रविवार, 26 जुलाई 2015

ब्लेम इट टू ब्रिट्स

हम सभी, जो अपने आप को थोड़ा बहुत बुद्धिजीवी समझते होंगे, ने थरूर साहब का वायरल हुआ वीडियो ज़रूर देखा होगा। बहुत ही सलीके से उन्होंने, सधी हुयी अंग्रेज़ी में, अंग्रेज़ों के देश में, उन्हीं लोगों के सामने, उनकी जिस तरह से धज्जी उड़ाई है, वो काबिल-ए-तारीफ़ है। उससे पूरा प्रबुद्ध भारत एक फ़ील गुड फैक्टर का शिकार हो गया। जो लोग आज भी अंग्रेजों के राज में अंग्रेजों के साथ होते, वो भी देश प्रेम की इस आँधी में कूद पड़े हैं। हर तरफ वाह-वाह हो रही है और होनी भी चाहिये। इतने सालों बाद ही सही, किसी ने आइना पूरी ईमानदारी के साथ दिखने की कोशिश तो की। अंग्रेज़ी जानने और बोलने वालों की इस देश में ब्रिटिश शासन के दौर से ही कोई कमी नहीं रही। लेकिन उनमें से अधिकतर की सोच पर भी ब्रितानी भाषा और संस्कृति का प्रभाव छाया रहा। वो अंग्रेज़ों की भारत में छूट गयी औलादों की तरह ही बर्ताव करते रहे। और यदि हम सभी अपने आस-पास सूक्ष्म दृष्टि डालें तो हम आज भी अंग्रेज़ी संस्कार और शिष्टाचार की ही नक़ल करते दिखाई देते हैं। वर्षों की ग़ुलामी ने हमारी नींव को हिला के रख दिया है। नेता जी, इस शब्द से हम पुराने लोगों के जेहन में सिर्फ आदरणीय सुभाष चन्द्र बोस की ही तस्वीर आती है, ने अपनी एक पुस्तक में आज़ादी के बाद कुछ वर्षों की लिमिटेड डिक्टेटरशिप का ज़िक्र किया था। उनका मानना था कि सैकड़ों सालों की ग़ुलामी के कारण भारतवासी अपनी अस्मिता को भूल चुका है। उसके हृदय में देश प्रेम, देश भक्ति, आत्मगौरव, स्वदेश और स्वाभिमान की अलख जगाना प्राथमिकता होनी चाहिये, तभी देश सही दिशा में विकास कर पायेगा।   

थरूर साहब का भाषण ऑक्सफ़ोर्ड सोसाइटी द्वारा आयोजित वाद-विवाद का एक हिस्सा था। बाकी वक्ताओं के विचारों को सुनाने-समझने के लिये पूरा प्रोग्राम वायरल होना चाहिये। पक्ष-विपक्ष दोनों ही ने अपनी बात को दमदार तरीक़े से रखने के लिये तथ्यों का सहारा लिया होगा। हमारी दिक़्क़त ये हैं कि हम वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। ताली बजाना शायद सबसे आसान काम है। दूसरे करें और हम सिर्फ़ तमाशा देखें। इस देश में ऐसे वक्ताओं की कमी नहीं है, जिनके भाषणों में देश-प्रेम न झड़ता हो, लेकिन उनके आचरण में इस चरित्र का सर्वथा अभाव रहता है। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को तो भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता-अधिकारी-कर्मचारी इस प्रेम में सराबोर दिखाई देता है।राजनीति में जब सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों देशप्रेमी हैं, तो देश को विकसित होने से कौन रोक सकता है। लेकिन ये सब जानते हैं कि पिछले छः दशकों हमें जहाँ होना चाहिए था, हम वहाँ नहीं पहुँच पाये। इतिहास के पन्नों में दर्ज़ किन-किन विसंगतियों का हिसाब हम किन-किन देशों से माँगेंगे। चंगेज़ खाँ से लेकर महमूद ग़ज़नवी, मोहम्मद गोरी से लेकर सिकंदर, फ्रांसीसियो पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों, जिसे देखो मुँह उठाया और चला आया। किस-किस से हिसाब माँगते फिरेंगे हम। इतने वर्षों की गुलामी के बाद भी जो हम नहीं सीखने को तैयार हैं, वो है इतिहास से सबक। अगर आप में एका नहीं है तो बाहर वाला तो इस फ़िराक़ में बैठा ही है कि आपके घर में घुसा जाये। देश का विकास सत्ता पक्ष भी करना चाहता है और प्रतिपक्ष भी। लेकिन किसी भी मुद्दे पर ये एकजुट नहीं हैं। मामला क्रेडिट लूटने का है। वो भी देश की बलि दे कर। 

जिन देशों से हम मुकाबला करना चाहते हैं, उनमें कई साझा बातें हैं। देश के प्रति प्रेम, नियम-कानून का पालन, अपने वैधानिक पदों की गरिमा और त्वरित न्याय प्रक्रिया कुछ ऐसी ही बातें हैं। और ख़ास बात ये है कि ये सब जीवन-मूल्य दो-ढाई साल की उम्र से ही घुट्टी में पिलाये जाते हैं। जब हम अपने बच्चों को पापा-मम्मा सीखा रहे होते हैं, वो था-था सीखा रहे होते हैं। जिससे बच्चे को थैंक यू कहने में आसानी हो। जिस देश में सत्य, अहिंसा, न्याय, देश प्रेम सिर्फ भाषणों तक सीमित हो गया हो और इनका पालन करने वाला स्वयं को अल्पसंख्यक और असहाय समझता हो, उस देश में क्रांतियाँ सिर्फ कागज़ों में आती है। हक़ीक़त में आते-आते पीढ़ियाँ गुज़र जातीं हैं। समस्यायें अनंत हैं। उतने ही वादे, उतने ही नारे। बेटी बचाओ, पर्यावरण बचाओ, बिजली बचाओ, पानी बचाओ। क्लीन इण्डिया, ग्रीन इण्डिया, मेक इन इण्डिया। खासियत ये कि सारा देश भी यही चाहता है। पक्ष-विपक्ष, अमीर-गरीब, सरकारी-गैरसरकारी सब। लेकिन यक्ष प्रश्न है करेगा कौन। प्रधानमन्त्री कहेगा कि सफाई रक्खो तो हम गन्दगी फैलायेंगे। हम वो सब करेंगे जो एक संभ्रांत नागरिक को नहीं करना चाहिये। इसी से हमें आज़ादी का एहसास होता है। और आज़ादी का सम्बन्ध मन से है, तन भले ही कीचड़ में लोट रहा हो। आमिर खान को सत्यमेव जयते के एक भी एपिसोड करने की ज़रूरत नहीं पड़ती अगर हम प्राइमरी शिक्षा में मॉरल-एथिक्स पर जोर देते और बच्चों के सामने वो नज़ीर रखते जो सिर्फ़ लफ़्फाज़ियों में बर्बाद कर देते हैं। बच्चा अपने बड़ों से ही सब सीखता है। घर-परिवार-समाज का रोल भले दिखाई न दे किन्तु हमारे अंदर तक पैठ जाता है। सदियों की ग़ुलामी ने हमारे डीएनए को बदल डाला है। हम अभी भी आज़ादी के लिये लड़ रहे हैं। पहले फ़िरंगीयों से, अब अपने ही रंग वालों से। पान-गुटका खा के हमारा नागरिक जब पाव लीटर फेचकुर सड़क पर फेंकता है, तो निश्चय ही उसके हृदय में क्रांतिकारी भाव होता होगा। मानो लार्ड क्लाइव के मुँह पर उसका पीक पड़ने वाला हो। कोई सभ्य नागरिक अपने ही देश-स्थान को कैसे गन्दा कर सकता है।

