सोमवार, 31 मार्च 2025

कृषि शोध - दशा और दिशा

भारतीय कृषि का इतिहास 9000 वर्षों से भी पुराना है. कृषि एवं पशुपालन अपनाने के साथ ही मानव सभ्यता का विकास एक समाज के रूप में होना आरम्भ हुआ. प्रारम्भ से ही वर्षा आधारित खेती में प्रति वर्ष दो फसल लेने का प्रचलन था. उस समय भी देश-विदेश से खाद्य सामग्री का आदान-प्रदान हुआ करता था, जिसके माध्यम से नयी फसलों का भारत में प्रवेश हुआ और भारतीय फसलें भी विदेशों तक पहुँचीं. मध्ययुगीन काल में भी भारत में सिंचाई और भूमि संरक्षण प्रबन्धन के प्रमाण मिलते हैं. मानव जीवन में पादप और पशुधन की उपयोगिता को भारतीय समाज ने चिन्हित कर लिया था. ईसा से 8000 वर्ष पूर्व ही फसलों में जौ और गेहूँ की खेती और, पशुओं में बकरी और भेंड पालन का उल्लेख मिलता है. पंक्तिबद्ध बुआई, फसलों की मड़ाई, चारागाह और अनाज भण्डारण की पद्यतियाँ भी विकसित की गयी थीं. भारत में कपास का उत्पादन 5वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में आरंभ हो गया था, जिसने आधुनिक वस्त्र औद्योगीकरण को एक सुदृढ़ नीव रखी. आम और खरबूज भारतीय उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के मुख्य फल थे. भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग, सिन्धु और गंगा घाटी में धान का उत्पादन लिया जाता था. गन्ने का उद्भव दक्षिणी और दक्षिण पूर्व एशिया माना जाता है. हेम्प का उत्पादन तेल, रेशे और दवाइयाँ प्राप्त करने के लिये किया जाता था. मिश्रित खेती का सिन्धु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था. यहाँ पर पशुचालित कृषि यन्त्रों के उपयोग का भी वर्णन मिलता है. रबी और खरीफ़ का वातावरण किन फसलों के लिये अनुकूल है, इसका ज्ञान भी भारतीय कृषकों को था. जूट का उत्पादन भारत में सबसे पहले आरम्भ हुआ. वनस्पतियों के औषधीय गुणों के आधार पर आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति का विकास हुआ. वृक्षों और पशुओं को उनकी उपादेयता के आधार पर पूजनीय भी माना जाने लगा. वैदिक साहित्य में फसलों, फलों, सब्जियों, पशु व मत्स्य पालन आदि एकीकृत कृषि प्रणाली के विषय में भी उल्लेख मिलता है. पारम्परिक अनाज और दलहन फसल चक्र कृषि प्रणाली ने उत्पादन की स्थिरता और भूमि की उर्वरता को बनाये रखा. सहस्त्र वर्षों की कृषि व्यवस्था ने वर्तमान कृषि को एक सुदृढ़ आधारशिला प्रदान की. प्राचीन काल से भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. वर्तमान में जब कुल जनसंख्या का पचास प्रतिशत भाग जीविकोपार्जन के लिये कृषि पर निर्भर हो, तो इसमें कोई संशय नहीं रहता कि भारत आज भी एक कृषि प्रधान देश है.  

भारत में कृषि शोध 1829 में करनाल में एक ऊँट और बैल प्रजनन फार्म की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ. बाद में 1868 में कोयंबटूर में कृषि कॉलेज और अनुसंधान स्टेशन, 1889 में पूना में पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बैक्टीरियोलॉजिकल रिसर्च लेबोरेटरी और 1905 में शाही कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के रूप में इनका विस्तार हुआ. आईएआरआई में कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार हेतु प्रशिक्षण आरम्भ किया, किन्तु स्वतन्त्रता के पूर्व इसकी गतिविधियों को समुचित संज्ञान नहीं मिला. स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात यहाँ किये गये प्रयासों ने हरित क्रान्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. हरित क्रान्ति ने न केवल देश को भोजन उपलब्धता के गंभीर संकट उबारा अपितु देश को खाद्य अधिशेष (सरप्लस) राज्य में परिवर्तित कर दिया. हरित क्रान्ति कृषि इतिहास में आज भी मानव जाति की सर्वोत्तम उपलब्धि के रूप में अंकित है. 

इसी बीच इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) में वर्ष 1910 में डॉ. सैम हिगिनबॉटम के नेतृत्व में, भारत में ईसाई चर्च संगठनों ने कृषि संस्थान की स्थापना की. डॉ. हिगिनबॉटम ने 1903 से 1909 तक, इलाहाबाद क्रिश्चियन कॉलेज में अर्थशास्त्र और विज्ञान पढ़ाया, जिसे वर्तमान में इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के रूप में जाना जाता है, और साथ ही साथ स्थानीय बोली का अध्ययन भी किया। इस अवधि में वो आसपास के गाँवों में एक परिचित व्यक्ति बन गये. उन्होंने ग्रामीणों की रहन-सहन की स्थिति को बहुत पास से देखा. कृषि में प्राचीन प्रणाली के उपयोग ने उन्हें चिन्ता में डाल दिया. उनको अनुभव हुआ कि कृषकों में अत्यधिक आर्थिक गरीबी का मूल कारण कम उत्पादकता है. अंततः 1909 के अंत में उन्होंने एक कृषि स्कूल की स्थापना करने का निर्णय लिया. उनकी कल्पना, ग्रामीण छात्रों को उन्नत कृषि विधियों की शिक्षा के माध्यम ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार लाने की थी. डॉ. हिगिनबॉटम एक ऐसा कृषि विद्यालय स्थापित करना चाहते थे जो युवाओं को गाँवों में काम करने के लिए प्रशिक्षित करे और साथ ही ग्रामीणों की व्यावहारिक कृषि समस्याओं पर शोध भी करे. प्रयागराज में यमुना नदी की दूसरी ओर के क्षेत्र को कृषि तकनीकों के प्रदर्शन के उद्देश्य से विकसित किया गया ताकि प्रति वर्ष संगम पर आने वाले श्रद्धालुओं को उन्नत कृषि प्रणालियों का प्रदर्शन कराया जा सके. अनौपचारिक रूप से कृषि शिक्षा वर्ष 1912 में  प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से आरम्भ की गयी. डेयरी, पशुपालन और कृषि फार्म विकसित किये गये. कृषि यान्त्रिकी और डेयरी में डिप्लोमा 1923 में आरम्भ हुआ, फिर 1932 में कृषि में स्नातक और वर्ष 1943 में कृषि अभियन्त्रिकी में स्नातक शिक्षा आरम्भ हुयी. यह संस्थान कृषि अभियन्त्रिकी में स्नातक प्रदान करने वाला एशिया का पहला और विश्व का चौथा संस्थान बन गया. कृषि अभियन्ता प्रो. मैसन वाग ने कृषि अभियान्त्रिकी विभाग की स्थापना की, और उन्हें आज भी भारत में कृषि अभियान्त्रिकी के संस्थापक के रूप में स्मरण किया जाता है. 

कृषि उत्पादन में हरित क्रान्ति द्वारा अभूतपूर्व वृद्धि में उच्च उपज देने वाली उन्नत प्रजातियों के उपयोग का मुख्य व अमूल्य योगदान है. उन्नत प्रजाति के बीजों से वांछित उत्पादकता प्राप्त करने के लिये खाद और सिंचाई की समुचित व्यवस्था भी सुनिश्चित की गयी. पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वृहद सिंचित क्षेत्रों और साधन सम्पन्न कृषकों के चयन ने हरित क्रान्ति में अपनी भूमिका निभायी. नीतिगत निर्णय जैसे सरकार द्वारा उत्पादित फसल का उचित मूल्य पर क्रय ने भारतीय किसानों को मँहगे आदान के प्रति प्रतिक्रियाशील (इनपुट रेस्पोंसिव) कृषि पद्यतियों को अपनाने के लिये प्रेरित किया. फसलों के सुरक्षित भण्डारण की सुविधा भी विकसित की गयी. जब यही उत्पादित अन्न, सार्वजानिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपभोक्ताओं की थाली तक पहुँचा, तब जा कर हरित क्रान्ति संपन्न हुयी. हरित क्रान्ति के सभी कारकों का यदि सूक्ष्म निरीक्षण किया जाये तो इसके प्रमुख घटक थे- 1. उन्नत प्रजाति के बीज और उनकी उपलब्धता, 2. खाद की समुचित मात्रा, 3. वृहद सिंचित क्षेत्र, 4. नीतिगत व्यवस्थायें, जैसे समर्थन मूल्य पर उत्पाद की सुनिश्चित खरीद, 5. भण्डारण व्यवस्था, और 6. सार्वजानिक वितरण प्रणाली. कृषि उत्पादन के किसी भी क्षेत्र में हरित क्रान्ति मॉडल को दोहराने के लिये हरित क्रान्ति के समस्त कारकों का संयोजन करना पड़ेगा. 

भारतीय कृषि ने हाल के वर्षों में प्रभावशाली वृद्धि दर प्राप्त की है. अब भारत कृषि वस्तुओं के आयात के साथ ही उनका निर्यात भी कर रहा है. भारत चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है, तथा भैंस-माँस, पोल्ट्री, अंडे और दूध के बड़े उत्पादक देशों में से एक बन गया है.  दूध और फसल उत्पादन के एकीकरण ने बड़ी संख्या में सीमांत किसानों की आय में वृद्धि करने में सहायता की है। गौ और पशुपालन के द्वारा मृदा स्वास्थ्य में सुधार की भी संभावनाओं ने देश को पुन: आकृष्ट किया है. प्राकृतिक और जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य है - खेती व्यय को कम करना, भोजन में पौष्टिकता को बनाये रखना, मृदा एवं जल संरक्षण. कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली ने कृषि उत्पादन और उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, किन्तु भविष्य की बढ़ती हुयी जनसंख्या, खाद्य आवश्यकता, पर्यावरण असन्तुलन, कीटाणु-जीवाणु प्रकोप आदि चुनौतियों का समाधान खोजना भी अत्यन्त आवश्यक है. बदलते वैश्विक परिपेक्ष्य और उभरती हुयी चुनौतियों की पृष्ठभूमि में, कृषि अनुसन्धान, शिक्षा एवं विस्तार प्रणाली एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. भविष्य की आशंकाओं और सम्भावनाओं के बीच देश का कृषि उत्पादन, अनुसन्धान व विस्तार की कार्य प्रणाली पर ही निर्भर है. आज उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के साथ जल एवं मृदा संरक्षण की महत्ता को भी समझा जा रहा है. कृषि में लघु और सीमांत किसानों के लिये फसल उत्पादन में लाभप्रदता भी एक मुख्य चुनौती बन कर उभरी है. बढ़ते परिवार के साथ घटती हुयी प्रति व्यक्ति जोत ने खेती की लाभप्रदता को प्रभावित किया है. बढ़ती आदान लागत, मौसम पर निर्भरता, घटती श्रमिक उपलब्धता  और उत्पाद का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण आज कृषि एक लाभप्रद व्यवसाय नहीं रह गया है. श्रम और आय के अनुपात को देखते हुये ग्रामीण युवा पीढ़ी का कृषि से विमुख होना सहज सम्भाव्य है. समुचित आय व रोजगार की खोज में गाँवों से पलायन बढ़ा है. ग्रामीण अंचल में कृषि कार्यों को सम्पादित करने के लिये श्रमिकों का अभाव है. आजकल हर कोई टिकाऊ खेती की बात कर रहा है, किन्तु उससे अधिक आवश्यक हो गया है कि किसान खेती में टिका रहे. यदि भूमि के हिस्से से होने वाली आय एक परिवार के लिये पर्याप्त न हो तो ऐसे व्यक्ति का खेती में टिके रहने को विवशता से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता. वर्तमान अर्थयुग में सम्पन्नता के सभी समीकरण आय और लाभ केन्द्रित हो गये हैं और होने भी चाहिये, ऐसे में किसी को खेती करने के लिये प्रेरित करना सम्भव नहीं है. खेती को लाभप्रद बनाने के लिये आवश्यक है सम्यक समग्र दृष्टि.  

वर्तमान परिस्थितियों में खेती को लाभप्रद बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं. प्राय: ये मान लिया जाता है कि उत्पादन दुगना हो गया तो लाभ भी दुगना हो जायेगा. किन्तु माँग और आपूर्ति की गणित इसके ठीक विपरीत है. कृषि को लाभप्रद उद्योग बनाने के प्रयास में किसान बीज, उर्वरक, कीट-पतवार नाशक, यन्त्र निर्माताओं आदि कृषि आदान कम्पनियों के लिये एक बाज़ार मात्र है. भारत में अभी भी 50 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों  में रह कर कृषि आधारित कार्यों में संलग्न हैं. जबकि उत्पादन के बाद कृषि उत्पाद शहरों में स्थित मिलों में भण्डारण व प्रसंस्करण के लिये चला जाता है. इन प्रसंस्करण कंपनियों के लिये गाँव सस्ते कृषि उत्पाद के स्रोत हैं. समस्त खाद्य मूल्य श्रृंखला गाँवों के बाहर स्थापित है. फसल उत्पादन में सन्निहित सभी संकटों का सामना किसान करता है जबकि उसके उत्पाद का मूल्य निर्धारण बाज़ार करता है. प्राय: किसान को अपना उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर बेचने को विवश होना पड़ता है. इसके पीछे ग्राम स्तर पर भण्डारण और प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव है. एक प्रकार से देखा जाये तो पूँजी प्रवाह गाँवों से शहरों की ओर जाता दिखायी देता है. इन परिस्थितियों में ग्रामीण युवाओं का उन्नत जीवन शैली के लिये ग्राम्य अंचल से शहरों में पलायन नितांत स्वाभाविक है. मूल्य श्रृंखला में किसान सबसे निर्बल कड़ी और मूल्य श्रृंखला के अन्य हितधारकों का दायित्व है कि वे श्रृंखला की कमज़ोर किन्तु अनिवार्य कड़ी के हितों का संरक्षण करें.    

कोई भी उद्योग बिना लाभ के पुष्पित-पल्लवित नहीं हो सकता. सर्वाधिक उद्यम वाले कार्य कृषि, को कभी उद्योग की दृष्टि से नहीं देखा गया. जबकि कृषि ही ऐसा उद्योग है जो बढ़ती जनसंख्या के लिये आय व रोजगार का एक चिरस्थायी समाधान बन सकता है. किन्तु इसके लिये कृषि में उन्नत बीजों से लेकर भोजन की थाली तक पहुँचने में मूल्य श्रृंखला के समस्त आयामों पर कार्य होना चाहिये. हरित क्रांति के उपरोक्त अनेक घटकों में सर्वाधिक ध्यान किसी एक कारक ने आकृष्ट किया तो वो था - उन्नत प्रजाति. क्रान्ति के अन्य कारकों का योगदान गौण हो गया. फलस्वरूप कृषि शोध की दिशा ही बदल गयी. फसल प्रबन्धन जैसा व्यावहारिक और अनुप्रयुक्त विज्ञान नेपथ्य में चला गया. उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के लिये कृषि शोध, प्रजाति विकास के एकांगी मार्ग पर बढ़ गया. जिस क्षेत्र में वित्तीय पोषण का प्रावधान अधिक होगा, वही शोधकर्ताओं को आकृष्ट भी करेगा. इसका सीधा उदाहरण एलोपैथी चिकित्सा व अन्य वैकल्पिक चिकित्सा पद्यतियों में देखने को मिलता है. अधिक वित्तीय उपलब्धता के कारण एलोपैथी श्रेष्ठ मस्तिष्क और छात्रों को आपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रही है. इसमें छात्र ने किस भाषा में, किनके द्वारा शिक्षा प्राप्त की, वही छात्र के विचारों का निर्धारण करता है. अंग्रेजों की आधीनता ने भारतीय मानस पटल पर अंग्रेजी में पढ़े और पढाये विषयों की अमिट छाप छोड़ी है. ये छाप इतनी गहरी है कि देश अपने ही पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान को संदिग्धता से देखता है. आयुर्वेद और होमियोपैथी का सबसे मुखर विरोध एलोपैथी चिकित्सकों द्वारा ही होता है. ऐसे ही जब प्राकृतिक और जैविक खेती के वैज्ञानिक अध्ययन का विषय उठा तो सबसे अधिक विरोध अंग्रेजी में कृषि शिक्षा ग्रहण किये लोगों की ओर से हुआ. जबकि इसका मूल उद्देश्य खेती-किसानी में लागत मूल्य और फसल को रासायनिक उर्वरक और कीट-खरपतवार नाशकों के उपयोग को कम करना था. ताकि लोगों में रसायन रहित भोजन के उपयोग को बढ़ावा दे कर उन्हें खाद्यजनित रोगों से बचाया जा सके. इसके प्रचार के मूल में प्राकृतिक और जैविक खेती से उत्पन्न उत्पादों के लिये उच्च मूल्य के बाज़ार का निर्माण करना भी है.  

भारत ने कृषि शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व प्रगति की है. 1877 में सैडापेट में पहले कृषि कॉलेज की स्थापना के साथ औपचारिक कृषि शिक्षा का आरम्भ हुआ, जो बाद में कोयंबटूर में स्थानांतरित हो गया. बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज, शिवपुर में वर्ष 1898 में औपचारिक पाठ्यक्रम के रूप में कृषि शिक्षा आरम्भ की गयी. यह केवल 20 वीं शताब्दी के आरम्भ में वृहद स्तर पर औपचारिक कृषि अनुसंधान और शिक्षा की आवश्यकता का अनुभव किया गया. 1905 में आईएआरआई की स्थापना के बाद, 1906 में कानपुर, नागपुर, लायलपुर और कोयंबटूर, 1907 में पुणे और 1908 में सबौर में कृषि कॉलेजों की स्थापना की गयी. आज भारत में 74 कृषि विश्वविद्यालयों की एक सुदृढ़ और सशक्त कृषि शिक्षा प्रणाली है, जिसमें 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 4 केन्द्रीय विश्वविद्यालय कृषि संकाय के साथ, और 4 मानित विश्वविद्यालय सम्मिलित हैं. इन विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध कृषि कॉलेजों की संख्या भी कम नहीं है.  

