क्रान्तियाँ अचानक घटित नहीं होतीं. इनके नेपथ्य में होती है, लक्ष्य को प्राप्त करने की एक समग्र दृष्टि और दिशा. इनमें निहित होता है, स्वार्थरहित सन्घर्ष और त्याग. सर्वोपरि होती है, देश और समाज कल्याण की भावना. एक समय ऐसा भी था, जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था. खाद्यान्न उत्पादन देश की बढ़ती जनसँख्या की खाद्य आपूर्ति करने में सक्षम नहीं था. इसके लिये आयातित अनाज पर निर्भर रहना पड़ता था. देश की बढ़ती जनसँख्या के समक्ष खाद्य सुरक्षा एक प्रश्नवाचक चिन्ह बन कर खड़ी थी. तब समाधान के भी समस्त प्रयास आरम्भ हुये. खाद्यान्न आत्मनिर्भरता में अधिक उत्पादकता वाले उन्नत बीजों ने मुख्य और केन्द्रीय भूमिका निभायी. ये उन्नत प्रजातियाँ कृषि में किये गये निवेश (Inputs), खाद-पानी, के प्रति संवेदनशील थीं. अतः हरित क्रान्ति सम्भव हो सकी, सिंचित क्षेत्र के बड़ी जोत वाले समर्थ किसानों के द्वारा जो खाद और पानी का निवेश वहन करने में सक्षम थे. इस क्रांति में नीति-नियंताओं की भूमिका को भी कम करके नहीं आँका जा सकता. कृषि शोध का शीर्ष नेतृत्त्व तत्कालीन प्रशासन में इस विश्वास को स्थापित करने में सफल रहा कि उचित प्रोत्साहन के द्वारा ही खाद्यान्न आत्मनिर्भरता सम्भव है. न्यूनतम समर्थन मूल्य, सुनिश्चित ख़रीद, भण्डारण क्षमता और सार्वजानिक वितरण प्रणाली का विकास आदि कारणों के कारण हरित क्रान्ति घटित हो सकी. यदि हरित क्रान्ति के घटकों को सूचीबद्ध किया जाये, तो वह निम्नवत होगी:
1. उच्च उत्पादकता वाले उन्नत बीज
2. खाद की उपलब्धता
3. पानी की सुविधा
4. अधिक जोत वाले समृद्ध किसान
5. न्यूनतम समर्थन मूल्य
6. सुनिश्चित ख़रीद
7. सुरक्षित भण्डारण
8. सार्वजानिक वितरण प्रणाली
इस क्रान्ति को हरित क्रान्ति तब घोषित किया गया जब खाद्यान्न उत्पादन में हुयी वृद्धि, जनसाधारण की थाली तक पहुँची. यदि समग्र दृष्टि डाली जाये तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि किसी भी खाद्य सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये हरित क्रांति के सभी घटकों का समावेश अवश्य होना चाहिये. निसन्देह इसमें उन्नत बीजों की मुख्य भूमिका है. वर्तमान परिवेश में कृषक की आय-वृद्धि को एक और घटक के रूप में जोड़ा जाना आवश्यक है. कृषि आधारित उद्योगों के लिये आवश्यक है कि वे कृषक कल्याण की दिशा में भी अपना योगदान दें.
हरित क्रांति के बाद ही दुग्ध उत्पादन की श्वेत क्रान्ति भी देखने को मिली. श्वेत क्रान्ति ये यह सिद्ध करने में सफल रही कि सहकारिता और सहभागिता से भी क्रान्ति संभव है. उपलब्ध संसाधनों का यदि समुचित उपयोग किया जाये तो वर्तमान चुनौतियों और परिस्थितियों को क्रान्ति में परिवर्तित किया जा सकता है. दुग्ध क्रान्ति का मूल, दुग्ध उत्पादकों के संजाल (नेटवर्क) निर्माण और उनके व्यवसायिक हित-लाभ के संरक्षण में निहित है. इसे कोआपरेटिव क्रान्ति की संज्ञा भी दी जा सकती है, जिसमें उत्पादक से लेकर उपभोक्ता तक सभी हितधारकों का लाभ सुनिश्चित करते हुये, एक जीत-जीत स्थिति (Win-Win Situation) का निर्माण किया गया. समय के साथ दुग्ध क्रान्ति का ये कॉपरेटिव मॉडल और सशक्त और सुदृढ़ हुआ है. सम्भवतः यह एक प्रशंसनीय और अनुकरणीय आदर्श उदाहरण है, जिसे कृषि उत्पादन के किसी भी क्षेत्र में स्थापित किया जा सकता है.