हमारी एक आदत सी बन गयी है। हर बुराई का आरोप दूसरों पर मढ़ देना। अंग्रेज़ों के माफ़ी माँग लेने से हमारा अतीत नहीं बदलने वाला। किसी को नीचा दिखा कर हम ऊँचे नहीं हो जायेंगे। सेल्फ इम्प्रूवमेंट की कोई भी किताब पढ़ लें। वो पहले ही आगाह करते हैं, वर्तमान परिस्थितियों के लिये स्वयं जिम्मेदार बनिये। दूसरों को दोष देने से कुछ नहीं होने वाला। मुझे स्वामी विवेकानन्द की कुछ पंक्तियाँ, जो कभी बहुत पहले आँखों के सामने से गुज़रीं थीं, प्रेरणा देतीं हैं - और किसी का नहीं दोष तो मेरा ही है…मै ही तो अपना साकार अतीत हूँ …। हम आज़ादी के साठ साल बाद भी अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने में लगे हैं। यदि हम भारत को उन्नत राष्ट्रों  देखना चाहते हैं तो ये काम आदर्श नागरिकों के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। और आदर्श नागरिक की बुनियाद दो-ढाई साल के बच्चे से तो सम्भव है, लेकिन पचीस साल के नवजवान को सही-गलत का भेद समझा पाना कठिन है। वो उल्टा उनको क़ानून पढ़ायेगा। देर कभी नहीं होती। जब जागो, तभी सवेरा। चंग़ेज़ों, ग़ज़नवियों, गोरियों और अंग्रेज़ों के समय हमने जो गलतियाँ की थीं, कम से कम उन्हें तो न दोहरायें। बँधी मुट्ठी लाख की, और खुली तो प्यारे ख़ाक की। वही ताक़त है। किसी ने बहुत सही बात कही थी। लोग बाग़ आजकल अपने शेर ग़ालिब के नाम से चेप देते हैं। 

हमें अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था  
मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था  

(मुझे शक़ है। ऐसा शेर कम से कम ग़ालिब तो नहीं लिख सकते। किन्तु बात सही है। असली शायर को आभार।)  

- वाणभट्ट 

रविवार, 3 मई 2015

फकीरा चल चला चल

इस देश में कभी भी विचारकों की कमी नहीं रही होगी। जब बाकी दुनिया दूसरों पर विजय के लिए प्रयास कर रही थी, हम इह और उह लोक की गुत्थी सुलझाने में लगे थे। लेकिन विचारों का क्या है, कब आये, कब चला जाये। इसलिये इनको लिपिबद्ध करना आवश्यक है। इतने ग्रन्थ और पुराण ऐसे ही नहीं लिख गये। भाषा जितनी गूढ़ हो, विचारक उतना ही महान। शायद इसीलिये ज्ञानी जनों ने संस्कृत को अपना माध्यम बनाया। आम आदमी व्याकरण की जटिलता और शब्दों की क्लिष्टता से ही विचारक ऑब्लिक लेखक को विद्वान मान लेता था। सूर-तुलसी-मीरा-रहीम-रसखान की सीधी सच्ची बातें हर किसी की समझ आ जातीं थीं, लिहाजा ये जन-कवि बन गये। इनकी ज्ञान-गंगा सुनने-पढने वालों से सीधा सम्वाद करती थी। इन्हें अपनी बात पाठकों तक पहुँचानी थी, अतः इन्होने भाषा और शब्दों का आडम्बर नहीं अपनाया। आज भी इनकी रचनाओं का घर-घर में पठन-पाठन होता है। पहले और अब भी ग्रन्थ-वेद-पुराण केसरिया कपड़ों में लिपटे पूजा स्थल की शोभा बढ़ाते रहे हैं। इनको पढ़ पाना भी छोटे-मोटे विद्वानों के बस की ही बात रही होगी। नतीजा ये कि संस्कृत जानने वाला हर व्यक्ति पंडित-ज्ञानी बन गया।      

आज ज़माना बदल गया है। कलियुग के आसार तो भारतीय साहित्य के आरब्ध से ही परिलक्षित होने लगा था। आज वो अपने चरम पर है। मुगलों और अंग्रेजों की लम्बी गुलामी ने संस्कृत के मूल पर ही प्रहार किया। ज्ञानी पहले अरबी-फारसी को तवज्जो देने लगे, बाद में वही पदवी अंग्रेज़ी को सौंप दी गयी। अँगरेज़ तो चले गये पर अंग्रेज़ी के यहाँ से टलने के आसार कम ही दिख रहे हैं। आज संस्कृत के जानकार खोजे नहीं मिलते, और जो मिलते हैं, वो उसका सार काम-व्यापार की नीयत से ज़्यादा समझते हैं।ज्ञान कल भी आम आदमी की पहुँच से दूर था और आज भी दूर है। और यही गति रही तो कल भी रहेगा। 

संस्कृत की जगह अंग्रेजी ने ले ली है। पहले किताबी शिक्षा आश्रमों और गुरुकुलों में कुलीन परिवारों तक ही सीमित थी। भला हो अंग्रेज़ों का जिन्होंने क्लर्क तैयार करने के लिये स्कूली शिक्षा को बढ़ावा दिया। शिक्षा को रोजगार गारंटी स्कीम की तरह देखा जाने लगा। गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले, गाँव-गाँव पाठशालायें खुल गयीं। सब वन टू का फोर करने में लग गये। विचारकों के विचारों को चैलेंज किया जाने लगा। आज लोग सिर्फ़ इसलिये कि पुराणों में जो कुछ कहा गया है, वो मानने योग्य है, ये मानने को तैयार नहीं। देश काल के साथ ज्ञान को परिमार्जित होते रहना चाहिये। पर हम धर्म के नाम पर अपने-अपने ग्रंथों की परिपाटी को ढोने को विवश हैं। हज़ारों साल पहले कही-लिखी बातों को हर परिस्थिति में, सदैव  और सर्वमान्य, ब्रम्ह-वाक्य की तरह स्वीकार कर लिया गया है। इसमें कोई रद्दो-बदल की गुंजाईश देखने वाला नास्तिक करार दिया जा सकता है। मानवता, परम्परा और संस्कार की भले ही सबने तिलांजली दे दी हो। भौतिकतावादी युग में जीवन और आचरण सब बदल गया है। नहीं बदले हैं तो हमारे ग्रन्थ। आज सही-गलत में अंतर कर पाने की दुविधा संभवतः पहले से कहीं ज़्यादा है। और फ़ेसबुकिया और व्हाट्सऐप्पिया ज्ञान का आलम ये है कि ज्ञानीजन अपने विचारों को चाणक्य और सुकरात के विचार बता कर चेप  रहे हैं। कोई ऑथेन्टिसिटी चेक तो है नहीं। किसी ने अपनी घटिया शायरी बच्चन जी के नाम से चेप दी। सैकड़ों लाइक भी मिल गये। आपत्ति करने पर जनाब फ़रमाते हैं कि आप कथ्य पर जाइये। किसने कहा है इससे क्या फ़र्क पड़ता है। अपने नाम से बंधु ने ठोंका होता तो मुमकिन है अपना मिला के दो लाइक भी न मिलते।

आज के युग में विचारकों ने अपने महान विचारों के लिये अंग्रेजी भाषा को पकड़ रखा है। कभी ये सौभाग्य संस्कृत को मिला हुआ था। अच्छा हुआ, सूर-तुलसी-मीर-ग़ालिब आज नहीं पैदा हुए वर्ना फ्रस्ट्रेशन से मर जाते कि कितने जतन से हम अपनी बात कह रहे हैं और सुनने वाले हैं कि हिज़ मास्टर्स वॉइस के प्राणी की तरह कुछ और सुनने को राज़ी नहीं हैं। अच्छे विचारकों का शगल है कि दूसरों के विचारों से अवगत रहें। हिंदी या जनसामान्य की भाषा में जो कहा-सुना-लिखा जा रहा है, वो निंदनीय है भर्त्सनीय है। अंग्रेजी अखबार, पत्रिका या चैनल जो भी कह रहा है उसे पढ़िये-सुनिये-गुनिये और उसे इस अंदाज़ में पुनः लिखिये-कहिये जैसे इस विचार की उद्गमस्थली आप ही हैं। इतनी विवेचना कर डालिये कि ओरिजिनल लेखक को भी शक होने लगे कि ये उसके नहीं आप के ही विचार हैं। वैसे भी कॉपीचोर समाज में कॉपीराइट के लिये लड़ने में समय व्यर्थ करना मूर्खता नहीं, तो मूर्खता जैसा तो है ही। दूसरी भाषा में लिखिये और पहली भाषा को ज्यों का त्यों भी चेप दीजिये तो कोई माई का लाल ये नहीं कह सकता कि ओरिजिनल माल किसका है। एक राज़ आज आप सबसे बाँट रहा हूँ। किसी से कहना नहीं। चूँकि मैं हिंदी में लिखता हूँ, इसलिये अंग्रेजी के दो-एक अखबार भी पलट लेता हूँ। अमूमन मसाला मिल जाता है, जिसे हिंदी में चिटका देता हूँ। हिन्दी वाले ज्ञानी भले न माने (क्योंकि हिन्दी पत्रिका या ब्लॉग पढ़ना समय व्यर्थ करने के सामान समझा जाता है) पर  अंग्रेज़ी वालों को शक नहीं होता। ख़बर तो हिन्दी में ही चटखारे ले ले के पढता हूँ, पर मौका मिले तो अंग्रेज़ी एडिटोरियल पर नज़र मार लेता हूँ। यही वो जगह है जहाँ से आप ओरिजिनल विचारों का चोर्यीकरण कर सकते हैं। अंग्रेजी अख़बारों के विचारकों को जब देश के गण्यमान्य लोग ज़्यादा तरजीह देते हैं तो मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति को विचारों के लिये विभिन्न स्रोतों को तलाशना नितांत अनुचित है। कुछ जेब, कुछ समय, अगर इज़ाजत दे देते तो शायद मै भी बैठकबाजी करके हिन्दी के गण्यमान विचारकों में शामिल हो गया होता। खैर कोई बात नहीं।

