वो शायद पट भी जाता पर स्टेटस का फ़र्क पाटने के लिये लड़की वाले राजी नहीं थे। लिहाज़ा एक दिन इनको बुरी तरह पीट-पाट के रेलवे ट्रैक पर डाल आये। किस्मत अच्छी थी जो किसी की नज़र पड़ गयी और ये बच गये। कालान्तर में शर्मा जी एलआईसी में अफ़सर बने और उसी लड़की ने घर से भाग कर इनसे शादी की। घर-समाज सबने लड़की का बहिष्कार कर दिया। शर्मा जी ने भी अपने-पराये सबसे जम के मोर्चा लिया। इसीलिये शर्मा के घर बाहरी लोगों का आना-जाना कम है और घर वाला तो न कोई इनका है, न उनका। लोग इनके बारे में न जाने क्या-क्या कयास लगाया करते हैं। पर इन दोनों की दुनिया अलग है, जिसमें ये मग्न रहते हैं। वॉकर्स ग्रुप और ऑफिस यही शर्मा का बाह्य दुनिया से संपर्क है। मेरा तो घर का आना जाना है। कभी तुम्हें शर्मा के यहाँ चाय पिलवाता हूँ। इसकी बीवी बहुत ही ज़हीन  है। दोनों में गज़ब का सामंजस्य है। इन्होने शादी तो की लेकिन आज तक ये लोग अपने-अपने धर्म पर कायम हैं। 

हमारी चाय आ गयी थी। पुरवा हवा की जो तफ्तीश मुझे मिश्रा के यहाँ तक खींच लायी थी। वो पूरी हुयी। भिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करें, यही धर्म है। मेरा अपना मानना है धर्म के अलावा जो कुछ भी है वो अधर्म है। मजहब-पूजा पद्यति कितनी भी अलग हो लेकिन धर्म तो धर्म ही रहेगा। सर्वधर्म-समभाव सिर्फ़ नारे की चीज़ नहीं है। शर्मा दम्पति इसका एक जीवंत उदाहरण हैं। उनके प्रति आदर का उदगार है मेरा ये लेख। प्रभु हमारे देश वासियों को ऐसी ही सन्मति प्रदान करे। 

बाहर पुरवा अपने उफान पर थी। मेरे लिये ये ताज़ी बयार का झोंका था।      

- वाणभट्ट 

आदर्शवादी

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