सियारों को अपनी बुद्धि पर बहुत भरोसा था.
चालक वो इतने थे कि कोई शिकार स्वयं न करते. शेर-चीता-बाघ शिकार करते. उनके खाने के बाद जो बच जाता, वो इनके लिये काफ़ी था. उनके साथ रह कर जंगल का कोई भी प्राणी ऐसा न था जिसका स्वाद इन्होंने न चखा हो.
पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये संस्कार इनके जीवन में रच-बस गया था. जंगल के अपने कानून होते हैं. जंगल का कानून अलिखित होता है. लेकिन उसका पालन करने-कराने की जिम्मेदारी स्वयं प्रकृति ने ले रखी थी. शाकाहारी निरीह प्राणी, ताक़तवर माँसाहारी प्राणियों के लिये भोजन थे. पढ़ और अनपढ़ में ये ही अन्तर है. यदि शाकहारी जानवर पढ़े-लिखे होते तो सामाजिक न्याय और समरसता के लिये आंदोलन करते. लेकिन अनपढ़ इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर चुके थे.
शेर अपने आप राजा बन गया और बाक़ी जानवर प्रजा. लेकिन राजा की अपनी प्रजा के प्रति न कोई जिम्मेदारी थी, न कोई जवाबदेही. जब भूख लगी, और जो सामने पड़ गया, वही शिकार. वो उतना ही खाता था, जितना उसके लिये जरूरी हो. बल्कि सभी जंगलवासियों को ज्ञान था कि भोजन उतना ही जितना ज़रूरी हो, स्वाद नहीं स्वास्थ्य के लिये. उन्हे ये भी मालूम था कि जंगल में डॉक्टर नहीं होता. भोजन ही औषधि है.
सियारों ने शेर की संगत में रह कर हर जानवर का स्वाद ले लिया था. बस एक शेर ही था जिसके स्वाद से वो अब तक वंचित थे. लेकिन जिसने कभी स्वयं शिकार करके चूहा न मारा हो वो शेर के शिकार की भला सोच भी कैसे सकता था. सब मिल जाये, कोई तमन्ना भी न बचे, ऐसा भी कभी होता है. तमन्ना तो होती ही उसकी है जो न मिले. जंगल के नियम में तमन्ना पालने की कोई व्यवस्था है भी नहीं. किन्तु सियार तो सियार.
सियार को सबसे दिमाग़दार जीव माना गया है. उनके मन में तमन्ना जगी कि भाईयों और बहनों हमने सब कुछ तो खा कर देख लिया, एक बार शेर का माँस भी खाने को मिल जाये, तो जीवन धन्य. इस कार्य को हममें से कोई अकेले तो कर नहीं सकता. सौ सियारों की एक टीम बनायी गयी. ये भी तय था कि जो पहले मोर्चे पर जायेगा, उसे भक्षण के लिये शेर का माँस नहीं मिल पायेगा. जब सब समझदार हों तो देश और समाज के उद्धार के लिये दूसरों से ही आगे आने की उम्मीद करेगा. भगत सिंह पड़ोसी के घर. हर घर भगत होते तो आज़ादी में चार सौ साल लगते? सियार हमेशा अधिकता में रहे हैं, चाहे जंगल हो या समाज.
दिमाग़दार सियारों ने बहुत मौके खोजे लेकिन हर बार पहले कौन, हर एक के दिमाग़ में आ जाता. शेर को बूढ़ा होना ही था. उसने खाना छोड़ दिया. सिर्फ़ पानी से काम चलाता. उसे मालूम था कि अन्त निकट है. धीरे-धीरे शरीर शिथिल होता जा रहा था. सियारों को इसमें अवसर दिखायी दिया. सबने एक साथ धावा बोल दिया.
शेर को संतोष था कि सियारों ने धावा पीछे से किया था.
-वाणभट्ट
शेर को संतोष था, बस इतना ही काफ़ी है
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