शनिवार, 5 अप्रैल 2014

लोकतंत्र में विचारधारा का महत्त्व

लोकतंत्र में विचारधारा का महत्त्व


लेखक क्या है विचारों के बिना। अलबत्ता मुझे ये गलतफहमी कभी नहीं रही कि मै लेखक हूँ। पर गाहे-बगाहे कुछ इष्ट-मित्र मेरी पोस्टों पर अपनी टिप्पणियाँ दे कर मुझे अनुग्रहित करते रहते हैं। मै सदैव उनका हृदय से कृतज्ञ रहता हूँ और रहूँगा भी। ये बात अलग है कि मै बिना पढ़े उनके ब्लॉग पर 'वाह -वाह क्या बात है' टाइप की टिप्पणी नहीं करता। इसलिए चार सालों में मेरी टी आर पी (फॉलोवर लिस्ट) अभी तक बमुश्किल ५७ ही पहुंची है। अन्य दिग्गज ब्लॉगरों की तीन-चार सौ से ऊपर देख के रश्क होना स्वाभाविक है। कई गुरुघंटालों को साधने की कोशिश भी की कि गुरु ये बताओ टी आर पी  बढ़ाने  के लिए तुमने कौन सी जुगत लगाई। तो गुरु लोग संजीदा हो जाते हैं कहते हैं अपनी लेखनी में जादू लाओ लोग खुद-बखुद तुम्हारे फॉलोअर बन जायेंगे। हाल ही में टॉप ३०० पठनीय हिंदी ब्लॉगरों की लिस्ट का कहीं से आविर्भाव हुआ है। एक स्वनाम धन्य ब्लॉगर महोदय ने लड़-भिड़ के अपना नाम इस फेहरिस्त में घुसेड़वा भी लिया है। लिखा-पढ़ी करके कुछ ब्लॉग के महारथियों से सिफारिश से बंदा लिस्ट को शुभ अंक ३०१ करवा भी लेता। किन्तु ऐसा करने से मेरे महान गुरु बाणभट्ट, खुदा उन्हें जन्नत बख्शे, की आत्मा को असीम कष्ट होता। जिस गुरु ने अपने जीते जी राजा-महाराजाओं के ज़माने में चाटुकारिता का साथ देने से इंकार कर दिया हो, उसका ये कलयुगी चेला वाणभट्ट सिर्फ टी आर पी के लिए इतना गिर जाये, ये शर्म की बात है। आजकल तो बेशर्मी हद के पार हो गयी है और भाई लोगों ने तो मुहावरा ही गढ़ डाला कि जिसने की शरम उसके फूटे करम। तो भाइयों और बहनों अपनी फूटी किस्मत को लेकर अपने महान गुरु का नाम ख़राब करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। एकलव्य टाइप का चेला हूँ। गुरु की स्वतः प्रेरणा से आज मै कुछ ऐसा लिखने पर आमादा हूँ जिसे इस बार ५-१० से कुछ ज्यादा टिप्पणियां मिल जाएँ। २-४ लोग टी आर पी में जुड़ जायें। गुरु मुझ पर ऐसे ही कृपा बनाये रक्खें। इससे ज्यादा वाणभट्ट को और क्या आकांक्षा रखनी चाहिये। इस आशय से मैंने सामायिक विषय भारत के लोकतंत्र में चल रही महाभारत को मुद्दा बनाने का फैसला लिया है।

चौसर बिछ चुकी है। हर दल अपने-अपने शकुनियों के भरोसे चालें चल रहा है। पूरी की पूरी महाभारत करा देने वाले मामाश्री रणभूमि से विरक्त ही रहे। बहन के पूरे कुनबे का नाश पीटने के बाद मामा का उह-लोक गमन किस प्रकार हुआ, इस बारे में मेरा ज्ञान सीमित है। ये तो निश्चित है कि मामा जी ने कुरुक्षेत्र में युद्ध करते हुए अपने प्राण नहीं गंवाएं होंगे। और कुरुक्षेत्र के मैदान में कोई शकुनि नाम का प्राणी यदि सहदेव के हाथों मारा भी गया होगा तो शकुनि का बॉडी डबल रहा होगा। इतना इंटेलिजेंट मामा युद्ध में जाने की बेवकूफी नहीं करेगा। महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जो हर देश-काल में फिट बैठता है। और हमारे देश का चुनाव किसी महायुद्ध से कम है क्या? एक तरफ़ सत्ता पक्ष का गठबंधन है तो दूसरी तरफ विपक्ष गुटबाजी में लगा है। परन्तु आज के इस युद्ध में ये कहना मुश्किल है कि पांडव कौन है और कौरव कौन। दोनों पक्षों में दुर्योधन भी हैं और दुश्शासन भी। कुछ पितामह हैं। कुछ आचार्य हैं। हर दल में धृतराष्ट्र भी हैं और गांधारी भी। जितने पात्रों की महर्षि वेद व्यास ने उस समय मात्र कल्पना की होगी आज साक्षात् भारत की पावन धरा पर अवतरित हो चुके हैं। और २०१४ के इस महासंग्राम में अपनी-अपनी ताल ठोंक रहे हैं। दरअसल ताल होती ही ऐसी जगह है जहाँ कोई दूसरा ठोंक नहीं सकता। जिसे कोई दूसरा ठोंक सके वो शरीर में ताल के ठीक विपरीत स्थापित है। बस एक विचार आ गया तो सोचा इसे भी चटका दिया जाये।

