सोमवार, 28 जुलाई 2014

खुली चिट्ठी

ये सरकार क्या बदली, जिसे देखो राय बहादुर बना घूम रिया है। इसके पहले की सरकारें तो कान में कड़ुआ तेल डाले पड़ीं रहतीं थीं। पर अब तेल के दाम जब बढ़ गये हैं तो लोग एक-एक बूँद तेल खाने के काम में लाना पसंद कर रहे हैं। कान में डालने वालों पर स्विस बैंक में अकाउन्ट होने का शक़ हो सकता है। सीबीआई और आयकर वाले तो छुट्टा सांड की तरह घूम रहे हैं। काले धन की उगाही स्विस बैंक से कर पाना थोड़ी टेंढ़ी खीर है। इसलिये देश के ज़र्रे-ज़र्रे में व्याप्त ब्लैक मनी वालों को मेरी ये राय है कि कोई भी ऐसा काम न कीजिये जिससे किसी को आप पर शक़ हो सके। सरकार के जासूस सब्जी मंडी तक में छाये हुए हैं। कौन प्याज़ और कौन टमाटर खा रहा है इसका ब्यौरा प्रतिदिन सरकार को भेजा जा रहा है। अगर नज़र में चढ़ गए तो ये न कहना कि आगाह नहीं किया। 

बात राय बहादुरी से शुरू हुयी थी। सब लोग अपने-अपने क्षेत्र के विषय में सरकार को राय दे रहे हैं। वो भी खुली चिट्ठी के रूप में। सरकार को पढ़ने की फ़ुर्सत मिले न मिले। पर अड़ोसी-पड़ोसी को तो ये चिट्ठी दिखाई जा सकती है कि फ़लाँ विषय पर उन्होंने सरकार को क्या राय दी है। लोग हड़बड़ी में हैं कि कहीं कोई काम उनकी राय के बिना हो गया तो क्रेडिट सरकार ले जायेगी। इसलिये खुली चिट्ठियाँ अख़बारों में छपवायी जा रहीं हैं। चाहे उद्योग का मसला हो, चाहे विदेश नीति का, चाहे सुरक्षा का, चाहे कृषि का, चाहे काले धन का। हर कोई क्रेडिट लूट लेना चाहता है। वो गर्व से बताते हैं कि वित्त मंत्री ने उन्हीं के कहने पर रेडीमेड कपडे में टैक्स बढ़ा दिया ताकि लोग कपड़े मोहल्ले के झुम्मन टेलर की दुकान पर ही सिलायें। आजकल ज्ञान टीवी और वीडियो के माध्यम से सहजता से प्राप्त हो सकता है इसलिये एलसीडी के दाम कम कर दिए गये। वाट्सएप से लोग अपना ज्ञान शेयर कर सकते हैं इसलिये मोबाइल सस्ते करना ज़रूरी था। 

पर गुटके-तम्बाखू पर टैक्स बढ़ा कर सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। इसे बिना खाये तो बहुतों की अक्ल का ताला ही नहीं खुलता । गुटखे को मुख में धारण करके बोल पाना कतिपय मुश्किल होता है। जब आदमी चुप होगा, तभी तो सोच पायेगा, विचार आयेंगे। बड़े-बड़े खिलाड़ी खेल में ध्यान लगाने के लिये चुइंगम चबाते नज़र आते हैं। कैमरे के सामने चुल्लू भर थूक उगलने में उन्हें शर्म आती होगी। इसलिये तमाम मल्टीनेशनल (मेरी नज़र में एण्टीनेशनल) कम्पनियाँ चुइंगम के निर्माण में रत हैं। जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों की देशी मुद्रा विदेशों में जा रही है। गुटका हमारे स्वावलम्बन का प्रतीक है। कम से कम ये एक ऐसा उद्योग है जो स्वदेशी तकनीक और ज्ञान पर पूरी तरह आधारित है। इस उद्योग को लगा के रातों-रात कितने फ़क़ीर, धन्ना सेठ बन गये। सोच तो बहुत लोग सकते हैं पर सोच कर के बोल पाना एक कठिन कार्य है। बहुत लोग इसलिये नहीं बोल पाते कि ऊपर वाले को बुरा लग जायेगा। ऊपर वाले को बुरा लगा तो उनका भला तो होने से रहा। तो सोच और बोल वही सकता है जिसका माइंड इज़ विदआउट फियर। गुटका खाने वाले निश्चित रूप से फीयरलेस लोग होते हैं। ये आपके ऊपर थूक दें और लड़ने लग जायें कि गलती आपकी है कि आप उनके मुँह और ज़मीन के बीच जानबूझ कर आ गये। अभी चीन को इस शौक़ का पता नहीं है वर्ना हमारा पान, हमारा तम्बाखू, हमारा गुलकन्द हम ही को चाँदी के वर्क में लपेट के बेच दे।  

मुझे पहले भी कोई जल्दी नहीं रही। आपाधापी में कोई भी महान चिंतक काम नहीं कर पाया है। चिंतन अपने आप में एक महान कार्य है। पर इस देश में कर्मण्येवाधिकारस्ते की ऐसी जबरदस्त फीलिंग है कि लोग बिना सोचे समझे काम किये जा रहे हैं। कोई सोचे तो बहुत से काम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़े। बहुत से पुनीत कार्य तो लोग सिर्फ़ इस गरज से कर रहे हैं कि सरकार ने बजट एलोकेट कर दिया है। उस बजट को ठिकाने लगाने के लिये काम करना पड़ रहा है। मज़बूरी ये हो गयी है कि बजट को हिल्ले लगाना सबसे बड़ा काम हो गया है। एजी, सीएजी, चिल्लाते रहें कि फण्ड का मिसयूज़ हुआ है, पर फण्ड को कंज़्यूम करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें क्या मालूम। ये आउटसोर्सिंग न होती तो कितने ही ठेकेदार और बिचौलिये जो आलिशान गाड़ियों में घूमते हैं, आज चाय-पान बेच रहे होते। एक दलाल ने तो अधिकारी को चैलेंज कर दिया कि बिना मेरे सहयोग के आप एक आइटम खरीद के दिखाओ। तीन कोटेशन तो हम ही मुहैया करा सकते हैं। 

फिनलैंड एक छोटा सा देश है। सुना है वहाँ किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले सालों डिस्कशन होता है। विचार विमर्श के वर्षों में यदि उस कार्य की आवश्यकता महसूस नहीं हुयी तो प्रोजेक्ट ड्राप कर दिया जाता है। लेकिन एक बार जब प्रोजेक्ट अप्रूव हो गया तो उसे टाइम से खत्म करने के प्रयास किये जाते हैं ताकि प्रोजेक्ट कॉस्ट न बढ़े। हमारे यहाँ फ्लाईओवर बनाने के विचार आते ही मंत्री जी उसका शिलान्यास करने पर आमादा हो जाते हैं। और प्रोजेक्ट जितना डिले होगा बजट उतनी बार रिवाइज़ होगा। एक बार काम का लोकार्पण हो गया तो मंत्री, अफ़सर, ठेकेदार बेचारों को नया पुल बनाना पड़ेगा इसलिये एक ही पुल जितने साल बनता रहे, उतना भला। पब्लिक के लिये गीता का पाठ है कि जो हो रहा है, अच्छा है और जो होगा वो और भी अच्छा होगा। सब अच्छा ही अच्छा होगा तो देश के धर्मगुरुओं का क्या होगा। 

इस मामले में मै आलसी लोगों का कायल हूँ। उनके पास सोचने का समय होता है। सेब तो बहुत गिरे पर गुरुत्वाकर्षण के बारे में कौन सोच पाया। कर्मयोगी उसे कर्मफल समझ के खाने में जुट जाते थे। कर्मयोगी को उबलते पानी की केतली में इंटरेस्ट भला क्यों आयेगा। आलसी सिर्फ़ उतना ही काम करेगा जितना आवश्यक है। वो ज़िन्दगी में आरामतलबी के सारे साधन के स्वप्न देखेगा। वो ट्रेन खोजेगा, वो प्लेन खोजेगा, वो एसी डिज़ाइन करेगा, वो कार को आरामदेह बनाने की हर सम्भव कोशिश करेगा। कर्मयोगी खोज की पुनरावृत्ति तो कर सकते हैं पर नयी सोच उनके बस का रोग नहीं है। लेकिन देश के दुर्भाग्य का क्या रोना रोया जाये, यहाँ ऐसे आदमियों की कदर नहीं है। यहाँ हर आदमी यही दम भरने में लगा है कि उसने एक 30 साल के प्रभावी जीवन में कितने ही महान कर डाले। वास्तव में उसमें से अधिकांश कार्य करने के लिये उसे पश्चाताप होना चाहिये कि गरीब देश के करोड़ों रुपये उसने सिर्फ़ अपनी कर्मयोगिता सिद्ध करने में फूँक दिये। ये अलग बात है कि इस बहती गंगा ने उसकी कई पीढ़ियों के भाग्य तार दिये। इसलिये मेरे विचार से सोचना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें से एक-दो कार्य भी मूर्त रूप ले सके तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये। इसलिये मैंने सोचा कि जब सब भाई लोग सोच-सोच के थक जायेंगे, तब हम अपनी मूल्यवान राय देंगे। पर राय का कॉपीराइट तो होता नहीं। इसलिये क्यों न खुली चिट्ठी का सहारा लिया जाये। ताकि सनद रहे और वक़्त आने पर काम आ सके कि इन महान रायों का प्रणेता कौन था।  

इस देश में गहन चिंतकों का सर्वथा अभाव रहा है। दिमाग में राय आई नहीं कि झोंक दी। कोई हनीमून मनाने के मूड में है और आप हैं कि राय पे राय दिये जा रहे हैं। किसी को हनीमून में डिस्टर्ब करना कहाँ की सभ्यता है। साठ दिनों में भाई लोगों ने इतनी ढेर सारी राय दे डाली कि सरकार को एक पोर्टल बनाना पड़ गया। जिनके माइंड में फियर था, वो बेनामी चिट्ठीयाँ भेज रहे थे। दिल्ली के अफ़सरशाहों को जल्दी समझ में आ गया कि ऐसी चुनिंदा रायें आम आदमी तो दे नहीं सकता। विभाग के छिपे विभीषण ही लंका ढहाने पर आमादा हैं। ऐसे तो अपनी दुकान बंद हो जायेगी। इसलिये पोर्टल पर पूरा नाम-पता देना कम्पलसरी कर दिया गया है। इन परिस्थितियों में कम से कम सरकारी लोग तो मुँह बंद रखेंगे। बाकि लोगों को किसी विभाग के बारे में पूरी जानकारी जुटाने के लिये आरटीआई तक जाना होगा। आँकड़े बताते हैं कि आरटीआई से सूचना निकलवा पाना नाकों चने चबाने के समान है। पूरा विभाग भ्रष्ट लोगों को बचाने की मुहिम में शामिल हो जाता है। जब एक इंजिनियर, एक डॉक्टर, एक अफसर, एक कर्मचारी अपने विभाग में वांछित सुधारों के लिये लिखेगा तो वो एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बन सकता है। इसलिये इन पर नकेल ज़रूरी है। 
पर इससे मुझे क्या। मै तो खुली चिट्ठी देश के मेरे जैसे उदीयमान व्यंगकारों के लिये लिख रहा था। यदि देश में सब कुछ वैसा हो गया जैसा होना चाहिये तो हमारे जैसे लोग तो भूखे मर जायेंगे। हम किस पर व्यंग लिखेंगे और कार्टूनिस्ट क्या कार्टून बनायेंगे। लोग गुटके नहीं खायेंगे तो देश की सड़कें काली दिखने लगेंगी। पता ही नहीं चलेगा कि इस सड़क से कोई गुजरता भी है या इंजीनियरों ने सिर्फ कमीशन खाने के चक्कर में इस सड़क का निर्माण करा दिया। ट्रेन के सिंक साफ़-सुथरे होंगे तो लोग खामख्वाह मुँह धोते रहेंगे और पानी बहाते। डिब्बे साफ़ रहेंगे तो लोग जमीन में बैठ के यात्रा करने लगेंगे। पहले ही ट्रेन में लोग लदे-फंदे रहते हैं। प्लेटफार्म और टॉयलेट साफ़-सुथरे होंगे तो लोग होटल भला क्यों जायेंगे। इस गन्दगी का मुख्य उद्देश्य लोगों को यातायात से विमुख करना है। जिससे लोग अपने घर-गाँव को छोड़ने से पहले दस बार सोचें। अपने घर में गैया चराना भला है या मुम्बई तक जनरल कोच में भेंड़-बकरी की तरह यात्रा करना।

