जब मै मीटिंग में घुसा तो कुछ देर हो चुकी थी. लंगूर की शक्ल का वर्मा बॉस गुस्से में भरा बैठा था. गुस्से में वो चिम्पांजी जैसा लग रहा था. उसकी शक्ल ही कुछ बनमानुस सी थी. मुझे उसका चेहरा देख कर हँसी आ रही थी. पर वो डैम सिरियस था. लग रहा था कम्पनी का सारा दारोमदार उस एक बेचारे पर है. मै भी मनहूस सी शक्ल बना कर कोने वाली सीट पर बैठ गया. कहीं मुस्कराता देख कर पारा और न चढ़ जाये, इसलिये ये मुलम्मा चढ़ाना जरूरी था.
बॉस बोल रहा था, बोल क्या रहा था चीख रहा था कि अगर सब लोग इसी ढर्रे पर चलते रहे तो हो गया कम्पनी का बेडा ग़र्क. कम्पनी को ऊपर उठाने के लिए उसने जी जान लगा रक्खी है, पर नीचे वाले हैं कि पूरे मौज मस्ती में लगे रहते हैं. कोई काम समय पर नहीं, कोई टार्गेट नहीं, जब देखो बहानेबाजी, अरे भाई मै जब तुम्हारी उम्र का था तो दिन-रात एक कर देता था. तभी कम्पनी ने मेरे काम को देख कर धडाधड प्रोमोशन दिया. मै सीनियर मैनेजर कि कुर्सी तक ऐसे ही नहीं पहुँच गया.
मैंने फुसफुसा के अपने पडोसी से पूछा यार अजेंडा क्या है. उसने भी फुसफुसा के जवाब दिया - अबे, अगर कोई काम की बात निकल आये तो उसे ही अजेंडा समझ लेना. मुझे तो नींद आ रही है. रात बीवी क्लास ले रही थी, अब ये. वैसे भी जब इसकी प्रोसीडिंग निकलेगी तो उसे पढ़ लेना. अभी तो ये पास्ट टेंस मोड़ में चल रहा है. पूरी कहानी दोहराने में एक-आध घंटे तो निकल ही जायेंगे. जगा देना.
शर्मा जी ने भी देर से एंट्री मारी. कर्मठ आदमी थे. बॉस को लगता था कि ऊपर मैनेजमेंट की नज़र में ये ना आ जायें इसलिये अपनी कृपा नहीं, वक्र दृष्टि हमेशा बनाये रखता था. शर्मा जी को देखते ही उसकी आँखों में एक चमक सी आ गयी. मौका भी था और दस्तूर भी.
"क्या शर्मा, इज़ थिस द टाइम टु रीच. आप जैसा सीनियर अगर लेट आयेगा तो नये इम्प्लाईज़ क्या इम्प्रेशन पड़ेगा".
"सर जो आपने अर्जेंट रिपोर्ट माँगी थी, वही तैयार कर रहा था. इसी से थोड़ी देर हो गयी". शर्मा जी ने से संयत सा जवाब दिया.
"एक तो देर से आते हो और बहाने बनाते हो. अपनी गलती मान लेने से कोई छोटा तो नहीं हो जाता है". बॉस बात का बतंगड़ बनाने के मूड में था. "हम लोग भी इतने सालों से कम्पनी के साथ काम कर रहे हैं. पर क्या मजाल की अपने बॉस को कभी रिप्लाई दिया हो. तुम बहस कर रहे हो. डोन्ट यू नो हाउ टु टाक तो योर सीनियर्स".
शर्मा जी एक निहायत ही शरीफ़ और सज्जन इंसान थे. कंपनी के प्रति वफ़ादार. अपने सीनियर्स को रोज़ कंपनी को चूना लगाते देखा करते थे. इसलिये उन्हें कंपनी के प्रति अपनी वफ़ादारी पर कुछ गुमान भी था. लगता था जिस दिन इनका कच्चा-चिटठा बड़े मैनेजर के सामने रक्खूँगा इस वर्मा की तो ऐसी-तैसी हो जायेगी. पर सोचते थे कि नौकरी है तो किसी न किसी की चाकरी भी करनी पड़ेगी. इसलिए चुप रह जाते.
पर उस दिन वो इस उम्मीद में थे कि शायद बॉस उन्हें रिपोर्ट टाइम पर खत्म करने कि शाबाशी दे. इसलिये भड़क गये. "सर मै सारा-सारा दिन कंपनी के काम में खटता रहता हूँ. कल आप ही ने कहा था कि रिपोर्ट आज मेरी टेबल पर होनी चाहिये. फिर मीटिंग जरूरी है या रिपोर्ट. मीटिंग में जो भी होता है, प्रोसेडिंग में तो आ ही जाता है. मेरे आने या न आने से क्या फ़र्क पड़ जाता."
वर्मा खुश हो गया. तीर सीधे निशाने पर लगा है. "शर्मा ये तुम्हारे घर कि खेती नहीं है कि जब जी में आया मुँह उठाया, चले आये. हर चीज़ का तौर-तरीक़ा होता है. मीटिंग है तो टाइम पर आना ही पड़ेगा. रात में रिपोर्ट निपटा लेते, किसी ने रोका तो नहीं था. हम भी कभी जूनियर हुआ करते थे, पर कभी बॉस को शिकायत का मौका नहीं दिया. और तुम हो कि ज़ुबान लड़ाते हो. आई विल राइट तो माय बॉस अबाउट थिस मिसबिहेव". शर्मा जी को सन्न करने के लिये इतना डोज़ काफी था. मीटिंग अपनी दिशा भटक चुकी थी.