बात विचार से शुरू हुयी थी। लोकतंत्र में विचारों का महत्त्व। जब किसी एक के विचार को नासमझ लोगों की पूरी की पूरी फ़ौज सिर्फ इसलिए मानने लग जाए कि नेता जी की जी-हजूरी में ही अपनी भलाई है तो यही विचार, विचार-धारा में तब्दील हो जाते हैं। विचार भी उन्हीं के मानने योग्य माने जाते हैं जिनके पास पद-धन-बल की ताकत है। ये बात कोई नहीं पूछता कि ये ताकत आपने किस प्रकार अर्जित की है। अगर आपको लगता है कि आपके विचारों और जेब में दम है, तो हमारा जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, आपको इजाज़त देता है कि आप अपनी एक पार्टी बना लें। खुद को उसका सीईओ नियुक्त कर लें। भूखे-बेरोजगार और दारुबाजों की निरंतर बढती जनसंख्या किसी भी उदीयमान नेता को निराश नहीं करती। और नेता का खून तो सिर्फ और सिर्फ अपने इर्द-गिर्द छाये चापलूसों के नारों से ही बढ़ता है। उसे छुहारा-बादाम-मिश्री खाने की ज़रूरत नहीं है। एक बार आप नेता बन गए तो विचार आपके पेटेंट हो जाते हैं। इस देश में हर वो शख्स महान हो सकता है जो भोले-भाले लोगों को सपने बेच सके। पूरा का पूरा फ़िल्म उद्योग इस बात का जीता-जागता सबूत है। जिन्हें एक वख्त की  रोटी नसीब नहीं होती वही लोग सल्लू मियां की  दबंग को हिट करा देते हैं। फ़िल्म या टी वी  देख के कोई कह सकता है कि भारत में हर जगह गरीब और गरीबी ही दिखायी देती है। सत्ता पक्ष के लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। वो हर साल लाखों लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर कर देते हैं। ये रेखा कुछ वैसी ही रेखा लगती है जैसे हाई जम्प में रॉड लगायी जाती है। अगर नहीं डांक पाये तो उसे नीचे कर लो। जितने गरीब रेखा के ऊपर जा रहे हैं उससे दुगनी संख्या में नए गरीब पैदा हो रहे हैं। पहले हर घर में साईकिल बड़ी चीज़ हुआ करती थी। आज झोंपड़-पट्टे में भी मोटरसाइकिल और टीवी आम हो गए हैं। गांव-गांव, गली-गली में लोगों को हिंदी सिनेमा ने कपडे पहनने के तौर-तरीके सिखा दिए हैं। ब्यूटी पार्लर का चलन अब शहरों-कस्बों तक ही सीमित नहीं रह गया है। पहले के गरीब सिर्फ दो वक्त की रोटी की आस रखता था। अब की गरीबी मानसिक है। अगर आपके पास साईकिल है तो मोटरसाइकिल के ख्वाब आपको सोने नहीं देंगे, और मारुती है तो हौंडा सिटी के। तनख्वाहें बढ़ीं हैं पर लोगों के सपने भी बेलगाम हुए हैं। लोग खाने से ज्यादा दिखाने में लगे हुए हैं। जिस तरह लोगों का क्रेज़ मोबाइल जैसे गैजेट्स पर होना शुरू हुआ है, लगता है लोग बिना खाने के तो जी सकते हैं पर बिना बतियाये नहीं। और नेता लोगों का काम ही क्या है, बुझे-मुरझाये लोगों में आशा का संचार करना। जैसे अच्छे स्वाद पर सबका हक़ है वैसे ही देश की अमीरी पर भी सबका हक़ होना चाहिये। और वो भी बिना शर्त, बिना मेहनत मिलना चाहिये। गरीबों का मसीहा बनने के लिये अमीरों को गाली दीजिये और धीरे-धीरे अमीरों की  लिस्ट में शामिल हो जाइये। नेताओं की संख्या और उनकी चल-अचल संपत्ति में जितनी वृद्धि गत वर्षों में हुयी है वो कल्पनातीत है। ३००-४०० परसेंट का ग्रोथ उद्योग और उद्यम के किसी क्षेत्र में शायद ही मिला हो। पर नेतागिरी में ये आम है। गरीबी हटाते-हटाते ये कब अमीर हो गए इन्हें खुद पता नहीं चला। अगर नूरजहाँ आज होतीं तो कश्मीर के लिए कश्मीर जाने की  कोई ज़रूरत नहीं थी। कश्मीर खुद दिल्ली आ जाता। और मोहतरमा कहतीं कि धरती पर अगर नेताओं के लिये स्वर्ग है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है।

और कोई हर-हर, घर-घर पहुंचा हो या न पहुंचा हो पर इसमें शक़ नहीं कि टीवी की आज वही स्थिति है जिसकी इस देश का हर नेता कामना करता था। क्या गांव क्या कस्बे। क्या गली क्या कूचे। टीवी के साइज़ और दाम में अंतर हो सकता है पर अब इस माया का वास घर-घर पहुँच गया है। रही-सही कसर चैनेलों ने कर दी है। देश-दुनिया में क्या हो रहा है और हमारे यहाँ क्या हो सकता है, इस पर देश का बच्चा-बच्चा बोल सकता है। इस तकनीक ने देश में सूचना क्रांति ला दी। अब बच्चा पड़ोस के चचा यानि अंकल, जो एक सर्वमान्य-सर्वव्याप्त शब्द हो गया है, की शक्ल भले न पहचान पाये न पहचान पाये पर मलिंगा और क्रिस गेल को ज़रूर पहचानता होगा। इस क्रांति का श्रेय सत्ता पक्ष लेने में जुटा रहता है पर मुझे ये तरक्की उपभोक्ता वाद की प्रतीक लगती है। आपने सिर्फ दरवाज़ा खोला और बाहर का बाज़ार आपके घर में घुस गया। आज अगर कोई देसी तकनीक गलती से मिल भी जाये तो लोगों को उस पर भरोसा नहीं होता। लेकिन अगर कटरीना या करीना किसी विदेशी उत्पाद को एंडोर्स कर दें तो गांव में भी उस वस्तु का मार्केट तैयार हो जाता है। भारतेन्दु जी होते तो ज़रूर कहते कि घर की तो बस मूंछें ही मूछें हैं। इस तकनीक के सहारे हमारे और आपके घरों में पैठ गया एक ऐसा कल्चर जिससे अभी तक हम वंचित थे। अब हमें ये मालूम है कि हमारे पास क्या-क्या नहीं है और उसके लिए कितने पैसे चाहिए। मौजूदा आमदनी के स्रोतों से तो उतना धन अर्जित करने में कई जनम लगेंगे पर हमारी लालसा सब इसी जनम में पाने की है। भले ही झूठ बोलना पड़े या किसी का गला काटना पड़े। चाहतों का अम्बार है और उसे पूरा करने के लिये क़र्ज़ की व्यवस्था भी सहज उपलब्ध है। और जो ये तुरत-फुरत चाहता है उसके लिए नेतागिरी या किसी स्थापित नेता की चमचागिरी ही एक मात्र विधान है। 

टीवी के जरिये हर बार चुनावी दंगल और भी दिलचस्प हो जाता है। पहले जिन नेताओं को देखने-सुनने को लोग घंटों ग्राउंड पर इंतज़ार करते थे वो आज आपके साथ डिनर कर रहे हैं। टटपुंजिया से टटपुंजिया नेता कुछ ऐसा बोल देगा कि न्यूज़ चैनेलों को मसाला मिल जायेगा। फिर आप भला कैसे उन्हें पहचानने से इंकार कर सकते हैं। नेता तो नेता, उनके परिवार के मेम्बरान और यहाँ तक कि उनकी गाय, भैंस और कुत्तों का भी साक्षात्कार ले लिया जाता है। उनकी लाइक्स और डिस्लाइक्स का भी ख्याल रखा जाता है। नेता जी को जब गाय का दूध निकालते दिखाया जाता है तो आम आदमी को लगता है कि ये नेता हमारे बीच का है। ये बात तो बाद में पता चलती है कि नेता जी पहले ही अमरुद हो गए थे और सेटिंग के चलते ही मिडिया में छाये रहते हैं। वर्ना हर ऐरा-गैरा नेता मीडिया में आने के लिए इरादतन और गैरइरादतन उट-पटांग बकने से बाज नहीं आता। चुनावी समर में हर नेता से रु-ब-रु होने का मौका मिल रहा है। पार्टी लाइन से हट कर सबके विचार और विचार-धाराओं से अवगत होने का ये सुनहरा मौका है। हर पार्टी अपने को दूसरे से बेहतर बताने में जुटी हुयी है। हर प्रत्याशी जिताऊ या नॉन-जिताऊ कैटेगरी में रक्खा जा रहा है।  हर आदमी एक वोट में बदल गया है। चैनेलों के ओपिनियन पॉल मुकाबले को और भी दिलचस्प बना रहे हैं। महान नेता जो पार्टी के मुखिया के विरुद्ध मूक बने रहते थे, विरोधी पार्टी का पश्रय पा कर मुखर हो रहे हैं। जिसे टिकट नहीं मिला उसने बगावत कर दी। जो पहले एक पार्टी की विचारधाराओं का पोषण करता था, अब दूसरी पार्टी की नीतियों का गुणगान कर रहा है। चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने से उपजे असंतोष और इस असंतोष से उपजी पार्टी छोड़ के दूसरे दलों की ओर पलायन की प्रवृत्ति, ये सिद्ध करती है कि नेताओं में किसी पार्टी या पार्टी के विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का सर्वथा आभाव है।