वर्तमान युद्ध, वर्तमान में उपलब्ध उपकरणों और संसाधनों से ही लड़ना होगा. भविष्य की तकनीक हमें नवोन्मेषी कार्यों के लिये प्रेरित अवश्य करती हैं, किन्तु वर्तमान समस्याओं का समाधान वर्तमान तकनीकों से ही सम्भव है. यही बात दलहन आत्मनिर्भरता के विषय में भी लागू होती है. नीति-नियन्ताओं ने इस दिशा में अपनी कार्यान्वयन योजना को मूर्तरूप देना आरम्भ भी कर दिया है. दिशा-निर्देश के अनुसार दहलन उत्पादन के लिये उपयुक्त क्षेत्रों के चिन्हीकरण का कार्य आरम्भ भी कर दिया है. शासन और नीति निर्धारक अब शोध और विज्ञान की ओर आशावान दृष्टि से देख रहे हैं. भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुये दलहन आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में प्राप्त करने का निश्चय किया गया है. अतः दलहन शोध को भी स्पष्ट रूप से अपनी संस्तुतियों के साथ आगे आना होगा. जलवायु परिवर्तन सहिष्णु, कीट और रोग अवरोधी, उच्च उत्पादन और पौष्टिकता वाली प्रजातियों का विकास की दिशा में पारम्परिक और अनुवांशिक प्रजनन पद्यातियाँ निश्चय ही एक आशान्वित भविष्य की ओर इंगित करती हैं, किन्तु आज की परिस्थितियों से निपटने के लिये कोई स्पष्ट संकेत देने में सक्षम नहीं हैं. बहुत से विषय वस्तु विशेषज्ञ अपनी-अपनी दिशाओं में प्रयास कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है समन्वित (Integrated) और समेकित (Consolidated) प्रयास की. आवश्यकता है कि आज दलहन उत्पादक क्षेत्रों में प्रचलित और संस्तुत प्रजातियों का कठोर स्क्रीनिंग की. स्क्रीनिंग का उद्देश्य अधिक से अधिक प्रजातियों का चयन करने की अपेक्षा अस्वीकरण होना चाहिये. प्रत्येक प्रजाति को उत्पादकता कीट-रोग प्रतिरोधकता के साथ ही यदि विशिष्ट गुणवत्ताओं का भी समावेश हो तो निश्चय ही कम प्रजातियों का चयन होगा, किन्तु वो श्रेष्ठ होंगी. रंग, आकार, छिलके और दाल का अनुपात, पकने में समय, प्रोटीन व अन्य तत्वों की मात्रा आदि विशिष्टताओं को भी सम्मिलित कर लिया जाये तो निसंदेह चयनित प्रजातियों की संख्या में कमी आयेगी. प्रजातियों को उनके अन्तिम उपयोग जैसे शीघ्र अंकुरण, अधिक पफिंग, कम तेल सोखने, अधिक फ्लेकिंग, फेर्मेंटेशन के लिये उपयुक्तता आदि विशिष्टताओं, के अनुसार वर्गीकृत भी किया जा सकता है. एक देश ने भारतीय प्रजाति की देसी गायों को संवर्धित करके उनके दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया वो भी दूध की पौष्टिकता और गुणवत्ता को बिना प्रभावित किये. इसी प्रकार स्थानीय प्रजातियों के विकास की प्रक्रिया अपनाना चाहिये, ताकि उत्पादन में वृद्धि प्रजाति की गुणवत्ता को प्रभावित न करे और वो शीघ्रता से उस क्षेत्र में स्वीकार्य हो जाये. प्रायः ये देखने को मिलता है कि नयी प्रजातियों की संस्तुति के बाद भी, कृषक पुरानी प्रजातियों को ही उगा रहा है. कारण बीज की उपलब्धता तो है ही साथ में उसका समय-सिद्ध भरोसा भी है. स्थानीय प्रजातियों को उन्नत करना उन्हें सहज स्वीकार्य बनायेगा.
