रविवार, 10 जुलाई 2022

डिजिटल इण्डिया

आजकल उसके दिमाग में हर वक्त गिनतियाँ बजती रहती. एक दौर वो भी था जब संगीत बजा करता था. हर सिचुएशन और हर मौके के लिये गीत. जैसे फिल्मों में बैक ग्राउंड म्यूसिक. ये चेंज एकाएक तो नहीं हुआ था.

एक-दो-तीन-चार-पाँच-छ:-सात-आठ-नौ-दस. दस सीधी चढने के बाद चौपड़ा आ जाता है. फिर दस सीढियाँ और पहला फ्लोर. सातवें माले के अपने अपार्टमेंट तक सापेक्ष हमेशा सीढियों से ही चढना पसन्द करता था. आज की युवा पीढ़ी हेल्थ को लेकर इतनी सम्वेदनशील है कि तेल-नमक-घी-चीनी से परहेज करने में उसे कोई गुरेज नहीं है. नौकरी लगने के बाद वो थोडा लापरवाह हुआ ही था कि वेस्ट लाइन ने चुनौती पेश कर दी. इसलिये दिन में जब भी मौका मिलता वो चलने लगता. फोन आते ही, वो रोमिंग हो जाता. समय और स्टेप्स पर चाहे-अनचाहे उसका ध्यान चला ही जाता था. चलते-चलते कदम गिनना उसकी आदत में ये रच-बस सा गया था. पहले वो चलता था, तो चलता था. बीच में एक-आध बार घड़ी देख लेना ही काफी था. अब तो फ़िटनेस बैण्ड हाथ से हर समय चिपका रहता है. कितने स्टेप चले, कितनी देर बैठे और हेल्थ पैरामीटर्स कहाँ जा रहे हैं, ये पता रखना नितांत आवश्यक सा हो गया है. ये बीमारी सिर्फ़ सापेक्ष तक सीमित नहीं है. आज का हर युवा और अधेड़ इस टेक्नॉलोजी से प्रभावित है. 

सन चौरासी में जब कम्प्यूटर के आवक की आहट हुयी थी, देश घबरा सा गया था. कैसे सीखेंगे नयी तकनीक है. दस लोगों का काम अकेले कम्प्यूटर कर लेगा, तो रोजगार का क्या होगा. कम्प्यूटर आया भी और छाया भी. अब उसके बिना जीवन असम्भव सा लगता है. अच्छे से याद है जब सदी बदलने वाली थी. डर था कि सारे कम्प्यूटर काम करना न बन्द कर दें क्योंकि उसके पहले डेट लिखने की प्रथा में वर्ष के लिये आखिरी के दो अंक प्रयोग होते थे. नहीं तो सन उन्नीस सौ चौरासी लिखा होता. बहरहाल सॉफ्टवेयर कम्पनीज़ ने बहुत से अपडेट पैचेज़ बनाये. सन 1999 और 2000 के बीच की रात दिल बस इसीलिये धड़कता रहा कि कल कम्प्यूटर चलेगा भी या नहीं. उसी के बाद से सभी कम्प्यूटर प्रोग्राम्स में वर्ष के लिये चार डिजिट्स का प्रयोग आरम्भ हो गया.

सुनते आ रहे थे कि समय की रफ़्तार बहुत तेज़ है. समय ऐसे भागता है कि आदमी को पता ही नहीं चलता कि कब बचपन ख़त्म और कब बुढ़ापा शुरू. लेकिन सन 2000 के बाद टेक्नोलॉजी ने जो स्वरूप बदला तो आदमी की सारी उर्जा टेक्नोलॉजी से सामंजस्य बिठाने में ही बीती जा रही है. सबसे बड़ी क्रांति तो संचार और सूचना के क्षेत्र में आयी. कभी मोहल्ले में एक फोन हुआ करता था, नब्बे के दशक आते-आते हर घर में फोन था. पीसीओ बूथ पर एसटीडी और आईएसडी कॉल्स के लिये लाइनें लग जाती थीं. लैंड लाइन फोन्स एनलॉग से डिजिटल हुये ही थे कि मोबाइल फोन ने दस्तक दे दी. 

मोबाइल फोन आया तो साइज़ जैसे वाकी-टॉकी. बात करने के ही नहीं, सुनने के भी पैसे लगते. टेक्नोलॉजी सीडीएमए-2जी-3जी-4जी बदलती गयी तो हैंडसेट भी उतनी ही तेजी से अपग्रेड होते गये. फीचर्स से लैस फोन्स इतने स्मार्ट हो गये कि इन्सान बेवकूफ़ लगने लगा. ज़माने के साथ उपडेट होने की जितनी कोशिश करते हैं टेक्नोलॉजी उससे कहीं ज़्यादा तेजी से बदल रही है. लोग फोन सिर्फ़ इसलिये बदल रहे हैं कि नया मॉडल पुराने से ज़्यादा एफिशिएंट है. मँहगे-मँहगे फोन्स सिर्फ़ इसलिये डिब्बा हुये जा रहे हैं कि कंपनी ने नया मॉडल लौंच कर दिया है. उस एडवांस तकनीक का उपयोग वो कहाँ करेगा, ये उपयोगकर्ता के विवेक पर निर्भर करता है. ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में भी स्मार्ट फोन का अमूल्य योगदान है. दूर-दराज़ गाँवों में बैठे बच्चों को भी उच्च शिक्षा उपलब्ध है. पुरानी पीढ़ी स्मार्ट फोन्स की चाहे कितनी भी बुराई करे लेकिन कुल मिला कर इसके फ़ायदे ज़्यादा और नुकसान कम हैं. वैसे भी पुरानी पीढ़ी तकनीक से ज़्यादा तजुर्बे पर विश्वास करती है और नयी पीढ़ी रोज नये तजुर्बे करने को तैयार रहती है.