फिर मेरा ध्यान गया सभी पार्टियों की मूल विचारधारा पर। सभी पार्टियाँ देश में सुशासन की बात कर रहीं हैं। सभी सांप्रदायिक एकता के लिए कृतसंकल्प हैं। सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। सभी सर्वशिक्षा और सर्व सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं। सड़क और बिजली और पानी और स्वास्थ्य सब देना चाहते हैं सबको। सबके रोजगार और आमदनी की गारेंटी सब नेता ले रहे हैं। सब विदेशी धन भारत वापस लाना चाहते हैं। सबका ध्यान गरीब, कामगार और किसानों पर है। ये तबका ही सबसे बड़ा वोटर है। इसलिए हर किसी के पास इनके लिए योजनाओं का भण्डार है। अफ़सोस होता है जब एक जमीन के मालिक किसान को भी गरीब की श्रेणी में रख दिया जाता है। ये बात अलग है कि उसी के खून-पसीने से पूरे देश का पेट भर रहा रहा है। और अगर वो कार कंपनियों की तरह फिक्सड और वर्किंग कैपिटल का आंकलन कर अपना मुनाफा भी जोड़ दे तो महँगी विदेशी कारों में घूमने वाले बड़े-बड़े धन्ना सेठों को रोटी के लाले पड़ जायें। किसी कवि ने कहा था कि सिर्फ दिमाग से खाने-कमाने वाले मेहनतकश से चढ़ कर बोलें, ऐसी व्यवस्था बदल जानी चाहिये। परन्तु सत्ता में आने के बाद सब औद्यौगीकरण और व्यापार के द्वारा पूंजीवाद का राग अलापते नज़र आते हैं। रोटी-कपडा-मकान जैसी मूलभूत समस्यायें हर चुनाव का मुद्दा बन जातीं  हैं और चुनाव के बाद यही समस्याएं गौण हो जातीं  हैं। जो नेता चुनावी मौसम में गरीबों के हमदर्द बने फिरते थे सत्ता में आ कर उनके लिए योजनाएं बनाते हैं और फिर कहते हैं कि जनता तक १० फीसदी रकम ही पहुँच पाती है क्योंकि भ्रष्टाचार है। अगर हमें वोट दोगे तो देश से भ्रष्टाचार अलविदा कह देगा। सभी पिछड़ों को आगे लाना चाहते हैं और अगड़ों को पीछे ले जाना चाहते हैं। ताकि सामाजिक न्याय हो सके। भगवान ने जब सृष्टि बनाई तो हर प्राणी को कुछ गुण दिये ताकि वो जीवन-यापन कर सकें। किसी को ताकत दी तो किसी को भागने की क्षमता। पर भाई लोग ये सिद्ध करने में लगे हैं स्त्री-पुरुष, ज्ञानी-अज्ञानी, निर्धन-धनी सब बराबर हैं। अगर बराबर नहीं हैं तो हम एक ऐसी व्यवस्था प्रतिपादित करेंगे जो सबको बराबर कर देगी। इनका बस चले तो इस व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर लागू कर दें। अमेरिका से कहें कि ७०% हमारे आदमियों को ढोना आपकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। आपको अमीर होने का अधिकार तब तक नहीं मिल जाता जब तक धरती पर गरीबी और लाचारी है। सभी अपनी-अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए राज्यों के विभाजन के पक्ष में हैं। सम्भवतः मूल भावना ये हो कि बड़े राज्य में नेता ज्यादा हो जाते हैं और कम्पटीशन बढ़ जाता है। राज्य छोटे होंगे तो हमारे लग्गू-भग्गू भी कमेटियों के चेयरमैन बन जायेंगे। बड़ी सेवा की है उन्होंने पार्टी और नेता की। पूरी बात का लब्बोलाबाब ये है कि हर कोई देश की प्रगति चाहता है और भारत के हर आदमी को खुशहाल देखना चाहता है। तो फिर प्रश्न ये उठता है कि हमारी विचारधारा आपकी विचारधारा से अलग कैसे।

इतिहास गवाह है कि पक्ष और विपक्ष संसंद में इन्हीं सब मुद्दों पर एक नहीं हो पाते। भाई जब सब एक ही चीज़ चाहते हो तो कैसी दिक्कत है। ये महाभारत समझ के परे है कि दोनों एक ही बात कर रहे हैं पर विचार अलग हैं। पुरानी महाभारत में एक लेना चाहता था तो दूसरा देने से इंकार करता था। विचारों का भेद रणक्षेत्र में बदल गया। महाभारत हो गयी। पर वो उन्नीस दिन में समाप्त भी हो गयी। बुराई पर अच्छाई की विजय हर कहानी का सुखद अंत है। पर ये कैसी लड़ाई है जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक पक्ष जब सत्ता में आये तो वो १०० डैम बनवा दे। हर रोज़ १० किमी सड़क बनवा दे। साल में ५० भ्रष्टाचारियों को ही नाप दे। विपक्ष कहे कि जब हम सत्ता में आएंगे तो इसका दूना करके दिखायेंगे। साझा सहयोग से देश प्रगति के पथ पर बढ़ जायेगा। पर यहाँ तो होड़ लगी है एक-दूसरे को नीचा दिखने की। सब दूसरे को चोर और नाकारा साबित करने में लगे हैं। सांप्रदायिक ताकतें देश के लिए खतरा बन जाएंगी, ये अभी-अभी पता चला है। सांप्रदायिक लोग गंगाजल ले कर असाम्प्रदायिक होने की बात कर रहे हैं तो तथाकथित गैरसंप्रदायिक ये सिद्ध करने में लगे हैं कि ये दिखावा है। नेता ये पब्लिक है सब जानती है जैसे नारे दे कर जनता को बेवकूफ बनाते रहे हैं। और जनता की बेवकूफियों का हर इलेक्शन में इम्तहान होता है। कम से कम एक चीज़ तो सभी चुनावों ने सिद्ध की है कि हम इस इम्तहान में अव्वल नम्बर से पास होते आये हैं। वर्ना ईमानदार और कर्मठ नेता चुनाव हार जाये और नाकारा गुंडा-डकैत जाति-संप्रदाय के नाम पर विजयी हो जाये, ऐसा हो सकता है क्या। साड़ी-पैसा-दारु बांटने वाले वोट खरीदते आये हैं। घुटे नेताओं के चिकने-चुपड़े चेहरे के पीछे का सत्य टीवी चैनेलों के आने से जनता के सामने है। पर क्या वोट देते समय हम उम्मीदवार की योग्यता को पैमाना मान पाते हैं या उसकी खोखली बातों में उलझ के रह जाते हैं। सदन में बैठ कर क्या विपक्ष सिर्फ विरोध करेगा। रचनात्मक विपक्ष का स्वप्न फिलहाल तो पूरा होता दिख नहीं रहा है। जो पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ घिनौनेपन की हद तक इलज़ाम लगा रही हैं क्या वो किसी भी मुद्दे पर सियासत से बाज आयेंगी इसमें मुझे शक़ है। इलेक्शन कमीशन एक विश्वास ज़रूर दिलाता है कि चुनाव दिन प्रति दिन निष्पक्ष होते जा रहे हैं। अब जनता की बारी है कि वो देश के प्रति अपनी वफ़ादारी सिद्ध करे। कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को ही रोक दे। एक बार जो संसद चुन दी जाये वो कम से कम पाँच साल देश चलाये। मुद्दे वही पुराने हैं रोटी-कपडा-मकान, बिजली-पानी-सड़क। हर साल देश के कुछ हिस्से ही सही प्रगति कर जायें। बड़ी-बड़ी योजनाओं ने छोटे-छोटे सरकारी मुलाजिमों को इतनी ताक़त दे दी कि वो जनता की नौकरी करने के बजाय उनके रजा बन बैठे। सेवा के बदले मेवे लेने के आदी हो गये।पूंजीवाद-साम्यवाद-समाजवाद की तरह ये भी एक विचारधारा है, भारतवाद। हमें सिर्फ खुद को और अपने देश को देखना है। जहाँ तक मेरा ज्ञान है लोक माने स्थान होता है तो लोकतंत्र का मतलब हुआ सिस्टम ऑफ़ लैंड, जो अब तक भ्रष्टाचार जैसी असाध्य बीमारी से ग्रसित रहा है। इसे लोगतंत्र या जनतंत्र में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। इंटरनेट और टी वी के युग में जनता के पास सूचना की कमी नहीं है बस ज़रूरत है तो दृढ इच्छाशक्ति की। ये तो मै बस एक विचार दे रहा हूँ, इसे धारा बनाना जनता का काम है।

