ये सरकार क्या बदली, जिसे देखो राय बहादुर बना घूम रिया है। इसके पहले की सरकारें तो कान में कड़ुआ तेल डाले पड़ीं रहतीं थीं। पर अब तेल के दाम जब बढ़ गये हैं तो लोग एक-एक बूँद तेल खाने के काम में लाना पसंद कर रहे हैं। कान में डालने वालों पर स्विस बैंक में अकाउन्ट होने का शक़ हो सकता है। सीबीआई और आयकर वाले तो छुट्टा सांड की तरह घूम रहे हैं। काले धन की उगाही स्विस बैंक से कर पाना थोड़ी टेंढ़ी खीर है। इसलिये देश के ज़र्रे-ज़र्रे में व्याप्त ब्लैक मनी वालों को मेरी ये राय है कि कोई भी ऐसा काम न कीजिये जिससे किसी को आप पर शक़ हो सके। सरकार के जासूस सब्जी मंडी तक में छाये हुए हैं। कौन प्याज़ और कौन टमाटर खा रहा है इसका ब्यौरा प्रतिदिन सरकार को भेजा जा रहा है। अगर नज़र में चढ़ गए तो ये न कहना कि आगाह नहीं किया।
बात राय बहादुरी से शुरू हुयी थी। सब लोग अपने-अपने क्षेत्र के विषय में सरकार को राय दे रहे हैं। वो भी खुली चिट्ठी के रूप में। सरकार को पढ़ने की फ़ुर्सत मिले न मिले। पर अड़ोसी-पड़ोसी को तो ये चिट्ठी दिखाई जा सकती है कि फ़लाँ विषय पर उन्होंने सरकार को क्या राय दी है। लोग हड़बड़ी में हैं कि कहीं कोई काम उनकी राय के बिना हो गया तो क्रेडिट सरकार ले जायेगी। इसलिये खुली चिट्ठियाँ अख़बारों में छपवायी जा रहीं हैं। चाहे उद्योग का मसला हो, चाहे विदेश नीति का, चाहे सुरक्षा का, चाहे कृषि का, चाहे काले धन का। हर कोई क्रेडिट लूट लेना चाहता है। वो गर्व से बताते हैं कि वित्त मंत्री ने उन्हीं के कहने पर रेडीमेड कपडे में टैक्स बढ़ा दिया ताकि लोग कपड़े मोहल्ले के झुम्मन टेलर की दुकान पर ही सिलायें। आजकल ज्ञान टीवी और वीडियो के माध्यम से सहजता से प्राप्त हो सकता है इसलिये एलसीडी के दाम कम कर दिए गये। वाट्सएप से लोग अपना ज्ञान शेयर कर सकते हैं इसलिये मोबाइल सस्ते करना ज़रूरी था।
पर गुटके-तम्बाखू पर टैक्स बढ़ा कर सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। इसे बिना खाये तो बहुतों की अक्ल का ताला ही नहीं खुलता । गुटखे को मुख में धारण करके बोल पाना कतिपय मुश्किल होता है। जब आदमी चुप होगा, तभी तो सोच पायेगा, विचार आयेंगे। बड़े-बड़े खिलाड़ी खेल में ध्यान लगाने के लिये चुइंगम चबाते नज़र आते हैं। कैमरे के सामने चुल्लू भर थूक उगलने में उन्हें शर्म आती होगी। इसलिये तमाम मल्टीनेशनल (मेरी नज़र में एण्टीनेशनल) कम्पनियाँ चुइंगम के निर्माण में रत हैं। जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों की देशी मुद्रा विदेशों में जा रही है। गुटका हमारे स्वावलम्बन का प्रतीक है। कम से कम ये एक ऐसा उद्योग है जो स्वदेशी तकनीक और ज्ञान पर पूरी तरह आधारित है। इस उद्योग को लगा के रातों-रात कितने फ़क़ीर, धन्ना सेठ बन गये। सोच तो बहुत लोग सकते हैं पर सोच कर के बोल पाना एक कठिन कार्य है। बहुत लोग इसलिये नहीं बोल पाते कि ऊपर वाले को बुरा लग जायेगा। ऊपर वाले को बुरा लगा तो उनका भला तो होने से रहा। तो सोच और बोल वही सकता है जिसका माइंड इज़ विदआउट फियर। गुटका खाने वाले निश्चित रूप से फीयरलेस लोग होते हैं। ये आपके ऊपर थूक दें और लड़ने लग जायें कि गलती आपकी है कि आप उनके मुँह और ज़मीन के बीच जानबूझ कर आ गये। अभी चीन को इस शौक़ का पता नहीं है वर्ना हमारा पान, हमारा तम्बाखू, हमारा गुलकन्द हम ही को चाँदी के वर्क में लपेट के बेच दे।