आज अधिकांश कृषि शोध उन्नत प्रजातियों के विकास पर प्रमुखता से कार्य कर रहे हैं. कृषि की प्रत्येक समस्याओं का समाधान प्रजातियों के विकास में खोजा जा रहा है. चाहे जलवायु परिवर्तन का विषय हो या उत्पादन-उत्पादकता का, फसल सुधार के माध्यम से ही समस्याओं को सुलझाने का प्रयास हो रहा है. इस एकल दिशा प्रयास के कारण प्राकृतिक जैविक विविधता के बाद भी दिन प्रति दिन संस्तुत नयी-नयी प्रजातियों का विकास हो रहा है. इनमें अधिकांश प्रजातियाँ, उत्पादकता व एक या दो अन्य विशेषताओं के लिये चिन्हित की जा रही हैं. इनका उद्देश्य 15 से 20 प्रतिशत तक उत्पादकता में वृद्धि है. जबकि उचित फसल प्रबन्धन से इस वांछित उत्पादकता को प्राप्त किया जा सकता है. केवल उचित यन्त्रीकरण से उत्पादन-उत्पादकता में वृद्धि के साथ ही संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है. कृषि की अनेकानेक समस्याओं के व्यावहारिक व अभियांत्रिकी समाधान सहज उपलब्ध हैं. स्वतंत्रता के पचहत्तर सालों में अभियांत्रिकी के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है. प्रजातियों का विकास एक समय लेने वाली प्रक्रिया है. अभियान्त्रिकी का सदुपयोग करके कृषि समस्याओं का शीघ्र व त्वरित निदान किया जा सकता है. खेती में श्रम और लागत कम करने में कृषि अभियान्त्रिकी ने अमूल्य योगदान दिया है. उत्पादित फसल के मूल्य सम्वर्धन से कृषक और ग्रामीण आय में वृद्धि की अपार संभावनायें हैं. जलवायु परिवर्तन सहिष्णु, कीट व रोग रोधी प्रजातियों के विकास का मुख्य उद्देश्य, उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि ही रहा है.  प्राय: मुख्य  उपयोगकर्ताओं, किसान, प्रसंस्करणकर्ता और उपभोक्ता, की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रजातियों के विकास को वरीयता नहीं मिलती. खेती में कृषि कार्यों की समयबद्धता अत्यंत आवश्यक है. इसलिये वृहद् स्तर पर खेती करने के लिये प्रत्येक कृषि कार्य के यंत्रीकरण की आवश्यकता है. इसके लिए आवश्यक है कि प्रजातियों के विकास में यन्त्रों के प्राचल (पैरामीटर्स) का भी ध्यान रखा जाये. पंक्तिबद्ध व मेंढ पर बुआई के लिये सीड ड्रिल और प्लांटर्स का उपयोग होता है. अगल प्रजातियों के भिन्न आकार के बीजों के कारण मशीन का बार-बार संयोजन करना पड़ता है. उत्पादित अनाज की साफ़-सफाई में भी हर आकार की चलनी न होने के कारण सफाई क्षमता प्रभावित होती है. प्रत्येक फसल के दानों की आकार-सीमा नियत करके सीड ड्रिल से लेकर थ्रेशर, ग्रेडर, और प्रसंस्करण मशीनों की दक्षता को बढाया जा सकता है.

अब आवश्यकता है चतुर (स्मार्ट) फसल सुधार की. अभियांत्रिकी औसत के नियम पर कार्य करती है. पूरे विश्व में मानव संरचना अलग-अलग है, किन्तु पूरे विश्व में मेज और कुर्सी की ऊँचाई लगभग नियत है. भवनों के निर्माण में भी अधिकांश पैरामीटर्स वैश्विक स्तर पर सामान्य मानव के आधार पर बनाये जाते हैं. इसी प्रकार मशीनों का डिज़ाइन भी सामान्य मानव के अनुरूप तैयार किया जाता है. इससे यन्त्र निर्माण में सुविधा हो जाती है. कृषि में भी प्रजाति विकास में अभियांत्रिकी और मशीन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिये. यदि कृषि उत्पादन का अधिकतम यंत्रीकरण करना है तो बोआई, निराई, गुड़ाई, कटाई, थ्रेशिंग आदि समस्त फसल उत्पादन प्रणालियों की आवश्यकताओं को प्रजाति विकास में सम्मिलित करना होगा. मशीन की सेटिंग के अनुसार यदि कृषि पद्यतियों को अपनाया जाये तभी कृषि का अधिकतम यन्त्रीकरण सम्भव हो पायेगा. अभी एक ही फसल की भिन्न प्रजातियों के बीज अलग-अलग आकार के होते हैं, इसके कारण हर प्रजाति के लिये मशीन पैरामीटर्स को बदलना पड़ सकता है. यंत्रीकरण में सर्वाधिक योगदान ट्रैक्टर्स का है. इसलिये आवश्यक है कि फसल पंक्तियों के बीच कम से कम ट्रैक्टर के पहिये के बराबर दूरी सुनिश्चित हो. आजकल मशीन द्वारा हार्वेस्ट करने के लिये सभी फसलों की ऊँचाई बढ़ाने के प्रयास चल रहे हैं. इस प्रोजेक्ट की विशेषता ये है कि इस मशीन से कटाई और मड़ाई के शोध में कोई अभियन्ता सम्मिलित नहीं है. यंत्रीकरण का लाभ तब ही है जब बोआई से लेकर कटाई तक के सभी कार्य मशीनों की सहायता से किये जायें. जबकि इस परियोजना का लक्ष्य मात्र कटाई और मड़ाई तक ही सीमित है. बोवाई व अन्य कृषि कार्य मानव श्रम द्वारा ही किये जाते हैं. चूँकि फसल पंक्तियों के बीच की संस्तुत दूरी ट्रैक्टर के पहियों की चौडाई से कम होती है इसलिये अन्य कृषि कार्य जैसे निराई-गुड़ाई, कीटनाशक का स्प्रे श्रमिकों द्वारा किया जाता है. ट्रैक्टर के पहिये के बराबर दूरी रखने पर खेत में पौधों की संख्या कम हो जाती है, जो उत्पादन और उत्पादकता पर ऋणात्मक प्रभाव डालती है. कृषि उत्पादों का अंतिम उपयोगकर्ता या तो प्रसंस्करणकर्ता होता है या उपभोक्ता. किन्तु दुर्योग से प्रजाति विकास में उनकी आवश्यकताओं की उपेक्षा की जाती है. उनकी आवश्यकताओं का समावेश करके लक्ष्योंमुख प्रजातियों का विकास कम संसाधन में किया जा सकेगा. भारत जैविक विविधताओं का देश है, अन्तः आवश्यकता है देशी प्रजातियों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने की. कृषि शिक्षा में रत सभी विश्वविद्यालय व कॉलेज फसल सुधार कार्यक्रम चला रहे हैं. इस प्रकार देश की जैविक विविधता को निर्बाध रूप से बढाया जा रहा है. स्थिति ये हो गयी है कि शुद्ध देसी प्रजाति खोजना और उनका संरक्षण कर पाना कठिन होता जा रहा है. भारत को जलवायु और मृदा संरचना के आधार पर बाईस कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों में बाँटा गया है. प्रत्येक क्षेत्र में स्थापित विभिन्न शिक्षा व् शोध संस्थान उस क्षेत्र की फसलों के विकास में लगे हुये हैं. सभी के पास उन्नत प्रजातियाँ हैं, किन्तु हर समूह अपनी-अपनी प्रजाति की संस्तुति कर रहा है. यदि सभी समूह मिल कर ये निर्णय लें कि इस क्षेत्र में ये दो या चार प्रजातियाँ ही उच्चतम उत्पादन देंगी, तो बहुत संभव है किसान को उन्नत प्रजातियों के बीज आसानी से उपलब्ध हो सकें. इससे न केवल फसल उत्पादन और प्रसंस्करण में यन्त्रीकरण करना सुलभ हो जायेगा, अपितु उत्पादकता में भी वृद्धि अवश्य होगी. फसल सुधार का कार्य नेपथ्य में चलता रहता है, अग्रभाग में तो विकसित प्रजातियाँ और उनके बीज ही दिखायी देते हैं. मिसाइल के विकास में कितना मौलिक विज्ञान, भौतिकी, गणित, रसायन शास्त्र पर काम हुआ, ये कोई नहीं देखता. दिखाई देता है आकाश, पृथ्वी और नाग का सफल प्रक्षेपण. अपने कार्यक्षेत्र से भिन्न विषयों का शोध में समावेश करके कम समय में उपयुक्त उन्नत प्रजाति का चयन या विकास किया जा सकता है. पहले बैसाखियों का भार बहुत अधिक होता था. कलाम साहब के सुझाव से मिज़ाइल में उपयोग होने वाले हल्के और मजबूत मिश्र धातु के उपयोग ने एक बहुत बड़ा परिवर्तन ला दिया. फसल सुधार व कृषि सम्बंधित अन्य विषय विशेषज्ञों का सामूहिक प्रयास अधिक उन्नत और प्रचलित प्रजाति का विकास करने में सक्षम होगा. प्रसंस्करणकर्ता को भी एकसमान कच्चा माल चाहिये होता है, भिन्न प्रजातियों के लिये भिन्न प्रसंस्करण उपचार भी करने पड़ते हैं. इसमें अन्तिम उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है. भारत में आम के पैक्ड जूस का विपणन बहुत सी कम्पनियाँ कर रही हैं. वे भी आम का गूदा या गाढ़ा जूस विदेशों से आयात करती हैं. जबकि भारत में आम की पैदावार बहुतायत से होती है. जब कंपनियों से पूछा गया कि आप भारतीय पल्प का उपयोग क्यों नहीं करते तो उनका उत्तर था यहाँ आम की इतनी अधिक प्रजातियाँ हैं कि पूरे खेप के लिये एक सान्द्रता, रंग और मिठास का पल्प नहीं मिलता जबकि आयातित पल्प एकरूप होता है. यही समस्या मिल मालिकों को भी होती है. आयातित दलहनी फसलों की पूरी खेप एक सी होती है, इसलिये मशीन सञ्चालन में बहुत ज्यादा समायोजन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. कम प्रजातियों का अर्थ है, किसानों के लिये बीजों की सहज उपलब्धता और प्रसंस्करण हेतु एकरूप कच्चा माल. प्रजातियों की संख्या कम करने के लिये निस्तारण से पहले प्रजातियों को जितने अधिक परीक्षणों (स्क्रीनिंग) से गुजरना होगा, उतनी ही कम प्रजातियाँ सभी पैरामीटर्स पर सफल होंगी. अभी तक उन्नत प्रजातियों को उत्पादन, उत्पादकता और रोग रोधकता के आधार पर निर्गत किया जाता है. मशीन निर्माताओं और प्रसंस्करण के लिये उपयोगी पैरामीटर्स को भी संज्ञान में लिये जाने से निश्चय ही प्रजातियों के निस्तारण संख्या में कमी आयेगी. उपभोक्ताओं के स्वाद और वरीयता को सम्मिलित करने से किसी भी निर्गत प्रजाति के अप्रचलित हो जाने की सम्भावना भी कम होती है. बीस साल पहले फसल की ऊँचाई बढ़ाने के उद्देश्य से फसल सुधार कार्यक्रम आरम्भ किये गये थे. एक अभियन्ता ही ये समझ सकता है कि फसल को ऊँचा करने की तुलना में कंबाइन की कटर बार को नीचे करना एक आसान विकल्प है. आज अधिकांश फसलें कम्बाइन से कट रही हैं. बीस साल पहले यदि किसी ने इस बात पर ध्यान दिया होता तो मशीन से कटाई के लिये फसल की ऊँचाई बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. कुछ लोगों की अवधारणा थी कि  बीजों का आकार छोटा होना चाहिये, क्योंकि बड़े दाने थ्रेशर मशीन में टूट जाते हैं. बहुत सम्भव है उन्हें थ्रेशर में सेटिंग बदलने के प्रयोजन का भान न रहा हो. 

जिस तरह प्रजातियों का विकास हो रहा है, उसी तरह अभियान्त्रिकी तकनीकों का विकास भी हो रहा है. कृषि वैज्ञानिकों को चाहिये कि प्रजाति विकास में उन्नत अभियांत्रिकी तकनीकों का भी प्रयोग करें. काल्पनिक सुपर वैरायटी की अवधारणा में अवांछित क्षेत्रों में शोध संसधान को व्यर्थ कर देना उचित नहीं है. आजकल फसल कटाई के दौरान न झडें या भण्डारण में बिना किसी रसायन के भण्डारगृह में कीट से सुरक्षित रहे, इस दिशा में प्रजाति विकसित करने की योजना की चर्चा हो रही है. जिन समस्याओं का सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ प्रबंधन हो सकता है, उन क्षेत्रों में प्रजातियों का विकास करने के प्रयास, मानव श्रम और वित्तीय संसाधनों के दुरूपयोग से अधिक कुछ नहीं है. कृषि शोध में एक समस्या ये भी है कि हर व्यक्ति अलग-अलग परियोजना पर काम कर रहा है. जबकि बड़े-बड़े काम समूह द्वारा किये जाते हैं. इसरो में एक परियोजना पर हज़ारों लोग मिल कर काम करते हैं, जो उनकी सामूहिक उपलब्धि होती है. कृषि शोध में शोध एकाकी है तो सफलता भी व्यक्तिगत है. कृषि के किसी भी क्षेत्र में अभियन्ताओं की भूमिका पर कोई विशेष बल नहीं दिया गया है. यहाँ तक कि अधिकांश कृषि विज्ञान केन्द्रों में हर विषय के विषयवस्तु विशेषज्ञ मिल जायेंगे सिवाय कृषि अभियंता के. अभियंता का दृष्टिकोण समाधान उन्मुखी होता है और वो संस्थान में संसाधन सृजन के कार्य में प्रमुख भूमिका निभा सकता है. प्रजातियों के विकास कार्यक्रमों में अभियंताओं का समावेश प्रजाति विकास को एक नयी दिशा देने में सक्षम है. इनका व्यावहारिक ज्ञान कृषि शोध को नया आयाम देगा. 

कृषि शोध की वर्तमान समस्या ये है कि ये हर कृषि समस्या का समाधान प्रजातियों के उन्नयन में देखती है. जबकि उनका प्रबंधन एक सस्ता और आसन विकल्प हो सकता है. समस्याओं का उन्नत प्रजातियों के विकास से सम्पूर्ण निराकरण के प्रयास कभी भी अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहते. इसीलिये जो समस्यायें कृषि में पचास वर्ष पहले थीं, वो आज भी अस्तित्व में बनी हुयी हैं. समस्या के सम्पूर्ण उन्मूलन करने की चेष्टा से अधिक सरल है उनका प्रबन्धन. अभियांत्रिकी तकनीकों के माध्यम से समस्या को समाप्त तो नहीं पर उसकी तीव्रता को कम लागत में नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है. इसी प्रकार वर्षों से पौधों के उकठा रोधी बनाने के लिये शोध चल रहे हैं. किसी ने मृदा की नमी से इसे सहसम्बद्ध करने का प्रयास नहीं किया. सम्भवतः भूमि में नमी की कमी उकठा रोगाणु को सक्रिय करता हो. सिंचाई की आधारभूत संरचना में निवेश कृषि एवं कृषक की अनेकानेक समस्याओं को साधने में सिद्ध होगा. विगत छह वर्षों में, भारत के सिंचित क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुयी है, जो सकल फसली क्षेत्र के 47% से बढ़ कर 55% हो गया है. भविष्य में सिंचित क्षेत्र का परिमाण बढ़ना सुनिश्चित है. प्रजातियों के विकास हेतु शोध दल में भिन्न विषय वस्तु विशेषज्ञों का समावेश किसी अनावश्यक शोध की सम्भावना को कम करेगा, साथ ही कृषि शोध में टीम भावना का भी विकास करेगा. अधिकांश प्रजातियों को कीट और रोगरोधी क्षमता, जलवायु परिवर्तन के न्यूनतम असर और अल्पतम जल आवश्यकताओं के लिये परीक्षित (स्क्रीन) किया जाता है. किसी क्षेत्र के लिये किसी प्रजाति की संस्तुति से पहले उसे अधिकाधिक पैरामीटर्स के लिये स्क्रीन करना चाहिये ताकि संस्तुत प्रजातियों की संख्या कम से कम हो और उसका अधिकाधिक उपयोग हो सके. कम प्रजातियों की संख्या बीजों की उपलब्धता को भी सुनिश्चित करेंगी और, यन्त्र निर्माताओं और प्रसंस्करणकर्ताओं की आवश्यकता की पूर्ति भी करेगी.

डॉ. हिगिनबॉटम ने अर्थशास्त्री होने के बाद भी 1943 में ही कृषि में अभियांत्रिकी के महत्त्व को समझ लिया था. किन्तु आज स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद भी इस विषय को कृषि शोध में समुचित स्थान नहीं मिला है. ये दुर्भाग्य ही है कि संस्थानों में कृषि लागत को कम करने के या तकनीक प्रदर्शन के लिये भी यंत्रीकरण को समुचित रूप से नहीं अपनाया गया है. आज भी अधिकांश कृषि शोध संस्थानों में कृषि अभियांत्रिकी विभाग नहीं हैं. जल और मृदा संरक्षण, फसल उत्पादन का यंत्रीकरण और कटाई के बाद प्रसंस्करण आज की महती आवश्यकता हैं जो कृषि को औद्योगिक स्वरुप दे कर कृषक और ग्रामीण आय में वृद्धि करने में सक्षम हैं. 

-वाणभट्ट

शनिवार, 22 मार्च 2025

मुर्गीदाना

किसी भी भाषा में यदि किसी मुहावरे की रचना हुयी है तो उसके पीछे देश-समाज का वर्षों का अनुभव निहित होता है. तभी तो मुहावरे एकदम टाइम टेस्टेड उदाहरण बन जाते हैं. आप सिर्फ़ उनका ज़िक्र कीजिये और लोग समझ जाते हैं कि आप कहना क्या चाहते हैं. हमारे देश में एक ऐसा ही मुहावरा है 'हारे को हरि नाम'. इस देश में साधू-संत ऐसे ही बहुतायत में नहीं पाये जाते. शायद लौकिक सफलता के लिये जिस साम-दाम-दण्ड-भेद की आवश्यकता होती है, वो सबके बस की बात नहीं है. इसलिये वो दुनिया जीतने से बेहतर स्वयं पर विजय प्राप्त करने के असम्भव से प्रयास में लग जाता है. इस प्रयास को इसलिये असम्भव कह रहा हूँ कि आत्मविजय पाने के लिये भी हम दुनिया के प्रपंच छोड़ने को तैयार नहीं हैं. पूर्व जन्मों के संयोग से जहाँ भी अवस्थित हैं, हम वहीं पर ज़िन्दगी का पूरा मज़ा लेते हुये परमानन्द का आनन्द लेना चाहते हैं. इस चक्कर में धोबी के गधे की तरह ना घर के बचते हैं ना घाट के. और जब अन्त समय सर पर आ कर खड़ा हो जाता है तो अन्तरात्मा कहती है कि दुविधा में दोऊ गये, माया मिली ना राम. माया तो वैसे भी महाठगिनी है, साथ तो सिर्फ़ राम ही रहते हैं. लेकिन पूरा जीवन माया जो नाच नचाती है, वो नाच ना होता, तो हम सब भी किसी अन्य जीव की तरह धरती पर आते और विचरण करके निकल जाते. 

