गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सफलता की गाथा

सफलता की गाथा  

आजकल मीडिया में समाचार को सेंसेशनल तरीके से पेश करने का चलन ना-काबिल-ए-बर्दाश्त की हद तक पहुँच गया है। पर जैसी की एक अंग्रेजी उक्ति है 'बेगर्स आर नॉट चूज़र्स'। न्यूज़ और टी वी देखना हमारी विशुद्ध पर्सनल बीमारी या मज़बूरी, जो भी कह लें, है। किसी डॉक्टर ने तो कहा नहीं है कि देश-दुनिया का हाल अगर आप नहीं जानेंगे तो फलां रोग लग जायेगा। ना ही किसी वैद्य ने बताया कि चैनल सर्फ नहीं करोगे तो वायु-पित्त-कफ में से एक या तीनों टाइप के विकार होने की सम्भावना है। ये वन वे ट्रेफिक है। तो भाई चैनल जो भी दिखाए, देखना ही पड़ता है। चैनेल्स की प्रतिस्पर्धात्मक मजबूरियां इतनी ज्यादा हैं कि हर चैनेल अपने समाचार को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में जुटा हुआ है। और जो लोग सास-बहु, घर-उजाड़, हंसाते-भूत, सच्ची-कथाएँ टाइप के सोप ऑपेराओं का आनंद लेने में असक्षम हैं उनके लिए तो न्यूज़ चैनेल की सर्फिंग के अलावा कोई काम बचता ही नहीं। इन चैनलों पर भी न्यूज़ कम और इश्तहार ज्यादा। पर इसी को तो मज़बूरी कहा जाता है। जैसे उडि जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवै। टी वी के सामने बैठ कर मै सलमा सुल्तान के ज़माने को याद करते हुए दूर-दर्शन न्यूज़ और आजकल के सनसनी खेज़ समाचारों का तुलनात्मक विश्लेषण कर ही था कि एक चैनेल पर सनसनी टाइप के पत्रकार ने न्यूज़ फ्लैश की "प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाये "।

प्याज़ के बढ़ते दामों से तो पूरा देश चिंतित है। जनता परेशान तो सरकारें भी परेशान। पहले भी ऐसा होता रहा है। जब-जब प्याज़ के दाम बढ़े सरकारों की नींदें हराम हो गयीं। ये तो एक ऐसी कमोडिटी बन चुका है जो सरकार बना भी सकता है और गिरा भी। प्याज़ की राखी बन रही है, संता -बंता के चुटकुले बन रहे हैं, दहेज़ और गिफ्ट में भी प्याज़ का ज़िक्र।सोशल साइट्स पर भी ये मुद्दा छाया हुआ है। प्याज़ और प्याज़ के दाम के लिए इतनी चिल्ल-पों को देख कर लगता है जैसे ये कोई जीवन- दायनी आधारभूत खाद्य सामग्री हो। अगर ये न हो तो आदमी भूखा मर सकता है। हिंदुस्तान के कई धर्मों-सम्प्रदायों में प्याज़-लहसुन का प्रयोग निषिद्ध है। इसे तामसी प्रवृत्ति का माना गया है। पर मनुष्य ही क्या जो प्रवृत्तियों का दास न हो। नहीं तो महात्मा नहीं बन जायेगा वो। इनके खाने वाले इनके गुण गिनाते नहीं थकेंगे। पर यही बात काजू-बादाम-अखरोट पर भी लागू होती है। बहुत फायदे हैं इनके। पर हम अपनी-अपनी औकात और जेब अनुसार इन शुष्क फलों का आनंद लेते हैं या नहीं लेते हैं। लेकिन इनके बिना कोई भूखा नहीं रहता। कोई हाहाकार भी नहीं मचता। फ्री में मिल जाये तो चबैने सा चबा लें और खरीद के खाना हो तो एक-एक काजू का लुफ्त उठाएं। ये मामला पूरी तरह आर्थिक है जिसके पास पैसा हो उसकी तो रोटी भी चुपड़ी होती है। जिसके पास नहीं है वो दाल के पानी में रोटी भिगो के खाए या नमक के साथ, ये उसका अपना ऑप्शन है। तो निवेदन ये है की भाई हैसियत नहीं है तो प्याज़ क्यों खानी। प्याज़ के बिना क्या नहीं रहा जा सकता। स्वाद की बात है तो जब प्याज़ सस्ता हो जाये तब साल भर की सारी तमन्ना निकाल लीजिये।पर आजकल ऐसी आग लगी है गोया प्याज़, प्याज़ न हो कर पानी हो गया हो। जिसके बिना सारा जग सूना-सूना लग रहा हो। रहीम दास जी आज होते तो बहुत संभव है कि लिख देते -

रहिमन प्याज़ राखिये बिन प्याज़ सब सून, 
फोटो चेपिये फेसबुक पर, खाते दोनों जून।  
वह-वाह, वह-वाह (अपनी दाद खुद ही देनी पड़ती है आजकल। लोगों के पास व्यस्त जीवन में ब्लॉग पढ़ने और समझने का समय ही कहाँ होता।)

चूँकि ये सिर्फ और सिर्फ स्वाद का मामला है तो बहुत संभव है कि ये हाहाकार समृद्ध लोगों ने ही मचा रक्खी हो। क्योंकि कि आम-आदमी तो रुखी-सूखी खाय के साफ़ पानी को भी तरस रहा है। ठन्डे की तो बात ही क्या करनी, उसका मतलब तो कोका-कोला होता है। लहसुन-प्याज़ के बारे में वो हो सोच सकता है जिसने दो जून के आटे-दाल-चावल-तेल-केरासिन का जुगाड़ कर लिया हो। जमाखोरी भी तो अमीरों की ही देन है। सीधा डिमांड-सप्लाई का नियम है। डिमांड बढ़ाने के लिए सप्लाई कम कर दो। फिर मुंह माँगा दाम वसूलो। ये बात सिर्फ प्याज़ पर नहीं भारत में हर चीज़ पर लागू हो सकती है और होती रही है। बचपन में मुझे याद है जब जाड़ा आता था तो बोरोलीन या तो मिलती नहीं थी या मिलती थी तो प्रिंट मूल्य से दो रुपये ज्यादा में। अमीरी ऐसे ही तो आती है। बिजनेस और राजनीति में एथिक्स का सर्वथा अभाव रहा है। एक तरफ इनका गठबंधन किल्लत बनाता है और दूसरी तरफ जनता से ज्यादा पैसा वसूल लिया जाता है। चाहे वो चीनी रही हो या गैस, दाल रही हो या गेहूं, आलू रहा हो या प्याज़। इस मामले में हमारे व्यापारी बहुत ही स्मार्ट रहे हैं और सारा सरकारी अमला तो मात्र इन्हें सपोर्ट करने के लिए ही बना है। जमाखोरी इनके सहयोग के बिना नामुमकिन है। बिजनेस और सत्ता दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  