मुझे पहले भी कोई जल्दी नहीं रही। आपाधापी में कोई भी महान चिंतक काम नहीं कर पाया है। चिंतन अपने आप में एक महान कार्य है। पर इस देश में कर्मण्येवाधिकारस्ते की ऐसी जबरदस्त फीलिंग है कि लोग बिना सोचे समझे काम किये जा रहे हैं। कोई सोचे तो बहुत से काम करने की आवश्यकता ही नहीं पड़े। बहुत से पुनीत कार्य तो लोग सिर्फ़ इस गरज से कर रहे हैं कि सरकार ने बजट एलोकेट कर दिया है। उस बजट को ठिकाने लगाने के लिये काम करना पड़ रहा है। मज़बूरी ये हो गयी है कि बजट को हिल्ले लगाना सबसे बड़ा काम हो गया है। एजी, सीएजी, चिल्लाते रहें कि फण्ड का मिसयूज़ हुआ है, पर फण्ड को कंज़्यूम करने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, इन्हें क्या मालूम। ये आउटसोर्सिंग न होती तो कितने ही ठेकेदार और बिचौलिये जो आलिशान गाड़ियों में घूमते हैं, आज चाय-पान बेच रहे होते। एक दलाल ने तो अधिकारी को चैलेंज कर दिया कि बिना मेरे सहयोग के आप एक आइटम खरीद के दिखाओ। तीन कोटेशन तो हम ही मुहैया करा सकते हैं।
फिनलैंड एक छोटा सा देश है। सुना है वहाँ किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले सालों डिस्कशन होता है। विचार विमर्श के वर्षों में यदि उस कार्य की आवश्यकता महसूस नहीं हुयी तो प्रोजेक्ट ड्राप कर दिया जाता है। लेकिन एक बार जब प्रोजेक्ट अप्रूव हो गया तो उसे टाइम से खत्म करने के प्रयास किये जाते हैं ताकि प्रोजेक्ट कॉस्ट न बढ़े। हमारे यहाँ फ्लाईओवर बनाने के विचार आते ही मंत्री जी उसका शिलान्यास करने पर आमादा हो जाते हैं। और प्रोजेक्ट जितना डिले होगा बजट उतनी बार रिवाइज़ होगा। एक बार काम का लोकार्पण हो गया तो मंत्री, अफ़सर, ठेकेदार बेचारों को नया पुल बनाना पड़ेगा इसलिये एक ही पुल जितने साल बनता रहे, उतना भला। पब्लिक के लिये गीता का पाठ है कि जो हो रहा है, अच्छा है और जो होगा वो और भी अच्छा होगा। सब अच्छा ही अच्छा होगा तो देश के धर्मगुरुओं का क्या होगा।
इस मामले में मै आलसी लोगों का कायल हूँ। उनके पास सोचने का समय होता है। सेब तो बहुत गिरे पर गुरुत्वाकर्षण के बारे में कौन सोच पाया। कर्मयोगी उसे कर्मफल समझ के खाने में जुट जाते थे। कर्मयोगी को उबलते पानी की केतली में इंटरेस्ट भला क्यों आयेगा। आलसी सिर्फ़ उतना ही काम करेगा जितना आवश्यक है। वो ज़िन्दगी में आरामतलबी के सारे साधन के स्वप्न देखेगा। वो ट्रेन खोजेगा, वो प्लेन खोजेगा, वो एसी डिज़ाइन करेगा, वो कार को आरामदेह बनाने की हर सम्भव कोशिश करेगा। कर्मयोगी खोज की पुनरावृत्ति तो कर सकते हैं पर नयी सोच उनके बस का रोग नहीं है। लेकिन देश के दुर्भाग्य का क्या रोना रोया जाये, यहाँ ऐसे आदमियों की कदर नहीं है। यहाँ हर आदमी यही दम भरने में लगा है कि उसने एक 30 साल के प्रभावी जीवन में कितने ही महान कर डाले। वास्तव में उसमें से अधिकांश कार्य करने के लिये उसे पश्चाताप