शनिवार, 4 जनवरी 2014

मिशन जीवन - II

मिशन जीवन प्रारम्भ हुए 150 वर्ष बीत चुके थे। लगभग 75 वर्षों तक चन्द्र और पृथ्वी अंतरिक्ष केन्द्रों से अमर और मानसी का संवाद बना रहा। जब तक डॉ  संदीपन जीवित रहे उन्होंने चन्द्र केंद्र पर ही जीवन व्यतीत किया। ये मिशन उनका स्वप्न था, जिसे वो सफल होते देखना चाहते थे। परन्तु ये उनके जीवन काल में सम्भव न था। पृथ्वी से संपर्क टूटने के बाद अमर-मानसी की स्थिति किसी ग्रह पर स्थित जीवन जैसी ही हो गयी थी। सिवाय इसके कि यह ग्रह 1000000 मी प्रति सेकेंड की गति से अंतरिक्ष में बढ़ा चला जा रहा था। जबकि अन्य सभी ग्रह और तारे अपने-अपने पूर्व निर्धारित मार्ग पर चलने को विवश थे। इस ग्रह पर जीवन था, जो अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज में निकला था। जैसा डॉ संदीपन ने बताया था इन्हें एक सीधे मार्ग का अनुसरण करना था। अंतरिक्ष में यदि कोई वाह्य बल न हो तो दिशा परिवर्तन कि सम्भावनायें नगण्य हैं। 

अमर और मानसी का जीवन सांसों की गणित पर आधारित था। अंतः उनका मुख्य कार्य अपनी सांसों का नियंत्रण ही था। अभ्यास के द्वारा वे अब एक साँस में दो मिनट तक सहजता से रह सकते थे। इस मानसिक खेल में उनकी भाव-भंगिमा यंत्रवत हो कर रह गयी थी। कोई भी अनावश्यक गतिविधि उनके लिये वर्जित तो नहीं अपितु निषिद्ध थीं। अनावश्यक रूप से उन्हें पलकें न झपकाने का भी प्रशिक्षण दिया गया था। उन्हें अपनी भावनाओं पर भी नियंत्रण रखना था। किसी भी प्रकार की उत्तेजना उनकी श्वसन प्रक्रिया को बढ़ा सकती थी। उनका मुख्य शगल था साँसों को अधिकाधिक देर रोके या छोड़े रखना या इन्फ्रारेड टेलिस्कोप की सहायता से अंतरिक्ष में जीवन को तलाशना। उन्हें उम्मीद थी किसी तारे की कक्षा में अवस्थित ग्रहों पर पृथ्वी जैसे वातावरण की उपस्थिति। मुख्य रूप से उन्हें किसी नीले या हरे ग्रह की खोज करनी थी। उनकी आँखें सदैव इन्हीं रंगों की तलाश में थीं। दोनों ने अपने सोने और जागने के क्रम को इस प्रकार व्यवस्थित किया था कि दोनों में से एक हमेशा सजग रह सके। उनके लिए एक और चीज़ निषिद्ध थी एक-दूसरे का आई कॉन्टैक्ट यानि नेत्र सम्पर्क।

एक दिन मानसी ने अमर को अपनी ओर विचित्र दृष्टि से निहारते हुये पाया। वो अमर के व्यवहार में परिवर्तन कुछ दिनों से महसूस कर रही थी। उसे अमर की मनःस्थिति भाँपने में देर नहीं लगी। स्त्रियों की छठीं इंद्री लोगों के विचारों का अनुमान लगाने के लिये कुछ ज्यादा ही विकसित होती है। एक मीठी झिड़की देते हुए उसने अमर से कहा अभी बहुत ज़िंदगी पड़ी है। भावावेश में अपनी सांसों को व्यर्थ न करो। हमें अपने मिशन के अंतिम चरण तक पहुँचने का प्रयास करना होगा। नये ग्रह पर हम अपने विश्वास को मूर्त रूप दे पायेंगे। तब तक धैर्य ही हमारा अस्त्र है।

अमर और मानसी की मित्रता एवियोनिक्स में डिग्री के प्रथम वर्ष में ही आरम्भ हो गयी थी। उसी समय डॉ संदीपन ने अपने छात्रों के सम्मुख मिशन जीवन का जिक्र किया और आह्वाहन किया ऐसे युगलों का जो इस मिशन में काम करने के इच्छुक हों। पूरे एवियोनिक्स और एरोस्पेस इंजीनियरिंग के छात्रों में तीन युगलों ने अपने नाम इस मिशन के लिये दिये थे। इसके बाद उन्हें चार सालों के अंतरिक्ष अभियांत्रिकी, वैमानिकी, योग और श्वसन क्रिया पर कड़े और कठिन प्रशिक्षण कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया गया। प्रथम मिशन के लिये अमर और मानसी की जोड़ी ने सभी परीक्षाओं में उच्चतम अंक प्राप्त किये। इस चयन में श्वसन क्रिया और स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण माना गया। मिशन का मुख्य उद्देश्य लोंजिविटी यानि दीर्घ आयु प्राप्त करना था। इसलिये डॉ संदीपन ने मिशन जीवन के प्रथम अभियान में इनको स्थान दिया। अन्य दो टीमों के लिये इस मिशन में सम्भावनाओं का पटाक्षेप हो गया। सभी प्रतियोगियों ने चन्द्रमा पर स्थानांतरित होने से पूर्व इस मिशन की कामयाबी के लिये अमर-मानसी को बधाई और शुभकामनायें दीं।

यान अपनी गति से बढ़ा जा रहा था। कई बार यान उल्काओं से टकराने वाला था। परन्तु दोनों ने उसे अपनी सहज व त्वरित बुद्धि से बचा लिया। एक बार तो यान एक श्याम विवर यानि ब्लैक होल की चपेट में लगभग आ ही गया था। अमर और मानसी ने प्रणोदन यानि प्रोपल्शन यूनिट की सारी शक्ति उस विवर के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध झोंक दी। ये सन्योग ही था कि यान के संवेदी यंत्र ने जब वाह्य गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की चेतावनी दी, उस समय दोनों जागृत अवस्था में थे। स्पेस एविएशन सेण्टर पर उन्हें सेकण्ड के हज़ारवें हिस्से से भी कम समय में निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षित था। वैमानिकी के सभी गुर उनकी मूल प्रवृत्ति यानि बेसिक इंस्टिंक्ट में आत्मसात कर चुके थे।अन्यथा 1000000 मी/सेकेण्ड की गति पर चालकों की जरा सी भूल इस पूरे मिशन पर पानी फेर सकती थी। 

दो-ढाई सौ साल से नीरस जीवन व्यतीत करना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी। मिशन के प्रति प्रतिबद्धता, संयमित दिनचर्या और कड़ा प्रशिक्षण इन दोनों को विशिष्ट बनाती थी। विशिष्ट मिशन के लिये विशिष्ट व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। पृथ्वी से संपर्क टूटने के बाद भी दोनों के लिये मन में कोई नकारात्मक विचार लाने की सम्भावना नहीं थी। नकारात्मक ऊर्जा उनकी आयु को प्रभावित कर सकती थी। उनका मानसिक खेल सदैव उन्हें व्यस्त रखता। उन्हें विश्वास था कि वे धरती के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन खोजने में सक्षम होंगे। डॉ संदीपन का मिशन अब उनका मिशन था। मंद मेटाबोलिक रेट के कारण उनके शरीर में किसी भी प्रकार के जीर्णन का प्रभाव गोचर नहीं था। जबकि उतने ही समय में धरती पर दो-तीन पीढ़ियाँ अपना अस्तित्व खो चुकीं थीं। इस बात का संज्ञान अमर और मानसी के लिये संजीवनी का काम करता। आचार-विचार और श्वसन तन्त्र का सदुपयोग कैसे जीवनी शक्ति को विकसित  कर सकता है, ये भारत के ऋषि-मुनियों को सदियों से ज्ञात था। विज्ञान और वैदिक ज्ञान इस मिशन के मूलभूत आधार थे। डॉ संदीपन और इसरो के प्रमुख वैज्ञानिकों को इसका सम्पूर्ण श्रेय दिया जाना चाहिये। अंतरिक्ष शोध में पृथ्वी के कई देश भारत की तकनीकी क्षमता के समतुल्य अवश्य थे, परन्तु दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिये उनके पास कोई प्रणाली नहीं थी। आयु संवर्धन के वैदिक ज्ञान ने भारत को अन्य विकसित देशों से अग्रणी कर दिया।