यदि प्याज़ कोई मूलभूत सामग्रियों (एस्सेन्शिअल कमॉडीटी) में शुमार हो तो ये हाय-तौबा समझ आती है। प्याज के बिन कौन भूखा मरा जा रहा है। हमारे यहाँ जनसँख्या विस्फोट ने एक वृहद् रूप ले लिया है। सबको सिर्फ और सिर्फ अपनी पड़ी है, देश का होना न होना गौण हो गया है। इसलिए हम हर उस काम को करने को तत्पर रहते हैं जिससे हमें थोडा भी फायदा होने वाला हो। लाइन में लग कर मूवी का टिकट लेना भी हमें गवारा नहीं। सरकार द्वारा प्रदत्त सब्सिडाइज्ड गैस से अपनी कार चलाना हमारे स्मार्ट होने की निशानी है। पैदा होने से लेकर मरने तक हमें कितनी ही सरकारी सुविधाओं के लिए उन लोगों को घूस देना पड़ता है जिनकी नियुक्ति ही जनता को सेवा देने के लिए हुयी है। और वो भी भीख नहीं, अधिकार की तरह। यहाँ तो बिना घूस के न जन्म मिलता है न मृत्यु। राजा का कर्तव्य अगर सेवा करना हो, और वो ये मानता भी हो, तो शायद उससे बड़ा नौकर खोजना मुश्किल है। पर सरकारी अमले तो बनाये ही इसलिए गए हैं कि वो जनता जनार्दन पर राज कर सकें। अगर हम सब, पूरा देश, घूस देने से मना कर दें तो कितने ही विभाग हमारे घर आयेंगे कहेंगे भैया सुविधाएं ले लो। लाइसेंस बनवालो, टैक्स दे दो, रजिस्ट्री करवा लो, मकान खरीद लो नहीं तो हमारा टारगेट नहीं मीट होगा। पर अभी तो सबको अपनी-अपनी पड़ी है। तो फिर किसी और को दोष क्यों देना। जिसे मौका मिलेगा हमारा खून चूसेगा। अरे भाई जिस चीज़ की जमाखोरी शुरू हो, जिस चीज़ का दाम अनियंत्रित-असामान्य रूप बढ़ना शुरू हो जाये उसका परित्याग शुरू कर दो। जमाखोर खुद ही घबरा जायेगा। लेकिन हम तो स्टेटस के चक्कर में पड़े हैं। अगर अभी प्याज़ नहीं खाया तो लोग क्या कहेंगे। मंहगाई के दौर में भी अगर कुछ दिखावा न कर पाए तो जनाब लानत है हमारी रईसी को।

बात की बात में विषयांतर हो गया। बात थी किसान के द्वारा प्याज़ जमाखोरी से लाखों कमाए जाने की। रिपोर्टर ने जिस तरह बताया उससे लगा इस कानून के पालन करने वालों के महान देश में किसान ने कोई भयंकर अपराध कर दिया हो। जिस देश में आदर्श  बच्चों के लिए हैं और उसूल दूसरों को प्रवचन देने के लिए, वहां किसान पर ऐसा आरोप सुन कर मै स्तंभित रह गया। मुझे ध्यान आया की एक नामी ब्रेड कंपनी ने अपनी ब्रेड को लोकप्रिय बनाने के लिए मैदे में स्किम्ड मिल्क पाउडर की मिक्सिंग करवा दी। ब्रेड इतनी स्वदिष्ट थी कि मक्खन लगाये बिना आप खा सकते थे। शीघ्र की बाकि छोटी कम्पनियाँ बंद हो गयीं। एक बहुराष्ट्रीय कोल्ड ड्रिंक कंपनी ने अपना मार्केट बनाने के लिए दूसरी देसी कंपनी की खाली बोतलें ही खरीद डालीं और उन्हें तुडवा डाला। १२ रुपये किलो का गेहूं जब आटा बन कर २५ रुपये में बिकता है तो कोई हाय-तौबा नहीं मचती। जबकि अधिकांश मुनाफा तो बिचौलिए और प्रसंस्करणकर्ता ही ले जाते हैं। ज़मीन-बीज-खाद-पानी-मेहनत सब किसान की और मुनाफा बिजनेसमैन का। उत्पादन से पहले बीज, खाद, कीटनाशक सब के सब बिलियन डॉलर इंडस्ट्री बन गये हैं। और उत्पादन के बाद फ़ूड प्रोसेस्सिंग इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है। पर लकवे-पाले-बीमारी का जोखिम किसान के सर पर। तिस पर बेचने के लिए मंडियों के चक्कर। कोई किसान को ही बिजनेस क्यों नहीं सिखाता। उत्पादन की पूरी लागत, ज़मीन का किराया, सभी फिक्स्ड और वैरियेबल कॉस्ट, पूरे परिवार की दिन-रात की मेहनत का मोल जोड़ कर किसान अपनी उपज की कीमत तय कर सकता है। जैसा कार, साबुन, तेल, कंघी, कपडा, आटा, कंप्यूटर, मोबाईल, सीमेंट, चॉकलेट, नूडल इत्यादि-इत्यादि कम्पनियाँ करतीं हैं। जिस आदमी को गप्प मारने के लिए एक पैसे प्रति सेकेण्ड की टॉक वैल्यू सस्ती लगती है, उसी आदमी को एक रोटी का दस रुपये देना खलता है। पूरा देश आजकल फ़ूड सिक्योरिटी की बात कर रहा है। किसके भरोसे? किसान के भरोसे देश को खाद्य सुरक्षा का भरोसा दिलाया जा रहा है। पर किसान सुरक्षा की कोई बात नहीं कर रहा है। इस विषय पर हम संवेदनहीनता की हद तक लापरवाह हो गए हैं। किसान को भी उन सभी तकनीकी सुख-सुविधाओं का लाभ लेने का हक है जिनका लाभ शहरी भाई उठाने की आदी हो गए हैं। पर इनके लिए चाहिए पैसा। जो किसान के पास अक्सर नहीं होता। वहीँ खाद्य सामग्री के भण्डारण और प्रसंस्करण से जुड़े उद्योग फल-फूल रहे हैं। भण्डारण और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का मूल उद्देश्य ही है कृषि उपज का मूल्य सम्वर्धन। कृषि उत्पादन से उत्पाद के उपभोग तक की सारी श्रंखला में सबसे फायदे का सौदा भण्डारण और प्रसंस्करण ही है। जैसा कि हम सुनते आये हैं कि अंग्रेज कच्चा माल भारत से ले जाकर उसे संवर्धित कर पूरी दुनिया में व्यापार किया करते थे। आज भी तो यही हो रहा है। अगर भारत गाँवों में बसता है तो अंग्रेजों का काम हमारे अपने भाई कर रहे हैं। कम मूल्य का कच्चा माल गाँवों से लेकर उसे मनमाने मुनाफे के साथ वापस जनता को बेचना। जब ये काम उद्योगपति करें तो ये व्यापार और जब कभी किसान इस क्षेत्र में हाथ आजमाए तो जमाखोर। ये तो वही बात हुई कि आपका प्यार प्यार और हमारा प्यार चक्कर।