पर मुझे अफ़सोस है कि ये महान ब्लॉग सिर्फ मेरे चाहने वाले चंद पाठकों तक ही पहुँच पायेगा। मेरा इतना लम्बा सारगर्भित प्रलाप सुधि जनता तक पहुँचाना अब उन लोगों का पुनीत कर्तव्य है को ब्लॉग्गिंग की विधा में तन-मन से समर्पित हैं, धन तो अभी तक यहाँ दिखा नहीं है। गुरु जी लोगों से विनम्र निवेदन है कि ३०० लोगों की लिस्ट में से मेरे लिए किसी को हटाइये नहीं बस एक नाम और जोड़ लीजिये और इस लिस्ट को तब तक बढ़ाते जाइये जब तक इस प्रकार के बेगैरत लोग डिमांड करते रहें। अपने चारित्रिक पतन के लिये मै गुरु बाणभट्ट जी से क्षमा चाहता हूँ। पर गुरु जी ये बताइये कि इतना दिल और दिमाग झोंक देने के बाद सिर्फ ४-५ पांच टिप्पणियां मिलें और फॉलोअर लिस्ट में इज़ाफ़ा न हो तो आपका ये कलयुगी चेला क्या करे। इसलिये मेरी बात को दिल पर कतई न लीजियेगा। हिंदुस्तान का चुनाव तो चलता रहेगा। हर पाँच साल के बाद फिर आएगा। पर गुरु जी आपसे निवेदन है कि अपने इस तुच्छ चेले की लेखनी को जाग्रत बनाये रखिये। टी आर पी बढे या न बढ़े। टिप्पणियां मिलें या न मिलें। बंदा अपना ज्ञान ब्लॉग्गिंग की इस फ्री सेवा से झाड़ता रहे और सिद्ध पुरुषों से इसी प्रकार ज्ञान अर्जित करता रहे।  

- वाणभट्ट    

बुधवार, 19 मार्च 2014

मि. एक्स इन इलाहाबाद

मि. एक्स इन इलाहाबाद


अपने शहर इलाहाबाद में काफी अंतराल के बाद मुझे कुछ दिन वहाँ रुकने का सौभाग्य मिला। इसी शहर में मै पला और बढ़ा। सन अट्ठासी से मेरा शहर लगभग छूट गया। फिर भी साल में दो-चार चक्कर तो लग ही जाते। पर लम्बा रुकना सम्भव ना हो सका था। बार- बार आने से ये तो था कि मोहल्ले के चाचाओं-चाचियों और भतीजे-भतीजियों ने पहचानना नहीं छोड़ा था। सब भले नाम से न जानते हों पर ये ज़रूर जानते थे कि यही वर्मा जी के सुपुत्र हैं, ये बात अलग है कि असलियत तो सिर्फ पिता जी ही जानते होंगे। जवानी में जो बेटा माँ-बाप की आँखों का तारा हुआ करता है वही बुढ़ापा आते-आते प्रायः मोतियाबिंदु में तब्दील हो जाता है। हर वृद्ध को दूसरे के बेटा-बहू बहुत सुशील नज़र आने लगते हैं। लायक या नालायक होने का सर्टिफिकेट तो माँ-बाप की आत्मा में छिपा रहता है। पर वो ये राज़ किसी से शेयर नहीं करते और कोई इस राज़ को कभी जान भी नहीं पाता। 

चिपको आन्दोलन में किसी ने वृक्षों को इतना कस के पकड़ा होता तो निश्चय ही पेड़ की छाल के अक्स उसके शरीर पर उभर आते। लड़की ने लडके को इस कदर अपनी बाँहों में भींच रक्खा था। ऐसा लग रहा था कि जरा पकड़ ढीली हुयी तो लड़का बाइक समेत उसे छोड़ के कहीं भाग ना जाये। चिपकने में अड़चन निगोड़ी हेलमेट मोटरसाइकिल के हैंडल की शोभा बढ़ा रहा था। जिस स्पीड पर वो चल रहे थे उस पर लड़की का भाई तो सर फोड़ सकता था किन्तु एक्सीडेंट से सर फूटने की कतई गुंजाईश नहीं थी। बाइक की स्पीड जितनी सम्भव थी उतनी कम थी, सड़क के उस सुनसान क्षेत्र में। भाई भी भाईचारा तभी दिखा पाता जब वो उन्हें पहचान पाता। लडके ने मुँह रुमाल के तिकोने से ढँक रक्खा था और लड़की की तो सिर्फ आँखे ही दिख रही थीं। सर और शक्ल दोनों दुपट्टे से ढँके हुए थे। दुपट्टे का ऐसा मल्टीपरपज़ यूज़ तो इसके इज़ादकर्ता ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। 

