रविवार, 13 जून 2021

गुड मॉर्निंग

आँख अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी कि उसके हाथ ने टटोल कर मोबाइल उठा लिया. रात देर से सोने के कारण आखों में कडुआहट बनी हुयी थी. देर से सोने की कोई खास वजह नहीं थी. सोने से पहले बस एक मिस्टेक गलती से हो गयी थी. उसने मोबाइल उठा लिया था.

सोशल मिडिया का उसका चस्का एक लिमिट से ऊपर था. जब तक इमेल और फेसबुक का ज़माना था कम्प्यूटर और लैपटॉप खोलने का झन्झट था. जब से ये मल्टी-फ़ीचर्ड हाई एन्ड मोबाइल का प्रादुर्भाव हुआ, ये अम्प्यूटर-कम्प्यूटर खोलने का चक्कर भी ख़त्म हो गया. हालात ये हैं कि - दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार, जब जरा गर्दन झुकाई देख ली. जब भी जरा सी भी बोरियत तारी हुयी, हाथों में अजीब सी फड़फड़ाहट होनी शुरू हो जाती है और वो ख़ुद-ब-ख़ुद उस जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ मोबाइल रखा होता है. फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, लिंक्डइन और न जाने क्या-क्या नामाकूल चीजों ने आदमी का जीना दुश्वार कर रखा है. लेकिन फुल इन्टरटेन्मेंट में कोई कमी हो, ऐसा नहीं है. कुछ लोगों के लिये तो सोशल मिडिया आबादी में बर्बादी का सबब बन के रह गया है. हर समय ऑनलाइन रहना एक बीमारी बन गयी है. व्हाट्सएप्प इन सब बिमारियों में सबसे बड़ी बीमारी बन के उभरा है. आज हर व्यक्ति समय की कमी का रोना रो रहा है. लेकिन अपने समय 24 x 7 का वो कैसे उपयोग कर रहा है, उसे मालूम तो है पर जानना और मानना नहीं चाहता. 

कुछ सिद्ध-अवतारी पुरुषों नें जिन्होंने मैटेरियलिस्टिक जगत में ख्याति अर्जित कर ली है, वो रोज यू-ट्यूब और अन्य मिडिया प्लैटफॉर्म्स से आम जनता की भलाई हेतु सोशल मिडिया पर लानत-मलानत भेजते रहते हैं. ऐसे बताते हैं कि समय का सदुपयोग करके हर व्यक्ति कैसे सफल बन सकता है, कैसे अपनी इनकम को बढ़ा सकता है, और कैसे अपने जीवन को सुख-सुविधाओं से सम्पन्न कर सकता है. इन ख्यातिलब्ध लोगों को ये भान नहीं है कि जिन्हें उनकी तरह सफल बनना है, उनके पास यू-ट्यूब देखने का समय नहीं है. दुनिया के सारे प्रवचन उनके लिये हैं जिनके पास समय है. सुख-समृद्धि की लालसा में व्यक्ति किसी से कुछ भी सीखने को आतुर रहता है. जबकि सफलता के लिये सुनना और गुनना उतना आवश्यक नहीं है जितना काम करना और करते रहना. लेकिन जब वक्ता अपने वक्तव्य के आखिरी चरण में चैनल को सब्सक्राईब करने का आग्रह करता है, तो शक़ होना लाज़मी है कि उसे अपनी बात पर कितना भरोसा है. जिन्हें भरोसा होता है उन्हें पता होता है कि बात निकलती है तो दूर तक जाती है. इनके प्रवचनों को सुन-सुन कर आम जनता को एक अपराध-बोध सा हो जाता है कि अपने समय का उपयोग इन्टरटेन्मेन्ट के लिये करना महापाप है. लिहाजा एक ऐसी पौध डेवेलप हो गयी जो सोशल मिडिया से जुडी तो रहना चाहती है लेकिन ये नहीं चाहती कि दूसरे जाने कि वो अपना अमूल्य समय सोशल मीडिया पर बर्बाद कर रहा है. वो फेसबुक पर जाता है, हर घन्टे दो घन्टे पर, ताकि लेटेस्ट अपडेट्स से वाकिफ़ रहे. लेकिन गलती से भी किसी पोस्ट को लाइक नहीं करता. वरना लोग जान जायेंगे कि वो कहाँ समय बर्बाद कर रहा है. इन्हें साइलेंट यूज़र कहा जा सकता है. ये वो प्राणी हैं जो वाट्सएप्प पर भी अपना नोटिफिकेशन ऑफ करके रखते हैं. जिससे पोस्ट देखी या नहीं देखी किसी को पता नहीं चलेगा. ये ग्रूप पर भी बस देखने का काम करते हैं. क्या मजाल कि गलती से भी कोई कमेन्ट कर दें. ये लोग वाट्सएप्प पर कितने एक्टिव हैं ये जानने के लिये बस आपको ये करना है कि सरकार की तारीफ़ में कुछ कशीदे पढ़ दीजिये या विपक्ष पर कोई कटाक्ष कर दीजिये. फिर ये भाई लोग अपना सारा आवरण उतार कर आमने-सामने आ जाते हैं. तब पता चलता है, इन स्लीपिंग सेल वालों का. 