शर्मा जी नौकरी का महत्व समझते थे. और ये भी समझ रहे थे कि वर्मा को आज मौका मिल गया, जिसका उसे बरसों से इंतज़ार था. प्राइवेट नौकरी थी, सरकारी होती तो साले को दो कंटाप मार देते, फिर लिखा-पढ़ी चलती रहती. बड़ी मुश्किल से ये जॉब मिला था. आज शाम को जेब ढीली करनी होगी. बार एंड रेस्टोरेंट में वर्मा के साथ बैठने की बात सोच कर भी उसको उबकाई सी आने लगी. पर मरता क्या न करता, मीटिंग के बाद शाम का प्रोग्राम बना लिया.
अगले दिन प्रोसीडिंग शर्मा जी को भी मिली. अजेंडा तो कहीं कुछ नहीं था. बस उनके डिस्कशन का ही जिक्र था. लिखा था शर्मा ने सबके सामने वर्मा को बुरा-भला कहा. क्यों न इसके विरुद्ध अनुशाश्नात्मक कार्यवाही की जाये. शर्मा को लगा शाम की बियर मूत में बह गयी. वर्मा साला बहुत ही हरामी निकला. बीवी का गुस्सा, बच्चों की फीस और माँ-पिता का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया.
मूड अपसेट हुआ पर उसके पास भी हर जोड़ का तोड़ था. अब वो बॉस के बॉस के पास जायेगा. वर्मा का कच्चा-चिटठा लेकर. और बतायेगा कि वर्मा किस तरह से कंपनी को चूना लगा रहा है. साला वर्मा कल तक मेरे पास माफ़ी माँगने ना आया, तो मेरा भी नाम नहीं. तभी किसी ने शर्मा को बताया कि तुम तो शाम को बियर पिला के निकल लिये थे. बाद में ठाकुर के घर पर बैठक थी, दारु की. खाने के साथ. मै भी था. ठाकुर ने वर्मा को चढ़ाया कि मौका अच्छा है, मत चूको चौहान. ये ठाकुर वही था, जिसे शर्मा के रिकमेंडेशन पर कम्पनी ने रक्खा था. खैर ये सब तो लगा रहता है. प्राइवेट में नंबर बनाने कि जुगत में तो सभी लगे रहते हैं.
उसी शाम, दिन ढलने के बाद शर्मा पीटर स्क्वाच की पूरी बोतल ले कर बड़के बॉस के घर कच्चा चिट्ठा खोलने के इरादे से पहुँच गया. तो देखा वर्मा और ठाकुर तो पहले से मौजूद हैं. गप्पें चल रहीं हैं. शर्मा को देखते ही सब मुस्कराये. बड़का बॉस बोला "यार शर्मा तुम बहुत ही समझदार आदमी हो. मेरी मन-पसंद ब्रांड की बोतल लेके आये हो. जाओ जा के केऍफ़सी से मुर्गे की टाँग भी ले आओ. ठाकुर तुम भी साथ चले जाओ. जल्दी आना."
बॉस और बॉस के बॉस के साथ जाम टकराते हुए शर्मा-वर्मा-ठाकुर के सारे गिले-शिकवे मिट चुके थे. चियर्स कहते हुए शर्मा के सर से बड़ा बोझ हट चुका था.
-वाणभट्ट
dilchasp
जवाब देंहटाएंस्पेशलिस्ट लगते हो यार :-).....शुभकामनायें !!
जवाब देंहटाएंकोर्पोरेट दुनिया का यही दृश्य है। इमानदारी का अकाल है । अनुशासन दिखाते हैं और जताते हैं। ऊंचे ओहदे पर हैं इसलिए नीचे वालों को लज्जित करते हैं। एक बोतल बियर में पिघल जाते हैं। शर्मनाक।
जवाब देंहटाएंचलो...अंत भला तो सब भला ।
जवाब देंहटाएंsatish ji, chhuta nahin hoon par dekhata to hoon...
जवाब देंहटाएंsushil ji, ye to ek ghatna hai...ant aate-aate to sharma ji ko pata nahin kya-kya karna hoga...
dhanyavaad rashmi ji, divya ji...
वाणभटट जी नमस्कार,
जवाब देंहटाएंआपका लेख पोल खोलने वाला है,
ऊँची दुकान फ़ीके पकवान वाले इस दुनिया में बहुत है,
ज्यादातर आसानी से मिल जायेंगें।
आपसे एक अनुरोध कि आप दूसरो के व अपने ब्लाग पर भी टिप्पणी हिन्दी में ही देने का कष्ट करे।
waah , realy very nice
जवाब देंहटाएंवाणभट्ट जी, आपकी कथा-लेखन की शैली बड़ी ही रोचक है। लगता है पुनः वाणी वाणो बभूव।
जवाब देंहटाएंचलो जी आप भी हिन्दी में शुरु हो गये।
जवाब देंहटाएं‘अगर कोई काम की बात निकल आये तो उसे ही अजेंडा समझ लेना.’...अकसर मीटिंग्स में ऐसा होता है...ढेर सारा तामझाम और नतीज़ा सिफ़र...
जवाब देंहटाएंबहुत करारा व्यंग है...
हार्दिक बधाई...
hahahha meeting hoti hi aisi hai....aur office ki ye politics ...bahut saral tareeke se samjha di aapne.
जवाब देंहटाएंइसे कहते हैं ईटिंग, मीटिंग और चीटिंग....
जवाब देंहटाएंपहली बार आपके ब्लॉग पर आया अच्छा लगा
जवाब देंहटाएंवाणभट्ट जी, आपकी कथा-लेखन की शैली बड़ी ही रोचक है!
आपसे एक अनुरोध कि कृपया जाट देवताजी की बात माने....