मानसी ने लगभग झकझोरते हुये अमर को योग निद्रा से जगा दिया। अमर उठो और जल्दी देखो हरा ग्रह। हमें तुरंत यान की दिशा को मोड़ना होगा। वे अब तक तीसरे तारे की परिक्रमा कक्ष में प्रवेश कर चुके थे। एस्ट्रोनॉमी के अनुसार यह खगोलीय पिण्ड सूर्य के निकटस्थ तीसरे तारे अल्फा सेंटिनो के चौथे ग्रह जिबेका का एक उपग्रह था। जैसे धरती के लिये चाँद परन्तु ये अपनी धूरी पर घूम रहा था। अमर के निर्देश पर यान में लगे परम संगणक ने गणनायें प्रारम्भ कर दीं। आकार में ये पृथ्वी से 1.5 गुना बड़ा था। ये पिण्ड 40 घंटे में अपने स्थान पर एक चक्कर लगा लेता है। यानि यहाँ दिन-रात 20 घंटे के होंगे। अपने मूल ग्रह जिबेका की परिक्रमा ये पिण्ड 375 दिन में पूरी कर लेता है। और जिबेका अपने सूरज अल्फा सेंटिनो के चारों ओर परिक्रमा 725 दिन में पूरी कर लेगा। अमर और मानसी के लिये ये क्षण यूरेका मोमेंट से कम नहीं था। तुरंत उन्होंने अपने यान कि दिशा उस हरे ग्रह की ओर मोड़ दी। इस पिंड का नाम रखा गया - अर्थेरा। 


Green Planet
अर्थेरा 
(चित्र साभार : http://www.zastavki.com/eng/Space/wallpaper-31236.htm) 

अगले पचास सालों की यात्रा में अमर-मानसी ने उस हरे खगोल पिण्ड, अर्थेरा, को टेलिस्कोपिक आई से एक पल भी ओझल नहीं होने दिया। जैसे-जैसे वो इस पिंड के निकट आते जा रहे थे, उनका विश्वास उस ग्रह  पर जीवन की सम्भावनाओं को लेकर बढ़ता ही जा रहा था। टेलिस्कोप से उन्होंने उस ग्रह पर समुद्र और धरती दोनों की उपस्थिति का भान हो चुका था। उस ग्रह में हरे रंग की उपस्थिति वनस्पतियों के आधिक्य की ओर इंगित कर रही थी। अब बस ये देखना था कि यहाँ भी पानी जैसे पदार्थ की रासायनिक संरचना H2O ही है। ऑक्सीजन ही यहाँ प्राणवायु है या नहीं। पृथ्वी पर जितने तत्वों और यौगिकों की उपस्थिति ज्ञात की जा चुकी है, ब्रम्हांड में उससे अधिक अवयवों की सम्भावनायें वैसे तो न के बराबर थीं। परन्तु नये ग्रह पर जीवन के विषय में मात्र अनुमान ही लगाया जा सकता है। हो सकता है, वहाँ जीवन नाइट्रोजन से चलता हो। और वनस्पतियाँ अम्लीय या क्षारीय माध्यम में जीवित रहतीं हों। अमर-मानसी के अंतःकरण ऐसा मानता था कि जीवन वहीं होगा जहाँ सारी स्थितियाँ पृथ्वी जैसी होंगी। और किसी भी ग्रह पर आदमी से उन्नत प्राणी नहीं मिलेगा। एकदम विपरीत परिस्थितियों की सम्भावना नगण्य थी, किन्तु सुरक्षा की दृष्टि से ये सब तय करना आवश्यक था। 

यान को अर्थेरा की वाह्य कक्षा में स्थापित करने के पश्चात अमर और मानसी ने लघु यान के द्वारा अर्थेरा पर जाने का निर्णय लिया। मुख्य यान ग्रह की वाह्य कक्षा में परिक्रमा करता रहेगा, जबकि छोटे यान की सहायता से वे लोग अर्थेरा की धरती पर उतरेंगे। यदि जीवन की संभावनायें मिलतीं हैं तो वे वहाँ 20-25 साल जीवन व्यतीत करके अपनी वापसी यात्रा पर लौट चलेंगे। दोनों ने छोटे यान में बैठने के बाद तीन सौ सालों में पहली बार एक-दूसरे की आँखों में डूब कर देखा। उन्हें ये एहसास था कि यह यात्रा या तो एक नये जीवन का आरम्भ बन सकती है या इस जीवन का अंत। 


लघु यान 


(क्रमशः)


 - वाणभट्ट

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

मिशन जीवन - I

चंद्रमा की सतह पर एक अत्याधुनिक भवन के सभा कक्ष में इसरो के कई मुख्य वैज्ञानिक और अधिकारी, भारत के प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग में व्यस्त थे। जब से चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि की, भारत का अंतरिक्ष मिशन काफी आगे निकल चुका है। ऑॅक्सीजन की जीवनी और हाइड्रोजन की ऊर्जा शक्ति दोनों को मिला कर इसरो ने चंद्रमा पर ही अपना अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र स्थापित कर दिया। इस प्रकार पृथ्वी के वातावरण और गुरुत्वाकर्षण से निकलने में जो ऊर्जा व्यय हो जाती थी, उसका उपयोग यान को गति देने में किया जा सकता था। चन्द्रमा से प्रक्षेपण करने पर पृथ्वी से छह: गुना अधिक गति प्राप्त की जा सकती थी। इस नये मिशन के लिये यान को पृथ्वी की तुलना में 100 गुना अधिक एस्केप वेलोसिटी के लिए डिज़ाइन किया गया था। गणनाओं के अनुसार चंद्रमा से 1000 किमी प्रति सेकेण्ड की स्पीड प्राप्त करना कठिन न होगा। मिशन का उद्देश्य अनन्त अंतरिक्ष में गोता लगाने के सामान था। एक दिशा में बढ़ते हुए ब्रम्हांड में किसी जीवन की तलाश। योजना 'राह पकड़ तू एक चलाचल पा जायेगा मधुशाला' से प्रभावित जान पड़ती थी। लक्ष्य था 400 साल तक यान को आगे ले जाना और उतना ही समय वापसी के लिये नियत किया गया था। निकटस्थ तारों में जीवन की सम्भावनायें खोजने के लिए तक़रीबन 350 वर्षों का समय लगाने की सम्भावना थी। चंद्रमा से प्रक्षेपण का ये पहला मिशन था। इसे ले कर सभी वैज्ञानिक उत्साहित थे। प्रधानमंत्री जी की भी इस प्रोजेक्ट में विशेष रूचि थी। मिशन के मुखिया डॉ. संदीपन ने प्रोजेक्ट की पूरी रूप रेखा प्रधानमंत्री महोदय के समक्ष प्रस्तुत की।

अंतरिक्ष यान चार मुख्य इकाइयों का संयोजन था। पहला गाइड यूनिट: यान की दिशा पर नियंत्रण हेतु। इसमें यान चालकों के लिए कॉकपिट और रहने की व्यवस्था थी। इस यूनिट में ऑक्सीजन और तापमान का स्तर पृथ्वी के हिसाब से डिज़ाइन किया गया था। इसके फ्रंट एंड पर लगा था, इन्फ्रारेड गाइडेड टेलिस्कोप जो एक प्रकाश वर्ष दूरी तक आकाश के भीतर देख सकने की क्षमता से लैस था। इसकी सहायता से चालक को यान की दिशा नियंत्रण का निर्णय करने में सहायता मिलती। गाइड यूनिट से ही लगी हुयी ट्रैकिंग यूनिट थी। इस यूनिट का कार्य स्पेस में यान की स्थिति को स्पष्ट करना, हाई रेजोल्यूशन कैमरे से यान के यात्रा मार्ग के चल-चित्र भेजना और वापस लौटते समय जाने वाले मार्ग को ट्रैक करते हुए ऑटो मोड में यान को वापस पृथ्वी की कक्षा तक लाना। तीसरा यूनिट फ्यूल या ईंधन के लिये समर्पित था।  मुख्य रूप से ये पानी का वृहद् टैंक था। जिसके साथ एक हाइड्रोजन-ऑक्सीजन स्प्लिटिंग डिवाइस लगी थी। जो फ्यूल या ऑक्सीजन की आवश्यकता के अनुसार पानी को विभाजित कर लेती थी। निर्वात में एक बार गति प्राप्त कर लेने के बाद किसी तरह का घर्षण न होने के कारण यान की गति में कोई ह्रास नहीं होता। ईंधन का उपयोग सिर्फ यान की दिशा में परिवर्तन के लिये करना था। यही स्प्लिटर यान के कक्ष में ऑक्सीजन का स्तर बनाये रखता था। चौथी यूनिट फ़ूड यानि खाद्य यूनिट थी। मिशन के यात्रियों के ऊर्जा या कार्य शक्ति को बनाये रखने के लिये भोजन आवश्यक था। भोजन का मुख्य स्रोत नूट्रीशनली एनरिच्ड टेबलेट्स थीं और पीने के लिये एनर्जी ड्रिंक्स। इस यान में एक विशेष लघु अंतरिक्ष यान की भी व्यवस्था की गयी थी। मुख्य यान को ग्रहों की वाह्य ऑर्बिट में छोड़ कर जीवन की तलाश में ग्रह के वातावरण में प्रवेश किया जा सकता था। इस लघु यान में लगीं प्रोब्स के द्वारा उस ग्रह  के वातावरण के आंकड़ों के आधार पर जीवन की सम्भावनाओं को सुनिश्चित किया जा सकता था। आवश्यकता पड़ने पर इसे किसी ग्रह की भूमि पर उतारना और उसे वापस मुख्य यान तक वापस लाना सम्भव था। इस मानव मिशन के बारे में सूचनायें गुप्त रखी गयीं थी। सभी को डर था कि यदि मैन-मिशन की ख़बर लीक कर गयी तो दुनिया भर से अधिक सक्रिय भारतीय मानवतावादी संगठन इस अभियान का विरोध आरम्भ कर देंगे।

