वफ़ादारी शब्द आते ही धरतीवासियों के जेहन में सिर्फ़ एक ही प्राणी की शक्ल सामने आती है. जो नाराज़ हो तो भौंकता है, और प्यार करने पर आ जाये तो चाट-चाट कर मुहाल कर देता है. आपको देख के खुश हो जाये तो दुम हिला-हिला के जी हलकान कर दे. भगवान ने सभी प्राणियों को बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया, लेकिन इनकी कुछ हरकतों की वजह से इनका नाम गाली की तरह प्रयोग में लाया जाता है. लोग भी गुणों से अधिक अवगुणों पर ध्यान देते हैं. हिन्दुस्तान में तो जातक के जन्म लेते ही उसकी कुण्डली बनवाने का विधान है. उसमें उसकी योनि भी लिखी होती है. योनि किसी न किसी पशु पर आधारित होती है. यदि आपको किसी की योनि पता चल जाये तो ये एहसास भी होता है कि वो मनुष्य प्रायः उसी के अनुसार व्यवहार भी करता है. कन्फेर्मेटरी टेस्ट के तौर पर आप दूसरों की नहीं, अपनी ही चेक करके देख लीजिये. आपको लगने लगेगा कि आप में उस प्राणी (जानवर) के गुण विद्यमान हैं.
आदमी को भी यदि किसी दूसरे व्यक्ति के चरित्र को एक शब्द में बताना हो तो अक्सर किसी न किसी जानवर का ही नाम लेता है. अलाना तो एकदम गऊ है, फलाना बैल, उल्लू या गधा है. बस एक शब्द मात्र से लोग दूसरे के बारे में सब कुछ समझ जायेंगे. आगे कुछ कहने की ज़रूरत न होगी. लोग अपने आप उसके पूरे चरित्र का चित्रण कर लेंगे. वैसे भी आदमी की समस्या ही ये है कि वो अपने चरित्र से अधिक दूसरों के चरित्र पर नज़र रखता है. परन्तु आज जिस प्राणी का ज़िक्र करना चाह रहा हूँ, उस प्राणी के चाहने वाले उस पर जान न्यौछावर करते हैं, और न चाहने वाले उससे कहीं ज़्यादा नफ़रत करते हैं. प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले भी जब किसी व्यक्ति पर अत्यंत क्रोधित होते हैं, मनुष्य को उस प्राणी के नाम के साथ कुछ और सम्पुट जोड़ कर सम्बोधित करते हैं. आजकल कश्मीर से कन्याकुमारी तक गली-गली उनका आतंक फैला हुआ है. उनके लवर्स भी उसी तादात में बढ़ रहे हैं. इधर आपने किसी को 'के-के' शब्द कहा नहीं कि उधर आपके घर के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया. आपने आदमी को नवाज़ी जाने वाली संज्ञा (कमीने) को उसके नाम के साथ जोड़ने की गुस्ताखी कैसे कर दी. ये उस प्राणी का सरासर अपमान है. और हम उस प्राणी के प्रेमी इस अन्याय की पुरजोर विरोध और भर्त्सना करते हैं. अब तक आप समझ तो गये होंगे कि लेखक किस प्राणी की बात कर रहा है, लेकिन नाम लेने से घबरा भी रहा है.
मेरी क्या मजाल कि प्राणि-शिरोमणि का नाम अपनी ज़ुबान पर लाऊँ और पहले से खड़ी अपनी दुश्मनों की फ़ौज में इज़ाफ़ा करूँ. फ़िल्मों में अमिताभ की आवाज़ का लाभ उठाने के लिये स्पेशली भारी-भरकम डायलॉग लिखे जाते थे. किसी फ़िल्म में विलेन अमिताभ से कहता है कि - वफ़ादारी से काम करोगे तो बहुत आगे जाओगे. इस पर भाई अपनी गम्भीर आवाज़ में कहते हैं - सेठ, वफ़दारी चाहिये तो कुत्ता पाल लीजिये, मै तो आदमी हूँ सोच समझ कर काम करूँगा. डायलॉग का दम देखिये, फ़िल्म का नाम भूल गया लेकिन डायलॉग याद रहा. इस उम्मीद में कि कभी मौका मिला तो चिटकाऊँगा. लेकिन नौकरी में मौका ही नहीं लगा. हर एप्लिकेशन के नीचे लिखना पड़ रहा है - योर्स फेथफ़ुली. ये बात अलग है कि जब उपर वाले ही अपने देश-समाज के लिये फेथफ़ुल न हों तो नीचे लिखा फेथफ़ुल भी बस अंग्रेज़ी भाषा में लिखे प्रार्थना-पत्र की रस्म अदायगी मात्र रह जाता है. इस मामले में धरम पा जी थोड़े स्ट्रेट थे. जिसे तौलना हो बिना लाग लपेट के तौल देते. कुत्ते-कमीने मै तेरा खून पी जाऊँगा. जट्ट जो ठहरे.