लेकिन यकीन मानिये यदि आपके पास कोई बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं है तो सोशल मिडिया से दिलचस्प कोई चीज़ नहीं है. लोगों ने बुक्स-मैगज़ीन्स पढना तो कब का छोड़ दिया है लेकिन ज्ञान की पिपासा कभी शांत होने वाली तो है नहीं. यहाँ सोशल मीडिया पर भाँती-भाँती का ज्ञान उमड़ा पड़ रहा है. यदि आप किताब से पढ़ेंगे तो आप को एक समय में एक विषय का ही ज्ञान मिलेगा. जबकि वाट्सएप्प पर जारी हर दो ज्ञान में भयंकर विषयांतर मिलने की सम्भावना प्रबल होती है. एक तरफ इस लोक में सफलता के सूत्र बताये जा रहे होंगे तो दूसरी ओर जन्म-जन्मान्तर का ज्ञान सहज रूप से बँट रहा होगा. हमारे पूर्वजों के अनुसार ज्ञान दो प्रकार के होते हैं  - सार वाला और थोथा वाला. सार वान ज्ञान अक्सर नीरस होता है और थोथा प्रतीत होता है. लेकिन थोथा ज्ञान, वाह वाह क्या बात है. क्या बच्चे क्या बूढ़े सबको बहुत रास आता है. टिकटॉक, मौज़, जोश इत्यादि ने लोगों को अपनी क्रियेटिविटी के नये आयाम खोजने में जिस तरह सहयोग किया है, यकीन मानिये संभवतः पूरी फ़िल्म और टेलीविज़न इंडस्ट्री इतने कलाकारों के लिये कम पड़ जाती. रही सही कसर स्टारमेकर और एस्म्यूल ने पूरी कर दी. जिन गवैयों को बच्चे बाथरूम के बाहर गाने की इजाज़त नहीं दे रहे थे. वो पूरे सोशल मीडिया की नाक में दम किये पड़े हैं. 

बाक़ी सोशल मीडियाओं की तुलना में वाट्सएप्प ज़्यादा श्रेष्ठ है. बाक़ी सोशल मिडिया में आपको कुछ तो करना ही पड़ेगा. चाहे फोटो अपलोड करनी हो या कमेन्ट, थोड़ी मेहनत तो करनी ही पड़ेगी. लेकिन वाट्सएप्प आपको कुछ करने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं है. मैसेज इधर से आना है, उधर फॉरवर्ड हो जाना है. बुरा हो दिन दूनी रात चौगुनी अफवाह फैलाने वालों का कि वाट्सएप्प को प्रतिबन्ध लगाना पड़ा कि एक बार में एक मैसेज सिर्फ़ और सिर्फ़ पाँच लोगों को भेजा जा सकेगा. तो भाई लोगों ने उसकी भी काट खोज लिया. व्हाट्सएप्प ग्रूप बना कर. अब अफवाह फैलाना थोडा आसन हो गया. लेकिन ग्रूप के सदस्यों पर ये निर्भर करता है कि वो अवांछित चैट को झेलें या ग्रूप से प्रस्थान ले लें. इस ग्रूप ने बहुत दुश्मनियों को अंजाम दिया. विशेष तौर पर राजनितिक पोस्ट के कारण. कोरोना के कारण आमने-सामने बैठ कर मुँह तोड़ जवाब देने का मौका नहीं मिल पा रहा है. इस लिये लोग-बाग़ मोबाइल तोड़ विमर्श करने को बाध्य हैं. कुछ मित्र मोदी-योगी के धुर विरोधी हैं. ग्रूप पर किसी ने सरकार के समर्थन में पोस्ट प्रेषित कर दी. बस क्या था, पूरे के पूरे ग्रूप का, जो साथ जीने-मरने की कस्में खाता था, दो-फाड़ हो गया. पहले बहस हिंदी में चली. फिर धीरे-धीरे अंग्रेजी में परिवर्तित हो गयी. सभी को डर था कि कहीं शुद्ध हिंदी का प्रयोग न होने लगे. बहरहाल इन बहस-मुसाहिबों से कुछ निकलने वाला नहीं. सब लोग अपने प्रारब्ध से जड़ रूप से जुड़े हुये हैं. किसी पक्ष ने अपना पाला बदला हो, ऐसा कभी नहीं हुआ. हाँ, दुश्मनियाँ अवश्य परवान चढ़ गयी. कोई ग्रूप छोड़ के भाग गया. किसी को मान-मनव्वल करके वापस इसलिये जोड़ा गया कि दमदार विपक्ष नहीं होगा तो ग्रूप रूपी पार्लियामेन्ट की डिबेट में आनन्द नहीं आयेगा. ये बात अलग है कि उन्हें सुलगाने के लिये लल्लू-पप्पू जैसे कुछ शब्द ही काफी थे. गुलदस्ते में यदि भिन्न-भिन्न फूल न हों तो गुलदस्ते का मज़ा ही क्या. 