यान की संरचना की संक्षिप्त जानकारी देने के बाद डॉ संदीपन ने गम्भीर लहजे में कहना शुरू किया। मिस्टर प्राइमिनिस्टर हम इस मिशन पर पूरे 500 मिलियन डॉलर खर्च कर रहे हैं। ये मिशन अगले 600-800 सालों के लिये है। ये हम सभी पृथ्वी वासियों के लिये जीवन में एक बार वाला मिशन है। महोदय इसलिये मै आपसे कुछ सीमाओं के आगे जाने की अनुमति चाहता हूँ। हम इसे मैन-मिशन बनाना चाहते हैं। अब तक मानव रहित यानों को चंद्रमा से आगे भेजा गया है। ये अभियान मानव सहित ब्रम्हांड की अथाह गहराइयों में खोज के लिये आरम्भ किया गया है। अंतरिक्ष में यान भेज देने से हमारा काम सिर्फ फ़ोटो तक ही सीमित रह जाता है। यान यदि किसी अन्य ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आ जाये तो उसका मिशन वहीं समाप्त समझिये। यदि हम इसमें किसी मानव को भेजते हैं तो निश्चय ही यान पर नियंत्रण बनाये रखना आसान हो जायेगा। यान में लैस इन्फ्रारेड टेलीस्कोप की सहायता से चालक एक लाइट इयर दूर तक देख सकता है और उसी के अनुसार अपनी यात्रा की दिशा निर्धारित कर सकता है। ये सुविधा अनमैन्ड मिशन में नहीं मिल सकती। उसे धरती या चंद्रमा पर स्थित कंट्रोल रूम से ही चालित करना पड़ता है। अंतरिक्ष रूपी समुद्र में यदि जीवन तलाशना है तो हमें गोता लगाने जैसा कुछ करना ही पड़ेगा। जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ. आप अंतरिक्ष में जितना अंदर घुसते जायेंगे ब्रम्हांड में जीवन के खोज की सम्भावनायें उतनी ही बढती जायेंगी। हाँ लौट के वापस आने की सम्भावना भी उतनी ही क्षीण होती जायेगी। पर मुझे उम्मीद है कि हमारे वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की रिवर्स ट्रैकिंग डिवाइस की सहायता से यान सकुशल वापस आ सकेगा। यदि मानव जीवित लौट आता है तो न सिर्फ भारत कि अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के लिये अनमोल उपलब्धि होगी।

प्रधानमंत्री की व्यग्रता बढती जा रही थी। संदीपन जी आप क्या कहना चाहते हैं। निकटतम तारे की कक्षा में घुसने में हमें 350 साल लगते हैं और एक आदमी जिसका जीवन, सौ-पचास साल में ख़त्म हो जाता है, हम उसे यान में भेज दें। ये तो जान बुझ कर किसी को मौत के मुँह में धकेलने जैसा है और आप इस पर मेरी सहमति भी चाहते हैं। नहीं ये कदापि सम्भव नहीं है। संदीपन उवाच -  सर, मै एक नहीं दो लोगों को इस मिशन पर भेजना चाहता हूँ। इसके लिये एक स्त्री और पुरुष युगल को स्पेशल ट्रेनिंग दी गयी है। ये दोनों भारतीय योग पद्यति से एक मिनट में मात्र 1-2 साँस प्रति मिनट पर जीवित रह सकते हैं। शुद्ध ऑक्सीजन के साथ ये 2-3 मिनट में एक साँस पर भी रह सकते हैं। कम साँसों से शरीर का मेटाबॉलिक रेट कम हो जाता है। ऑक्सीडेशन और फ्री रेडिकल्स की प्रक्रिया क्षीण पड़ जाती है। जिससे उम्मीद है कि ये खुद को 800 से 1000 सालों तक जीवित रखने में सफल होंगे। पृथ्वी पर दीर्घ आयु प्राणियों की श्वसन दर अत्यंत कम होती है। कछुए 4-5 श्वांस प्रति मिनट की दर से आसानी से 400-500 साल जीवित रह लेते हैं। इस युगल की आयु मात्र 20 वर्ष है। बचपन से इन्हें इसी मिशन के लिये तैयार किया गया है। इन्हें यान चलाने, उसके रख-रखाव और ज़ीरो ग्रेविटी पर रहने का भी प्रशिक्षण दिया गया है। ये कम ऑक्सीजन और जीरो ग्रेविटी पर भी एक सामान्य मानव की तरह व्यवहार करने में सक्षम हैं। निर्वात और ज़ीरो  ग्रेविटी पर वैसे भी में जीर्णन गति मंथर पड़ जाती है। ये दोनों स्वयं इस मिशन के प्रति आश्वस्त हैं और तत्पर भी। इन पर किसी तरह की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। बल्कि ये स्वयं इस पुनीत कार्य में आपका आशीर्वाद चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा - मित्रों, मै कैसे अपने होनहारों को जानबूझ कर मौत के मुँह में धकेल दूँ। पर डॉ संदीपन अपनी योजना के प्रति कृतसंकल्प लग रहे थे। उन्होंने कहा यदि लोग ऐसे ही भयभीत हो जाते तो शायद दुनिया गोल है, ये पता कर पाना भी मुश्किल होता। अंतरिक्ष में प्रवेश से पहले भी तो ऐसी ही किम्वदंतियां थीं। और हमें ऐसे युवा तैयार करने में भी 20 से 25 साल का समय लग जाता है। मेरे विचार से वर्त्तमान ही इस कार्य के संपादन का सर्व श्रेष्ठ समय है। आप चाहें तो अमर और मानसी से मिल भी सकते हैं।

अमर, मानसी, डॉ  संदीपन और उनकी प्रतिबद्ध टीम के हौसलों को देखते हुए प्रधानमंत्री जी को इस मिशन को आज्ञा देनी पड़ी और आशीर्वाद भी। पूरा चन्द्र अंतरिक्ष केंद्र ख़ुशी और जश्न के माहौल में डूब गया।

 (क्रमशः)

- वाणभट्ट

(चित्र : साभार http://2.bp.blogspot.com/gqSOnXfNPQc/T1RGhAj9Q6I/AAAAAAAADI0/CTx62mP7Cmo/s400/ring-galaxy.jpg)


शनिवार, 28 दिसंबर 2013

बिदाई

हमारे देश में बिदाई अपने आप में एक अत्यंत भावुक प्रसंग है। विवाह के उपरान्त वधु की बिदाई बहुत ही मार्मिक हो जाती है अगर कोई बिस्मिल्ला खां साहब की शहनाई बजा दे। रफ़ी साहब का बाबुल की दुआयें लेती जा… अगर बज गया तो तय है कि स्वयं वर, वधु से ज्यादा भावुक हो जाये। कई बार तो वधु को अपना रुमाल देने के बजाय वो खुद उसके आँचल से अपने आँसू पोंछने लग जाता है। अपने विवाह के समय मैंने जब दो शर्तें रख दीं कि बारात का स्वागत भले शहनाई से कर लीजिये, पर विदाई कतई नहीं। और ये रफ़ी साहब वाला गाना कहीं से भी कान में नहीं पड़ना चाहिये। होने वाली धर्मपत्नी के घर वाले चौंक गये। कैसा बंदा है दहेज़ के युग में उट-पटांग सी डिमांड कर रहा है। मेरी मज़बूरी थी कि मै पहले ही दिन अपनी भावुकता का प्रदर्शन करने से बचना चाहता था। पर बिदाई के वक्त इंसेंसटिविटी की इन्तहा हो गयी। अगर टीवी-फ्रिज की डिमांड होती तो लोग याद रखते, मेरी छोटी से ख्वाहिश को सब भूल गये। शहनाई वाले ने बिदाई को यादगार बनाने के लिये बाबुल की दुआएं…धुन छेड़ दी। फिर मेरा क्या जुलुस निकला होगा इसका अन्दाज़ आप सब लगा सकते हैं। बीवी और सास मुझे चुप कराने में लगीं थीं और ससुर बेचारे कन्धा छुड़ाते भाग रहे थे।  

