शनिवार, 1 सितंबर 2018

या देवी सर्व भूतेषु

या देवी सर्व भूतेषु

सुबह-सुबह अदरक की कुटाई चल रही थी। टहलने के बाद किसी धार्मिक चैनल पर प्रवचन सुनते हुये अखबार से चिपक जाना प्रकाश की आदत बन चुकी थी। लोग अखबार ऐसे पढ़ते हैं जैसे किसी एग्जाम के लिये जीके की तैयारी कर रहे हों। पता नहीं कौन सा क्वेशचन कहाँ से आ जाये। लेकिन दस मिनट बाद कोई पूछ लें कि कोई खास खबर तो बतायेंगे फलां मोहल्ले में चोर भैंस हाँक ले गये...कैसा ज़माना आ गया है। 

कुछ अलग करने की गरज़ से प्रकाश एडिटोरियल पढ़ा करता था। समकालीन चिंतकों के विचार पढ़ना उसका शग़ल था। कब कहाँ मौका मिल जाये और वो उन विचारों को अपना बता कर बुद्धिजीवियों की कतार में शामिल हो जाये। विचारों का कहाँ कॉपीराइट होता है। ये बात अलग है कि संख्याबल पर चलने वाले इस देश में बुद्धिजीवियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। पढ़ते-पढ़ते उसने जिज्ञासा को आवाज़ लगायी "देवी चाय नहीं आयी अभी तक, अखबार खत्म होने को आया। अरे हाँ आज का अखबार बिल्कुल छूना मत। पता नहीं क्या-क्या छाप देते हैं देवी।" वो जिज्ञासा को देवी ही बुलाता था। शायद स्वयं को देवता घोषित करने का ये सबसे आसान तरीका है क्योंकि यंत्र नार्य पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता वाला सीधा-सटीक सिद्धान्त है।

जिज्ञासा चाय की ट्रे हाथ में लिये हाज़िर हो गयी। "क्यों न पढ़ूँ आज का पेपर। ज़रूर कोई नारी मुक्ति की बात लिखी होगी। चाहे कोई कितना भी पढ़-लिख ले लेकिन नारी की स्वतंत्रता उसे रास नहीं आती। अब तो पढ़ना ही पड़ेगा। अखबार बढ़ाओ।" चाय का प्याला पकड़ते हुये प्रकाश ने अखबार का न पढ़ने वाला पन्ना आगे करके पत्नी को पकड़ा दिया। 

प्रकाश एक मल्टीनेशनल फर्म में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। जिज्ञासा विज्ञान में पीएचडी कर के एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत थी। दोनों की केमिस्ट्री अच्छी थी। नोक-झोंक हर समय चलती रहती। ऐसे ही साल गुज़रते गये और जिम्मेदारियाँ बढ़ती गयीं। जिज्ञासा ऑफिस और घर का मैनेजमेंट बखूबी निभाती जबकि उम्र में प्रकाश से कुछ छोटी ही थी। लेकिन दो बच्चों के बाद भी प्रकाश पूरा बच्चा ही बना हुआ था। जब तक वो घर पर रहता उसकी ज़िन्दगी जिज्ञासा के इर्द-गिर्द ही घूमती। कपड़े निकल दो। टाई कहाँ है। क्या खिला रही हो। हर समय कहाँ बिज़ी रहती हो। कुछ देर साथ बैठ जाया करो। लेकिन डबल ड्यूटी करने वाली जिज्ञासा के पास इतना समय कहाँ था। सो निर्णय ये हुआ कि सुबह की चाय साथ पियेंगे। और ये नियम बदस्तूर चलता था।

आज के एडिटोरियल में किसी महिला एक्टिविस्ट ने एक बहुत ही सुन्दर लेख लिखा था। उसका अभिप्राय ये था कि आज महिलायें लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम कर रही हैं। और अक्सर उनसे अच्छा भी। वो उच्च पदों को सुशोभित ही नहीं कर रही बल्कि उनमें निहित व्यावसायिक ज़िम्मेदारियाँ बखूबी निभा रही हैं। खास बात ये है कि घर वापसी पर भी घर के सारे काम उनका इंतज़ार कर रहे होते हैं। और वो इसे काम भी नहीं मानती। पति और बच्चों के साथ दोस्त-रिश्तेदारों को सम्हालना शायद सुपरवुमन के बस की ही बात है।

लेख ने एक प्रश्न खूबसूरती से उछाला था कि ये पुरुष ऑफिस में ऐसा क्या करते हैं कि घर आने के बाद सिर्फ टीवी देखने और मैगज़ीन पलटने लायक ही बचते हैं। देवता बनना शायद  कठिन नहीं है लेकिन देवता बने रहना थोड़ा मुश्किल ज़रूर है। जिज्ञासा ने लेख खत्म करते हुये अपने अंदाज में कहा "कब से हाथ बटाने का इरादा है मिस्टर प्रकाश।"

- वाणभट्ट

5 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, नए दौर की गुलामी “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. कड़वी सच्चाई यही है कि पुरुष आफिस में उतना काम नहीं करते हैं जितना घर पे ऑफिस के काम से थके होने का ढोंग करते हैं।
    बहुत समीचीन लेख है।धन्यवाद बाणभट्ट जी

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  3. जाने क्या सोच कर हमारे पूर्वजो ने स्त्री पुरुष में भेदभाव रखना शुरू किया। जबसे समान दर्जा मिलने लग गयी मानो गृहस्ती टूट रही है । पहले जैसा टिकाऊ सुंदर विवाद नही हो रहे है। समाज व्यबस्था जिस बुनियाद पर टिकी हुई थी उसके अंतर्निहित संदेश को हम समझने मे सफल नही रहे। क्या अच्छा है क्या बुरा है इसी कश्मकश में पूरी जिंदगी बिता दिए। समय की जो मांग है वही अच्छा है। स्त्री पुरुषमें भेदभाव ईश्वर प्रदत्त है एवं तद्नुसार कार्यछमता और कार्य के प्रकार भी बाटे हुए है। पी एस बसु

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यूं ही लिख रहा हूँ...आपकी प्रतिक्रियाएं मिलें तो लिखने का मकसद मिल जाये...आपके शब्द हौसला देते हैं...विचारों से अवश्य अवगत कराएं...