मियाँ शेक्सपियर ने कभी फ़रमाया था कि गुलाब, गुलाब ही रहेगा चाहे, आप उसे किसी भी नाम से पुकारें. उनकी इस बात पर किसी फिरंगी के दिल और दिमाग़ में कोई कन्फ्यूज़न रहा हो, ऐसा नहीं लगता तो नहीं. दरअसल, विकसित देशों की ये ख़ासियत रही है कि उन्होंने किसी को महान मान लिया तो मान लिया. उसकी बधिया नहीं उधेड़ेंगे. हम भारतीयों की आदत है कि हम अपने आलावा किसी को महान मानने के लिये आसानी से राजी नहीं हैं. महान बनने और मानने के पीछे भी लॉबीयिंग होती है. एक पक्ष किसी को महान बनाने पर आमादा हो जाये तो दूसरा पक्ष उसके विरुद्ध सैकड़ों कारण ले कर खड़ा हो जायेगा. उसे महान मानने के औचित्य पर ही सवाल उठा देगा.
कंफ्यूज़न क्रियेट करने की हमारी बीमारी पुरानी है. हमारी अदालतें और अदालतों में वकील इसीलिये फल-फूल रहे हैं कि मुक़दमों को इस कदर उलझा दिया जाता है कि माननीय न्यायलय भी कन्फ्यूज़ हो जाता है कि सही क्या है और गलत क्या. इसीलिये साफ़-सुथरे केस भी बीसियों साल घिसटते रहते हैं. इसीलिये न्यायालयों का काम बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि हर तरफ़ काम ही काम है. और इसीलिये न्यायालयों में, इतना काम है, इतना काम है, इतना काम है कि कोई काम नहीं हो पा रहा है. डिमाण्ड होती रहती है कि न्यायधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जाये. ताकि लम्बित मामलों त्वरित रूप से निपटाया जा सके. तारीख़ बढ़ते जाने से आम जन मानस में अवधारणा बनती जा रही है कि पैसा और ताकत न्याय को प्रभावित कर सकती है. यदि अधिक फ़ीस वाला वकील या उच्चतर न्यायलय जाने पर न्याय बदल जाये तो फिर न्याय कहाँ रह जाता है. स्पेड तो स्पेड ही रहेगा चाहे वकील बदले या न्यायलय. तब कभी-कभी कबीलों की अलिखित कबीलायी न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी लगने लगती है. किसी लेखक ने इस दर्द को ऐसे बयाँ किया है कि जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसे न्यायलय जा कर लगता है कि न्याय तो मिला नहीं, बचा-खुचा अन्याय भी उसे मिल गया. जेल जाते समय, दुष्टतम से दुष्टतम, भ्रष्टतम से भ्रष्टतम, व्यक्ति भी अपनी न्याय प्रणाली पर विश्वास व्यक्त करने से नहीं चूकता. यदि उसे न्याय व्यवस्था पर विश्वास था तो गलत काम किया ही क्यों. पता नहीं चलता कि व्यवस्था की प्रशन्सा कर रहा है या उस पर कटाक्ष. पद, पावर और पैसे के दम पर दोषी व्यक्ति मूँछों पर ताव देता घूमता है कि हमार कोई का करिबे.
तो मामला ये है कि हमारी छिद्रान्वेषण की आदत है, तो क्या सही, क्या गलत हम अपने पक्ष या विपक्ष में होने के आधार पर तय करते हैं. यदि हम सरकार में हैं तो उनकी सौ प्रतिशत बातें सही हैं. और सरकार में नहीं हैं तो उनकी सारी की सारी गतिविधियों की आलोचना करना हमारा परम कर्तव्य है. सिर्फ़ इसलिये कि हम विपक्ष में हैं. आज कल एक नया प्रचलन बढ़ा है कि उन बातों को तोड़-मरोड़ कर ऐसे प्रस्तुत करो कि यदि इतिहास के घोषित महापुरुष यदि भारत की धरा पर पुनर्जीवित हो जायें, तो उनका अपने महान होने का भरम टूट जाये. इसके लिये किसी और का दोष नहीं है. इसके पीछे तर्क-कुतर्क करने की हमारी अनुवांशिक प्रवृत्ति है, जिसे फ्री डेवेलपमेंट की आधुनिक शिक्षा पद्यति ने पोषित और पल्लवित किया है.