पर यहाँ बिदाई का ज़िक्र नौकरी से रिटायरमेंट के सन्दर्भ में है। बिदाई विवाह के अवसर पर हो या रिटायरमेंट के, दुखद न भी कहें, तो कुछ अजीब सा अनुभव तो है ही। वहाँ बाप खुश है कि बेटी से फुर्सत मिली अब वो गंगा नहायेगा। यहाँ साथी खुश हैं कि एक निपटा। लेकिन मज़ा ये है दोनों असीम दुःख प्रदर्शित करना चाहते हैं। आम आदमी का रिटायरमेंट भी आम होता है और बिदाई भी। भले सब लोग चंदा दे दें, पर विदाई समारोह तक जाने का समय निकाल पायें ये ज़रूरी नहीं। पर ख़ास आदमी, जो अमूमन बॉस हुआ करता है, के रिटायरमेंट और बिदाई को ख़ास बनाने के लिये उसके चेले कोई कोर-कसर  नहीं छोड़ते। हॉल खचाखच भर जाता है सिर्फ़ ये देखने के लिए कि चेले जो अब तक बॉस के साथ मौज की रोटियाँ तोड़ रहे थे, कैसे विलाप करते हैं। बॉस जिसके शरीर में पद के कारण जो कलफ़ सी अकड़न आ गयी थी, वो कैसे जाती है।

जिस बॉस ने खौफ़ कायम करके काम लिया हो वो ये भी जानता है कि लोग डर से नतमस्तक थे और मौका पड़ते ही बगावत कर सकते हैं। ये बगावत कोई क्रांतिकारी बगावत नहीं होती। बस लोग निर्णय ले लेते हैं कि गुंडई करने वाले बॉस को फ़ेयरवेल नहीं देनी। रिटायरमेंट तो होना ही है पर फ़ेयरवेल मिलेगी कि नहीं ये निर्णय जनता लेती है। एक तरह से ये आपकी इंटिग्रिटी रिपोर्ट होती है। बॉस बनने के बाद आप पद में निहित अपनी शक्तियों का दुरूपयोग करते हुये सबकी सत्यनिष्ठा परिभाषित करते हैं। हमारे देश ने बॉसों को सत्यनिष्ठा से इम्युनिटी दे रक्खी है। चाहे कितना भी भ्रष्ट अफसर हो, उसकी सत्यनिष्ठा नीचे वाले लोग तो भर नहीं सकते। इसलिये फ़ेयरवेल ही मानक है कि आप कितने लोकप्रिय हैं। चूँकि हमारा बॉस मैनेजर से ज्यादा प्रशासक बनने  में लगा रहता है इसलिये वो ये भी सुनिश्चित करना चाहता है कि ऐसी बगावत न हो और अगर होने वाली हो तो पहले से पता चल जाये। इस विषम परिस्थिति से निपटने के लिये वो भी आखिरी दिन तक सीआर का खौफ़ लटका के रखता है। या ये बता के रखता है कि किसी भी पल अगले छः महीनों के लिये एक्सटेंशन लेटर आता ही होगा। डरे सहमे लोग जिन्होंने आपको कई साल झेला है, कुछ और दिन झेलने को विवश हो जाते हैं। बिदाई मिलने के बाद आप धीरे से पतली गली से निकल लेते हो। 

मेरी बिदाई का समय नज़दीक आ रहा था। राज योग की शुरुआत मानो कल की ही बात हो। चार साल कैसे निकल गये पता ही नहीं चला। राज्याभिषेक एक स्वप्न की तरह लगता है। विभाग के उच्चतम पद पर मेरी नियुक्ति एक संयोग से कम नहीं थी। तब मैंने ईश्वर का शुक्रिया भी अता किया था। उस समय मै वाकई सेवा करना चाहता था। पर सिस्टम में पहले से जुटे लग्गू-भग्गू को अपनी मलाई की चिंता हो जाती है। बॉस अगर सबके साथ रहेगा तो आम और ख़ास लोगों में फर्क नहीं रह जायेगा। उन्होंने बताया कि जिनसे काम लेना है, उनसे दूरी  बना के रखना ज़रूरी है। उन्होंने मुझे मेरी और मेरे पद में अवस्थित शक्तियों का भान कराया। ये चेंज  कैसे हुआ मुझे ख़ुद पता नहीं चला। मुझमें इन लोगों ने इतनी इनसेक्यूरिटी भर दी कि मैंने लोगों पर विश्वास करना बंद कर दिया। लगता था सब नकारे और निकम्मे हैं और मुझे इनसे काम कराने के लिये भेजा गया है। सख्ती करो तो लगता लोग मुझे और मेरे पद को उचित आदर नहीं दे रहे हैं। जो एक प्रशासक का जन्मसिद्ध अधिकार है। पर एक बार इनसेक्युरिटी की फीलिंग अगर किसी में आ गयी, तो उसके आचार-विचार में कैसे परिवर्तन आ जाता है, ये मै अब महसूस कर सकता हूँ। 

अपने को सिक्योर करने के लिये लग्गू ने सुझाया कि सबोर्डिनेट्स में असुरक्षा की भावना जब तक नहीं होगी तब तक आप असुरक्षित ही रहेंगे। तो मीटिंग्स में जो भी बोलने का प्रयास करे, उसी पर दाना-पानी ले कर चढ़ जाओ। जब बोलने वाले चुप हो जायेंगे तो न बोलने वाले अपने आप तुम्हारे साथ हो जायेंगे। भग्गू ने बताया कि जो लिखने वाले हैं उन्हें उल्टा मेमो थमा दो। आफ्टर ऑल यू हैव टेन पेंस। लिखने वाले शरणागत हो जायेंगे। जो थोड़ी बहुत चूँ -चाँ करे उसे कमरे में बुला के हड़का दो। लग्गू ने समझाया सिर्फ़ और सिर्फ़ हम आपके प्रति वफ़ादार हैं।  भग्गू ने बताया आप सिर्फ़ हमारा ख्याल रखिये और सारी व्यवस्था हमारे ऊपर छोड़ दीजिये। पूरे चार साल लग्गू-भग्गू ने मुझे कन्फ्यूज़ करके रख दिया। मै सिर्फ़ ये ही इंश्योर करता रहा कि कौन मेरे साथ हैं और कौन नहीं। चूँकि इस सिस्टम में टारगेट और जवाबदेही, नीचे वालों की होती है इसलिये मुझे ज़्यादा दिक्कत नहीं हुयी। पर अब रिटायरमेंट आ ही गया समझो, तो एक चिंता सता रही है कि फ़ेयरवेल मिलेगा या नहीं। इतने दिन मैंने जबरन आदर तो बटोर लिया। पर अब यदि फ़ेयरवेल न हुआ तो ये बात जग जाहिर हो जायेगी कि चार सालों में मेरी जनमानस में कोई पैठ न बन पायी। आजकल ये डर भी लगता है कि जिन्हें सार्वजानिक और व्यक्तिगत रूप से इन वर्षों में अपमानित करता रहा, कहीं वो अपने उदगार न व्यक्त कर दें। आजकल तो लग्गू-भग्गू पर भी शक़ होता है। कमरे में कम आ रहे हैं। पर उन्हें ही बुलाना पड़ेगा और कोई तो शायद मेरे बुलाने पर भी न आये।  

लग्गू-भग्गू से अपनी चिंता जब साझा की तो उन्होंने इसका समाधान भी निकाल दिया। लग्गू ने कहा कल से ही हम आपके फ़ेयरवेल के लिये चंदा इकठ्ठा करना शुरू कर देंगे। जो-जो बागी है उनकी लिस्ट दो दिन में आपके हाथ होगी। उनकी सीआर और इंटीग्रिटी के साथ कैसा सुलूक करना है, ये निर्णय आपका। भग्गू ने कहा पहले अलग-अलग ग्रुप्स से आपकी बिदाई करवा देतें हैं। शुरुआत मेरे यहाँ से। फिर देखिये कैसी होड़ लगती है, आपको बिदाई देने की। मैंने कहा धन्यवाद, यू पीपुल आर रियली जीनियस। दोनों ने एक सुर में जवाब दिया वी आर विथ दी चेयर, सर। 

अब मै निश्चिन्त हूँ एक भाव-भीनी बिदाई पाने के लिये। 

- वाणभट्ट 

पुनश्च : हरिवंश राय 'बच्चन' जी की कालजयी रचना मधुशाला की पंक्तियाँ समर्पित कर रहा हूँ -
      
छोटे से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जाने वाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला।

अपने विदा की तैयारी स्वागत के साथ ही शुरू कर देनी चाहिये।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

राज योग

ज्योतिषी महोदय कुंडली में घुसे पड़े थे। पोस्ट ग्रेडुएशन के बाद नौकरी के आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे थे। एक मित्र ने सलाह दी कि पोथी-पत्री भी बिचरवा लो। ग्रह-नक्षत्रों की चाल ज्ञानी पंडितों से छिपी नहीं रहती। जब आदमी कमज़ोर पड़ता है तो यही सब टोटके उसके लिए जीने का सम्बल हो जाते हैं। सब कुछ सही-सलामत चलता रहे तो कौन पूछता है इन ज्ञानी-ध्यानियों को। 