होना चाहिये कि गरीब देश के करोड़ों रुपये उसने सिर्फ़ अपनी कर्मयोगिता सिद्ध करने में फूँक दिये। ये अलग बात है कि इस बहती गंगा ने उसकी कई पीढ़ियों के भाग्य तार दिये। इसलिये मेरे विचार से सोचना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें से एक-दो कार्य भी मूर्त रूप ले सके तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये। इसलिये मैंने सोचा कि जब सब भाई लोग सोच-सोच के थक जायेंगे, तब हम अपनी मूल्यवान राय देंगे। पर राय का कॉपीराइट तो होता नहीं। इसलिये क्यों न खुली चिट्ठी का सहारा लिया जाये। ताकि सनद रहे और वक़्त आने पर काम आ सके कि इन महान रायों का प्रणेता कौन था।
इस देश में गहन चिंतकों का सर्वथा अभाव रहा है। दिमाग में राय आई नहीं कि झोंक दी। कोई हनीमून मनाने के मूड में है और आप हैं कि राय पे राय दिये जा रहे हैं। किसी को हनीमून में डिस्टर्ब करना कहाँ की सभ्यता है। साठ दिनों में भाई लोगों ने इतनी ढेर सारी राय दे डाली कि सरकार को एक पोर्टल बनाना पड़ गया। जिनके माइंड में फियर था, वो बेनामी चिट्ठीयाँ भेज रहे थे। दिल्ली के अफ़सरशाहों को जल्दी समझ में आ गया कि ऐसी चुनिंदा रायें आम आदमी तो दे नहीं सकता। विभाग के छिपे विभीषण ही लंका ढहाने पर आमादा हैं। ऐसे तो अपनी दुकान बंद हो जायेगी। इसलिये पोर्टल पर पूरा नाम-पता देना कम्पलसरी कर दिया गया है। इन परिस्थितियों में कम से कम सरकारी लोग तो मुँह बंद रखेंगे। बाकि लोगों को किसी विभाग के बारे में पूरी जानकारी जुटाने के लिये आरटीआई तक जाना होगा। आँकड़े बताते हैं कि आरटीआई से सूचना निकलवा पाना नाकों चने चबाने के समान है। पूरा विभाग भ्रष्ट लोगों को बचाने की मुहिम में शामिल हो जाता है। जब एक इंजिनियर, एक डॉक्टर, एक अफसर, एक कर्मचारी अपने विभाग में वांछित सुधारों के लिये लिखेगा तो वो एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बन सकता है। इसलिये इन पर नकेल ज़रूरी है।
पर इससे मुझे क्या। मै तो खुली चिट्ठी देश के मेरे जैसे उदीयमान व्यंगकारों के लिये लिख रहा था। यदि देश में सब कुछ वैसा हो गया जैसा होना चाहिये तो हमारे जैसे लोग तो भूखे मर जायेंगे। हम किस पर व्यंग लिखेंगे और कार्टूनिस्ट क्या कार्टून बनायेंगे। लोग गुटके नहीं खायेंगे तो देश की सड़कें काली दिखने लगेंगी। पता ही नहीं चलेगा कि इस सड़क से कोई गुजरता भी है या इंजीनियरों ने सिर्फ कमीशन खाने के चक्कर में इस सड़क का निर्माण करा दिया। ट्रेन के सिंक साफ़-सुथरे होंगे तो लोग खामख्वाह मुँह धोते रहेंगे और पानी बहाते। डिब्बे साफ़ रहेंगे तो लोग जमीन में बैठ के यात्रा करने लगेंगे। पहले ही ट्रेन में लोग लदे-फंदे रहते हैं। प्लेटफार्म और टॉयलेट साफ़-सुथरे होंगे तो लोग होटल भला क्यों जायेंगे। इस गन्दगी का मुख्य उद्देश्य लोगों को यातायात से विमुख करना है। जिससे लोग अपने घर-गाँव को छोड़ने से पहले दस बार सोचें। अपने घर में गैया चराना भला है या मुम्बई तक जनरल कोच में भेंड़-बकरी की तरह यात्रा करना।
