तब तक बाबा वैलेंटाइन का आविर्भाव भारत की धरा पर नहीं हुआ था। ये कहना मुश्किल है कि उस दौर में देश, प्रेम के प्रभाव से मुक्त्त रहा होगा। प्रेम पर ग्रन्थ और महाकाव्य आदि काल से यहाँ लिखे जा चुके थे। वैलेंटाइन बाबा के दादा-परदादा की औकात नहीं थी कि हिंदुस्तानी प्रेम की ए-बी-सी भी समझ पाते। सोलह कला सम्पन्न भगवान यहाँ द्वापर में ही डेरा डाल चुके थे। क्यूपिड की अवधारणा भी हमारे कामदेव से चुराई हुयी लगती है। बसंत के आगमन के साथ ही शरद ऋतु में सोयी पड़ी सभी आकांक्षायें और अपेक्षायें अंगड़ाई लेना शुरू कर देतीं हैं। कवियों ने इस माह को ऋतुराज का सम्मान ऐवें ही नहीं दे दिया। इस मौसम का आना और प्रेमीजन का बौराना, यहाँ का एक चिरंतन सत्य रहा है।
जिस प्रकार हर भारतीय अपनी पुश्तैनी श्रेष्ठता मनोग्रन्थि से पीड़ित रहता है, इस बात को सौ फीसदी गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि बाबा वैलेंटाइन ने कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुये प्रेम दिवस का पूरा कॉन्सेप्ट ही हाइजैक कर लिया। अगर ये उनका ओरिजिनल आइडिया होता तो क्या वैलेंटाइन डे बसन्त ऋतु में ही पड़ता। अक्टूबर-नवम्बर में यह दिन मनाया जाता तो कोई नयी बात होती। ये तो हमारी नयी पीढ़ी की विशेषता है कि अपने स्वर्णिम अतीत को पूरी तरह झुठला देना चाहती है। हर चीज़ के लिये पश्चिम की ओर मुँह बाये देखती रहती है। जिस देश में सुर-ताल भी नियम-कानून से आबद्ध रहता हो वहाँ प्रेम की मर्यादायें भी भली-भाँति परिभाषित थीं। ये माउस-कम्प्यूटर-फेसबुक वाली जेनेरेशन अपनी विरासत को अन-डू करने पर आमादा है। पर इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। जवानी हमेशा दीवानी होनी ही चाहिये। सदैव नयी संभावनाओं की तलाश का ही नाम है, जवानी। सपने देखने का हौसला और उन्हें पूरा करने की ज़िद। जैसे नीम-पुदीना-तुलसी-अदरक-हल्दी हमारे पेटेंट हैं वैलेंटाइन डे पर भी हमें दवा ठोंक देना चाहिये। मुझे यह कहने में कतई गुरेज़ नहीं है कि बाबा वैलेंटाइन ने हमारा ही आइडिया चुरा के कई मल्टीनेशनल कम्पनियों के माध्यम से हमें ही वापस बेच दिया।
हर क्रिया-कलाप का सामाजिक के साथ-साथ एक आर्थिक पक्ष भी होता है। युवाओं में प्रेम का इतना बड़ा मार्केट खोज पाने में देशी उद्योग जगत पूर्णतः असफल रहा। चॉकलेट-कार्ड-गिफ्ट का सिलसिला, जो पूरे हफ़्ते चलता है, शनै-शनै एक अच्छे-ख़ासे व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है। कभी-कभी तो ये लगता है कि ये मल्टीनेशनल कम्पनियाँ न आतीं तो हमारे युवाओं का क्या होता। अपने लिये सच्चा प्यार खोज पाना इस पीढ़ी के लिये कितना कठिन होता।