अभी कुछ दिन पहले ही दुनिया की हैपीनेस इन्डेक्स की रिपोर्ट आई है. भारत 118 पायदान पर है. इस रिपोर्ट से ये भी पता लगा कि एक से एक आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़े देश भी खुशहाली में हमसे आगे हैं, तो कम से कम मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. हमारे देश में कर्तव्य-ईमानदारी-सत्यनिष्ठा-नैतिकता-संस्कार जैसी बड़ी-बड़ी बातें, बचपन से घुट्टी में इस कदर पिलायी जातीं हैं कि जब भी हम किसी प्रकार के आनन्द के बारे में सोचते हैं तो लगने लगता है, कहीं कोई पाप तो नहीं करने जा रहे. और एक बार ये विचार आ गया तो आप, जिसको दुनिया आनन्द मानती है, का क्या ख़ाक वो मज़ा ले पायेंगे. एक तो हमारा बहुसंख्यक लोगों का धर्म ही ऐसा है, जो भोग से अधिक त्याग को तरजीह देता है. कभी-कभी तो मुझे लगता है कि सनातन से विमुख होने और नये-नये सम्प्रदायों के उदय का यही मुख्य कारण है कि यहाँ तो व्यक्ति के लिये यम और नियम का पालन करना ही अत्यन्त कठिन है. और यदि आप ने उसका पालन कर लिया तो आप स्वार्थ से उपर उठ कर सम्पूर्ण जगत के हितार्थ काम करने लगेंगे. परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई. आपकी अपने व्यक्तिगत आनन्द की इच्छा ही समाप्त हो जायेगी. 

आप किसी से भी बात कीजिये, तो वो बतायेगा कि वो कितना भला आदमी है और घर-परिवार-समाज ने उसके भले होने का नाजायज़ लाभ उठाया है. उसके हिस्से तो त्याग ही आया. इसमें कोई शक भी नहीं है कि हम लोग वाकई भले लोग हैं. सामान्य तौर पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि शुद्ध-स्वार्थी लोगों की संख्या हमारे यहाँ कम है. हम बिना नियम-कानून वाले सम्पूर्ण आज़ादी वाले एक ऐसे देश-समाज की परिकल्पना करते हैं - जहाँ गम भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले. अब ऐसे युटोपियन समाज की कल्पना में जियेंगे तो दुखी तो रहना  ही पड़ेगा. गुलज़ार साहब से किसी ने पूछा कि कविताओं-ग़ज़लों में इतना दुःख क्यों भरा होता है. ऐसा जवाब कोई शायर ही दे सकता है - सुख फुलझड़ी की तरह होता है. आता है तो लगता है, बहुत ज़ल्दी ख़त्म हो गया. दुःख स्थायी और लम्बा लगता है, अगरबत्ती की तरह. जिसको समझ आ गया कि जीवन में हर चीज़ द्वैत में मिलती है, उसे सुख-दुःख भाव विह्वल नहीं कर सकता. समतल पर हम रहना नहीं चाहते. हम चाहते हैं सुखों का पहाड़ खड़ा करना. लेकिन भूल जाते हैं कि पहाड़ जितना ऊँचा होगा, बगल में खाई भी उतनी ही गहरी होगी. चूँकि मै स्वयं को आम भारतीयों की तरह ही एक आदर्शवादी भारतीय मानता हूँ, तो ये बता देना उचित होगा कि ये विचार स्वयंभू भगवान ओशो के तमाम चेलों में से किसी एक चेले के प्रवचन के माध्यम से मेरे कानों में पड़े थे. वर्ना मेरी क्या मजाल कि इतनी बड़ी बात कह या समझ भी सकूँ. 

जब व्यक्ति सफलता के शिखर पर होता है तो उसे ये कहने में कतई गुरेज नहीं होता कि सब कुछ उसने अपनी मेहनत के दम पर अर्जित किया है. और ख़ुदा न खास्ता यदि किसी कारण से व्यक्ति असफल हो जाये तो उसे ये कहने में देर नहीं लगती कि मेहनत तो बहुत की थी लेकिन भगवान् को मंज़ूर नहीं था. सफलता अहंकार को जन्म देती है जबकि विनय का उद्भव विफलता में निहित है. अहंकार के गुब्बारे में भरी हवा बस एक पिन की मोहताज होती है. फिर न गुब्बारा रहता है, न गुब्बारे का वज़ूद. भगवान् की विशेष कृपा से मै कुछ इमोशनल कवि हृदय व्यक्ति हूँ, इसलिये दूसरों के स्वाभिमान-अभिमान-अहंकार का मै बराबर ख्याल रखता हूँ. इसके लिये कभी-कभी आपको अपने स्वाभिमान का पायदान भी बनाना पड़ सकता है. दूसरों के अहम् का पोषण कवि टाइप के लोग ही कर सकते हैं, क्योकि उनमें दूसरों के दर्द को महसूस करने की विलक्षण प्रतिभा होती है. अपने अहम् का पोषित करने वाले भी अक्सर इन्हीं को इनकी औकात दिखाने का मौका नहीं चूकते. अपने कांफिडेंस को बढ़ने का सबसे आसान, सुगम और सटीक हथियार है, दूसरे के कांफिडेंस पर प्रहार. 

ऐसा नहीं है कि मेरा गुब्बारा कभी फूलता या फूला नहीं था. या आज भी कभी-कभी फूल नहीं जाता. फूलने और पिचकने की अनेक चक्रों से गुजरने के बाद ये एहसास हुआ कि गुब्बारे का वज़ूद बना रहे, ये अधिक आवश्यक है. दूसरे तो पिन लिये घूम ही रहे हैं. तेरहवीं पर पूड़ी का भोग लगाते हुये कहेंगे कि दूसरों के दुःख-दर्द से सरोकार रखने वाला एक भला आदमी नहीं रहा. इसलिये हवा कम कर ली लेकिन किसी दूसरे को हवा कम रखने की सलाह आजतक नहीं दी. आसमान में तैरते रंग-बिरंगे गुब्बारों का आनन्द आप तभी ले सकते हैं जब आप उनके नीचे और जमीन की सतह के करीब उड़ रहे हों. ये हर व्यक्ति की व्यक्तिगत यात्रा है जिसे उसे स्वयं तय करना है.   

इसी तरह दुनिया से पिटते-पिटाते जीवन के पचास पतझड़ पार कर लिये. ज़्यादातर जो लोग बसन्त व्यतीत करने की बात करते हैं. वो सम्भवतः वो लोग हों जिन्होंने जीवन का भोग किया हो. यहाँ तो लगता था कि आदर्शों की स्थापना और दुनिया सुधारने का सारा ठेका मेरे ही हिस्से आया. दुनिया का मज़ा लेना हो तो मीन-मेख निकालने की आदत से बचना चाहिये. ऐसे बहुत से उदहारण मिल जायेंगे जिन्होंने पेट भरने को अहमियत दी, भले दिमाग खाली रहा. अगले जन्म में भगवान् से भरा पेट और खाली दिमाग़ माँगूँगा (ये विचार भी मेरा नहीं है, कहाँ किससे उठाया है, याद नहीं. मेरे ब्लॉग के विचार प्रायः अपने नहीं होते. कहीं से पढ़ता हूँ, कहीं चेप देता हूँ, डिसक्लेमर के साथ). इन्होंने ज़िन्दगी का भरपूर आनन्द लिया और मुझे इस बात का एहसास दिलाने से कभी नहीं चूके कि इतना उठा-पटक करके तुम्हें क्या मिला. हम कहाँ तुम कहाँ. तब ऐसी स्थिति बन जाती है कि लगता है ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं. और यहीं से शुरू होती है आदमी की अन्तर्यात्रा. परमात्मा की खोज. 

इसके लिये सबसे ज़रूरी है किसी गुरु का होना. वही आपको भगवान से मिलवा सकता है. पण्डित-पुजारी हवन और पूजा तो करवा सकते हैं लेकिन भगवान से मिलने के लिये एक अदद गुरु का होना अति आवश्यक है. तमाम अध्यात्मिक चैनलों और यू-ट्यूब पर निर्झर झड़ रहे ज्ञान के कारण आज आपके लिये सुविधाजनक बाबा की खोज कोई बड़ा काम नहीं रह गया है. उन्नीस सौ चौंतीस में प्रकाशित 'अ सर्च इन सीक्रेट इण्डिया' के लेखक पॉल ब्रनटन को एक अध्यात्मिक गुरु की खोज में भारत का चप्पा-चप्पा छानना पड़ गया था. अब तो समस्या सेलेक्शन की है. चॉइस इतनी अधिक हैं कि आप की समझ नहीं आता किसे पकडें किसे छोडें. जब इस क्षेत्र में प्रवेश किया तो पता चला, चेला गुरु नहीं सेलेक्ट करता, गुरु चेला सेलेक्ट करता है और आप वहीं पहुँच जाते हैं, जो आपके लिए सबसे उचित है. पहले तो कई बाबाओं के प्रवचन यू-ट्यूब पर सुने गये. उनके कुछ टीवी प्रोग्राम्स देखे गये. सभी के प्रवचन एक से बढ़ कर एक. सभी अच्छी-अच्छी बातें करते. सबकी लम्बी-लम्बी फैन फालोइंग. सभी सोशल मीडिया पर 365 दिन 24/7 उपलब्ध. बाबाओं के अनुयायियों और मंदिरों-तीर्थों पर बढती बेतहाशा भीड़ देख कभी-कभी मुझे लगता कि जब सब लोग इतने अच्छे हैं, तो समाज में बढ़ते अपराध का ज़िम्मेदार कौन है. मंदिरों पर भीड़ बढ़ी है तो शराब के ठेकों पर भी भीड़ पहले से अधिक ही दिखती है. ये कहना बहुत कठिन हो गया है कि क्या सही है और क्या गलत. सही गलत का अंतरद्वंद जब हद से बढ़ गया तो एक बाबा को गुरु बना लेना मैंने उचित समझा. 

गुरु जी का आश्रम हमारे शहर के पास ही था बल्कि ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि आश्रम शहर के अन्दर ही आ गया था. योग-ध्यान के लिये जितनी सुख-सुविधाओं की आवश्यकता होती है सब आश्रम में उपलब्ध थीं. गुरु जी के चेले अधिकांशतः शहरवासी ही थे. प्रतिकूल मौसम में उन्हें अत्यधिक ठण्ड या गर्मी बर्दाश्त नहीं होती थी. गुरु जी तो पच्चीस वर्ष हिमालय पर कठिन तपस्या करके आये थे. उन्हें मालूम था कि चेलों को समाज से नया-नया विमोह हुआ है. आश्रम में सुविधा न मिली तो ये पुन: माया-मोह के जाल में फँस जायेंगे. आश्रम में अवर्णनीय शांति थी. गुरु जी प्रवचन के बाद चेलों को गाइडेड मेडिटेशन करवाते. बताते दुनिया में सिर्फ़ मानव के पास ही प्रभु को खोज सकने की क्षमता है, लेकिन वे दुनियादारी को ही सच मान के बैठे हैं. जब ऊपर वाले की बे-आवाज़ की लाठी पड़ती है तो कुछ दिनों तक मंदिरों के चक्कर काटते फिरते हैं. बाद में वही ढाक के तीन पात. वृद्धावस्था में जब शरीर भी भोग में साथ देने से इन्कार कर देता है तो भगवान की याद आती है. क्या आप भगवान् को बासी फूल अर्पित करते हैं. तो भगवान को याद करने के लिये बुढ़ापे का इन्तजार क्यों. जितनी जल्दी आप अपनी अध्यात्मिक यात्रा आरम्भ करेंगे अगले जन्म में उसके आगे से यात्रा शुरू होगी. गुरु जी की वाणी में अपार स्नेह झलकता था. मानो वे इस यात्रा को इसी जन्म में पूरा करवा देंगे. 

एक दिन उन्होंने अपने प्रवचन में इस बात पर बल दिया कि सृष्टि के कण-कण में भगवान हैं. हम सभी भगवान के अंश हैं. सभी में प्रभु विद्यमान हैं. हमको सभी में ब्रह्म को देखने का प्रयास करना चाहिये. इंसान ही नहीं समस्त चर-अचर जगत प्रभु की ही कल्पना है और उस सर्वव्यापी प्रभु की कोई कृति विकृत कैसे हो सकती है. एक शिष्य ने पूछा भी कि जो लोग दुश्मनी निभाने का कोई मौका नहीं छोड़ते, जो दिन-रात अपमानित करने में लगे रहते हैं, उनसे कैसे निपटा जाये. गुरु ने मुस्कुरा कर कहा - तुममें भगवान का अंश है, पहले तो तुम्हें ये अनुभव करना होगा. सबमें ब्रह्म स्वरुप का दर्शन करो. कल्याण होगा. शिक्षक से तो चर्चा की जा सकती है लेकिन गुरु की बातें गूढ़ होती हैं. उन्हें आत्मसात करना पड़ता है.   

दो-तीन महीने ऐसे ही बीत गये होंगे. नया मुल्ला प्याज़ ज़्यादा खाता है. मै नियमानुसार हर रविवार आश्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देता. लोग अपनी-अपनी समस्यायें गुरु जी से साझा करते और गुरु जी उनका निराकरण बताते. ये सब प्रवचन और मेडिटेशन सेशन के बाद होता था. जिसको जाना हो चला जाये लेकिन मुझे ये सेशन ज़्यादा इंटरेस्टिंग लगता. 

एक दिन उसी शिष्य ने पूछा - गुरुदेव आप के कहे अनुसार मैंने तो हर किसी में ब्रह्म का स्वरुप देखना आरम्भ कर दिया है लेकिन बाकी लोग तो और आक्रामक होते जा रहे हैं. पहले ही मै दुनिया में फिट नहीं हो पा रहा था अब तो लगता है दुनिया के बाहर ही हो गया हूँ. मेरे लिये तो हर व्यक्ति प्रभु का दिव्य रूप है. मै उन्हें ब्रह्म स्वरूप मान कर सहायता करता रहता हूँ, लेकिन वो लोग तो हमें ना-ना प्रकार से प्रताड़ित कर रहे हैंउन्हें मुझमें ब्रह्म क्यों नहीं दिखता. 

गुरु जी अपने चिरपरिचित अन्दाज़ में मुस्कुराये. बोले एक किस्सा सुनाता हूँ - एक बार एक व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक समस्या हो गयी. उसे लगता था कि वो मुर्गी का दाना है. जब भी कहीं बाहर निकलता तो जैसे ही कोई चिड़िया या मुर्गी सामने आ जाये, वो पैनिक हो जाता था और वापस घर में घुस जाता था. घर-बाहर-ऑफिस वाले सब परेशान. अच्छा-भला लम्बा-तगड़ा आदमी एक मुर्गी से डर रहा है. किसी ने सलाह दी कि किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास दिखाया जाये. डॉक्टर ने उसकी पूरी बात सुनी फिर उसे समझाया - देख भाई तेरे दो हाथ हैं, दो पैर हैं, दो कान हैं, एक नाक है, एक मुँह है. तू मुर्गीदाना थोड़ी न है. तू आदमी है. फिर उसकी पत्नी से बोला कि थेरेपी तब तक चलेगी जब तक ये समझ नहीं जाता कि ये मुर्गीदाना नहीं आदमी है. पत्नी रोज उसे ले कर आती. डॉक्टर रोज उसे यही बताता कि उसके दो हाथ हैं, दो पैर हैं, दो कान हैं, एक नाक है, एक मुँह है. वो मुर्गीदाना नहीं आदमी है. ऐसा करते-करते तीन महीने निकल गये. एक दिन वो आदमी आया और बोला - डॉक्टर साहब अब मुझे समझ आ गया कि मेरे दो हाथ हैं, दो पैर हैं, दो कान हैं, एक नाक है, एक मुँह है. मै मुर्गीदाना नहीं हूँ. मै आदमी हूँ. डॉक्टर बहुत खुश हुआ. उसने कहा अब तुम पूरी तरह स्वस्थ हो. जाओ अब नार्मल जीवन जियो. वो आदमी क्लिनिक से निकल गया. डॉक्टर अलगे पेशेंट को देखने में लग गया. इतने में वही आदमी दौड़ता हुआ आया और परदे के पीछे छुप के खड़ा हो गया. डॉक्टर परदे के पीछे गया और उससे पूछा कि क्या बात है जो यहाँ छिप के खड़े हो. वो आदमी बोला डॉक्टर साहब मै तो समझ गया कि मेरे दो हाथ हैं, दो पैर हैं, दो कान हैं, एक नाक है, एक मुँह है. मै मुर्गीदाना नहीं हूँ. मै आदमी हूँ. लेकिन जो बाहर मुर्गी घूम रही है उसे कौन बतायेगा कि मै मुर्गीदाना नहीं आदमी हूँ.

गुरु ने कहा - तुम्हारा भी यही हाल है. जब तक तुम्हें अपने ब्रह्म रूप पर विश्वास नहीं होगा तब तक दूसरे में ब्रह्म कैसे दिखेगा. सबसे आवश्यक है स्वयं के ब्रह्म होने पर विश्वास. 

-वाणभट्ट

शनिवार, 8 मार्च 2025

इन द परस्युट ऑफ़ हैप्पीनेस

देवेश का फोन आया तो उसमें आग्रह के भाव से कहीं ज्यादा अधिकार का भाव था. 'भैया हमका महाकुम्भ नय नहलउबो का. तुम्हार जइस इलाहाबादी के रहे हम डुबकी नय लगाय पाये तो तुम्हार प्रयागराजी होवै के का फ़ायदा.' 