दरअसल सरकारें समस्या पैदा करने में विश्वास रखतीं थीं। वर्ना काम तो वो सारे यूपी में भी होने हैं, जो कर्नाटक में होते हैं। अपने ही घर में काम की कमी नहीं है तो परदेस में जा के धक्के खाने की क्या ज़रुरत। पर प्रदेश सरकार चाहती है कि पंजाब का पैसा हमारे यहाँ आये। हमारा पैसा पंजाब क्यों जाये। मैंने देखा कानपुर से लखनऊ के बीच तक़रीबन 30 हज़ार लोग रोज आते-जाते होंगे। पढने के लिये, पढ़ाने के लिये, बैंक के लिये, दफ्तरों के लिये। लखनऊ का आदमी कानपुर आ रहा है और कानपुर का आदमी लखनऊ जा रहा है। अगर कानपुर वाला कानपुर में और लखनऊ वाला लखनऊ में काम करे तो ट्रेन पर भीड़ कम हो जायेगी। ऐसे में रेलवे और उन्नाव के समोसे वालों को होने वाले घाटे का ख्याल सरकार नहीं रखेगी तो और कौन रक्खेगा। ट्रांसफर पर कमीशन नहीं मिले तो मंत्री-संत्री का दरबार क्यों सजे। ट्रेन में भीड़ होगी तभी तो हवाई यात्रा को बढ़ावा मिलेगा। बंगलुरु से दिल्ली के जहाज खाली चलेंगे तो एयरलाइंस बंद हो सकती है। इसलिये दिल्ली वाले को बंगलुरु भेजो और बेंगलुरु वाले को दिल्ली। जो लोग एक जगह रहते-रहते उकता जाते हैं उनके लिये ट्रांसफर मतलब एक महीने की तनख्वाह और टीटीए के साथ नये स्थान की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों से रूबरू होने का मौका है।  

देश में विकास की अपरिमित संभावनायें हैं। लेकिन जब महानगरों में ही ज़िन्दगी के समस्त सार उपलब्ध हों तो बहराइच और गोण्डा में भला कौन रहना चाहेगा। फटी पड़ी जनसंख्या के बीच महानगरों की चकाचौंध आम भारतीय को आमंत्रित करती रहती है। और एक बार जिसे महानगर की हवा लग गयी उसका देवरिया और भदोही में तो दम घुटेगा ही। अब नये-नये शहर बनाने की बात हो रही है। नयी-नयी गाड़ियाँ चलाने की बात हो रही है। जो चल रहा है, वो और सुचारू रूप से चलता रहे इस पर कोई सोचना नहीं चाहता। गोया बजाज के एड की तरह सारे घर के बल्ब बदलने की बात हो रही है। और होनी भी चाहिये। नये काम के लिये नया वित्तीय प्रावधान। पुराने को ठीक करने का काम तो सस्ते में हो सकता है। और एक सशक्त सरकार को टुच्चे काम नहीं करने चाहिये। देश का सुधार होगा, वो भी विश्वस्तरीय तकनीक से। दुनिया भर में टेक्नोलॉजी की भरमार है तो अपनी तकनीक को क्या विकसित करना। इसका मूलमंत्र है एफडीआई। 

हम तो अपने लोगों की बेहतरी नहीं सोच पाये इसलिये विदेशी कंपनियों से आह्वाहन है कि आप आइये हमारी अर्थव्यवस्था को समृद्ध कीजिये। हमारे बेरोजगारों को रोजगार दीजिये। सन छियासी में जब मैंने काइनेटिक हौंडा खरीदी थी, तभी मुझे लग गया था, बजाज के दिन लदने वाले हैं। पंद्रह सालों के बाद जब मेरी हीरो-हौंडा का क्लच वायर टूटा तो मुझे भरोसा हो गया कि हीरो को अब साइकिल बनाने तक सीमित हो जाना चाहिये। पहले एक ईस्ट इण्डिया कंपनी थी, आज पूरी दुनिया यहाँ घुसी पड़ी है। चूँकि हम रीइनवेंटिंग व्हील के सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखते इसलिये पूरी दुनिया को निमंत्रण देते घूम रहे हैं कि आप यहाँ आईये, हम बड़े कद्रदान लोग हैं। हुनर पहचान लेते हैं। आप कार बनाइये, हम खरीदेंगे। आप जहाज बनाइये, हम उसे उड़ायेंगे। आप बम बनाइये, हम पड़ोसियों को डरायेंगे। लेकिन ये भूल जाते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध चीज़ें हमारे पडोसी भी खरीद सकते हैं। और हमेशा नया वर्ज़न पुराने वर्ज़न से बेहतर होता है। तो जो बाद में खरीदेगा वो फायदे में रहेगा। वैसे देश में अच्छे, सच्चे, देशभक्त और चारित्रिक नेताओं का भी सदैव अभाव रहा है। तकनीक की तरह इस क्षेत्र में भी एफडीआई की अभूतपूर्व संभावनायें हैं। हम तो हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम के हिमायती रहे हैं। अब हमारे कुटुम्ब वाले ही गच्चा दे जायें तो ये उनकी नियत है। भगवान सब देख रहा है और सबके कर्मों का लेखा, चित्रगुप्त जी की डायरी में नोट होता रहता है।    

मेरे विचारों का आयाम देश की सभी समस्याओं तक फैला हुआ है। राय इतनी कि ब्लॉग वालों द्वारा दी गयी फ्री स्पेस कम पड़ जाये। ये तो सिर्फ विचारों की बानगी है। मेरे पाठक मुझे हर बार चेताते हैं कि भट्ट जी आपके विचारों से हमें क्या सरोकार। मै उन्हें समझाता हूँ कि देश हित में है विचारों का आदान-प्रदान। अब मुझे ख़ुशी है कि सरकार ने मेरे जैसे अपठनीय लेखक के लिये एक ऐसा मंच तैयार किया है जहाँ मै फर्जी आई-डी बना के विचारों की भड़ास निकाल सकता हूँ। पढ़ना, न पढ़ना सरकार का काम है। मै इसी प्रकार निर्विकार भाव से अपने मनन और चिंतन को लेखनी बद्ध करता रहूँगा। ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये. 

- वाणभट्ट

सोमवार, 9 जून 2014

ज़ंजीर

सन तिहत्तर में एक फिल्म आयी जिसने एक आम नायक को महानायक में बदल डाला। ज़ंजीर देखने के लिये चाचा को बच्चों ने पटा लिया। हॉल पहुँच गये रिक्शे में लद-लदा के। लेकिन टिकट नहीं मिला। चाचा बेचारे को ब्लैक में टिकट लेना पड़ा। उन्हें तो पिक्चर में क्या मज़ा आया होगा पर बच्चों ने पैसा वसूल लिया। उस समय जुम्मा-जुम्मा उम्र थी यही कोई आठ साल। मार धाड़ और ढिशुंग-ढिशुंग में बहुत मज़ा आया। एक-एक डाइलॉग पर हॉल तालियों से गूँज जाता। शानदार फिल्म के लिये विलेन भी जानदार होना चाहिये। अगर राम से टक्कर हो तो रावण जैसा किरदार भी आपेक्षित है। अजीत की दमदार डायलॉग डिलीवरी और अमिताभ का एंग्री यंग मैन का रूप भारत की जनता के सर चढ़ के बोला। प्राण साहब तो लाज़वाब थे ही हमेशा से। फिल्म तो सुपर हिट हुयी ही पर अमिताभ को भी उसके बाद पीछे मुड़ के देखना नहीं पड़ा। उस समय मेरे बाल मन में एक जिज्ञासा जगी कि फिल्म का नाम घोड़ा होना चाहिये था। ज़ंजीर का इस फिल्म में क्या मतलब। किस अनाड़ी ने रख दिया। विलेन जब गोली चला रहा था तो घोडा ज़ंजीर से लटक रहा था। मेरा ध्यान घोड़े पर तो गया पर हाथ पर बंधी चेन से फिल्म के नामकरण का तात्पर्य मेरी बालबुद्धि के परे था। मेरे हिसाब से फिल्म का नाम अश्व या अश्वथामा या सिर्फ़ घोड़ा होना चाहिये था।     

आप चाहिये या न चाहिये आपको बड़े तो होना ही है। और बचपन में तो बड़े होने की बड़ी जल्दी भी थी। मै बड़ा हुआ भी उम्र के लिहाज़ से। अक्ल के लिहाज़ से मेरे बड़े होने पर मित्र गणों को थोड़ा संदेह हमेशा बना रहता है। ईमानदारी-देशभक्ति-सत्य-अहिंसा-न्याय-धर्म की बातें आजकल या तो बच्चे करते हैं या कमज़ोर लोग। वीर लोग तो इस धरा-वसुंधरा पर अवतरित सभी भोग्य वस्तुओं का भोग लगाने में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। और वो भी डेली बेसिस पर। हफ़्ते-महीने में कुछ भोग लगाया तो क्या लगाया। हनुमान जी को भी लोग मंगल-मंगल प्रसाद चढ़ा देते हैं। ताक़तवर को तो रोज प्रसाद चाहिये। तभी उसे एहसास बना रहता है कि वो वीर है। और माल दूसरे के हिस्से का हो तो और स्वादिष्ट लगता है। बहरहाल जैसे-तैसे बड़े होने था, बड़े हो गये। लेकिन बचपन की जिज्ञासा शांत न हो पायी। तब और भी आश्चर्य हुआ जब पता चला कि ये गलती सलीम-जावेद जैसे महान स्क्रीन प्ले लेखकों ने की थी। भाई मर्ज़ी है उनकी और उनके प्रोड्यूसरों की। पैसा उनका, फ़िल्म उनकी, वो भी सुपर-डुपर हिट तो मै भला कौन - खामख्वाह।        

अंग्रेजों के ज़माने में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ज़ंजीर से बांधा जाता था। किसी बलिष्ठ व्यक्ति को यदि बेड़ियों में रखा जाता तो बात समझ आती थी कि ये किसी को पीट-पाट सकता है। पर कभी-कभी निरीह से मरियल लोगों के भी हाथ-पैर ज़ंजीर से जकड़े रहते। पता चलता था कि उस आदमी की सोच ख़तरनाक थी जिससे अंग्रेजी साम्राज्य की नीवें हिल सकतीं थीं। बाबर से लेकर अंग्रेजों तक, और आज के दौर में सरकारी अफ़सरान, जिसकी भी राज करने की लालसा थी, उसे बगावत का फोबिया बना रहता। कोई राजा अगर प्रजा की सेवा करना चाहता हो तो उससे बड़ा सेवक खोजना मुश्किल है। लेकिन फिर राजा बनने में उसने जितने पापड़ बेले हैं, जिन षड्यंत्रों का वो भागी बना, उसका मज़ा जाता रहेगा। इसलिये जब एक बार येन-केन-प्रकारेण सिंघासन मिल जाये तो बगावत की बू को दूर करने में ही सारा प्रोडक्टिव समय व्यर्थ कर देना एक राजसी मानसिकता है। तब समझ आया कि ज़ंजीर प्रतीक है, मानसिक ग़ुलामी का। एक कैदी को बमशक़्क़त सजा भी दे दो तो भूख खुल के लगेगी। उसका स्वास्थ्य बन सकता है। पर एक को बेड़ियों में जकड के रख दो तो उसकी सोच की धार धीरे-धीरे कुंद हो जायेगी। मै सलीम-जावेद का कायल हो गया नायक के सपने में भले ही घोडा आता हो पर उन्होंने फिल्म का नाम रखा - ज़ंजीर।ज़ंजीर नायक की बेबसी को बहुत ही संजीदा तरीके से दर्शाती थी। लेखकद्वय  ने अगर मेरे कहे अनुसार फिल्म का नाम अश्व, अश्वथामा या घोडा रखा दिया होता तो शायद न फिल्म हिट होती, न अमिताभ।     

एक दिन जब ऑफ़िस पहुँचे, तो देखा प्रशासनिक भवन के सामने कुछ नाप-जोख चल रही है। जब भी विभाग में कहीं से फंड आ जाता है, इस प्रकार का काम शुरू हो जाता है। ये कोई गौर करने लायक बात न थी। फिर कुछ दिनों के बाद देखा की कालेज के प्रधानाचार्य महोदय के पोर्टिको वाली सड़क पर चेन का बैरियर लग गया है। हुआ यूँ कि पूरे परिसर में साईकिल, स्कूटर, गाड़ी पार्क करने की कोई समुचित व्यवस्था न थी, न प्रशासन ने इस ओर कभी ध्यान दिया। कुछ छायादार हिस्सों में पहले-आओ, पहले-पाओ के आधार पर कुछ गाड़ियाँ खड़ीं हो जातीं थीं। कुछ के लिये  गिने-चुने पेड़ थे और उनके अलावा लोगों के लिये जाड़ा-गर्मी-बरसात था, खुला आसमान। आम आदमी तो प्रशासनिक भवन से दूर ही रहने का प्रयास करता। किन्तु मुँहबोले प्रशासनिक कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी प्राचार्य महोदय की गैर-हाज़िरी में पोर्टिको की छाया का आस्वादन करने से नहीं चूकते थे। 

कोई भी विभाग बिना विभागाध्यक्ष के तो चल सकता है पर बिना लग्गू-भग्गुओं के नहीं। लग्गू ने प्राचार्य महोदय को खोंस दिया कि हुज़ूर जब आपकी अम्बेस्डर पोर्टिको की शोभा नहीं बढ़ा रहीं होतीं तो ऑफिस के बाबुओं के दुपहिया वाहन उस पोर्टिको की शोभा ख़राब कर रहे होते हैं। भग्गू कहाँ पीछे रहता बोला सर आप जिस कार्यकुशलता से प्रशासनिक निर्णय लेते हैं, बहुत सम्भावना है कोई आपको रिटायरमेंट से पहले हुर-हुरा न दे। इसलिये इस रस्ते पर एंट्री रिस्ट्रिक्ट कर दीजिये। प्राचार्य ने अनमना सा विरोध किया कि लोगों का रास्ता लंबा हो जायेगा, उन्हें घूम के जाना पड़ेगा। लग्गू-भग्गू ने समझाया सर इस पोर्टिको पर सिर्फ़ और सिर्फ़ आपका और आपकी अम्बेस्डर का हक़ है। और किसी भी प्रशासक को अपने हक़ के प्रति जागरूक और जनता के हक़ के प्रति यदि सुसुप्त नहीं तो निर्विकार तो रहना ही चाहिये। अभी ये लोग आपके पोर्टिको में कब्ज़ा करेंगे कल आप की अनुपस्थिति में आप के कमरे के एसी की ठंडी हवा भी खाने लगेंगे। दोनों प्रवेश द्वार पर सीकड़ लग जायेगी जैसी इण्डिया गेट पर लगी रहती है, फिर किसी की क्या मजाल जो आपके पोर्टिको की छाया का मिसयूज़ कर सके। प्रस्ताव पास हो गया और अमल में भी आ गया। 