आजकल हर जगह सक्सेस स्टोरी का ज़माना है। खास तौर पर कृषि के क्षेत्र में। रोज नयी-नयी किसानों के लिए ऐसी लाभप्रद तकनीकें आ रही हैं जिनसे कृषि का मुनाफा बढाया जा रहा है। समर्थन मूल्य से किसानों को जो लाभ हो रहा है वो अभूतपूर्व है। सच भी है। शायद पहले कृषि इतनी विकसित नहीं थी। किसानों का मुनाफा बढ़ा ज़रूर है पर उनके शहरी काउंटर पार्ट की तुलना में बहुत कम। पर सक्सेस स्टोरीज़ की संख्या को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे सारा पैसा खेती में ही फटा पड़ रहा है। रोज-रोज कृषि क्षेत्र के लोग नयी-नयी सफलता की गाथा निकाले जा रहे हैं कि उनकी उन्नत तकनीक किसानों के लिए कितनी लाभदायी है। एक भाई साहब ने अख़बार में छपवाया की तरबूजे की खेती से किसान ने १६००० रुपये पैदा किये। फोटो में भरी गर्मी में सूटधारी इन अफसर साहबान को सिर्फ अंगौछा लपेटे किसान एक तरबूजा दे रहा है। एक भाई ने बताया की पुदीने की खेती अगर किसान करे तो १.५ लाख तक प्रति हेक्टेयर उत्पन्न कर सकता है बशर्ते की वो पुदीने का तेल निकल के बेचे तब। एक भाई मूंग की खेती से दो महीने में ६०००० रुपये पैदा कर लेने का दावा करते हैं। वर्तमान उत्पादन, उत्पादकता और न्यूनतम समर्थन मूल्य को देखते हुए ये गणना कुछ ज्यादा प्रतीत होती है। अगर ये सफलता की कहानी है तो शहर के इंटर फेल बाबुओं की तनख्वाहें भी किसी सफलता से कम नहीं हैं। ये काम न करने की तो तनख्वाह लेते हैं और करने की घूस। किसी भी सूरत में इनकी मासिक आमदनी किसान की वार्षिक मेहनतकश कमाई से ज्यादा है। किसानों के उत्थान के लिए ये बंधुगण जितना पैसा अपनी देश-विदेश की यात्राओं में खर्च करते हैं, ये भी एक सक्सेस स्टोरी बन सकती है। सरकारी फण्ड को बेरहमी से सिर्फ अपने प्रमोशन के लिए कन्जूम करने में इन योजनाकर्ताओं का सानी खोजना कठिन है। सरकार ने जितने भी मदों में किसानों के लिए पैसे भेजे हैं, सब के सब एक सक्सेस स्टोरी बन गए हैं। नहीं तो ग्रांट भी रुकेगी और पदोन्नति भी। आफ्टर आल सबको अपनी-अपनी पड़ी है। 

आज का युग अर्थ युग है। पैसा ही धर्म है और पैसा ही रिश्ते और समाज। कोई ये नहीं पूछ रहा की पैसा कहाँ से आ रहा है और कैसे आ रहा है। चाहो तो गुटका बेच कर करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर लो या अफीम बेच कर। घूस से कमाओ या ज़मीर बेच कर। पैसे की अपनी भाषा है।ऐसे में किसान से देश के लिए चैरिटी की उम्मीद का कोई मतलब नहीं है। कृषि क्षेत्र में सक्सेस स्टोरीज़ का जिस तरह से प्रचलन बढ़ा है उसे देख के लगता है विज्ञानं के अन्य क्षेत्र ढक्कन हो गए हैं। सबसे ज्यादा मुनाफा कृषि में ही हो रहा है। ये बात अलग है कि हम किसी भी किसान आज उद्योगपति के रूप में नहीं जानते। ऐसे में ये खबर कि प्याज़ की जमाखोरी से किसान ने लाखों कमाए ये मेरे विचार से एक वास्तविक सक्सेस स्टोरी है। गौर कीजिये लाखों। देश के सबसे बड़े उद्योग कृषि,  जो सौ करोड़ को खाना दे सकता है और रोज़गार भी, को हमने अपाहिज सा बना रक्खा है। सरकार के सहयोग से रेंगने वाला उद्यम। जबकि उसी से सम्बद्ध बीज-खाद-केमिकल्स-प्रसंस्करण उद्योग बन गए। यदि भारत का किसान फसल उत्पादन के साथ-साथ भण्डारण और प्रसंस्करण का कार्य करने लगेगा, कृषि भी एक संपूर्ण उद्योग का रूप ले लेगी। अभी कृषक के उत्पादन का मूल्य सरकार नियत करती है। जबकि अन्य किसी उद्योग में ऐसा नियंत्रण नहीं है। फिक्स्ड, वैरिएबल और विज्ञापन को जोड़ कर मुनाफा तय किया जाता है और कम्पनियाँ ही अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारण करतीं हैं। यहाँ तक की तेंदुलकर और कैटरिना कैफ का पैसा भी ग्राहकों से वसूला जाता है। जिस दिन भारतीय कृषक के हाथ में भण्डारण और प्रसंस्करण की जादुई छड़ी आ जाएगी उस दिन उसकी ही नहीं पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दशा और देश की दिशा दोनों बदल जाएगी। खाद्य सुरक्षा को कृषक सुरक्षा से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। खेती की सफलता गाथाएं जब अम्बानीज़, टाटाज़, बिरलाज़ के साथ बिजनेस टुडे, फ़ोर्ब्स इंडिया, इकनोमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैण्डर्ड में स्थान पाएंगी तभी कृषि को एक उद्योग का दर्ज़ा मिल पायेगा। संपन्न किसान ही समृद्ध भारत नीवँ है। 

हे ब्रम्हा! हे विष्णु! हे महेश! वाणभट्ट आप सबका आह्वाहन करता है। ये मनोकामना पूरी कीजिये। सवा रुपये का प्रसाद…  

तीनो देव एक साथ बोल उठे "वत्स यहाँ भी…घूस…सुधर जाओ"  

- वाणभट्ट  

बुधवार, 11 सितंबर 2013

रेंड़ के पेंड़

सावन के अंधे को हर तरफ़ हरा ही हरा दिखाई देता है। ये कहावत आजकल चरितार्थ हुयी दिख रही है। सावन ख़त्म हुए कई दिन हो गये हैं, पर हरियाली का सर्वत्र वास है। घर के सामने बने गंगा बैराज के मैदान में पूरा का पूरा एक नेचुरल रेन फ़ॉरेस्ट ही तैयार हो गया है। वैसे तो यहाँ से मोहल्ले में पीने के पानी की आपूर्ति की जाती है। पर जब से वर्ल्ड बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ खींच लिया है, तब से जल विभाग के लिये इस प्रांगण की रख-रखाव कर पाना भी संभव नहीं रह गया है। भरी आबादी के बीचों बीच जंगल का होना, सोशल फोरेस्ट्री का एक नायब नमूना है। निगम के महानुभावों ने शायद इस सन्दर्भ में सोचा नहीं होगा, नहीं तो एक सक्सेस स्टोरी तो छाप ही लेते। वो बेचारे तो बस बजट को हिल्ले लगाने की फ़िराक़ में लगे रहते हैं। उनकी इस प्रक्रिया में किसी का भला हो जाये तो हो जाये। 

छापाखाना के निर्वचनीय सुख का आनंद वो ही अनुभव कर सकता है, जो काम करता कम है और छापता ज्यादा। दरअसल इस मामले में निगम का नजरिया कतई वैज्ञानिक नहीं है। और उनके यहाँ प्रमोशन में छापने का कोई नम्बर भी नहीं है। थोड़ा प्रचार-प्रसार कर दें, तो ये एक आइडियल मॉडल बन सकता है। हर मोहल्ले में एक मैदान खाली छोड़ दीजिये. उसमें सारे पेड़-पौधे, खर-पतवार जो भी निकल आये, उगने दीजिये। दो-चार साल में एक फ़ॉरेस्ट तैयार हो जायेगा। देश में फ़ॉरेस्ट का रकबा भी बढ़ जायेगा। वो भी बिना कुछ किये। हर्र भी नहीं, फिटकरी भी नहीं, और रंग चोखा। शहरवासियों को शुद्ध हवा के लिये ज़्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ेगी। खुले परिवेश में दिशा-मैदान जाने और सॉलिड वेस्ट के निस्तारण में जो सुविधा होगी, वो एडिशनल बेनिफ़िट है।  