इस महाकुम्भ में एक बार पहले भी नहा पाने की स्मृतियाँ जीवन्त हो गयीं. कानपुर से निकलते ही मेले का सा माहौल बन गया था. जिसे देखो प्रयागराज की ओर बढ़ा चला जा रहा है. रास्ते में कोई चाय की दुकान या ढाबा नहीं था जहाँ लोगों की भीड़ न हो. जहाँ-जहाँ टोल प्लाजा और डाईवर्ज़ंस थे, वहाँ-वहाँ यही भीड़ जाम में कन्वर्ट हो जा रही थी. पेट्रोल पम्प पर गाड़ियों की लम्बी-लम्बी लाइनें लगी हुयी थीं. ऐसी लाइनें हम लोगों को तभी देखने को मिलती थीं जब अफवाह फ़ैल जाती थी कि बजट में तेल का दाम बढ़ने वाला है, या शहर के सभी पेट्रोल पम्पों में बस दो दिन का पेट्रोल बचा है. लोग वाहन उपयोग के इतने आदी हो चले हैं कि यात्रा के किसी अन्य मोड के बारे में सोच भी नहीं सकते. सब टैंक फुल कराने में लगे रहते. मौकापरस्त लोग पेट्रोल के थोड़े ज्यादा पैसे भी वसूल लें तो वाहन स्वामी सहर्ष दे देते. अख़बारों और न्यूज़ चैनेल्स में प्रयागराज जा रही सभी ट्रेनों के ठसाठस फुल होने के दृश्य दिखाये जा रहे थे. स्टेशन पर भी ट्रेन्स में चढने-उतरने में मारा-मारी दिखायी जा रही थी. कुछ स्टेशनों पर तो तिल रखने की भी जगह नहीं दिख रही थी. क्या रिजर्वेशन और क्या बिना रिजर्वेशन. भीड़ इतनी की ना तो कोई टिकट खरीद सकता था, ना कोई उसे चेक कर सकता था. जब आप पुण्य कार्य के लिये जा रहे हों तो टिकट खरीदने या देखने या दिखाने को प्रभु के कार्य में हस्तक्षेप ही माना जायेगा. लेकिन ये तय है कि बिना श्रद्धा के कोई घर से निकलने की हिम्मत नहीं कर सकता. वैसे भी हमारे यहाँ मान्यता है कि जब कोई अदृश्य शक्ति आपको प्रेरित करती है, तभी आप तीर्थ के लिये निकल पाते हैं. आप गंगा जी नहीं जाते, गंगा जी आपको बुलाती हैं.

बहुत से मन के चंगे लोगों ने कठौती में ही गंगा मान कर बाल्टी स्नान कर लिया. और जो लोग प्रयागराज रिटर्न थे, उनको भी अपने इस ब्रह्म ज्ञान से वंचित न रहने दिया. कुछ को प्रयागराज से लौटे श्रद्धालुओं द्वारा लाया संगम का जल मिल गया था. यदि कोई कहता है कि भारत में भगवान बसते हैं, तो उसने सही ही कहा है. एक सौ पचास करोड़ के देश में यदि मात्र दस प्रतिशत लोग ही आज़ादी के पचहत्तर साल बाद विकसित भारत की सुविधाओं का लाभ लेने में सक्षम हों तो बाकी एक सौ पैंतीस करोड़ को भी तो जीने का कोई ना कोई सबब चाहिये ना. पढ़े-लिखे अज्ञानी इसे अन्ध भक्ति कह सकते हैं. उन्हें धर्म को अफ़ीम बोलने में किसी प्रकार की आत्मग्लानि महसूस नहीं होती. लेकिन मज़हब को नासूर बोलने में चोक लेने लगती है.

जितने लोग निकल पड़े थे, उन्हें स्वयं से ज्यादा भगवान का ही भरोसा था. कब और कैसे पहुँचेंगे, कहाँ रुकेंगे, क्या खायेंगे, ये सोच लिया होता तो वे घर से निकल ही नहीं पाते. सरकार ने बहुत पुख्ता इंतज़ामात किये थे, ताकि अधिक से अधिक लोग महाकुम्भ में सम्मिलित हो सकें. मुख्य नहान दिनों के अलावा प्रतिदिन एक से दो करोड़ लोगों द्वारा संगम पर आस्था की डुबकी लगाना जीवन में एक बार प्राप्त होने वाला अनुभव था. लेकिन उस अनन्त जनसमूह में आपका अपना अहम तिरोहित हो जाता है. एक अस्तित्वहीनता का बोध जन्म लेता है. साथ ही ये भान भी होता है बूँद-बूँद से सिन्धु बना है. बूँदों के बिना सागर का अस्तित्व नहीं है. सागर में बूँद का कोई वज़ूद हो न हो लेकिन हर बूँद में सागर के समस्त गुण-धर्म-अवयव उपस्थित हैं. सब अपने-अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार धरती पर अवतरित और अवस्थित हैं. सब की अपनी-अपनी नितान्त एकाकी यात्रा है. सब यहाँ यदि उमड़े पड़ रहे हैं तो अपने-अपने व्यक्तिगत मोक्ष की कामना के साथ. 

हमारे वाकर्स ग्रूप के चार बन्दों ने पच्चीस जनवरी को महाकुम्भ जाने का निर्णय लिया. मैंने जब से होश सम्भाला है हर पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी को देश के झण्डे को नमन अवश्य किया है. मुझे उम्मीद थी कि पच्चीस को जा कर, उसी दिन लौट के आ पाना शायद सम्भव न हो पाये, इसलिये मैंने जाने से मना कर दिया. शाम को हम और गर्ग साहब जब आराम से चाय का लुफ्त उठा रहे थे, बर्थवाल जी का फोन आया कि यार मिश्रा ने भीड़-भाड़ देख कर जाने का आइडिया ड्राप कर दिया है. हम लोग की विशेषता है कि व्यक्तिवाचक नामों के ऊपर सहजता से जातिवाचक सूचकों से लोगों को बुला लेते हैं. माँ-बाप खामख्वाह ही बच्चों के नाम पर रिसर्च करते हैं. जब कि हम वर्मा-शर्मा से भी काम चला सकते हैं. अब कोई और इंटरेस्टेड हो तो उसे अकोमोडेट किया जा सकता हैं. शायद गंगा मैया की पुकार थी जिसने मुझे बॉस से स्टेशन लीव लेने के लिये प्रेरित किया. 'सर यदि इजाज़त हो तो इस बार मै प्रयागराज में ही झन्डा फहरा लूँ.' माँ गंगे की कृपा से मुझे इस बात की सहर्ष अनुमति भी मिल गयी. अब भी अगर मै कहूँ कि मै प्रयागराज गया था, तो मेरी भूल होगी. करने और करवाने वाला तो बस केशव है, हम तो बस अपने-अपने अहम् का वहम पाले बैठे हैं. प्रभु की माया ही ऐसी है. 

हम लोग प्रातः छ: बजे इलाहाबाद के रास्ते पर निकल पड़े थे. रास्ते के दृश्य का बखान पहले ही कर चुका हूँ. बहरहाल किसी तरह लखनऊ वाली तरफ से हम इलाहाबाद में प्रवेश कर पाये. हाइवे छोड़ने के बाद सामने अन्तहीन जाम से सामना हुआ. शहर के भीतर के जाम की स्थिति कोई बेहतर नहीं थी. कई डायवर्ज़ंस को झेलते हुये किसी तरह हम लोग अपने बाघम्बरी स्थित घर पहुँच पाये. मित्रों ने राय दी कि कार को घर पर ही छोड़ दिया जाये और आगे की यात्रा पैदल तय की जाये. इलाहाबाद में जिसका जीवन बीता हो उसे घर से संगम तक पैदल जाने की बात थोड़ी अटपटी लगी. मैंने प्रतिरोध किया कि कार जहाँ तक जा सकती है वहाँ तक चलते हैं, उसके बाद पैदल चल लेंगे. लेकिन जाम के मद्देनज़र मित्रों ने लोकल व्यक्ति की सलाह मानने से इन्कार कर दिया. मन मसोस के मुझे भी उनके साथ पैदल चलना पड़ गया. ये तो बाद में पता चला कि ये हम लोगों का उस दिन का सबसे अच्छा निर्णय था. संयोग से हमारे घर से संगम की कुल दूरी अधिक से अधिक पाँच किलोमीटर की होगी. सो ये तो पता था कि अधिकतम कितना चलना पड़ सकता है. जाम-डाईवर्ज़ंस में घूमते-फिरते हम लोगों संगम स्नान करके लौटने में छ: घन्टे लगे. इस बीच जब हम लोग कुछ अल्पाहार के लिये रुके तो मुझे ध्यान आया कि मेरा एकादशी का व्रत भी है और सुबह से कुछ संतरों और केलों का ही सेवन किया था. बाकी लोगों ने बीच में भोजन जैसा कुछ लिया था. शाम तीन बजे से निकले-निकले रात नौ बजे हम वापस घर लौट पाये. सुबह छ: बजे से हम निरंतर यात्रा पर थे. सभी के शरीर थक चुके थे लेकिन संगम स्नान के बाद सभी की आत्मा जोश से लबरेज थी. स्नान के बाद माथे पर चन्दन-टीका करके हम सब एक अनजान स्फूर्ति का अनुभव कर रहे थे. 

मैंने पता किया पास ही एक स्कूल के प्रांगण में झन्डा फहराने का कार्यक्रम सुबह नौ बजे संपन्न होना था. मैंने कहा उसके बाद निकलने में कल दस तो बज ही जायेगा. सबने एक दूसरे की ओर देखा. बर्थवाल ने बोला - कल यदि झन्डा आप अपने ऑफिस में ही फहरायें तो कैसा रहेगा. सभी के चहरे चमक उठे. अगले पाँच मिनट में हम फिर सफ़र पर थे. जितना जाम जाने में था उतना ही जाम लौटने में भी था. लेकिन शहर के भीतर, हाइवे पहुँचने तक. जाने वाले रास्ते पर अभी भी जाम की स्थिति बनी हुयी थी. हमारी लौटने वाली साइड पर कतिपय कम भीड़ थी. रात तीन बजे हम लोग वापस कानपुर आ सके और मै अपने संस्थान के 26 जनवरी समरोह में सम्मिलित भी हुआ. अब इसे कोई दैवी शक्ति न माने तो न माने, मुझे मालूम है कि ये सब मुझे मेरे सामर्थ्य के बाहर प्रतीत होता यदि मैंने माँ गंगा के बुलावे पर अपना दिमाग लगा दिया होता. यही स्थिति कमोबेश सभी श्रद्धालुओं के साथ हुयी होगी. कुछ को शहर प्रवेश से ही पन्दरह-बीस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था. लेकिन आध्यात्म से चमकते उनके चेहरों पर पुलिस-प्रशासन के लिये अतिश्योक्तिरंजित शब्द थे. किसी को किसी प्रकार का न गिला था न शिकवा.    

देवेश बाबू, हैं तो पटना के खाँटी बिहारी, लेकिन इलाहाबाद में साथ बीटेक करने के दौरान इलाहाबादी भाषा-शैली में विशारद भी कर डाली. ये उपाधि कोई संस्थान या विश्वविद्यालय नहीं देता. इसे आपको परम ज्ञानी इलाहाबादियों संगत में रह कर ही प्राप्त करना होता है. जिसका उपयोग रिक्शे-ऑटो से करना नितान्त आवश्यक है, अन्यथा वे आपको बाहरी समझ कर दुगना पैसा वसूल लें. इसका दूसरा सबसे प्रयोग होता था तब होता है जब इलाहाबादी बकैतों को डील करना हो. अगर आपने बहस-मुबाहिसा (वाद-विवाद) में परिस्कृत भाषा शैली का प्रयोग गलती से कर दिया तो आपके लिये लॉजिकल तरीके से बात कहना मुश्किल हो जाये. बहुत मुमकिन है कि इलाहाबादी आपको बताय दे कि तुम अबहिन लरका हो और तुमका कुच्छौ नय मालूम है. ऐके बाद बहस की कौनो गुंजाईश बचत है का. आपको बैकफुट पर आना ही पड़ता कि इन जाहिलों से कौन भिड़े. 

मेरा इलाहाबाद कुछ हद तक सन अट्ठासी के बाद से छूट सा गया था, ये बात अलग है कि आप चाहिये तो भी इलाहाबाद छूटता कहाँ है. दिल्ली-पंजाब में रहने के बाद हिन्दी जैसा कुछ तो बचा रहा लेकिन इलाहाबादी भाषा पर कमांड जाता रहा. फेसबुक और वाट्सएप्प पर इलाहाबादी ग्रूप्स में होने के कारण हम लोग गाहे-बगाहे इलाहाबादी की प्रैक्टिस कर लेते हैं. ईश्वरीय विधान के अनुसार फिलहाल मेरा डेरा कानपुर है, जो कि एक गंगा किनारे वाला शहर है. मैंने देवेश को बताने की कोशिश की कि भाई भगवान् के फज़ल से मै पहले ही पच्चीस जनवरी को ही संगम स्नान का पुण्य लाभ ले आया. मेरी अब तक की ज़िन्दगी में अटेंड किये गए माघ, अर्धकुम्भ और कुम्भ मेलों में पहला अवसर था, जब मुझ इलाहाबादी को अपने घर से संगम तक की दूरी पैदल नापनी पड़ी हो. इसके पहले सायकिल, स्कूटर या कार संगम क्षेत्र तक चली जाया करती थी. लेकिन 144 साल बाद पड़ने वाला ये महाकुम्भ भी तो पहली बार पड़ा था. देवेश के पुन: गंगा स्नान के आग्रह को मुझे मानना ही था. दोस्ती होती भी तो निभाने के लिये है. तय हुआ कि 21 फरवरी को सुबह निकल कर भाई दिल्ली से कानपुर आ जायेगा और शाम को ऑफिस करके हम लोग प्रयागराज को कूच कर जायें ताकि रात 12 तक हम संगम तट पर पहुँच जायें. 

लेकिन ऐसा हो न सका, देवेश भाई का प्रवेश कानपुर में रात आठ बजे के बाद हुआ. खाना-पीना करके हम लोग रात ग्यारह बजे उसकी ऑटोमेटिक गियर वाली एसयूवी से निकल पाये. उसके ड्राइवर ओम को कानपुर में आराम करने के लिये बमुश्किल आधा एक घंटा मिला होगा. लेकिन वो ड्राइवर ही क्या जो ये न हाँके कि मैंने तीन-तीन दिन तक लगातार कार चलायी है. उसका एक पक्ष ये है कि मेरे रहते साहब को आराम न मिला तो मेरे होने का क्या लाभ. दूसरा पक्ष ये भी हो सकता है कि साहब की ड्राइविंग पर उसे भरोसा कम हो. गाडी ऑटोमेटिक थी और बड़ी थी इसलिये मुझ जैसे छोटी गाड़ी ब्रिओ चलाने वाले पर न तो दोस्त को विश्वास था न ड्राइवर को. 

प्रयागराज की बानगी भौती बायपास से ही दिखनी शुरू हो गयी थी. हमें लगा शायद जाम कानपुर के एन्ट्री पॉइंट रामदेवी तक हो लेकिन जल्द ही ये एहसास हो गया कि पूरे इलाहाबाद तक इस जाम से जूझना पड़ेगा. बाई पास के बाद जाम और बढ़ता जा रहा था. कोई ढाबा, चाय की दुकान, पेट्रोल पम्प खाली नहीं था. जाम में जो गाड़ियाँ दिख रही थीं, उनमें से गाहे-बगाहे ही यूपी की गाड़ियाँ थीं. पंजाब, गुजरात, हिमाचल, राजस्थान आदि प्रदेशों से आ रही गाड़ियों का ताँता लगा हुआ था. उसमें हमारी दिल्ली की एक गाडी भी फँस गयी थी. किसी को कोई हड़बड़ी आज नहीं थी. कोई कान-फोडू हॉर्न नहीं. सब शांति से अपनी लेन में गाड़ी लगाये खड़े थे. जगह मिलती तो बढ़ते, न मिलती तो खड़े रहते. ये बात अलग है कि छ: लेन सड़क पर आठ लेन बन चुकीं थीं, जो जाम के दृश्य को और भी भयावह बना रही थीं. ड्राइवर के बगल वाली सीट पर मै काबिज था, पीछे वाली सीट पर भाई रश्मि भाभी के साथ विराजमान थे. सामने वाली कार लगभग दस मीटर मूव कर चुकी थी, पीछे वाले से रहा नहीं गया, उसने हॉर्न ठोंक दिया. मैंने ओम की ओर मुड़ के देखा तो उसे आँख बन्द किये ध्यानावस्था में पाया. हल्के से आवाज़ देकर उसे गाडी किनारे किसी चाय की दुकान पर लगाने को कहा. 

उसके बाद की कमान देवेश ने सम्हाली और ड्राइवर साहब एक घन्टे की नैप लेने के इरादे से बगल वाली सीट पर बैठ गये. सुबह 6 बजे हम लोग इलाहाबाद के एन्ट्री पॉइंट पर थे. और गूगल मैप आगे का रास्ता नीला दिखा रहा था, जो हमें किसी चमत्कार जैसा लगा. लगा हाइवे छोड़ के हम एक घन्टे में घर पर होंगे. लेकिन एन्ट्री पॉइंट पर आठ लेन ट्रैक का जाम बगल सब लेन में भी प्रवेश कर चुका था. ओम तब तक अपनी नींद पूरी करके उठ गया था. एक पेट्रोल पम्प पर हम लोगों ने टैंक फुल करा लिया ताकि लौटते समय पेट्रोल की चिंता न रहे. वहीं पर चाय पी गयी. चाय वाले से पूछा यहाँ इतने बड़े जाम का क्या कारण है, जबकि आगे सड़क खाली है. उसने एक कातिल मुस्कराहट के साथ जवाब दिया - यहाँ से इलाहाबाद में प्रवेश बंद है. सब को लखनऊ वाली तरफ से ही घुसना होगा. बनारस रूट पर आगे बढने से पहले एक टोल भी है. अब मुझे उस जाम का कारण समझ आ गया था. ओम ड्राइविंग सीट पर अपनी जगह पुन: स्थापित हो गया और देवेश पिछली सीट पर बैठते ही नींद के आगोश में आ चुका था.          