लोगों की असुविधा का ख्याल रखना कुशल प्रशासकों का काम नहीं है। कुछ को बुरा लगा, कुछ को भला। पर बुरा-भला लगने या कहने की गुंजाईश न थी। प्राचार्य जी कलम के पक्के थे। मुँह से कुछ न कहते पर कलम से रगड़ देते। और रोजी-रोटी में पूरी आस प्रमोशन पर ही टिकी रहती है। वही तो बरक़्क़त है। सो लोगों ने मुँह सिल लिये। राजाज्ञा भी कोई चीज़ होती है।एक दिन हमारे शर्मा जी इमोशनलिया गये। बोले साला खाली पोर्टिको में भी गाड़ी नहीं खड़ी कर सकते लानत है ऐसी जहालत पर। जोश आ गया चेन हटा के अपनी स्कूटी पोर्टिको में लगा दी। उस क्षण उन्हें लगा किसी गोरी सरकार का नमक कानून तोड़ दिया। प्राचार्य ने एक जाँच आयोग बैठाया दिया। बगावत की बू पर काबू ज़रूरी था। आयोग ने प्राचार्य के कहे अनुसार शर्मा के इस जघन्य कृत्य की घनघोर भर्तस्ना की। आखिर उनकी भी सत्यनिष्ठा यानि इंटीग्रिटी का मामला था। शर्मा को भयंकर सा मेमो मिला पर्सनल फाइल में एडवर्स एंट्री हुयी सो अलग से। शर्मा के सपने में अब बिना घोड़े वाली ज़ंजीर अक्सर आती है। जिन्हें मेमो नहीं मिला उनके सपनों में भी वो ज़ंजीर जरूर आती होगी उन्हें उनकी बेबसी का एहसास दिलाने।   

- वाणभट्ट               

गुरुवार, 29 मई 2014

पुरवा बयार

शर्मा जी की उम्र पचास के अल्ले-पल्ले रही होगी। मोहल्ले के इको पार्क वॉकर्स क्लब के संस्थापक सदस्य। बहुत ही नियमित। बहुत ही जिंदादिल। मँहगे हेयर डाई से बालों को रंग के अपनी उम्र के आधे ही जान पड़ते। मुझे मिला कर कुल जमा दस लोगों को अपनी प्रेरणा से जोड़ रक्खा था। ट्रैक पर टहलने के बाद सभी मिल के योग (योगा) करते फिर लाफ्टर सेशन शुरू होता। पूरा एक घंटे का पैकेज है। पार्क में आना उतना ही अनिवार्य है जितना दफ्तर जाना। अटेंडेंस रजिस्टर तो नहीं था पर न आना बहुत मँहगा पड़ता। एक दिन भी कोई चूक गया तो तय है कि पेनल्टी के रूप में उसके घर सब चाय पीने जायेंगे। और कोई शरीफ़ आदमी सिर्फ़ चाय तो पिलायेगा नहीं, कुछ खिलायेगा भी। ये दो तरफ़ा टैक्टिस बहुत कारगर रही। पार्क नहीं आये तो दोस्त हाल लेने घर पहुँच जायेंगे। और जिस बीवी को सुबह-सुबह बिस्तर से उठ कर चाय बनानी पड़ेगी, वो अगले दिन ख़ुद अलार्म लगा के उठेगी और आपको ठीक समय पर घर के बाहर कर देगी। इस तरह हमारा क्लब कई वर्षों से फल-फूल रहा है। शर्मा जी शारीरिक रूप से बिलकुल स्वस्थ थे और मानसिक रूप से और भी ज़्यादा। देखने में पचीस के लगते पर दिल बीस का ही था। लाफ्टर सेशन के लिये अलग से तैयारी करके आते थे। अपने क्रैकिंग जोक्स से सबका जीना मुहाल कर देते। हमेशा हॅंसने-हँसाने को तत्पर रहते।

जाड़ा-गर्मी-बरसात शर्मा जी को हमने कभी पार्क में नदारद नहीं पाया। लिहाजा हमें उनके घर कभी चाय पीने का सौभाग्य नहीं मिला। नमक-मिर्च के साथ बताने वाले बताते हैं कि शर्मा जी ने लव मैरिज की थी। और उनकी पत्नी, यानि हमारी भाभी जी, अपने दिनों में अनिन्द्य सुंदरी हुआ करतीं थीं। शर्मा से शादी के बाद नियमित खान-पान से इंशा-अल्ला उनका स्वास्थ्य आवश्यकता से अधिक भरा-पूरा हो गया था। उम्र का असर शर्मा जी की ही तरह उन पर भी हावी नहीं हुआ था। आदमी वही जवान है जो उम्र को मानसिक रूप से दरकिनार कर दे। लिहाजा उन्हें हर आने-जाने वाले पर शक़ रहता कि उसके इरादे गलत हैं। और शर्मा जी के टहलने वाले दोस्तों पर तो उन्हें कतई विश्वास नहीं था। टहलने वाले सर्किल का तो स्टेटस भी नहीं पता। अफ़सर है, क्लर्क है या चपरासी। शर्मा जी की नियमितता का शायद ये भी एक कारण रहा हो। शर्मा जी तन-मन दोनों से जवान थे, जबकि उनकी पत्नी मन से पूर्णतः युवा। उनसे मिलने की सभी की इच्छा मन ही मन बनी रहती पर शर्मा भूले से भी किसी को अपने घर आने का न्योता न देता। 

चाय की पेनल्टी से बचने का एक मात्र तरीका था - मास बंक। किस-किस के घर जा पायेंगे शर्मा जी। ये भी हो सकता है कि हमारे बीच का कोई जासूस शर्मा जी को मास बंक की खबर कर देता हो और वो भी छुट्टी मार लेते हों। कुछ लोगों ने सन्डे ऑफ़ का सिस्टम बना रक्खा था। उन्हें सन्डे एग्जम्प्टेड था। पर आज सन्डे नहीं था। न ही कोई मास बंक का फरमान था। मै यथा समय ठीक साढ़े पाँच बजे उद्यान में था। पार्क में मेरे अलावा सिर्फ़ शर्मा जी ही पहुँच पाये थे। बाकी सबने गच्चा दे दिया। पहले से बता दिया होता तो मै भी फ़रलो मार लेता। ये भाईसाहब अमूमन सबसे जल्दी आ जाया करते थे। इस समय टहलने के बाद प्राणायाम में लगे हुए थे। मेरे पार्क में एंट्री लेते ही उन्होंने धीमे स्वर में हरि-ओम की आवाज़ लगाई। उनकी आवाज़ से गर्मजोशी गायब थी।

मुझे शक हुआ कि हो न हो कुछ गड़बड़ है। लगता है शर्मा जी की तबियत ठीक नहीं है। मुझे लगा उन्हें आत्मीयता की ज़रूरत है। पार्क में कोई अन्य मित्र दिख भी नहीं रहा था। सो टहलने का कार्यक्रम स्थगित करके मैंने पूरी गर्मजोशी से पूछा - शर्मा क्या बात है, बड़े बुझे-बुझे से लग रहे हो। वो एक ठंडी आह भर के चुप लगा गये। थोड़ा और कुरेदा तो बोले कुछ नहीं यार जब पुरवा हवा चलती है तो पूरे बदन में हल्का-हल्का दर्द रहता है। पुरानी चोटें फिर से हरी हो जातीं हैं। एक सिसकारी के साथ वो फिर चुप हो गए। उनका ध्यान आज प्राणायाम में नहीं लग रहा था। मुझे लगा राख में कहीं अंगार छिपा है। बोला - पुरवा तो सबके लिये है। हाँ थोड़ा आलस्य ज़रूर लगता है शायद इसीलिये आज अनुपस्थिति ज़्यादा है। पर घर के अंदर एसी में सोने वालों पर भला पुरवा क्या असर करेगी। आपको कौन सी चोट लग गयी शर्मा जी। शर्मा जी मेरे अतिक्रमण पर थोड़ा बुरा सा मान गये। लेकिन बड़ी शराफ़त से बोले वर्मा जी आज चलता हूँ, कल मिलूँगा। और वो बिना हँसे-हँसाये, मेरे अंदर जिज्ञासा का तूफ़ान खड़ा करके पार्क से निकल लिये। जिसका शीघ्र निवारण होना ज़रूरी था। लिखने वाले को तो बस लिखने का मसाला चाहिये। कोई सुख में हो या दुःख में लेखक अगर अपने स्वार्थ से उबर जाए तो कितनी ही कहानियाँ अनकही रह जायें।  

शर्मा जी के एक पुराने मित्र जो हमारे वॉकर क्लब के सदस्य भी थे वही मेरी शंका का समाधान कर सकते थे। रास्ता थोड़ा लम्बा था पर आज टहलना भी तो नहीं हुआ था। मिश्रा जी ने सोचा आज वर्मा जी अकेले ही पेनल्टी वसूल करने कैसे आ गये। जब हम ड्राइंग रूम में चाय का इंतज़ार कर रहे थे, मैं अपनी जिज्ञासा पर ज़्यादा संयम न रख सका। तुरंत मुद्दे पर आ गया। यार शर्मा आज बड़ा सेंटी सा लग रहा था कह रहा था पुरवा हवा चलती है तो बदन टूटता है। मिश्रा थोड़ा संजीदा हो गया फिर बोला यार मै शर्मा को बचपन से जानता हूँ। शुरू से ही बहुत ही हृष्ट-पुष्ट सुन्दर और स्मार्ट बंदा है। कालेज के दौरान इसे इश्क का रोग लग गया। जिस लड़की से लगा वो इससे भी ज्यादा सुन्दर थी लेकिन इसे घास भी नहीं डालती थी। उसकी अपनी सीमायें थीं, जात-बिरादरी की। भाईसाहब उसकी राह में मारे-मारे फिरा करते। जाति और सम्प्रदाय के हिसाब से तो दोनों में जो अंतर था वो शायद पट भी जाता पर स्टेटस का फ़र्क पाटने के लिये लड़की वाले राजी नहीं थे। लिहाज़ा एक दिन इनको बुरी तरह पीट-पाट के रेलवे ट्रैक पर डाल आये। किस्मत अच्छी थी जो किसी की नज़र पड़ गयी और ये बच गये। कालान्तर में शर्मा जी एलआईसी में अफ़सर बने और उसी लड़की ने घर से भाग कर इनसे शादी की। घर-समाज सबने लड़की का बहिष्कार कर दिया। शर्मा जी ने भी अपने-पराये सबसे जम के मोर्चा लिया। इसीलिये शर्मा के घर बाहरी लोगों का आना-जाना कम है और घर वाला तो न कोई इनका है, न उनका। लोग इनके बारे में न जाने क्या-क्या कयास लगाया करते हैं। पर इन दोनों की दुनिया अलग है, जिसमें ये मग्न रहते हैं। वॉकर्स ग्रुप और ऑफिस यही शर्मा का बाह्य दुनिया से संपर्क है। मेरा तो घर का आना जाना है। कभी तुम्हें शर्मा के यहाँ चाय पिलवाता हूँ। इसकी बीवी बहुत ही ज़हीन  है। दोनों में गज़ब का सामंजस्य है। इन्होने शादी तो की लेकिन आज तक ये लोग अपने-अपने धर्म पर कायम हैं। 

हमारी चाय आ गयी थी। पुरवा हवा की जो तफ्तीश मुझे मिश्रा के यहाँ तक खींच लायी थी। वो पूरी हुयी। भिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करें, यही धर्म है। मेरा अपना मानना है धर्म के अलावा जो कुछ भी है वो अधर्म है। मजहब-पूजा पद्यति कितनी भी अलग हो लेकिन धर्म तो धर्म ही रहेगा। सर्वधर्म-समभाव सिर्फ़ नारे की चीज़ नहीं है। शर्मा दम्पति इसका एक जीवंत उदाहरण हैं। उनके प्रति आदर का उदगार है मेरा ये लेख। प्रभु हमारे देश वासियों को ऐसी ही सन्मति प्रदान करे। 