आज लेखक पुन: एक बार फिर कुत्तों की ओर मुखातिब है. गलियों में आजकल इनकी संख्या बहुत बढ़ गयी है. सिर्फ़ हमारे मोहल्ले में नहीं. भारत के सभी राज्यों के सभी जिलों के सभी मोहल्लों की बात हो रही है. हम समस्याओं का पोषण करने में माहिर हैं. समस्या जब तक सर से नीचे रहती है, उसकी ओर ध्यान नहीं देते, और जब सर से उपर निकल जाती है तो कहते हैं कि अब क्या ही कर सकते हैं (इसी को नयी वाली हिन्दी कहा जाता है. पुरानी हिन्दी में अकारण ही जोड़ दें तो नयी हिन्दी बन जाती है. काम तो - अब क्या करें - से भी चल जाता).
शहर में उठाईगिरी और चोरी की वारदातें बढ़ रही थीं. पड़ोसी से मुलाक़ात और बोल-चाल तो शहर के ज़ेड स्क्वायर मॉल में ही होतीं. घरों के बीच इतनी ऊँची-ऊँची दीवारें जो बना लीं हैं. पता नहीं कानपुर में कितनी प्राइवेसी चाहिये लोगों को. हमारे इलाहाबाद में तो आज भी अड़ोसी-पड़ोसी के बीच चार फ़ुट की दीवार होती है. ग्लोबल सिटीजन होने के नाते, यहाँ भी मेरी दीवार तो चार फ़ुट ही रही. लेकिन पड़ोसियों को तो चोरों से सुरक्षा चाहिये. धूप और हवा के लिये भले ही सड़क पर खटिया डाल के बैठना पड़े. कुछ लोग तो इंतहा प्राईवेसी पसन्द हैं कि छत पर भी पडोसी उनको देख न सके. ऐसे लोगों के लिये ही बुर्क़ा इजाद किया गया होगा. दुनिया ढँकने के बजाय ख़ुद को ही ढँक लो.
देश ने तरक्की की तो लोगों की तरक्की भी होनी ही थी. पे कमीशंस का दौर चला तो हर नौकरी-पेशा आदमी को उसकी उम्मीद से अधिक धन मिलने लगा. तनख्वाह अधिक हो तो लोन आसानी से मिल जाते हैं. हमारे पिता जी ने भी लोन ले कर मकान बनवाया था. आज भी याद है कि लोन की किश्त चुकाने में हम लोग पूरा सीजन एक ही सब्जी पर काट देते थे. जो सीजन की सबसे सस्ती होती. लौकी का सीजन हो तो सुबह नाश्ते से लेकर रात के खाने तक दे लौकी, दे लौकी. नेनुआ, टिंडा और कद्दू तो इतना खाया कि अब तक वितृष्णा बनी हुयी है. आज ऐसी बात नहीं है. लोग मकान, कार और कम्प्यूटर का लोन एक साथ उठाते हैं. जो भी मकान बनवाना शुरू करता है तो दो मंजिल से नीचे रुकता नहीं है. पैसा है तो सिक्योरिटी भी तो चाहिये. एक मंज़िल पर ख़ुद रहेगा, दूसरी पर किरायेदार रखेगा. ताकि भविष्य में कभी बाहर जाना हो तो घर की रखवाली के लिये गार्ड पर खर्च नहीं करना पड़ेगा. इन्डिपेंडेंट मकानों की यही दिक्कत है. इस मामले में फ्लैट अच्छे होते हैं. पर घर की रखवाली के लिये किरायेदार ऐसा होना चाहिये जिसकी पत्नी घरवाली हो, दिन भर घर में रहती हो. घर सुरक्षित रहेगा तभी तो हम, पति-पत्नी, निश्चिंत हो कर नौकरी कर पायेंगे. धरती पर एक हम ही तो समझदार हैं नहीं. पूरा का पूरा मोहल्ला समझदार है. नतीजा, हर घर डबल स्टोरी. मकान ज़्यादा, किरायेदार कम. कभी-कभी तो लगता है कि बेकार में पैसा दूसरी मंज़िल में लगा दिया, उतना बैंक में डाल देते तो किराये से अधिक तो ब्याज मिल जाता और उस ब्याज से सेक्युरिटी वाले का खर्च निकल जाता.