लगभग 15-20 लाख की शहरी आबादी वाले शहर में प्रतिदिन एक करोड़ से ज्यादा लोगों के आने से प्रशासन को यदि अप्रत्याशित कदम उठाने पड़ें, तो उठाने ही पड़ेंगे. एक तरफ से आओ और दूसरी तरफ से निकल जाओ. मुझे लगा ऐसी व्यवस्था ठीक ही है. चूँकि इस यात्रा के सूत्रधार मा-बदौलत ही थे तो मेरी पलक झपकने का सवाल ही कहाँ था. चलाना मुझको था नहीं सो मेरी ड्यूटी बस ये ही देखने की थी कि ड्राइव करने वाला झपिया तो नहीं रहा. लेकिन इस भीषण जाम में झपियाने की गुंजाईश नहीं थी. झपियाये नहीं कि आगे या पीछे से ठुंके नहीं. इस बात का संतोष था कि धीरे ही सही, आगे बढ़ तो रहे हैं. लखनऊ रूट से जब इलाहाबाद के लिए बढ़े तो लगा, अब घर सारे जामों के बाद भी जल्द पहुँच जायेंगे. लेकिन आगे बढ़ने पर बताया गया फाफामऊ पुल से प्रवेश निषेध है. आगे बेला कछार से स्टील ब्रिज के द्वारा शहर में प्रवेश किया जा सकता है. हमने मान लिया कि जाम से बचने का एक तरीका डायवर्ज़न भी है, सो बिना किसी हील-हुज्जत के आगे बढ़ लिये. इलाहाबादी होने के नाते मुझे ऐसे किसी पुल का ज्ञान नहीं था जो सीधे स्टैनली रोड पर खुलता हो, लेकिन इंतजाम पुलिस का था और पुलिस का विनम्रता से आग्रह करना अपने आप में एक अजूबा सा लगा. ये भी लगा कि ज्यादा झिकझिक की तो भाई लोग अपने पुराने रूप में न आ जायें. तो हम लोग बढ़ते चले गये. और स्टील ब्रिज से होते हुये स्टैनली तक पहुँच गये. अब मेरा गन्तव्य, मेरा घर, मात्र छ:-सात किलोमीटर यानि आधा घंटा की दूरी पर था. तभी सामने चौराहे पर एकाएक कुछ पुलिस वाले प्रकट हो गये. उन्होंने बताया - दरअसल बेला कछार में पार्किंग बनायी ही इसलिये गयी है कि वहाँ इलाहाबाद के बाहर से आने वाली गाड़ियों को खड़ा करा दिया जाये. वहाँ दूर दूर तक न हाथी था ना घोड़ा था, सभी को पैदल ही जाना था. रेतीली मिटटी में इ-रिक्शे चल नहीं सकते थे. मै तो बस इस ख़ुलूस में बढ़ा जा रहा था कि अपना घर तो है ही.            

पुलिस वाले ने मुस्कुराते हुये बड़ी मासूमियत से हमें रोक दिया. आप अपनी गाड़ी बेला कछार में लगा दीजिये. मैंने बताया कि मै इलाहाबाद का ही रहने वाला हूँ. उसने बताया या तो इलाहाबाद की कार हो या इलाहाबाद का आधार हो तब ही हम आपको शहर प्रवेश की इज़ाजत दे सकते हैं. मैंने चिरौरी के अन्दाज़ में कहा - भाई जब नौकरी बाहर है, आधार भी कानपुर का है, तो क्या करूँ. देवेश की तन्द्रा कुछ देर पहले ही टूटी थी. बिफर गया - ये कह तो रहे हैं कि इनका घर है यहाँ पर और ये भी सरकारी अधिकारी हैं सेन्ट्रल गवर्नमेंट में. पुलिस वाले पर देवेश के पर्सनालिटी का कुछ रौब पड़ा या नहीं ये तो कहना मुश्किल है लेकिन पीछे लग रहे जाम की अपेक्षा हम लोगों को प्रवेश की अनुमति देना उसे ज्यादा उचित लगा. हमारे मुड़ने की जगह भी नहीं थी. उसने साथ ही ये शब्द भी जोड़ दिये सीधे से निकल जाइये आप लोग दाहिने कहाँ मुड़ने जा रहे थे. उस दिन पहली बार मुझे अपने ही शहर में बेगानेपन का एहसास हुआ. शुक्र है कि हम आगे निकल गये अगर वापस लौट के बेला कछार में गाड़ी पार्क करनी पड़ती तो हम लोगों को भले थोडा ज्यादा चलना होता लेकिन बेचारे पाठकों का क्या होता. उनके के लिये ये लम्बा ब्लॉग और लम्बा हो जाता. उस पुलिस वाले में हमें देवदर्शन हो गये. भगवान् के प्रति आस्था कुछ और बढ़ गयी. 

शहर के जाम से जूझते हुये किसी तरह जब हमने घर के सामने गाडी खड़ी की तो दोपहर का एक बजा था. कानपुर से इलाहाबाद अपने घर तक की यात्रा में हमें चौदह घन्टे लग चुके थे.  

अब हमारा अगला काम था जल्दी से फ्रेश हो कर संगम की ओर पैदल प्रस्थान करना. पिछले अनुभव ने यही सिखाया था. शहर में जिधर देखो आदमी ही आदमी. पूरा रास्ता पैदल श्रद्धालुओं से भरा हुआ था. आपको अपने लिये जगह बनाते हुये आगे बढ़ना एक चुनौती से कम नहीं था. तीर्थयात्रियों के लिये आने और जाने के मार्ग को भी अलग करने का प्रयास किया गया था. भीड़ को कम करने के उद्देश्य से बैरिकेड्स लगा कर रूट डाईवर्जन्स भी किये गये थे. सामने दिख रहे गंतव्य तक पहुँचने में आपको कितनी दूरी तय करनी होगी और कितना समय लगेगा ये कहना मुश्किल था. इ-रिक्शे ने अलोपी मन्दिर पर छोड़ दिया. किसी ने बताया आजकल यंग बाइकर्स मोटरसायकिल पर लोगों को थोडा और आगे तक ले जा सकते हैं. किराया दो सौ रुपये प्रति सवारी और एक मोटरसायकिल पर दो सवारी से कम नहीं बैठा रहे थे. वो दो मोटरसायकिल वाले भी हमें देवदूतों से कम नहीं लगे. लेकिन उन्होंने शास्त्री ब्रिज के नीचे जहाँ छोड़ा वहाँ से भी संगम एरिया ढाई किलोमीटर तो रहा ही होगा. लेकिन रेले के साथ बढ़ते हुये शायद ही किसी को ये ध्यान आया हो कि हम सबने रात भर यात्रा की है या किसी प्रकार की थकान है. शिव रात्रि और मेले का आखिरी स्नान करीब ही था और हर कोई चाहता था कि वो इस महाकुम्भ का हिस्सा बने इसलिये प्रतिदिन एक से डेढ़ करोड़ लोग प्रयागराज में संगम स्नान कर रहे थे. संगम पर हर तरफ़ आदमी ही आदमी दिख रहे थे. कहीं भी कपड़े-बैग रखने की जगह नहीं दिख रही थी. मेले की खासियत होती है, आप बढ़ते जाते हैं तो रास्ता निकलता जाता है. हम सबने बारी-बारी से स्नान किया. इस भीड़ में हर व्यक्ति अकेला था. उसके संकल्प, उसकी मान्यतायें उसकी अपनी थीं. सभी उस अद्भुत वातावरण में राग-द्वेष से पूरी तरह मुक्त थे. जितने संकल्प उतनी डुबकी. डुबकी सभी इष्ट-मित्र-परिवार के लिये. भाभी जी ने सम्पूर्ण भक्ति भाव के साथ पूजा अर्चना सम्पन्न की. लेकिन चन्दन-टीका और सेल्फी भी ज़रूरी थी स्नान को यादगार बनाने के लिये. 


पाप-पुण्य की अह्मंयताओं से मुक्त ये स्नान हमारे जीवन के कुछ अविस्मरणीय क्षणों में शामिल हो गया. आनन्द की खोज में सभी इधर-उधर भटक रहे हैं. यूँ ही करोड़ों लोग कष्ट झेलते हुये हर साल माघ मेले में संगम तट पर नहीं पहुँच जाते. इस बार तो ग्रहों का विशेष संयोग वैसे भी 144 साल बाद पड़ा था. इस भीड़ का हिस्सा बनके हर व्यक्ति आल्हादित अनुभव कर रहा था. हम भी उनमें से एक थे. लेकिन एक बात हमें अच्छे से समझ आ गयी थी, कष्ट जितना अधिक होगा आनन्द का लेवल भी उतना ही अधिक होगा. कम या अधिक सभी 60 करोड़ श्रद्धालुओं ने इस यात्रा में कष्ट उठाये होंगे. लेकिन सब तृप्त आत्मा से वापस लौट गये. उन करोड़ों लोगों की तरह वापस लौटते हुये हम भी इस अद्भुत अनुभव को संजोने में लगे थे. गंगाजल और संगम की मिट्टी साथ थी, अपने उन इष्ट-मित्रों के लिये जो किसी कारण से संगम तक नहीं पहुँच पाये थे. आनन्द वो नहीं है जो आप अपने लिये करते हैं. आनन्द वो है जो हम दूसरों के लिये करते हैं. और इसकी खासियत है कि ये बाँटने से बढ़ता है. 

- वाणभट्ट 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

जालिम जमाना

आजकल लोग बाग कुछ ज्यादा सेंटीमेंटल और इमोशनल होते जा रहे हैं. होना भी चाहिये. पे कमीशन्स लगने के बाद सब आत्म निर्भर जो हो गये हैं. और इसीलिये अलग-थलग भी. जब सब प्रैक्टिकल होने की जुगत में लगे हैं, तो कौन किसके अहम का तुष्टिकरण करे. किसी को कोई चुनाव-वुनाव लड़ना हो तो भले गधेे को बाप बना ले. वर्ना किसी को आपके इमोशन में भला क्या दिलचस्पी हो सकती है. हाँ लेखक और कवि ऐसे प्राणी हैं, जिन्हें यहीं से मसाला खोजना होता है. तो भाई साहब, हमने सोशल मीडिया की किसी विधा या किसी ग्रूप को पकड़ा, तो फिर छोड़ा नहीं.

हर समय तरक्की और विकास की बात करने वाले बिज़ी टाइप के लोग अपना रीड रिसिप्ट ऑफ़ रखते हैं ताकि लोगों को गलतफ़हमी बनी रहे कि बन्दा बहुत व्यस्त है. बीच में मुझे लगा कि लोग मुझे एकदम खलिहर समझ रहे हैं, कि जब देखो तब ऑनलाइन रहता है. तो मैने भी इस सुविधा का उपयोग करने का निश्चय किया. अब मुझमें कुछ-कुछ मिस्टर इंडिया वाली शक्तियाँ आ गयीं थीं. मै ऑनलाइन रहता, और लोग पूछते भाई कहाँ व्यस्त हो आजकल वॉट्सएप्प भी नहीं देखते. फ़ेसबुक पर अपना कोई भी सुराग़ नहीं छोड़ता था. न कोई लाइक, न कोई कमेंट. आदमी परेशान हो जाता है. व्यूज़ तो हज़ार के उपर, पर कमेंट और लाइक दो-चार. नाज़ुक मिजाज़ होने के कारण मुझे दूसरों के दर्द का एहसास बहुत आसानी से हो जाता है. बताईये किसी ने इतनी मेहनत-जतन से पोस्ट या स्टेटस लगाया, और किसी ने उसको तवज्जोह नहीं दी. ऐसे में अच्छे भले आदमी के दिल का टूटना लाज़मी है. मुझे अपने उपर गिल्टी कॉन्शस होने लगा. बताओ किसी का दिल दुखाने का भला मेरा क्या अख़्तियार है. आदमी को कम से कम अपनी नज़र में तो सही होना ही चाहिये. 

अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते क्यूँ कर

दिल ही दुश्मन है मुखालिफ़ के गवाहों की तरह 

- सुदर्शन फ़ाकिर

सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी उद्देश्य से मैने रीड रिसिप्ट को पुन: ऑन कर दिया. 

अब इसमें और भी बड़ा लफड़ा ये है कि किसी ने दर्द भरा स्टेट्स लगाया और आपने पलट के हाल नहीं पूछा तो उसके दिल की तो वो जाने, आपका दिल, आपकी अंतरात्मा, आपको कचोटना शुरू कर देती है. लगता है बन्दे ने कुछ उट-पटांग कर लिया, तो समाज कल्याण या सुधारक होने का जो दम्भ पाले बैठे हैं, उसका क्या होगा. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि कॉल किया तो बन्दा खुशमिजाज़ मूड में मिला. बोला डायलॉग अच्छा लगा सो चेप दिया. सबसे ज़्यादा दिक़्क़त तब है जब बन्दा वाकई लो फील कर रहा हो. डर रहता है कि यदि आपने फोन पर उसे पैसिफ़ाइ करने का प्रयास किया तो घण्टे दो घण्टे गये. ऐसा नहीं है कि यार-दोस्तों-रिश्तेदारों के लिये मै इतना समय दान नहीं कर सकता, लेकिन अफ़सोस की बात है कि ये इतने नाशुक्रे टाइप के लोग हैं कि बाद में आप ही के लिये कहते घूमते हैं कि खाली आदमी है, इसे कोई काम नहीं है. फोन लगाता है तो दो घण्टे बरबाद कर देता है. कवि और लेखक होने का एक नुकसान ये भी है कि आपके दिल में तो सारे जहाँ का दर्द है लेकिन ये भाई लोग बड़े प्रैक्टिकल हैं. इन्हें ऐसा बन्दा चाहिये जो इनकी व्यथा सुन के इन्हें हल्का तो कर दे, लेकिन इनकी बात पचा जाये, किसी से कुछ ना कहे. 

बॉस से पीड़ित लोग अक्सर गिरते-पड़ते मुझ नाचीज़ के पास ही आ कर टपकते हैं. उन्हें मालूम है कि कविवर घायल साहब ही उनके उद्गार झेल सकते हैं. उन्हें सांत्वना देने के चक्कर में मुझे भी मजबूरी में संवेदना के दो-चार शब्द कहने पड़ जाते हैं. बॉस को कहे कुछ सम्पुट उनकी घायल आत्मा पर फ़ाहे का काम करते हैं. अब जब रिटायरमेंट की कगार पर हूँ, तब समझ आया कि मेरा अच्छे से अच्छा दोस्त जब मेरा बॉस बनता है तो मुझे ही क्यों सुधारने में लग जाता है. हल्के होने के बाद जब इनका टूटा-फूटा आत्मविश्वास लौट आता है, तो ये ही जा कर बॉस को प्रेषित उन्हीं सम्बोधनों को मेरे नाम से ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर आते हैं. पता नहीं बॉस भी ऐसे लोगों को कैसे टॉलरेट करते हैं. मै तो कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता. उन्हें कमरे से बाहर निकाल दूँ. यदि कभी गलती से मै बॉस बन गया तो ऐसे लोगों की एंट्री ही बैन करवा दूँगा. लेकिन सहृदय लोगों के बॉस बन पाने की सम्भावना नगण्य होती है. उस पर एक दर्द ये भी है कि ऐसे लोग अपने ग़मों से उबरने के बाद पार्टी करते हैं तो हमें ही नहीं बुलाते. कभी-कभी तो लगता है कि इनकी पार्टी में जाने के लिये खाना-पीना शुरू कर दूँ, क्योंकि इनकी शिकायत रहती है कि तुम्हें क्या बुलाना, न खाते हो, न पीते. 

ऐसे लोगों की खासियत ये भी होती है कि इनके पास किसी और के दुखड़े सुनने का न समय है, न जज़्बा. गलती से किसी ने इनके आगे बीन बजानी शुरू कर दी तो यही लोग पॉज़िटिव एटिट्युड पर एक लम्बा लेक्चर पेल देंगे. यदि बन्दा गलती से इनके पास पहुँच जाये, और इनकी सुनने बैठ जाये, तो अपनी शान में इतने कसीदे काढ देंगे कि यकीन मानिये उस बन्दे को डिप्रेशन में जाने से स्वयं ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते.

जिन बन्दों के नेटवर्क में मेरे जैसे लोग नहीं हैं, वो जालिम जमाने वाले स्टेटस ऐसे डालते हैं जैसे उन्होंने जमाने के लिये पता नहीं कितना त्याग किया है, लेकिन जमाना उनके किसी काम नहीं आया. बस उन्हें प्रताड़ित करने में लगा है. ऐसे लोगों को मेरी बिना माँगे वाली राय ये है कि पहले आप जमाने के काम आना शुरू कीजिये, फिर स्टेटस भी लगा लीजियेगा. तब वो आपका अधिकार होगा. दूसरा ऑपशन ये है कि मुझ जैसों को अपना दोस्त बनाईये. आपको आपके दर्द का एक साझीदार मिलेगा, और मुझ जैसों को एक कहानी का किरदार. 

- वाणभट्ट

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

अन्तरात्मा

नौकरी की शुरुआत से ही मुझे ऑफिशियल क्वार्टर्स में रहने का सौभाग्य मिला. हर जगह कैंपस की लाइफ़ एकदम स्टैण्डर्ड सी होती है. ऑफिस से निकले तो घर आ गया और घर से निकले तो ऑफिस. कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो ऑफिस की बात जब तक घर पर बता न लें उन्हें बदहजमी बनी रहती है. ऑफिस में भले ही उनकी चूं न निकलती हो, लेकिन बीवी को उनकी अफ़सरी पर कोई शक न हो इसलिये शाम को चाय पर ऑफ़िस की छोटी-बड़ी सब बातें बता के ही दम लेते हैं. अपनी लकीर लम्बी करने में बहुत मेहनत है, इसके बनिस्पत दूसरे की लकीर छोटी करना कहीं आसान है. दिन भर मोहल्ले की पंचायत से बोर बीवी भी कुछ चटपटा सुनना चाहती है. आज बॉस ने किसी पडोसी की क्लास ली हो तो उससे अधिक इम्पोर्टेन्ट भला क्या बात हो सकती है. उसकी सोचिये जिसकी उस दिन क्लास लगी हो. उस शाम या तो बन्दा टहलने नहीं निकलता, और यदि निकल जाये तो उसे लगता है कि पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा उसके हाल से वाक़िफ़ है. हमारे यूपी में भाभी जी लोगों का आलम ये है कि भाईसाहब के साथ हों तो भले लम्बी-लम्बी हाँक लें. लेकिन अगर कभी अकेले में आमना-सामना हो जाये पहचानने से भी इंकार कर दें. ऐसे माहौल में यदि पड़ोस की भाभी जी ने बाई मिस्टेक गल्ती से स्माइल फेंक दी तो कसम से आदमी को डिप्रेशन का शिकार होने में देर नहीं लगती. 