जिन लोगों को अपने समय की कीमत का ज़रा भी भान था वो ग्रूप में बिल्कुल भी शिरकत न करते. जब पर्सनली बात कीजिये तो बताते भाई मै तो ग्रूप को बिना देखे ही डिलीट कर देता हूँ. दिन भर लोग कुछ न कुछ भेजते रहते हैं. बहुत खाली लोग हैं. पलट के ये पूछना की आप अपने खाली समय का क्या करते हैं, धृष्टता हो जाती इसलिये कभी पूछने की हिम्मत नहीं कर पाया. बहरहाल ग्रूप छोड़ने और जोड़ने के चक्कर में वर्मा जी को पता चला वाट्सएप्प में एक और फ़ीचर ब्रॉडकास्ट लिस्ट का. एक मैसेज कुछ सेकेंड्स में अपने सभी इष्ट-मित्रों को कैसे भेजा जाये - इन वन स्ट्रोक. बस फिर क्या था. वर्मा जी को मज़ा आ गया. आनन-फानन में दो-ढाई सौ लोगों को लिस्ट में डाल दिया. अब वन-वे ज्यादती शुरू हो गयी. अपना गाना स्टारमेकर पर बनाया और झेल दिया. कोई उल्टा-पुल्टा ब्लॉग लिखा और टिका दिया. ये तो भला हो कि टेक्नॉलोजी अभी थोड़ी कम एडवान्स है, वर्ना इतने लप्पड़ पड़ते कि बुद्धि हरी हो जाती. 

बहरहाल उन्होंने अपने टाइम पास का आदर्श मूल्य स्थापित करने के उद्देश्य से गुड मॉर्निंग मैसेजेज़ भेजने का निर्णय लिया. स्टारमेकर और ब्लॉग्स का नम्बर तो हफ़्ते दस दिन में आता है. तब तक सबको शुभकामना सन्देश ही भेज दिया करें. उनको उनके इस नेक इरादे ने आनन्द से विभोर कर दिया. दूसरों की लाइक्स और डिसलाइक्स की परवाह करने की उम्मीद किसी को नहीं होनी चाहिये क्योंकि इस गुनाह में हर कोई कम या ज़्यादा शामिल है. कौन परवाह करता है कि टिकटॉक और मौज का कचरा न फैलाये. लेकिन जब और लोग नहीं मानते तो वर्मा जी भला क्यों मानें. उन्होंने अपना वन-वे प्रसारण जारी रखा. वर्मा जी नियम से प्रतिदिन प्रातः लोगों को गुड मॉर्निंग भेजने लगे. अब भेजने का काम तो कर दिया लेकिन किसने देखा किसने नहीं ये जानने का उनका काम और बढ़ गया. पहले तो थोडा समय बच भी जाता था लेकिन अब समय काटने की कोई चिंता न थी. पहले एक मैसेज भेज दो फिर चेक करो किस-किस का टिक डबल हुआ और किस-किस का हरा. लेकिन इस काम से जल्दी बोर हो गये. नतीजा नेकी करके दरिया में डालना ही समझदारी थी. भेज दिया तो भेज दिया कौन देखे किसने देखा या नहीं.