इस ग़रज़ से जब रविवार का एडिटोरियल पलटा तो पाया अंग्रेजी के एक ज्ञानी विचारक जी फरमा रहे हैं "डिप्रेशन इज़ मेन कॉज़ ऑफ़ फ़ार्म सुसाइड।" इन महानुभाव ने लैंसेट जरनल में छपे एक शोध पत्र के आधार पर सांख्यकीय माध्यम से बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से ये समझाने का प्रयास किया था कि आत्महत्या की प्रवृत्ति एक मानसिक बीमारी है। जिसका मूल कारण अवसाद है। जो मानसिक तनाव है न कि वित्तीय तनाव। भारत में आत्महत्या की दर 11 प्रति एक लाख व्यक्ति है। जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। ये भी माना गया है कि वास्तविक दर, प्रतिवेदित दर 30 से 40 प्रतिशत अधिक हो सकती है। वैश्विक आत्महत्या पैटर्न का खेती आत्महत्या से कोई सीधा सरोकार नहीं है। लैंसेट अध्ययन ने अनौपचारिक स्रोतों से बताया है कि किसान की संख्या गैर-खेती लोगों की तुलना में कम है। फ़ार्म सुइसाइड्स की दर नॉन-फ़ार्म की तुलना में घटी है। पढ़े-लिखे और संपन्न लोगों में आत्महत्या का प्रतिशत अधिक है। आक्षेप ये लगाया है कि प्रेस और मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये फ़ार्म सुइसाइड्स को बढ़ा-चढ़ा के दिखाता है। पत्रकार मेडल और अवार्ड की चाहत में इन ख़बरों को ज़रूरत से ज़्यादा हवा देते हैं। लेखक ने तो यहाँ तक कह दिया कि जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स का जो लोग विरोध कर रहे हैं, वो वास्तव में आत्महत्या को बढ़ावा दे रहे हैं। 

देश-दुनिया में हज़ारों शोध हो रहे हैं, हज़ारों शोध पत्र छप रहे हैं। एक प्रतिवेदन के आधार पर समस्त पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना कहाँ तक जायज़ है, ये समझ से पर है। शोध से पूर्व ही शोधकर्ता एक परिकल्पना, एक अवधारणा बना कर प्राथमिक या द्वितीयक आँकड़े एकत्र करता है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया 2001-03 तथा यू एन के 2010 के सर्वे पर आधारित है, ये पत्र। जिस देश में एक लाख सत्तर हज़ार आत्महत्यायें दर्ज़ होतीं हों, वहाँ इस प्रकार के अध्ययन का महत्त्व बढ़ जाता है। ये प्रयास अनूठा और सराहनीय है। लेकिन हर अध्ययन का सीधा-सपाट निष्कर्ष भ्रामक हो सकता है। इसको सूखे, बाढ़, बढ़ती खेती लागत और बढ़ते कृषि ऋण से जोड़ कर भी देखा जाना चाहिये। जिन वर्षों में प्राकृतिक आपदा आई उन वर्षों में कितने किसान प्रभावित हुये। 

जो लोग आत्महत्या करते हैं, अमूमन उनके सपने, उनके यथार्थ से बड़े होते हैं। और ये बात पढ़े लिखे और अनपढ़ दोनों पर लागू होती है। चिंता का विषय ये है कि विकास के साथ-साथ आत्महत्या की प्रवृति भी पहले से अधिक विकसित हुयी है। एक ही जीवन में भौतिक सुख के सभी साधन पा लेने के लिये आदमी बड़े-बड़े दाँव खेलने से नहीं चूक रहा है। आसानी से उपलब्ध ऋण व्यवस्था लोगों को ज़मीन-जायज़ाद गिरवी रख कर क़र्ज़ लेने को प्रेरित करती है। शहरों और दूरदर्शन की चकाचौंध आम आदमी को ऐसे सपने दिखाती है कि वो आर-पार की लड़ाई में कूद जाता है। चाहे वो क्रिकेट की दुनिया हो या फ़िल्मी सितारों की। जितना बड़ा जुआ उतना बड़ा लाभ। जो आदमी नहीं सीख पा रहा है वो है, सब्र। विकेट पर खड़े रहना ही जीत है। एक आशा तो बनी रहती है। समाज का एक भी व्यक्ति यदि समाज को अपनी मर्ज़ी से त्यागता है, तो ये समाज की मौत है उसकी नहीं। क्या फ़र्क है कि वो किसान है या नहीं। 

- वाणभट्ट               

मंगलवार, 3 मार्च 2015

विज्ञान दिवस

तीसरा अलार्म बज रहा था। राबिया बेगम ने करवट बदलते हुये लिहाफ़ में सर घुसेड़ दिया। फ़रमाया - "आ गया कम्बख़्त" राशिद मियाँ को बिस्तर से उठना पड़ा। पहला अलार्म पाँच बजे का था और दूसरा साढ़े-पाँच का। इन दोनों को बंद किया जा सकता था। किन्तु तीसरा तब तक बजता था जब तक राशिद मियाँ बिस्तर से उठने को मज़बूर न हो जायें। ये दूधिया अपने दूध के चक्कर में जाड़ा-गर्मी-बरसात 365 दिन छः बजते-न-बजते घंटी बजा ही देता। राबिया बहुत झल्लाती - "दूध नहीं पानी पिला रहा है, ना चाय में रंगत आती है, ना दही ही जमता है। सुबह-सुबह नींद खराब होती है सो अलग से।" लेकिन राशिद मियाँ का मानना था अगर राधे न आता तो पूरा घर सोता ही रह जाता। बेगम साहिबा के चक्कर में बच्चों का स्कूल भी छूट जाता। ये तीसरा अलार्म था जिस पर राशिद को पूरा भरोसा था। ये बात अलग है कि राबिया ने इस काम में उसका सहयोग देने से मना कर दिया था। चूँकि ये सुझाव राशिद भाई का था लिहाज़ा सभी मौसम में दूध लेने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कन्धों पर थी। 


भगोना ले कर बाहर निकले तो देखा फाटक पर पाठक जी खड़े हुए थे। मुस्कराते हुये बोले - "गुड मॉर्निंग राशिद भाई। ज़्यादा सुबह तो नहीं आ गया। आप लोग तो अर्ली राइज़र हैं इसलिए सुबह-सुबह घंटी बजा दी। डिस्टर्ब तो नहीं कर दिया।" राशिद को कभी-कभी अपने हद से ज़्यादा ज़हीन होने पर अफ़सोस होता था। ऐसे लोगों के लिये राबिया ही सही है, मुंह-तोड़ जवाब तो देती। पाठक जी निकट के साइन्स कॉलेज में रसायन शास्त्र के प्रवक्ता पद पर नियुक्त थे। एक कार्ड निकलते हुए बोले - "आज हमारे यहाँ साइंस-डे मनाया जा रहा है। ऊपर से आदेश है। बजट भी आया है।एक छोटा सा प्रोग्राम रखा है। ग्यारह से एक बजे तक। दो-चार वक्ता हैं। उसके बाद हाई-टी का आयोजन भी है। आप आयेंगे तो अच्छा लगेगा। मुस्लिम रिप्रेसेंटेशन भी हो जायेगा। लोग मानते हैं कि मुसलमानों की विज्ञान में कम दिलचस्पी होती है।" अभियांत्रिकी में आईआईटी से पीएचडी करने के बाद राशिद ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसे कभी इस प्रकार का कॉम्पलिमेंट सुनने को मिलेगा। परन्तु प्रत्यक्ष रूप से उसने पूरी कोशिश करने का वादा कर लिया। तब तक राधे भी आ गया। पाठक जी को और भी कार्ड बांटने थे इसलिये इस मुलाकात का अन्त हो गया।