कम प्रजातियों का सीधा सम्बन्ध उच्च गुणवत्ता के बीजों की उपलब्धता से है. प्रकृति ने पहले से ही अनुवांशिक विविधता की व्यवस्था बना रखी है. अधिक क्षेत्र में एक ही प्रजाति की खेती से न केवल फसल प्रबंधन में सहायता मिलेगी अपितु फसल उत्पाद की एकरूपता, प्रसन्स्करण के लिये अधिक उपयुक्त होगी. कुछ अन्य कृषि प्रधान देश विस्तृत भूमि पर एक ही प्रजाति की फसल लेते हैं. जिसके कारण उनके लिये मशीनीकरण सहज हो जाता है. इससे समय और श्रम प्रबन्धन भी आसन हो जाता है. भारत दलहन का सर्वाधिक उत्पादक और उपयोगकर्ता देश है. आन्तरिक दलहन आवश्यकता की आपूर्ति के लिये दलहन आयात आज की आवश्यकता है. कुछ देश भारत के लिये ही दालों का उत्पादन कर रहे हैं. हजारों हेक्टेयर में उत्पादित एक ही प्रजाति की उपज भारतीय प्रसंस्करणकर्ताओं को भी आयातित उपज के उपयोग के लिये प्रेरित करती है. भारत आमों के उत्पादन में एक अग्रणी देश है, किन्तु अधिकांश प्रसंस्करणकर्ता आम का पल्प या कंसंट्रेट इसलिये आयात करते हैं क्योंकि बाहर से आने वाला उत्पाद एकसमान है, और उससे तैयार अन्तिम उत्पाद मार्केट में पसंद किया जाता है. यही बात दलहन की आत्मनिर्भरता पर भी लागू की जा सकती है.
दलहन आत्मनिर्भरता के सूत्र:
1. दलहन उत्पादक क्षेत्रों का चिन्हीकरण
2. क्षेत्र की प्रचलित और संस्तुत प्रजातियों की स्क्रीनिंग
3. उत्पादकता और गुणवत्ता के आधार पर एक या दो प्रजातियों का चयन
4. चयनित प्रजातियों का बीज उत्पादन
5. विस्तृत क्षेत्र में फसल उत्पादन
6. मशीनीकरण व फसल प्रबन्धन
7. विकेन्द्रित भण्डारण
8. ग्राम्य अंचल में प्रसंस्करण
प्रजातियों का विकास पृष्ठभूमि में निरन्तर चलते रहने की प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य कठोरतम स्क्रीनिंग के बाद कम से कम प्रजातियों का चयन होना चाहिये. फसल सुधार कार्यक्रम में उत्पादन और उत्पादकता के अतिरिक्त फसल प्रबन्धन और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यदि ड्रिप इरिगेशन, पंक्तिबद्ध बुआई, रिज प्लांटिंग, निपिंग, मृदा स्वास्थ्य आदि फसल प्रबन्धन तकनीकों से उत्पादकता में वृद्धि होती है, तो इनके लिये उत्पादन तकनीक का मानकीकरण करना आवश्यक है, ताकि सभी प्रजातियों को सामान प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियाँ मिलें. इनका परिक्षण मूल विकासकर्ता से भिन्न विषयवस्तु विशेषज्ञों द्वारा किया जाना अनिवार्य होना चाहिये.
वैज्ञानिकता की यवनिका के पीछे प्रायः विज्ञान और तार्किकता व्यर्थ हो जाती है. आज जब जैविक और प्राकृतिक खेती की बात होती है, तब अंग्रेज़ी भाषा में कृषि विषयों का अध्ययन करते के कारण अधिकांश वैज्ञानिक इनका विरोध करने पर बाध्य हैं, क्योंकि ये अवधारणायें इनकी शिक्षा के विपरीत है. ऐसी ही स्थिति एलोपैथी और आयुर्वेद के सन्दर्भ में पायी जाती है, जो एक सीमा तक सही भी है. वर्षों की शिक्षा सदैव नये ज्ञान के प्रति सशंकित रहती है. विज्ञान का काम है शंका का समाधान. पुरातन पद्यतियों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसने की आवश्यकता है. विज्ञान को सदैव नये विचारों के प्रति सहिष्णु और समावेशी होना चाहिये.
कृषि शोध का सम्पूर्ण परिदृश्य उन्नत बीजों के विकास पर सीमित हो कर रह गया. व्यवहारिक क्षेत्र में किये गये, मौलिक शोध की अन्तिम परिणति एक उत्पाद के रूप में होनी अत्यावश्यक है. चन्द्रयान प्रोजेक्ट को, अनेकानेक मौलिक विषयों जैसे गणित, भौतिकी, और रसायन शास्त्र के मौलिक शोध की वाह्य या प्रकट उपलब्धि कह सकते हैं, जिसमें अभियांत्रिकी विषयों ने भी अहम् भूमिका निभायी है. बीजों के विकास व चयन प्रक्रिया में अभियांत्रिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. श्रेष्ठ होता यदि फसल सुधारक इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते. ये स्थिति दुखद है, किन्तु आशा है जब उत्पादकता को कृषक आय और समृद्धि से जोड़ कर देखा जायेगा, अभियान्त्रिकी की आवश्यकता को बल मिलेगा.
दलहन आत्मनिर्भरता की चुनौती, वो भी निर्धारित समय सीमा में, से निपटने के लिये कृषि शोध को अधिक प्रभावी, अनुकूल और ग्रहणीय बनाने की आवश्यकता है.
-वाणभट्ट
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