लेकिन जैसे पहले भी बताया जा चुका है कि लोग आज कल अपने को व्यस्त दिखाने के चक्कर में नोटिफिकेशन ऑफ़ करके बैठ जाते हैं ताकि वो तो मैसेज देख लें लेकिन किसी को पता नहीं चले कि उन्होंने देखा. काफी दिनों से वर्मा जी ने मैसेज का डिलीवरी स्टेटस देखना बन्द कर रखा था. एक दिन फुर्सत में देखना शुरू किया तो देखा कई लोगों का मैसेज महीनों से हरा नहीं हुआ था. करोना काल में ये वाट्सएप्प और फेसबुक ही था जिसने लोगों  को डीप डिप्रेशन में जाने से बचा लिया. यदि किसी ने मैसेज नहीं देखा तो वर्मा जी की चिन्ता स्वाभाविक थी. सभी तो नाते-रिश्तेदार-दोस्त थे. उनसे रहा नहीं गया डरते-डरते फोन लगा दिया कि कहीं कोई अप्रिय समाचार न सुनने को मिले. उधर से दोस्त की खनकती हुयी आवाज़ सुन कर जान में जान आयी. क्या यार बहुत दिनों बाद फोन किया. इधर तो दूसरी वेव बहुत सख्त गुज़री. हर कोई किसी न किसी रूप से इससे प्रभावित हुआ है. तुम सभी ठीक हो न. वर्मा जी देसी अंदाज़ में आ गये. दो-चार सम्पुट लगा कर बोले  - अबे साले रोज-रोज गुड मॉर्निंग भेज रहा हूँ, तुम हो कि देखते ही नहीं. मुझे तो बहुत चिंता हो गयी. पता नहीं क्या क्या सोच लिया. दोस्त ने जवाब दिया - यार कम पापी थोड़ी न हूँ. अभी नम्बर नहीं लगने वाला. क्या बताऊँ दोस्त मैंने वाट्सएप्प का नोटिफिकेशन ऑफ़ कर रखा है. नहीं तो लोग समझते हैं वर्क फ्रॉम होम के नाम पर घर पर ऐश कर रहा है. भाई आज कल यही सब तो टाइम पास है. देखता मै रोज था, बस रिस्पोंस नहीं करता था. लोग भी न इतना सारा गुड मॉर्निंग ज्ञान भेज देते हैं कि मोबाइल की मेमोरी रोज फुल. डिलीट करते करते हालत ख़राब हो जाती है. मै तो मॉर्निंग मैसेज खोलता भी नहीं. मेरी राय मानो तो स्टेटस पर अपना गुड मॉर्निंग भेज दिया करो. बिना किसी प्राइवेसी के, जिसे चाहिये होगा देख लेगा और तुम्हें भी इतने लोगों को भेजने के लिये ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी. आइडिया में दम था. वर्मा जी ने उसे अपना लिया. अब ब्रॉडकास्ट करने के बाद उसी मैसेज को स्टेटस पर भी डाल देते. टिक के हरे होने की चिन्ता समाप्त. बस फ़र्क इतना था कि अब उनकी गुड मॉर्निंग विशेज़ कॉन्टैक्ट लिस्ट के हर व्यक्ति तक उपलब्ध थीं. लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है. 

उनका जो फ़र्ज़ है, वो अहल-ए-सियासत जानें 

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे 

(जिगर मुरादाबादी)

- वाणभट्ट 


रविवार, 30 मई 2021

सहानुभूति

उसने जब कमरे में प्रवेश किया तो उसे उम्मीद थी कि वो कुछ सहानुभूति से पेश आयेगा. लेकिन ऐसा कम ही होता है कि जिसकी जब-जहाँ-जिससे आपको उम्मीद हो वो तब मिल जाये जब आप चाहें. डॉक्टर की फ़ीस ज्यादा थी और भीड़ भी उसी हिसाब से कम नहीं थी. यही चलन है कि जो जितना महँगा उतना ही अच्छा मान लिया जाता है. सस्ते डॉक्टर का इलाज सस्ता होता है और मँहगे का मँहगा. डॉक्टर को भी लगता है कि जो मेरी फ़ीस अफ़ोर्ड कर सकता है तो दवाई का खर्च भी निकाल ही लेगा. सभी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. सबको नम्बर अलॉट कर दिये गये थे. कोई आपा-धापी नहीं थी. वेटिंग लाउन्ज सुविधाजनकजनक और वातानुकूलित था. उसे लगा उसने यहाँ आ कर कोई गलती नहीं की बल्कि पहले आ जाता तो जितना दर्द उसने झेला उससे बच जाता.  