राशिद नियत समय पर कॉलेज के रसायन शास्त्र विभाग के सेमीनार रूम में पहुँच गया। तैयारियाँ अभी चल रहीं थीं। डायस के किनारे दीप प्रज्वलन की तैयारी थी। साफ़-सफाई में लगे थे विभाग के सभी कर्मचारी। पाठक जी ने मुस्कराते हुये स्वागत किया - "प्राचार्य जी आते ही होंगे। वही कार्यक्रम चीफ गेस्ट भी हैं। तब तक और गैदरिंग हो जायेगी।" हॉल की स्थिति देखते हुये ये समझ आ रहा था कि पूरी गैदरिंग में 50-60 से ज़्यादा लोगों के आने की उम्मीद नहीं थी। आयोजन की ज़िम्मेदारी पाठक जी पर ही थी। वो अपने काम में व्यस्त हो गये। राशिद ने कोने की एक सीट पकड़ ली। 

लोग आ रहे थे और अधिकांश झाँक-झाँक के लौट जा रहे थे। कुछ बैठ गए थे। संभवतः दूसरे डिपार्टमेंट के लोग हों। कुछ स्नातकोत्तर छात्र लग रहे थे। सीटें खाली दिख रही थीं इसलिये पाठक जी ने कार्ड की औपचारिकता त्यागते हुये किसी को भी पकड़ लाने का विचार अपने सहकर्मियों के सामने रख दिया। धीरे-धीरे 30-40 लोगों को इकठ्ठा कर पाने में आयोजक सफल हुये। प्राचार्य और वक्ता लोग मंचासीन हो गये। संचालन का जिम्मा भी श्रीमान पाठक जी पर ही था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप-प्रज्वलन से हो गया। उसके बाद विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष के चित्र पर माल्यार्पण होना था। पोडियम से पाठक जी ने मुख्य अतिथि और वक्ताओं से चित्र पर मल्यार्पण करने का आग्रह भी कर दिया। पर ये क्या मन्च पर फोटो नदारद थी। पाठक जी के चेहरे पर कई रंग आ-जा रहे थे। 

प्राचार्य महोदय ने बात सम्हाल ली - "पाठक जी फोटो मंगवा लीजिये। ये तो इन-हाउस कार्यक्रम है।" एक आदमी फोटो लाने के लिए लपका। आनन-फानन में वही आदमी फोटो झाड़ता हुआ मंच पर आ गया। पर फोटो रखने के लिये वहां कोई व्यवस्था नहीं थी। लिहाजा एक कुर्सी के ऊपर उसे स्थापित करने का प्रयास किया जाने लगा। कुर्सी के हत्थों पर फोटो को टिकाया गया। पर हत्थों का आकर या फोटो की सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी या दोनों ही, कुछ ऐसी थी कि जैसे ही फोटो को छोडो वो नीचे की ओर सरकने लगती। व्यवहारिक ज्ञान के लिए विज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। विभाग के चपरासी ने कहीं से एक चादर ला कर उसे कुर्सी पर बिछा दिया तब जा कर फोटो टिक सकी। अब माला पहनाने की बारी थी। लेकिन जैसा हमारी मानक टीमों में होता है, दायें हाथ को ये खबर नहीं होती कि बायाँ हाथ क्या कर रहा है। बायें को फोटो लाने को बोला गया और दायें को माला। और दायें-बायें की आपस में कभी बात भी नहीं हुयी। माला फोटो की तुलना में छोटी थी, सो अपनी सहज बुद्धि का परिचय देते हुये प्राचार्य महोदय ने माला फोटो के इमैजिनरी चरणों में अर्पित कर दी।      

कार्यक्रम शुरू हो गया। वक्ताओं में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के प्रति अपने प्रबुद्ध उद्बोधनों से उपस्थित श्रोताओं को मुग्ध करने की होड़ सी मच गयी। पाठक जी बचे-खुचे कार्यक्रम को सकुशल निपटाने में व्यस्त हो गये। कार्यक्रम अपने अंतिम चरण पर था जब पाठक जी का ध्यान राशिद की ओर गया। वो पिछली कुर्सी पर निढ़ाल पड़ा था। आँखें पलट कर कूटस्थ में टिकीं हुयी थीं। हाथ-पैर पसारे बेहोश पड़े राशिद को देख पाठक जी के हाथ-पैर फूल गये। आज का दिन किसी भी तरह से उनके अनुकूल नहीं था। किसी तरह आयोजन निपटा कर वो मंच से राशिद भाई की ओर भागे। "राशिद भाई - राशिद भाई आप ठीक तो हैं।" मियाँ राशिद की तन्द्रा टूट गयी। बोले - "बड़े ही ज्ञानवर्धक और ओजपूर्ण व्याख्यान चल रहे हैं।" पाठक जी को आज पता चला कि जान में जान आना किसे कहते हैं। बोले - "व्याख्यान तो ख़त्म हो गए हैं।चलिये हाई -टी का आनन्द लेते हैं। आपके आगमन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।" 

सभी के साथ वो दोनों भी उस दिशा में बढ़ लिये जहाँ हाई-टी सर्व की जा रही थी। 

- वाणभट्ट   

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रेम दिवस: श्याम सिंह की अधूरी कहानी

तब तक बाबा वैलेंटाइन का आविर्भाव भारत की धरा पर नहीं हुआ था। ये कहना मुश्किल है कि उस दौर में देश, प्रेम के प्रभाव से मुक्त्त रहा होगा। प्रेम पर ग्रन्थ और महाकाव्य आदि काल से यहाँ लिखे जा चुके थे। वैलेंटाइन बाबा के दादा-परदादा की औकात नहीं थी कि हिंदुस्तानी प्रेम की ए-बी-सी भी समझ पाते। सोलह कला सम्पन्न भगवान यहाँ द्वापर में ही डेरा डाल चुके थे। क्यूपिड की अवधारणा भी हमारे कामदेव से चुराई हुयी लगती है। बसंत के आगमन के साथ ही शरद ऋतु में सोयी पड़ी सभी आकांक्षायें और अपेक्षायें अंगड़ाई लेना शुरू कर देतीं हैं। कवियों ने इस माह को ऋतुराज का सम्मान ऐवें ही नहीं दे दिया। इस मौसम का आना और प्रेमीजन का बौराना, यहाँ का एक चिरंतन सत्य रहा है। 

जिस प्रकार हर भारतीय अपनी पुश्तैनी श्रेष्ठता मनोग्रन्थि से पीड़ित रहता है, इस बात को सौ फीसदी गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि बाबा वैलेंटाइन ने कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुये प्रेम दिवस का पूरा कॉन्सेप्ट ही हाइजैक कर लिया। अगर ये उनका ओरिजिनल आइडिया होता तो क्या वैलेंटाइन डे बसन्त ऋतु में ही पड़ता। अक्टूबर-नवम्बर में यह दिन मनाया जाता तो कोई नयी बात होती। ये तो हमारी नयी पीढ़ी की विशेषता है कि अपने स्वर्णिम अतीत को पूरी तरह झुठला देना चाहती है। हर चीज़ के लिये पश्चिम की ओर मुँह बाये देखती रहती है। जिस देश में सुर-ताल भी नियम-कानून से आबद्ध रहता हो वहाँ प्रेम की मर्यादायें भी भली-भाँति परिभाषित थीं। ये माउस-कम्प्यूटर-फेसबुक वाली जेनेरेशन अपनी विरासत को अन-डू करने पर आमादा है। पर इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। जवानी हमेशा दीवानी होनी ही चाहिये। सदैव नयी संभावनाओं की तलाश का ही नाम है, जवानी। सपने देखने का हौसला और उन्हें पूरा करने की ज़िद। जैसे नीम-पुदीना-तुलसी-अदरक-हल्दी हमारे पेटेंट हैं वैलेंटाइन डे पर भी हमें दवा ठोंक देना चाहिये। मुझे यह कहने में कतई गुरेज़ नहीं है कि बाबा वैलेंटाइन ने हमारा ही आइडिया चुरा के कई मल्टीनेशनल कम्पनियों के माध्यम से हमें ही वापस बेच दिया। 

हर क्रिया-कलाप का सामाजिक के साथ-साथ एक आर्थिक पक्ष भी होता है। युवाओं में प्रेम का इतना बड़ा मार्केट खोज पाने में देशी उद्योग जगत पूर्णतः असफल रहा। चॉकलेट-कार्ड-गिफ्ट का सिलसिला, जो पूरे हफ़्ते चलता है, शनै-शनै एक अच्छे-ख़ासे व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है। कभी-कभी तो ये लगता है कि ये मल्टीनेशनल कम्पनियाँ न आतीं तो हमारे युवाओं का क्या होता। अपने लिये सच्चा प्यार खोज पाना इस पीढ़ी के लिये कितना कठिन होता। 