हाँ, तो आजकल हर तरफ हरियाली ही हरियाली है। ग्रह-दशा अनुरूप इधर लखनऊ के चक्कर बढ़ गये हैं। कानपुर सेंट्रल से लेकर चारबाग़ तक हर जगह पूरी प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़े हुये है। ऐसी ताबड़तोड़ हरियाली पर अब तक ध्यान देने का अवसर नहीं मिला था। ना-ना प्रकार की वनस्पतियों ने जैसे धरा का अधिग्रहण कर लिया हो। एक-एक चप्पे, एक-एक कोने पर प्रकृति की छटा, रोम-रोम को मस्त कर देती है। भाँति-भाँति के खर-पतवार अपने पूरे शबाब पर हैं। सभी खर-पतवारों में सबसे खूबसूरत और आकर्षित करने वाले कोई पेंड़ हैं, तो वो हैं, रेंड़ के पेंड़। गर्व से उन्मत्त इसके लहलहाते-झूमते बड़े-बड़े पत्ते बरबस आपको आकृष्ट कर लेंगे, बशर्ते आप इनकी ओर नज़र डाल सकें। इन्हें देख कर जीवन की अदम्य इच्छाशक्ति परिलक्षित होती है। ये स्लम डॉग टाइप के पौधे हैं, जिनके जीने-मरने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पर ये इनकी जिजीविषा है कि बिना किसी पालन-पोषण के ये न सिर्फ़ पैदा होते हैं, बल्कि फलते-फूलते भी हैं। इनके बीजों का डिसपर्शअन भी इतना सुव्यवस्थित है कि कानपुर से लखनऊ के बीच रेंड से वंचित स्थान खोजना कदाचित ही संभव हो।    

इस तरह की अनचाही हरियाली को विशेषज्ञों ने वीड्स यानि खर-पतवार की संज्ञा दे रक्खी है। मान ना मान मै तेरा मेहमान। एक तरफ़ पूरा विश्व अपनी और अपने पशुओं की खाद्य समस्या से जूझ रहा है। उपजाऊ ज़मीन का रकबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष घटता जा रहा है। और ये अवांछित वीड्स धरती पर ऐसे फैलते हैं जैसे कभी साहिर साहब ने फ़रमाया था :


चीन-ओ-अरब हमारा, हिन्दोस्तान हमारा 
रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा

इनका बस चले तो कोई भी फ़सल पनप ही न सके। कृषि का अधिकतम श्रम इन खर-पतवारों को नियंत्रित करने में लग जाता है। खाद और पानी मिल जाये तो ये मुख्य फसल के ऊपर हावी होने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इनकी जिजीविषा और परजीवी प्रवृत्ति इतनी सशक्त है कि ये फसलों का पोषण सोख लेते हैं। खेतों में इनका नियंत्रण एक वृहद् समस्या बन गया है। रक्तबीज की तरह ये फैलते हैं और भस्मासुर की तरह सब नष्ट करने को आतुर रहते हैं। एक तरफ जहाँ फ़सलों का उत्पादन बढ़ाने के लिये अरबों-खरबों ख़र्च किये जा रहे हैं, वहाँ वीड्स का अनियंत्रित स्वतः विकास और प्रसार, सारे फसल सुधार शोध को चुनौती देते हुये प्रतीत होते हैं। अधिक उत्पादन वाली उन्नत प्रजातियों पर कितने संसाधन ख़र्च कर दिये गये और यह राशि दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। पर वीड्स का उत्पादन, उत्पादकता और क्षेत्रफल, बिना किसी शोध के दिन पर दिन उन्नत होता चला जा रहा है। एक तरफ ज्ञानियों - विज्ञानियों का विश्वव्यापी समूह और दूसरी तरफ निपट अनपढ़, गंवार, जंगली और जाहिल वीड्स। संभवत: इसे ही कहते हैं सेल्फ़ इम्प्रूवमेंट या स्वतः सुधार। और सेल्फ़ इम्प्रूवमेंट सदैव बाहर से थोपे सुधार से अधिक प्रभावी और शक्तिशाली होता है। वीड्स इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। 

एक फसल सुधारक मित्र का ध्यान मैंने इस ओर आकृष्ट करना चाहा। यार तुम लोग इतने रिसोर्सेज वैरायटी डेवलपमेंट में लगा देते हो और ये वीड्स देखो दिन पर दिन अपने आप इम्प्रूव हुये जा रहे हैं, बिना संसाधन के। भाई साहब संजीदा हो गये। बोले - सदियों से प्रकृति में अच्छे-बुरे की जंग चल रही है। हम उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने में लगे हैं। संसाधन कम हैं और ये खर-पतवार मुख्य फ़सलों का पोषण ले लेते हैं। ये ना तो पशुओं के काम आते हैं, ना आदमी के। अच्छाई और बुराई की होड़ में अक्सर बुराई आगे निकल जाती है। बुराई को अगर छूट दे दो तो वो भलाई पर हावी हो जाती है। खर-पतवार अनचाहे उग आते हैं जबकि फ़सल को रोपना पड़ता है, संरक्षित और संवर्धित करना पड़ता है। तब जा कर हम आदमी और पशुओं का भरण-पोषण कर पाते हैं। उनकी बात में दम था और दर्द भी। उनकी बातें वनस्पति जगत के लिये ही नहीं प्राणी जगत के लिये भी सत्य जान पड़ीं। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिपेक्ष्य में ये व्यवस्था मानव जाति के लिये तो शत-प्रतिशत सही लगी। हर युग में द्वैत रहा है। बुराई के बिना अच्छाई की कद्र भी तो नहीं है।    

पर मै ये लेख तो रेंड़ के पेंड़ के फेवर में लिख रहा हूँ। आदमी जब हरियाली के क्षेत्र को दिन पर दिन कम करता जा रहा है। जंगल कटते जा रहे हैं। ग्रीन कवर घटता जा रहा है। आदमी और जानवरों की संख्या पृथ्वी पर बढ़ती ही जा रही है। सबको अपनी-अपनी ही पड़ी है। तो प्रकृति बेचारी क्या करे। हरियाली भी ज़रूरी है, पर्यावरण संरक्षण के लिये। आदमी हो या जानवर, सब प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में लगे हैं। ये प्रकृति का सेल्फ-डिफेन्स मैकेनिज्म है कि ऐसे पेड़-पौधे पैदा करो जिसे कोई छू भी न सके। कुछ तो हवा बदलेगी। कुछ तो वातावरण साफ़ होगा। 

गर्व से लहलहाते, हरे-भरे और खूबसूरत  रेंड़ के पेंड़ों के प्रति मेरे मन में अनायास एक आभार का भाव तैर गया। मन में एक भाव ये भी आया की काश गेंहूँ और धान भी वीड्स की तरह बिना संसाधन के सर्वत्र फ़ैल जाते, फूलते-फलते तो खाद्यान्न समस्या कम हो जाती, और शायद आदमी की भूख भी।  


अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला 
जिस दिये में जान होगी वो दिया रह जायेगा 
(मेरा नहीं है, बस यूँ ही चेप दिया) 