'अ रोज़ इज़ अ रोज़' का जब से अंग्रेज़ीदाँ लोगों ने हिन्दी में तर्जुमा किया, हम हिन्दुस्तानियों ने इसे ब्रम्हवाक्य की तरह मान लिया। चूँकि ये बात विदेशी शेक्सपियर जैसे महान अँग्रेज़ी लेखक और नाट्यकार ने कही थी, तो उसे गलत मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. जो लोग अपने देसी महापुरुषों और उनके कथनों को हमेशा सशंकित दृष्टि से देखते हों, उनके लिये फ़िरंगी बयान अनुकरणीय बन जाते हैं. अपने नेताओं के वक्तव्यों की बाल की खाल उधेड़ने में कोई गुरेज़ नहीं है। विदेशियों का कहा कोटेशन हमारी समझ में जल्दी आ जाता है। उपनिषद-पुराण क्या कहते हैं, ये जानने-समझने के लिये हमारे पास समय नहीं है। पर ओबामा अगर 'यस यू कैन' कहता है, तो लगता है इससे पहले ये शब्द दुनिया की किसी भाषा में कभी भी नहीं कहे गये।
इस मामले में चीन और जापान का तो ज़्यादा पता नहीं पर निश्चय ही उनका विदेशी भाषा अज्ञान ही उनकी मूल संस्कृति के संरक्षण का कारण रहा होगा। उनकी जनता विदेशी कोटेशन्स के अनुवाद ही अपनी भाषा में सुनती या पढ़ती होगी। इसलिये कोट की मूल भावना की तह तक संभवतः नहीं पहुँच पाती हो। पर हमारा क्या, हम मुग़लों से ज्यादा मुग़ल और अंग्रेज़ों से ज़्यादा अंग्रेज़ हैं. ये हमारी सैकड़ों वर्षों की धुर गुलामी का परिचायक है कि फिरंगी ज़ुबान में कही बात हमारे दिल में गहरे बैठती है। बाकि हमारे प्राचीन ग्रन्थ सिर्फ हमारा मनोबल बढ़ाने के लिये उपयोग में लाये जाते हैं। हमारे पुरखों ने वेदों-उपनिषदों के ज़माने में ही हवाई जहाज की खोज कर ली थी। सूर्य तक की दूरी का अनुमान लगा लिया था। इह और उह लोक दोनों की बारीकियों से हम वाकिफ़ थे। ये तो हमने अपने ज्ञान का उपयोग करना उचित नहीं समझा वरना क्या अमेरिका क्या चीन सब हमारे आगे पानी भरते नज़र आते।
कभी-कभी जब राष्ट्रीय अस्मिता जागती है तो हम भी अपने पुरखों को महान बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते. हद तो तब हो जाती है जब हम उम्मीद करने लगते हैं कि हमारे पुरखे महान थे, इसलिये महान होना हमारा बर्थ राइट है। इस बात का किसी और के मानने न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बात हमारे जेहन में घुसी हुयी है। जो इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते उनकी देश भक्ति पर प्रश्नवाचक चिन्ह अवश्य लगाया जा सकता है. वे या तो इस देश की महान परम्परा के बारे में अनभिज्ञ हैं या भारत को विश्व गुरु मानने से उन्हें कोई बहुत बड़ा नुकसान होने की आशंका है। यदि सरकार की माने तो इसके पीछे आईएसआई या पाकिस्तान के हाथ हो सकता है, जो देश की जनता को अँधेरे में रखना चाहती है।
बाहर वालों के सामने हम भारतीय सम्मान-स्वाभिमान की कितनी भी डींगें हाँक लें पर अन्दर ही अन्दर हम पश्चिममुखी हैं। हर चीज़ पर पश्चिम के विकसित देशों की ओर टकटकी लगाये बैठे रहते हैं कि कब वो हमारे विचारो को एंडोर्स करें और कब हम देसी से वैश्विक सम्पत्ति बन जाये। वैश्विक होने के अपने फ़ायदे हैं। अपने देश का नमक तो बहुत खा लिया, विदेशों का नमक तभी चखने को मिलेगा जब हमारे विचार अमेरिका के विचारों से मेल खायें। चाहे ये विचार वैज्ञानिक हों या आध्यात्मिक। मुझे शक़ है कि हम अपने कई ऋषियों-मनीषियों को शायद न पहचान पाते अगर उन्होंने पश्चिमी देशों का रुख न किया होता। स्वामी विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानन्द, आचार्य रजनीश इत्यादि कोई अपवाद नहीं हैं। आज भी हम अपने वैज्ञानिकों और विचारकों को अंग्रेज़ी चश्मे से देखना पसंद करते हैं। अगर किसी ने अमरीका के उच्च श्रेणी की शोध पत्रिका में अपना शोध छपवा लिया तो हम उसको अवार्ड देने के लिए पलक-पाँवड़े बिछा के तैयार हो जाते हैं। अपनी भाषा के लेखों को हेय दृष्टि से देखना हमारी परम्परा बन गयी है।