लोगों की भीड़ देख कर उसका भरोसा डॉक्टर पर और बढ़ गया. उसका ख़ुद पर भी कॉन्फिडेंस कुछ बढ़ गया कि वो अकेला नहीं है. बहुत हैं उसकी तरह मानसिक बीमारी के शिकार. ये तो भला हो सहयोगियों का जिन्होंने उसे ये राय दी कि परेशान होने से अच्छा है कि एक्सपर्ट एडवाइज़ ले ही लो. ये बात अलग है कि सब उसे पीठ पीछे मेन्टल बुलाने लगे थे. लेकिन उसके पास बुरा मानने की गुंजाईश नहीं थी. हसन साहब की ग़ज़ल में ज़िक्र भी है - उनसे अलग मै रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में.  

आख़िर उसका नंबर भी आ गया. उसके पहले जो पेशेन्ट अन्दर गया था उसकी दबी हुयी सिसकियाँ बन्द दरवाज़े नहीं रोक पाये थे. उसे लगा कि डॉक्टर की आँखों में भी कुछ पानी ज़रूर उतरा होगा. लेकिन जब वो अन्दर पहुँचा तो डॉक्टर निर्विकार सा चेहरा बनाये मेज की दूसरी बैठा था. मानो इसके पहले वाला कोई गीता का ज्ञान बाँट कर गया हो. दूसरों का दुःख - दर्द सुनना उसका पेशा है. वो उसी तरह निर्लिप्त भाव से सबके दुखड़े सुनता जैसे सन्त लोग सांसारिक लोगों के कष्ट. अन्दर ही अन्दर मज़ा लेते रहते हैं कि बेटा हम क्या उल्लू के पट्ठे थे जो माया-मोह का त्याग कर आये. लेकिन यदि महात्मा जी की कुण्डली खंगाली जाये तो बहुत सम्भव है उनके इस वानप्रस्थ के मूल में रेखा-जया-सुषमा छिपी पड़ी हों. 

फ़ीस भले ही ज़्यादा थी लेकिन पेशेन्ट के लिये बमुश्किल  दस से पन्द्रह से मिनट का समय था उसके पास. इसलिये सीधे मुद्दे पर आ गया. क्या परेशानी है। वो तो पहले से ही गुब्बारे सा भरा बैठा था, बस सुई चुभाने की देर थी. अपने अन्दर के झंझावातों को रोक पाना उसके लिये असम्भव सा था. सारा दुःख दर्द उड़ेल कर रख दिया। पता नहीं कितने वर्षों का लावा था जो ज्वालामुखी फटने का इंतज़ार कर रहा था. सारी सीमायें तोड़ कर बह निकला। डॉक्टर पूरे इत्मीनान से उसकी बात या यूँ कहें बकवास को झेलता रहा। उसने भी कोई बात ऐसी नहीं समझी जिसे वो छुपाना चाहता हो। आखिर शहर का सबसे मँहगा मनोरोग चिकित्सक था। जब इतनी फ़ीस ले रहा है तो सुनेगा कैसे नहीं। वो अपने उद्गार एक नोट बुक में लिख कर लाया था। कोई बात छूट नहीं जाये।  डॉक्टर ने शायद पेशेन्ट के ठीक पीछे घडी लगा रखी थी। सुनने का समय 8 से 10 मिनट और सुनाने के लिये 5 से 7 मिनट. हर पेशेन्ट से पहले ही अश्योरेंस सर्टिफिकेट पर साइन करा लिया जाता था कि वो अपनी मर्ज़ी से इस इलाज के लिए यहाँ आया है. उसकी सारी बात रिकॉर्ड की जा सकती है जिसका उपयोग सिर्फ़ और सिर्फ़ शोध के लिये किया जा सकेगा और उसे डॉक्टर और मरीज़ के बीच पूर्णतः गुप्त रखा जायेगा. 

सुनते समय डॉक्टर के चेहरे के हाव-भाव उसी भैंस की तरह लग रहे थे जो बीन बजाते समय पगुराना पसंद करती है. 8 मिनट होते न होते उसने पेन उठा कर उनकी ओर ऐसे देखने लगा कि अब बस भी करो. बिना कुछ बोले उसने पर्चे पर दवाइयां लिखना शुरू कर दिया था. और इन जनाब के दर्द का गुबार कम होने का नाम नहीं ले रहा था. डॉक्टर के पास समय की बाध्यता थी. उसकी बात को काटते हुये बोला - दवाइयां लिख दीं हैं. बाहर मेरा केमिस्ट आपको दवाइयां दे भी देगा और समझा भी देगा कि कब-कब और कैसे खानी है. उसे लगा कि उसकी बात अधूरी रह गयी है. डॉक्टर को क्या? उसकी कौन सी बीवी भागी है. लेकिन पैसा पहले ही जमा हो चुका था. बहस की गुंजाईश नहीं थी. चुपचाप खड़ा हो गया. उसे लगा इतनी बात अगर उसने प्रिया को बोल देती तो शायद ये नौबत न आती.  