जब से १८ सेकेण्ड से ज्यादा किसी को देखना घूरने जैसे जघन्य अपराध की श्रेणी में आ गया है मै अपनी श्रीमती जी को भी घर के बाहर कपड़ों से पहचानना ही पसंद करता हूँ। वैसे मै केजरीवाल जी से इस कानून को तोड़ने के लिए आह्वाहन करूँगा। भाई ये नियम बहुत गलत है। लड़कों के लिए ये सिद्ध कर पाना अत्यंत कठिन है कि कोई लड़की उसे घूर रही थी। जबकि हर लड़की ये मान के चलती है कि हर वक्त कोई न कोई उसे घूरने पर आमादा है। ये बात अलग है कि वो घर से बिना ढंग से ड्रेसअप और मेकअप के बाहर नहीं निकलतीं। अगर किसी की ये हार्दिक इच्छा है कि कोई उसे न देखे तो फिर इस ड्रेसिंग सेन्स की कौन तारीफ करेगा। मै तो अपनी टूटी चप्पल और फटी बनियान के साथ एट लीस्ट मोहल्ले में तो बिना संकोच घूम ही लेता हूँ। इस अति-स्त्रीवादी कानून की जितनी भी मुखालफत हो कम ही है। लड़कियाँ तो ये मानती हैं कि लड़कों में घूरने लायक कोई चीज़ है ही नहीं भले ही हृतिक रोशन सामने बैठा हो। ये बात अलग है कि वो मोहल्ले के हर लुच्चे-लफंगे को भली-भाँति पहचानतीं हैं। और शरीफ पढ़ाकू टाइप के लड़कों (जो १८ सेकेण्ड से कम घूरता हो) को मग्घू की श्रेणी में रखतीं हैं। इस कानून को तोड़ने के लिए मै केजरीवाल साहब के साथ जेल भरो आंदोलन तक में भाग लेने को भी तत्पर हूँ। सभी स्त्री-पुरुषों से जो भी इस कानून के खिलाफ हों उनका भी मै आह्वाहन करता हूँ। मुझे पूरी उम्मीद ही नहीं विश्वास है जिस देश में गे संस्कृति के संरक्षण के लिए इतने मुखर स्वर उठे हैं वहाँ मेरी इस विचारधारा से सहमत लोगों की कमी न होगी। 


मेरी धर्मपत्नी निकट के पार्क केशव वाटिका में अक्सर टहलने निकल जातीं थीं। इस अतिवादी कानून के तहत मै उन्हें उनके घर से निकलते समय पहने कपड़ों के द्वारा पहचान लिया करता था। एक बार तो हद ही हो गयी। वो जब निकलीं तो मैंने उन्हें नया सूट पहन के निकलते नहीं देखा। तय था कि वाटिका में उन्हें पहचान नहीं पाया। अब देवी जी बुरा मान गयीं कि मेरे नए सूट की तुमने तारीफ नहीं की। जब मैंने बताया कि मै पराये धन और परायी नारी की ओर नहीं देखता तो उन्हें और बुरा लग गया। बोलीं ये नया सूट सिर्फ तुम्हारे देखने के लिए थोड़ी न सिलवाया है। एक जुमला और जड़ दिया कि सब मर्द एक से होते हैं अपनी बीवी को छोड़ दूसरों की बीवियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। मैंने बताया कि देवी एक ऐसा कानून है जो हमें घूरने से रोकता है। अगर कोई १८ सेकेण्ड में पहचान आ गया तो भाभी जी या बहन जी नमस्ते कर के निकल लेता हूँ। पर पत्नी जी को मेरी बात पर भरोसा नहीं हुआ। लेकिन मेरे मन में एक शक़ ज़रूर घुस गया कि इन्होने बिना घूरे मुझे कैसे पहचान लिया।

मोहल्ले भर का अंकल बन जाने के बाद अपने और पराये बच्चों में ज्यादा फर्क नहीं लगता। ज़माना बदल गया है। हम भी इस तरह के चिपकू युगलों को देखने के अभ्यस्त हो चले हैं। पर मोहल्ले में इस तरह घूमते इस चिपकू युगल पर थोड़ी देर के लिए ध्यान चला ही गया। अनजाने में १८ नहीं तो १५ सेकेण्ड तो घूर ही लिया होगा।  पर क्या खाक पहचान पाता, शक्लें तो नक़ाब से आच्छादित थीं। हाँ मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट पर यूनिक तरीके से लिखे "ॐ साईं राम" को देख ये अंदाज़ लग गया कि हो न हो ये दो मकान छोड़ के रहने वाले शर्मा जी की ही गाड़ी है। कुछ देर बाद मैंने मुड़ के देखा तो मेन रोड आने से पहले कोने के हनुमान मन्दिर के सामने दोनों चलती मोटरसाइकिल पर हनुमान जी के समक्ष श्रद्धावनत प्रतीत हुये। मेरा मन भी इन बच्चों में व्याप्त संस्कार की गहरी जड़ों को देख कर श्रद्धा से झुक गया। वो चाहते तो खुले आम घूम सकते थे। मुँह खोल के चिपके हुये घूम कर वे मुझे शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे। समाज ने कितनी भी उन्नति कर ली हो किन्तु लाज-शर्म भी कोई चीज़ है। बड़े-बूढ़ों का लिहाज और भगवान के प्रति आस्था यही तो संस्कार हैं। 

ऐसा नहीं है कि हमारे ज़माने में प्यार नहीं होता था। लेकिन छुप-छिपा के नहीं। चेहरा ढँकने का रिवाज़ नहीं था। अगर किसी ने किसी को सेट कर लिया तो पूरा कालेज जान जाता था। यहाँ तक कि प्रोफेसर भी। लड़की को लडके के दोस्तों से वैसा ही सम्मान मिलता था जैसे भाभी को। और सारे प्रतिद्वन्दी बेवजह मामा टाइप की कैटेगरी में शामिल हो जाते। प्रेम के जग जाहिर हो जाने के कारण युगल पर एक दूसरे का साथ निभाने के लिये सामाजिक दबाव भी पड़ता था। पर इस घटना ने मुझे ये सोचने पर विवश कर दिया कि जिन बच्चों को मंदिर दिखाई दे सकता है उन्हें मै क्यों नहीं दिखायी दिया। पहली बार एक अस्तित्वविहीनता का एहसास मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर छा गया। लगा जैसे मै उस बियाबान सड़क पर कहीं एक्सिस्ट ही नहीं करता। बच्चों ने मेरे अस्तित्व को सिरे से नकार दिया था। मुझे कन्फ्यूज़न सा होने लगा कि योग-साधना से सम्भव है मुझमें अदृश्य होने की कोई दैवी शक्ति आ गयी है।


मै आगे बढ़ा तो सामने से एक चाचा जी चले आ रहे थे। मैंने उन्हें हाथ जोड़ के प्रणाम किया। कंधे पर सब्जी का झोला लटकाये वो अपनी ही धुन में थे। सम्भव है बुजुर्गवार ने मुझे न पहचाना हो। अगर रुक कर पूरा परिचय देता तो शायद पहचान भी लेते। पर नमस्ते का जवाब तो बनता ही था। सड़क के दूसरे छोर से एक भतीजे ने प्रवेश किया। अब मुझे उम्मीद जगी कि अपने शहर में मुझे कोई जानने वाला जरुर पहचान लेगा। पर ये क्या भतीजा तो कान में हेड फोन लगाये और आखें आई पॉड पर गड़ाये चला आ रहा था। अब मेरा सब्र जवाब दे रहा था मैंने हौले से आवाज़ लगायी रवि। उसने मेरी ओर निगाह जरुर की पर ऐसा लगा जैसे वो मेरे आर-पार देख रहा हो, सी-थ्रू। मेरा अदृश्यता का कॉन्सेप्ट कन्फर्म होता लग रहा था। एक्टिवा पर सवार एक भतीजी ने भी उसी समय एंट्री मारी। खाली सड़क पर मुझे न देख पाना असम्भव था। किन्तु मुझे देख कर भी न उसके चेहरे की संरचना में कोई परिवर्तन आया न ही एक्टिवा की स्पीड में। ऐज़ यूज़ुअल उसके कानों से भी तार लटक रहे थे। आँखों पर चढ़े सनग्लास आपको ये इम्युनिटी दे देते हैं कि आप जिसे चाहें उसे देखें जिसे चाहें उसे न देखें। अब मुझे मज़रूह साहब वाला दर्द कुछ-कुछ समझ आ रहा था। 