बाहर पुरवा अपने उफान पर थी। मेरे लिये ये ताज़ी बयार का झोंका था।      

- वाणभट्ट 

सोमवार, 26 मई 2014

जीनोटाइप

सत्य आधार जी सभा अध्यक्ष की कुर्सी पर पूरे ठसके के साथ विराजमान थे।

कुछ लोग कभी रिटायर नहीं होते। वे अपने कार्यकाल में इतने महान कार्य सम्पादित कर चुके होते हैं कि उनका जाना एक निर्वात खड़ा कर देता है। और इस खाली जगह को भरने के लिये उनके समतुल्य किसी व्यक्ति को खोज पाना वर्तमान शासकों के लिये निकट भविष्य में संभव नहीं हो पाता। लिहाज़ा ऐसे महान सेवकों को सेवाकाल में विस्तार से नवाज़ा जाता है। यदि सेवा विस्तार नहीं मिला तो तमाम परामर्श समितियों में साहब के समायोजन की पर्याप्त संभावनायें होतीं हैं। कुछ नहीं तो उनके वैचारिक निवेश का सम्बल अगली पीढ़ी को मिलता रहेगा। यदि आपने अवकाश प्राप्त करने से पहले अपने पोस्ट रिटायरमेंट असाइनमेंट का जुगाड़ नहीं कर लिया तो आपकी अब तक की हुयी जोड़-तोड़ से अर्जित सभी उपलब्धियाँ व्यर्थ गयीं। नौकरी में रहते हुये जिसने भविष्य के उभरते सितारों के मेन्टॉर बन कर उनका मूल्य-सम्वर्धन कर दिया हो, उसका रिटायर हो पाना कतिपय असंभव है। आपके कार्यकाल के दौरान आपकी असीम अनुकम्पा से योग्यता और अयोग्यता के बावज़ूद जो आगे पदोन्नत होते चले गये, उनके लिए ऋण से उऋण होने का समय है, आपका रिटायरमेंट। क्योंकि सिर्फ योग्यता के बल पर यदि कोई आशान्वित है कि वो परम पद प्राप्त करेगा तो वो अवश्य दिवा स्वप्न दोष विकार से पीड़ित होगा। ऋण से उऋण होने का तरीका है, किसी प्रकार उनकी आवश्यकता को बनाये रखिये।   

ये सामाजिक प्रगति का ही लक्षण है कि व्यक्ति वानप्रस्थी की आयु में भी गृहस्थ आश्रम के आनन्द  छोड़ना नहीं चाहता। शिलाजीत और पुष्टिवर्धक औषधियों की कम्पनियाँ इन्हीं के भरोसे चल रहीं हैं। संन्यास की तो बात अब बेमानी हो गयी लगती है। चिकित्सा के क्षेत्र में हुये आविष्कार ये सुनिश्चित करते हैं कि जब तक गाँठ में पैसे हैं या जब तक आप न चाहें, धरती का बोझ कम होने से रहा। और कर्मयोगी मनुष्य के साथ दिक्कत ये है कि वो कर्म नहीं करेगा तो जीते जी मर जायेगा। इसलिये ऐसे कर्मयोगियों को अगर देश ने नहीं पहचाना तो ये अपना एनजीओ बना लेंगे और एनजीओ को मिलने वाली सरकारी-गैरसरकारी अनुदान राशि से देश सेवा करते रहेंगे। जब तक साँसें है कोई ज़िन्दगी को झुठला नहीं सकता। बस दिल का धड़कते रहना ज़रूरी है। धड़कते दिल में कई स्टंट दफ़न हों तो भी चलेगा। क्योंकि चलती का नाम है गाड़ी। दिमाग जो साठ साल में ही सठियाने लगता है, उस पर प्रश्न करना देश के उदीयमान भविष्य पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर सकता है। ज़िन्दगी है तो सपने भी होंगे। शरीर शिथिल पड़ सकता है पर सपने नहीं। शिथिल शरीर के लिये पुरखों की जड़ी-बूटियाँ हैं, तेल-मालिश है। रहे सपने तो, दूसरों के खर्च पर हवाई यात्रायें और अतिथिगृहों में मिलने वाली सुविधायें आपको सदैव सपने देखने के लिये प्रेरित करती रहेंगी। सो जो-जो पुनीत कार्य आपसे अपने उत्पादक कार्य काल में छूट गये हों उन्हें करवाने के लिये यही सबसे मुफीद समय है। क्योंकि अब आपको सिर्फ ज़ुबान हिलानी है और शरीर किसी और को।  

किन राहों से दूर है मंज़िल कौन सा रस्ता आसां है...
हम जब थक कर रुक जायेंगे, औरों को समझायेंगे...- निदा फ़ाज़ली

जुगाड़ और नेटवर्क से किसी समिति के चेयरमैन बन गये तो ये हर उस काम को जो ख़ुद न कर पाये हों, उन्हें दूसरों से करवाने का अवसर है. 

सत्य आधार जी की आँखों में गाम्भीर्य झलक रहा था। और चेहरे पर अद्भुत ओज उनके द्वारा अर्जित उपलब्धियों का सहज बखान कर रहा था। समिति के अन्य सदस्य भी उन्हीं की तरह या तो अवकाश प्राप्त थे या उसी कगार पर पैर लटकाये बैठे थे। अपने अध्यक्षीय भाषण में साहब ने बताया कि किस प्रकार वो देश को अन्न की समस्या और कुपोषण से निजात दिलाना चाहते हैं। इसके लिये दूसरों को क्या-क्या कदम उठाने चाहिये और नयी पीढ़ी को क्या-क्या करना चाहिये। किस प्रकार विकसित प्रजातियों और तकनीकों  प्रयोग करके फसलों का उत्पादन और उनकी उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। उनके विचार, उनकी पावन जिव्हा से धारा-प्रवाह फूट रहे थे। 

उनके भाषण का लब्बोलबाब कुछ इस प्रकार था। भारत कृषि प्रधान देश रहा है और रहेगा। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग १५% का योगदान करता है और ५०% जनसँख्या को रोजगार मुहैया करता है। आज आवश्यकता है तो इसे उद्योग की तरह अपनाने की है। आज बहुत सी उन्नत प्रजातियाँ हमारे प्रजनक लोगों ने विकसित कर दीं हैं। आवश्यकता है तो उनके प्रचार-प्रसार की। किसानों द्वारा उन्नत प्रजातियाँ अपनाने की। हम अभी भी औद्योगिक खेती से बहुत दूर हैं। थोड़ा आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग हो तो तो कृषि का उत्पादन दुगना करना ज्यादा कठिन नहीं है। यदि कृषि कार्यों में हुये मशीनीकरण को वृहद रूप से अपनाया जाये तो लागत मूल्य कम किया जा सकता है। कम समय में ज्यादा काम हो सकता है। पानी का समुचित प्रबंधन होना चाहिये। इसके लिये ड्रिप या स्प्रिंकलर्स का प्रयोग किया जा सकता है। बुआई से लेकर कटाई तक यदि सभी शस्य क्रियाओं के लिये आधुनिक यंत्रों का प्रयोग करें तो उसी भूमि से अधिक उत्पादन ले सकते हैं। फिर करीब १५-२०% उत्पादित अन्न उचित रख-रखाव और प्रसंस्करण के आभाव में खराब हो जाता है और खाने योग्य नहीं रह जाता।इसके लिए आवश्यक है उचित प्रबंधन की। उचित प्रबंधन के द्वारा हम न सिर्फ अधिक अन्न का उत्पादन कर सकते हैं अपितु बल्कि उनका संरक्षण भी कर सकते हैं। आज हमारे पास ऐसी प्रजातियाँ हैं जो गर्मी झेल सकतीं हैं। एक्सट्रीम कोल्ड में भी सर्वाइव कर सकतीं हैं। ये रेनफेड एरियाज़ में कम पानी की स्थिति में भी संतोषजनक उत्पादन देतीं हैं। वी मस्ट थिंक आउट ऑफ़ बॉक्स। थिस इज़ हाई टाइम। इसके लिये देश के इंजीनियरों और मैनेजरों को कृषि क्षेत्र में अपनी सहभागिता बढ़ानी चाहिये। माना कि कृषि में पैसा कम है किन्तु अपने देश और देश की बढ़ती जनसँख्या के लिये प्रोफेशनल्स को आगे आना ही होगा। इत्यादि-इत्यादि गिनाने में वो ये भूल गये कि कृषि शोध के केवल उन्नत प्रजातियों के विकास पर सीमित हो कर रह गया है। हर कोई जलवायु सहिष्णु, कीट और जीवाणु रोधी सुपर रेस विकसित करने में लगा हुआ है, जबकि अधिकांश कृषि समस्याओं का प्रबंधन एक सरल व सहज समाधान हो सकता है. 

बहुत ही ओजपूर्ण था, सत्य आधार जी का भाषण। हमारे सिस्टम के हिट और फिट लोगों की एक खासियत है वो कभी उद्वेलित नहीं होते। उन्हें किसी कार्य के लिये प्रेरित करने के लिए वित्तीय प्रावधान का खुलासा करना आवश्यक है। अन्यथा उनके दोनों कान खुले रहते हैं। बड़े-बड़े देश सेवा के लिये उनको प्रेरित नहीं कर सके, तो सत्य आधार जी की भला क्या बिसात। लेकिन उनके हाव-भाव से ऐसा लगता मानो वे इस ओज पूर्ण भाषण को सुनने मात्र से कल से ही देश-सेवा में जुटने वाले हैं। कल से इसलिये कि कल किसने देखा है। ये लोग सभाओं में अपने विचार देने की अपेक्षा बंद कमरों में बॉस के समक्ष अपने उदगार व्यक्त करते हैं। इससे दो फायदे हैं। एक तो बॉस का समय, जो कट नहीं रहा होता है, कट जाता है। और दूसरा बॉस को ये ग़लतफ़हमी बनी रहती है कि यही मेरा वफादार चेला है। बॉस अगर फ़ायदा न भी करे तो कम से कम नुक्सान तो नहीं करेगा। वफ़ादारी चीज़ ही ऐसी है, जो दोनों तरफ़ से निभायी जानी चाहिये। ऐसा सिस्टम के ज्ञानियों और ध्यानियों का मानना है। 

सभा में इंजिनियर शर्मा भी बैठा था। उसकी उम्र अभी-अभी ऐसी गहन सभाओं में बैठने की हुयी थी। भाषण सुन कर उद्वेलित हो गया। इस देश के इंजीनियरों को ये ग़लतफ़हमी अक्सर हो जाती है कि सिर्फ़ वो ही आउट ऑफ़ बॉक्स प्राग्मेटिक सोलूशन्स सोच सकते हैं। जबकि शासन उनका उपयोग सिर्फ जिम्मेदारी फिक्स करने में करता है। फाइलों पर मलाई अफसर और उनका मुँह लगा बीए फेल बाबू खाये, जिम्मेदारी अभियंता की। बड़ी नाइंसाफ़ी है। शर्मा ने कुछ बोलने के लिये हाथ खड़ा कर दिया। सभा में उपस्थित विद्वतजनों ने उसे घूर कर देखा। पर बेचारा देश के प्रति अपने कर्तव्यबोध के कीड़े के प्रभाव से उस क्षण ग्रसित हो गया लगता था। बोला सर मै कुछ कहना चाहता हूँ। चूँकि मामला आउट ऑफ़ बॉक्स और युवाओं का था, सत्य आधार जी को आज्ञा देनी पड़ी। बाकि सब बकरे की ख़ैर मनाने में लग गये। उन्हें मालूम था कि सत्य आधार जी को सुनाने की आदत है, सुनने की नहीं। 

अपने अंध जोश से भरपूर शर्मा ने कहना शुरू कर दिया। सर मै मानता हूँ कि कृषि उद्योग नहीं है, किन्तु इसने कितने ही उद्योगों को संरक्षण और पश्रय दे रक्खा है। बीज, कीटनाशक, खर-पतवारनाशक, कृषि यंत्र, भण्डारण, प्रसंस्करण सभी क्षेत्रों में अनेकों राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सक्रिय भागीदारी है। ये सभी कम्पनियाँ दिन-दूनी रात चौगनी तरक्की कर रही हैं। इनका ग्राहक या तो किसान है या आम उपभोक्ता। जबकि कृषि अपने आप में एक हानिकारक व्यवसाय बनता जा रहा है। एक ही कृषि क्षेत्र के लिए अनेक प्रजातियों के बीज संस्तुत हैं। बीज बनाने का काम कम्पनियाँ कर रहीं हैं, जिनके लिये किसान एक ग्राहक है और वो इनसे अपने उत्पाद का अधिकतम मूल्य वसूलती हैं। यदि एक क्षेत्र के लिये कम से कम प्रजातियाँ चिन्हित हों तो थोड़े प्रशिक्षण के बाद उनका बीज बनाना किसानों के लिये भी सम्भव हो सकता है। प्रजातियों के विकास से उत्पादन बढ़ाना सिंगल डाइरेक्शन सोच है। एक बार एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि वो मैदानी इलाकों के लिये ऐसी मछली विकसित कर रहा था जो ठण्ड में न मरे। मैंने उसे राय दी कि भाई ठन्डे इलाके की मछली ले आओ, शायद वो जिन्दा रह जाए। लेकिन फ्री की राय में वित्तीय प्रावधान तो होता नहीं इसलिए वो भाई अभी तक अपने प्रयास में तन-मन और सरकारी धन से लगे हुये हैं। संभवतः हम सभी कृषि समस्याओं का समाधान फसल सुधार के द्वारा करना चाहते हैं। किन्तु अच्छे से अच्छे बीज को चाहिये स्वस्थ मृदा, खाद, पानी और उचित प्रबंधन। खाद्यान्नों की उत्पादन, उत्पादकता और उपलब्धता बढ़ाने के लिये समग्र दृष्टि की आवश्यकता है। अच्छे बीज, उर्वर भूमि, समुचित जल प्रबंधन, उचित शस्य क्रियायें और साथ में मशीनीकरण, भण्डारण और प्रसंस्करण में ग्रामीण सहभागिता के द्वारा ही हम कृषि को उद्योग के रूप में स्थापित कर सकते हैं। किसी भी उद्योग के लिये ब्रेक इवन पॉइंट का निर्धारण किया जाता है। इसी प्रकार कितनी भूमि और कितनी पैदावार किसान के लिये फ़ायदेमंद होगी इसका आँकलन ज़रूरी है। जितना प्रयास हम फसलों को उन्नत करने में कर रहे हैं, उससे कम ख़र्च में वर्षा और भूगर्भ जल का संचयन और संवर्धन कर के हम अधिक से अधिक वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र को सिंचित क्षेत्र में बदल कर पैदावार बढ़ा सकते हैं। इससे मौसम पर हमारी निर्भरता कम होगी और मौसम की मार से भी राहत मिलेगी। सर आज की लड़ाई हमें उन्हीं हथियारों से लड़नी है, जो हमारे हाथ में हैं। सस्टेनेबिलिटी अर्थात निरंतरता किसी भी उद्योग का मूल है। ये बात कृषि पर भी लागू है। उन्नत प्रजातियों की उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन में सदैव अंतर रहा है। हमें ऐसे प्रबंधन परिक्षण करने चाहिये जिससे हम उत्पादन को उस प्रजाति की अधिकतम उत्पादन क्षमता तक ले जा सकें। ऐसा बोल के इंजिनियर शर्मा आत्मविभोर होकर चुप हो गया। उसे लगा उसने देश की खाद्यान्न समस्या सिर्फ अपनी बातों से सुलझा दी। उसे क्या पता था कि विद्वान लोग समस्या को सुलझाने नहीं उलझाने में यकीन रखते हैं। समस्या है तो विद्वान हैं। समस्या खत्म तो विद्वान की आवश्यकता भी ख़त्म हो सकती है।   