सोशल फॉरेस्ट्री का नायाब नमूना


रेंड़ के पेंड़

- वाणभट्ट

सोमवार, 2 सितंबर 2013

सूखे फूल

रोज सुबह शुक्ल जी के मिलने का स्थान और समय नियत है। केशव वाटिका में जहाँ 'फूल तोडना सख्त मना है' का बोर्ड लगा है वहीं प्रातः शुक्ल जी पूर्ण तन्मयता के साथ फूल तोड़ते मिल जायेंगे। कहीं कोई और फूल तोड़ न ले जाये इसलिये उन के लिये अलसुबह बाकि पुष्प प्रेमियों के आने से पहले वाटिका पहुँचना नितांत आवश्यक है। जब तक मै  पहुँचता हूँ उनकी दोनों जेबें फुल हो चुकी होतीं हैं। वाटिका के चौकीदारों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया पर सठियाने का भी कोई लाभ होता है तो वो ये है कि आप को कोई कुछ समझा नहीं सकता। सफ़ेद बालों और उम्र का लिहाज़ अभी भी बुजुर्गों को हमारे देश में नियम-कानून से ऊपर रखता है। फूल तोडना कौन सा जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। और वाटिका के चौकीदार भी कौन से पुलिस वाले थे। और होते भी तो क्या कुछ ले-दे के मान न जाते। पर अगर ले-दे के ही शुक्ल जी को फूल हासिल करने होते तो मोहल्ले में कई मालिनें ये काम कर रहीं हैं। सिर्फ ३०-४० रुपये में महीने भर फूलों की आपूर्ति।

शुक्ल जी सरीखे अन्य लोग भी देर-सबेर वाटिका पहुँच ही जाते और फूल तोड़ने की प्रक्रिया में यथाशक्ति अपना-अपना योगदान देने में कोई कोर-कसर ना छोड़ते। इस कारण वाटिका सिर्फ़ नाम की वाटिका रह गयी थी।खिले हुये फूलों को देखना तो केवल इन पुष्प तोड़कों और उनकी जेबों के नसीब तक ही सीमित रह गया है। मैंने भी कई बार अपनी मित्रता का हवाला देते हुये शुक्ल जी से निवेदन किया कि प्रभु इतने सारे फूल भी इतनी खुशबु नहीं दे पाते जितनी एक अगरबत्ती दे देती है। पर उनका कहना था कि भगवान को बासी सुगंध कैसे अर्पित की जा सकती है और वो भी तब जब वाटिका में फूल सहज उपलब्ध हैं।

आजकल मिडिल क्लास तबके में एक बयार आई है।  सब अपने एमआईजी मकानों की एक इंच जगह भी खाली नहीं छोड़ते। पूरा का पूरा मकान पक्की फर्श से ढँक जाता है। कुछ तो पूरी जमीन के ऊपर पूरी छत भी तान देते हैं।पूरे घर में मार्बल की फ्लोरिंग करने के बाद गेट तक कलेजी लगाने का प्रचलन बढ़ गया है। कच्ची ज़मीन रखने से मार्बल के गन्दा होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है। हाँ, इस प्रजाति के लोगों में कुछ पर्यावरण प्रेमी भी हैं। वो सड़क के फुटपाथ को घेर कर बगीचा टाइप की चीज़ बना लेते हैं। कुछ वृक्षारोपण कर अपने को प्रकृति और सौदर्य प्रेमी की संज्ञा देने से नहीं चूकते। सरकार के बस का तो फुटपाथ मेंटेन करना है नहीं, लिहाज़ा इस काम को समाज सेवा का दर्ज़ा भी दिया जा सकता है। ये बात अलग है की सडकों का पानी नालियों तक न पहुँच पाये तो जलभराव की स्थिति बन जाती है। और तारकोल से बनी सड़कें पानी का रुकना बर्दाश्त नहीं कर पातीं, इसलिये दस साल की जगह दो साल में ही जवाब दे देतीं हैं।

शुक्ल जी ने भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर एक लघु वाटिका बना ली थी। पर उन्हें शिकायत थी कि वो इतनी मेहनत से पौधे लगाते हैं, उनकी देख-भाल करते पर जब फूलों का मौसम आता तो ज़ालिम ज़माने वाले एक फूल भी उनके लिए नहीं छोड़ते। दुखी हो कर उन्होंने बिना फूलों वाले पेड़-पौधे लगा लिये और अब फूलों के लिये उनको केशव वाटिका पर निर्भर रहना पड़ता। जब आप किसी भी आदमी के गलत से गलत कृत्यों के जेनेसिस में जायें तो लगता है, वो आदमी जो भी कर रहा है, वह शत-प्रतिशत सही है। किसी की बहन की कोई नाक काट ले तो उसका रावण बन जाना संभव है। किसी के बाप को राज-पाठ सिर्फ इसलिये ना मिले कि वो नेत्रहीन है, तो उसे दुर्योधन होने का पूरा अधिकार है। चूँकि शुक्ल जी मेरे मित्र हैं और मै उनकी पुष्प-व्यथा से वाकिफ़ भी हूँ इसलिये उनके फूल तोड़ने को ले कर मै ज्यादा क्रिटिकल नहीं हूँ, यद्यपि मै फूलों को शाखाओं पर देखना ही अधिक पसंद करता हूँ।  

उस शाम शुक्ल जी अपनी स्कूटी पर एक भारी-भरकम पौलीथीन बैग लिये कहीं जा रहे थे जब मै उनसे टकराया। हेलमेट पहन रक्खी थी उन्होंने जिससे ये जाहिर था कि वो कहीं सुदूर क्षेत्र के भ्रमण के इरादे से निकले हैं। टोकना तो हिंदुस्तानी हितैषियों का परम कर्तव्य है, सो मैंने पूछ ही लिए "बन्धु कहाँ प्रस्थान का विचार है"। "आ जाओ वर्मा जी तुम्हें गंगा जी तक घुमा लायें" ऐसा कह कर उन्होंने स्कूटी रोक ली। मै तो सैर करने के इरादे से निकला ही था इसलिये इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ पलों में मै उनके पीछे वाली सीट पर विद्यमान था और लगभग एक घंटे की यात्रा कर के जाजमऊ पुल के ऊपर। रास्ते में शुक्ल जी ने बताया की घर में बहुत सूखे फूल इकट्ठे हो गये थे चूँकि भगवान को चढ़ाये फूल हैं इसलिये उन्हें इधर-उधर तो फेंक नहीं सकते। इसलिए यहाँ तक आना हुआ इसी बहाने गंगा मैया के दर्शन भी हो जायेंगे। एक पंथ दो काज। 

गंगा पुल पर शाम की सोंधी हवा के आनंद में मै खो सा गया था, जब छपाक की आवाज़ हुई। लगा किसी ने बोरे में भर के लाश को फेंक दिया हो पानी में। मैंने चौंक के नीचे देखा तो शुक्ल जी के द्वारा लाया बैग पानी में डूबता-उतराता बहा जा रहा था। बगल में शुक्ल जी असीम श्रद्धा भाव से हाथ जोड़े गंगा मैया को प्रणाम कर रहे थे। 

लौटते समय रास्ते भर मेरा कुछ भी बोलने का मन नहीं हुआ। बहुत थकान लग रही थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सम्बन्धी की शव-यात्रा में कन्धा दे कर लौट रहा हूँ।   

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम 
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे   

- वाणभट्ट            

शनिवार, 10 अगस्त 2013

धर्म

इधर जिंदगी ने कुछ फ़िलोसोफ़िकल टर्न लिया। जब तक आदमी जीत रहा होता है, तो सिकंदर मोड में होता है, और हारता है तो स्पिरिचुअल मोड में चला जाता है। वैसे हमारे महापुरुषों ने आदमी को भली-भांति समझ कर ही ये बात कही होगी - हारे को हरि नाम। फिर ज़िन्दगी की खासियत है कि आदमी समय के साथ जीत को भी भूल जाता है, और हार को भी। हर समय नयी चुनौतियाँ सामने होतीं हैं और उन पर विजय के लिये आदमी सदैव संघर्षरत


