शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

कुर्सी और चमचों का खेल

प्रथम एआई जेनरेटेड कविता...


कुर्सी का मोह निराला है, जिसने सबको पाला है,

इस चार पाँव की लकड़ी ने, जाने कितनों को डस डाला है।

सिंहासन पर जो बैठ गया, वो ख़ुद को ख़ुदा समझता है,

पर असली खेल तो पीछे बैठा, 'चमचा' ही रचता है।


चमचागिरी वो विद्या है, जिसमें बिना पढ़े ही डिग्री है,

साहब की हाँ में हाँ मिलाना, बस यही इसी की फ़िक्री है।

साहब जो कहें "दिन है अभी", तो चमचा "सूरज" लाता है,

साहब कहें "अँधेरा है", तो वो "तारे" गिनवाता है।


बिना धार के चाकू सा, ये मक्खन ख़ूब लगाता है,

मेहनत करने वाला पीछे, और ये आगे बढ़ जाता है।

एक हाथ में निष्ठा है, और दूसरे में स्वार्थ का प्याला,

चमचागिरी के दम पर ही, आज कल होता है उजाला।


पर याद रहे ओ कुर्सी वालों, ये चमचे बड़े सयाने हैं,

जब पाँव डगमगाते कुर्सी के, ये सबसे पहले बेगाने हैं।

आज तुम पर निछावर हैं, कल किसी और पर होंगे,

ये 'चमचे' कभी भी वफ़ादार, किसी दौर के नहीं होंगे।


वाणभट्ट 

(Credit to Google AI...😊) 

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