ऐसा नहीं है कि पुराने ज़माने में लोग प्रेम-सुख से वंचित रहे हों। को-एड स्कूलों में पढ़ने का और कोई फ़ायदा रहा हो या न रहा हो, एक फ़ायदा ज़रूर होता था, बच्चों में प्रेम के प्रति अनुराग कम उम्र में ही विकसित हो जाता था। जितने भी प्रेमीजन हुआ करते थे, उन्हें किताबों और नोट्स की अदला-बदली का बहाना मिल जाया करता। ये बात अलग है कि अक्सर इस प्रकार का प्रेम इसी अदला-बदली तक ही सीमित रहता और कोई तीसरा गिफ्ट-विफ्ट पकड़ा कर बाज़ी मार जाता। टीचर-माँ-बाप और हितैषी पड़ोसियों कारण कितने ही प्रेम असफल रह गये कहना कठिन है। आठवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते टीन तो लग ही जाता था। उस पर तुर्रा ये कि कई साल के दो-चार फेलियर लडके-लड़कियों को उभरते प्रेमीजन बतौर कंसल्टेंट रख लेते। मर्यादा का तो ये आलम था कि टीचर्स केचुओं के निषेचन का पाठ स्किप कर जातीं। लडके उन पन्नों अंकित शब्दों को समझने का प्रयास करते। लड़कियाँ बगल में बैठे गहन अध्ययन में व्यस्त लड़के के उन पृष्ठों पर यूँ नज़र डालतीं मानो अश्लील साहित्य हो।  

श्याम सिंह। हाँ, यही नाम था उसका। आठवीं कक्षा में चार बार फेल होने के कारण उन्हें हमारी कक्षा की शोभा बढ़ाने का भी मौका मिला। बताने वाले बताते थे, श्याम सिंह किसी रईस बाप की औलाद है और कहने वाले कहते कि श्याम सिंह का दिल हमारी क्राफ्ट टीचर पर आ गया है। इसलिये पास होना नहीं चाहता। आठवीं तक ही था, हमारा स्कूल। उसके बाद लड़कों के जीआईसी में एडमिशन लेना होता। जिसका हौवा उसी तरह था, जैसे इण्टर के बाद आईआईटी का। उस समय दिल के आने का मतलब भी समझ से परे था। गाहे-बगाहे जो फिल्में देखने का मौका मिलता उनमें भी मर्यादा का समवेश मर्यादा की पराकाष्ठा तक रहता। प्रेमी युगल दूर-दूर खड़े हो कर गाना गाते, तो फूल टकराते, तोते चोंच लड़ाते। ऐसे में केचुए के बारे में ना पढ़ा कर हमारे गुरुजनों ने हमारे साथ जो अन्याय किया उसकी नयी शिक्षा व्यवस्था में गुंजाईश नहीं है। 

एक दिन बरखा मैम बहुत गुस्से में थीं। "श्याम सिंह हाथ निकालो"। श्याम सिंह ने दाहिना हाथ सामने कर दिया। मैम ने आव देखा न ताव लकड़ी के स्केल से तड़ातड़ मारना शुरू कर दिया। श्याम सिंह का हाथ लाल हो गया लेकिन बन्दे ने उफ़ तक नहीं की। अमूमन एक-दो स्केल खाने के बाद आम छात्र अपना हाथ दायें-बायें-पीछे खींचने लगता। लेकिन श्याम सिंह ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हाथ के ऊपर स्केल पड़ते रहे पर उसके चेहरे पर शिकन का नामोनिशान भी न था। उसकी बेख़ौफ़ नज़रें मैम के चेहरे पर टिकी थीं। वो चेहरा जेहन में अभी भी ज़िंदा है। हमेशा शांत-संयत और मधुर स्वभाव वाली बरखा मैम को वैसे गुस्से में किसी ने नहीं देखा था। वो श्याम सिंह को घसीटते हुये प्रिंसिपल के रूम में घुस गयीं। 

उस दिन के बाद श्याम सिंह को किसी ने नहीं देखा। कक्षा के खोजी पंडितों ने बताया कि अगले दिन डस्टबिन में लिपस्टिक-पाउडर-चूड़ी-बिंदी-माला पड़े मिले थे। चॉकलेट-कार्ड्स का प्रचलन उस ज़माने में होता तो श्याम सिंह उसी क्लास में दो-चार साल और फ़ेल हो सकता था। 

- वाणभट्ट   

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

केजरीवाल का होना

इस लेख को आज लिखा जाना ज़रूरी है। क्योंकि यहाँ कल क्या हो किसने जाना। बीजेपी का एग्जिट पोल को अतिविश्वास के साथ नकारना ईवीएम की विश्वसनीयता को कम कर रहा है। कोई भी बटन दबाओ और कमल खिलाओ। खैर आज तो आप के लिये जश्न का दिन है। 

बीजेपी की लहर में आप का ये प्रदर्शन कहीं न कहीं भारत में प्रबुद्ध होते प्रजातंत्र की ओर इशारा कर रहा है। जब वोट की बात हो तो सभी पार्टियों को भारत के मज़दूर-किसान याद आने लग जाते हैं। और चुनाव बीतते ही विकास का वो मॉडल दिखाया जाता है जो उद्योग और पूँजीपतियों के लिये ज़्यादा मुफ़ीद होता है। आम आदमी अपने को ठगा सा महसूस करता है। पूंजीवादी मॉडल में गरीब को उतना ही मिलता है जितना पूंजीवादी के हाथ में सिमट नहीं पाता। जैसे बाँध से छलकता पानी। स्थिति वही बनी रहती है, क्या नहायें और क्या निचोड़ें। और पूंजीपति पाँच सितारा होटलों में भारत की ग्रामीण-कृषि-सामाजिक अर्थव्यवस्था पर अपने उदगार व्यक्त करते नज़र आते हैं।  

इस देश में कांग्रेस से आज़ादी में अन्ना हज़ारे-रामदेव-केजरीवाल की तिकड़ी का बड़ा योगदान रहा है। कई साल इस तिकड़ी ने कांग्रेस के लिये ताबूत बनाने का काम किया। किन्तु अफ़सोस इस बात का है कि सत्ता में आने के बाद एक जोड़ी सारा क्रेडिट लूटने पर आमादा है। तत्कालीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी श्रेय देना होगा कि उन्होंने जनमानस और आरएसएस की इबारतों को पढ़ा-समझा। कठिन दौर था वो भी जब कांग्रेस सत्ता के मद में चूर थी। मोदी पर उनके व्यक्तिगत आक्षेप जितना बढे, मोदी का कद उतना ही बढ़ता गया। समीकरण कुछ ऐसे बने कि पार्टी एक मज़बूत सरकार बनाने में सफल हो गयी। परन्तु पार्टी ने जिस तरह गैर विचारधारा वालों के लिए अपने द्वार खोल दिये उससे तय हो गया मानो सत्ता पाने के लिये मूल्यों से समझौता ही एक मात्र विकल्प रह गया हो। भारतवर्ष में इकलौती दूसरी राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण लाभ ज़रूर मिला, जो पार्टी को जनता ने प्रचंड बहुमत से जिताया। ऐसा ही कुछ दिल्ली के चुनाव में होता नज़र आ रहा है। केजरी को लक्ष्य करके चलाये तीर बूमरैंग करते प्रतीत हो रहे हैं।

बी पॉजिटिव। हाँ जी, आज के ही नहीं, पूरे और पुराने भारत में भी इस देश का ब्रह्मवाक्य रहा होगा। अन्यथा इतने विशाल जनमानस वाला देश इतने लम्बे अरसे तक गुलाम न रहता। ये निगेटिव लोग ही थे, जो हर बात पर पूछते रहते कि यूँ होता तो क्या होता। उन्होंने सत्ताओं को चुनौती दी। उन्होंने व्यवस्था में सुधार की गुंजाइशों को तलाशा। ये राइट टु इनफार्मेशन, राइट टु एजुकेशन, राइट टु वर्क, राइट टु फ़ूड इत्यादि-इत्यादि मुददे यूँ ही नहीं उछले। किसी ने थाली में परोस के नहीं दे दिया इनको। बहुतों ने इन विचारों के लिये आहुतियाँ दीं। उनके नाम हम जान पायें या न जान पायें। पर निश्चय ही ये लोग पॉजिटिव एटीट्यूड लोग नहीं थे। यह वर्ग अंग्रेज़ों के समय उनका वफ़ादार था और कांग्रेस के समय उसका। हमेशा सत्ता और पद के साथ। ये निगेटिव लोग ही थे जिन्होंने संस्था की कमियों की ओर इंगित किया। उन्हें इस धृष्टता का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। ये वो सनकी सोल्जर्स थे जो अपनी विचारधारा के प्रति कृतसंकल्प थे। हमारी पुरानी आदत है कि हम तभी प्रतिभा पहचान पाते हैं, जब उसे ब्रूकर-मैग्सेसे-नोबल मिल जाता है। कैलाश सत्यार्थी के विचारों से सम्मत लोगों की संख्या में रातों-रात इज़ाफ़ा हो गया। नोबल ने उन्हें ही नहीं देश को भी एक नयी पहचान दी। लेकिन उनके संघर्ष की दास्ताँ रोंगटे खड़े कर देती है। बच गये सो नोबल मिला वर्ना नाते-रिश्तेदार भी यह कहते फिरते कि सर-फ़िरा था।  

