मोड़ पर खड़े लम्हे
याद दिलाते हैं
कि
उनकी उपेक्छा कर
हमने की थीं छोटी या बड़ी गलती
ये लम्हे खुद को पहचनवाने की कोशिश
में खड़े हैं
और हम हैं कि उन्हें भूलने में लगे हैं
दरअसल हम डरते हैं
कि
उन लम्हों में हम फिर वो भूल दोहरा न दें
- वाणभट्ट
एक नाम से ज्यादा कुछ भी नहीं...पहचान का प्रतीक...सादे पन्नों पर लिख कर नाम...स्वीकारता हूँ अपने अस्तित्व को...सच के साथ हूँ...ईमानदार आवाज़ हूँ...बुराई के खिलाफ हूँ...अदना इंसान हूँ...जो सिर्फ इंसानों से मिलता है...और...सिर्फ और सिर्फ इंसानियत पर मिटता है...
बुधवार, 29 सितंबर 2010
सोमवार, 27 सितंबर 2010
घाव करें गंभीर ...
घाव करें गंभीर .....
१. मज़हबी नारों में
इंसानियत की आवाज़ दब गई
नक्कारखाने में तूती की आवाज़
सुनी है कभी ?
२. मत पूछो ये सड़क शहर जाती है.
शहर की ओर भागता है सियार
जब
मौत आती है.
३. ज़बरन मुस्कुराते बच्चे,
बस्तों के बोझ से दबे बच्चे,
बचपन में ही हैं कितने बड़े बच्चे.
४. मैं बस एक आदमी हूँ,
आदमी से ही मिलता हूँ,
आदमियत पे मिटता हूँ.
- वाणभट्ट
१. मज़हबी नारों में
इंसानियत की आवाज़ दब गई
नक्कारखाने में तूती की आवाज़
सुनी है कभी ?
२. मत पूछो ये सड़क शहर जाती है.
शहर की ओर भागता है सियार
जब
मौत आती है.
३. ज़बरन मुस्कुराते बच्चे,
बस्तों के बोझ से दबे बच्चे,
बचपन में ही हैं कितने बड़े बच्चे.
४. मैं बस एक आदमी हूँ,
आदमी से ही मिलता हूँ,
आदमियत पे मिटता हूँ.
- वाणभट्ट
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