गलियां हैं अपने देस की,
फिर भी हैं जैसे अजनबी, 
किसको कहे कोई, अपना यहाँ। 


लेकिन एक बात की ख़ुशी भी थी कि अपने ही मोहल्ले में मै अजनबी की तरह घूम सकता हूँ। मुझे न तो कोई देख सकता है न पहचान। कम से कम जान पहचान वाले तो बिलकुल नहीं। हर किसी के जीवन में ये कल्पना ज़रूर होती है कि यदि मै अदृश्य हो जाऊँ तो क्या-क्या करूँगा। इस विषय पर कई इंग्लिश और हिंदी फ़िल्में बन चुकीं हैं। इस खुशफहमी को पाले मै मोहल्ले के मेन चौराहे तक आ गया। यहाँ अब पूरा मार्किट सा बन गया था। जब मैंने इलाहाबाद छोड़ा था तब यहाँ सन्नाटा हुआ करता तब से अब तक मोहल्ले की चल-अचल जनसँख्या में भी वृद्धि हुयी है और ये चौराहा तो पूरा बिज़नेस सेंटर में बदल चुका का है। मुझे उम्मीद थी कि यदि चचा, भतीजे और भतीजी सुनसान गली में मेरे अस्तित्व को नकार सकते हैं वे इस चहल-पहल वाले इलाके में मुझे क्या देख पायेंगे।


अदृश्यता का हर कोई लाभ उठाना चाहता है। मैंने एक बंद पड़ी दुकान के सामने अपनी फेवरेट ब्रांड भूरी लम्बी चान्सलर सुलगा ली। तभी ऐसा लगा कि उसका धुआँ मेरे शरीर पर चिपक गया है। सब्जी वाले चाचा छंटाक भर जीरा लेने के लिए पंसारी की दुकान पर खड़े थे और मेरी ओर घूर रहे थे। उनकी दृष्टि ये कूट-कूट के कह रही थी कि वर्मा जी ने अपने लड़के को यही संस्कार दिए हैं कि बड़े-बूढ़ों के सामने धुएँ के छल्ले निकाले। मुंह लपेटे मोटरसाइकिल वाले भतीजे-भतीजी भी आते दिखे। बिना अपनी आइडेंटिटी डिस्क्लोज़ किये उन्होंने उसी श्रद्धा से प्रणाम किया जैसे कुछ देर पूर्व हनुमान जी को करते दिखे थे। एक्टिवा वाली भतीजी भी उतने ही वेग से वापस आती दिखाई दी उसने नमस्ते तो नहीं की पर एक्टिवा की स्पीड पर एकाएक ब्रेक लग गया। पलट कर देखा ये वही अंकल हैं जो शरीफ से दिखते थे। 

मुझे लगा मि इंडिया अब लाल लाइट में सभी को दिखायी दे रहा है या मि एक्स इन बॉम्बे के किशोर कुमार पर दवाई का असर ख़त्म हो गया है।

- वाणभट्ट

शनिवार, 15 मार्च 2014

पिता की घोषणा

पिता की घोषणा 

समस्त मानवीय सम्वेदनाओं में लिपटा
संशयों से घिरा
प्रवृत्तियों में जकड़ा   
मै। 

सम्पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ 
स्वयं को 
यह कह सकने में असमर्थ पाता हूँ 
कि 
भगवान हूँ
मात्र इसलिये 
कि 
मै पिता हूँ।  

जन्म के समय 
देखा है मैंने  
प्रभु का अंश 
साक्षात तुझमें। 

यदि सम्भव हो 
तो क्षमा करना  
कि 
पूर्वाग्रहों से ग्रसित 
मैंने प्रयास किया 
भगवान को
इन्सान बनाने का। 

- वाणभट्ट 


रविवार, 9 मार्च 2014

सहअस्तित्व

सहअस्तित्व 

जीवन है
किसी भी तरह की
मुक्ति के विरुद्ध

इस काल्पनिक लालसा ने
कर दिया चिंतन 
अवरुद्ध

हर कोई चाहता है मुक्ति
बंधन से मुक्ति
उत्तरदायित्वों से मुक्ति

पर क्या सम्भव है जीवन
बिन
बन्धन

सहअस्तित्व है आधार जीवन का 
सामंजस्य है विपरीत ध्रुवों का

द्वैत
ही तो है
सर्वत्र व्याप्त

तप्त सूर्य और शीतल धरा
चुम्बक का उत्तरी-दक्षिणी सिरा
धनावेश-ऋणावेश
सकारात्मक-नकारात्मक
परमाणु का इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन
सभी पदार्थ में है अणुओं का बंधन
अलग है फ्री रेडिकल्स की कथा
अल्पायु है,
चिपक लिया यदि कोई खाली मिला

सन्यासी ने जाते हुये 
न देखा मुड़ के
सन्यास भी मिलता है
किसी अज्ञात से जुड़ के

अद्वैत है
तो द्वैत भी है
दो है तभी अलग हैं
तभी जुड़ेंगे
अद्वैत बनेगा   

अकेले को सदैव खोज रहेगी
जो केवल मिल के ही पूरी होगी

विपरीत में है नैसर्गिक सामंजस्य
एक-दूसरे के पूरक
सबकी प्रकृति है पृथक
फिर क्यूँ भटकते हैं मुक्ति के लिए
जो बँट रही है अनायास
और
मिल जाती है बिन प्रयास

दृष्टि न कर सकेगी श्रवण
स्वाद-सुगंध के लिए हैं भिन्न अंग
सहअस्तित्व के लिये नहीं आवश्यक युद्ध-वृत्ति
गढ़ रक्खी है प्रकृति ने,
सहज प्रवृत्ति

सामाजिक विषमताओं 
और 
अधिकार के लिये
तो युद्ध होना चाहिये
पर श्रेष्ठता को मापना
अब बंद होना चाहिये

मुक्ति में नहीं है जीवन
किन्तु
बंधन से ही मुक्ति है सम्भव

दूसरे के बिना पूरक,
आधा और एकाकी है, 
है ना!!! 