कैम्पस मतलब शहर के अन्दर एक शहर. जो शहर में हो कर भी शहर से बाहर होता है. कभी कभी तो ये एहसास होता था कि कैम्पस देश और दुनिया के भी बाहर है. वहाँ की ख़बरें भी आन्तरिक होती हैं, जिनका बाहर की दुनिया से कोई मतलब नहीं. किसने किसका क्या काम लगाया और किसने किसको क्या सबक सिखाया, ये सब को पता होता है. जो ऑफिस में डिस्कस होता है, वही किटी में और जो किटी में डिस्कस होता है, उस पर ऑफिस में चर्चा होती है. कुछ लोगों को लगता है कि कैम्पस में रहने से आपकी प्राइवेसी नहीं रहती. लेकिन नये अनजाने शहर में पचास लोग जानने वाले हों, ये भी कोई कम नेमत नहीं है. सारी प्राइवेसी में खलल के बाद भी मुझे कैम्पस लाइफ़ इसीलिये अच्छी लगती थी कि मिलने वाला कोई ये नहीं कह सकता कि मैं इन्हें नहीं जानता या पहचानता. ये बात अलग है कि पहचाने या ना पहचाने. जो पहचान ले समझ लो उसे कुछ आपसे काम पड़ने वाला है. और जो न पहचाने उसका निकट भविष्य में आपसे कोई काम नहीं पड़ने वाला. सीधा हिसाब है. ऑफिस की दोस्ती फटे की यारी है. किस्मत ने साथ कर दिया तो निभाना ही पड़ेगा, किसी तरह का कोई वादा नहीं है. इसीलिये ऑफिस के रिश्ते मोहल्ले और मोहल्ले के रिश्ते ऑफिस पहुँच ही जाते. जो कुछ भी एक जॉइंट फैमिली में हो सकता है, सब यहाँ होता है. कौन सा ऐसा परिवार है, जहाँ सब बराबर हों, सबमें एका हो और किसी प्रकार की कोई खटपट न हो. हमारे यहाँ तो केन्द्र सरकार का विभाग होने के कारण सम्पूर्ण भारतीय संस्कृतियों के दर्शन हो जाते हैं. जो इस भावना की पुष्टि करते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है.

कैम्पस की लाइफ़ में हम और हमारा परिवार रच-बस गया था. शायद ही कभी हमने कैम्पस से बाहर निकलने की सोची हो. दिन अच्छे भले कट रहे थे. सब एक दूसरे से खुल के मिलते थे क्योंकि क्या घर क्या ऑफिस सबको सबके बारे में सब पता था. लेकिन आदमी की फितरत ही ऐसी है कि जब सब कुछ सही-सही चल रहा हो तो उसे कुछ नया करने का मन करता है. बस मोनोटोनी से बचने के लिये. ऐसे में किसी ने राय दे दी कि इनकम टैक्स में रियायत पानी है तो होम लोन ले लो. जब आदमी नौकरी खोज रहा होता है तो उसे आजीविका के लिये एक अदद नौकरी की तलाश होती है. और जब पहली बार इनकम टैक्स देना पड़ता है तो उसे लगता है कि सरकार उसे चूस रही है. उसने कोई पूरे देश का ठेका तो उठा नहीं रखा है. तो जनाब टैक्स बचाने के लिए वो जितने हथकण्डे अपना सकता है, सब अपनाता है. सरकार को भी मालूम है नौकरीपेशा लोगों की ये मानसिकता. सो एक हाथ देती है और दूसरे हाथ ऐसी स्कीमें ले आती हैं जो टैक्सफ्री हैं ताकि जनता उनमें निवेश करे और सरकार का पैसा सरकार के पास ही रहे. देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिये पैसे का सर्कुलेशन में रहना भी ज़रूरी है, वरना भारत का मिडिल क्लास तो इसीलिये बदनाम था कि साढ़े सात परसेंट के मुनाफ़े पर वो सारी बचत-पूँजी पीपीएफ और जीपीएफ में झोंक दे. 

टैक्स बचाने के उद्देश्य से मेरे मन में भी 'एक बंगला बने न्यारा' वाली तमन्ना कुलाँचे मारने लगी. सहगल साहब के ज़माने से अब तक में बहुत परिवर्तन आ चुका था. मिडल और सर्विस क्लास के लिये बँगले अब सपनों में ही रह गये थे. एलआईजी, एमआईजी और एचआईजी जो आप के बजट को सूट करे, वही चुन लीजिये और बंगले का स्वप्न भूल जाइये. सन 2000-05 तक फ्लैट्स की अवधारणा आ चुकी थी लेकिन अपने दस फुटा लॉन में सुबह की चाय और जाड़े में अपनी छत पर चटाई बिछा के धूप सेंकने की इच्छा ख़त्म नहीं हुयी थी. मिडल क्लास की खुशियाँ भी कितनी छोटी होती थीं, उन दिनों. शुभ कार्य को शीघ्र ही किया जाना चाहिये. वैसे तो हम लोग अपने कैम्पस जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट थे, किन्तु टैक्स बचाने के एक मात्र उद्देश्य से मैंने होम लोन लेने का निश्चय लिया. ये भी निर्णय हुआ कि मकान ले लेते हैं पर रहेंगे कैम्पस में ही.  

शुरुआत प्राइवेट बिल्डर्स के यहाँ से की क्योंकि सरकारी लोगों को पता नहीं क्यों लगता है कि प्राइवेट बिल्डर्स बेटर प्लानिंग करते हैं और अधिक सुविधायें देते हैं. ये तो बाद में पता चलता है कि उनकी मार्केटिंग ही उत्कृष्ट होती है, सुविधायें नहीं. कैम्पस में रहते-रहते हम लोग दुनिया से बाहर हो चुके थे. दुनिया कहाँ कितने आगे निकल गयी पता ही नहीं चला. बिल्डर ने पहले ही बता दिया कि 60 प्रतिशत श्वेत और बाकी 40 प्रतिशत श्याम में पेमेंट करना होगा. मै साईट मैनेजर की ओर देखता रह गया. भाई जितना कहोगे उतना अपनी बचत और लोन लेकर हम पूरा सफ़ेद धन दे सकते हैं, काली कमाई का तो एक धेला नहीं है हमारे पास. उसने कहा भाई साहब आप किस दुनिया में रहते हैं. जिसने भी मकान या फ़्लैट ख़रीदा हो पहले उससे मिलें वो बतायेगा कि मकान कैसे ख़रीदा जाता है. परम मित्र गर्ग साहब ने बताया कि महाजनो येन गत: स पन्था:. विभाग के मूर्धन्य लोगों ने यूँ ही सरकारी कॉलोनियों को आशियाना नहीं बनाया है. इसके लिये आपको पूरा लोन आसानी से मिल सकता है. इसीलिये हमारे सीनियर्स ने पास की एक शहरी प्राधिकरण कॉलोनी में अपना रैन-बसेरा बसाया हुआ है, तुम भी वहीं के लिये प्रयास करो.    

जब जागो तभी सवेरा. साहब हम भी ले आये एक फॉर्म कॉलोनी में मकान आवंटन के लिये. जैसा कि हमने पहले बताया था कि हम लोग अब तक ज़माने से बाहर का जीवन जी रहे थे. मकान की लॉटरी से लेकर रजिस्ट्री तक की प्रक्रिया में शामिल हर आदमी मुँह बाये खड़ा था. कोई फिक्स्ड रेट नहीं था और जो था वो भी अनाप-शनाप. तुर्रा ये कि जनाब दस्तूर है, चढ़ावे का. और बिना चढ़ावे के पत्ता तक नहीं खिसकता. बड़े-बड़े लोगों ने छोटे-छोटे लोगों को इस काम पर लगा रखा है. आप शिकायत भी करेंगे तो किसकी, किससे. जिस देश में व्यक्तिगत स्वार्थ सर चढ़ के बोलता हो वहाँ ईमानदारी की बात करने वाला भी अकेला हो जाता है. मकान आवंटन की इस पूरी प्रकिया में मुझे उन उन लोगों से मिलना पड़ा जिनसे शायद कोई कभी दोबारा मिलना न चाहे. बहुतों की कलई खुलते देखी और उनके रुआब का कारण भी समझ आया. सीधी सी बात है, अगर वो जनता की सहायता करने के उद्देश्य से काम करेंगे तो जनता को दुहेंगे कैसे. 

अब सेमी फिनिश्ड मकान को फिनिश कराना भी एक चुनौती से कम नहीं था. लेकिन अब तक ऑफिशियल डीलिंग की कुछ-कुछ आदत सी पड़ गयी थी. ऊपर वाले दिखाने को कट्टर ईमानदार टाइप के लोग होते हैं. उनका काम है नीचे वालों को संरक्षण देना. बात नीचे वालों से ही बनती है और उनके नखरे उठाना हर किसी की मज़बूरी बन जाता है. उसे ही वो अपनी ताकत समझ कर गौरवान्वित होते रहते हैं. 

जब बिजली के कनेक्शन के लिये सबस्टेशन पहुँचा तो अन्दर घुसने से पहले ही जुगाड़ तलाशने लगा. किसी ने बताया फॉर्म विभाग के एक साहब के झोले में रहता है लेकिन देते हैं वो किसी चाय की दुकान पर बैठने वाले दलाल के माध्यम से ही हैं. पता नहीं क्यों मुझे दलाल शब्द से घोर आपत्ति है. आपको उन्हें सेवा प्रदाता कहना चाहिये. एक से एक दुरूह काम को वो अपने नेटवर्क की वजह से चुटकी बजाते ही कर और करवा सकते हैं. चाय की दुकान पर बहुत भीड़ थी. कुछ लोग चाय भी पी रहे थे. कुछ चाय पी कर बैठे हुये थे. कुछ चाय के आने का इन्तजार कर रहे थे. भगोने पर चाय औटाई जा रही थी. बिना किसी को सम्बोधित किये मैंने हवा में जुमला उछाला - बिजली का कनेक्शन लेना था. कुछ मुस्कुराते चेहरों को मैंने अपनी ओर देखता पाया. फ़रेब के धन्धे पूरी ईमानदारी से होते हैं. दो बन्दे मेरी तरफ बढ़ लिये. किनारे ले जाकर उन्होंने पूरी कागज़ी फोर्मैलिटी और ईमानदारी से फिक्स्ड रेट भी बता दिया. ये भी बता दिया कि ज्यादा जुगाड़ के चक्कर में पड़ेंगे तो चक्कर ही काटते रह जायेंगे. अब तक के तजुर्बों से मुझे इस बात पर विश्वास  हो चला था कि तुलसी बाबा जी ने भी निर्विघ्न मानस लिखने से पहले दुष्टों की पूजा अर्चना क्यों की होगी.

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएं| जे बिनु काज दाहिनेहु बाएं||

पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें| उजरें हरष बिषाद बसेरें|| ||

कुछ लोग निहायत ही दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं. उन्हें निष्प्रयोजन ही दूसरों की को परेशान करने में आनन्द आता है. अर्थात आप ये भी मान सकते हैं कि दुष्टों का धरती पर सदा से वास रहा है और बिना उनकी स्तुति-वन्दन के महान से महान लोगों के लिये महान कार्यों का निष्पादन कर सकना असम्भव रहा है. सम्भवतः ये देश इसी कारण से आज भी विकासशील राष्ट्र है क्योंकि ये दुष्टों के सही हो जाने की उम्मीद पाले बैठा रहा. इनकी सेन्स वैल्यू हो या न हो लेकिन न्यूसेंस वैल्यू बहुत है. अब चूँकि न्यूसेंस कोई अपराध तो है नहीं कि इन्हें कोई सजा दी जा सके. अक्सर ये लोग संगठित तरीके से गिरोह बना कर काम करते हैं. इनका पूरा इको सिस्टम होता है. और अच्छे लोग तो हमेशा माइनोरिटी में ही रहे हैं. इनके बस दो ही इलाज़ हैं. या तो सही जगह पर सही तरह से लट्ठ बजे या इनके अहम् की तुष्टि की जाये. पहले में रिस्क ये है कि उनकी संख्या ज्यादा है. दूसरा कोई भी शरीफ़ व्यक्ति उतना नहीं गिर सकता, जहाँ ये लोट रहे हैं. इगो को सन्तुष्ट करना एक सबसे सेफ़ तरीका है लेकिन इसके लिये आपको अपनी इगो की तिलांजलि देनी पड़ती है. काश ये बात पहले समझ आ जाती तो हम भी इस जीवन में कुछ महान काम कर गुजरते. अपनी इसी मूढ़ता के चलते अपने कितने ही महान विचारों को मूर्त रूप नहीं दे पाया. अब तो कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि ये जीवन तो व्यर्थ चला गया, अगले जनम में देखा जायेगा.

अपने इगो को दरकिनार करते हुये उनके सामने चाय की पेशकश की लेकिन बन्दों ने गुटखे की डिमांड रख दी. जिसके लिये बस पाँच रुपये से उन्होंने संतोष कर लिया. मुझे ले कर वो सबस्टेशन में घुस गये और एक चपरासीनुमा अफ़सर (श्री श्रीलाल शुक्ल जी के कॉपीराइट से साभार चुराया हुआ) के सामने मुझे प्रस्तुत कर दिया. अफ़सर ने उन्हें देखते ही आग बबूला होने का स्वांग किया. यहाँ ले कर क्यों आ गये और उन्हें डाँटते हुये वो उनके साथ कमरे के बाहर निकल गया. जब कि उन दिनों मोबाईल फोन वाला ज़माना नहीं था कि कोई कुछ रिकॉर्ड कर सके. लेकिन पेन वाले स्पाईकैम आ चुके थे. 

अब मेरा ध्यान कमरे की दरो-दीवार पर गया. सरकारी दीवारों पर एक ही रंग होता है जो मेरे स्टाफ़ क्वार्टर का भी था पीला क्रीम. कमरा छोटा था. अफसर की मेज-कुर्सी के बाद बमुश्किल विजिटर चेयर की गुंजाईश थी. जिसकी शोभा नाचीज़ उस समय बढ़ा रहा था. उनमें एक दरवाज़ा था जिससे मै अन्दर आया था या वो बाहर गये थे. एक खिड़की थी जो मेज के ठीक सामने थी, मेरी पीठ के पीछे. मेज की बायीं ओर एक सीमेंट की ढली हुयी अलमारी थी, जिस पर पल्ले लगने बाकी थे. उस अलमारी में एक फोटो फ्रेम रखा था. वो भी उल्टा यानि बोर्ड वाला हिस्सा सामने था, फोटो वाला पीछे. हो सकता है फोटो का शीशा टूट गया हो. मेरे मन में किसकी फोटो है, ये जानने की प्रबल जिज्ञासा उठ खड़ी हुयी. जब तक मै ये देख पाता की तस्वीर किसकी है, तीनों गुटका चबाते हुये वापस आ गये.

सेवा प्रदाता के हाथ में एक फॉर्म था. उसने कहाँ-कहाँ हस्ताक्षर करने हैं और क्या-क्या कागज़ लगाने हैं, इसकी संक्षिप्त हिदायत दी और साथ में ये भी जोड़ दिया कि फॉर्म गलत हो गया तो फिर पूरी फोर्मैलिटी करनी पड़ेगी. फ़ीस के साथ उसने शीघ्र आने के लिये भी कहा. आ कर चाय कि दुकान पर हमसे मिल लीजियेगा, आपका काम हो जायेगा. तय रेट के अनुसार मैंने शर्ट की उपरी जेब में रखे रुपये साहब जी की ओर बढ़ा दिया. उसने चढ़ावा सेवा प्रदाताओं को अर्पित करने का इशारा किया. मैंने वैसा ही किया. तीनों पैसा लेकर फॉर्म सहित पुनः कमरे से बाहर चले गये. शायद पैसा गिनने या देखने कि कहीं कटा फटा नोट तो नहीं पकड़ा दिया. उनके अपने तरीके हैं ठोंक बजा के काम करने के. इस बीच मुझे हाथ बढ़ा कर फोटो देखने का मौका मिल गया. 

फोटो गाँधी जी की थी. मुझे लगा कि कम से कम उस अफ़सर की अंतरात्मा इतनी जाग्रत तो थी कि हमारे महापुरुष के सामने गलत करने से वो कतरा रहा था. अन्य विभागों में उनके चित्र सामने लोग सरेआम हर वो काम कर रहे हैं जो उन्हें नहीं करने चाहिये. गाँधी जी का चित्र भला किसी को कुछ भी सही या गलत करने से कैसे रोक सकता था. जहाँ लोग भगवान के सामने भी गलत करने से न घबराते हों, वहाँ इस व्यक्ति का राष्ट्रपिता के प्रति इतना आदर भाव देख कर मै भाव विह्वल हो गया. हर विभाग का अपना दस्तूर होता है वर्ना देश में भले लोगों की कमी नहीं है. मेरा मन उस अफ़सर के प्रति श्रद्धा और आदर से भर गया.

-वाणभट्ट 

शनिवार, 18 जनवरी 2025

प्रोस्पैरिटी इंडेक्स

भारत वर्ष को लेकर विकसित देश बस गरीबी और भुखमरी की बातें करते हैं. उन्हें ये बताते बड़ा अच्छा लगता है कि अभी भी हमारा देश ग्लोबल हंगर इंडेक्स में बहुत आगे है. जो कि देश में व्याप्त भयंकर भुखमरी का द्योतक है. और हमारा भोलापन देखिये कि कोई भी बात अंग्रेजी में छप जाये तो उसे ब्रह्मवाक्य मान कर अपनी ही सरकार के पीछे पड़ जाते हैं. अपने पिछड़ेपन का सियापा फैलाना विपक्ष के लिये सत्ता तक पहुँचने का माध्यम बन गया है. एक बात मेरी समझ में आजतक नहीं आयी कि जब पक्ष और विपक्ष दोनों का ध्येय देश की उन्नति है तो सत्ता में होने या न होने से क्या फ़र्क पड़ता है. जो लोग भी चुन के आ जायें, देशहित में काम करें. और न भी आयें तो भी देशहित के लिये काम करने से किसी ने उन्हें रोका तो नहीं है. सब मिल जुल के संसद में बैठो, जो उचित हो उस पर वोटिंग के आधार पर नियम बनाओ, कानून बनाओ. बहुत ही आसान है. पर शायद यहीं से राजनीति की शुरुआत होती है.

स्थिति ये है कि भाई लोग बिना सत्ता में आये कुछ करना नहीं चाहते. और जब आ जाते हैं तो पक्ष, विपक्ष में परिवर्तित हो जाता है और विपक्ष पक्ष में. इतने समय में जो बात समझ आयी है वो ये है कि पक्ष अपनी पीठ ठोंकने को आतुर है, तो विपक्ष उसकी बधिया उधेड़ने में. क्या मजाल कि किसी भी कंस्ट्रॅक्टिव काम पर ही दोनों एक मत हो जायें. एक जमाना था जब नेता देश की आज़ादी के लिये  एकजुट हो कर लड़ रहे थे, अपनी-अपनी तरह से. लेकिन तब तक सत्ता का स्वाद नहीं चखा गया था. दुश्मन एकदम क्लियर था. एक बार सत्ता का स्वाद मिल गया तो देश को अपनी जागीर समझ लिया. पुश्त-दर-पुश्त अपनी संतानों को बस ये ही बताते रहे कि ये देश तुम्हारी विरासत है. 70 सालों में तरक्की तो हुयी लेकिन जितनी होनी चाहिये थी, उतनी नहीं. जिनको सत्ता मिली, उनका विकास देख के ये अवश्य पता लगता है कि देश के विकास की कृपा कहाँ रुकी पड़ी थी. 