ऐसा ही एक सिपहसालार है केजरी। अमिताभ की फिल्में में एक आदमी पूरी व्यवस्था पलटने का माद्दा रखता था। सत्ता और ताकत से लूटा-पिटा आम आदमी उसे हिट करा देता था। ऐसा ही कुछ भारतीय राजनीति में होने को है। यहाँ से ये भी तय होगा कि राजनीति मुद्दों पर होगी, व्यक्तियों पर नहीं। 

कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे में ढल गये 
कुछ लोग थे कि वक़्त के साँचे बदल गये - (मेरा नहीं है)

- वाणभट्ट         

शनिवार, 10 जनवरी 2015

आफ्टर एफेक्ट ऑफ़ पी के

साइड एफेक्ट्स तो बहुत देखे होंगे पर आफ्टर एफेक्ट का असर और भी बुरा होता है। ख़ास तौर पर जब आप उम्मीदों के सैलाब पर जज़्बातों की नाव खे रहे हों। शायद वाणभट्ट पहला व्यक्ति था जिसने 'पी के' के पहले पोस्टर से ही प्रभावित हो कर फिल्म की अनुशंसा इस आधार पर कर दी थी कि विधु भाई का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड, खामोश, परिन्दा, परिणीता, मुन्ना भाइज़ आदि-इत्यादि, बहुत ही उम्दा था (कृपया लिंक http://vaanbhatt.blogspot.in/2014/08/blog-post.html देखें)। सारे अख़बारों के रिव्यूज़ से ज़्यादा बच्चों की ज़िद मुझे भी हॉल तक घसीट ले गयी। अमूमन मुझे फिल्में देखना तभी अच्छा लगता है जब हॉल में हमारे अलावा कम ही लोग हों। सन्डे के दिन सारा परिवार पीछे पड़ गया कि 'पी के' दिखाओ।लिहाज़ा नेट से ही पिक्चर बुक करने बैठ गया। पर ये क्या पास के हॉल की सीटें सभी शोज़ के लिये बुक हो चुकीं थीं। अब तो मेरी इच्छा भी बलवती हो गयी। सभी अख़बारों और फेसबुकिया कमेन्ट्स ने फिल्म के काफ़ी कसीदे पढ़ रक्खे थे। रात नौ से बारह वाला टिकट किसी दूर के हॉल में मिला तो चौरासी रुपये नेट हैंडलिंग चार्जेज़ के बाद छः सौ रुपये में बुक कर दिये। नेट से परचेज़ वालों को डिस्काउन्ट की बीमारी होती है, लिहाज़ा ये चौरासी रुपये थोड़े खले भी पर विधु-आमिर-हिरानी की जोड़ी हावी थी, उस पल। 

इस फिल्म का साइड एफेक्ट तो हॉल में ही शुरू हो गया था। नींद भी आ रही थी और सरदर्द भी। लॉजिकल लोगों की फिल्म में लॉजिक निकालने की कोशिश करता रहा। पर शुरू से अंत तक ऐसा कोई दृश्य मेरी समझ में नहीं आया। फिल्म शुरू होती है एक नंगे एलियन से। इस धरती पर व्याप्त सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य से ज़्यादा उन्नत प्राणी की कल्पना कर पाना मेरी सहज बुद्धि से परे था और रहेगा। इतना दिमाग दिया है ऊपर वाले ने कि अपनी नस्ल को छोड़ के अन्य सभी जीव-जन्तुओं की नस्ल सुधार रहा है। जब अंतरिक्ष यान से आदमी उतरता देखा तो तसल्ली हुयी कि मेरी धारणा से ये टीम इत्तेफ़ाक़ रखती है। पर ये क्या। एलियन भाई बिना कपड़े के ही धरती पर अवतरित हो गये। अगर मानव की प्रगति के बारे में देखा जाये तो भूख-आग पर काबू पाने के बाद उसे अपने कपड़ों की ही चिंता हुयी होगी। और बाकि जो तरक्की आपको दिखाई दे रही है वो तन ढँकने के बाद ही शुरू हुयी होगी। क्योंकि सारी तरक्की के मूल में कहीं न कहीं स्त्री-पुरुष विभेद अवश्य रहा होगा। वर्ना कपड़ों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती। पूरी की पूरी सृष्टि ही परस्पर विपरीत ध्रुवों पर टिकी है। विज्ञान के जितने नियम और तत्व अब तक हमारे साइंसदानों ने धरती पर खोजे हैं वो पूरे ब्रम्हांड के लिये अटल सत्य की तरह हैं। धरती कोई अनोखा ग्रह नहीं है जहाँ की फिसिक्ज़-केमिस्ट्री-बायोलॉजी अन्य ग्रहों से अलग होगी। अपनी वैज्ञानिक सोच के मद्देनज़र मै किसी ऐसे अनोखे ग्रह की अवधारणा कर सकने में मै सक्षम नहीं हूँ। क-ख-ग सीखे बिना कोई भाषा सीख जाये। एक-दो-तीन किये बिना कोई गणनायें करने लग जाये। तो मै ये नहीं मान सकता कि सभ्यता के न्यूनतम मानक जानने-मानने वाले ग्रह के लोग अंतरिक्ष यान बना सकते हैं। जिस गोले पर लोग ख़ुद नंगे घूम रहे हों वो रिमोट से चलने वाला यान बना लें और उसका संचालन ऐसे व्यक्ति को सौंप दें जो स्वयं किसी अनजान ग्रह पर जा रहा हो, नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है। 

हाथ पकड़ कर जो डाटा ट्रांसफर कर लेते हों वहाँ  प्रभु की अलौकिक माया से वंचित रह जाना आश्चर्यचकित कर सकता है। बंदा हाथ भी पकड़ता था तो कन्याओं का। वेश्या का हाथ पकड़ के बन्दे ने भोजपुरी सीख ली पर हिलती कारों का रहस्य उसे समझ नहीं आया। यदि वह एलियन था तो उसकी उत्पत्ति का भी कोई कारण रहा होगा या सिर्फ विचार ट्रांसफर से ही वहाँ बच्चों का जन्म हो जाया करता हो। स्त्री-पुरुष में संभवतः फर्क वहाँ भी होगा। वर्ना उसके मन में अनुष्का जैसी युवती के प्रति ही अनुराग क्यों उत्पन्न हुआ। जिस बन्दे में इंसानियत हो, इमोशन हो, प्यार हो, नफरत हो वो किसी अज्ञात शक्ति (भगवान) के अनुभव से वंचित रह जाये, असंभव सा लगता है। दिल्ली में इतनी हिलती कारें हैं तो हमारे नटवर लालों की इस धरती को धिक्कार है जो उतरे हुये कपड़ों के लिये भी तरसते हैं। उसे भगवान और बाबा तो दिखे किन्तु भूखे-नंगे भिखारियों की फ़ौज नहीं दिखी। क्या वे एकदमै लपू-झन्ने हैं जो बेवजह ठण्ड में कड़कड़ाते घूमते हैं।  