- वाणभट्ट
 

गुरुवार, 6 मार्च 2014

दंश

दंश 

नारी 
जब माँ बनती है 
तो बड़े गर्व से कहती है 
मैंने बेटा जना

जनखों की 
बलैयों पे
देती है सब लुटा 

कभी  
अंदर गहरे 
उतर जाती है 
ये विडम्बना 

पर माँ खुश है 
कि  
नारी होने का दंश
जो  
इस देश में उसने भोगा 
उसकी संतति को 
न भोगना होगा

- वाणभट्ट


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

सम्बल

सम्बल 

झुर्रियों से लदी 
लाठी के सहारे रेंगती बुढ़िया  

चुम्बक लगी लकड़ी से 
लोहा बटोरती बंजारन सी औरत 

कुछ सिक्कों के लिए दिन-रात 
मेहनत करता अपाहिज भिखारी 

ट्रेन से कटी जाँघ पर 
कृत्रिम पाँव बाँधता आदमी 

बजबजाती गलियों में 
घोड़ी के आगे नाचते लोग

तेल चुपड़े बालों को गूँथ 
चटक बिंदी लगाती मजदूरन 

कूड़े में खज़ाना खोजती 
अबोध लड़कियाँ 

गंदे मैले कपड़ों में 
चमकती आँखें वाले बच्चे 

झोपड़ी से आती 
मासूम की किलकारी 

सबूत हैं जीवन का  

जो 
झकझोर के उठा देते हैं 
सोयी पड़ी
जिजीविषा को

और ज़िन्दगी बढ़ जाती है 

- वाणभट्ट   

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

मिशन जीवन - V

मिशन जीवन - V


ऑपरेशन संतति समाप्ति पर था। अमर-मानसी की संतानें जीवनयुक्त नए ग्रह अर्थेरा पर स्थापित हो चुकीं थीं। अब उनके समक्ष पृथ्वी के लिए ३५० वर्षों की लम्बी वापसी-यात्रा की चुनौती थी। अर्थेरा पर सामान्य भोजन और वायु के उपयोग के कारण उनका जीर्णन प्रारम्भ हो चला था। उन्हें यथाशीघ्र मिशन जीवन के अंतिम चरण को कार्यान्वित करना था।  अर्थेरा पर कोई भी इनकी भिन्न वेश-भूषा और पद्यतियों के बाद भी दूसरे ग्रह का वासी मानने को तैयार न था। उन्हें पिछले २५ वर्षों में निरंतर यही लगता रहा कि अमर-मानसी किसी विकसित कबीले से निष्काषित युगल हैं।

अर्थेरा आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से पिछड़ा अवश्य था परन्तु समुदाय के रूप में एक बहुत ही संगठित समूह था। इतने वर्षों में उनका सामना किसी भी अप्रिय घटना से नहीं हुआ था। यदि राजा अपनी प्रजा के प्रति जवाबदेह हो तो प्रजा भी उसकी आज्ञा को सर-माथे लेती है। पूरा अर्थेरा समाज सभी अपनी आवश्यकताओं और उत्तरदायित्वों का वहन परस्पर मिलजुल के सौहार्द पूर्ण तरीके से करता था। पृथ्वी के सभ्य समाज में व्याप्त आतंरिक विद्वेष का लेश मात्र लक्षण भी पिछले वर्षों में देखने को नहीं मिला। इन २५ वर्षों में कबीले  ने अमर-मानसी के सहयोग से अपनी जीवन शैली में अनेक सुधार किये, परन्तु उनकी मूलभूत व्यवस्था और आंतरिक ताने-बाने में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया। सहअस्तित्व सम्भवतः प्रकृति की मौलिक संरचना है। 

उचित अवसर पर एक दिन अमर-मानसी अपने यान तक गये। अंदर जा कर अपनी पृथ्वी वाली पोशाकों को पुनः धारण किया। यान को धरती पर चलाते हुए उसे अपने कबीले वाले गाँव ले आये। यान पूरे कबीले के लिए कौतुहल का विषय बन गया। दोनों ने सभी कबीले वालों के सामने अपने मिशन जीवन को विस्तार से समझाया। पृथ्वी से लाये चित्रों के द्वारा उन्होंने वहाँ की सभ्यता से सबको अवगत करने का प्रयास भी किया। दोनों ने समस्त काबिले को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और साम्राज्ञी से अपनी वापसी-यात्रा के लिए अनुमति भी माँगी। उन्हें अब दोनों की दूसरे ग्रह वाली बातों में कुछ सत्यता तो दिखाई दी। परन्तु पूर्ण प्रमाणिकता तो यान के आकाश में लोप होने के बाद ही हुयी।

यान में बैठने के बाद अमर ने मानसी से कहा अर्थेरा से निकलने के लिये हमें पृथ्वी की डेढ़ गुनी ज्यादा एस्केप वेलोसिटी चाहिये। यहाँ का गुरुत्व बल पृथ्वी की तुलना में ज्यादा है। इसलिए वातावरण को न्यूनतम दूरी में पार करना होगा। उसने प्रक्षेपण के लिये यान में लगे चारों राकेट को एक साथ आरम्भ होने का निर्देश कम्प्यूटर पर दे दिया। उलटी गिनती आरम्भ हो गयी थी। सेकेण्ड अंक के शून्य होते ही कम्प्यूटर ने चारों राकेट एक साथ दाग दिये। यान धरती की लंबवत दिशा में उठ गया और कुछ ही क्षणों में अर्थेरा वासियों की चकित दृष्टि से ओझल हो गया।

अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रहे मुख्य यान से संलग्न होना एक कठिन प्रक्रिया थी। लघु यान और मुख्य यान में माइक्रोवेव संचार के द्वारा अमर ने दोनों यानों को एक ही दिशा के लिए संचालित कर लिया। लघु यान के मुख्य यान में जुड़ने में हुयी एक भी गलती उन्हें सदैव अंतरिक्ष में ही रहने के लिए विवश कर देती। लघु यान को एक बार ही प्रयोग में लाने के लिए बनाया गया था। इसलिए वापस अर्थेरा ले वातावरण में प्रवेश करते ही वो छिन्न-भिन्न हो जाता। लघु यान को इस प्रकार जोड़ना था कि मुख्य यान पर किसी भी प्रकार का बल न लगे अन्यथा मुख्य यान अंतरिक्ष की असीम गहराइयों में डूब सकता था। मानसी ने इस पूरी प्रक्रिया को सहजता से पूर्ण किया। इस कार्य के लिए नियत १० सेकेण्ड में पूरी क्रिया को संपन्न करना था। अमर ने मानसी को कुशल संचालन के लिए बधाई दी। 

मुख्य यान पर आने के बाद अमर ने यान के ऑटो ट्रैकिंग उपकरण को सक्रिय कर दिया। इस उपकरण में यान के पथ से समस्त आँकड़े उपलब्ध थे। अब यान को स्वचालित प्रणाली में वापस पृथ्वी की कक्षा में स्थित चंद्रमा तक जाना था, जहाँ से इस यान की यात्रा प्रारम्भ हुयी थी। यात्रा लम्बी अवश्य थी पर उबाऊ बिलकुल नहीं। ग्रह-नक्षत्रों को इंफ्रा रेड टेलीस्कोप की सहायता से इतने निकट से देखना एक अलग ही अनुभव था। पुनः अमर और मानसी ने अपनी दिनचर्या को इस प्रकार व्यवस्थित किया कि दोनों में से एक पूर्ण रूप से चैतन्य रहे। श्वांस नियंत्रण और ध्यान का उनका पुराना खेल पुनः आरम्भ हो गया। तीन शताब्दी से अधिक अवधि की यह यात्रा उनके जीवन की अंतिम यात्रा हो सकती थी। अतः वे उसका सम्पूर्ण आनंद लेना चाहते थे।

