मोड़ पर खड़े लम्हे
याद दिलाते हैं
कि
उनकी उपेक्छा कर
हमने की थीं छोटी या बड़ी गलती
ये लम्हे खुद को पहचनवाने की कोशिश
में खड़े हैं
और हम हैं कि उन्हें भूलने में लगे हैं
दरअसल हम डरते हैं
कि
उन लम्हों में हम फिर वो भूल दोहरा न दें
- वाणभट्ट
एक नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं...पहचान का प्रतीक...सादे पन्नों पर लिख कर नाम...स्वीकारता हूँ अपने अस्तित्व को...सच के साथ हूँ...ईमानदार आवाज़ हूँ...बुराई के खिलाफ हूँ...अदना इंसान हूँ...जो सिर्फ इंसानों से मिलता है...और...सिर्फ और सिर्फ इंसानियत पर मिटता है...
बुधवार, 29 सितंबर 2010
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