युवा ज्योतिषी के चेहरे पर एक अद्भुत तेज़ था, या बेरोज़गारी से मेरा तेज़ फीका पड़ गया था, कहना मुश्किल है। कुछ मिनटों की सघन गणना करने के बाद जब उसने कुंडली से ऊपर सर उठाया तो मुझे और मेरे मित्र दोनों को उसने अपनी भविष्यवाणी सुनने हेतु लालायित पाया। गुरु-गम्भीर आवाज़ में उसने फ़रमाया जातक की कुंडली में राज योग है। ये बहुत आगे जायेगा और राज सुख का भागी बनेगा। मैंने मन ही मन कहा बेटा ज़माने के साथ तू भी उड़ा ले मज़ाक मेरी मुफ़लिसी का। पर मेरा दोस्त खुश हो गया और उसके हाथ पर दस रूपया रख दिया। बाद में मैंने कहा यार ये दस रुपये तेरे उधार रहे। दोस्त बोला जब डी-एम, वी-एम बन जाओगे तो सब सूद-ब्याज़ सहित वसूल लूँगा। उसी के कहने पर जीएस की किताबें भी खरीद लीं, आईएएस/पीसीएस के फॉर्म भर दिये। तथाकथित तौर पर भरसक तैयारी में जुट गया। विशिष्ट क्षेत्र में अध्ययन के बाद विकल्प सीमित हो जाते हैं। दूसरे विषयों के साथ प्रतियोगितायें निकालना किसी चुनौती से कम नहीं है।

बहरहाल खुशकिस्मत रहा कि जिस विश्वविद्यालय से पढाई की थी वहीं अध्यापन हेतु कुछ रिक्तियाँ आ गयीं। गुरु जी लोग मुझे अपनी विद्वता की वजह से तो नहीं, पर चरणवंदन प्रवृत्ति के कारण जानते थे। सो उन्होंने घर से बुलवा कर अप्प्लाई करवा दिया। मेरा सेलेक्शन अवश्यम्भावी था और ऐसा हुआ भी। अध्ययन-अध्यापन ऐसा क्षेत्र है, जिसमें गुरू शिष्यों को सिखाने की प्रक्रिया में विषय ज्ञान प्राप्त करता है। जो विषय पढ़ते समय दुरूह लगते थे, पढ़ाते-पढ़ाते कंठस्थ हो गये। विद्वत समाज में उठते-बैठते मुझे अपने ज्ञानी हो जाने के बारे में कोई संशय नहीं रह गया था। छात्र तो गुरु को खुश रखने में वैसे भी कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ते। मैंने भी कई घंटाल टाइप के गुरुओं की सेवा की थी, जिसका मेवा अब मिल रहा था। तभी मैंने निर्णय लिया था कि अगर गुरु बनना है तो गुरु-घंटाल ही बनना है। इस विधा के सारे गुर मालूम ही थे। छात्रों में अपना भय क्रिएट करो। पढ़ाओ कम, डराओ ज्यादा। तभी सब चेले बन के रहते हैं। वर्ना सिर चढ़ जाते हैं। भगवान राम ने भी भय बिन प्रीत की सम्भावना से इंकार कर दिया था। 

राज योग के अपने लक्षण होते हैं। तामसी प्रवृत्तियाँ न हों तो कैसा राज योग। इस नाते मैंने माँस-मदिरा जैसे आसुरी गुणों को अपनी जीवनशैली बना लिया। जब ताक़त होगी तभी तो इंसान शरीर का सम्पूर्ण आनंद उठा पायेगा। जिस समाज में अधिकाँश व्यक्तिगत उन्नयन का मूल में ही भ्रष्टाचार व्याप्त हो, वहाँ कदाचार कब सदाचार बन जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। दबंग और घूसखोर आदरणीय बन जाते हैं। ईमानदारी और देशभक्ति गुनाह में तब्दील हो जाते हैं। यहाँ दवाई की तस्करी करने वाला स्वास्थ्य मंत्री बन सकता है और राशन की ब्लैक मार्केटिंग करने वाला रसद मंत्री। ऐसे देश में सफल से सफल व्यक्ति भी यदि ईमानदार सरकार के बनने से पहले उसके के फेल हो जाने के प्रति आशान्वित नज़र आयें, तो कैसा आश्चर्य। बहरहाल मैंने सीधा और सरल रास्ता अपनाया। सिद्धांत और मूल्यों के चक्कर में कभी खुद को नहीं बाँधा। पाथ ऑफ़ लीस्ट रेसिस्टेंस। जैसे नदी अपना रास्ता खुद बना लेती है। ये बात अलग है कि वो सिर्फ़ ऊपर से नीचे ही जा सकती है। गिरना हमेशा चढ़ने से आसान होता है। धारा के विपरीत चलने में अनावश्यक शक्ति ह्रास होता है। उधर चढ़ने में शिखर है, तो इधर गिर कर भी समुद्र मिलता है। त्याग करके यदि गाँधी शिखर पर पहुँचता है तो भोग करके जिन्ना भी समुद्र तक पहुँच ही जाता है। 

शिखर में एक ख़राबी है। आप सबके स्कैनर पर होते हैं। पूरी दुनिया आपके फिसलने का इंतज़ार कर रही होती है। ज़रा भी चूके तो हर तरफ थू-थू। जग-हँसाई के पात्र बनिये सो अलग से। कीचड़ में रहिये तो चाहे फिसलिये, चाहे लोटिये, चाहे डुबकी लगाइये, किसी को आपति न होगी। सरकारें मुफ़्त चावल बाँट सकतीं हैं, बेरोजगारी भत्ता और कंप्यूटर भी बँट सकता है।पर जल माफियाओं के रहते सरकार दिल्ली को पानी कैसे पिलाती है, इस पर सभी नेताओं और मीडिया की भयंकर दिलचस्पी है। 

खैर मै अपनी बात करता हूँ। दुनिया जैसे चलती है, मैंने वैसे ही चलने का निर्णय लिया और देश-समाज के लिहाज से खासा सफ़ल भी रहा। पीएचडी वालों से दारु के साथ मुर्गा और परास्नातकों से सिर्फ दारू वसूलना अपना एक मात्र उसूल था। जब सबको आपका रेट मालूम हो तो ज्यादा दिक्कत भी नहीं होती। सब राजी-ख़ुशी मेरी ये तुच्छ इच्छा पूरी कर देते। मै भी मस्त और बच्चे भी। छात्रों पर अपनी मजबूत पकड़ थी, इसी को मै राज योग का लक्षण समझ कर आनंदित हो लेता था।

पर असली राज योग क्या होता है, ये मालूम होना अभी बाकी था। समय ने करवट ली और मै उसी विभाग का विभागाध्यक्ष बना जिसमें मै पढ़ा रहा था। सीनियॉरिटी के लिहाज़ से भी अपने सहकर्मियों में वरिष्ठ हो चला था। ये मेरी पहली प्रशासनिक उपलब्धि थी। अब तक मै अपने अग्रजों की सुख-सुविधाओं का ख्याल रखता था, अब मेरे सबोर्डिनेटों का ये दायित्व था कि वे मुझे खुश रखें। मुझे खुश करना इतना कठिन भी नहीं था। चूँकि यहाँ सब मेरी पूरी कुंडली जानते थे, इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं हुयी खुद को स्थापित करने में। पर असली चुनौती तब शुरू हुयी जब मेरी नियुक्ति दूसरे प्रदेश में एक संस्थान के निदेशक के तौर हो गयी। नये लोग, नये माहौल में खुद को स्थापित करना एक चुनौती से कम नहीं था। पर अब तक मै सहज मानवीय गुणों में प्रवीण हो चुका था। ऊपर वालों को कैसे खुश रखना है ये मेरी सहज प्रवृत्ति में आ गया था। कोई प्यार से बिकता है, कोई सेवा से, तो कोई पैसे से। जिसको जो चाहिये मेरी पोटली में सबके लिये कुछ न कुछ था। पर नीचे वालों को पालतू बनाने के गुर अभी सीखना था।

अन्य अपने सरीखे (पीने-खाने वाले) निदेशकों के समक्ष जब अपनी समस्या बखान की तो सुझाव तुरंत मिल गये। पहला सरकारी नौकरी का आदमी सिर्फ़ और सिर्फ़ काम करके आगे नहीं बढ़ सकता। उसकी सीआर अफ़सर के हाथ होती है। सभी कर्मचारियों में इसका खौफ़ होना चाहिये, इसी के अतिउत्कृष्ट या उत्कृष्ट होने पर उनकी पदोन्नति निर्भर रहती है। दूसरा लाइक माइन्डेड लोगों को साथ रक्खो। तीसरा आम कर्मचारी से ख़द को दूर रखने से आपके बारे में हर कोई जान नहीं पता और सदैव सशंकित रहता है। पहले और तीसरे के बारे में तो कोई संशय नहीं था। दूसरे को इम्प्लीमेंट करने में मेरी आसुरी प्रवृत्तियों ने साथ दिया। मैंने लौटते ही सारे अपने नीचे के उच्च पदस्थ सहकर्मियों को दारु और चिकेन की पार्टी का न्योता दे डाला। मुझे विश्वास था लाइक माइन्डेड ऐसे ही मिल पायेंगे। साथ ही अनलाइक माइन्डेड लोग भी चिन्हित हो जायेंगे। ऐसा हुआ भी। अब वो लोग जो संघर्ष कर के शिखर तक जाना चाहते हैं, सारे चिन्हित हो चुके हैं। मै उनके संघर्ष तो कठिन बनाने में यथाशक्ति-यथासम्भव योगदान कर रहा हूँ। लाइक माइन्डेड लोगों को अब पार्टी देनी नहीं पड़ती, अब वे ही मुझे पार्टी देते हैं। आजकल मेरी पाँचों उँगलियाँ घी में हैं और सर कढ़ाई में। जिधर मै निकल जाता हूँ, लोग दड़बे में घुस जाते हैं। झुक-झुक के सलाम करते लोग किसे अच्छे नहीं लगते। इस प्रदेश के लोग वाकई उलटे हैं जितना लतियाओ, उतनी वफ़ादारी पाओ। चार सौ साल की ग़लामी और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने ग़लाम ही पैदा किये हैं। आदमी का राज आदमी के ऊपर यही राज योग है। 