इस बीच सभा में उपस्थित सभी के चेहरे पर विभिन्न हाव-भाव आते और जाते रहे। शर्मा के खैरख्वाह आँखें मार-मार के उसे चुप होने का ईशारा करते रहे। पर उस पर तो जैसे विक्रम वाला वेताल सवार था, ये बात अलग थी कि यहाँ हलाल वेताल को होना था और ठहाके विक्रम को लगाने थे। सत्य आधार जी को सुनने की आदत तो थी नहीं। उन्हें शर्मा का इस प्रकार बोलना अखर गया। लेकिन इस बक्से के बाहर की सोच को वो चुप भी नहीं करा सकते थे। वो मुस्कराते हुए बोले इंजिनियर तुम्हें अपना जीनोटाइप मालूम है। शर्मा आश्चर्यचकित सा बोला - नहीं सर। "तुम्हारा जीनोटाइप है यूएसए टाइप। यू नो मीनिंग ऑफ़ यूएसए, इट्स अन-सटिस्फाइड आंटी यानि असंतुष्ट चाची"। पूरी सभा सन्नाटे में आ गयी। अपने गज़ब का सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की तारीफ़ करते हुये केवल सत्य आधार जी का ठहाका कमरे में गूँज रहा था। बाकी सभा स्तब्ध थी इतने ख्यातिलब्ध व्यक्ति से इतने घटिया मज़ाक की शायद किसी ने अपेक्षा नहीं की होगी। 

शर्मा ने सत्य आधार (जी की अब कोई गुंजाईश न थी) की आँखों में आँखे घुसेड़ दीं। सर आपने न सिर्फ मेरा बल्कि अपना जीनोटाइप भी बता दिया। साऊथ अफ्रीका। उसके बाद जो हुआ वो कहानी का हिस्सा नहीं है। 

- वाणभट्ट

मंगलवार, 20 मई 2014

गुज़र तो जायेगी तेरे बग़ैर भी लेकिन...

एक दिन सपने में देखा सपना। वैसे सपने में सपना देखने का कॉपीराइट चचा गुलज़ार का है। पर वो भतीजा ही क्या जो चाचा के माल पर अपना अधिकार न समझे। तो साहबान सपने में सपना इसलिए कि ऐसे सपनों के सपने में भी सच होने की सम्भावना असंभव सी लगती है। जैसे अमिताभ बच्चन फिल्मों में अमोल पालेकर की वजह से मार्केट से आउट हो जाये। ये सपना भी कुछ ऐसा ही था। हमारे महान देश में व्यवस्था परिवर्तन हो गया है। और वो भी कोई छोटा-मोटा नहीं। अमूल-चूल। सरकार ऐसी जो सेवा करना चाहे। नौकरशाही भ्रष्टाचार से मुक्त। सारे काली कमाई वाले जेल के अंदर। पेट की खातिर जुर्म करने वाले जेल के बाहर। सबको रोजगार। दगाबाज और देशद्रोहियों की खैर नहीं। न सिर्फ विदेशों में पड़ा काला धन बल्कि देश में जमा सारा काला धन कुर्क कर लिया गया। काले-सफ़ेद सभी तरह के हराम के धंधे बंद। पुलिस चाक-चौबंद। शुद्ध जल और वायु। प्रदूषण का अंत। गंगा साफ़। इधर-उधर गंदगी फैलाना और थूकना ख़त्म। सांप्रदायिक सदभाव, सर्वत्र व्याप्त। नारी उत्पीड़न और दहेज़ मानो बीते ज़माने की बात। पडोसी मुल्कों की क्या मज़ाल कि हमारी ओर आँख भी उठा सकें। दूर देशों में हमारे सामानों का निर्यात बढ़ गया है। चीन और अमरीका के बाजार भारतीय सामानों से अटे पड़े हैं। लोकपाल आ गया। किसी पर आय से अधिक संपत्ति का शक हुआ नहीं कि वो जाँच की गिरफ्त में। राम-राज्य का सपना जो प्रभु राम के समय भी पूरा न हो सका था, पूरा हो गया। ये सपना किसी एक ने देखा, ऐसा न था। देश के सभी भ्रष्टों को एक साथ सुबह चार बज के पैंतालीस मिनट पर ये सपना आया। इतना भयावह सपना सपने के अंदर ही देखा जा सकता है। सब अंदर तक हिल गये।सुबह का सपना है, कहीं सच हो गया तो।

जिस प्रकार त्रिजटा राक्षसी को लंका दहन से पहले ही अनिष्ट की सम्भावना हो गयी थी एक स्वप्न के माध्यम से। भ्रष्टों के भ्रष्ट भी इस दुःस्वप्न को लेकर चिंतित हैं। किन्तु कर्ण और रावण को भी मरते दम तक ये एहसास कहाँ हो पाया कि वो गलत पक्ष और वजह के लिये लड़ रहा है। इस धन-बल से ग्रसित महाबलियों को भारत के महान लोकतंत्र पर वृहद आस्था है। वे आश्वस्त हैं कि बरसों से पुष्पित-पल्लवित हमारे पुरखों की भ्रष्टाचार में लिप्त विरासत सिर्फ सरकार बदल जाने से दम तोड़ दे, ऐसा कतिपय संभव नहीं। ऐसा कभी हो सकता है कि आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद की गुलामी और कुशासन का जीवन जीते-जीते जनता जाग जाये और पूरे के पूरे सिस्टम को ही कटघरे में खड़ा कर दे। जनता बदलाव चाहती है जबकि सत्ता वर्षों से पोषित कुव्यवस्था को ही व्यवस्था मान कर उसे महिमा मंडित करने में लगी रहती है। हर देश में विषमतायें होती ही हैं। सत्ता कम से कम प्राकृतिक समस्याओं के समाधान में लगी रहतीं तो भला था। पर यहाँ तो सत्ता ने अनेक मानव निर्मित विषमतायें रच डालीं। जिस भी क्षेत्र पर शासन की नज़र पड़ी समस्या पैदा हो गयी। देश है तो समस्यायें हैं, समस्यायें हैं तो उनके समाधान खोजने के लिये विद्वतजन हैं। विद्वतजन कोई सस्ता उपाय बतायें तो हर कोई अपना ले। लेकिन फिर बजट भी कम हो जायेगा। जब बजट होगा तो उसके कार्यन्वयन में सरकारी अमला होगा। इस अमले में हर एक के आगे पेट लगा है और जब पेट लगा है तो भूख भी होगी। और भूख है तो पहले अपनी-अपनी बुझाओ, देश गया भाड़ में। ऐसी महान सेवा भावना के आगे हर किसी को नत-मस्तक देख, हर किसी ने इसे ही सफलता का मूल-मन्त्र मान लिया है। जिनके पास ऐसी नौकरी नहीं है तो ये मान लिया जाता है कि इनके पास न तो पेट होगा न भूख। यही वो लोग हैं जिनकी सेवा के लिये सरकार बनी है। इनमें मज़दूर, किसान, व्यापारी व  अन्य प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले शामिल हैं। अपने जीविकोपार्जन में व्यस्त इन लोगों में तोंद जैसी उपलब्धि खोज पाना थोड़ा दुर्लभ है। यदि कोई भी व्यक्ति इस एक्सेसरी से युक्त है तो मान लीजिये वो किसी न किसी प्रकार से दूसरों के हिस्से का भोगी या भागी है।

भ्रष्टाचार की जड़ में है समस्या की खोज। सभी विद्वतजन मिल बैठ कर सरकार को ये बताते हैं की फलां जगह फलां समस्या है। समस्या जब तक छोटी है, वो समस्या नहीं होती। समस्या को विस्तार देना पड़ता है। समस्या का आकर उसके समाधान में होने वाले फण्ड द्वारा निर्धारित होता है। इस क्षेत्र में विदेशी ट्रेनिंग और एक्सपर्टीज़ की ज़रुरत हो तो समस्या सार्वभौमिक टाइप की हो जायेगी। जिसका समाधान विदेश यात्रा करने मात्र से निकल आयेगा। कुछ समस्याओं की ओर विद्वतजन  मात्र इस लिये ध्यान नहीं दे रहे हैं कि विदेशों में न ये समस्या है, न इनका समाधान नहीं है। ऐसी ही समस्या है गाँवों में नील गाय और शहरों में बंदरों की बढ़ती तादाद। पर अभी इन समस्याओं का आविर्भाव विकसित देशों में नहीं हुआ है इसलिये इनका समाधान मिलना मुश्किल है।इनके समाधान में ज़्यादा बजट एलोकेट करने की  गुंजाईश भी नहीं है, लिहाजा हमारे विद्वानों का इनको समस्या मानने से भी इंकार है। साठ के दशक में नील गाय की समस्या का ज़िक्र संसद में मिलता है, जब इसे वनरोज डिक्लेयर करने की बात उठी थी। पर बहुत संभव है, उपयुक्त बजट एलोकेशन के आभाव में इस समस्या को स्थगित कर दिया गया हो। जब तक खाने-पचाने के लिये बजट में पर्याप्त प्रावधान न हो, समस्या को नज़रअंदाज़ करने में ही देश और समाज का हित है। एक तरफ समस्या के परिमाण को दिनोदिन बढ़ाते जाइये, दूसरी तरफ ऐसा इलाज खोजने में शक्ति-संसाधन व्यय कीजिये जो कारगर न हो सके।

बाढ़-सूखा, आँधी-तूफान तो प्राकृतिक आपदायें हैं। पर इनका समाधान तो मनुष्य के द्वारा ही किया जा सकता है। भारत की समृद्ध जलवायु इस बात आश्वासन तो देती ही है कि यदि सूखा नहीं पड़ा तो इस वर्ष बाढ़ अवश्यम्भावी है। ऐसे में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन विभाग को ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। सूखा और बाढ़ राहत पैकेज का डाटा तो कम्प्यूटर में फीड है। जनसँख्या के हिसाब से डाटाबेस खुद ही फण्ड का आँकलन कर देता है। बस प्रिंट कमांड देना है और वित्तीय प्रावधान निकल आयेगा। पर इस प्रकार की आपदा से पीड़ित लोग अमूमन आम आदमी होते हैं। जिन्हें ये तक नहीं मालूम होता कि वो खबरों की सुर्खियाँ बन चुके हैं। टाइम्स के फ्रंट पेज पर उनकी फोटो छपी है और सरकार ने उनकी पुनर्स्थापना के लिये लाखों की राशि संस्तुति कर रखी है।

कुछ शासन निर्मित समस्यायें भी हुआ करतीं हैं। अक्सर इनके साथ वोट चिपका होता है। फलां जाति-सम्प्रदाय के लोग पुअरेस्ट ऑफ़ पुअर की श्रेणी में आते हैं। इसलिए उन्हें मुफ्त रोटी, कपडा और मकान मिलना चाहिये। उन्हें शिक्षा भी मिलनी चाहिये। कोई ये बताये की यदि किसी को जीवन के लिए आवश्यक चीजें बिना परिश्रम के मिल जाये तो वो काम ही क्यों करे और पढाई तो करने का सवाल ही नहीं उठता। ये बात अलग है कि इन लोगों के नाम पर जो राशि स्वीकृत हुयी, उसे उन्हीं के कुछ बंधु -बांधव, नेता-मंत्री-संतरी मिल-बाँट के चट कर गये। ऐसी ही कुछ सर्वदेशीय समस्यायें हैं बिजली-पानी-सड़क। ये अगर लोगों को मिल गया तो लोग ज़्यादा समृद्ध हो जायेंगे। समृद्ध हो जायेंगे तो टी वी देखेंगे। पढ़-लिख भी लेंगे। देश-दुनिया देख कर ही तो आज़ादी के दीवानों को लगा कि हम गुलाम हैं और गुलामों की कोई आवाज़ नहीं होती। ज्ञान मिल गया तो सोचने भी लगेंगे भला हमारा देश दूसरे फिसड्डी देशों से पीछे कैसे। सरकार में कमी है तो सरकार बदल दो। और सत्ता गयी तो वर्षों का पाला-पोसा सिस्टम भी बदल जायेगा। और सिस्टम बदल गया तो कौन भला हमारी और हमारे पेट की सोचेगा। आज़ाद लोग सिस्टम के काम नहीं आते बल्कि वो सिस्टम से काम लेने लगते हैं, जवाबदेही तय करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में फख्र से अर्जित नौकरी, असली नौकरगिरी में बदल जाती है। जब मुखिया ही खुद को नौकर नंबर वन मानता हो तो ऐसी स्थिति में परमानेंट-गवर्नमेंट-सर्वेंट नौकरी का भला क्या लुत्फ़ ले पायेगा। तुर्रा ये कि किसी भी समय कोई पीछे पड़ गया तो आय से अधिक संपत्ति लोकपाल हड़प लेगा। भ्रष्ट आचरण ने जिन सुख-सुविधाओं की आदत डाल दी है, वो सीमित आय की तनख्वाह से कैसे पूरी होगी. भ्रष्टाचार बिना जीना भी कोई जीना होगा। ऐसे में एक ही शेर जेहन में कौंधता है - 

गुज़र तो जाएगी तेरे बग़र भी लेकिन 
बहुत उदास बहुत बेकरार गुज़रेगी...