शुरुआत शायद किसी बात पर बोल-चाल बन्द होने से हुयी थी. अब तो उसे ये भी याद नहीं कि बात क्या थी. लेकिन लिव इन में 5 साल रहने के बाद 2 साल की शादी बोझ हुयी जा रही थी. आवश्यकताओं और उम्मीदों की कसौटी ज़िन्दगी पर कब हावी हो जाती है, पता भी नहीं चलता. दोनों को लगता वो एक-दूसरे के लिये अपने-अपने कैरियर का त्याग कर रहे हैं. बिना कहे-सुने फ़ासले इस कदर बढ़ गये कि साथ न रहने का निर्णय करने में दोनों को कोई झिझक नहीं हुयी. अब जब अकेला था तो कैरियर का पूरा फैलाव सामने था, लेकिन क्यों और किसके लिये बस ये ही नहीं पता. 

उसकी बेचैनी और परेशानी का सबब सुनने के लिये किसके पास फ़ुर्सत थी. और जॉब के बाद सोचने के लिये उसके पास समय ही समय था. उसे लगता कि कोई चाहिये जो उसकी बात को सुने उसे समझे. वो गलत नहीं था. जितना वो चुप रह कर संयत दिखने की कोशिश करता अन्दर की बेबसी उसे और बेचैन-परेशान कर देती. बहुत दिनों से वो अपने अंदर उठे हुये ग़ुबार को टालता जा रहा था। फिर उसे लगने लगा उसके हाव-भाव से लोग उसके अन्दर झाँक रहे हैं। हर किसी पर उसे शक होता, लगता जैसे सब उसके मन की अन्तर्व्यथा को पढ़ लेते हैं. और मन ही मन उसका उपहास उड़ा रहे हैं. हर कोई उसे अपने विरुद्ध साजिश करता नज़र आता. मनोरोग के बारे में उसने इंटरनेट खंगाल डाला। सारे श्री-श्री लोगों का ज्ञान पढ़ डाला. लेकिन वो जितना ही उसमें अन्दर जाने का प्रयास करता वो ख़ुद को उतना ही अकेला पाता। अपनी महफ़िल लूट लेने की आदत पर कभी उसे गुमान था, अब उसे जी का जंजाल लगने लगीं थीं। पार्टियों में उसने पहले की तरह शामिल होने की कोशिशें ज़रूर कीं, लेकिन मन न लगा. गम कम करने की फिराक़ में उसकी सारी कहानी पीने-पिलाने वाले ग्रूप को पूरी तरह कंठस्थ हो गयी थी. उन्हें ये तक मालूम था कि आउट होने के बाद ये क्या-क्या बकेगा और कब कब इमोशनल हो कर टेसू टपकायेगा. उनका भी मूड ख़राब हो जाता इसलिये वो भी कटने लगे थे. 

कभी वो पूरी तरह आदर्शवादी हुआ करता था. उसे ये नहीं मालूम था कि जिन आदर्शों के पीछे वो सबसे लड़ता फिरता है, वही उसे एक दिन अकेला कर जायेंगे। कुण्ठाओं की शुरुआत तो कहीं बचपन में ही हो गयी थी। पिता जी भ्रष्ट विभाग के ईमानदार अधिकारी थे। उनके अलावा उनके बारे में विभाग का कोई सीनियर या जूनियर अच्छी राय नहीं रखता था। सरकारी आवास में रहने के कारण माता जी को अड़ोस-पड़ोस से उनके ईमानदारी के चोचलों की ख़बर मिलती रहती थी। जो मियाँ-बीवी की दैनिक कलह का कारण बन चुकी थी। उनके नारी स्वभाव को पड़ोसियों की पत्नियों में रौब गाँठने का मौका चाहिये होता था। उन्हें अपने कपड़ों-लत्तों-मेकअप पर शर्म आया करती। बेटे विस्तार को पढाई की पूरी सुविधा थी लेकिन जहाँ माँ-बाप अपने ही प्यार को अँधेरे में टटोल रहे हों वहाँ बच्चे के बारे में कौन सोचता. जिस देश की भाषा में तलाक़ या डाइवोर्स जैसा शब्द ही न हो वहाँ बिना प्यार के विवाह  हो जाना कोई अजूबा नहीं है. प्रेम-विहीन दाम्पत्य में बच्चों की संख्या में वृद्धि हो जाना सहज सी बात लगती है. लेकिन बच्चों में भावनात्मक परिपक्वता का नितांत आभाव होना स्वाभाविक होता है. विस्तार पहला इशू था और चार बच्चों के बाद अंत हुआ इति से.