एक कहानी है। किसी विश्व विजेता को ये पता चला कि जितने लोगों ने विश्व विजय की उन्हें अपना नाम सुमेरु पर्वत पर दर्ज़ करना होता है। इस गरज़ से वो सुमेरु पर्वत तक भी पहुँच गये। उसे लगा कि विश्वविजय के बाद अगर नाम न लिखा तो सारी क़वायद व्यर्थ चली जायेगी। वहाँ गेट पर एक दरबान बैठा ऊँघ रहा था। उसने पूछा कि क्या ये ही सुमेरु पर्वत है. दरबान ने कहा - हाँ। फिर उसने बताया कि उसने पूरे विश्व पर विजय पा ली है और सुमेरु पर्वत पर अपना नाम लिखना चाहता है। दरबान जरा भी इम्प्रेस नहीं हुआ। बैठे-बैठे ही उसने चॉक का एक टुकड़ा उठाया और बोला नाम लिखने आये हो तो ये लो चॉक और पहाड़ी पर अपना नाम लिख आओ। विश्वविजेता गेट से अन्दर गया और थोड़ी देर में हैरान-परेशान लौट कर आया कि पूरे पर्वत पर तो कोई जगह ही नहीं है, जहाँ वो अपना नाम लिख सके। दरबान ने कहा - भाई कोई भी नाम मिटा दे और अपना लिख ले।कहने का तात्पर्य ये है कि धरती कभी वीरों से खाली नहीं हुयी है और हर सौ साल में इतने महान लोग पैदा हो जाते हैं कि हर किसी को याद रखना संभव नहीं है। हाँ, जिन्होंने दिलों पर राज किया शायद वो अमर हो गये।

जीत शायद आदमी को और व्यस्त कर देती है, अगली फतह के लिये और सोचने का मौका नहीं देती। पर हार आपको चिंतन करने को विवश कर देती है, कहाँ हम गलत थे और कहाँ सही। जीतने  वाला पहले ही 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' वाले फोरमैट में चला जाता है। इलाहाबाद में सिविल सेवा के सफल और असफल परीक्षार्थियों से मुलाकात हो ही जाती थी। उनमें सिर्फ़ इतना अंतर होता था, सफल वाला कहता था, ये मेरी मेहनत का नतीजा है और असफल कहता भगवान/भाग्य ने साथ नहीं दिया।

कुछ पिटने-पिटाने के बाद मुझे भी धर्म की शरण में जाना ही था। कमरे को कुटिया बना दिया और ख़ुद को वानप्रस्थी। किसी ने बताया हनुमान चालीसा पढो, तो किसी ने दुर्गा चालीसा का पाठ रिकमेन्ड किया। मेरी दादी नित्यप्रति सुन्दरकाण्ड पढ़ा या पढ़वाया करतीं थीं। वहीं तक जब हनुमान जी सीता माता की गोद में भगवान राम की मुद्रिका डाल देते हैं। उसके बाद उन्हें भरोसा था कि राम जी अब उन्हें आज़ाद करा ही लेंगे। सबसे कठिन काम सीता जी को खोजने का था। मै बचपन से अपनी दादी के लिये सस्वर सुन्दरकाण्ड का पाठ किया करता था। इसलिये मैंने सुन्दरकाण्ड पर भरोसा किया। हाँ, वो घंटी लेकर आरती भी गाती थीं, तो मुझे वो भी एक सहज पूजन विधि लगी। मुझे लगने लगा कि अब मै धार्मिक हो गया हूँ। फर्स्ट स्टेज के झटके से उबरने के लिये ये विधि बहुत ही कारगर रही।

फिर कुछ महापुरुषों को पढ़ने और समझने का मौका मिला। उन्हें चिंतन-मनन करने का सुखद अनुभव भी हुआ। धर्म की परिभाषायें बनीं भी और टूटीं भी। अपनी आस्था पर भी प्रश्न उठे। और धर्म का एक नया स्वरुप दिखाई दिया। ये जितना सीधा और सरल शब्द है, उसकी व्याख्या ज्ञानियों ने कठिन और दुरूह कर दी है। आम आदमी को पूजा पद्यति पकड़ा दी है और सार से दूर कर दिया है। बीच में मिडिलमेन और बैठ गये हैं, भगवान के प्रतिनिधि बन कर। पर वे भी ज़रूरी हैं। शायद आरम्भ यहीं से होता है। इसे यात्रा का पहला पड़ाव भी कह सकते हैं। रोजमर्रा की दौड़-भाग से फुर्सत मिले, तो धर्म के बारे में सोचा भी जाये, तब तक ये पूजन पद्यति ही श्रेष्ठ है।

धर्म क्या है, हम सब जानते हैं। अधर्म करने के लिये हमें सोचना पड़ता है, धर्म के लिये नहीं। सत्य, सत्य होता है, असत्य के लिये दिमाग़ लगाना पड़ता है। गाँधी या संत वो ही हो सकता है जो दिमाग़ का उपयोग समाज की भलाई के लिये करे न कि अपनी। पर धरती समझदार लोगों से अटी पड़ी है (मेरे हिसाब से जो देश जितना भ्रष्ट है, उतने ज्यादा समझदार वहाँ वास करते हैं)। समझदार दुनिया के हिसाब से चलते हैं। अपनी समझ पर उन्हें ऐतबार नहीं होता, शायद। वो एक संगठित माफ़िया गिरोह की तरह देश-समाज को चूसने में लगे हैं। जिस देश में हर आदमी धार्मिक हो वहाँ तो पहले ही स्वर्ग होना जाना चाहिये, पर हम अभी भी मूलभूत समस्याओं से ऊपर नहीं उठ सके हैं। हर आदमी सिर्फ़ इसलिये पूजा कर रहा है कि बाकि सब पूजा कर रहे हैं। अपने बचपन में मैंने इतने तीज-त्यौहार, व्रत-उपवास नहीं देखे, जितने आज प्रचलित हैं। भ्रष्टाचार और नारी असम्मान की जितनी घटनायें आज उजागर हो रहीं हैं, ये हमारी अधार्मिक छवि को प्रदर्शित करती हैं। ऐसा सिर्फ़ इसलिये हो रहा है कि हम जिस तरह धर्म की नक़ल करते हैं, उसी तरह भ्रष्टाचार की भी। चूँकि सब कर रहे हैं इसलिये मुझे भी करना है। सब झूठ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं, तो झूठ बोलने से कैसा परहेज। सत्य-अहिंसा बच्चों के पाठ्यक्रम में ज़रूर हैं, पर जीवन जीने की कला सिखाते समय बच्चे को हर कोई दुनियादारी सिखाना चाहता है ताकि वो इस भवसागर के सभी इम्तहान पास कर सके। ये बात अलग है कि दुनियादारी का पहला ट्रायल बच्चा उन्हीं पर करता है, जो उसे ये सारी तकनीक सिखाते हैं। कितना बड़ा उलटफेर है, जिसे हम धर्म मानते हैं, उस पर चलने को तैयार नहीं हैं। इसलिये घंटी बजा कर, उपवास रख कर खुद को धार्मिक मान लेते हैं।