- वाणभट्ट

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

लोकतंत्र में विचारधारा का महत्त्व

लेखक क्या है विचारों के बिना। अलबत्ता मुझे ये गलतफहमी कभी नहीं रही कि मै लेखक हूँ। पर गाहे-बगाहे कुछ इष्ट-मित्र मेरी पोस्टों पर अपनी टिप्पणियाँ दे कर मुझे अनुग्रहित करते रहते हैं। मै सदैव उनका हृदय से कृतज्ञ रहता हूँ और रहूँगा भी। ये बात अलग है कि मै बिना पढ़े उनके ब्लॉग पर 'वाह-वाह क्या बात है' टाइप की टिप्पणीयाँ नहीं करता। इसलिये चार सालों में मेरी टीआरपी (फॉलोवर लिस्ट) अभी तक बमुश्किल 57 ही पहुँची है। अन्य दिग्गज ब्लॉगरों की तीन-चार सौ से ऊपर की फॉलोइंग देख के रश्क होना स्वाभाविक है। कई गुरुघंटालों को साधने की कोशिश भी की कि गुरु ये बताओ टीआरपी  बढ़ाने  के लिए तुमने कौन सी जुगत लगायी। तो गुरु लोग संजीदा हो जाते हैं, कहते हैं, अपनी लेखनी में जादू लाओ, लोग खुद-बखुद तुम्हारे फॉलोअर बन जायेंगे। हाल ही में टॉप 300 पठनीय हिन्दी ब्लॉगरों की लिस्ट का कहीं से आविर्भाव हुआ है। एक स्वनाम धन्य ब्लॉगर महोदय ने लड़-भिड़ के अपना नाम इस फेहरिस्त में घुसेड़वा भी लिया है। लिखा-पढ़ी करके कुछ ब्लॉग के महारथियों से सिफारिश से बंदा लिस्ट को शुभ अंक 301 करवा भी लेता। किन्तु ऐसा करने से मेरे महान गुरु बाणभट्ट, खुदा उन्हें जन्नत बख्शे, की आत्मा को असीम कष्ट होता। जिस गुरु ने अपने जीते जी राजाओं-महाराजाओं के ज़माने में चाटुकारिता का साथ देने से इंकार कर दिया हो, उसका ये कलयुगी चेला वाणभट्ट सिर्फ टीआरपी के लिए इतना गिर जाये, ये शर्म की बात है। आजकल तो बेशर्मी हद के पार हो गयी है और भाई लोगों ने तो मुहावरा ही गढ़ डाला कि जिसने की शरम, उसके फूटे करम। तो भाइयों और बहनों, अपनी फूटी किस्मत को लेकर अपने महान गुरु का नाम ख़राब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। एकलव्य टाइप का चेला हूँ। गुरु की स्वतः प्रेरणा से आज मै कुछ ऐसा लिखने पर आमादा हूँ, जिसे इस बार 5-10 से कुछ ज्यादा टिप्पणियाँ मिल जायें। 2-4 लोग टीआरपी में जुड़ जायें। गुरु मुझ पर ऐसे ही कृपा बनाये रक्खें। इससे ज्यादा वाणभट्ट को और क्या आकांक्षा रखनी चाहिये। इस आशय से मैंने सामायिक विषय भारत के लोकतंत्र में चल रही महाभारत को मुद्दा बनाने का फैसला लिया है।

चौसर बिछ चुकी है। हर दल अपने-अपने शकुनियों के भरोसे चालें चल रहा है। पूरी की पूरी महाभारत करा देने वाले मामाश्री रणभूमि से विरक्त ही रहे। बहन के पूरे कुनबे का नाश पीटने के बाद मामा का उह-लोक गमन किस प्रकार हुआ, इस बारे में मेरा ज्ञान सीमित है। ये तो निश्चित है कि मामा जी ने कुरुक्षेत्र में युद्ध करते हुए अपने प्राण नहीं गंवायें होंगे। और कुरुक्षेत्र के मैदान में कोई शकुनि नाम का प्राणी यदि सहदेव के हाथों मारा भी गया होगा तो शकुनि का बॉडी डबल रहा होगा। इतना इंटेलिजेंट मामा युद्ध में जाने की बेवकूफ़ी नहीं करेगा। महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जो हर देश-काल में फिट बैठता है। और हमारे देश का चुनाव किसी महायुद्ध से कम है क्या? एक तरफ़ सत्ता पक्ष का गठबंधन है तो दूसरी तरफ विपक्ष गुटबाजी में लगा है। परन्तु आज के इस युद्ध में ये कहना मुश्किल है कि पांडव कौन है और कौरव कौन। दोनों पक्षों में दुर्योधन भी हैं और दुश्शासन भी। कुछ पितामह हैं। कुछ आचार्य हैं। हर दल में धृतराष्ट्र भी हैं और गांधारी भी। जितने पात्रों की महर्षि वेद व्यास ने उस समय मात्र कल्पना की होगी आज साक्षात् भारत की पावन धरा पर अवतरित हो चुके हैं। और 2014 के इस महासंग्राम में अपनी-अपनी ताल ठोंक रहे हैं। दरअसल ताल होती ही ऐसी जगह है, जहाँ कोई दूसरा ठोंक नहीं सकता। जिसे कोई दूसरा ठोंक सके वो शरीर में ताल के ठीक विपरीत स्थापित है। बस एक विचार आ गया तो सोचा इसे भी चटका दिया जाये।

बात विचार से शुरू हुयी थी। लोकतंत्र में विचारों का महत्त्व। जब किसी एक के विचार को नासमझ लोगों की पूरी की पूरी फ़ौज सिर्फ़ इसलिये मानने लग जाये कि नेता जी की जी-हज़ूरी में ही अपनी भलाई है तो यही विचार, विचार-धारा में तब्दील हो जाते हैं। विचार भी उन्हीं के मानने योग्य माने जाते हैं जिनके पास पद-धन-बल की ताकत है। ये बात कोई नहीं पूछता कि ये ताकत आपने किस प्रकार अर्जित की है। अगर आपको लगता है कि आपके विचारों और जेब में दम है, तो हमारा जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, आपको इजाज़त देता है कि आप अपनी एक पार्टी बना लें। खुद को उसका सीईओ नियुक्त कर लें। भूखे-बेरोजगार और दारुबाजों की निरंतर बढती जनसंख्या किसी भी उदीयमान नेता को निराश नहीं करती। और नेता का खून तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने इर्द-गिर्द छाये चापलूसों के नारों से ही बढ़ता है। उसे छुहारा-बादाम-मिश्री खाने की ज़रूरत नहीं है। एक बार आप नेता बन गये तो विचार आपके पेटेंट हो जाते हैं। इस देश में हर वो शख्स महान हो सकता है जो भोले-भाले लोगों को सपने बेच सके। पूरा का पूरा फ़िल्म उद्योग इस बात का जीता-जागता सबूत है। जिन्हें एक वख्त की  रोटी नसीब नहीं होती वही लोग सल्लू मियाँ की दबंग को हिट करा देते हैं। फ़िल्म या टीवी  देख के कोई कह सकता है कि भारत में हर जगह गरीब और गरीबी ही दिखायी देती है। सत्ता पक्ष के लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते। वो हर साल लाखों लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर कर देते हैं। ये रेखा कुछ वैसी ही रेखा लगती है जैसे हाई जम्प में रॉड लगायी जाती है। अगर नहीं डांक पाये तो उसे नीचे कर लो। जितने गरीब रेखा के ऊपर जा रहे हैं, उससे दुगनी संख्या में नये गरीब पैदा हो रहे हैं। पहले हर घर में साईकिल बड़ी चीज़ हुआ करती थी। आज झोंपड़-पट्टे में भी मोटरसाइकिल और टीवी आम हो गये हैं। गाँव-गाँव, गली-गली में लोगों को हिंदी सिनेमा ने कपड़े पहनने के तौर-तरीक़े सिखा दिये हैं। ब्यूटी पार्लर का चलन अब शहरों-कस्बों तक ही सीमित नहीं रह गया है। पहले के गरीब सिर्फ़ दो वक्त की रोटी की आस रखता था। अब की गरीबी मानसिक है। अगर आपके पास साईकिल है तो मोटरसाइकिल के ख्वाब आपको सोने नहीं देंगे, और मारुती है तो हौंडा सिटी के। तनख्वाहें बढ़ीं हैं पर लोगों के सपने भी बेलगाम हुये हैं। लोग खाने से ज्यादा दिखाने में लगे हुये हैं। जिस तरह लोगों का क्रेज़ मोबाइल जैसे गैजेट्स पर होना शुरू हुआ है, लगता है लोग बिना खाने के तो जी सकते हैं पर बिना बतियाये नहीं। और नेता लोगों का काम ही क्या है, बुझे-मुरझाये लोगों में आशा का संचार करना। जैसे अच्छे स्वाद पर सबका हक़ है वैसे ही देश की अमीरी पर भी सबका हक़ होना चाहिये। और वो भी बिना शर्त, बिना मेहनत मिलना चाहिये। गरीबों का मसीहा बनने के लिये अमीरों को गाली दीजिये और धीरे-धीरे अमीरों की  लिस्ट में शामिल हो जाइये। नेताओं की संख्या और उनकी चल-अचल संपत्ति में जितनी वृद्धि गत वर्षों में हुयी है वो कल्पनातीत है। 300-400 परसेंट का ग्रोथ उद्योग और उद्यम के किसी क्षेत्र में शायद ही मिला हो। पर नेतागिरी में ये आम है। गरीबी हटाते-हटाते ये कब अमीर हो गए इन्हें ख़ुद पता नहीं चला। अगर नूरजहाँ आज होतीं तो कश्मीर के लिये कश्मीर जाने की  कोई ज़रूरत नहीं थी। कश्मीर खुद दिल्ली आ जाता। और मोहतरमा कहतीं कि धरती पर अगर नेताओं के लिये स्वर्ग है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है।

और कोई हर-हर, घर-घर पहुँचा हो या न पहुँचा हो पर इसमें शक़ नहीं कि टीवी की आज वही स्थिति है जिसकी इस देश का हर नेता कामना करता था। क्या गाँव क्या कस्बे। क्या गली क्या कूचे। टीवी के साइज़ और दाम में अंतर हो सकता है पर अब इस माया का वास घर-घर पहुँच गया है। रही-सही कसर चैनेलों ने कर दी है। देश-दुनिया में क्या हो रहा है और हमारे यहाँ क्या हो सकता है, इस पर देश का बच्चा-बच्चा बोल सकता है। इस तकनीक ने देश में सूचना क्रांति ला दी। अब बच्चा पड़ोस के चचा यानि अंकल, जो एक सर्वमान्य-सर्वव्याप्त शब्द हो गया है, की शक्ल भले न पहचान पाये न पहचान पाये पर मलिंगा और क्रिस गेल को ज़रूर पहचानता होगा। इस क्रांति का श्रेय सत्ता पक्ष लेने में जुटा रहता है पर मुझे ये तरक्की उपभोक्ता वाद की प्रतीक लगती है। आपने सिर्फ़ दरवाज़ा खोला और बाहर का बाज़ार आपके घर में घुस गया। आज अगर कोई देसी तकनीक गलती से मिल भी जाये तो लोगों को उस पर भरोसा नहीं होता। लेकिन अगर कटरीना या करीना किसी विदेशी उत्पाद को एंडोर्स कर दें तो गाँव में भी उस वस्तु का मार्केट तैयार हो जाता है। भारतेन्दु जी होते तो ज़रूर कहते कि घर की तो बस मूंछें ही मूंछें हैं। इस तकनीक के सहारे हमारे और आपके घरों में पैठ गया एक ऐसा कल्चर जिससे अभी तक हम वंचित थे। अब हमें ये मालूम है कि हमारे पास क्या-क्या नहीं है और उसके लिए कितने पैसे चाहिये। मौज़ूदा आमदनी के स्रोतों से तो उतना धन अर्जित करने में कई जनम लगेंगे पर हमारी लालसा सब इसी जनम में पाने की है। भले ही झूठ बोलना पड़े या किसी का गला काटना पड़े। चाहतों का अम्बार है और उसे पूरा करने के लिये क़र्ज़ की व्यवस्था भी सहज उपलब्ध है। और जो ये तुरत-फुरत चाहता है उसके लिये नेतागिरी या किसी स्थापित नेता की चमचागिरी ही एक मात्र विधान है। 