मेरा राज योग अब शुरू हुआ है। राज योग शायद ऐसा ही होता हो। 

- वाणभट्ट 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

मजमा

साढ़े ग्यारह बजने को थे। इलाहाबाद के चौक में घंटाघर के पास गहमा गहमी का माहौल अपने शबाब की ओर बढ़ रहा था। असली भीड़ तो एक-दो बजे के बाद होती है। जब घर-गृहस्थी से फुर्सत पा कर महिलायें पूरे बाज़ार पर हावी हो जातीं हैं। घंटाघर के पीछे छिपे मीनाबाजार की रौनक अभी इक्का-दुक्का ग्राहकों तक ही सीमित थी। कुछ लोग भीड़ बढ़ने से पहले चौक की संकरी गलियों से निकल लेना उचित समझते हैं। ये ऐसे ही लोगों की जमात थी। सेल्स मैनों की संख्या दुकान पर खरीददारों पर भारी जान पड़ रही थी। मालिक भगवानों की खुशामद में लगे थे और उनके कारिंदे काम बढ़ने के पहले एक-दूसरे से अटखेलियों का पूरा लुफ़्त उठा लेना चाहते थे।

एक मौलाना ऐनक लगाए ठठेरी बाज़ार की तरफ से कब निकल आये, किसी ने ध्यान भी न दिया। वो परम आदरणीय छुन्नन गुरु की प्रतिमा की ओर मुँह करके घंटाघर की घड़ी की ओर एकटक निहारने लग गये। उनके चेहरे की परेशानी-चिंता साफ़ पढ़ी जा सकती थी। लग रहा था कोई जिन्न घडी से प्रकट होने वाला हो। उनकी देखा-देखी कुछ चिल्लर पार्टी भी मुँह उठाये घड़ी की ओर देखने में मशगूल हो गयी। एक बच्चे से रहा नहीं गया। पूछा ही लिया कि मियाँ जी क्या देख रहे हैं। उन्होंने मुँह पर उंगली लगा कर उसे चुप रहने का इशारा कर दिया। बच्चों में कौतूहल कुछ और बढ़ गया। वो भी टकटकी लगा कर उधर देखने लग गये जिधर मौलाना देख रहे थे। 

एक सायकिल वाला उधर से गुज़र रहा था, वो भी इन्हें अजीबोगरीब अवस्था में देख कर रुक गया। पूछा क्या हो रहा है तो बच्चों ने उसे भी चुप रहने का इशारा कर दिया। वो भी बड़ी हसरत के साथ उस ग्रूप में शामिल हो गया। एक स्कूटर वाले भाई साहब ने अपना स्कूटर स्टैंड पर लगा दिया। और उस समूह का हिस्सा बन गए। जो लोग मार्किट में आ जा रहे थे, उनकी भी उत्सुकता कुछ बढ़ गयी। धीरे-धीरे करके समूह बढ़ता ही जा रहा था और कोई भी किसी को कुछ भी बता पाने की स्थिति में नहीं था। संयोग से मेरे पास भी कुछ समय था। अटैची की चेन ठीक करने वाले के आने का समय तो हो चला था पर वो अभी आया नहीं था। उसकी दुकान ठीक घंटाघर के नीचे फुटपाथ पर हुआ करती थी। लिहाज़ा मै भी उस भीड़ में शामिल हो गया। समय बीतने के साथ-साथ लोगों के चेहरे पर उत्सुकता के भाव आ जा रहे थे। पर मौलाना थे कि भीड़ से बेफिक्र घड़ी की ओर देखे जा रहे थे। दुकानों से लोग भी निकल के बाहर आ गए। लगभग जाम की सी स्थिति बन गयी थी।   

कुछ पुलिसिया भी वहाँ आ गये। और तहकीक़ात में जुट गये कि क्या हो रहा है। पर किसी को कुछ मालूम हो तो बताये भी। वो भी घडी की ओर सर उठा के खड़े हो गए। अजीब माहौल बन गया कि पता नहीं घंटाघर में क्या होने वाला है। जो आये वहीं पर थम जाये। कुछ लोग दूरबीन ले आये ताकि सही-सही देख सकें। वहाँ होने वाली वाली किसी अनहोनी घटना से वो चूक न जायें। भीड़ में कुछ प्रेस फोटोग्राफर भी आ गये और विभिन्न एंगल से भीड़ की फ़ोटो लेने में लग गए। पुलिस वालों को काम मिल गया। वो भीड़ को हाँकने में जुट गये। पर भीड़ थी कि एक तरफ़ से हटती तो दूसरी तरफ़ जा खड़ी होती। सबकी निगाह घड़ी की टिक-टिक करती सुइयों पर टिकी थी। 

मौलाना भीड़ से बेफिक्र ही रहे और धीरे से वापस ठठेरी बाज़ार की ओर चल दिये। किसी का उनकी ओर ध्यान भी नहीं गया। सब तन्मय हो कर ऊपर देखने में व्यस्त थे। कोने पर बैठे तमोली ने मौलाना को भीड़ से निकलते देख लिया। पूछा ये क्या मज़मा लगा दिया मियाँ। मियाँ बोले बारह बजे पोती को स्कूल से लेने जाना होता है। आज मेरी घड़ी ख़राब हो गयी थी इसलिये घंटाघर आ गया। बारह बज गये हैं, मै जा रहा हूँ पोती को लेने। तमोली ने कहा कल फिर आइयेगा। आप के फ़ज़ल से खूब पान बिक गये सुबह-सुबह।

घंटाघर पर भीड़ बढती ही जा रही थी। मेरी अटैची वाले का अभी तक कोई अता-पता नहीं था।   

- वाणभट्ट 

अंत में: ये घटना विनय भाई ने सुनाई थी। ये भाई टाइप के भाई नहीं हैं। ये वाकई भाई हैं। इस कथानक का कॉपीराइट उनका ही है। मेरी तरफ से ये कहानी कॉपीलेफ्ट है। दिल खोल के कॉपी कीजिये, पेस्ट कीजिये।  
   

रविवार, 17 नवंबर 2013

महान लोगों का देश

पैदा होने के कुछ ही वर्षों में, जब मै होश सम्हाल रहा था, तभी मुझे ये एहसास हो गया था कि मै किसी महान देश में अवतरित हो गया हूँ। घर के अंदर पुरखों की फ़ोटो घरेलू मंदिर में भगवान के ऊपर शोभायमान हुआ करतीं थीं। स्कूल पहुँचा तो स्कूल का नाम ही महापुरुष के नाम पर रखा हुआ था। प्रधानाचार्य के कमरे से ले कर क्लासरूम तक हर कमरे में महापुरुष विद्यमान थे। लाइब्रेरी की सारी दीवार महापुरुषों की फोटोज़ से भरी हुई थी। सबके दैदीप्यमान चेहरे छात्रों को आकृष्ट किये बिना न रहते। सड़कों के नाम महापुरुषों पर और हर चौराहे पर किसी महापुरुष की मूर्ति। इस बात में कतई शक़ नहीं की भारत भूमि ने अनेकों महापुरुष पैदा किये हैं। जिनके बारे में पढ़ कर हम उन पर और ख़ुद पर गर्व किये बिना नहीं रह सकते। ये बात अलग है कि उनके विचारों और कृत्यों को अपने जीवन में उतारना सदैव कठिन रहा है, इसलिये हम सिर्फ़ फ़ोटो और मूर्ति लगा कर महान लोगों को श्रद्धांजलि दे लेते हैं। उनके ऋण से उऋण होने का शायद ये ही सबसे आसान तरीक़ा है। 