डिजिटल इंडिया की नींव कब और कैसे पड़ गयी, हवा तक नहीं लगी. एक परिवार में चार मोबाइल फोन होंगे तो चार नम्बर दस संख्या वाले तो याद करने पड़ सकते हैं. फिर उतने ही सेविंग अकाउंट, उतने ही डेबिट और क्रेडिट कार्ड, उतने ही पिन. हर व्यक्ति के दो-दो ईमेल, हर ईमेल के पासवर्ड. कॉलेज आईडी, ऑफिस आईडी, वाहन रजिस्ट्रेशन, पॉल्यूशन व पॉलिसी, हाउस टैक्स, वाटर टैक्स, बिजली, फोन का बिल ऐसी न जाने कितनी ही सूचनायें आपको कंठस्थ होने की उम्मीद लाज़मी है. यदि आप आयकर दाता हो तो पैन नम्बर के बिना आपकी गाड़ी कहीं भी फँस सकती है. जीएसटी वालों को कुछ और पासवर्ड रटने पड़ते होंगे. बची खुची जो कसर थी वो आधार नम्बर ने पूरी कर दी. डिजिटल ट्रांजेक्शंस के आने के बाद से कोई माने या न माने डिजिटल इंडिया ने हर व्यक्ति तक अपनी पहुँच बना ली है. आपकी कमाई और खर्च दोनों का पूरा ब्यौरा सरकार के पास अपने आप पहुँच जाता है. कोई भी अगर कैश की बात करता है तो सीधा सन्देह दो नम्बर की ब्लैक मनी का होता है.

वैसे तो डिजिटल इण्डिया कॉन्सेप्ट का मुख्य उद्देश्य तो वित्तीय लेन - देन में पारदर्शिता लाने का था. लेकिन इतने डिजिट और इतने ओटीपी और इतने पासवर्ड्स हर समय दिमाग में चलते रहते हैं कि दिमागी गड़बड़ी के हालात बनते जा रहे हैं. कोई न कोई गिनती या पासवर्ड या ओटीपी हर समय दिमाग में घूमता नज़र आता है. जिस देश में अधिकांश छात्र गणित से बचने के लिये उच्च शिक्षा में मैथ्स छोड़ कर अन्य विषय का चयन करते हों, उनके लिये डिजिट फ्रेंडली बनने-बनाने की क़वायद एक दुस्वप्न से कम नहीं है. कोई भी सामान लेने जाइये तो जैसे ही आप कार्ड या यूपीआई से पेमेंट करने की सोचते हैं, दुकानदार के चेहरे पर शिकन का आ जाना स्वाभाविक है. बड़े से बड़े शो रूम वाले भी दो हज़ार से उपर की राशि लेने के लिये आना-कानी करनी शुरू कर देते हैं. कारण यदि आय सरकार को मालूम होगी तो टैक्स भी तो देना पड़ेगा. सारे बिजनेस तो व्यक्तिगत पूँजी से व्यक्तिगत तौर पर खड़े किये गये हैं, उसमें सरकार को टैक्स देने का क्या औचित्य है. सरकार के विचार डिजिटल इंडिया को लेकर जिनते मुखर और प्रबल हैं, जनता और व्यापारी उतना ही कतरा रहा है. कारण टैक्स अपवंचना से बचने के प्रयास से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.  

एक सौ चालीस सीढियाँ चढ़ कर सापेक्ष ने अपने फ्लैट की घण्टी को दो बार बजाया. ये उसकी सिग्नेचर स्टाइल थी. एज़ युज़ुअल दरवाज़ा समता ने ही खोला. चाय के साथ ही उसने शाम का अपना पसंदीदा डिबेट चैनल लगा दिया. तीतर-बटेर की लड़ाइयाँ तो अब प्रचलन से बाहर हैं. इसलिये विभिन्न चैनल्स शाम के पीक आवर्स में विभिन्न पार्टी प्रवक्ताओं की वाकपटुता की प्रतियोगिता कराते हैं. ऐसा लगता है सब एक-दूसरे की जान के दुश्मन हो गये हों. न कोई जीतता है न कोई हारता है. सब विजयी भाव से विदा होते हैं. एंकर अपनी टीआरपी के लिये विक्षिप्त हुआ जाता है. लेकिन डिबेट के बाद के सांप्रदायिक समरसता की फोटो प्रसारित नहीं होती, जब दोनों पक्ष साथ-साथ चाय-कॉफ़ी लड़ा रहे होते हैं. समता को यही बात बुरी लगती कि सब काम धाम छोड़ कर सापेक्ष इस दंगल में जुट जाता है. वो उसके लिये कोई न कोई काम खोज लाती ताकि घर में टीवी का पॉल्यूशन कुछ कम हो सके. 