टीवी के जरिये हर बार चुनावी दंगल और भी दिलचस्प हो जाता है। पहले जिन नेताओं को देखने-सुनने को लोग घंटों ग्राउंड पर इंतज़ार करते थे, वो आज आपके साथ डिनर कर रहे हैं। टटपुंजिया से टटपुंजिया नेता कुछ ऐसा बोल देगा कि न्यूज़ चैनेलों को मसाला मिल जायेगा। फिर आप भला कैसे उन्हें पहचानने से इंकार कर सकते हैं। नेता तो नेता, उनके परिवार के मेम्बरान और यहाँ तक कि उनकी गाय, भैंस और कुत्तों का भी साक्षात्कार ले लिया जाता है। उनकी लाइक्स और डिस्लाइक्स का भी ख्याल रखा जाता है। नेता जी को जब गाय का दूध निकालते दिखाया जाता है तो आम आदमी को लगता है कि ये नेता हमारे बीच का है। ये बात तो बाद में पता चलती है कि नेता जी पहले ही अमरुद हो गये थे और सेटिंग के चलते ही मिडिया में छाये रहते हैं। वर्ना हर ऐरा-गैरा नेता मीडिया में आने के लिये इरादतन और गैरइरादतन उट-पटांग बकने से बाज नहीं आता। चुनावी समर में हर नेता से रु-ब-रु होने का मौका मिल रहा है। पार्टी लाइन से हट कर सबके विचार और विचार-धाराओं से अवगत होने का ये सुनहरा मौका है। हर पार्टी अपने को दूसरे से बेहतर बताने में जुटी हुयी है। हर प्रत्याशी जिताऊ या नॉन-जिताऊ कैटेगरी में रक्खा जा रहा है।  हर आदमी एक वोट में बदल गया है। चैनेलों के ओपिनियन पोल मुकाबले को और भी दिलचस्प बना रहे हैं। महान नेता जो पार्टी के मुखिया के विरुद्ध मूक बने रहते थे, विरोधी पार्टी का पश्रय पा कर मुखर हो रहे हैं। जिसे टिकट नहीं मिला उसने बगावत कर दी। जो पहले एक पार्टी की विचारधाराओं का पोषण करता था, अब दूसरी पार्टी की नीतियों का गुणगान कर रहा है। चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने से उपजे असंतोष और इस असंतोष से उपजी पार्टी छोड़ के दूसरे दलों की ओर पलायन की प्रवृत्ति, ये सिद्ध करती है कि नेताओं में किसी पार्टी या पार्टी के विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का सर्वथा अभाव है।

फिर मेरा ध्यान गया सभी पार्टियों की मूल विचारधारा पर। सभी पार्टियाँ देश में सुशासन की बात कर रहीं हैं। सभी सांप्रदायिक एकता के लिये कृतसंकल्प हैं। सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ हैं। सभी सर्वशिक्षा और सर्वसशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। सड़क और बिजली और पानी और स्वास्थ्य सब देना चाहते हैं सबको। सबके रोजगार और आमदनी की गारेंटी सब नेता ले रहे हैं। सब विदेशी धन भारत वापस लाना चाहते हैं। सबका ध्यान गरीब, कामगार और किसानों पर है। ये तबका ही सबसे बड़ा वोटर है। इसलिये हर किसी के पास इनके लिये योजनाओं का भण्डार है। अफ़सोस होता है जब जमीन के मालिक किसान को भी गरीब की श्रेणी में रख दिया जाता है। ये बात अलग है कि उसी के खून-पसीने से पूरे देश का पेट भर रहा रहा है। और अगर वो कार कंपनियों की तरह फिक्सड और वर्किंग कैपिटल का आँकलन कर अपना मुनाफ़ा भी जोड़ दे तो महँगी विदेशी कारों में घूमने वाले बड़े-बड़े धन्ना सेठों को रोटी के लाले पड़ जायें। किसी कवि ने कहा था कि सिर्फ दिमाग से खाने-कमाने वाले मेहनतकश से चढ़ कर बोलें, ऐसी व्यवस्था बदल जानी चाहिये। परन्तु सत्ता में आने के बाद सब औद्यौगीकरण और व्यापार के द्वारा पूंजीवाद का राग अलापते नज़र आते हैं। रोटी-कपडा-मकान जैसी मूलभूत समस्यायें हर चुनाव का मुद्दा बन जातीं  हैं और चुनाव के बाद यही समस्यायें गौण हो जातीं  हैं। जो नेता चुनावी मौसम में गरीबों के हमदर्द बने फिरते थे, सत्ता में आ कर उनके लिए योजनायें बनाते हैं और फिर कहते हैं कि जनता तक बस 10 फीसदी रकम ही पहुँच पाती है क्योंकि भ्रष्टाचार है। अगर हमें वोट दोगे तो देश से भ्रष्टाचार अलविदा कह देगा। सभी पिछड़ों को आगे लाना चाहते हैं और अगड़ों को पीछे ले जाना चाहते हैं। ताकि सामाजिक न्याय हो सके। भगवान ने जब सृष्टि बनाई तो हर प्राणी को कुछ गुण दिये ताकि वो जीवन-यापन कर सकें। किसी को ताकत दी तो किसी को भागने की क्षमता। पर भाई लोग ये सिद्ध करने में लगे हैं स्त्री-पुरुष, ज्ञानी-अज्ञानी, निर्धन-धनी सब बराबर हैं। अगर बराबर नहीं हैं तो हम एक ऐसी व्यवस्था प्रतिपादित करेंगे जो सबको बराबर कर देगी। इनका बस चले तो इस व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर लागू कर दें। अमेरिका से कहें कि 70% हमारे आदमियों को ढोना आपकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। आपको अमीर होने का अधिकार तब तक नहीं मिल जाता जब तक धरती पर गरीबी और लाचारी है। सभी अपनी-अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए राज्यों के विभाजन के पक्ष में हैं। सम्भवतः मूल भावना ये हो कि बड़े राज्य में नेता ज्यादा हो जाते हैं और कम्पटीशन बढ़ जाता है। राज्य छोटे होंगे तो हमारे लग्गू-भग्गू भी कमेटियों के चेयरमैन बन जायेंगे। बड़ी सेवा की है उन्होंने पार्टी और नेता की। पूरी बात का लब्बोलाबाब ये है कि हर कोई देश की प्रगति चाहता है और भारत के हर आदमी को खुशहाल देखना चाहता है। तो फिर प्रश्न ये उठता है कि हमारी विचारधारा आपकी विचारधारा से अलग कैसे।

इतिहास गवाह है कि पक्ष और विपक्ष संसद में इन्हीं सब मुद्दों पर एक नहीं हो पाते। भाई जब सब एक ही चीज़ चाहते हो तो कैसी दिक्कत है। ये महाभारत समझ के परे है कि दोनों एक ही बात कर रहे हैं पर विचार अलग हैं। पुरानी महाभारत में एक लेना चाहता था तो दूसरा देने से इंकार करता था। विचारों का भेद रणक्षेत्र में बदल गया। महाभारत हो गयी। पर वो उन्नीस दिन में समाप्त भी हो गयी। बुराई पर अच्छाई की विजय हर कहानी का सुखद अंत है। पर ये कैसी लड़ाई है जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक पक्ष जब सत्ता में आये तो वो 100 डैम बनवा दे। हर रोज़ 10 किमी सड़क बनवा दे। साल में 50 भ्रष्टाचारियों को ही नाप दे। विपक्ष कहे कि जब हम सत्ता में आयेंगे तो इसका दूना करके दिखायेंगे। साझा सहयोग से देश प्रगति के पथ पर बढ़ जायेगा। पर यहाँ तो होड़ लगी है एक-दूसरे को नीचा दिखाने की। सब दूसरे को चोर और नाकारा साबित करने में लगे हैं। सांप्रदायिक ताकतें देश के लिये खतरा बन जायेंगी, ये अभी-अभी पता चला है। सांप्रदायिक लोग गंगाजल ले कर असाम्प्रदायिक होने की बात कर रहे हैं, तो तथाकथित गैरसंप्रदायिक ये सिद्ध करने में लगे हैं कि ये दिखावा है। नेता, ये पब्लिक है सब जानती है, जैसे नारे दे कर जनता को बेवकूफ़ बनाते रहे हैं। और जनता की बेवकूफ़ियों का हर इलेक्शन में इम्तहान होता है। कम से कम एक चीज़ तो सभी चुनावों ने सिद्ध की है कि हम इस इम्तहान में अव्वल नम्बर से पास होते आये हैं। वर्ना ईमानदार और कर्मठ नेता चुनाव हार जाये और नाकारा गुंडा-डकैत जाति-संप्रदाय के नाम पर विजयी हो जाये, ऐसा हो सकता है क्या। साड़ी-पैसा-दारु बाँटने वाले वोट खरीदते आये हैं। घुटे नेताओं के चिकने-चुपड़े चेहरे के पीछे का सत्य टीवी चैनेलों के आने से जनता के सामने है। पर क्या वोट देते समय हम उम्मीदवार की योग्यता को पैमाना मान पाते हैं या उसकी खोखली बातों में उलझ के रह जाते हैं। सदन में बैठ कर क्या विपक्ष सिर्फ विरोध करेगा। रचनात्मक विपक्ष का स्वप्न फिलहाल तो पूरा होता दिख नहीं रहा है। जो पार्टियाँ एक-दूसरे के खिलाफ़ घिनौनेपन की हद तक इल्ज़ाम लगा रही हैं क्या वो किसी भी मुद्दे पर सियासत से बाज आयेंगी इसमें मुझे शक़ है। इलेक्शन कमीशन एक विश्वास ज़रूर दिलाता है कि चुनाव दिन प्रति दिन निष्पक्ष होते जा रहे हैं। अब जनता की बारी है कि वो देश के प्रति अपनी वफ़ादारी सिद्ध करे। कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को ही रोक दे। एक बार जो संसद चुन दी जाये वो कम से कम पाँच साल देश चलाये। मुद्दे वही पुराने हैं रोटी-कपडा-मकान, बिजली-पानी-सड़क। हर साल देश के कुछ हिस्से ही सही प्रगति कर जायें। बड़ी-बड़ी योजनाओं ने छोटे-छोटे सरकारी मुलाजिमों को इतनी ताक़त दे दी कि वो जनता की नौकरी करने के बजाय उनके राजा बन बैठे। सेवा के बदले मेवा लेने के आदी हो गये। पूंजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद की तरह ये भी एक विचारधारा है, भारतवाद। हमें सिर्फ ख़ुद को और अपने देश को देखना है। जहाँ तक मेरा ज्ञान है, लोक माने स्थान होता है, तो लोकतंत्र का मतलब हुआ सिस्टम ऑफ़ लैंड, जो अब तक भ्रष्टाचार जैसी असाध्य बीमारी से ग्रसित रहा है। इसे लोगतंत्र या जनतंत्र में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। इंटरनेट और टीवी के युग में जनता के पास सूचना की कमी नहीं है, बस ज़रूरत है तो दृढ इच्छाशक्ति की। ये तो मै बस एक विचार दे रहा हूँ, इसे धारा बनाना जनता का काम है।

पर मुझे अफ़सोस है कि ये महान ब्लॉग सिर्फ मेरे चाहने वाले चंद पाठकों तक ही पहुँच पायेगा। मेरा इतना लम्बा सारगर्भित प्रलाप सुधी जनता तक पहुँचाना अब उन लोगों का पुनीत कर्तव्य है को ब्लॉगिंग की विधा में तन-मन से समर्पित हैं, धन तो अभी तक यहाँ दिखा नहीं है। गुरु जी लोगों से विनम्र निवेदन है कि 300 लोगों की लिस्ट में से मेरे लिये किसी को हटाइये नहीं, बस एक नाम और जोड़ लीजिये और इस लिस्ट को तब तक बढ़ाते जाइये जब तक इस प्रकार के बेगैरत लोग डिमांड करते रहें। अपने चारित्रिक पतन के लिये मै गुरु बाणभट्ट जी से क्षमा चाहता हूँ। पर गुरु जी ये बताइये कि इतना दिल और दिमाग झोंक देने के बाद सिर्फ 4-5 पाँच टिप्पणियाँ मिलें और फॉलोअर लिस्ट में इज़ाफ़ा न हो तो आपका ये कलयुगी चेला क्या करे। इसलिये मेरी बात को दिल पर कतई न लीजियेगा। हिंदुस्तान का चुनाव तो चलता रहेगा। हर पाँच साल के बाद फिर आयेगा। पर गुरु जी आपसे निवेदन है कि अपने इस तुच्छ चेले की लेखनी को जाग्रत बनाये रखिये। टीआरपी बढे या न बढ़े। टिप्पणियाँ मिलें या न मिलें। बंदा अपना ज्ञान ब्लॉगिंग की इस फ्री सेवा के माध्यम से झाड़ता रहे और सिद्ध पुरुषों से इसी प्रकार ज्ञान अर्जित करता रहे।  

- वाणभट्ट    

बुधवार, 19 मार्च 2014

मि. एक्स इन इलाहाबाद

अपने शहर इलाहाबाद में काफी अंतराल के बाद मुझे कुछ दिन वहाँ रुकने का सौभाग्य मिला। इसी शहर में मै पला और बढ़ा। सन अट्ठासी से मेरा शहर लगभग छूट गया। फिर भी साल में दो-चार चक्कर तो लग ही जाते। पर लम्बा रुकना सम्भव ना हो सका था। बार- बार आने से ये तो था कि मोहल्ले के चाचाओं-चाचियों और भतीजे-भतीजियों ने पहचानना नहीं छोड़ा था। सब भले नाम से न जानते हों पर ये ज़रूर जानते थे कि यही वर्मा जी के सुपुत्र हैं, ये बात अलग है कि असलियत तो सिर्फ पिता जी ही जानते होंगे। जवानी में जो बेटा माँ-बाप की आँखों का तारा हुआ करता है, वही प्राय: बुढ़ापा आते-आते मोतियाबिंदु में तब्दील हो जाता है। हर वृद्ध को दूसरे के बेटा-बहू बहुत सुशील नज़र आने लगते हैं। लायक या नालायक होने का सर्टिफिकेट तो माँ-बाप की आत्मा में छिपा रहता है। पर वो ये राज़ किसी से शेयर नहीं करते और कोई इस राज़ को कभी जान भी नहीं पाता। 