चूँकि भाई लोगों ने पैसा कमाने के एक मात्र उद्देश्य से धर्म को तर्क की कसौटी पर कसने का प्रयास किया है तो वाणभट्ट के विचार से 'पी के' को भी तर्कसंगत होना चाहिये। मसाला फिल्मों का तर्क से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता ये तो सिर्फ बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रख कर बनायीं जातीं हैं। भीड़तंत्र में जो भीड़ इकठ्ठा कर ले वो सफल। नेता हों या अभिनेता हों, पीर हों या बाबा हों, सब वर्षों से आम जनता को सपने ही तो बेचते आये हैं। आम आदमी दुःख-संताप में जीवन बिता रहा है। जो उसकी आँखों में हसीन सपने जगाने में सफल हो गया वो हिट हो गया। पैसा कमाने के लिये विवादित मुद्दों को उठाया जाता है। उसके पोस्टर जलाये जाते हैं। जाने-माने विश्लेषक फिल्म का विश्लेषण करते हैं। फिल्म सुपर-डुपर हिट हो जाती है। नए कीर्तिमान बनाती है। चूँकि बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों ने समीक्षा में अपनी-अपनी कलम तोड़ दी है, आम आदमी को लगता है अगर उसने फिल्म की बुराई कर दी तो बुद्धिहीनों की श्रेणी में न जाये। इसलिये कहता घूमता है वाह-वाह क्या बात है। किन्तु उसको मालूम है उसका फुद्दू खींच दिया गया है। अब ज्ञानी होने का ढोंग तो करना ही पड़ेगा। यही भगवान के घर होता है। यही भगवान के ठेकेदारों के यहाँ होता है। कॉलेज में जब लड़के किसी वाहियात फिल्म में अपना पैसा और समय बर्बाद करके आते थे तो खूब बढ़-चढ़ के उसकी तारीफ करते थे। जब बाकि भी देख आते थे तो एक दूसरे को देख-देख मुस्कराते थे और नये लडके का बकरा बनाते। 

फिल्म वालों की बेसिरपैर की गल्प के पीछे  है तर्क ये है कि भाई हम तो सिर्फ और सिर्फ इंटरटेन करने के लिये फिल्में बनाते हैं। कम से कम आम आदमी तीन घंटे के लिए अपने दुःख-दर्द भूल कर सपनों की दुनिया में खो जाता है।यही काम तो भगवान और उनके एजेंट भी करते हैं। एक बाबा ने कहा सत्य ही ईश्वर है। एक ने कहा शांति में ईश्वर का वास है। अगर उनकी मान लो तो तीन घण्टे क्या पूरे दिन-महीने-साल गुज़र जायेंगे वो भी बिना पैसा खर्च किये। फ्री का इंटरटेनमेंट और रंग भी चोखा। हिलती कार और स्ट्रॉबेरी कंडोम में फूहड़ हास्य खोज पाना मेरे बस की बात नहीं थी। हर प्राणी में ज्ञान का आविर्भाव तो अंतर से ही होगा। तब तक इसे चाहे कोई भी मूर्ख बना ले। चाहे बाबा, चाहे फिल्म वाले। जब कथानक में दम होता है तो पब्लिसिटी की ज़रूरत नहीं  होती। इस टीम ने अपनी किसी पूर्व फिल्म की मार्केटिंग में इतना व्यय नहीं किया होगा जितना 'पी के' के प्रमोशन में। करोड़ों कमा लिये इसके लिए बधाई। सवा सौ करोड़ लोगों के देश में एक करोड़ बेवकूफ बना लो तो सौ करोड़ हो जाता है। सीधी गणित है। आपने तीन करोड़ लोगों को इंटरटेन दिया तो सारे रिकॉर्ड टूट गये। वो फुद्दू दुबारा आपके बहकावे में अगली बार न भी आएं तो मार्किट बहुत बड़ा है। भविष्य में मै इस टीम से लॉजिकल इंटरटेनमेंट की उम्मीद करता हूँ। भगवान बहुत पर्सनल अनुभूति हैं। जहाँ कहीं भी मानव सभ्यता होगी कुछ न कुछ मान्यतायें भी अवश्य होंगी। हाँ जिस सभ्यता ने न्याय-व्यवस्था, नियम-कानून का मानकों के रूप में अनुपालन कर लिया वहाँ सब भगवान हो जाएंगे और फिर भगवान को पूछेगा कौन? 

सच्चे फाँसी चढ़ते वेखे, झूठा मौज़ उड़ाये,
लोकी कहिन्दे रब दी माया, मै कहन्दा अन्याय,
ते कि मै झूठ बोल्याँ…  

- वाणभट्ट 

रविवार, 21 सितंबर 2014

निज भाषा बनाम राष्ट्र भाषा

पंडित जी ने हिकारत से अपनी टूटी चप्पल कल्लू मोची की ओर फेंक दी। 'रे कलुआ, जरा दू ठो टाँका मार दे।' कल्लू तन्मयता से कुछ काम कर रहा था। चप्पल धप्प से उसकी निहाई के बगल में  गिरी। उसने सर उठाया और गुस्से को पीते हुए पंडित को तरेरा। बोला कुछ नहीं। फिर घिसी-पिटी चप्पल को देखने लगा। बोला 'पंडित जी दू रुपया लागी।' पंडित जी के आग लग गयी। 'कस में अब हमहू का पैसा देबे के पड़ी।' 'तो फिर खुदै टाँक लो।' कह के कल्लू अपने काम में लग गया।

बिसेसर ने एक झटके से बाल्टी कुयें में डाल दी और पानी खींच रहा था जब किसी ने पीछे से उस पर लाठी का प्रहार किया। 'सरउ तुम्हार ई हिम्मत कि ठकुरन के कुआँ से पानी लेबो।' बिसेसर रस्सी-बाल्टी छोड़ के मारने वाले से भिड़ गया। 'तुम्हार कुल ठकुरई घुसेड़ देबै।' तब तक कुछ और लठैत आ गये। पीट-पीट के भुरकस भर दिया और हाते के बाहर फेंक दिया। लेकिन बिसेसर ने गाँव में चिंगारी सुलगा दी थी।

'लाला मेरे बाप के बाप ने ऐसा कौन सा कर्जा लिया था कि सूद चुकाते-चुकाते मेरा बाप निपट गया। अब भी मूल जस का तस है। मै कुछ नहीं देने वाला।' लाला तैश में आ गया। 'सूद तो तेरे फ़रिश्ते भी चुकायेंगे। जानता नहीं मेरा खाता यमराज का खाता है। मरने पर ही ख़त्म होता है।' घसीटे का हाथ लाला के गिरहबान तक पहुँच गया। 'बोल कब पहुंचा दूँ यमराज के पास। काट मेरा नाम अपने खाते से।' युवा खौलता खून देख के लाला की आत्मा काँप गयी।

आज़ादी के अड़सठ वर्ष बाद हम अपनी उस स्वतंत्रता पर गर्व कर सकते हैं जो अंग्रेजों की ग़ुलामी से मिली। लेकिन हज़ारों-लाखों ऐसी छोटी-बड़ी लड़ाईयाँ भी लड़ीं गयीं, जिनका कहीं ज़िक्र, कहीं चर्चा तक नहीं हुयी। पर इन्ही लड़ाइयों ने भारतीय समाज को वो स्वरुप दिया, जो आज हमारे सामने है। दीन और निर्धन व्यक्ति भी आज अपनी अस्मिता को लेकर जागरूक हो गया है। जो सपना भारत के नीति-नियंताओं ने देखा था, उसने कब मूर्त रूप ले लिया पता ही नहीं चला। आज मज़दूर और कामगार के साथ भी लोग न्यूनतम शिष्टाचार का पालन करते हैं। उन्हें इस बात का भान है मात्र पैसे से आदमी को अब क्रय नहीं किया जा सकता। स्वतन्त्रता स्वतः नहीं मिलती। इसके लिये हर देश में हर पीढ़ी को मोल चुकाना होता है। बहुत से लोगों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों-असमानता को दूर करने के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी है। कहावत, रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था, हर देश-काल में सत्य सिद्ध हुयी है। आज हम जिस भी सामाजिक उन्नति को देख रहे हैं, उसके लिये अनेकानेक उच्च-निम्न-निर्धन-धनाढ्य समाज सुधारकों का त्याग और बलिदान शामिल है। ये सूची अंतहीन है और इसी सूची में कल्लू-बिसेसर-घसीटे के नाम मिल जायेंगे। बहुत कुछ हो चुका लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी भी सर्वत्र विषमतायें अनायास दीख पड़तीं हैं। किन्तु जिस दिशा में देश बढ़ चुका है, निसंदेह वो दिन अवश्य आयेगा जब स्वतन्त्र भारत का प्रत्येक नागरिक वर्षों पुरानी सामाजिक विषमताओं से मुक्त होगा। नयी विषमतायें भी निर्मित हो सकतीं हैं, किन्तु कम से कम पुरानी से तो छुटकारा मिलेगा। 