लगभग ३०० वर्ष बीत चुके थे जब उन्होंने सौर्य मंडल में प्रवेश किया। इन छः-साढ़े छः सौ वर्षों में सूर्य मंडल कुछ बदल सा गया था। शनि के वलय समाप्त हो चुके थे। बृहस्पति के आकार में भी कमी आ गयी थी। मंगल की लालिमा में कुछ हरा-नीला रंग भी सम्मिलित था। मंगल और बृहस्पति के बीच एक पृथ्वी जैसे एक नए ग्रह का प्रादुर्भाव हो रहा था। पृथ्वी के चारों ओर दो-दो चन्द्र परिक्रमा कर रहे थे। ये सब उनके किये एक सुखद स्वप्न जैसा था। छः सौ साल पहले कोई ये कल्पना भी नहीं कर सकता था कि सौर्य मंडल में इस प्रकार परिवर्तन भी हो सकता है। दोनों को हर्ष था कि  वे इस घटना के साक्षी बने। उनकी यात्रा का अंत निकट आ रहा था। मात्र ४५-५० वर्ष और। 

अमर-मानसी ने यान की स्वचालित प्रणाली को बंद कर यान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सबसे पहले उन्होंने चन्द्र अंतरिक्ष केंद्र से सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। उधर से कुछ अस्फुट से सन्देश आ रहे थे। सन्देश कि भाषा भी उनकी समझ में नहीं आ रही थी। उन्हें लगा कि कहीं भारतीय अंतरिक्ष केन्द्र पर किसी अन्य देश ने अधिपत्य तो नहीं जमा लिया। दो चंद्रमाओं ने उनकी निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर दिया था। अमर ने मानसी से कहा धरती वालों ने लगता है चाँद के टुकड़े कर डाले। मानव के विकास और विनाश में अधिक अंतर नहीं है। अर्थेरा के लोग एक सम्पूर्ण जीवन जी रहे हैं। जबकि धरती पर इंसान तकनीक और क्षमताओं का उपयोग प्रकृति पर शासन करने के लिए कर रहा है। भारत का अंतरिक्ष केंद्र किस चाँद पर है, यह खोज पाना असम्भव सा लग रहा है। हम सीधे पृथ्वी पर प्रवेश करें। ये ही श्रेयस्कर प्रतीत होता है, मानसी ने अपनी सहज प्रतिक्रिया दे दी थी। 

अमर ने यान की दिशा पृथ्वी की ओर मोड़ दी। वातावरण के घर्षण से उत्पन्न यान के वाह्य तापमान को अनुज्ञेय सीमा से अंदर रखने हेतु अमर ने संक्षिप्त मार्ग का अनुसरण करते हुये वातावरण में प्रवेश लिया। अर्थेरा पर उतरने की पुनरावृत्ति करते हुये शीघ्र सम्पूर्ण यान पृथ्वी की विशाल जल राशि में समा गया। कुछ क्षणों के बाद यान समुद्र की सतह पर तैर रहा था। अपनी इस यात्रा को समाप्त करके अमर-मानसी के आनंद का ठिकाना नहीं रहा। वो हर्षातिरेक में चीख पड़े। यह यात्रा और उनका जीवन एक स्वप्न से कम नहीं था।सामान्य होने के बाद दोनों ने एक साथ  यान के प्रकोष्ठ से बाहर कदम रखा ही था कि उन्होंने यान को चारों तरफ से अन्य स्टीमरों से घिरा पाया। स्टीमरों पर सवार सभी की स्वचालित बंदूकों का लक्ष्य अमर-मानसी ही थे। उस समूह के मुखिया ने कुछ कहा। उसकी भाषा दोनों की समझ से परे थी। ये वही अस्फुट सी भाषा थी जिसे उन्होने चन्द्र अंतरिक्ष केन्द्र से संपर्क साधते हुए सुनी थी। दोनों ने क्षीण सी मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये। 

चारों ओर से घेर कर उन्हें उनके यान के साथ निकटस्थ तट तक लाया गया। वहाँ पर यान को उस समूह ने अधिकृत कर लिया। अमर-मानसी को बंधक बना कर मुखिया सिपाहियों की एक टुकड़ी के साथ एक गाड़ी में शहर की ओर चल दिया। उन्नति के सन्दर्भ में ये देश ७०० साल पहले छोड़े भारत से आगे लग रहा था। लगभग उस समय के अमेरिका जैसा। शीघ्र ही वे लोग एक विशाल भवन के सामने थे। उस भवन पर अंकित संकेत चिन्हों से अमर-मानसी ने अनुमान लगा लिया कि यह इस देश की अंतरिक्ष संस्था है। इसी ने अमर के माइक्रोवेव तरंग सन्देश का अंतरावरोधन किया होगा और तब से ही ये लोग यान के पृथ्वी पर प्रवेश की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। अमर-मानसी संतुष्ट थे कि वे वापस अपनी धरती पर आ गए हैं। दोनों ने किसी प्रकार का विरोध करना उचित नहीं समझा। उन्हें आशा थी कि शीघ्र ही वे अपनी बात इन लोगों को समझा सकेंगे। 

एक प्रतीक्षा कक्ष में दोनों को बैठा दिया गया। सिपाहियों का मुखिया भी उनके साथ बैठ गया। उसने अपनी भाषा में कुछ बात करने का प्रयास किया। थोड़ी ही देर में वे संकेतों की भाषा में कामचलाऊ बात कर रहे थे। शीघ्र उनकी प्रतीक्षा समाप्त हुयी। भीतर एक सभा कक्ष में कई लोग उपस्थित थे। सभा में उपस्थित लोगों ने अमर-मानसी से कई सवाल पूछे परन्तु वे विचारों का आदान-प्रदान कर सकने की स्थिति में नहीं थे। सभा की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति ने अमर-मानसी को एक विशेष कुर्सी पर बैठने का आदेश दिया। उनके पूरे शरीर को कुर्सी पर पट्टों की  सहायता से बांधने के पश्चात् उनके सर पर एक टोपी जैसा यंत्र लगा दिया गया। उन्हें आशा थी कि अब शायद बिजली के झटके दिए जाएँ परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। अध्यक्ष ने संकेत से अमर को अपनी बात कहने के लिए कहा। कुछ ही देर में अमर जो-जो सोच कर बोल रहे थे वो चलचित्र की भाँति सामने परदे पर दिखाई देने लगा। सभा में उपस्थित लोग कभी कौतुहल तो कभी असमंजस में वो दृश्य चित्र देख रहे थे। अमर ने अपनी पूरी यात्रा को अक्षरशः चित्रपट पर प्रदर्शित होते देखा। सभी पूरी तरह शान्त बैठे थे। पूरा वृतान्त समाप्त होते ही सभागार करतल ध्वनि से गूंज गया। सब लोग अपने स्थान पर खड़े हो गए थे।

मानसी सभाकक्ष के कोने में रखे ग्लोब को एकटक देख रही थी। उस पर अंकित महाद्वीप पृथ्वी के महाद्वीपों से अलग जान पड़ रहे थे।

(समाप्त)

- वाणभट्ट            
                      

कुत्ता प्रेम

कुछ लोगों को लेख के टाइटल से शिकायत होनी लाज़मी है. दरअसल सभ्यता का तकाज़ है कि कुत्ते को कुत्ता न कहा जाये. भले ही कुत्ता कितना बड़ा कमीना ...