सत्तर सालों में जनता ने भी बहुत सारे प्रयोग कर डाले. जब हम आज भी इतने भोले-भाले हैं कि अपना भला नहीं सोच सकते, तो पहले की बात ही क्या करनी. जिसने जो भी वादे किये, जनता ने उसे ही सिरमौर बना दिया. वादे भी ऐसे कि जनता को लगे कि रामराज्य ऐसा ही होता होगा. अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम. कोई भी समाज त्याग पर तो विकसित हो सकता है, लेकिन यदि भोग को ही विकास का पैमाना मान लिया जाये तो समाज का तो भला होने से रहा. जो बुद्धि-बल-धन से सम्पन्न हैं, जिम्मेदारी उन्हीं की है, कि वो समाज के वंचितों के उत्त्थान और विकास के विषय में सोचें, काम करें. समृद्ध और सम्पन्न लोग यथासामर्थ्य-यथाशक्ति कर भी रहे थे. कभी-कभी उन लोगों को भी भ्रम हो जाता था कि दुनिया चलाने का ठेका उन्होंने ही तो नहीं ले रखा है. जब हम अपने बुद्धि-बल से सम्पन्न हो रहे हैं, तो वो मेरी व्यक्तिगत सम्पन्नता है और उस पर किसी प्रकार की दावेदारी नहीं होनी चाहिये. 

लोकतंत्र की खूबी ये है कि वो बनता वंचितों से  है लेकिन पलता पूँजीपतियों की गोद में ही है. क्योंकि 'एव्री वोट काउंट्स'. और वंचितों की संख्या, समर्थों की संख्या से हमेशा अधिक रही है. सत्ता उसी के पास रहती है जिसके पीछे जनता है. और जनता को चाहिये उँगलियाँ घी में और सर कढाई में. ऐसी स्थिति में एक ऐसे समाज की परिकल्पना गढ़ी गयी, जहाँ किसी प्रकार का वर्ग-विभेद न हो. सब बराबर. एक काल्पनिक आदर्श व्यवस्था. ये बात अलग है कि आदर्श के मानदण्ड इतने ऊपर हैं कि उनके लिये प्रयास तो किया जा सकता है, लेकिन प्राप्त करना असम्भव है, वो भी तब जब समाज के अधिसंख्य लोग त्याग के लिये तत्पर न हों और व्यक्तिगत स्वार्थ सर्वोपरि हो. बहरहाल लोकतंत्र की कुन्जी जनता के हाथ है और जनता उसके साथ है, जो अधिक सपने यथार्थवादी तरीके से बेच सके. इसी प्रयोग में सरकारें जीतती रहीं और जनता हर बार हारती रही. उसी के परिणामस्वरुप आज सामने है एक विभाजित-विघटित समाज. जो आज भी अपने उत्थान का जश्न मनाने से अधिक अपने पिछड़ेपन को जीने और ढोने को विवश है. 

मेरे एक परिचित कनाडा से लौट के भारत आये. पुणे में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी शुरू की. लेकिन थोड़े ही दिनों में उन्हें ये एहसास हो गया कि उन्होंने गलती कर दी. जो वर्क कल्चर कनाडा में था या जिस ग्रोथ की सम्भावनायें कनाडा में थीं, वो यहाँ नहीं मिलनी. इसलिये उन्होंने अपनी पत्नी से वापस लौटने के विषय में परामर्श किया. पत्नी ने छूटते ही मना कर दिया. यहाँ उसने हर घरेलू काम के लिये कोई न कोई हेल्पर लगा रखा था, वहाँ सारा का सारा काम खुद ही करना पड़ता था. जहाँ सब समृद्ध हों वहाँ आपकी समृद्धि का कोई मोल नहीं. यहाँ तो आप आदमी, और आदमी का समय दोनों खरीद सकते हैं. कोई देश कितनी भी तरक्की कर ले लेकिन तरक्की का मज़ा (विशेष रूप से जब व्यक्तिगत हो) तो वो आप विकाशसील देश में ही ले सकते हैं. देश को तो निरन्तर आगे ही बढ़ना है. उसी का नतीजा है कि आज हर क्षेत्र में उन्नति दिखायी देती है. जैसे-जैसे लोगों समृद्धि बढ़ी है वैसे-वैसे जनसामान्य के जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है. एक समय वो था जब समृद्धि का मानक मारुती 800  थी, आज ना-ना प्रकार की विदेशी कारों का भारतीय बाज़ार में जलवा है. हर तरफ मॉल कल्चर देख-देख कर आँखें चकाचौंध हैं. हर कोई देश की तरक्की देख कर हतप्रभ है. कुछ दिन पूर्व ही मेरे एक मित्र दो महीने का जापान प्रवास करके आये हैं. जब हालचाल लिया तो उनका पहला वाक्य था - वर्मा जी नरक देखने के लिये आपको कहीं और जाने की जरूरत नहीं है. बस अपने अगल-बगल नज़र घुमा के देख लीजिये. उनके इस वक्तव्य ने मेरी - 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' की भावना को ठेस लगायी, लेकिन वास्तविकता यही है इसलिये मैंने कोई कुतर्क नहीं किया. 

चूँकि हमने सारे विकास का ठेका अपने नेताओं को दे दिया है तो हम आसानी से अपनी बेसिक जिम्मेदारी भी उन पर थोपने से नहीं चूकते. सरकार कुछ करती ही नहीं. सरकार के सफायी अभियान के प्रयासों के बाद भी कूड़ों के ढेर अभी भी दिखायी दे रहे हैं. बहुमंजली इमारतों और आवासीय कॉलोनियों के बगल में बसी झुग्गी-झोपड़ियों ने विकसित समाज को सस्ते मजदूर मुहैया करा रखे हैं. और उन्हीं मलिन बस्तियों को सम्पन्न लोग प्रायः हिकारत की नज़र से देखते हैं. नेताओं ने भी अपनी गाड़ियों के शीशे काले कर रखे हैं ताकि समाज की विद्रूपता को आसानी से अनदेखा कर सकें. अभी हमारे इलाके में फुटपाथ और नाली का अभियान आरम्भ हुआ. उम्मीद थी कि विलुप्त हो गये फुटपाथ और नालियाँ पुन: प्रगट हो जायेंगे, लेकिन ऐसा हो न सका. जिसने-जिसने सहयोग किया उसके सामने काम हो गया, जिसने नहीं किया उसका वोट भी तो सरकार में बने रहने के लिये आवश्यक है. फुटपाथ पर अतिक्रमण वैसे ही विद्यमान है, जैसे पहले था. जैसा समाज होगा वो अपने जैसे लीडर ही चुनेगा. जाति-पंथ-सम्प्रदाय के आधार पर हम जब तक नेता चुनते रहेंगे, सरकारें तो बनती रहेगी, किन्तु देश हाशिये पर ही रहेगा. 

प्रिय पाठकों, आप लोगों को लग रहा होगा कि बंदा ये क्या मर्सिया ले कर बैठ गया जबकि देश दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है. मल्टीस्टोरी बिल्डिंगें बन रही हैं, मेट्रो रेल चल रही हैं, सड़कों के जाल बुने जा रहे हैं, बड़ी-बड़ी विदेशी कारों ने सड़कों को जाम कर रखा है, ट्रेन में एसी कोच की संख्या जनरल डिब्बों से ज्यादा हो गयी है, फिर भी वाणभट्ट को तरक्की नहीं दिखायी दे रही है, तो निश्चय ही आप गलत सोच रहे हैं. दरअसल लेखक ये कहना चाहता है कि देश को सत्तर साल बाद जहाँ होना चाहिये था, वहाँ से अभी भी बहुत दूर है. इन्फ्रास्ट्रक्चर की तरक्की दिखायी देती है लेकिन सामाजिक मूल्यों का ह्रास किसी को दिखायी नहीं देता. एक मित्र इंग्लैण्ड में रहते हैं. भारत आते-जाते रहते हैं. उनका कहना था कि हम लोग सिर्फ़ भौतिक संरचनात्मक विकास देख कर प्रफुल्लित हैं. सभ्यता और संस्कार छोड़ कर प्रगति नहीं होती. ये ढाई साल के बच्चे में तो विकसित की जा सकती है लेकिन पच्चीस साल के युवा में नहीं. न तो हम अपने भारतीय संस्कारों को पोषित कर सके, न ही हमने विदेशी मैनर्स को पूरी तरह अपनाया. जब बदतमीज़ी को हमने स्मार्टनेस का पर्याय मान लिया तो हर व्यक्ति स्मार्ट बनने और बच्चों को स्मार्ट बनाने में लगा है. दलील देता है कि ज़माने के साथ चलना हमारी मज़बूरी है.     

मेरा ध्यान देश की समृद्धि पर नहीं गया होता यदि इस बार देवोत्थान एकादशी पर अपने भाई साहब के कहने पर एकादशी का व्रत रखना शुरू न किया होता. तब पता चला कि देवशायनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक हिन्दू धर्म में सभी शुभ कार्य वर्जित हैं. और विष्णु भगवान के जागने के बाद जो शुभ कार्यों का रेला शुरू हुआ कि मेरे जैसे असामाजिक व्यक्ति (तत्व) के यहाँ भी विवाह के कुछ नहीं तो दस कार्ड आ गये. अब चूँकि दिखावे का ही जमाना है तो मुझे भी ग्यारह सौ से लेकर इक्कीस सौ से लेकर इक्यावन सौ तक देने पड़ गये. जिसको तेल लगाना था, उसको इक्यावन सौ और जिससे ज्यादा काम न पड़ने की उम्मीद थी, उसे ग्यारह सौ में निपटा दिया. फिर भी औकात दिखाने के चक्कर में महीने का बजट बिगड़ गया. अब जब कार्ड ही इतना मँहगा है तो नैवेद्य तो उससे ऊपर ही होना चाहिये. उपर से कार्ड देते समय कोई मैरिज हॉल में पर-प्लेट का रेट बता दे तो आदमी शर्माते-शर्माते भी ग्यारह सौ तो दे ही जायेगा. यदि आपका किसी से दुश्मनी मोल लेने का मंसूबा हो तो, आप पाँच सौ एक से भी काम चला सकते हैं.   

केवल दिल्ली एनसीआर में ही देवोत्थान एकादशी पर 48000 शादियाँ एक ही दिन में थीं. पूरे देश में कितनी होंगी, इसका एक सहज अंदाज़ लगाया जा सकता है. तमाम डेस्टिनेशन वेडिंग के कार्ड थे, जिसमें हर ओकेजन के हिसाब से ड्रेस कोड निर्धारित थे. उस पर तुर्रा ये था कि दसों शादी में फोटो खींची जानी थी. जिन्हें स्टेटस और फेसबुक पर अपडेट किया जाना था, इसलिये ड्रेस रिपीट भी नहीं होनी थी. और ऐसा सिर्फ मेरे लिये होता तो गनीमत थी, सारे कार्ड विथ फैमिली वाले थे. पूरे घर का स्टैण्डर्ड दिखाते-दिखाते मेरी तो ऐसी की तैसी हो गयी. और ऐसा सभी के साथ हुआ होगा. अपर क्लास अगर एक सूट में सारी शादी अटेंड कर ले, तो उसे सादगी या सिम्प्लिसिटी कहा जाता है. मिडल क्लास के लिये, इसे ही चिरकुटई की संज्ञा दी गयी है. बेगानी शादी में जब हम ही दस-बीस हज़ार के लपेटे में आ गये तो जिसके यहाँ शादी होगी उसको तो दिल खोल के दिखाना ही होता है. अब जब से लड़कियों और लड़कों में भेद कम हो रहा है, तो क्या लड़की और क्या लड़का दोनों की शादी में खर्चा बराबर हो रहा है. तीन-चार दिन चलने वाली शादीयों में, जिसे पूछो कितना खर्च हुआ तो ऑन एन एवेरेज पच्चीस-तीस लाख ऐसे बोल रहा है, जैसे इतना तो बनता ही था. और ये मै अपने जैसे मिडल क्लास लोगों की बात कर रहा हूँ. वर-वधु पक्ष दोनों के खर्चों को जोड़ लिया जाये तो एक शादी पचास लाख के अल्ले-पल्ले पड़ेगी. इसीलिये भारतीय शादियों को बिग फैट इंडियन वेडिंग्स के रूप में इन्टरनैशनल टीवी चैनेल्स पर शान से दिखाया जा रहा है. इतनी शादी से कितने ही लोग जुड़े होंगे. आभूषण वाला, परिधान वाला, किराने वाला, फल-फूल-सब्जी वाला, खाना बनाने वाला, खिलाने वाला, डेकोरेशन वाला, मैरिज हॉल वाला, बैंड वाला, पटाखे वाला, ट्रान्सपोर्ट वाला, होटल वाला, ट्रेवेल वाला. ब्यूटिशियन-मेकअप-नाइ-दर्जी-मोची-धोबी-लौंड्री, सभी की कहीं न कहीं आवश्यकता पड़ी होगी. पहले एक शादी, एक सायकिल, फिर स्कूटर, फिर मोटर सायकिल पर सेटेल हो जाया करती थी, अब कार से कम में बात नहीं बनती. स्टेटस की बात हो तो बस ये बताना होता है कि कार दस की है या बीस की. लाख तो आपने जोड़ ही लिया होगा. एक शादी कितने लोगों को इनकम और एम्प्लॉयमेंट देती है. शादी को पैसे की बर्बादी कहने वालों को इसके देश की अर्थ व्यवस्था में देने वाले योगदान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. देश की अर्थव्यवस्था को सम्हालने के सबसे बड़े पिलर का ज़िक्र करना तो मै भूल ही गया. जी हाँ, आपने सही समझा. जब तक उनका सहयोग न मिले किसी भी बारात का मज़ा जाता रहता है. बिना पिये आदमी (और अब औरत भी) भला कितनी देर डांस कर सकता/सकती है. यानि एक शादी का मतलब है देश की अर्थ व्यवस्था के सशक्तिकरण की दिशा में एक सशक्त कदम. जितना हम प्रतिवर्ष शादियों में खर्च कर देते हैं उतना तो कई विकसित देशों का जीडीपी भी न होगा. प्रोस्पैरिटी हर तरफ से फटी पड़ रही है. विश्व की 70 प्रतिशत ओबीस पॉपुलेशन (मोटापाग्रसित जनसंख्या) के साथ हम विश्व की नम्बर तीन पायदान पर हैं. बताइये और कितनी समृद्धि चाहिये.

जो लोग भारत को गरीब और मुफलिसों का देश समझते हों उन्हें कम से कम भारत में एक शादी जरुर अटेंड करनी चाहिये. दिमाग चकरघिन्नी न खा जाये तो कहना. यहाँ लोग जिंदगी भर बचत इसलिये करते हैं कि बच्चों की शादी शानदार तरह से की जायेगी. एक सौ सत्ताईस देशों की ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत एक सौ पाँचवें नम्बर पर है. इस बात पर विपक्ष बहुत शोर मचाता है. लेकिन किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि ग्लोबल प्रोस्पैरिटी इंडेक्स में हम कहाँ हैं. सुधी पाठकों की जानकारी के लिये ये बताना जरूरी हो जाता कि यहाँ भी हमारी स्थिति एक सौ सडसठ देशों में एक सौ तीन है. जीवन में द्वैत हमेशा रहेगा. सच-झूठ, अच्छाई-बुराई, श्वेत-श्याम, अमीरी-गरीबी, सब जगह साथ-साथ रहते हैं. एक चन्द्रयान प्रोजेक्ट को संसाधनों का दुरूपयोग मान सकता है तो दूसरा सफलता का कीर्तिमान. ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हमारा अपना दृष्टिकोण क्या है. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और हर तस्वीर के दो रुख़.

विपक्ष जहाँ हंगर इंडेक्स के आधार पर भारत के पिछड़े होने का सियापा फैला सकता है, तो वहीं सत्ता पक्ष ग्लोबल प्रोस्पैरिटी इंडेक्स को आधार बना कर देश के विकासोन्मुखी होने पर अपनी पीठ ठोंक सकता है. मेरे विचार से ये सब आंकड़े हैं जो सदैव मानवीय संवेदनाओं से परे होते हैं. देश को विकसित होने में हम सबकी भूमिका अहम होने वाली है. राष्ट्रवाद और मानवमूल्य ही किसी विकसित देश की आधारशिला हैं. 

-वाणभट्ट

रविवार, 29 दिसंबर 2024

समाज सेवा

कोई पूछे कि आदमी क्या है? तो गुलज़ार साहब कहते कि आदमी बुलबुला है पानी का. अब हम गुलज़ार तो हैं नहीं, इसलिये पुराना घिसा-पिटा डायलॉग मार देते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. आजकल जिसे देखो बस यही सिद्ध करने में लगा रहता है कि समय बहुत बदल गया है. समय ही तो एक ऐसी चीज़ है जो पल प्रति पल नवीन है. उसे निरन्तर आगे बढ़ना और बदलना ही है. लोगों की ये टिप्पणी अमूमन समय को लेकर कम समाज को लेकर अधिक होती है. जब समय हर समय बदल रहा है, तो समाज का बदलना भी तय है. वो वैसा का वैसा कैसे रहेगा जैसे पहले था. लेकिन आदमी की आदत है, उसे या तो भूत में जीना है या भविष्य में. हर कोई जमाने से पता नहीं क्या-क्या उम्मीदें पाले घूम रहा है. उनकी बातों से लगता है - 'क्या से क्या हो गया' या 'ये कहाँ आ गए हम'. उनका पसन्दीदा विषय होता है कि क्या ज़माना हुआ करता था और अब क्या हो गया है. वाट्सएप्प पर स्टेटस ऐसा  लगाते हैं मानो समाज उनका उधार खा कर चुकता करना भूल गया हो. उन्होंने तो समाज को बचाने के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया और ज़माना कृतघ्न निकला. भूतकाल की यादें संजोये कहेगा - जाने कहाँ गये वो दिन. जब आज की नयी पीढ़ी ने कन्चे और गुल्ली-डंडा खेला नहीं, देखा नहीं, जिन्होंने वीडियो गेम पर अपना बचपन गुजार दिया हो, उनको आपके 'हाय वो भी क्या दिन थे', से क्या ख़ाक सरोकार होगा. पुराने लोगों में भी, जिनका जीवन रईसी-जमींदारी, सुख-सुविधाओं में बीता हो, वो भले ही बीते हुये दिनों के लौटने की उम्मीद में ठंडी आहें भर सकते हैं. लेकिन जिनका जीवन त्रासदियों से जूझते बीता हो, वो कभी नहीं चाहेंगे कि कोई उनके बीते हुये दिन लौटा दे. 