किरायेदारों की भयंकर किल्लत होने के कारण घरों की सुरक्षा व्यवस्था चरमराने लगी. तब लोगों को लगा कि सुरक्षा के लिये किरायेदार न सही तो कुत्ता ही पाल लिया जाये. शुरुआत पामेरियन से हुयी थी. छोटा सा कुत्ता है. कोई घुसेगा तो कम से कम भौंकेगा तो. जहाँ लोगों की शान ही बड़ी कार से बनती-बढ़ती हो, वहाँ कुत्तों का कंप्टीशन भी होना ही था. किसी ने एलसेशियन पाला तो किसी ने लेब्राडोर, किसी ने जर्मन शेफ़र्ड, तो किसी ने गोल्डन रिट्रीवर. गाड़ी की ही तरह मेरा कुत्ता तुम्हारे कुत्ते से मँहगा और बड़ा. इंपोर्टेड कुत्ते के नाज-नख़रे भी अलहदा. उनका फ़ूड, उनका शैम्पू, उनका पार्लर, उनका एसी, उनका कमरा. मिडिल क्लास नौकरी पेशा लोगों को जल्दी ही समझ आ गया कि रईसी दिखाने के लिये बड़ी कार लेनी है तो शोफ़र भी रखो. कम से कम रोज कार पर कपड़ा तो मार देगा. नहीं तो शहर भर धूल-धूसरित कार ले कर घूमो. पार्किंग की जगह मिलती नहीं. बीवी तो शॉपिंग करे और आप कार में बैठे रहो. उसी तरह विलायती कुत्तों के ख़र्चे भी अफ़लातून. लोगों का जल्दी ही कुत्ते पालने से मन भर गया.
जब सब तरफ़ अंधकार हो जाता है तो कहीं न कहीं से आशा की किरण फूटती है. इन परिस्थितियों में गली के आवारा कुत्ते मसीहा बन के उभरे. घर में कुत्ता पालने से अच्छा है सड़क के कुत्तों को अपना लिया जाये. इन देसी कुत्तों की तो लॉटरी खुल गयी. हर घर कुछ न कुछ खाने को डाल देता. इस उम्मीद में कि कुत्ते वफ़ादार होते हैं, तो कुछ ख़्याल रखेंगे घर का, विशेषकर जब हम नहीं घर पर नहीं होते. आजकल जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी है, अशिक्षा भी परवान चढ़ रही है. कोई गाय और कुत्ते को रोटी खिला रहा हो, एकाएक सूरज को जल चढ़ाने लग जाये, चींटी को आटा डालने लगे, तो समझ लीजिये, किसी ग्रह-नक्षत्र की काट कर रहा है. औरों की क्या कहूँ, मुझे ही किसी ने मशविरा दिया कि वीआईपी की चड्ढी के ऊपर लाल लँगोट पहना करो तो शत्रु और बॉस काबू में रहते हैं. भगवान किसी मित्र को कभी किसी का बॉस न बनाये, बेवजह दुश्मनी हो जाती है. ये टोटका बहुत कारगर रहा है.
मोहल्ले का स्ट्रीट कुत्ता प्रेम इस कदर बढ़ गया कि हर किसी की ये समझ नहीं आ रहा कि वो कुत्तों के लिये क्या कर दें कि पूरे मोहल्ले के कुत्ते उनके वफ़ादार हो जायें. कोई सुबह-शाम दूध पिला रहा है, कोई पेडिग्री खिला रहा है. एक भाई तो रोज दर्जन भर अंडे लेकर कुत्तों के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करने में लगे रहते थे. कुत्तों की संख्या इतनी बढ़ गयी कि सड़क पर बच्चे कम कुत्ते अधिक दिखायी देते. जिसका गेट खुलता वो वहीं दौड़ पड़ते. सामने दुम हिलाते लोग किसे अच्छे नहीं लगते. इंसानों ने ये कला कुत्तों से ही तो सीखी है. सब का पौष्टिक भोजन खा-खा कर ये कुत्ते इसे अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझने लग गये. साल दो साल ऐसा भी दौर चला. धीरे-धीरे लोगों को लगने लगा ये कुत्ते तो दिन-रात बाहर घूम ही रहे हैं. खाना इन्हें भरपूर मिल ही रहा है, तो हम अपने ख़र्चे ही कम कर लें. कुछ लोगों के बच्चों और रिश्तेदारों को आवारा कुत्तों ने दौड़ा-दौड़ा के काट भी लिया था, इसलिये मारे गुस्से के उन्होंने कुत्तों को खाना देना बन्द कर दिया.
जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि सिर्फ़ हम ही समझदार थोड़ी हैं, पूरा मोहल्ला, क्या पूरा देश ही समझदारों का है. सैकड़ों साल की ग़ुलामी समझदार ही कर सकते हैं. बेवकूफ़ तो आज भी वतन पर मर-मिटने को तैयार हैं. सबने, कम से कम, ख़रीद कर तो सड़किया कुत्तों को खिलाना बन्द कर दिया. घर में जो बच जाता वही खिलाने की कोशिश करते. लेकिन माल खाने के आदी हो चुके कुत्ते सूखी रोटी भला क्यों खाते. नतीजा वे मालन्यूट्रीशन का शिकार होने लगे. अब उन कुत्तों में वो जोश-खरोश गायब था. रात भर भूख के मारे वे चिल्लाते-किचकिचाते. लोगों को लगता सुरक्षा कवच काम कर रहा है. दिन भर वे इधर-उधर पड़े सोते रहते. नींद इतनी गहरी कि सर पर स्कूटर पहुँच जाये तो इन्हें पता न चले. जरा सी आहट पर टूटने वाली श्वान निंद्रा जैसी बात नहीं बची थी. अब वो दुम तब ही हिलाते जब कोई उनका मन-पसन्द आहार ऑफ़र करता.
मोहल्ले वालों का सड़कीय कुत्ता प्रेम लगभग समाप्त था. एक बड़थ्वाल जी ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें कुत्तों से बहुत प्रेम तो नहीं था, लेकिन उन्हें उन बेचारों पर दया आती थी. पेडिग्री और अंडे तो नहीं, वो सुबह और शाम कुत्तों के लिये बिस्किट का इंतज़ाम रखते. वो कहते कि यदि ये कुत्ते रोटी खा लेते तो इन्हें मै भर पेट भोजन करा देता. लेकिन इन्हें भी मॉडर्न बच्चों की तरह उटपटांग चीज़े खाने की लत लग गयी है. रोटी नहीं खाते, पर बिस्किट चाव से खाते हैं. इनके चक्कर में रोज सौ रुपये सुबह और सौ रुपये शाम ख़र्च हो जाते हैं. सुबह और शाम जब बिस्किट का टाइम होता दसियों कुत्ते बड़थ्वाल जी के साथ पड़ोस में सोनकर की दुकान तक उन्हें गार्ड ऑफ़ ऑनर देते हुये ले कर जाते और बिस्किट खरीदवा कर वापस ले कर आते. बिस्किट वितरण उनके गेट पर ही होता. हर कुत्ते को एक पैकेट. कुत्ते ऐसी ऐसी मुद्रायें बनाते मानो इस जनम में उनके लिये बड़थ्वाल जी के ऋण से उऋण होना सम्भव नहीं है. बड़थ्वाल जी को भी एक संतुष्टि मिलती.
आज शाम जब टहल के लौटा तो उनके दरवाज़े पर कोई चहल पहल नहीं थी. एक भी कुत्ता नज़र नहीं आ रहा था. वो बालकनी में खड़े थे. बिना किसी विशेष प्रयोजन के मैंने पूछ लिया आज आपकी सेना दिखायी नहीं पड़ रही है. उन्होंने ने जो बताया उसे सुन कर कुत्तों पर से भी विश्वास उठ गया. भाई नवराते चल रहे थे, अभी कुछ दिन पहले ही ख़तम हुये हैं. उसके बाद से पार्क के उस पार रहने वाले श्रीवास्तव जी कसर पूरी करने में लगे हैं. दबा कर नॉनवेज का सेवन हो रहा है. अभी तक वो बची खुची हड्डियाँ कूड़ेदान में डाल देते थे. इस बार निस्तारण के लिये उन्होंने घर के बाहर एक तसला ला कर रख दिया है. चार दिन हो गये. कुत्ते बिस्किट खाने नहीं आये. जमाना बदल गया है. वफ़ादारी नाम की चीज़ ही नहीं रही.
जिन प्राणियों की मिसाल दी जाती थी, वफ़ादारी के लिये, जब उन्होंने ही वफ़ादारी को तिलांजलि दे दी हो, तो इंसान से इसकी उम्मीद करना बेमानी है. आदमी की परेशानी का सबब अब ये है कि वफ़ादारी की उपमा के लिये किस प्राणी का ज़िक्र करे.
-वाणभट्ट
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