विकसित देशों की सोच भी विकसित है। उनके द्वार अन्य देशों की प्रतिभाओं के लिये सदैव खुले रहते हैं। चाहे वो विद्या का क्षेत्र हो, चाहे खेल-कूद का। दूसरे देशों के प्रतिभा संपन्न लोगों के लिये उन्होंने बहुत सी छात्रवृत्तियाँ भी चला रखी हैं। हमारे यहाँ आज़ादी के सत्तर साल बाद भी आपकी योग्यता फिरंगी स्वीकार्यता पर निर्भर है। जब तक आप विदेशी जर्नल्स में अपने शोध पत्र नहीं छाप लेते आपके काम की कोई सराहना नहीं करेगा. जब आप जापान या जर्मनी में जा के वहीं काम करके, वहाँ के जर्नल में शोध पत्र छापते हैं, तो आपका काम लोकल नहीं ग्लोबल हो जाता है. आप जो भी काम करते हैं, उसे विदेशी शोध पत्र का तमगा मिल जाता है। हमारे जोगी-जोगना, जो दैवयोग और अपने सतत प्रयासों से वहाँ पहुँच गये, विदेशी ठप्पा लगवा के सिद्ध पुरुषों में शुमार हो गये। हमारे यहाँ सिद्ध भी उसी को माना जाता है, वैश्विक नज़र में सिद्ध है। हमारे अपनों की नज़र में चढ़ने के लिये ज़रूरी है कि हम विदेशी नज़रों में भी चढ़ें. इसके बिना हमारा काम नहीं चलता. चाहे टैगोर हों, चाहे रे, चाहे विद्यार्थी. कुल मिला के बात इतनी है कि यदि आप अपने को सिद्ध मानते हैं और चाहते हैं कि आपको और लोग भी सिद्ध मानें तो इसके लिये फिरंगियों के द्वारा चिन्हित किये जाना पहली शर्त है. फिरंगी भी आपको तभी सम्मानित करेंगे जब आप तन-मन से उनके विचारों को अपने देश में प्रचारित और प्रसारित करेंगे। इसके लिये उन्होंने धन का समुचित प्रावधान कर रखा है। धन वो आपको मुहैया कराने को तत्पर हैं ताकि वो हथियार बनायें, बम बनायें, तकनीकें विकसित करें, और उन्हें दुसरे देशों को बेचें. खाद्य और चिकित्सा के क्षेत्र में उनके शोध वृहद रूप से विकासशील देशों में होते रहें। चूँकि यहाँ भी विदेशी फण्ड की दरकार है तो यहाँ के शोध भी उन्हीं के विचारों का विस्तारीकरण है. फिर शोध में प्रयुक्त होने वाले विश्वस्तरीय उपकरण और यन्त्र और रसायन (जिनके बिना आपके शोध की प्रमाणिकता पर ही प्रश्न उठ जाता है) की सप्प्लाई भी तो उनके ही हाथ में है। इस तरह एक पंथ दो काज हो जाता है, उनके विचारों का वृहद स्वीकरण और, उनकी तकनीकों और उद्योगों का वैश्विकरण. जाने-अनजाने उनके लिये हम बाज़ार बन जाते हैं। तुर्रा ये की तश्तरी में अपनी तशरीफ़ फिरंगियों के हाथों सौंप कर हम गौरवान्वित महसूस करते हैं।
हम प्रेरणा के लिये भी पश्चिम की ओर देखते हैं. चीन-जापान-कोरिया अपनी भाषा अपने ज्ञान को प्रोत्साहित किया. उनकी तरक्की आत्मप्रेरित है. गुलामी ने हमारा अपनी ही योग्यता और ज्ञान पर भरोसा समाप्त कर दिया. भारत अपने पारम्परिक ज्ञान पर यदि आधुनिक दृष्टिकोण से शोध कार्य आरम्भ कर दे, तो निसन्देह कुछ समय-सिद्ध व्यवहारिक ज्ञान निकल कर आये. इसके लिये आवश्यक है कि हम अपनी भाषा में विज्ञान को बढ़ावा दें. जब भी कोई पारम्परिक खेती, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति या वैदिक विज्ञान की बात करता है, हमारे देश के ही अंगेज़ी में पढ़े-लिखे ज्ञानी विरोध के स्वर बुलंद करने लगते हैं. शासन द्वारा जैविक और प्राकृतिक खेती पर शोध को प्रोत्साहित करने के प्रयासों का सबसे मुखर विरोध वही कर रहे हैं, जिनके लिये अंग्रेज़ी में लिखा ज्ञान ही ब्रह्मवाक्य है.
भारत में ज्ञान की परम्परा के मूल में सर्वजन हिताय और सुखाय की भावना रही है. ज्ञान-विज्ञान का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिये करना, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है. अंग्रेज़ी में लिखा विज्ञान ही विज्ञान नहीं है. हिन्दी और संस्कृत में लिखा विज्ञान भी विज्ञान ही रहेगा. विदेशी भाषा में विदेशी ग्रंथों को पढने के साथ आवश्यकता है, अपने ग्रंथों का अपनी भाषा में अध्ययन और संकलन. अपनी सभ्यता और पुरखों की महानता पर गर्व करने के लिये ये आवश्यक भी है. वर्मा-शर्मा-मिश्रा से ही काम चला लेने वाले देश को पहले से मालूम है कि नाम में क्या रखा है.
-वाणभट्ट
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