घर के पास चौराहे पर एक महापुरुष की प्रतिमा स्थापित थी। एक बार गर्मी की छुट्टियों में पिता जी के साथ प्रातःकाल टहलने निकला तो पिता जी ने एक प्रश्न किया कि यदि ये मूर्ति जीवित हो जाये तो सबसे पहले क्या करेगी। हम भला क्या बताते। उत्तर भी उन्होंने ही दिया सबसे पहले अपने सर से चिड़िया की बीट साफ़ करेगी। यानि मूर्तियों को स्थापित तो कर दिया पर उनका रख-रखाव भगवान भरोसे ही था अर्थात उन मूर्तियों को साफ़-सफाई के लिये बरसात का हमेशा इंतज़ार रहता। कुछ मूर्तियाँ जो रूलिंग पार्टी की हुआ करतीं, वो उन महापुरुष के जन्म और मरण दिवस पर अवश्य धुल जातीं हों पर सरकार बदल जाये तो उनका भी वही हश्र हुआ करता, जो अन्य मूर्तियों का होता था। कुछ महान लोग सत्ता से परे थे। शिक्षा, साहित्य, कला या लोकल कार्यकर्त्ता अपनी मूर्तियों की दुर्गति अगर ख़ुद देख लेते तो बहुत सम्भव है, महान बनने से इंकार कर देते। कहते भाई जीवन भर तो हम देश-समाज सेवा के चक्कर में अभावों में जिये अब मरने के बाद तो हमें बक्श दो। 

कालांतर में हमें बड़े होना लिखा था सो बड़े हुए भी। लगभग पचास बसंत पूरे होने को हैं। इस अवधि में बहुत लोगों को महान बनते देखा और बहुत लोगों को महान बनाते देखा। प्रजातंत्र में प्रजा ये निर्णय लेती है कि कौन सरकार बनाये और सरकार ये निर्णय लेती है कि वो किसे-किसे महान घोषित करे। इस प्रकार अंततोगत्वा ये मान लिया जाता है कि प्रजा इन्हें महान मानती रही है, सरकार तो बस माध्यम मात्र है। पता नहीं विदेशों में महानता आइडेंटिफाई करने के क्या मानक हैं। हाल ही में अमेरिका में संगीतकार श्री ए. आर. रहमान के नाम पर किसी सड़क का नामकरण हुआ है। बाहर देशों में गांधी, टैगोर, लता और रविशंकर जी को भी सम्मान मिला है। ये भारत की वैश्विक पहचान बन गये हैं। यहाँ तो एक ग्रुप किसी को आइडेंटिफाई करता है, तो दूसरा ग्रुप भी अपना एक महापुरुष खोज लाता है। कहता है कि एक आपका तो एक हमारा भी। अगर पावरफुल ग्रूप ने दूसरे ग्रूप का कुछ कर्जा खा रखा है तो मामला सेटेल वर्ना दूसरे ग्रूप को अपने पावर में आने तक इंतज़ार करना पड़ सकता है। 

जो भी सत्ता में आया उसके सभी पुरखे महान हो गये। विश्व बंधुत्व का सन्देश देने वाला देश, शुरूआत अपने घर-परिवार से ही करता है। इस मामले में वो अंग्रेजी कहावत 'चैरिटी बिगिन्स ऐट होम' को अपना ब्रम्हवाक्य मान लेता है। ये तो गनीमत है कि भाई-चारे वाले इस देश और इस देश के प्रदेशों में कुछ गिने-चुने परिवारों का ही राज रहा है। इसलिये महान लोगों की संख्या भी सीमित रह गयी। भला हो जनता का जो उन्हीं लोगों को बार-बार चुनती रही वरना महानता की फेहरिश्त कहाँ जा कर रुकती कहना मुश्किल है। हर साल सत्ता पक्ष कुछ महान लोगों को चिन्हित करता है तुरंत प्रतिपक्ष वाले कुछ और नाम उछाल देते हैं। सीधा सवाल होता है कि अगर आप अपने वाले को महान समझते हैं तो हमारे वाले महानता में किससे कम हैं। अभी एक निर्विवाद रूप से महान व्यक्ति को देश ने सम्मान दिया। पर विवाद करने वालों का क्या वो तो इसी ताक में रहते हैं उन्होंने कहना शुरू कर दिया इनसे पहले इन्हें अवार्ड दिया जाना चाहिए था।   

जिन लोगों ने देश, प्रदेश, जनता के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में कुछ किया उनका महान हो जाना वाकई गौरव की बात है। पर जो लोग सिर्फ इसलिये महान हो गये कि उनके पोते या पर-पोते सत्ता या पावर में आ गये, तो अफ़सोस होता है। परन्तु मै  इस व्यवस्था का विरोध नहीं करता। कल का क्या पता। हमारे भी पोते या पर-पोते या उनके बच्चे कभी पावर में आ जायें तो मेरे नाम पर एक सड़क, एक मोहल्ला या एक शहर बन जाये और महान ब्लॉगर वाणभट्ट भी अमर हो जाये। पर मै अपनी वसीहत में लिख जाऊँगा कि अलबत्त  तो मेरी मूर्ति किसी चौराहे पर मत लगाना, और अगर लगवाना भी तो मूर्ति नॉन-स्टिक मटेरियल की बनी होनी चाहिये ताकि चिड़िया की बीट न चिपके।  

- वाणभट्ट 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

चिंता

चिंता, चिता के सामान है, ऐसा मै नहीं लोग कहते हैं। चिंता की बिंदी भी वहीं पर जा के हटती है। चूँकि लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व है इसलिये ये मानने  में कतई गुरेज़ नहीं है कि चिंता का दुष्प्रभाव, अंततः चिता तक ले जा सकता है। वहाँ तक पहुँचने के अनेक कारक हो सकते हैं, उनमें चिंता को भी जोड़ लेना उचित होगा। चिंता को शब्दों में व्यक्त करना थोडा कठिन है पर इस धरती पर जिसने भी मानव योनि में जन्म लिया, उसका इस आपदा से बच पाना कतिपय असम्भव है। इसे आप व्यथित या व्याकुल करने वाले विचार के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। जैसे हर चीज़ के आकार-प्रकार होते हैं वैसे ही चिंता भी कई आकार-प्रकार की हो सकती है। आकार के अनुसार चिंता को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है - छोटी चिंता और बड़ी चिंता। और प्रकार के हिसाब से ये व्यक्तिगत या सार्वजनिक या सार्वभौमिक हो सकती है। अब अगर हम आकार-प्रकार को क्लब करें, तो निम्न प्रकार कि चिंताएं पायी जा सकतीं हैं -

          1 . छोटी व्यक्तिगत चिंता 
          2 . छोटी सार्वजनिक चिंता
          3 . छोटी सार्वभौमिक चिंता
          4 . बड़ी व्यक्तिगत चिंता
          5 . बड़ी सार्वजनिक चिंता
          6 . बड़ी सार्वभौमिक चिंता

अगर इनका आर्थिक विश्लेषण किया जाये तो निश्चय ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे चिंताओं का आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। गरीब की चिंता और अमीर की चिंता। अमूमन ये देखा गया है कि छोटी चिंता छोटे लोग करते हैं और बड़े लोग बड़ी चिंता। छोटी चिंता करने वाला सिकुड़-सिकुड़ के छोटा होता चला जाता है और अंततोगत्वा चिता तक पहुँच ही जाता है। छोटी चिंता करने वाला चिंताओं को पोषित करता है पर उनका निराकरण न कर पाने के कारण उन्हीं में उलझता जाता है। पर बड़ी चिंता करने वाला दिन प्रति दिन बड़ा होता चला जाता है। चिंता जितनी बड़ी और सार्वभौमिक होगी आदमी उनता ही महान और समृद्ध होता चला जायेगा। इसलिये इन सभी प्रकार की चिंताओं में मै बड़ी-सार्वभौमिक-चिंता को सर्वोपरि रखता हूँ।

समाधान तो बड़ी चिंता करने वाला भी नहीं खोज पाता। वो एक समस्या क्रिएट करता है। फिर उस चिंता को एन्लार्ज करना शुरू कर देता है। फिर उसका ब्रांड एम्बेस्डर बन जाता है। फिर धीरे-धीरे अपनी चिंता कि लॉबीइंग करने लगता है। धीरे-धीरे उसकी चिंता समाज-देश-दुनिया की चिंता बन जाती है। सोते-जगते वो उसी समस्या को तब तक जीता है, जब तक उसे एन्जॉय करना न शुरू कर दे। इसके लिये देश-विदेश में जन-जागरण के लिये पंचतारा होटलों में वृहद् सेमिनार्स होंगे। देश-विदेश के विद्वत जन जो हर समय सम्भावित सार्वभौमिक समस्याओं पर अपनी तिरछी नज़र गड़ाये रखते हैं, वो अपने-अपने देश की सरकारों को ये विश्वास दिलाने में जुट जाते हैं कि ये आज अमरीका की समस्या है तो कल हमारी समस्या भी बन सकती है। इसलिये फलाँ कॉन्फ्रेन्स में उनकी मौजूदगी नितांत आवश्यक है। भारत पहले से ही 'पार्टिसिपेशन इस मोर इम्प्रोटंट दैन विनिंग' के सिद्धांत पर काम करता आया है। इसलिये हर फोरम पर अपना नुमाइंदा न भेजे ऐसा सम्भव नहीं है। समस्या के समाधान के लिये आवश्यकता होती है, फंड्स की। और अधिक से अधिक धन उगाही के लिये समस्या जितनी बड़ी और सार्वभौमिक होगी उतने ही अधिक देश समाधान के लिये दिल और जेब खोल के खर्च करेंगे। पृथ्वी के समस्त देशों ने कुछ देशों को हर क्षेत्र में लीडर मान ही रक्खा है सो अधिकांश धन तो उन्हीं की झोली में जाना है और बाकि एसोशिएटेड देश ये मान कर ही खुश हो लेते हैं कि हम एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में महान देशों के साथ हैं या हम भी इस मिशन में शामिल हैं।    

