मंगलवार, 2 नवंबर 2021

सिकन्दर

बाप ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि सपना सच हो जायेगा। सिकन्दर सचमुच सिकन्दर बन जायेगा। जब पच्चीस साल पहले बहुत जतन के बाद लड़का हुआ तो बाप को लगा उसने जग जीत लिया। बेटे का नाम रखा सिकन्दर। सिंह राशि में पैदा पूत के पाँव पालने से ही झलकने लगे थे। बहुत ही डिमांडिंग था। मम्मी चाहिये तो मम्मी, पापा चाहिये तो पापा। यही हाल था, बड़ी, मझली और छोटी दीदी के साथ। जिससे जो चाहा मनवा के ही मानता था। इकलौता बेटा था। लाड़ में कोई कमी नहीं होनी चाहिये। इस बात का हर कोई ख़याल रखता था।

यूपी और पंजाब के पानी में शायद उतना फ़र्क न हो जितना परवरिश की स्टाइल में। वहाँ के पेरेंट्स फ्री डेवलपमेंट के हिमायती हैं जबकि यूपी में सारा ध्यान बच्चों को संस्कारित करने में लगा दिया जाता है। कोई मेहमान आया हो और मेज पर नाश्ता लगा हो तो क्या मजाल कि यूपी का बच्चा बिस्कुट उठाने की गुस्ताखी कर बैठे। माँ अपनी एक नज़र मेहमान पर तो दूसरी उसी पर टिकाये रखती है। नतीजा यहाँ 6 फुट की कद्दावर काठी के लोग गाहे-बगाहे ही दिखायी देते हैं। पूरा का पूरा प्रदेश 5 फुट 5 इंच में सिमट जाता है। कोई दिख भी जाये तो यकीन मानिये उस बन्दे के माँ-बाप ने उसे संस्कारित करने में ज़्यादा ऊर्जा नहीं लगायी होगी। 

अपनी कहानी का हीरो, इतना असीम प्यार पा कर भी 5 फिट 9 इंच पर अटक गया। तब विश्वास करना पड़ता है कि जीन का भी अपना रोल होता होगा, वरना अंग्रेजी शोध पत्रों में लिखी हर बात को बाबा जी ने ढकोसला सिद्ध कर रखा है। लेकिन हमारे उत्तम प्रदेश के लिहाज से ये भी कम नहीं था। फ्री डेवलपमेंट का ये लाभ है कि बच्चा वही करता है जो उसका करने का मन। खेलना और बॉडी बिल्डिंग सिकन्दर के शौक़ थे। ग्रेजुएशन करते न करते सिकन्दर को स्पोर्ट्स कोटा से शहर में ही एक नौकरी मिल गयी। मिडल क्लास लोगों की ख़्वाहिशें भी बस इतनी होती हैं कि बच्चा पढ़-लिख कर जॉब में आ जाये। अपने शहर में ही रहे तो और क्या चाहिये। बुढापे का सहारा किसी मल्टीनेशनल के चक्कर में पड़ गया तो किसी काम का नहीं रहता। 

बहनों की शादी कर करा कर पिता जी निपटे ही थे कि सिकन्दर ने एक लड़की को ला कर माता-पिता के सामने खड़ा कर दिया। सजातीय हो तो ओत्र-गोत्र पूछा जाता। लेकिन पेरेंट्स को मालूम था कि बेटा तो मानेगा नहीं। धीरे से पूछा लड़की ने तो अपने माँ-बाप से तो परमिशन ले ली होगी। सिकन्दर का टका सा जवाब था - बस आप अपना आशीर्वाद दे दो उनका तो मिल ही जायेगा। नतीजा वही हुआ जो सिकन्दर को मंजूर था। जितने धूमधाम से वो शादी करना चाहता था की। बिल पिता जी भरते। लेकिन पेरेंट्स इसी बात से खुश थे कि बेटा-बहू साथ रहेंगे। मूल और सूद दोनों का सुख मिलेगा तो बुढापा आसानी से कट जायेगा।

मैन प्रोपोजेज़ गॉड डिस्पोजेज़। सूद जब तक प्ले ग्रुप में रहे, हर समय दादी-बाबा करते नहीं थकते थे। बस्ता क्या टँगा बच्चों की पढ़ाई की सारी टेंशन बहू पर आ गयी। दादी-बाबा बस दिनभर टीवी देखते हैं। बच्चों के कार्टून चैनल्स के कारण दादी ने अपने दूरदर्शन के सीरियल्स और बाबा ने न्यूज़ चैनल्स की तिलांजलि दे दी। लेकिन बहू को लगता ये लोग कार्टून दिखा कर बच्चों को अपने पास बनाये रखना चाहते हैं। सुबह-सुबह उठ कर जो शोर-शराबा मचाते हैं उससे भोर की नींद में खलल भी नाकाबिल-ए-बर्दाश्त होता जा रहा था। 

जब बच्चों के प्रवेश पर पाबंदी लग गयी तो दादी-बाबा के लिये दिन पहाड़ होने लगे। सिकन्दर को बोलने की हिम्मत तो पहले ही नहीं थी। सोचा कुछ देशाटन-तीर्थ कर लिया जाये। पेंशन की वजह से वे लोग बच्चों के मोहताज़ तो नहीं थे। वृन्दावन में बाँके बिहारी के दर्शन की लालसा बच्चों के सेटलमेंट के कारण बहुत दिनों से टल रही थी। लिहाजा एक दिन प्रोग्राम बना लिया। क्या पता था लौट कर ये दिन देखना पड़ेगा।

कल्याणपुर थाने के दरोगा ने दो गिलास पानी लाने को कहा। बाबू जी आप बिलकुल परेशान मत होइये। मकान आपके नाम पर है। आप चाहेंगे तो बेटा-बहू साथ रहेंगे वरना बाहर। सिकन्दर और उसकी पत्नी ने उन्हें लौट कर घर में घुसने नहीं दिया। दरोगा उन्हें लेकर घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला। सिकन्दर सकपका गया। पिता जी इतना नहीं गिर सकते। बहरहाल वर्दी के आगे वो सिर्फ़ हाँ जी - हाँ जी करता रहा।

पिता जी ने पहली बार महसूस किया दुनिया जीतने की शुरुआत तो घर से ही होती है। जीतने की आदत ही सिकन्दर बनाती है और कई बार माँ-बाप ख़ुद हार के बच्चों के मनोबल को बनाये रखते हैं। जीतने की आदत भी तो उन्हीं ने डाली थी। सिकन्दर को इतना निरीह देखने की आदत नहीं थी। दरोगा के जाने के बाद सब नॉर्मल नहीं लग रहा था।

पेंशन इतनी थी कि वृद्धाश्रम का खर्च वहन कर सकते थे। पत्नी से दबे स्वर में कुछ वार्तालाप हुआ। दोनों बिना बोले घर के बाहर आ गये।

हारता हुआ सिकन्दर अच्छा नहीं लगता।

- वाणभट्ट


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