समता ने कहा - "घर में कैश खत्म है. दूध वाले, सब्जी वाले, फल वाले, वैन वाले, प्रेस वाले का हिसाब करना है. आपको बोलना भूल गयी नहीं तो लौटते हुये आप लेते आते". न्यूक्लियर फ़ैमिली में पतिदेवों की पत्नियों को ना कहने की आदत का विकास नहीं हो पाता. उसने जोड़ा 140 सीढियाँ और 537 कदम बस, एटीएम सामने होगा. लेकिन अभी ही तो वो इतनी सीधी चढ़ के आया है, अभी तो डिबेट का माहौल सेट हुआ है. समता में दया नाम की कोई चीज़ है कि नहीं. समता से बोला - "अरे यार उनके फोन नम्बर्स दे दो फोनपे से भेज दूँगा". समता बोली - "उन्हें तो कैश ही चाहिये. वो चाहते हैं कि साहब लोग उनके लिये एटीएम में लाइन लगायें और उन्हें कर्रे-कर्रे नोट ला कर दें". "तो भूल जाओ, उन्हें दो-चार दिन इंतज़ार करने दो. उनको बोलो कि साहब सिर्फ़ फोनपे से ही पेमेंट करते हैं सब अपना-अपना यूपीआई एकाउन्ट बना लो". जबकि उसे ख़ुद मालूम था कि यूपीआई के साथ पिन, नेटवर्क और इन्टरनेट स्पीड का मामला अक्सर पेचीदा हो जाता है. कई बार पैसा निकलता नहीं, कई बार दो-दो पेमेंट हो जाते हैं. दूध और सब्जी वालों की भी अपनी मज़बूरी होती है. उनके धंधे अमूमन कैश पर ही चलते हैं. उसने समता को विश्वास दिलाया कि कल वो ज़रूर लेता आयेगा, अभी डिबेट का आनन्द लेने दो.

आज फिर वो ऑफिस के लिये लेट हो गया था. हड़बड़ी में घर से निकला. सोसायटी के मुख्य गेट पर कुछ जाम की सी स्थिति बन गयी थी. उसे गुस्सा आया, अपने उपर और दूसरों पर भी कि सब लोग टाइम से क्यों नहीं निकल सकते. शहर के जाम में, सद्यपरचेज्ड एसयूवी लेकर बिना खरोंच ऑफिस तक पहुँचना भी एक प्रोजेक्ट से कम नहीं है. सुबह-सुबह समय की रफ़्तार और बढ़ जाती है. ऑफिस की पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके वो मुख्य बिल्डिंग के उस पोर्टिको की ओर बढ़ गया जहाँ बायोमैट्रिक मशीन लगी थी. कदमों की गिनती के साथ ही अनायास उसके दिमाग में आधार की संख्यायें घूमने लगीं. चार-पाँच लोग यहाँ भी लाइन लगाये खड़े थे. आज तो इन्ट्री लेट होने वाली थी. आख़िर उसका नम्बर आ गया.  उसने जैसे ही बायोमेट्रिक मशीन में अपना आधार अंकित करना शुरू किया था, बगल से गुजर रहे एक कलीग ने गुड मॉर्निंग सर ठोंक दिया. उसने मुस्कराते हुये गुड मॉर्निंग का जवाब तो दे दिया लेकिन ये क्या. दिमाग से आधार नम्बर उडन छू हो गया था. बहुत जोर डाला - अपना मोबाइल नम्बर, बैन्क का एकाउन्ट नम्बर, एटीएम का पिन, समता का मोबाइल, यूपीआई का पासवर्ड सब याद आ गया लेकिन आधार नहीं. तभी उसे याद आया कि ऐसी ही इमरजेंसी के लिये मोबाइल पर एक नम्बर उसने आधार के नाम पर भी सेव कर रखा है. अपने उपर मुस्कराने के अलावा उसके पास कोई चारा न था.


- वाणभट्ट 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल के माहौल का वास्तविक चित्रण किया है आपने!👌

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-7-22) को सोशल मीडिया की रेशमी अंधियारे पक्ष वाली सुरंग" (चर्चा अंक 4488) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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  3. सटीक चित्रण।पूरी जिंदगी डिजिट्स में बंट गयी है।शरीर जैसे अणुओं परमाणुओं की एकीकृत संरचना न होकर छिन्न भिन्न हो चुकी हो,सारे अणु परमाणु अलग अलग हवा में अंकणो(डिजिट्स)कई तरह तैरते हुए

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  4. आज के समय का साकार चित्रण।
    बहुत सुंदर सटीक ।

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  5. :) बहुत सुंदर रचना। तीतर बटेर के लड़ाई से डिबेट की उपमा एकदम सटीक है। बहुत अच्छी लगी

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