चिपको आन्दोलन में किसी ने वृक्षों को इतना कस के पकड़ा होता तो निश्चय ही पेड़ की छाल के अक्स उसके शरीर पर उभर आते। लड़की ने लडके को इस कदर अपनी बाँहों में भींच रक्खा था। ऐसा लग रहा था कि जरा पकड़ ढीली हुयी तो लड़का बाइक समेत उसे छोड़ के कहीं भाग ना जाये। चिपकने में अड़चन निगोड़ी हेलमेट मोटरसाइकिल के हैंडल की शोभा बढ़ा रहा था। जिस स्पीड पर वो चल रहे थे, उस पर लड़की का भाई तो सर फोड़ सकता था किन्तु एक्सीडेंट से सर फूटने की कतई गुंजाईश नहीं थी। बाइक की स्पीड जितनी सम्भव थी उतनी कम थी, सड़क के उस सुनसान क्षेत्र में। भाई भी भाईचारा तभी दिखा पाता जब वो उन्हें पहचान पाता। लडके ने मुँह रुमाल के तिकोने से ढँक रक्खा था और लड़की की तो सिर्फ आँखे ही दिख रही थीं। सर और शक्ल दोनों दुपट्टे से ढँके हुए थे। दुपट्टे का ऐसा मल्टीपरपज़ यूज़ तो इसके इज़ादकर्ता ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। 

जब से १८ सेकेण्ड से ज्यादा किसी को देखना घूरने जैसे जघन्य अपराध की श्रेणी में आ गया है, मै अपनी श्रीमती जी को भी घर के बाहर कपड़ों से ही पहचानना पसंद करता हूँ। वैसे मै केजरीवाल जी से इस कानून को तोड़ने के लिये आह्वाहन करूँगा। भाई ये नियम बहुत गलत है। लड़कों के लिये ये सिद्ध कर पाना अत्यंत कठिन है कि कोई लड़की उसे घूर रही थी। जबकि हर लड़की ये मान के चलती है कि हर वक्त कोई न कोई उसे घूरने पर आमादा है। ये बात अलग है कि वे घर से बिना ढंग से ड्रेसअप और मेकअप किये बाहर नहीं निकलतीं। अगर किसी की ये हार्दिक इच्छा है कि कोई उसे न देखे तो फिर इस ड्रेसिंग सेन्स की कौन तारीफ़ करेगा। मै तो अपनी टूटी चप्पल और फटी बनियान के साथ एट लीस्ट मोहल्ले में तो बिना संकोच घूम ही लेता हूँ। इस अति-स्त्रीवादी कानून की जितनी भी मुख़ालफ़त हो कम ही है। लड़कियाँ तो ये मानती हैं कि लड़कों में घूरने लायक कोई चीज़ है ही नहीं, भले ही हृतिक रोशन सामने बैठा हो। ये बात अलग है कि वो मोहल्ले के हर लुच्चे-लफंगे को भली-भाँति पहचानतीं हैं। और शरीफ़ पढ़ाकू टाइप के लड़कों (जो १८ सेकेण्ड से कम घूरता हो) को मग्घू की श्रेणी में रखतीं हैं। इस कानून को तोड़ने के लिये, मै केजरीवाल साहब के साथ जेल भरो आंदोलन तक में भाग लेने को भी तैयार हूँ। सभी स्त्री-पुरुषों से जो भी इस कानून के खिलाफ़ हों, उनका भी मै आह्वाहन करता हूँ। मुझे पूरी उम्मीद ही नहीं विश्वास है जिस देश में गे संस्कृति के संरक्षण के लिए इतने मुखर स्वर उठे हैं, वहाँ मेरी इस विचारधारा से सहमत लोगों की कमी न होगी। 

मेरी धर्मपत्नी निकट के पार्क केशव वाटिका में अक्सर टहलने निकल जातीं थीं। इस अतिवादी कानून के तहत मै उन्हें उनके घर से निकलते समय पहने कपड़ों के द्वारा पहचान लिया करता था। एक बार तो हद ही हो गयी। वो जब निकलीं तो मैंने उन्हें नया सूट पहन के निकलते नहीं देखा। तय था कि वाटिका में उन्हें पहचान नहीं पाया। अब देवी जी बुरा मान गयीं कि मेरे नये सूट की तुमने तारीफ़ नहीं की। जब मैंने बताया कि मै पराये धन और परायी नारी की ओर नहीं देखता तो उन्हें और बुरा लग गया। बोलीं ये नया सूट सिर्फ़ तुम्हारे देखने के लिये थोड़ी न सिलवाया है। एक जुमला और जड़ दिया कि सब मर्द एक से होते हैं, अपनी बीवी को छोड़ दूसरों की बीवियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। मैंने बताया कि देवी एक ऐसा कानून है जो हमें घूरने से रोकता है। अगर कोई १८ सेकेण्ड में पहचान आ गया तो भाभी जी या बहन जी नमस्ते कर के निकल लेता हूँ। पर पत्नी जी को मेरी बात पर भरोसा नहीं हुआ। लेकिन मेरे मन में एक शक़ ज़रूर घुस गया कि इन्होने बिना घूरे मुझे कैसे पहचान लिया।

मोहल्ले भर का अंकल बन जाने के बाद अपने और पराये बच्चों में ज़्यादा फ़र्क नहीं लगता। ज़माना बदल गया है। हम भी इस तरह के चिपकू युगलों को देखने के अभ्यस्त हो चले हैं। पर मोहल्ले में इस तरह घूमते इस चिपकू युगल पर थोड़ी देर के लिये ध्यान चला ही गया। अनजाने में १८ नहीं तो १५ सेकेण्ड तो घूर ही लिया होगा। पर क्या ख़ाक पहचान पाता, शक्लें तो नक़ाब से आच्छादित थीं। हाँ, मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट पर यूनिक तरीक़े से लिखे "ॐ साईं राम" को देख ये अंदाज़ लग गया कि हो न हो ये दो मकान छोड़ के रहने वाले शर्मा जी की ही गाड़ी है। कुछ देर बाद मैंने मुड़ के देखा तो मेन रोड आने से पहले कोने के हनुमान मन्दिर के सामने दोनों चलती मोटरसाइकिल पर हनुमान जी के समक्ष श्रद्धावनत प्रतीत हुये। मेरा मन भी इन बच्चों में व्याप्त संस्कार की गहरी जड़ों को देख कर श्रद्धा से झुक गया। वो चाहते तो खुले आम घूम सकते थे। मुँह खोल के चिपके हुये घूम कर वे मुझे शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे। समाज ने कितनी भी उन्नति कर ली हो किन्तु लाज-शर्म भी कोई चीज़ है। बड़े-बूढ़ों का लिहाज़ और भगवान के प्रति आस्था यही तो संस्कार हैं। 

ऐसा नहीं है कि हमारे ज़माने में प्यार नहीं होता था। लेकिन छुप-छिपा के नहीं। चेहरा ढँकने का रिवाज़ नहीं था। अगर किसी ने किसी को सेट कर लिया तो पूरा कालेज जान जाता था। यहाँ तक कि प्रोफेसर भी। लड़की को लडके के दोस्तों से वैसा ही सम्मान मिलता था जैसे भाभी को। और सारे प्रतिद्वन्दी बेवजह मामा टाइप की कैटेगरी में शामिल हो जाते। प्रेम के जग जाहिर हो जाने के कारण युगल पर एक दूसरे का साथ निभाने के लिये सामाजिक दबाव भी पड़ता था। पर इस घटना ने मुझे ये सोचने पर विवश कर दिया कि जिन बच्चों को मंदिर दिखाई दे सकता है, उन्हें मै क्यों नहीं दिखायी दिया। पहली बार एक अस्तित्वविहीनता का एहसास मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर छा गया। लगा जैसे मै उस बियाबान सड़क पर कहीं एक्सिस्ट ही नहीं करता। बच्चों ने मेरे अस्तित्व को सिरे से नकार दिया था। मुझे कन्फ्यूज़न सा होने लगा कि योग-साधना से, सम्भव है मुझमें अदृश्य होने की कोई दैवी शक्ति आ गयी है।

मै आगे बढ़ा तो सामने से एक चाचा जी चले आ रहे थे। मैंने उन्हें हाथ जोड़ के प्रणाम किया। कंधे पर सब्जी का झोला लटकाये वो अपनी ही धुन में थे। सम्भव है बुज़ुर्गवार ने मुझे न पहचाना हो। अगर रुक कर पूरा परिचय देता तो शायद पहचान भी लेते। पर नमस्ते का जवाब तो बनता ही था। सड़क के दूसरे छोर से एक भतीजे ने प्रवेश किया। अब मुझे उम्मीद जगी कि अपने शहर में मुझे कोई जानने वाला जरुर पहचान लेगा। पर ये क्या भतीजा तो कान में हेड फोन लगाये और आखें आई पॉड पर गड़ाये चला आ रहा था। अब मेरा सब्र जवाब दे रहा था मैंने हौले से आवाज़ लगायी, रवि। उसने मेरी ओर निगाह ज़रुर की पर ऐसा लगा जैसे वो मेरे आर-पार देख रहा हो, सी-थ्रू। मेरा अदृश्यता का कॉन्सेप्ट कन्फर्म होता लग रहा था। एक्टिवा पर सवार एक भतीजी ने भी उसी समय एंट्री मारी। खाली सड़क पर मुझे न देख पाना असम्भव था। किन्तु मुझे देख कर भी न उसके चेहरे की भाव-भंगिमा में कोई परिवर्तन आया, न ही एक्टिवा की स्पीड में। ऐज़ यूज़ुअल उसके कानों से भी तार लटक रहे थे। आँखों पर चढ़े सनग्लास आपको ये इम्युनिटी दे देते हैं कि आप जिसे चाहें उसे देखें जिसे चाहें उसे न देखें। अब मुझे मज़रूह साहब वाला दर्द कुछ-कुछ समझ आ रहा था। 

गलियाँ हैं अपने देस की,
फिर भी हैं जैसे अजनबी, 
किसको कहे कोई, अपना यहाँ। 

लेकिन एक बात की ख़ुशी भी थी कि अपने ही मोहल्ले में मै अजनबी की तरह घूम सकता हूँ। मुझे न तो कोई देख सकता है न पहचान। कम से कम जान पहचान वाले तो बिलकुल नहीं। हर किसी के जीवन में ये कल्पना ज़रूर होती है कि यदि मै अदृश्य हो जाऊँ तो क्या-क्या करूँगा। इस विषय पर कई इंग्लिश और हिंदी फ़िल्में बन चुकीं हैं। इस खुशफ़हमी को पाले मै मोहल्ले के मेन चौराहे तक आ गया। यहाँ अब पूरा मार्किट सा बन गया था। जब मैंने इलाहाबाद छोड़ा था, तब यहाँ सन्नाटा हुआ करता तब से अब तक मोहल्ले की चल-अचल जनसँख्या में भी वृद्धि हुयी है और ये चौराहा तो पूरा बिज़नेस सेंटर में बदल चुका है। मुझे उम्मीद थी कि यदि चचा, भतीजे और भतीजी सुनसान गली में मेरे अस्तित्व को नकार सकते हैं, तो इस चहल-पहल वाले इलाके में कोई मुझे क्या देख पायेगा।

अदृश्यता का हर कोई लाभ उठाना चाहता है। मैंने एक बंद पड़ी दुकान के सामने अपनी फेवरेट ब्रांड भूरी लम्बी चान्सलर सुलगा ली। तभी ऐसा लगा कि उसका धुआँ मेरे शरीर पर चिपक गया है। सब्जी वाले चाचा छंटाक भर जीरा लेने के लिये पंसारी की दुकान पर खड़े थे और मेरी ओर घूर रहे थे। उनकी दृष्टि ये कूट-कूट के कह रही थी कि वर्मा जी ने अपने लड़के को यही संस्कार दिए हैं कि बड़े-बूढ़ों के सामने धुएँ के छल्ले निकाले। मुंह लपेटे मोटरसाइकिल वाले भतीजे-भतीजी भी आते दिखे। बिना अपनी आइडेंटिटी डिस्क्लोज़ किये, उन्होंने उसी श्रद्धा से प्रणाम किया जैसे कुछ देर पूर्व हनुमान जी को करते दिखे थे। एक्टिवा वाली भतीजी भी उतने ही वेग से वापस आती दिखाई दी उसने नमस्ते तो नहीं की पर एक्टिवा की स्पीड पर एकाएक ब्रेक लग गया। पलट कर देखा ये वही अंकल हैं जो शरीफ़ से दिखते थे। 

मुझे लगा मि. इंडिया का अनिल कपूर अब लाल लाइट में सभी को दिखायी दे रहा है या मि. एक्स इन बॉम्बे के किशोर कुमार पर अदृश्य होने वाली दवाई का असर ख़त्म होने लगा है।

- वाणभट्ट

जागृत निन्द्रा

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डाय...