चिंतायें कैसे ग्लोबल हो जातीं हैं ये हम सबने देखा है। पहले चिंता थी कि कैसे अपना पेट भर जाये। फिर चिंता हुई कि हमारे परिवार और इष्ट-मित्र भी ठीक-ठाक खाते पीते रहें। फिर चिंता हुई कि पूरे देश का एक भी व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिये। जब इसी समस्या को ग्लोबल कर दिया गया तो इसका आयाम खरबों रुपये तक पहुँच गया। इस समस्या के समाधान में लाखों लोग जुट गए। कितने ही अलाइड सेक्टर खुल गए। पब्लिकेशन, सेमिनार, सिम्पोसिआ, ट्रेवल, हॉस्पिटैलिटी आदि अनेक अवसर रोजगार के बन गये। एक समस्या बिना समाधान निकाले कैसे लाखों लोगों का पेट भर सकती है, रोजगार दे सकती है, ये इसका एक नायब उदाहरण है। 

आज कल ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज का मुद्दा दुहा जा रहा है। बढती जनसंख्या को खाना खिलाना एक बड़ी समस्याओं है और जब तक क्लाइमेट पर मानव जाति का कंट्रोल नहीं हो जाता तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसलिये हम ऐसी उन्नत फसल तैयार करने में लगें हैं जो गर्मी-सर्दी झेल ले। कीटों के प्रकोप से बेअसर रहे। बिना पानी के जीवित रहे। और उत्पादन प्रति व्यक्ति आवश्यकता को पूरा कर सके। अगर ये ख्वाब आपको सोने नहीं दे तो ये समस्या स्वागत योग्य है। पर इस ख्वाब को देखने और दिखाने वाले गहन निद्रा में डूबे हुए हैं और जागने को तैयार भी नहीं लगते। आज के उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग करके हम समस्याओं से कुछ हद तक निजात पा सकते हैं। कुशल प्रबंधन के द्वारा वैज्ञानिकों और किसानों ने विपरीत परिस्थितियों में उत्कृष्ट उत्पादन लिया है। उन मॉडलों को दोहरा कर उत्पादन बढ़ाना कदाचित आसान तरीका हो सकता है। रिवर लिंकिंग और भूमि जल रिचार्ज के द्वारा रेनफेड क्षेत्रों में जल की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। एक कहावत है थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली। यदि उन बातों का ध्यान रक्खें तो हम सब विश्वव्यापी समस्याओं के निदान में भागीदार हो सकते हैं। 

यहाँ एक ख़ास बात है कि सपना या तो दिल्ली में देखा जाता है या अमेरिका में। बड़े देशों की देखा-देखी छोटे देश भी उन्हीं समस्याओं को महसूस करने लगते हैं। यहाँ समस्यायें और समाधान केंद्र से आते हैं। उनके लिये अरबों-खरबों का वित्तीय प्रावधान कर दिया जाता है। और ग्राउंड लेवल पर तरक्की जीरो बटा सन्नाटा। छोटी-छोटी समस्याओं को इंटीग्रेट कर के हम बड़ी समस्यायें बना लेते हैं। बड़ी समस्याओं का समाधान बहुत फण्ड माँगता है। फिर हर गाँव, हर शहर, हर समुदाय की समस्यायें एक नहीं हो सकतीं तो समाधान एक कैसे हो सकता है। अक्सर ये भी देखा गया है कि फण्ड तो उपलब्ध करा दिया जाता है पर उस कार्य का क्रियान्वयन उन लोगों के हाथ सौंप दिया जाता है जो तकनीकी और प्रशासनिक रूप से या तो समस्या से जुड़े ही नहीं हैं या अक्षम हैं। मेरे विचार से समस्याओं को इंटीग्रेट करके समाधान खोजने के बजाय हर छोटी-छोटी समस्या का निदान करना चाहिये। और ये निदान उन्हीं के सहयोग से करना चाहिये जिनकी ये समस्या है। इससे न सिर्फ जन-सहयोग मिलेगा बल्कि लोग भी उन समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनेंगे जो उनसे सम्बन्ध रखतीं हैं। किसी भी समाधान को चुनिंदा जगहों पर मॉडल के रूप में विकसित करना चाहिये फिर उन्हीं प्रूवेन तरीकों को अन्य जगहों पर रिपीट करना कारगर सिद्ध हो सकता है। 

एक पर्यावरण प्रेमी कि दिनचर्या पर अगर नज़र डालें तो शीघ्र समझ आ जाता है कि चिंता करने वाले चिंता करने के लिये ही पैदा हुए हैं और उनका समाधान दूसरे कैसे कर सकते हैं, ये उनके भाषण कि प्रिय विषयवस्तु होती है। पर्यावरण संरक्षण पर भाषण देने वाला दस लीटर पानी अपने फ्लश में बहा देता है। ब्रश करते और दाढ़ी बनाते समय नल खुला ही रखता है। आरओ का प्यूरीफाइड पानी पीता है, एसी कमरे में सोता है, लम्बी शोफ़र ड्रिवेन गाड़ी में पीछे बैठ कर पाँच अख़बारों की सहायता से दिल्ली के जाम से निपटता है।एसी गाड़ी से निकल कर एसी कमरे में शोभायमान हो जाता है। मीटिंग में एसी खराब हो जाये तो साहब का पारा गरम होने की आशंका होती है। जैसे कम्प्यूटर के प्रोसेसर को ठंडा रखना अनिवार्य है वैसे ही इन साहिबानों का दिमाग। आखिर इनका ये ही पार्ट सबसे ज्यादा काम करता है। देश-विदेश में कहीं भी पर्यावरण पर परिचर्चा होगी तो साहेबान का हवाई टिकट कटा होगा। भाषण के अलावा इनके किसी कृत्य से पर्यावरण प्रेम खोज पाना शायद मुश्किल हो। मेरे इस कथ्य के अपवाद हो सकते हैं पर यदि उनकी संख्या ज़्यादा होती तो सुधार अब तक महसूस होने लगता।    

प्रत्येक देश-काल में ऐसी सार्वभौमिक चिंतायें शामिल रहीं हैं। एड्स, कैंसर, नशा मुक्ति, पर्यावरण, जैव विविधता, ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज, भूमि जल संरक्षण, पॉपुलेशन एक्सप्लोजन, मॉल न्यूट्रीशन इत्यादि-इत्यादि ऐसे मुद्दे रहे हैं जो युगों से छाये हुये हैं और आशा है युगों तक छाये रहेंगे। क्योंकि जो इस चिन्ता के समाधान में लगे हैं ये उनकी समस्या नहीं रोजी-रोटी है. समस्या की चिंता करने वाले दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहे हैं और करते रहेंगे। समस्या के समाधान से ज़्यादा तरज़ीह उन्होंने समस्या को पोषित करने में दी है। क्योंकि अगर समस्या ख़तम हो गई तो धरती पर उनकी आवश्यकता भी कम हो जायेगी। कोई संस्था जानवरों के प्रति एथिकल ट्रीटमेंट के लिये काम कर रही है, कोई मानव से मानवोचित व्यवहार के लिये. समस्याओं की कमी नहीं है बस वो नज़र चाहिये जो मुद्दे खोज ले, बना ले। वो दिन अब लद गये जब काजी जी शहर के अंदेशे में दुबले हो जाया करते थे। अब तो जो जितना बड़ा काजी है उतना ही हट्टा-कट्टा नजर आता है। एयर कंडीशन कमरों में मीटिंग, गरिष्ठ काजू-बादाम के स्नैक्स और लज़ीज़ व्यंजन, आरामदायक पाँच सितारा होटलों की हॉस्पिटैलिटी मज़बूर कर देतीं हैं कि समस्यायें ऐसे ही पनपती रहे और समाधान के लिये बैठकें दुनिया के जाने-माने शहरों के आलिशान होटलों में होती रहें। जिनकी समस्याओं में जीने कि आदत पड़ गयी है वो चाहते हैं कि ये सपना चलता रहे, पलता रहे और समाधान कभी न निकले, काश। कम से कम इस जीवन में तो नहीं।  

बड़ी विश्वव्यापी चिंता, चिता कतई नहीं है। अपनी चिंताओं का आयाम बढाइये। इसलिये जब भी चिंता कीजिये देश-दुनिया की कीजिये। बड़ी चिंतायें कीजिये हुज़ूर, छोटी-छोटी चिंतायें स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हैं। 

- वाणभट्ट 

अन्तर्कथा

जब भी किसी व्यक्ति में अपने प्रारब्ध, अपने अस्तित्व, का कारण जानने की इच्छा बलवती होती है, उसका आरब्ध कालजयी रचना गीता से होता है. महाभारत औ...