प्रति वर्ष जब हिंदी पखवाड़े का शुभारम्भ होता है, तो भारत की भाषायी स्थिति भी मुझे सामाजिक स्थिति से अलग नहीं दिखती। साल में पन्द्रह दिन तो हिंदी-प्रयोग के प्रोत्साहन हेतु कार्यक्रम होंगे, उसके बाद ठन-ठन गोपाल। विद्वत सभाओं में हिन्दी का मर्सिया पढ़ा जायेगा। कुछ केले और समोसे डकार के लोग फिर अंग्रेजी के गुणगान में लग जायेंगे। वही ढाक के तीन पात वाली बात। वर्षों की पराधीनता ने हिन्दी ही नहीं देश की समस्त भाषाओं की नींव को हिला के रख दिया है। हर कोई अंग्रेजी भक्त बना घूम रहा है। अंग्रेज़ी आज भी प्रशासन और राज-काज की भाषा बनी हुयी है। कभी हाथी माने एलिफैंट हुआ करता था, अब एलिफैंट माने हाथी बताने पर अभिवावक तीन वर्षीय बालक को दिये अपने अंग्रेजी ज्ञान पर आत्म-विभोर हो जाते हैं।शिक्षा के लिए अभी भी हमारे छात्रों को विदेशी भाषा पर निर्भर रहना पड़ता है। विज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अभी भी मान्यता प्राप्त करने के लिये पश्चिम की ओर देखने को विवश हैं। अधिकांश शोध जब विश्व बैंक द्वारा प्रदत्त ऋण पर निर्भर हैं, तो शोधपत्रों का प्रकाशन तथा प्रतिवेदन भी अंग्रेजी भाषा पर ही तो निर्भर रहेगा। भारत उन्नति के जो स्वप्न आज विदेशी निवेश से देखे और दिखाये जा रहे हैं। वो हमारे ज्ञान और क्षमता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं। हम अपने देश में स्वाधीनता के बीज बोना चाहते हैं, विदेशी तकनीक और विदेशी ज्ञान के आधार पर। हमारी नयी पौध द्वारा हिन्दी के स्थान पर हिंग्लिश का प्रयोग एक सुखद अहसास तो देता है। परन्तु हम अंग्रेजी में पारंगत न हो सके और अपनी राजभाषा हिन्दी भी हाथ से जाती रही। स्थिति त्रिशंकु जैसी है। न घर के न घाट के। 

किन्तु हमारी मिटटी में कुछ बात तो अवश्य है कि परिस्थितियाँ कितनी भी विषम रहीं हों, अनेक प्रयासों के बाद भी कोई हमारी हस्ती को मिटा नहीं पाया। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये भी बहुत संघर्ष हुए हैं। तब जा कर हिन्दी को बहुत पहले सितम्बर १४, १९४९ राजभाषा का अधिकार मिला है। किन्तु तब से ये दिन हिन्दी दिवस के रूप में औपचारिकता बन के रह गया है। इस दिवस की घोषणा के लिये भी कम पापड़ नहीं बेले गये होंगे। जितने लोगों ने स्वतंत्रता के लिये झंडे गाड़े होंगे उतने ही लोग हिन्दी के लिये समर्पित हुये होंगे। किसी ने हिन्दी में शपथ ली होगी तो किसी ने हिन्दी के प्रोत्साहन के लिये पर्चे बाँटे होंगे। किसी हिन्दी में शोध-प्रतिवेदन लिख डाला तो किसी ने अंग्रेज़ी स्कूलों का बहिष्कार किया। किसी ने अंग्रेजी सभा में अंग्रेजी बोलने से मना कर दिया तो किसी ने हिन्दी भाषा में व्यावसायिक परीक्षा के प्रश्नों के उत्तर लिख डाले। हिन्दी के लिये आंदोलन भी हुये और जलसे भी। तब जा कर बात पखवाड़े पर सहमति बनी होगी। हम अपनी बोल-चाल, चाल-ढाल, जाति-धर्म के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि उसके लिये हम मरने-मारने-आंदोलन-फ़तवे-जिहाद सब के लिये तैयार हैं, किन्तु देश के लिये मरने का काम भगत सिंहों और चंद्रशेखर आज़ादों के लिये छोड़ रखा है। जितनी सम्वेदना अपनी जाति-धर्म-भाषा को लेकर है उतनी यदि देश के प्रति होती तो अंग्रेज़ कितने दिन यहाँ ठहर सकते थे। किन्तु उन्होंने हमारी विषमताओं को हवा दी। देश को भाषा-धर्म-जाति के आधार इस तरह बाँटा कि स्वतन्त्रता के अड़सठ साल में भी हम उन्हीं विवादों में अटके हुये हैं। अनेकता में एकता यदि है तो क्या देश हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान पर एक नहीं हो सकता। हिन्दू से मेरा अभिप्राय हिंदुस्तान के नागरिकों से है। किन्तु ये सहज बात भी विवाद बन जाती है। और यही बात हमारे देश-प्रेम पर प्रश्नचिन्ह खड़े करतीं है। हिन्दी पखवाड़ा कब हमारे जीवन को रूपांतरित करेगा, हर हिन्दी प्रेमी उस दिन की उत्कंठा पूर्वक प्रतीक्षा कर रहा है।

स्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों, किन्तु बादलों के उजले किनारे चमक रहे हैं। सभी देशी और विदेशी भाषा साहित्य, और चलचित्र आज अनुवाद और डबिंग के माध्यम से हिन्दी भाषियों को सहज उपलब्ध है। सभी विदेशी कम्पनियाँ अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी भाषा में कर रही हैं। विदेशी खेल और समाचार चैनेल हिन्दी में कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। कारण व्यावसायिक हो सकते हैं किन्तु इन कंपनियों के विपणन सर्वेक्षण इन्हें हिन्दी में प्रचार-प्रसार के लिए बाध्य करते हैं। यह एक शुभ संकेत है। आशा के स्वर और भी मुखर हो जाते हैं जब देश के प्रधानमन्त्री और मन्त्री, विदेशी भूमि पर अपनी बात बुलंदी के साथ हिन्दी में रखते हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के उत्थान के लिये पखवाड़े मनाना कहाँ तक उचित है, यह वाद-विवाद का विषय हो सकता है। किन्तु इन क्षेत्रों में गैर-हिंदी भाषी को प्रोत्साहित करना हिन्दी दिवस मनाने का एक प्रयोजन अवश्य होना चाहिये। अहिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिन्दी के विकास हेतु इस पखवाड़े का महत्त्व बढ़ जाता है। साल में मात्र पंद्रह दिन एक भाषा का प्रयोग करके हम एक भाषा में निपुण नहीं हो सकते, न ही उस भाषा से प्रेम कर सकते हैं। काश कि हम इन प्रदेशों में हिन्दी-वर्ष मनायें। देश के सभी महान विचारकों ने हिन्दी को भारत को जोड़ने वाली भाषा कहा है। थोड़े सरकारी सहयोग, प्रोत्साहन और जन-अभियान से वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त होगा।

सामाजिक सरोकारों के लिये जिस तरह कल्लू, बिसेसर और घसीटे जैसे अज्ञात लोगों ने छोटी-छोटी किन्तु निर्णायक लड़ाइयाँ लड़ीं। वैसी ही लड़ाईयाँ हिन्दी के लिये भी लड़ीं जा रहीं हैं। एक प्रश्न मैं सदैव पूछता हूँ कि यदि आज अँग्रेज़ों का राज होता तो हम किस तरफ़ होते। जिस दिन हम अपनी व्यक्तिगत अस्मिता को, भाषा और देश की अस्मिता से जोड़ देंगे, हिन्दी विश्व-पटल पर राज करने के लिये सक्षम हो जायेगी। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाने के लिये हमें क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। एक राष्ट्र भाषा, जो विश्व-भाषा बनने का सामर्थ्य रखती हो, के लिये सम्पूर्ण देश को एकमत होना होगा। अन्यथा पखवाड़े का अंत भी वही होता रहेगा, जैसा हमारे देवी-देवताओं का होता है। कुछ दिनों के लिये प्राण-प्रतिष्ठा फिर विसर्जन। 

भारतेंदु जी की पीड़ा इन शब्दों में सहज अभिव्यक्त होती है "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल"। वो भी सन १८७० के आस-पास। संघर्ष जारी है और रहेगा, हिन्दी के हिन्द की जन-भाषा बनने तक। फिर इसे राष्ट्र-भाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता। 

- वाणभट्ट      

जागृत निन्द्रा

'अंधे ने अंधे को टक्कर मारी और आँख वाले ने छड़ी बदल दी'. ये डायलॉग सन् पचहत्तर में आयी किसी फ़िल्म में चटकाया गया था. डायलॉग जैसा डाय...