ऐसा नहीं है कि पुराने ज़माने में लोग प्रेम-सुख से वंचित रहे हों। को-एड स्कूलों में पढ़ने का और कोई फ़ायदा रहा हो या न रहा हो, एक फ़ायदा ज़रूर होता था, बच्चों में प्रेम के प्रति अनुराग कम उम्र में ही विकसित हो जाता था। जितने भी प्रेमीजन हुआ करते थे, उन्हें किताबों और नोट्स की अदला-बदली का बहाना मिल जाया करता। ये बात अलग है कि अक्सर इस प्रकार का प्रेम इसी अदला-बदली तक ही सीमित रहता और कोई तीसरा गिफ्ट-विफ्ट पकड़ा कर बाज़ी मार जाता। टीचर-माँ-बाप और हितैषी पड़ोसियों कारण कितने ही प्रेम असफल रह गये कहना कठिन है। आठवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते टीन तो लग ही जाता था। उस पर तुर्रा ये कि कई साल के दो-चार फेलियर लडके-लड़कियों को उभरते प्रेमीजन बतौर कंसल्टेंट रख लेते। मर्यादा का तो ये आलम था कि टीचर्स केचुओं के निषेचन का पाठ स्किप कर जातीं। लडके उन पन्नों अंकित शब्दों को समझने का प्रयास करते। लड़कियाँ बगल में बैठे गहन अध्ययन में व्यस्त लड़के के उन पृष्ठों पर यूँ नज़र डालतीं मानो अश्लील साहित्य हो।
श्याम सिंह। हाँ, यही नाम था उसका। आठवीं कक्षा में चार बार फेल होने के कारण उन्हें हमारी कक्षा की शोभा बढ़ाने का भी मौका मिला। बताने वाले बताते थे, श्याम सिंह किसी रईस बाप की औलाद है और कहने वाले कहते कि श्याम सिंह का दिल हमारी क्राफ्ट टीचर पर आ गया है। इसलिये पास होना नहीं चाहता। आठवीं तक ही था, हमारा स्कूल। उसके बाद लड़कों के जीआईसी में एडमिशन लेना होता। जिसका हौवा उसी तरह था, जैसे इण्टर के बाद आईआईटी का। उस समय दिल के आने का मतलब भी समझ से परे था। गाहे-बगाहे जो फिल्में देखने का मौका मिलता उनमें भी मर्यादा का समवेश मर्यादा की पराकाष्ठा तक रहता। प्रेमी युगल दूर-दूर खड़े हो कर गाना गाते, तो फूल टकराते, तोते चोंच लड़ाते। ऐसे में केचुए के बारे में ना पढ़ा कर हमारे गुरुजनों ने हमारे साथ जो अन्याय किया उसकी नयी शिक्षा व्यवस्था में गुंजाईश नहीं है।
एक दिन बरखा मैम बहुत गुस्से में थीं। "श्याम सिंह हाथ निकालो"। श्याम सिंह ने दाहिना हाथ सामने कर दिया। मैम ने आव देखा न ताव लकड़ी के स्केल से तड़ातड़ मारना शुरू कर दिया। श्याम सिंह का हाथ लाल हो गया लेकिन बन्दे ने उफ़ तक नहीं की। अमूमन एक-दो स्केल खाने के बाद आम छात्र अपना हाथ दायें-बायें-पीछे खींचने लगता। लेकिन श्याम सिंह ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हाथ के ऊपर स्केल पड़ते रहे पर उसके चेहरे पर शिकन का नामोनिशान भी न था। उसकी बेख़ौफ़ नज़रें मैम के चेहरे पर टिकी थीं। वो चेहरा जेहन में अभी भी ज़िंदा है। हमेशा शांत-संयत और मधुर स्वभाव वाली बरखा मैम को वैसे गुस्से में किसी ने नहीं देखा था। वो श्याम सिंह को घसीटते हुये प्रिंसिपल के रूम में घुस गयीं।
उस दिन के बाद श्याम सिंह को किसी ने नहीं देखा। कक्षा के खोजी पंडितों ने बताया कि अगले दिन डस्टबिन में लिपस्टिक-पाउडर-चूड़ी-बिंदी-माला पड़े मिले थे। चॉकलेट-कार्ड्स का प्रचलन उस ज़माने में होता तो श्याम सिंह उसी क्लास में दो-चार साल और फ़ेल हो सकता था।
- वाणभट्ट