दरअसल सरकारें समस्या पैदा करने में विश्वास रखतीं थीं। वर्ना काम तो वो सारे यूपी में भी होने हैं, जो कर्नाटक में होते हैं। अपने ही घर में काम की कमी नहीं है तो परदेस में जा के धक्के खाने की क्या ज़रुरत। पर प्रदेश सरकार चाहती है कि पंजाब का पैसा हमारे यहाँ आये। हमारा पैसा पंजाब क्यों जाये। मैंने देखा कानपुर से लखनऊ के बीच तक़रीबन 30 हज़ार लोग रोज आते-जाते होंगे। पढने के लिये, पढ़ाने के लिये, बैंक के लिये, दफ्तरों के लिये। लखनऊ का आदमी कानपुर आ रहा है और कानपुर का आदमी लखनऊ जा रहा है। अगर कानपुर वाला कानपुर में और लखनऊ वाला लखनऊ में काम करे तो ट्रेन पर भीड़ कम हो जायेगी। ऐसे में रेलवे और उन्नाव के समोसे वालों को होने वाले घाटे का ख्याल सरकार नहीं रखेगी तो और कौन रक्खेगा। ट्रांसफर पर कमीशन नहीं मिले तो मंत्री-संत्री का दरबार क्यों सजे। ट्रेन में भीड़ होगी तभी तो हवाई यात्रा को बढ़ावा मिलेगा। बंगलुरु से दिल्ली के जहाज खाली चलेंगे तो एयरलाइंस बंद हो सकती है। इसलिये दिल्ली वाले को बंगलुरु भेजो और बेंगलुरु वाले को दिल्ली। जो लोग एक जगह रहते-रहते उकता जाते हैं उनके लिये ट्रांसफर मतलब एक महीने की तनख्वाह और टीटीए के साथ नये स्थान की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों से रूबरू होने का मौका है।
देश में विकास की अपरिमित संभावनायें हैं। लेकिन जब महानगरों में ही ज़िन्दगी के समस्त सार उपलब्ध हों तो बहराइच और गोण्डा में भला कौन रहना चाहेगा। फटी पड़ी जनसंख्या के बीच महानगरों की चकाचौंध आम भारतीय को आमंत्रित करती रहती है। और एक बार जिसे महानगर की हवा लग गयी उसका देवरिया और भदोही में तो दम घुटेगा ही। अब नये-नये शहर बनाने की बात हो रही है। नयी-नयी गाड़ियाँ चलाने की बात हो रही है। जो चल रहा है, वो और सुचारू रूप से चलता रहे इस पर कोई सोचना नहीं चाहता। गोया बजाज के एड की तरह सारे घर के बल्ब बदलने की बात हो रही है। और होनी भी चाहिये। नये काम के लिये नया वित्तीय प्रावधान। पुराने को ठीक करने का काम तो सस्ते में हो सकता है। और एक सशक्त सरकार को टुच्चे काम नहीं करने चाहिये। देश का सुधार होगा, वो भी विश्वस्तरीय तकनीक से। दुनिया भर में टेक्नोलॉजी की भरमार है तो अपनी तकनीक को क्या विकसित करना। इसका मूलमंत्र है एफडीआई।
हम तो अपने लोगों की बेहतरी नहीं सोच पाये इसलिये विदेशी कंपनियों से आह्वाहन है कि आप आइये हमारी अर्थव्यवस्था को समृद्ध कीजिये। हमारे बेरोजगारों को रोजगार दीजिये। सन छियासी में जब मैंने काइनेटिक हौंडा खरीदी थी, तभी मुझे लग गया था, बजाज के दिन लदने वाले हैं। पंद्रह सालों के बाद जब मेरी हीरो-हौंडा का क्लच वायर टूटा तो मुझे भरोसा हो गया कि हीरो को अब साइकिल बनाने तक सीमित हो जाना चाहिये। पहले एक ईस्ट इण्डिया कंपनी थी, आज पूरी दुनिया यहाँ घुसी पड़ी है। चूँकि हम रीइनवेंटिंग व्हील के सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखते इसलिये पूरी दुनिया को निमंत्रण देते घूम रहे हैं कि आप यहाँ आईये, हम बड़े कद्रदान लोग हैं। हुनर पहचान लेते हैं। आप कार बनाइये, हम खरीदेंगे। आप जहाज बनाइये, हम उसे उड़ायेंगे। आप बम बनाइये, हम पड़ोसियों को डरायेंगे। लेकिन ये भूल