आदमी हमेशा से शांति की खोज में लगा रहा है। और ये उम्मीद उससे ही की जा सकती है जिसका पेट भरा हो। उसके पहले सारी कवायद पेट के लिये है। जिसका अधर्म सिर्फ़ पेट के लिये हो उसे कुछ हद तक जायज़ माना जा सकता है। पर जो दूसरे की रोटी पर नज़र गड़ाये बैठा हो, उसकी सारी तपश्चर्या व्यर्थ है। धर्म का उद्भव बुद्ध से हो सकता है, महावीर से भी। उनके पेट भरे थे, सो चिंतन कर सके। पर भरे पेटों की भूख ज्यादा हो, तो उसका क्या इलाज हो सकता है। आदमी जब-जब परेशान हुआ कुछ महापुरुषों ने उनका मार्गदर्शन किया। वो एक मशाल की तरह जिये। जो उनके संपर्क में आया, वो भी प्रदीप्त (इन्लाईटेन्ड) हो गया। हमने उन्हें अवतार बना दिया। समय के साथ जब मशाल बुझ गयी तो हम अपने-अपने मशाल के डंडे को बड़ा बताने में लग गये। जब कि जरुरत थी हम अपनी मशाल भी उस ज्योति से जला लेते। पर तब हमें खुद बुद्ध बनाना पड़ता। बुद्ध या ईसा को फोल्लो करना आसान है, खुद बुद्ध या ईसा बनना कठिन। हमने आसान विकल्प चुना। घंटी बजाना आसान था, तो घंटी बजा ली। सत्य और धर्म पकड़ना मुश्किल था तो उसे महापुरुषों के लिये छोड़ दिया। इससे हमें सहारा मिल गया कि हम महापुरुष को फोल्लो तो कर रहे हैं, पर उन सा बनना अपने बस की बात नहीं है। अपन तो आम आदमी हैं। अन्ना के आन्दोलन में सबसे विशिष्ट बात थी हर टोपी पर लिखा था - मै हूँ अन्ना। एक बुद्ध से कुछ नहीं होगा, सबको बुद्ध बनना  होगा, तभी बात बनेगी।   

धर्म केवल और केवल धर्म है। उसके अलावा जो कुछ भी है, वो अधर्म है। चाहे ये किसी भाषा में हो या किसी मज़हब में हो या किसी भी देश में हो। ये भी देखने को मिलता है, जिन देशों में नियम और कानून का राज्य है, वहाँ धर्म ज्यादा सशक्त है, वहाँ के लोगों को धर्म की आवश्यकता भी कम पड़ती है। जब हम धर्म की स्थापना नहीं कर पाये, तभी नियम-कानून की आवश्यकता पड़ी। दोनों मानवता की भलाई के लिये हैं। धर्म और कानून की नज़र में हर इंसान सामान है। पहले लोग भगवान की सर्वव्यापकता पर भरोसा कर धार्मिक थे कि भगवान सब जगह, सब कुछ देख रहा है। तकनीक के युग में ये काम सीसीटीवी  कैमरे ही कर सकते हैं। ऐसे तथाकथित धर्म से अब डर लगता है, जो मानवता के खिलाफ़ हो।

पिछले कुछ दिनों से मेरी पूजा बदल गयी है। गुलज़ार की लिखी ये प्रार्थना हम अपने स्कूलों में गाया करते थे - 'हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें. दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें.' जब धर्म और अधर्म से अन्जान थे, तब हम भी कुछ-कुछ भगवान थे। 

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर सांस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है 

-वाणभट्ट           

विशेष: इस लेख में व्यक्त सभी विचार मेरे नहीं हैं. विभिन्न किताबों में जिन बातों ने मुझे धर्म को समझने में सहायता की, जो बातें अच्छी लगीं, उन्हें साझा करने का प्रयास मात्र है, ये लेख. किसी के विचारों को ठेस पहुँचाना उद्देश्य नहीं है यदि अनजाने में ऐसा होता है तो मै उसका क्षमाप्रार्थी हूँ.   

रविवार, 21 जुलाई 2013

सदाशयता

सदाशयता 


मंदिरों में इन दिनों भीड़ ज्यादा होने लगी है। सब लोग धार्मिक हुए जा रहे है। ऐसा लगता तो है। पर जो होता है वो लगता नहीं और जो लगता है वो होता नहीं। जो पूजा मुझे घर के कोने में मिल जाती है वो मै बद्रीनाथ और केदारनाथ में नहीं पा सका। मै अपने आपको धार्मिक मानता तो नहीं हूँ पर धर्म के साथ ज़रूर रहने का प्रयास करता हूँ। इस लिए भगवत प्राप्ति का कोई भी सुअवसर हाथ से जाने नहीं देता। 

सो जब गुप्ता जी ने मंदिर चलने को कहा तो मै मना नहीं कर सका। भीड़-भाड़ और शोर-शराबे में मंदिर तो पहुँच जाता हूँ पर भगवान् गुम हो जाते हैं। उस दिन भी बहुत भीड़ थी। शनिवार का दिन था। शनि देव को प्रसन्न करने के जितने जतन मैंने बचपन से कभी न सुने न देखे वो आजकल प्रचलित हो उठे हैं। मंदिरों में भगवानों का एडीशन हो रहा है, मार्किट वैल्यू के हिसाब से। कानपुर के मंदिर में जब काम लगा देखा तो पता चला शीघ्र ही शनि महाराज की स्थापना होने वाली है। स्थापना होते ही वहां तेल-दिए-बाती सब उपलब्ध हो गए। एक नया व्यवसाय पनपते हुए मैंने देखा।

लुधियाना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। बारह साल बाद जब यहाँ आना हुआ तो पुराने काली मंदिर में शनिदेव की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी थी। ठेलों पर वो सारी चीजें मुहैया थीं जो कानपुर में मिला करतीं थीं। शनिदेव की महिमा है जहाँ-जहाँ न पहुँच जाए। क्या यूपी क्या पंजाब। सब जगह प्रभु का वास है। इसी को देख कर भारत की अनेकता में एकता वाली किम्वदंती सत्य लगने लगती है। माइंड इट...लगती है।

बहरहाल मंदिर में शनि देव की कृपा से बहुत भीड़ थी। माता रानी का जागरण भी चल रहा था। एक ही काम्प्लेक्स में सभी भगवान् होने से दर्शनार्थियों को इधर-उधर भटकने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। वन स्टॉप मन्दिर। राम भी हैं, कृष्ण भी, हनुमान भी और शंकर भी। मैंने भीड़ को देखते हुए वहीँ से असीम श्रद्धा के साथ सभी भगवानों का अभिवादन किया और मंदिर प्रांगण में घुसने का विचार त्याग दिया। गुप्ता जी बिना दर्शन किये लौटने को राजी न थे।   

बाहर एक बहरूपिया शनि देव के वस्त्र धारण किये। उसके सामने एक रुपयों से भरी टोकरी रक्खी हुई थी। मंदिर से जो भी निकलता उसकी टोकरी में कुछ न कुछ डाल देता। उसका आशीर्वाद पा लोग कृतज्ञ हो अपनी-अपनी दिशा में बढ़ जाते। संपन्न प्रदेश में चढ़ावा भी किसी को संपन्न बना सकता है। यूपी  में तो लोग घर से फुटकर रुपये लेकर मंदिर या कथा में जाते हैं। यहाँ दस-पांच-बीस के नोट उस टोकरी की शोभा बढ़ा रहे थे।

मै सर्वव्याप्त प्रभु की महिमा का गुणगान करने लगा। तू ही सबका सहारा है। शनि देव का भी आवाह्न किया। प्रभु धरा पर बहुत शनिचर सवार हो गए हैं। मेरे भले के लिए आपने अच्छा किया जो उन से दूर कर दिया। पर भगवन उन शनिचरों का भी तो कुछ निपटारा कीजिये जो देश-समाज को खोखला किये जा रहे हैं। 