विस्तार के लिये पढ़ाई के अलावा ज्यादा विकल्प तो थे नहीं. जिन बच्चों के परिवार में माँ-बाप ही आपसी तादात्म्य बनाने में व्यस्त हों वहाँ बच्चों को अपना ख्याल ख़ुद रखने की आदत जल्दी पड़ जाती है. हाँ, जिस पेरेंटल प्यार की बचपन में सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वो उससे वंचित रह जाते हैं. और उसे दूसरों में खोजने की कोशिश करता है. इस प्रक्रिया में वो अपने और अपनों से दूर होता चला जाता है. सही लोग उससे सहानुभूति रखते हैं और गलत लोग उसकी भावुकता का फ़ायदा उठाने से बाज नहीं आते. इतने धोखे और झटके खाने के बाद भी जो नहीं बदली थी वो थी उसकी नये-नये दोस्त बनाने की प्रवृत्ति. पता नहीं कितने दोस्त बने और कितने छूटे. दोस्ती कोई स्थायी थोड़ी न होती. दोस्ती तो अमूमन फटे की यारी होते हैं. साथ पढ़े या साथ काम कर रहे हैं तो कुछ सम्बन्ध को नाम देना पड़ता है. जगह बदली तो दोस्तों का बदल जाना लाज़मी है. रिश्ते चाहे कैसे भी हों, कितनी भी दूर हों, स्थायित्व का आभास तो जरुर देते हैं.

जीवन में जो कुछ अच्छा हुआ वो प्रिया के आने के बाद हुआ था. प्यार की दरकार तो उसे हमेशा से थी. जब प्रिया ने उसे अप्रोच किया तो उसके पास ना करने का कोई कारण नहीं था. दोस्ती कॉलेज के ज़माने से थी और बाकी दोस्त भी कॉमन ही थे इसलिये उन्हें शादी से पहले ही साथ रहने में कोई झिझक रही हो ऐसा नहीं था. यदि पत्नी में वो सारे गुण हों जो दोस्तों को भी पसन्द हों तो कुछ दोस्तियाँ पक्की सी हो जाती हैं. प्रिया को जल्दी ही समझ आ गया कि प्यार विस्तार की सबसे बड़ी ताकत है. वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी थी. किसी भी बात के लिये विस्तार को इशारों पर नचाना उसका पसन्दीदा शगल बन गया. विस्तार भी उसे हर हाल में खुश करने को राजी था. इसलिये दोस्तों द्वारा दिये उपनाम 'जोरू का ग़ुलाम' से भी उसे कोई आपत्ति नहीं थी. न्यूक्लियर फ़ैमिली की ये ख़ासियत होती है कि जब तक साथ हैं तब तक हैं जब भी जरा ग़लतफ़हमी हुयी तो बाक़ी लोग सिर्फ़ घी डालते नज़र आते हैं. इनके यहाँ जब सारी बातें विस्तार को ही माननी थीं तो किसी प्रकार की गड़बड़ी की कोई सम्भावना ही नहीं थी. फ़र्क तब पड़ा जब छोटे भाई-बहनों ने कहना शुरू कर दिया कि बुज़ुर्ग होते माँ-बाप सिर्फ़ हमारी जिम्मेदारी नहीं हैं. तय ये हुआ कि चारों बच्चे तीन-तीन महीने पेरेन्ट्स को अपने पास रखेंगे. विवाह के पश्चात् पहली बार विस्तार को कोई स्टैण्ड लेना पड़ा था. लेकिन प्रिया इसके लिये तैयार नहीं थी. वादे के मुताबिक़ जिस दिन माँ-पिता जी ने घर में कदम रखा प्रिया ने अपना फैसला सुना दिया. विस्तार सहृदय ज़रूर था लेकिन कहीं दिल के कोने में छिपा उसके अन्दर के पुरुष अड़ गया. नतीजा उसकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा भयावह निकला. 