भविष्य के नाम पर इनके पास, भारत के चीन, जापान, इजरायल और अमेरिका बन जाने के दिवा स्वप्न हैं. लेकिन उस विकास के पीछे जिस राष्ट्रवाद और त्याग की आवश्यकता होती है या होगी, उसकी आशा ये दूसरों से करते हैं. भगत सिंह हो तो पडोसी के यहाँ और अम्बानी हो तो हमारे यहाँ. और जब ये सोच ऊपर से नीचे तक हर आदमी की आत्मा तक में घुस गयी हो तो आज़ादी के सत्तर साल बाद आज हम जहाँ पहुँचे हैं, वो भी बहुत है. स्वार्थ का भाव हावी है. त्याग का अभाव सर्वत्र व्याप्त है. देश-समाज से ऊपर व्यक्तिगत स्वार्थ की अति के कारण ही भारत आज भी विकासशील देशों की श्रेणी में आता है. ये सभ्यता का तकाज़ा है, नहीं तो विकसित देश हमें बैकवर्ड (पिछड़ा) देश भी कह सकते थे. जैसे हमने अपने यहाँ एक छद्म अदर बैकवर्ड क्लास (ओबीसी वर्ग) बना रखा है, ताकि कुछ जातियों को लगता रहे कि वो पैदायशी फॉरवर्ड हैं और रहेंगे. हम उसे डेवेलपिंग क्लास भी कह सकते थे, लेकिन उससे उनमें हीनता के बोध में कमी आती है. हमें लगता है कि विकसित देश हमें विकासशील बोल कर हमारी इज्ज़तअफज़ाई कर रहे हैं. हमें ये खुशफ़हमी बनी रहती है कि कुछ भी हो इतनी विसंगतियों के बाद भी हम तरक्की कर रहे हैं. हमारा इतिहास तो हमेशा से गौरवशाली रहा है. और हम आसानी से आत्मश्लाघा के शिकार बन जाते हैं. लेकिन हमें ये नहीं समझ आता कि इस शब्द से उन्होंने डिक्लेयर कर रखा है कि भाई आज़ादी के सत्तर साल बाद भी ये विकासरत हैं, और अभी तक विकसित नहीं हो पाये हैं. इसे कहते हैं मखमल में लपेट के जूता मारना. 

हमने क्या सबने, बचपन से अब तक दुनिया को आगे ही जाते देखा है. देश ने तरक्की के नये-नये प्रतिमान गढ़े हैं. ऐसे में जब कोई बीते हुये दिनों को याद करता है, तो समझ आता है कि वो उस ज़माने की समाज में व्याप्त मानवीय मूल्यों और सद्भाव की बात कर रहा है. तब शायद नैतिकता और आदर्श कोरे शब्द नहीं थे और पूरा का पूरा समाज उन्हें जीने की कोशिश करता था. लोगों के पास समय की कोई कमी नहीं थी, इसलिए सबके साझे सुख और दुःख  के होते थे. तीज-त्यौहार सब मिलजुल के मनाते थे. समाज एक परिवार था और जीवन एक उत्सव. लेकिन भौतिक तरक्की, जो आज देखने को मिल रही है, तब वो न थी. ढाई सौ रुपये की सैलरी में पूरा परिवार पल जाता था. परिवार को कुनबा कहना ज़्यादा उचित होगा, क्योंकि उसमें दादी-बाबा, भाई-बहन, पत्नी-बच्चे सब शामिल थे. पास-पड़ोस और गाँव-देहात, एक्सटेंडेड फैमिली हुआ करते थे. आज ढाई लाख के पैकेज में ढाई प्राणी पल जायें तो गनीमत है. फिर आदमी कहता फिर रहा है, जमाना बदल गया है. 

तब समय की न कमी थी, न कोई पाबन्दी. प्रतिदिन प्रातः खेत-खलिहान का मुआयना करना शारीरिक आवश्यकता भी थी और मज़बूरी भी. कोयले की अँगीठी की आँच में माँ और दादी को खाना बनाते सभी पुरनिया लोगों ने देखा होगा. सुबह सवेरा होने से पहले चूल्हा जलाना और रात का खाना खत्म होने के बाद चूल्हे को मिटटी से लीपना अनिवार्य था. बिना नहाये किचन में प्रवेश वर्जित था. अँधेरा होने के बाद का जीवन, लालटेन और लैम्प के प्रकाश तक सीमित हो जाता था. बिजली के अविष्कार, उत्पादन और वितरण ने मानव विकास में अमूल्य योगदान दिया है. आज जब जमाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया है तो आदमी पुराने झींगा-लाला वाले दिनों में पुन: लौट जाने की बातें कर रहा है. बहुत से अतिशिक्षित और सम्पन्न लोग, सारे विकास को तिलांजलि देकर खेती करने और जंगलों में झोंपड़े बनाने को तत्पर लग रहे हैं. निसन्देह तकनीकी विकास ने मानव जीवन को बहुत सुगम बना दिया है. किन्तु सामाजिक जीवन को भी नकारात्मक तरीके से प्रभावित किया है.

आदमी ने इतनी तरक्की की है, इतनी तरक्की की है कि क्या बतायें. जहाँ दहेज में रेडियो और साइकिल की डिमांड हुआ करती थी, अब वहाँ कोई एसयूवी से नीचे बात करने को तैयार नहीं हैं. मेट्रो ट्रेन हर शहर में चलायी जा रही है. ऊँची-ऊँची स्काई स्क्रैपर बिल्डिंग हर शहर में बन रही हैं. जगह जगह एक्सप्रेस वे बन रहे हैं. मानव श्रम को कम करने और शरीर के आराम देने के लिये आज ना-ना प्रकार के उपकरण और यंत्र उपलब्ध हैं. आदमी अपने शरीर को आराम देने के लिये इसलिये काम कर रहा है कि बहुत सारे पैसे के बिना सुविधाओं का अम्बार नहीं खरीद सकता. पैसा कमाने की होड़ सी लगी है. यहाँ तक भी बात समझ आती है कि आदमी अपनी इच्छाओं के लिये ही तो जीता है. लेकिन इसके बाद कहानी में ट्विस्ट है. कुछ समय बाद अन्जाने में एक-दूसरे से आगे निकल जाने की अन्धी दौड़ में शामिल हो जाता है. इंसान का जीवन आज से ज़्यादा सुखी और खुशहाल शायद पहले कभी नहीं था. लेकिन जब सब सुखी हो जायें तो आदमी ये सोच कर दुखी हो जाता है कि उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे. किसी वाट्सएप्प ज्ञानी ने फ़रमाया है कि आदमी अपने दुःख से नहीं दूसरों के सुख से दुखी है.    

एक जमाना था कि मेहनतकश लोगों ने 'आराम है हराम' का नारा दिया था. अब सब का ध्यान ऐशो-आराम की ओर रहता है. मेहनत-मजदूरी-किसानी करके जीवन-यापन तो किया जा सकता है लेकिन ज़िन्दगी का मज़ा लेना है, तो शरीर को आराम और दिमाग़ को काम पर लगाना पड़ता है. इसीलिये आज के संपन्न व्यक्ति को खाना कमाने के लिये कम और पचाने के लिये ज्यादा मेहनत (शरीरिक श्रम) करनी पड़ रही है. स्वीगी-जोमैटो-ब्लिंकिट-अमेज़न जैसी कम्पनियाँ सिर्फ़ इसलिये फल-फूल रहीं हैं कि आदमी को आराम चाहिये. पूरा बाज़ार आपके फ़िंगरटिप पर मौज़ूद है, आपको बाजार जाने और सामान लाद के लाने तक की जहमत भी नहीं उठानी. 

सत्तर साल में घिसी-पिटी सत्ता लोलुपता वाली राजनीति भी धीरे-धीरे करके बदल चुकी है. नेताओं को भी मालूम हो गया है कि काठ की हांडी अब जल के कोयला बन गयी है. जनता भी अब अपने मतलब की सूचनाये इंटरनेट और मीडिया चैनेल्स से खोज लाती है. तरक्की की जो बयार पिछले सालों में चली है, उसे देख कर कभी-कभी लगने लगता कि इससे ज्यादा अच्छे दिन भला और क्या हो सकते हैं. हाँ, ये उन नेताओं और पार्टियों के दुर्दिन ज़रूर हैं, जो पुराने ढर्रे की लॉलीपॉप वाली राजनीति करना चाहते हैं. गरीबी हटाते-हटाते वो कब अरब-खरब पति बन गये, उन्हें खुद पता नहीं चला. कितने ही जनप्रतिनिधि जनता के पैसों का सदुपयोग (दुरूपयोग) करते हुये, फ़ुटपाथ से महलों में पहुँच गये. इस क्रान्ति को उन्होंने सामाजिक न्याय की संज्ञा से अलंकृत किया. आज सत्ताच्युत होने के बाद उनके पास अपने शासनकाल के स्वर्णिम दिनों को याद करते रहने के अलावा कोई चारा नहीं है. ये लोग समाजवाद  की परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिये इस कदर लालायित और आतुर हैं कि बस मुग़लकाल की पुनर्स्थापना का संकल्प ही उनके चुनावी घोषणापत्र में शामिल होने से बाक़ी रह गया है. अगले चुनाव में वो इस कमी को भी दूर करने का भरसक प्रयास अवश्य करेंगे.

सरकार चाहे कितना भी प्रयास कर ले, कितनी ही विकास की योजनायें बना ले, देश तो तभी उन्नति करेगा, जब जनता को ये एहसास होगा कि विकसित राष्ट्र के लिये सभी को योगदान देना होगा. नियम कानून तो हर देश में होते हैं ताकि समाज में सभी को समान सुरक्षा और अधिकार मिल सकें. वो देश और समाज आगे निकल गये, जहाँ इनका अनुपालन सुनिश्चित किया गया. समाज द्वारा स्वीकार्य कुछ मैनर्स और एटीकेट्स ने परस्पर व्यवहार को भी निर्धारित किया. तभी वो देश, सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित देशों में शुमार हुआ. कलाम साहब ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि हिंदुस्तानी जिस तरह सिंगापुर में व्यवहार करता है, वैसा ही व्यवहार भारत में करने लग जाये, तो भारत को सिंगापुर बनने में देर नहीं लगेगी. लेकिन 70 सालों में हमें लोकतंत्र द्वारा प्रदत्त फ़ुल फ्रीडम का आनन्द लेने की आदत पड़ चुकी है. 'रूल्स आर फ़ॉर फ़ूल्स' को ब्रह्मवाक्य मनाने वाली व्यवस्था में सबको लगता है कि हमने कोई देश या समाज सुधार का ठेका तो ले नहीं रखा. जब सारा देश सुधर जायेगा तो हम भी सुधरने की सोचेंगे.  

इसमें भी कोई शक नहीं कि देश की तरक्की और खुशहाली दोनों के लिये काम करना ही पड़ता है. काम है तो पैसा है, पैसा है तो आलिशान ज़िन्दगी है और आलिशान ज़िन्दगी है तो खुशहाली है. लेकिन इन सबके पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण लिमिटिंग फैक्टर है, वो है समय. जब आप तरक्की की रेस में दौड़ रहे हैं, तो समय का अभाव उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है. उसे तो न आप घटा सकते हैं, न बढ़ा. हर एक के पास एक दिन में चौबीस घंटे ही हैं. उसी में आपको काम भी करना है और, सामाजिकता को भी बनाये और बचाये रखना है. पैसा तो काम का बाई-प्रोडक्ट (उप-उत्पाद) है. जिसे देखिये बहुत सा पैसा कमाने के उद्देश्य से दिन-रात काम कर रहा है. इसलिये प्रत्यक्ष रूप से देशप्रेम भले ही नेपथ्य में चला गया हो लेकिन विकास सर्वत्र दिखायी देने लगा है. इसी प्रकार यदि सब काम करते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हम स्वयं को विकसित राष्ट्र डिक्लेयर कर दें. अपनी पीठ ख़ुद ही ठोंकनी पड़ती है. दूसरों से अप्रूवल लेने की आदत भी बदलने की ज़रूरत है. चाहे हम कितने भी विकसित हो जायें, एक चीज़ की कमी तो रहेगी. वो है समय की.

समय भी एक पूँजी है. लेकिन जब हर कोई धनोपार्जन के लिये व्यस्त से व्यस्ततर होता जा रहा है, तो कोई किसी को समय कैसे दे पायेगा. नतीजा आज आदमी में जैसा एकाकीपन का भाव देखने को मिलता है, वैसा कभी नहीं रहा. मनुष्य हमेशा से एक सामाजिक प्राणी रहा है. किन्तु व्यक्तिगत उत्थान के चक्कर में वो समाज की अनदेखी करता चला गया. जब सब के सब अपने-अपने स्तर पर समृद्ध हैं, तो दुखी रहने की कोई वजह दिखती है तो वो है भावनाओं की अभिव्यक्ति की कमी. जब सब अपनी सुनाने  और दिखाने में लगे हैं तो किसे फुर्सत है कि आपकी सुने या देखे. यही कारण है कि इतनी समृद्धि के बाद भी आदमी जीवन का मर्सिया पढ़े जा रहा है. उन पुराने दिनों को याद करके दुखी हो रहा है, जब यार-दोस्त तो बहुत थे और जीवन की आपा-धापी न थी. अकेलापन एक महामारी बन के उभरा है. शायर जाफ़र अली से गुस्ताखी की मुआफ़ी के साथ शेर में थोडा संशोधन कर के प्रस्तुत कर रहा हूँ. 'तुम्हें अपने से कब फुर्सत, हम अपने ग़म से कब खाली, चलो बस हो चुका मिलना, न हम खाली, न तुम खाली'. 

सशरीर मिलने के लिये समय चाहिये जो किसी के पास है नहीं (विशेष रूप से जब आप पीते-पिलाते न हों). चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इस नाते तकनीकी जगत ने कुछ विकल्प प्रस्तुत किये. जिसमें फ़ेसबुक, वाट्सएप्प, इन्स्टाग्राम आदि-इत्यादि प्रमुख हैं. लेकिन समय का चक्र देखिये, नौबत यहाँ तक आ गयी है कि समाज के नाम पर सोशल मिडिया ही बच गया है. जब सब बिज़ी हैं तो समय किसके पास है. और इतना ही काफी नहीं है. अगर हम बिज़ी हैं तो लोगों को बिज़ी लगना और दिखना भी चाहिये. पहले फ़ेसबुक पर आपने पोस्ट चेपी नहीं कि लाइक और कमेंट्स की झड़ी लग जाती थी. और ये एक सोशल ऑब्लिगेशन हो जाता था. यदि आपने मेरी पोस्ट लाइक की तो मेरा भी दायित्व था कि आपकी पोस्ट को लाइक करना. एक हाथ दे तो एक हाथ ले. अपने को बिज़ी दिखाने के चक्कर में लोगों ने पोस्ट्स पर कमेन्ट देने कम कर दिये. बाद में कुछ इमोजी और लाइक्स से काम चलाने लगे. अब तो हालात ये हैं कि हज़ार लोगों की फ्रेंड लिस्ट में व्यूज़ भले पाँच सौ पहुँच जायें, लेकिन कमेन्ट चार-पाँच और लाइक पचीस मिल जायें, तो गनीमत समझिये. देख तो सब रहे हैं लेकिन कोई दिखाना नहीं चाहता कि वो देख रहा है. ऐसा मै अपने वृहद सोशल मिडिया अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ. फ़ेसबुक का उपयोग मै लोगों के जन्मदिन के रिमाइंडर की तरह करता आया हूँ. और मेरा अनुभव कहता है कि जब भी किसी को मैंने व्यक्तिगत विश या कमेन्ट किया है, उसका जवाब आया है. यानि बन्दा देखता तो है लेकिन दिखाता है कि देख नहीं रहा है. यही हाल डिजिटल सामाजिकता के दूसरे स्तम्भ वाट्सएप्प का है. लोग रीड रिसिप्ट ऑफ़ करके इस सुविधा का भरपूर आनन्द ले रहे हैं. आपको पता ही नहीं चलेगा कि किसने आपकी पोस्ट देखी, किसने नहीं. 

मेरा सोशल मिडिया अनुभव ये भी कहता है कि मानव जीवन में कभी भी इतना एकाकीपन नहीं था, जितना तकनीकी क्रान्ति ने उसे अकेला कर दिया है. जब हम पच्चासी इंच का टीवी खरीदेंगे और विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिये पैसा खर्च करेंगे, तो उसे वसूलना भी तो पड़ेगा. इसके लिये घर में रहना ज़रूरी है. जिसको सामाजिक भाईचारा निभाना हो उसे मेरा टीवी देखना पड़ेगा. लेकिन उसे भी तो अपने पचहत्तर इंच के टीवी का पैसा वसूलना है. न हम खाली न तुम खाली वाली बात है. कभी कभी लगता है कि मुझे भी दिखाना चाहिये कि मै भी बहुत बिज़ी हूँ. इसका बस एक ही तरीका है की सोशल मिडिया से किनारा कर लिया जाये. मेरे गुड मोर्निंग या बर्थडे विश करने से किसी को भला क्या ही फ़रक पड़ता होगा. पिछले साल की तरह मैंने इस साल भी सोशल मिडिया से दूर रहने का संकल्प लेने की सोच ही रहा था कि एक देववाणी हुयी - 'वत्स तुम जो कर रहे हो उसे निष्काम भाव से करते जाओ. देश को तुम्हारे जैसे लोगों की महती आवश्यकता है जो लोगों के एकाकीपन के एहसास को कम करने के प्रयास में लगे हैं. ये भी एक प्रकार की समाज सेवा है'. 

यदि आप वाकई चाहते हैं कि कोई आपके काम में ख़लल न डाले तो इन प्लेटफॉर्म्स में अन्फ्रेंड और ब्लॉक करने के ऑप्शंस भी हैं. अब देववाणी तो मै टालने से रहा. आप अपना देख लीजिये.  

-वाणभट्ट

कृषि शोध - दशा और दिशा

भारतीय कृषि का इतिहास 9000 वर्षों से भी पुराना है. कृषि एवं पशुपालन अपनाने के साथ ही मानव सभ्यता का  विकास  एक समाज के रूप में होना आरम्भ हु...