जाते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध चीज़ें हमारे पडोसी भी खरीद सकते हैं। और हमेशा नया वर्ज़न पुराने वर्ज़न से बेहतर होता है। तो जो बाद में खरीदेगा वो फायदे में रहेगा। वैसे देश में अच्छे, सच्चे, देशभक्त और चारित्रिक नेताओं का भी सदैव अभाव रहा है। तकनीक की तरह इस क्षेत्र में भी एफडीआई की अभूतपूर्व संभावनायें हैं। हम तो हमेशा से वसुधैव कुटुम्बकम के हिमायती रहे हैं। अब हमारे कुटुम्ब वाले ही गच्चा दे जायें तो ये उनकी नियत है। भगवान सब देख रहा है और सबके कर्मों का लेखा, चित्रगुप्त जी की डायरी में नोट होता रहता है।
मेरे विचारों का आयाम देश की सभी समस्याओं तक फैला हुआ है। राय इतनी कि ब्लॉग वालों द्वारा दी गयी फ्री स्पेस कम पड़ जाये। ये तो सिर्फ विचारों की बानगी है। मेरे पाठक मुझे हर बार चेताते हैं कि भट्ट जी आपके विचारों से हमें क्या सरोकार। मै उन्हें समझाता हूँ कि देश हित में है विचारों का आदान-प्रदान। अब मुझे ख़ुशी है कि सरकार ने मेरे जैसे अपठनीय लेखक के लिये एक ऐसा मंच तैयार किया है जहाँ मै फर्जी आई-डी बना के विचारों की भड़ास निकाल सकता हूँ। पढ़ना, न पढ़ना सरकार का काम है। मै इसी प्रकार निर्विकार भाव से अपने मनन और चिंतन को लेखनी बद्ध करता रहूँगा। ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये.
- वाणभट्ट
आपने हम सब के मन की बातों का सार यहाँ रखा दिया है. पढ़कर अच्छा लगा.
जवाब देंहटाएंएकदम सटीक और सधी हुयी अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंहर तरह से सोच विचार कर अपनी बात रखी है, सहमत हूँ आपसे
इस खुली चिट्ठी में तो इतने सारे मसलों पर आपने सुझाव दिए की मोदी सरकार को २० साल तक राज करने क अवसर मिल गया ... किसी को नहीं छोड़ा सब को लपेट लिया ....
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब और तीखी धार है इन शब्दों की ... किस किस को और कहाँ कहाँ घाव कर गयी होगी पाता नहीं ....
काफी बहुपयोगी है यह खुली चिट्ठी...
जवाब देंहटाएंजरूरत इस अारोप-प्रत्यारोप के बीच से समस्याओं के हल निकालने की है। व्यंग्य तो सारा देश मार रहा है एक-दूसरे पर। देश क्या दुनिया में समस्याएं चुटकुले बन गई हैं अौर पीड़ित और पीड़क दोनों बस हंस रहे हैं। आपने भी इस दिशा में गहन विचार किया है।
जवाब देंहटाएंबढ़िया तंज और व्यंग्य का मिश्रण किया है जनाब!
जवाब देंहटाएंप्रसून जी ! आप तो परसाई जी की तरह व्यंग्य लिखते हैं । सुन्दर प्रस्तुति ।
जवाब देंहटाएंबेहद उम्दा... आपको बहुत बहुत बधाई...
जवाब देंहटाएं@मुकेश के जन्मदिन पर.
लेखक खुद को भट्ट्जी सिद्ध करने पर उतारू है तो हम प्रसून जी क्यों कहें भला? :)
जवाब देंहटाएंभट्ट जी, सिंपली वंडरफ़ुल, फ़ेसबुक पर शेयर कर रहा हूँ आशा है अन्यथा नहीं लेंगे।
Sahaj aur saral vyang .
जवाब देंहटाएंKoshishe hazar jaari rahani chahiye
Khushiyan hazar niyamit ho ek gum mitane ko.
Bahut badhiya.
सुंदर व्यंग, सभी को निर्देश,कि अपनी करनी पर स्वयं नियंत्रण रखें।
जवाब देंहटाएंसटीक आकलन,स्पष्ट चित्रण;बधाई एवं शुभकामनाएं👌👌
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