तीन महीने के बाद उसे उम्मीद थी कि सब कुछ वापस नार्मल हो जायेगा. लेकिन नहीं हुआ. कुछ लोगों के लिये प्रेम का अर्थ पूर्ण समर्पण होता है. प्रिया कुछ ऐसी ही थी. अब विस्तार के लिये ख़ुद को सम्हालने की बारी थी. यार-दोस्त उसका गम गलत करने के लिये हर शाम इकठ्ठा हो जाते थे. बहुतों के घर में परिवार के सामने पीने की मनाही थी. उन्हें एक परमानेन्ट अड्डा मिल गया था. जल्दी ही विस्तार को दोस्ती-यारी-प्यार सबके मायने समझ आ गये. जब तक वो झेलता रहा दोस्तियाँ बरकरार रहीं. जिस दिन खुल कर मना किया, दोस्ती के सारे कस्में-वादे हवा हो गये. उसे आज से पहले कभी इतना अकेलापन नहीं लगा था. पहली बार उसने अपने लिये अकेले बोतल खोली थी. जितना वो अपने डिप्रेशन से उबरने की कोशिश करता उतना ही और डूबता जाता. 

कुछ शुभचिंतकों की सलाह पर उसने चिकित्सकीय परामर्श लेने का निर्णय लिया. उसे उम्मीद थी कि अपना हाल-ए-बयाँ करने के बाद उसका दर्द कुछ कम हो जायेगा. लेकिन डॉक्टर का तो ये पेशा है उसे अपनी प्रैक्टिस के छह घंटों में अधिक से अधिक लोगों का दर्द कम करना है. विस्तार की कहानी चाहे कितनी ही दर्द भरी और लम्बी हो, उसके पास बमुश्किल पन्द्रह मिनट ही थे. फिर भी विस्तार को अच्छा लगा कि बहुत दिनों बाद ही सही किसी ने उसको सुना. ये सिलसिला चल निकला. महीने में एक बार वो डॉक्टर के पास आता और अपनी व्यथा कथा बता कर फारिग हो लेता. डॉक्टर भी दवाइयों में थोड़ी बहुत तब्दीली कर अपनी फ़ीस को जस्टिफाई कर देता. 

आज विस्तार कुछ ठान कर आया था. उसने कमरे में घुसते ही डॉक्टर की आँख में अपनी आँख डाल  दी. डॉक्टर साहब 6 - 8 महीने होने को आये आप कर क्या रहे हो. सिर्फ़ मेरी कहानी सुनते हो और इतनी मोटी फ़ीस झाड़ लेते हो. मँहगी मँहगी दवाइयाँ लिख देते हो. ऐसा कब तक चलेगा. डॉक्टर को रीएक्ट न करने की ट्रेनिंग मिली थी. तटस्थ भाव से उसे बोलते हुये देखता रहा. जब विस्तार को लगा कि बहुत बोल चुके तो वो अपने आप चुप हो गया.  

पहली बार डॉक्टर मुस्कुराया होगा. बहुत छोटी सी बात थी तुम्हें अब समझ आयी. जब तुम अपने आप में नहीं थे तुम्हें मेरी और दवाइयों की ज़रूरत थी. ये ज़िन्दगी तुम्हारी है जिसकी बागडोर तुम्हें अपने हाथ में रखनी होगी. नहीं तो सब तुम्हें इधर-उधर घुमाते रहेंगे. मेरा काम ही है दूसरों को उनके पैरों पर खड़ा करना. मुझे तुम्हारी सारी परेशानियों का अंदाज़ है लेकिन मै भी यदि तुमसे सहानुभूति दिखाने लगता तो तुम अपने ही बनाये जाल में उलझ के रह जाते. इन परिस्थितियों में लोग दूसरों से सहानुभूति की आशा पाल लेते हैं. और लोग भी उन्हें दया का पात्र समझ कर कुछ शब्द बोल देते हैं. कभी कभी परेशानियों से उबरने में समय लगता है. कोई परेशानी ज़िन्दगी से बड़ी नहीं है. जीवन में जीवन से बड़ा बस स्वास्थ्य है. कोई किसी के संग नहीं आता-जाता. सब अकेले हैं. जीवन छोड़ते जाओ तो छूटता चला जाता है. जीना है तो छोड़ना कुछ नहीं. सुख और दुःख दोनों जीवन के हिस्से हैं. तुम्हारे हिस्से सिर्फ़ सुख आयेगा ऐसा नहीं है. जीवन जीना है तो उसकी आँख में आँख मिला कर देखना पड़ेगा जैसे आज तुम मेरी ओर देख रहे हो. भागने से काम नहीं चलेगा. जिंदगी बहुत लम्बी है. ज़िन्दगी का नज़रिया बदलना पड़ता है. 

आज के बाद शायद तुम्हें मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी. और पड़ेगी तो बेहिचक चले आना. बस पन्द्रह सौ ही तो कंसल्टेशन फ़ीस है तुम्हारी व्यथा सुनने की. 

- वाणभट्ट