मेरी प्रार्थना ज्यादा देर नहीं चल पायी। एक बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। किसी जिद पर अड़ गया था। थोड़ी निगाह घुमाई तो एक गुब्बारे वाला पास ही खड़ा था और बच्चा एक बड़ा गुब्बारा खरीदने पर आमादा था। गुब्बारे वाला उसका मूल्य बीस रुपये आंक रहा था। माँ को शायद ये फिजूलखर्ची लग रही हो या उसके पर्स में सिर्फ लौटने का किराया हो। महिला बहुत संपन्न नहीं थी पर कपड़ों की चमक से उसे गरीब नहीं कहा जा सकता था।

माँ बच्चे को घसीटने के साथ-साथ डाँट  भी रही थी। तभी शनि देव बने उस व्यक्ति ने रास्ता रोक लिया और बीस का नोट माँ के हाथ पर रख दिया। बोला "बेटी, दिला क्यों नहीं देती, बच्चे का दिल नाहक दुखा रही हो।" 

किम्कर्तव्यविमूढ़ सी महिला को समझ नहीं आ रहा था कि वो पैसा ले या न ले। 

बच्चे की ज़िद जारी थी। 

- वाणभट्ट 



     

शनिवार, 8 जून 2013

भैय्ये

फ़्रांस की वो टीम न आती तो शायद राईस मिल जाने का सौभाग्य न मिलता। वो लोग हिन्दुस्तान से बासमती इम्पोर्ट करने के इरादे से आये थे। वहाँ एक स्पेसिफ़िक अरोमा का बासमती पसंद किया जाता है। उन्हें इम्पोर्ट कनसाइंटमेंट बहुत सी मिक्स्ड फ्रेग्रेंसेस मिला करतीं थीं। सो उन्होंने एक्सपोर्टर कंट्री में जा कर वहाँ की वैरियेबिलीटी का अनुमान लगाना उचित समझा।

बहरहाल मेरी ड्यूटी उन्हें बासमती उत्पादक क्षेत्र की राईस मिलों के दर्शन कराने की लग गयी। हम भारतीयों की खूबी है कि गोरी चमड़ी देख कर अपना हृदय खोल के रख देते हैं। अमूमन किसी भारतीय टीम को किसी मिल में ले जाना हो तो हमारे मिल मालिक कुछ घबरा जाते हैं। पता नहीं कौन टैक्स वाला निकल जाये या प्रदूषण कंट्रोल वाला। आज कल तो खोजी पत्रकारिता से भी डर लगता है। कहीं धूल से अटे पड़े प्लांट में काम करते मजदूरों की फ़ोटो ही न छाप दें। पैरों के नीचे कुचलते चावल को खुबसूरत थैलियों में पैक करते वीडियो न बना लें। थैलियों में पैक हो कर खाद्य पदार्थ का मूल्य और उपयोगिता बढ़ जाती है। 

फ़्रांस के नाम पर कई मिलों ने हमारे मिल विजिट के आग्रह को स्वीकार कर लिया। हम भी समय की पाबन्दी दिखाते हुये सुबह-सवेरे पूरे दल-बल को ले कर चल दिये। फ्रांसीसियों को हिदायत दे दी कि भैय्या फ़ोटो-वोटो मत खींचना, हमारे बिरादर बुरा मान सकते हैं। संभ्रांत देश शायद बातों को आसानी से मान लेते हैं। वर्ना हमें तो वही करना भाता है जिसमें रिस्ट्रिक्शन हो। आज़ाद ख़्याल देश है अपना। 

जब तक हम कोहली राईस मिल पहुँचे तब तक हम कई मिलें घूम चुके थे। कोहली साहब ने स्वल्पाहार की व्यवस्था भी कर रक्खी थी। फ़्रांसिसी तो बाहर खाने-पीने के नाम से ही घबरा जाते थे। हम आतिथ्य को अस्वीकार कर कोहली साहब को नाराज़ कर दें, ऐसा कोई इरादा नहीं था। खाते-पीते लोगों के शहर में खाना-पीना ही आतिथ्य का विशिष्ट लक्षण है। खासे डील-डौल वाले कोहली साहब खुद ही प्लांट दिखाने अपने एसी चेंबर से बाहर आ गए थे। 

ये मिल भी हमारे द्वारा विजिट की गयी बाकि मिलों जैसी ही थी। अन्दर वातावरण में तैरती धूल से हमारे फिरंगी मित्र अब तक अभ्यस्त हो चुके थे। उस ग़र्द-ग़ुबार से भरे वातावरण में तत्परता से काम करते मजदूरों को देख, अब उनमें कोई कौतुहल नहीं बच रहा था। पहले-पहल उन्हें चावल के ऊपर जूते रखने में थोड़ी परेशानी जरुर हुई पर पूरे प्लांट को देखने के लिये इस अनिवार्यता के आगे सब विवश थे। उनकी सारी हैरानी-परेशानी अब तक ख़त्म हो चुकी थी। तभी कुछ ऐसा हुआ जो वे लोग  पिछले प्लांटों में नहीं देख पाये थे।

एक बहुत ही कृशकाय आदमी ट्रक से एक कुंतल का बोरा पीठ पर रख कर सधे कदमों से उतर रहा था। तब तक बोरों का भार चालीस किलो नहीं हुआ था। एक पतला पटरा ट्रक को जमीन से जोड़े हुए था। गोदाम भी लगभग ट्रक से बीस मीटर की दूरी पर रहा होगा। फ्रांसीसियों का मुँह खुला का खुला रह गया।

कोहली साहब ने स्थिति को भाँप लिया। अंग्रेज़ी में बोले ये यू पी के भईये गज़ब के होते हैं। देखने में बिलकुल हड्डी, पर देह में इतनी ताकत होती है कि क्या बतायें। एक-एक, दो-दो कुंतल का माल इधर-उधर कर दें अपनी पीठ पर लाद के। पैसे के लिये ये यहाँ परदेश आते हैं और इतनी दिहाड़ी इन्हें अपने देश में नहीं मिलती जितनी यहाँ मिल जाती है। हम पंजाब के लोग देखने में भले ही कितने हट्टे-कट्टे दिखें पर मजदूरी करने के लिये ये भइये ही काम आते हैं। अब मैंने गौर किया की प्लांट के अधिकांश मजदूर बाहरी ही थे। भैये शब्द से मै दिल्ली से ही परिचित था। और ये भी मालूम था कि ये कोई आदरसूचक शब्द तो कतई नहीं लगता।

हिन्दी में मैंने सिर्फ़ इतना कहा भाई इस मेहनत की कीमत को समझो। अपने और अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिये ये इतना भारी बोझा उठा रहा है। क्या यही काम हमारे पंजाबी बन्दे कनाडा और अमेरिका जैसे विकसित देशों में नहीं कर रहे। वहाँ के लिये हम भी तो भैये ही हैं।

- वाणभट्ट             

रविवार, 12 मई 2013

मातृ दिवस आया है

माँ को याद करने के बहाने ढूँढते हैं अब
जैसे अपने ही घर का पता पूछते हैं अब

चलने-फिरने से भी कभी बेज़ार थे
आँचल से निकल दुनिया घूमते हैं अब

तूने अपना सब कुछ दिया बिना शर्त
अपने पास तेरे लिए न वख्त है अब

खुदगर्जी के रंग में सबने खुद को रंग लिया 
माँ, तू न जाने किस ज़माने में जीती है अब  

वख्त तो करवट बिन आवाज़ बदलता है
दुनिया बदली, तू क्यों नहीं बदले है अब

बूढी हो गयीं हैं तेरे माथे की सलवटें माँ
पर तेरी आँखों में सितारे नज़र आते हैं अब  

तेरी दुआ तो हर पल रहती थी साथ मेरे 
दुश्मनों के माँ की दुआएं भी मेरे साथ हैं अब 

- वाणभट्ट 

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत औ...