सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

मनोज जी के लिए...सादर...

कुछ न कर पायेगी इस इम्प्रेशन में है
मेरी लेखनी इन दिनों डिप्रेशन में है

एक सर पर बोझ कितना बढ़ गया 
समझती नहीं, खोपड़ी कम्प्रेशन में है

मंहगाई और भ्रष्टाचार हैं सुरसा का मुख
आम आदमी किस कदर टेंशन में है

कहती है रूमानियत लिखवा लो मुझसे
ज़िन्दगी जीने का मज़ा बस इमोशन में है 

दुनिया के दुःख भूल मज़ा चाहते हैं सब
लेखनी भी अपनी इस कैलकुलेशन में है

धड़कता था दिल कभी प्यार के नाम पर
आवाज़ भी नहीं करता, अब वाइब्रेशन में है

कलम-दावत पूज कर, मनाया इसको
देख ये हसीना, अब कितने टशन में है

- वाणभट्ट 

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

कलम जवाब देती है...

क्या-क्या लिखवाना चाहते हो तुम
मुझसे


देश और दुनिया की तुमको है 
क्या पड़ी 
अपनी-अपनी देखो, और देखो
कितनी सुखद है ज़िन्दगी

कितना घिसते हो मुझको
सिवाय मुझे बदलने के
और मिलता है 
क्या तुमको

कुछ भी तो नहीं बदला
कितना लिखा तुमने
न्याय और अन्याय पर
दरकते विश्वासों और 
समाजी सियासत पर
और हर बार थक के बैठ गए
कि अब नहीं उठाऊंगा लेखनी
फिर भी मेरा साथ नहीं छोड़ पाए
अपने ज़ज्बात नहीं छोड़ पाए

अब भी 
मुझे छाती से लगाये घूमते हो
ज़माने के गम दिल में समाये घूमते हो
दिल की धड़कन और 
बी.पी. बढ़ाये घूमते हो 

कभी मेरा भी ख्याल करो
मेरे भी कुछ ख्वाब हैं
कुछ कल्पनाएँ हो आसमानी 
लिखूं मै भी कुछ रूमानी

पर हर बार 
तुम हो कि उतर आते हो
यथार्थ के धरातल पे 
बिना मेरी परवाह किये 
डूब जाते हो दुनिया कि हलचल में 

माना
तुम्हारे दिल का गुबार है
मुझे क्या, मेरी मर्ज़ी के बिना 
मेरे साथ ये तो बलात्कार है
है ना...

- वाणभट्ट